गुरुवार, 13 मई 2021

कोरोना काल में टीवी पत्रकारों का योगदान...

             कोरोना जैसे राष्ट्रीय संकट के समय भी दर्दों के सौदागर बाज नहीं आ रहे, यह बहुत दुःखद है । कुछ टीवी न्यूज़ चैनल वाले नकारात्मक और भ्रामक समाचारों के उत्पादन गृह बनते जा रहे हैं । इन्हें न तो वायरोलॉज़ी की कोई जानकारी होती है न मेडिकल साइंस की फिर भी कोरोना और इसके इलाज के विषयों पर अपने निर्णयात्मक आरोपों के साथ सरकारों और चिकित्सकों को कटघरे में खड़ा करते रहने में ये लोग रात-दिन एक किये दे रहे हैं । यह सब माहौल को और भी पैनिक बनाता है । ऐसे चैनल्स को प्रतिबंधित किया जाना चाहिये ।

समाचार दिखाये जा रहे हैं कि कोरोना टेस्ट किये बिना केवल लक्षणों के आधार पर ही डॉक्टर्स कोरोना का इलाज़ शुरू कर देते हैं । यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आज दिनांक तक कोरोना का कोई विशिष्ट इलाज़ है ही नहीं, जो भी इलाज़ किया जा रहा है वह सब लाक्षणिक ही है इसलिये टेस्ट करने से चिकित्सा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है । हाँ यह अवश्य है कि यदि टेस्ट पॉज़िटिव आता है तो रोगी व्यक्ति से अन्य लोगों में संक्रमण फैलने की सम्भावनाओं को न्यून करने के उपाय करने में सुविधा होती है । किंतु यह काम तो बिना टेस्ट के भी किया जा सकता है । व्यावहारिक बात यह है कि टेस्ट रिपोर्ट आने तक की अवधि में रोगी की व्यवस्था कोरोना पॉज़िटिव जैसी होनी चाहिये या कोरोना निगेटिव जैसी? इसका निर्णय कैसे होगा? वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो यह है कि सारी सम्भावनाओं को न्यूनतम करने की दृष्टि से सम्भावित कोरोना या उससे मिलते-जुलते लक्षणों को देखते ही कोरोना पॉज़िटिव जैसी ही व्यवस्था की जानी चाहिये । इसलिये टेस्ट नहीं होने या टेस्ट की रिपोर्ट देर से आने का चिकित्सा पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है । इस समय किसी पर उँगली उठाने की अपेक्षा मिलजुल कर काम करने की आवश्यकता है किंतु इस तरह की कोई संस्कृति या कार्यप्रणाली हमारे देश में अभी तक निर्मित ही नहीं हो सकी । सभी राजनीतिक दलों को इस आपदा में एक साथ खड़े होने की आवश्यकता है और सबसे बड़ी आवश्यकता तो इस बात की है कि जो लोग चिकित्सा विज्ञान से सम्बंधित नहीं हैं उन्हें इन विषयों पर कोई वैज्ञानिक टिप्पणी करने से बचना चहिये । यूँ भी पल-पल बदलते कोरोना के स्वरूप के साथ ही चिकित्सा के निर्णय और रणनीति भी बदलती जा रही है जिससे आम लोगों में भय और अविश्वास का वातावरण बनता जा रहा है । ऐसे में टीवी पत्रकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यवस्था पर प्रश्न अवश्य उठायें पर चिकित्सा कैसे करनी है इस विषय पर कोई भी अधिकृत टिप्पणी न करें इस आपदा में उनका यही योगदान सबसे बड़ा योगदान होगा । आर.टी.पी.सी.आर टेस्ट, रेम्डेसिविर और ऑक्सीजन को लेकर मीडिया में बहुत अधिक बबाल मचा दिया गया है जबकि ये सब उतने आवश्यक नहीं हैं जितने कि तुरंत लाक्षणिक चिकित्सा, आइसोलेशन, शांति,  धैर्य और राष्ट्रीय एकजुटता ।       

सोमवार, 10 मई 2021

भारत में आज भी रहते हैं दैत्य-दानव और असुर...

      प्राचीन भारत के पौराणिक आख्यानों में हम दैत्य-दानव और असुर जैसे आततायी समुदायों के बारे में पढ़ते रहे हैं । क्या आज भी उन समुदायों का भारत में अस्तित्व है या फिर कालक्रम से अब वे सब समाप्त हो गये हैं, इस विषय पर चर्चा करने से पहले मैं सन् 1962 के उन दिनों की बात बताना चाहूँगा जब पिता जी चीनी युद्ध के सम्बंध में रोज शाम को घर के सभी सदस्यों के सामने नये-नये समाचार दिया करते थे । उन समाचारों में भारत-चीन युद्ध की बातें और हीरोशिमा-नागासाकी पर डाले गये बमों की यादें भी हुआ करतीं । हमने पहली बार पिता जी के मुँह से माओ जेदांग और च्यांग्काई शेक जैसे अज़ीब नाम सुने । लोग आपस में चर्चायें करते कि चीन तो भारत का मित्र था यह अचानक उसने भारत पर हमला क्यों कर दिया? माँ भी अपने बचपन के किस्से सुनाया करतीं कि बरतानिया हुकूमत के दिनों में लोग किस तरह फिरंगियों से डरा करते और गाँव के लोग उन्हें देखते ही छिप जाया करते । दादी के किस्सों में अच्छे राजा, बुरे राजा, दैत्य राजा और दानवों की बातें हुआ करती थीं । मेरे बाल मन में बुरे और हिंसक लोगों के शब्दचित्र जमा होते रहे । मैं सोचा करता कि हो न हो फिरंगी और चीनी भी दैत्य, दानव या फिर असुर ही होते होंगे ।   

वे दहशत भरे दिन थे, मुझे रात में डरावने सपने आया करते । तब मेरी उम्र मात्र चार साल की थी, मैं सपने में देखा करता कि हाथ में बंदूकें लिये चीनी सेना ने हमारे गाँव को घेर लिया है और ऊपर आकाश में बम गिराने वाले जहाज मँड़रा रहे हैं । मैं दिन में भी चारपायी से नीचे उतरने में डरा करता, और पूरे दिन घर भर में यही खोजा करता कि कहीं कोई चीनी सैनिक तो नहीं है । सूरज डूबने के साथ ही मेरी मुश्किलें बढ़ जाया करतीं, मुझे लगता कि मेरे सो जाने के बाद किसी भी क्षण चीनी सेना टनकपुर तक आ जायेगी । जैसे-तैसे रात कटती तो सुबह होते ही थोड़ी राहत मिलती कि चलो एक दिन और निकला । गाँव के लोग बातें करते कि भारतीय सेना के पास हथियार नहीं हैं, चीनी सेना अगर टनकपुर तक आ गयी तो बरेली और लखनऊ पर चीन का कब्ज़ा हो गायेगा ।

उस समय ये ख़बरें भी आया करतीं कि भारत की आमजनता ने युद्ध के लिये अपने जेवर तक नेहरू जी को दान में दे दिये । उस समय एक ख़बर और भी आया करती कि बाजार में न तो चॉकलेट है, न जेबी मंघाराम के बिस्किट और न गेहूँ । चार साल की उम्र में मैंने जमाखोरी और कालाबाजारी जैसे शब्दों को भी सुना । मैं इन शब्दों के अर्थ नहीं जानता था पर इतना अवश्य जान गया कि ये दोनों शब्द अच्छे नहीं हैं और इन्हीं दोनों शब्दों के कारण बाजार में कोई भी चीज बहुत ऊँचे दाम पर बेची जाती है । मैं मन में सोचा करता कि नेहरू जी अगर इन दोनों शब्दों को हटा दें तो हर बच्चे को चॉकलेट और जेबी मंघाराम के बिस्किट पुराने दामों पर ही मिल जाया करेंगे ।

आज एक बार फिर भारत में चीन की दहशत है । चीन ने भारत के विरुद्ध विषाणु युद्ध छेड़ दिया है । गुरिल्लायुद्ध में विश्वास रखने वाले चीन ने अपनी युद्ध नीति में छल का स्तर और भी गिरा दिया है । लोग मर रहे हैं, दिल्ली में इलाज़ से लेकर शव को मरघट तक ले जाने और फिर दाह संस्कार करने के लिये मृतकों के घरवालों को पानी की तरह पैसा बहाना पड़ रहा है । लोग कोरोना पीड़ितों को बड़ी निर्ममता से लूट रहे हैं । कोरोना एक अवसर बन गया है, लोग दवाइयों और ऑक्सीजन की जमाखोरी और कालाबाजारी कर रहे हैं । कोरोना से संक्रमित आदमी एक निर्बल शिकार है जिसे बहुत से जंगली कुत्तों ने घेर लिया है और वे उसके मरने से पहले ही नोच कर खा जाने के लिये उतावले हो गये हैं ।

इन दोनों संकटों में चीन, दहशत, युद्ध, दर्द में अवसर, जमाखोरी और कालाबाजारी जैसे कुछ शब्द उभय हैं जिनकी पुनरावृत्ति आश्चर्यजनक है । दैत्य-दानव और असुर जैसे समुदाय भारत में आज भी हैं और अब वे पहले से भी अधिक क्रूर और आततायी हो गये हैं ।

शुक्रवार, 7 मई 2021

सत्ता और सम्मान...

यदि यह राजतंत्र होता तो अब तक ममता बनर्जी ने तलवार की दम पर पश्चिम बंगाल को भारत से जीत कर एक पृथक राज्य बना लिया होता ।

विधानसभा चुनाव के समय ममता बनर्जी ने कहा था कि वे ख़ून की नदियाँ बहा देंगी, …चुनाव के बाद सबको देख लेंगी...। चुनाव हो गया और चुनाव परिणाम आते ही ममता ने सबसे पहले अपने दोनों वादों को पूरा कर दिया । तब से आज एक सप्ताह बाद भी बंगाल में ख़ून की नदियाँ बहायी जा रही हैं, यौनहिंसायें हो रही हैं, आगजनी और छुरेबाजी हो रही है, कश्मीर की तर्ज़ पर धमकी दी जा रही है कि हिंदू या तो इस्लाम स्वीकार करें या फिर मरने के लिये या बंगाल छोड़ने के लिये तैयार रहें । हिंदुओं के नस्लीय उन्मूलन से भारत का कोई प्रगतिशील नागरिक अब चिंतित नहीं है, धर्मनिरपेक्षता का यह उत्कृष्ट उदाहरण है ।

पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों से हिंदुओं का पलायन शुरू हो चुका है और दुनिया के तीस से भी अधिक देशों में इन घटनाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं । अब कोई मन की बात नहीं करता, हर ज़िम्मेदार आदमी इस समय मनमोहन सिंह बन गया है । धार्मिक हिंसाओं और कश्मीर घाटी से हिंदुओं के पलायन से डरे हुये हिंदुओं ने भाजपा को वोट दिया था ...इस लोभ में वोट दिया कि मोदी हिंदुओं की रक्षा करेंगे । निर्बल का लोभ कभी पूरा नहीं होता । हिंदुओं के सम्राट बने मोदी और अमित शाह ने हिंदुओं को निराश किया । पश्चिम बंगाल में हिंसा जारी है और भारत का हिंदू असहाय है ।

बंगाल वह धरती है जहाँ अंधविश्वास, विज्ञान, संगीत, कला, देशभक्ति और क्रांति के साथ विश्वासघात का भी ख़ूब खेला होता रहा है । बंगाल की धरती कई बार रक्तरंजित होती रही है जिसके कारण वहाँ की धरती पर विदेशियों का भी शासन रहा, यहाँ तक कि अरबी शासकों के ग़ुलामों का भी । 

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में इत्योपिया से लाये गये हब्शी गुलामों और ख़्वाज़ासरों की तलवारों में ताकत थी । मौका आते ही उन्होंने अपनी तलवारों का स्तेमाल किया और बंगाल पर कुछ समय के लिये हुकूमत भी की । यह वह दौर था जब सत्ता के लिये तलवारों के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं हुआ करता था । भय और हिंसा से सत्ता की छीनाझपटी का वह दौर आज भी बीता नहीं है । पिछले माह सम्पन्न हुये पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों के समय प्रारम्भ होकर अब तक जारी हिंसा के इस कटु सत्य को भारत भले ही न देख पा रहा हो पर शेष दुनिया तो देख ही रही है ।

डर से सत्ता तो पायी जा सकती है पर सम्मान नहीं, बिल्कुल नहीं । बंगाल में लम्बे समय से भय का साम्राज्य रहा है, पहले लॉर्ड कर्जन का फिर लेफ़्ट का और अब ममता बनर्जी का । ममता बनर्जी के उग्र रूप को टीवी पर देख कर बच्चे डर जाते हैं, मैं सहम जाता हूँ, और अब तो लेफ़्ट भी ममता से डरने लगा है । कंगना रानावत का ट्विटर अकाउण्ट प्रतिबंधित हो जाने के बाद तो अब कोई ममता के विरुद्ध एक शब्द बोलने का साहस नहीं कर सकेगा । अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग करते हुये सार्वजनिक मंचों पर ममता बंगाल में ख़ून बहा देने की धमकी दे सकती हैं किंतु ममता के विरुद्ध कोई एक शब्द भी नहीं बोल सकता । यही है असली लोकतंत्र जिसके लिये बंगाल के कई क्रांतिकारियों ने यातनायें सहते हुये अंग्रेज़ों से लोहा लिया था ।

चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत के साथ ही टीवी समाचारों में ममता की तारीफ़ों के पुल बाँधे जाने लगे । हमारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का यही चरित्र रहा है, हारने वाला बुरा होता है और जीतने वाला पल भर में ही अच्छा हो जाता है । तृणमूल कांग्रेस के हिंसक चरित्र से डरते हुये भी मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ममता बनर्जी के डर ने मेरे मन से उस स्त्री के प्रति सम्मान को शून्य कर दिया है । स्वतंत्र भारत के सबसे क्रूर शासकों में एक स्त्री का नाम लिखा जा चुका है ।

धर्म और जाति का विरोध करने वाले अंग्रेज़ों ने धर्म और जाति के आधार पर ही भारत में हुकूमत भी की और टुकड़े भी किये । समाज को जोड़ने की पैरवी करने वाले ब्रिटिशर्स ने समाज को जम कर छिन्न-भिन्न किया । 19 जुलाई 1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल को अलग करने की घोषणा की । सन् उन्नीस सौ सैंतालीस में एक बार फिर उग्र धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ । इण्डिया के सत्ताधीशों को अंग्रेज़ों की सियासी शातिराना चालें ख़ूब अच्छी लगती हैं । अंग्रेजों के छल अब हमारी परम्परा के महत्वपूर्ण अंग हैं ।

सत्ता के लिये बंगाल विधानसभा चुनाव में दो अहंकार आपस में टकराये । एक ने दूसरे पर विजय पायी । हारने के बाद भी ममता को सरकार बनाने का अवसर मिला । मैं इसे लोकतंत्र की ख़ूबसूरती कहकर महिमामण्डित करता हूँ, आप इसे लोकतंत्र की अलोकतांत्रिक परम्परा मानते हैं । मानने और होने में यही तो फ़र्क है ।

नंदीग्राम में जीत के उन्माद में हिंसा और आगजनी का प्रारम्भ हुआ ताण्डव अब बंगाल के कई जिलों में फैलता जा रहा है । मैं इसे भी लोकतंत्र कहता हूँ, आप इसे गुण्डत्व कहते हैं, कहते रहिये क्या फ़र्क पड़ता है । ममता और मोदी दोनों एक-दूसरे को बंगाल हिंसा के लिये दोषी ठहरा रहे हैं, ठहराते रहिये हिंदुओं के नरसंहार पर इस दोषारोपण से क्या फ़र्क पड़ता है, वह तो हो ही रहा है, होता ही रहेगा । चुनाव आयोग ने समय रहते यदि कानूनी कार्यवाही की होती तो शायद यह सब न होता । पश्चिम बंगाल के कुछ जिले कश्मीर घाटी की राह पर चल पड़े हैं । कल सारा आरोप पाकिस्तान पर थोप देना, मामला ख़त्म ।

इण्डिया जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म एक प्रमुख फ़ैक्टर हुआ करता है जहाँ धार्मिक दंगे होते हैं, धार्मिक आधार पर नरसंहार होते हैं, धार्मिक हिंसा होती है, धार्मिक नफ़रत होती है और चुनाव में धर्म एक महत्वपूर्ण निर्णायक तत्व होता है । यहाँ धर्म और धर्मनिरपेक्षता दोनों एक साथ चलते हैं । एक मौन है, दूसरी वाचाल है ।

राजा प्रजा को अफ़ीम खिलाता है और ख़ुद मदिरा पीकर उन्मत्त हो विचरण करता है । हमने तो भारत में लोकतंत्र के इसी स्वरूप को देखा है । कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से निष्कासित कर दिया गया, सब तमाशा देखते रहे और अब पश्चिम बंगाल से हिंदुओं को निष्कासित किया जा रहा है, सब तमाशा देख रहे हैं । जय हो भारत भाग्य विधाता ! जय हो मोदी ! जय हो ममता ! जय हो चुनाव आयोग ! जय जय जय जय हो !

-फ़िल्म सिटी नोयडा से अचिंत्य


सिस्टम का हिस्सा...

         न धन था, न अवसर इसलिये त्यागी बन गया । फिर जैसे ही अवसर मिला तो सांसारिक भी बन गया और प्रचण्ड बेइमान भी । सामने ऐश्वर्य हो और अवसर भी अनुकूल हो तो स्वयं को ऐश्वर्य भोग से विरत रख पाना बड़े-बड़े सिद्धांतवादी संतों के लिये भी सम्भव नहीं होता ।

प्रवचन और आदर्शों का बखान उनकी विशेषतायें हैं तथापि वे मानते हैं कि जो सिस्टम का हिस्सा नहीं बनेगा उसे जीने नहीं दिया जायेगा ...। वे पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहते हैं । लोक कल्याण और वसुधैव कुटुम्बकम के नारों के पीछे छिपे शातिराना छल के साथ वे अपनी पताका फहराना चाहते हैं । वे बड़ी मासूमियत से कहते हैं कि वे पवित्र हैं और उनके उद्देश्य पूरी तरह सात्विक हैं किंतु कुछ लोग उनकी संस्था को कलंकित कर रहे हैं । यह एक शातिराना स्पष्टीकरण है जो मुझे कभी संतुष्ट नहीं कर पाता । वे अपनी संस्था के ऐसे सदस्यों का बहिष्कार क्यों नहीं करते जो उच्च पदों पर पहुँचते ही सारे आदर्शों को आग लगाकर सिस्टम का हिस्सा बनने में पल भर की भी देर नहीं लगाते ?

निश्चित ही उनकी संस्था पतित नहीं है किंतु उनके बहुत से लोग पतित हैं । मुझे पवित्र संस्थाओं के उन पतित लोगों और एक महाभ्रष्ट व्यक्ति में कोई अंतर दिखायी नहीं देता । उनका दावा है कि वे भारत से भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहते हैं ...और इसके लिये उन्हें भ्रष्टाचार में सम्मिलित होना होगा । मेरी अल्पबुद्धि इस रहस्य को कभी समझ नहीं सकी । उनके पास आदर्श वाक्यों की कमी नहीं होती, वे विष से विष की चिकित्सा करने का उदाहरण देते हैं, किंतु...  

किंतु बड़ी चतुराई से वे इस सत्य की उपेक्षा करते रहते हैं कि विष की चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाले विष को पहले शुद्ध होकर अमृत होना होता है । पवित्र संस्था के अपवित्र लोग इस सत्य की प्रायः उपेक्षा करते पाये जाते हैं । वे इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहते कि अच्छे उद्देश्य के लिये चुना गया भ्रष्ट मार्ग कभी भी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँचा करता । आप कितने भी पवित्र क्यों न हों किंतु जब आप किसी सिस्टम का हिस्सा बनते हैं तो आप उस सिस्टम को आत्मसात करते हैं, उसके आगे की यात्रा में सात्विकता का कोई स्थान नहीं हुआ करता । पवित्र संस्थाओं को ईमानदारी से मंथन करना होगा ।

ईश्वर को यह सदा ही अपेक्षा रहती है कि कुछ लोगों को असत के विरुद्ध आवाज़ उठाना ही चाहिये भले ही इसके लिये उन्हें गम्भीर स्थितियों का सामना क्यों न करना पड़े ।

यह भारत का दुर्भाग्य है जहाँ कुछ लोग देश को बेचने की होड़ में हैं तो कुछ लोग हिंदुत्व को बेचने की होड़ में । साधुवेश में घूमने वाले रावणों के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी । अब सारा दायित्व आम आदमी पर है वह चाहे तो देश और मनुष्यत्व को बचा ले और चाहे तो प्रतिक्रियाशून्य बना रहे । 

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

विषाणु युद्ध...

 बनाने चले थे वैक्सीन किंतु बन गया घातक बायो-वीपन । चीनियों की मासूम सी लगने वाली इस बात को मान लिया जाय तो भी मैं कहूँगा कि जिस उद्देश्य से वुहान में वैक्सीन की खोज की जा रही थी वह पूरी तरह अवैज्ञानिक और समाज में अनैतिक आचरण को प्रोत्साहित करने वाली थी जिसके परिणामस्वरूप सन् दो हजार उन्नीस में चाहे-अनचाहे हम सब कोरोना विषाणु युद्ध में झोंक दिये गये ।

यह जानते हुये भी कि संयमित यौन-सम्बंध ही एड्स का बचाव है, नैतिक आचरण को प्रोत्साहित करने के स्थान पर अनैतिक आचरण को प्रोत्साहित करने और क्रूर व्यापारिक उद्देश्यों के लिये एक ऐसे वैक्सीन की आवश्यकता का अनुभव किया गया जो असुरक्षित यौन सम्बंधों के बाद भी लोगों को एड्स से बचा सके । वैज्ञानिकों के इस अनैतिक और असामाजिक दृष्टिकोण का ख़ामियाजा अब पूरी दुनिया को भोगना पड़ रहा है ।

ईसवी सन् दो हजार में विदित हुआ कि वुहान स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉज़ी में चीनी वैज्ञानिक चमगादड़ों में पाये जाने वाले एक कोरोना वायरस के ज़ेनेटिक मैटेरियल में परिवर्तन कर एड्स की वैक्सीन तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं । चीन पर अविश्वास करने वाले लोगों को यह संदेह था कि कहीं चीन वैक्सीन के बहाने से कोई विषाणु अस्त्र तो नहीं तैयार करने में लगा है? प्रयोगशाला में काम करने वाले एक कर्मचारी की असावधानी से एक दिन विषाणु को खुली हवा में आने का अवसर मिल गया और देखते-देखते उसने पहले तो चीन में और फिर पूरी दुनिया में तबाही मचानी शुरू कर दी । सारी दुनिया औद्योगिक वैश्वीकरण के सबसे बड़े दुष्प्रभाव से जूझने के लिये विवश हो गयी ।

वुहान की प्रयोगशाला से मुक्त होते ही कोरोना वायरस ने दुनिया को जहाँ के तहाँ ठहरने के लिये विवश कर दिया, भीड़ भरे बाजार निर्जन हो गये, सड़कें सूनी हो गयीं और लोग अपने-अपने घरों में कैद हो कर रह गये । मरघटों में शव रखने के लिये स्थान की कमी पड़ने लगी और कोरोना वायरस के व्यवहार से दिग्भ्रमित हुये डॉक्टर्स में भ्रांतियों की बाढ़ आ गयी । अनुमानों और हाइपोथीसिस को ही प्रमाण मानते हुये कोरोना वायरस, उसके संक्रमण एवं बचाव के तरीकों और चिकित्सा के सम्बंध में आये दिन नई-नई बातें गढ़ी जाने लगीं जो अगले कुछ ही दिनों में सही प्रमाणित न हो पाने पर बदल दी जाया करती थीं । संक्रमितों की जान बचाने के लिये वेंटीलेटर्स का उपयोग किया जाने लगा जो कुछ वैज्ञानिकों को उपयुक्त नहीं लगा । इस नयी व्याधि के लिये किसी के पास न तो कोई औषधि थी और न कोई वैज्ञानिक व्याख्या, सारे तीर अँधेरे में चलाये जाते रहे । डॉक्टर्स ने अनुमानों और जुगाड़ को ही वैज्ञानिक आधार मानते हुये लाक्षणिक चिकित्सा करनी शुरू कर दी । निजी चिकित्सालयों में धन की अभूतवर्षा होने लगी और रोगी कंगाल होने लगे । मृत्यु की सम्भावनाओं का सघन वातावरण तैयार किया जाता रहा जिससे चारो दिशाओं में भय व्याप्त हो गया । भय की बुलेट ट्रेन अनैतिक धन-वर्षा करने लगी । कोरोना वायरस के रिप्लीकेशन को रोकने के लिये किसी ने मलेरिया की दवाइयाँ दीं तो किसी ने ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एण्टीवायरल-एज़ेण्ट दिये किंतु वायरस का रिप्लीकेशन रुकने के स्थान पर उसके नये-नये म्यूटेण्ट्स तैयार होने लगे जिन्होंने और भी तबाही मचानी शुरू कर दी । पहले से उपलब्ध हाड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, इवरमेक्टिन, रेम्डेसिविर और फ़ैवीपिराविर से सफलता नहीं मिली तो कन्वल्सेंट प्लाज़्मा पर भरोसा किया गया, किंतु किसी के भी परिणाम पर्याप्त और संतोषजनक नहीं मिल सके । पहले से ही इण्टेलेक्चुअल ब्लैस्फ़ेमी के शिकार लोगों ने सत्य को अनदेखा करना जारी रखा और परिस्थितिजन्य जैविक अनुकूलन के लिये अपनी जीवनशैली में उपयुक्त परिवर्तन करने से मना कर दिया ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और शीर्ष वैज्ञानिकों की तरह एम.टेक की उपाधि प्राप्त वाराणसी के कलेक्टर कौशल राज शर्मा ने भी अप्रैल 2021 में रेम्डेसिविर का इन्डिस्क्रिमिनेटली स्तेमाल करने से डॉक्टर्स को कठोर शब्दों में मना किया तथापि सारी चेतावनियों की अनदेखी करते हुये रेम्डेसिविर इंज़ेक्शन की माँग बढ़ती ही गयी, इसके बावज़ूद कि वह पहले से ही अपने चिकित्सा उद्देश्यों में बारम्बार असफल होती रही है । एक ओर राजनीतिक विपक्षियों द्वारा कौशल राज शर्मा की विज्ञानसम्मत चेतावनी को मोदी की फासीवादी नीति के प्रमाण के रूप में प्रचारित किया जाने लगा तो दूसरी ओर संकट की घड़ी में हमेशा की तरह इस बार भी असामाजिक तत्वों ने लोगों की विवशता और पीड़ा में से अपने लिये अवसर तलाश लिये और ऑक्सीजन एवं रेम्डेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी शुरू कर दी । वहीं हल्दी, कालीमिर्च, लौंग, चक्रफूल, दालचीनी, तुलसी, नीम और गिलोय जैसी पूरी तरह सुरक्षित और सहज उपलब्ध एण्टीवायरल औषधियों पर लोगों का अविश्वास बना रहा । सभ्य और विकसित मानव सभ्यता के युग में भी लोग इण्टेलेक्चुअल ब्लैस्फ़ेमी के शिकार होते रहने से स्वयं को रोक नहीं सके ।

आम आदमी विज्ञान के अद्भुत अवैज्ञानिक पक्ष के क्रूर दुश्प्रभावों को बड़ी असहायता के साथ भोगने के लिये विवश है । कोरोना वायरस से बचने के लिये जो भी उपाय अपनाये गये वे सभी अपर्याप्त प्रमाणित होते रहे । कोरोना की विशिष्ट औषधि से पूरी तरह अनजान विज्ञान जगत को लाक्षणिक और अनुमान आधारित चिकित्सा के भरोसे अँधेरे में हाथ-पाँव मारने के लिये विवश होना पड़ा । शीघ्र ही संक्रमितों की बढ़ती संख्या के कारण संसाधनों की कमी होने लगी । चिकित्सालयों में औषधियाँ नहीं हैं, ठोस हो चुके फेफड़ों में साँसें ठूँसने के लिये ऑक्सीजन नहीं है, लोग मरते जा रहे हैं । सदा की तरह असामाजिक और अवसरवादी राजनीतिज्ञ एक-दूसरे पर दोष थोपने में लगे हुये हैं और संघीय व्यवस्था चरमरा कर पूरी तरह ध्वस्त हो गयी है । जब राज्य और केंद्र एक-दूसरे के लिये घृणा और विद्वेष की फसलें बोने लगें और पारस्परिक मतभिन्नता शत्रुता की स्थिति को स्पर्श करने लगे तो संघीय व्यवस्था की अवधारणा पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है । जब राजा निर्ममता से प्रकृति का दोहन और अपमान करने लगे तो प्रकृति के पास पूरे राज्य की उपेक्षा करने और दण्ड देने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं हुआ करता । प्रकृति तो समय-समय पर हमें कई बार चेतावनी देती रही है किंतु हमारे पास उस चेतावनी को सुनने-समझने का समय ही कहाँ रहा ! आज समय ने हमें उठाकर पटक दिया है । हमारे सारे संसाधन व्यर्थ होने लगे हैं और चिकित्सा विशेषज्ञों ने अपनी वैज्ञानिक विश्वसनीयता को खो दिया है । पिछली कुछ शताब्दियों में विज्ञान इतना असहाय और दयनीय कभी नहीं रहा जितना कि आज ।  

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

रेम्डेसिविर नहीं है रामबाण फिर भी जारी कालाबाजारी...

         रेम्डेसिविर की कालाबाजारी हो रही है, लोग चीख मार-मार कर रो रहे हैं, प्रशासन और सत्ता को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, राजनीतिक चिल्ल-पों के लिये एक और हथियार मिल गया है । इससे आम आदमी में एक संदेश प्रसारित हो गया कि रेम्डेसिविर कोरोना वायरस की रामबाण दवा है । कोरोना वायरस ने आम आदमी को मेडिकल साइंस के सत्य को जानने-समझने का अवसर दिया है । हम चाहते हैं कि आम आदमी उस सत्य को भी जाने, दुर्भाग्य से जिसका प्रचार नहीं हो पा रहा और जिसे बताने के लिये बेचैन साइंटिस्ट नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गये हैं । इस समय कोरोना वायरस के इलाज़ के लिये प्रचलित दवाइयों के बारे में साइंटिस्ट्स का क्या कहना है, जानिये आप भी –

“Remdesivir is a BSAA, Inhibits the replication of wide range of viruses by targeting viral proteins or host cell proteins used for the replication process. Remdesivir is ineffective after a patient is put on a ventilator, and is also ineffective for asymptomatic, mild, or moderate cases. It shortens progression of disease and hospital time. Not effective in lowering mortality or duration of mechanical ventilation.”

पिछले वर्ष 19 नवम्बर 2020 को Berkeley Lovelace Jr ने एक लेख लिखा था –“WHO tells doctors not to use Gilead’s Remdesivir as a corona virus treatment.” । इस लेख को cnbc.com पर देखा जा सकता है । दिनांक 24 अप्रैल 2021 को हिंदुस्तान टाइम्स के ई.पेपर संस्करण में पौलोमी घोष ने भी अपने लेख में मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज़ दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर नरेश गुप्त के हवाले से चेतावनी देते हुये लिखा है – “A Covid-19 patient may collapse after being administered with Remdesivir and hence it is only recommended to be used discriminately by a doctor in a hospital.”

हम मानते हैं कि रेम्डेसिविर की किस्मत बहुत अच्छी है जिसे शुरुआत में हिपेटाइटिस-सी के इलाज़ के लिये खोजा गया जहाँ यह सफल नहीं हो सका किंतु बाद में इस खोटे सिक्के को सार्स के इलाज़ में चलाने की कोशिश की गयी जहाँ यह एक बार फिर सफल नहीं हो सका, और अब इसे कोरोना वायरस के इलाज़ में आज़माया जा रहा है । अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इसके स्तेमाल से कोरोना वायरस के रिप्लीकेशन को रोकने में कितनी सफलता मिलती है । विशेषज्ञों और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा रेम्डेसिविर को कुछ ख़ास स्थितियों में इमर्ज़ेंसी के तौर पर और ट्रायल के लिये स्तेमाल किये जाने की सिफ़ारिश की गयी है । कमाल की बात यह है कि रेम्डेसिविर ने अपनी तमाम असफलताओं के बाद भी ब्रॉड स्पेक्ट्रम एण्टीवायरल एज़ेण्ट का सम्मानजनक दर्ज़ा हासिल करने में बाजी मार ली है । जो दवा अपने फ़ार्मेकोलॉज़िकल प्रभाव में इतनी अनिश्चित है उसके लिये भारत में हो रही मारामारी कितनी उचित है!

हमारे देश में हल्दी, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, स्टार एनिस, गिलोय, तुलसी और नीम जैसी अनुभूत औषधियों की भरमार है जिन्हें कोई पूछने वाला नहीं है । कोरोना के इलाज़ में एक और आमधारणा पनपने लगी है कि इसके इलाज़ में घर बिक जाता है और मरीज़ अस्पताल से निकलकर घर नहीं सीधे मरघट ही पहुँचता है । इस दहशत ने आम आदमी को आयुर्वेद की शरण में जाने को बाध्य कर दिया है । यदि स्थिति बहुत कॉम्प्लीकेटेड नहीं है तो श्वासकुठार रस, संशमनी वटी, त्रिभुवनकीर्ति रस, महासुदर्शन काढ़ा, यशद भस्म, श्रंग भस्म और गिलोय सत्व के अतिरिक्त यदि पहले से कोई व्याधि है तो उसके सिम्प्टोमैटिक ट्रीटमेंट से आशातीत सफलता मिल रही है और लोग स्वास्थ्य लाभ कर  रहे हैं । दुर्भाग्य से आयुर्वेद, वैदिक संस्कृति, और भारतीय विज्ञान के प्रशंसक लोग भी इन्हें अपने व्यावहारिक जीवन में अपनाने से कतराते हैं, शायद इसीलिये इसे अभी तक सच्चा राज्याश्रय नहीं प्राप्त हो सका है । जिन औषधियों के प्रभाव अनिश्चित हैं उनके लिये मारामारी हो रही है और जो कारगर हैं उनके लिये हुकुम नहीं है ।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

रास्ते और भी हैं...

            बिलखते हुये लोग विवश होकर अपनी आँखों के सामने अपने परिवार के सदस्यों को मरते हुये देख रहे हैं । गाँठ में पैसे हैं जो अब किसी काम के नहीं हैं । ऑक्सीजन और वेंटीलेटर्स की कमी का हंगामा हो रहा है । सरकार कहती है कि सब कुछ पर्याप्त है, डॉक्टर्स कहते हैं कि कुछ भी उपलब्ध नहीं है । हाईकोर्ट को कलम तोड़ धमकी देनी पड़ती है कि ऑक्सीजन की उपलब्धता में जो भी बाधा उत्पन्न करेगा उसे फाँसी दे दी जायेगी । क्या यह मोदी सरकार का अंतिम कार्यकाल होने वाला है?

रोगियों के लिये ऑक्सीजन नहीं है, वायुमण्डल प्रदूषित है, बड़े-बड़े ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं और एक-एक परिवार में चार-चार डीज़ल या पेट्रोल वाहन रखना आम बात है, न सरकार ने कभी कोई कोटा निर्धारण किया न हमने कभी सोचा । पैसे के अहंकार में हम प्रकृति को हमेशा अपमानित करते रहे हैं । तमाम प्रदूषणों के बीच वैचारिक प्रदूषण ने एक बार फिर बाजी मार ली है किंतु हमने इस सबसे बड़ी समस्या को कभी समस्या माना ही नहीं ।  

कोरोना की दूसरी लहर का आतंक जारी है । भारत से भी अधिक बुरी स्थिति ईराक की हो रही है जहाँ पहले से ही बहुत कुछ ध्वस्त है । उच्च सुविधासम्पन्न देवता (माननीय जी) भी संक्रमित हो रहे हैं, सुपर स्पेशल सुविधायें बौनी साबित हो रही हैं, कुछ देवताओं की मृत्यु भी हो चुकी है । हम साधारण मानुष हैं, हमें अपने लिये देवताओं वाली सुविधाओं की अपेक्षा नहीं करनी चाहिये । हमें अपने लिये कुछ और सोचना होगा, बिल्कुल साधारण । 

कुछ चिकित्सक मानते हैं कि भाप लेने से कोरोना मर जाता है इसलिये भाप लेना लाभदायक है, कुछ मानते हैं कि भाप लेने से फेफड़ों और नाक को क्षति हो सकती है इसलिये भाप लेना हाँइकारक है । वैज्ञानिकों के भी परस्पर विरोधी वक्तव्य सामने आ रहे हैं । आम जनता भ्रमित है ...और सच तो यह है कि चिकित्सकों का भी एक बहुत बड़ा वर्ग भ्रमित है । हम इस विषय पर भी बात करेंगे किन्तु अभी नहीं । अभी तो हमें अँधेरे में अपने लिये एक सुरक्षित रास्ता तलाशना है । कोरोना ने हमारी सारी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ को ठेंगा दिखा दिया है । जिनके पास पैसा है वे तमाम चिकित्सा के बाद भी जान गँवा रहे हैं और जो निर्धन हैं वे चिकित्सा के अभाव में जान गँवा रहे हैं । पैसा किसी काम का नहीं रहा । यह बात उन राष्ट्राध्यक्षों को भी समझनी चाहिये जो संसाधनों को हथियाने और बाजार को अपनी मुट्ठी में करने के लिये विश्वयुद्ध की तरफ़ निरंतर आगे बढ़ते जा रहे हैं ।

कोरोनाकाल में ही चीन की अर्थ व्यवस्था ने गति पकड़ ली है । इस मामले में फ़िलहाल अमेरिका अपने प्रतिद्वंदी चीन से पराजित हो चुका है । हम दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन उत्पादक हैं, फिर भी हमें बाहर से वैक्सीन आयात करनी पड़ रही है । हम रेम्डेसिविर का भी पर्याप्त उत्पादन कर सकते थे किंतु साल भर से निर्माताओं का पता नहीं क्यों मूड ही नहीं बन सका ।

युवाओं को अपने सपनों के लिये प्रतीक्षा करनी होगी । यह आपकी ही नहीं पूरी दुनिया के युवाओं की समस्या है और किसी भी स्थिति में ड्रग्स आपकी समस्या का समाधान नहीं है । कोरोना का प्रोजेक्ट 2025 तक चलने की ख़बर है । इस बीच हमें कोरोना वायरस के साथ ही रहना होगा... पूरी सूझ-बूझ के साथ । फ़िलहाल आम जनता का रुझान आयुर्वेदिक औषधियों की ओर होता जा रहा है । इम्यूनिटी बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक औषधियों से बाजार भरे पड़े हैं, फेफड़ों के संक्रमण की चिकित्सा के लिये भी आयुर्वेद में ढेरों दवाइयाँ हैं वह भी विदाउट साइड-इफ़ेक्ट्स । रौद्र ताण्डव के बाद लास्य नृत्य होता है जो सृजन का नृत्य है... जीवन का नृत्य है । इसलिये युवा अपने कैरियर को लेकर निराश न हों । दूसरों पर आरोप लगाने की भी आवश्यकता नहीं, अभी तो मृत्यु के खेला से स्वयं को बचाने की आवश्यकता है । दवाइयों, वैक्सीन्स, ऑक्सीजन और वेंटीलेटर्स को रौंदता हुआ कोरोना आगे बढ़ता जा रहा है लेकिन रास्ते और भी हैं... हमें आगे बढ़ना होगा ।

रेम्डेसिविर की कालाबाजारी हो रही है किंतु गिलोय, कालीमिर्च, लौंग, हल्दी, सोंठ और नीबू आपकी पहुँच के भीतर है । जो मधुमेह के रोगी हैं और BGR 34 नहीं ख़रीद सकते उन्हें केवकाँदा और भुइनिम्ब का सेवन करना चाहिये । प्रकृति ने आपको वह सब कुछ दिया है जिसकी आपको आवश्यकता है । इस सबके बाद भी प्रकृति को आपसे जिस जीवनशैली की अपेक्षा है उसका पालन तो आपको करना ही होगा ...यहाँ कोई समझौता प्रकृति को स्वीकार नहीं है । आधुनिक देवताओं ने प्रकृति को अपने नियंत्रण में करना चाहा और प्राकृतिक शक्तियों से रार कर ली । रावण ने भी काल को अपने नियंत्रण में करना चाहा और काल से रार कर ली । जीवित रहने के लिये हमें प्रकृति की ही उपासना करनी होगी । आइये, जिसे हम छोड़ चुके हैं उसे फिर से अपना लें अन्यथा प्रकति अपना संतुलन स्थापित करने के लिये खण्ड प्रलय से कम में संटुष्ट नहीं होगी ।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

रावण

श्री राम को सेना सहित समुद्र पार कर श्रीलंका जाने के लिये सेतु का निर्माण करना था । सेतु निर्माण के संकल्प और सफलता के लिये हवन-पूजन आदि कर्मकाण्ड के लिये उस समय के प्रकाण्ड वेद-विद्वान एवं सर्वश्रेष्ठ पुरोहित के रूप में रावण को आमंत्रित किया गया । युद्ध की तैयारी में एक शत्रु को दूसरे शत्रु के सहयोग की आवश्यकता थी । सेतु निर्माण में पुरोहित बनकर रावण ने न केवल अपने शत्रु को सहयोग किया बल्कि यजमान राम को अपने उद्देश्य में सफल होने का आशीर्वाद भी दिया । विश्व इतिहास में नैतिक चरित्र के ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं ।

रावणकृत शिवताण्डव स्तोत्र हर किसी के लिये आसान गायन नहीं है, “जटाटवी गलज्जल प्रवाहपावितस्थले । गलेऽवलम्ब्य लम्बिताम भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्” -जैसे अद्भुत शिवस्तोत्र का रचनाकार रावण, वेद-विद्वान और महान चिकित्सा विशेषज्ञ दशग्रीव हमारी घोर घृणा और तिरस्कार का पात्र हो गया । मंत्र-तंत्र दक्ष रावण रचित कई मंत्रों का प्रयोग तो वे लोग भी करते हैं जो उसके घोर विरोधी हैं और उससे घृणा करते हैं । आप रावण को एक नोटोरियस किंग कह सकते हैं किंतु उसकी उपलब्धियों की क्रेडिट से उसे कैसे वंचित कर सकते हैं!      

सामवेद की ऋचाओं के गायन में प्रवीण रावण ने वेदपाठ के स्वाभाविक उच्चारण के लिये पदपाठकी रचना की जिसे परवर्त्ती वेदपाठियों द्वारा अपनाया गया । शब्द और ध्वनि विज्ञान में दक्ष रावण ने शब्दों के अर्थानुरणन के लिये Onomatopoeia और alteration की विधि विकसित की । ज्योतिष विज्ञान को समृद्ध करते हुये दशग्रीव ने “रावणसंहिता” की रचना की । रावण द्वारा संस्कृत में रचित ग्रंथ प्रकृत कामधेनुने डेयरी एवं विटरनरी साइंस को समृद्ध किया, युद्ध कला के लिये युद्धिश तंत्रकी रचना की, फ़ार्मेकोलॉज़ी को समृद्ध करने के लिये डिस्टिलेशन की पद्धति का विकास किया और अर्क प्रकाशनामक ग्रंथ की रचना की । डाय्ग्नोसिस के लिये नाड़ी विज्ञान पर संस्कृत भाषा में रचना की जिसे आज भी “रावणकृत नाड़ी विज्ञानम्” के नाम से व्यवहृत किया जाता है । स्त्री रोग, प्रसूति तंत्र एवं बाल रोग में निष्णात रावण ने मंदोदरी के अनुरोध पर कुमार तंत्रनामक ग्रंथ की रचना की जिसमें इन विषयों से सम्बंधित एक सौ से अधिक रोगों की चिकित्सा का वर्णन किया गया है । शिव रसतंत्र और टॉक्ज़िकोलॉज़ी के आराध्यदेव हैं इसीलिये प्राचीन भारत के रस साधक” (फ़ार्मेकोलॉज़िस्ट) और टॉक्ज़िकोलॉसिट शिवभक्त हुआ करते थे । रावण की शिवभक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता । मर्करी और सल्फ़र के योग से औषधि निर्माण की विधि को विकसित करने वाला वैज्ञानिक रावण संगीत और कला में भी इस दुनिया को बहुत कुछ दे कर गया है । रुद्रवीणा वादन में दक्ष रावण ने वीणा जैसे एक यंत्र का भी आविष्कार किया जिसे आप रावणहत्था के नाम से जानते और उपयोग करते हैं ।

आज तो किसी रिसर्च का श्रेय लेने के लिये लोग सारी सीमायें तोड़ दिया करते हैं । भाषा-विज्ञान, वेद-विज्ञान, स्वर विज्ञान, युद्धकला, रसशास्त्र (फ़ार्मेकोलॉज़ी), मेडिकल साइंस, डेयरी एण्ड विटरनरी साइंस, ज्योतिष, संगीत, नीतिशास्त्र, प्रशासन और पौरोहित्य आदि में दक्ष विश्रवा पुत्र दशग्रीव वेदपाठी ब्राह्मण होते हुये भी आर्यावर्त्त में तिरस्कृत होता रहा । इस तिरस्कार को जस्टीफाइ करने के सैकड़ों तर्क दिये जाते रहे हैं । किंतु मुझे लगता है कि तिरस्कार की इस तीव्र आँधी में दशग्रीव की विद्वता और अद्भुत विलक्षणता की हम सभी अन्यायपूर्ण ढंग से उपेक्षा करते रहे हैं ।

किसी राजा का तिरस्कार तो हो सकता है किंतु किसी विद्वान और उसकी विद्वता का तिरस्कार किसी समाज के लिये श्राप से कम नहीं होता । भारत में स्वतंत्ररूप से देशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित करने वाले इसरो के वैज्ञानिक नम्बीनारायण के साथ हमने क्या नहीं किया? उन्हें न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक यातनायें भी दी गयीं, बल्कि पच्चीस साल तक जेल में भी बंद रखा गया, किस अपराध में? और इसका परिणाम यह हुआ कि स्पेस शटल के मामले में हमारी आत्मनिर्भरता को दशकों का धक्का लगा । हम लगभग तीन दशक पीछे चले गये ।

लोक हित के लिये राजाओं से जीवनभर युद्ध करने वाले श्रीकृष्ण को मथुरा से पलायन करना ही पड़ा । इसरो में शोध करने वाले हमारे वैज्ञानिक रहस्यपूर्ण ढंग से या तो गायब हो जाते हैं या फिर आत्महत्या कर लेते हैं । प्रतिभा पलायन और आत्महत्या की घटनाओं से आर्यावर्त्त अपनी वैज्ञानिक क्षमताओं को खोता जा रहा है । यदि आप सजग और हर पल चौकन्ने नहीं हैं तो आज कोई भी आपकी रिसर्च चुरा कर सारा श्रेय अपनी झोली में डाल लेता है और आप हाथ मल कर रह जाते हैं । चलिए छोड़िये, हम कलियुग से वापस त्रेतायुग में चलते हैं जहाँ रावण का वध हो चुका है और श्रीराम को अयोध्या लौटने के लिये तीव्र गति वाले वाहन की जुगाड़ करनी है ।

श्रीलंका की धरती पर लड़े गये युद्ध में अयोध्या की विजय हुयी, लंकेश का वध कर दिया गया । विजयी श्रीराम के पास एयरोप्लेन नहीं था, श्रीलंका से वापस आने के लिये उन्हें अपने शत्रु रावण के पुष्पक विमान का सहारा लेना पड़ा । आज के खोजी वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि उस समय श्रीलंका में रावण के पास कई एक एयर हैंगर्स थे जिनमें विमानों को रखा जाता था । यह खोज अभी भी चल रही है ।

जिस रावण का पतन उसके अहंकार के कारण हुआ, उसी ने अपने आराध्य शिव को अपने सिर काट-काट कर समर्पित कर दिये थे । क्या अर्थ है इसका? वाज़ ही अ मॉन्स्टर ऑफ़ टेन हेड्स? नो, मेडिकली सच अ मॉन्स्टर कैन नॉट सर्वाइव, हैव यू सीन अ सच पर्सन इवर? वी मे हैव टू हेड लाइंस इन अवर पाम्स बट नेवर टू हेड्स ऑन अवर नेक । इट इज़ सिम्बोलिक, जस्ट सिम्बोलिक । कथा है कि विश्रवापुत्र बचपन से ही बहुत सुदर्शन और बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न था । माँ ने बच्चे के गले में एक माला पहना दी जिसके मनकों में उसके चेहरे का प्रतिबिम्ब दिखायी देता था । साथियों ने इसीकारण उसे दशग्रीव कहना शुरू कर दिया । किंतु मुझे लगता है कि विश्रवा पुत्र की विलक्षणता के कारण उसे दशग्रीव की संज्ञा दी गयी होगी । ही वाज़ अ सुपर इंटेलीज़ेण्ट पर्सन हैविंग मल्टीडायमेंशनल पर्सनॉलिटी – “बहुमुखी प्रतिभा” । अपने अहंकार को समाप्त करने के लिये ही रावण ने अपनी दक्षतायें और उपलब्धियाँ अपने आराध्य को समर्पित करने का प्रयास किया जिसे सिम्बोलिकली “सिर काट कर चढ़ाना” कहा गया ।  

हमने रावण की बहुत सी उपलब्धियों को अपना तो लिया है किंतु उसका लेश भी श्रेय हम रावण को देना नहीं चाहते । कम से कम ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान में रावण की उपलब्धियों को स्वीकार करते समय हमें उसका ऋणी होना ही चाहिये । हमें विभीषण का भी ऋणी होना चाहिये जिसने रावण की मृत्यु का रहस्य हमारे आराध्य श्रीराम के समक्ष उजागर कर दिया किंतु हमने विभीषण का भी अपमान किया और उसके नाम को ही विश्वासघात का मुहावरा बना डाला । श्रीराम विजयी होकर वापस अयोध्या पहुँचे, तो हमने राम के पारिवारिक जीवन की इतनी निंदा कर डाली कि उन्हें अग्नि परीक्षा के बाद भी अपनी पत्नी को राजमहल से निष्कासित करना पड़ा । हम आर्यावर्त के निवासी न तो रावण के साथ न्याय कर सके, न विभीषण के साथ, न श्रीराम के साथ और न श्रीकृष्ण के साथ । हम अपने सनातनधर्म के साथ भी न्याय कहाँ कर पा रहे हैं! न हम अपने धर्म को अक्षुण्ण रख पा रहे हैं, न अपने मंदिरों को लुटने और तोड़े जाने से बचा पा रहे हैं, न अपने देश की सीमाओं को बचा पा रहे हैं और न अपने समाज को धर्मांतरण से बचा पा रहे हैं फिर भी हमें अपने आर्यत्व पर इतना गर्व है कि हम फूले नहीं समाते । 

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

सावधान ! कोरोना का खेला चालू आहे...

सत्ता में बैठे लोगों ने कोरोना युद्ध की कमान तो अपने हाथ में ले ली लेकिन अब संक्रमण एवं मौतों को नियंत्रित न कर पाने की पराजय का ठीकरा डॉक्टर्स और जनता पर फोड़ कर अपनी अकाउण्टेबिलिटी से पल्ला झाड़ लिया है । कैमरे और लाइट की दुनिया में आने से पहले मैं बायोटेक्नोलॉज़ी का छात्र रहा हूँ और वायरोलॉज़ी एवं सेलुलर बायोलॉज़ी में अच्छी रुचि होने के कारण कोरोना युद्ध के लिये बनायी जाने वाली नीतियों का तमाशा भी समझता रहा हूँ । आज एक-एक कर जब सारी सच्चाइयाँ सामने आती जा रही हैं तो राजनैतिक दलों के प्रवक्ता स्वीकार करने लगे हैं कि केवल सत्ता को ख़ुश करने के लिये वैज्ञानिकों ने झूठे आँकड़े पेश किये और वैक्सीन की असंतोषजनक कार्मुकता को छिपाया । डॉक्टर्स और वैज्ञानिकों पर आरोप लगाते समय असावधानीवश भाजपा के प्रवक्ता धोखे में अपनी कार्यप्रणाली की पोल भी खोलने लगे हैं । सत्ता को ख़ुश करने के लियेयह एक ऐसा सच है जो सत्ता की कार्यप्रणाली, आई.ए.एस. अधिकारियों और वैज्ञानिकों से सत्ता की अपेक्षाओं की वास्तविकता को कटघरे में खड़ा करता है । इसका अर्थ यह हुआ कि सत्ता ऐसा वातावरण निर्मित कर सकने में असफल रही है जिसमें आई.ए.एस. अधिकारी, डॉक्टर्स और वैज्ञानिक सही तथ्य प्रस्तुत कर सकें, वे बाध्य हैं सत्ता को एन-केन प्रकारेण ख़ुश करने के लिये जिसके लिये उन्हें झूठे आँकड़े और झूठी बातें निर्मित करनी पड़ती हैं । इस तरह की कार्यप्रणाली से सत्ता ख़ुश होती है लेकिन उसका ख़ामियाजा जनता को ही नहीं बल्कि पूरी सभ्यता को भुगतना पड़ता है ।

अब जब कोरोना का डबल म्यूटेण्ट दहशत मचाता घूम रहा है और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गयी तो राजनीतिज्ञों ने आरोप लगा दिया कि जनता ने ही नियमों का पालन नहीं किया । राजनीतिज्ञों का दूसरा आरोप है कि डॉक्टर्स ने कोरोना वायरस की प्रकृति, वैक्सीन की कार्यक्षमता और कोविड 19 के उपचार के बारे में सही तथ्यों को छिपाकर सत्ता को अँधेरे में रखा (यानी विश्वासघात किया?) ।

मैं कोरोना के शुरुआती दिनों को याद करता हूँ जब फ़िल्म सिटी में रसूखदार लोग और जनता को उपदेश देने वाले नेतागण गले में मास्क लटकाकर या ठोड़ी के पास सरका कर घूमा करते थे । मौलाना मोहम्मद साद के धार्मिक मरकज़ में देश-विदेश के लोगों का जमावड़ा लगा रहा और दिल्ली के अधिकारी उनसे नियमों का पालन करने के लिये प्रार्थना करते रहे । शाहीन बाग का जमावड़ा हो या किसान आंदोलन का या फिर कुम्भ स्नान का ताजा मामला, सभी जगह भीड़ को नियंत्रित करने में असफल प्रशासन और सरकार ने अपनी दुर्बलताओं और असमर्थताओं का ही प्रदर्शन किया है । एक ओर लॉक-डाउन और ठीक उसी समय अनियंत्रित भीड़ के आगे पानी भरती हमारी सत्ता । जन आंदोलनों और सामूहिक धार्मिक क्रियाकलापों पर न सत्ता का नियंत्रण था और न सुप्रीम कोर्ट ने ही कोई प्रभावी संज्ञान लिया । विरोधाभास की चरम स्थिति के साथ जनता को अपने हाल पर मरने के लिये छोड़ दिया गया और अब सत्ता के प्रवक्ता कहते घूम रहे हैं कि वैक्सीन समाधान नहीं है, हर किसी को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन ही होगा ।

जहाँ तक डॉक्टर्स और साइंटिस्ट्स की बात है तो यह समझना होगा कि सत्ता ने अपने तंत्र को सच बोलने के लिये उपयुक्त स्थितियाँ निर्मित नहीं कीं और जिसने सच बोला भी तो उसकी बात को सुना ही नहीं गया । कोरोना वैक्सीन के वर्तमान इण्डीविडुअल की सेलुलर कार्मुकता अनिश्चित है, उसकी क्षमता और कार्य-अवधि भी बहुत कम है, और सच बात तो यह है कि आज कोरोना की जितनी भी वैक्सीन्स व्यवहार में लायी जा रही हैं वे सब आज भी अपने ट्रायल फ़ेज़ में ही हैं यह इसी से प्रमाणित है कि वैक्सीन के दूसरे डोज़ के अंतराल के बारे में डॉक्टर्स को भी पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ कुछ भी पता नहीं है, सब कुछ अनुमानों और हाइपोथीसिस के सहारे आगे होता जा रहा है । साइण्टिस्ट्स ने तो यह भी बता दिया कि इस वैक्सीन के उपयोग से कोरोना के कई और नये म्यूटेण्ट्स बनने की सम्भावना है और मात्र एक साल बाद ही यह वैक्सीन निष्प्रभावी हो जायेगा । इस सबके बाद भी वैक्सीन के पीछे जनता की गाढ़ी कमायी में आग लगायी जा रही है । दुःखद बात यह है कि जॉन्सन एण्ड जॉन्सन की वह वैक्सीन ख़रीदने का मन भारत ने बना लिया है जिसे उसके वैस्कुलर इम्बोलिज़्म वाले साइड इफ़ेक्ट के कारण अमेरिका ने रिजेक्ट कर दिया है । 

दुनिया भर की प्राचीन सभ्यतायें इस तरह के संकटों का समय-समय पर सामना करती रही हैं । कहीं प्रकृति ने संतुलन बनाया तो कहीं उन्नत सभ्यताओं ने सत्य का अनुसंधान करते हुये सामाजिक जीवनशैली में अस्पर्श्यता को अपनाया । कभी विदेशी आक्रमणकारियों ने तो कभी राजनीतिक बेहयाई ने भारत की प्राचीन जीवनशैली को वैदिक और मनुवादी सोच कहते हुये विकृत किया और सोशल डिस्टेंसिंग को ब्राह्मणवादी अभिषाप कहते हुये छुआछूत की विकृत परिभाषायें गढ़ डालीं जबकि भारतीय समाज की वर्णव्यवस्था नेचुरो-साइंटिफ़िक व्यवस्था रही है जहाँ किसी प्रकार के सामाजिक वर्गभेद का कोई स्थान नहीं होता । आज हर कोई छुआछूत का ही उपदेश “सोशल डिस्टेंसिंग” के नाम से देने लगा है । स्पर्श में डिस्क्रिमिनेशन और भोजन में शुचिता की आवश्यकता को यदि आप छुआछूत कहते हैं तो आज पूरी दुनिया को क्या उसी की आवश्यकता नहीं है?              

कोरोना की दवाइयाँ अज्ञात हैं, रोकथाम के जो ज्ञात उपाय हैं वे संतोषजनक परिणाम दे सकने में असफल रहे हैं फिर भी इलाज़ हो रहा है और रोकथाम के उपाय भी अपनाये जा रहे हैं । आर.टी.पी.सी.आर. कोरोना की विश्वसनीय जाँच नहीं है फिर भी जाँच आवश्यक है । यह उसी तरह है जैसे हमें हमें रेल का टिकट तो लेना पड़ेगा भले ही रेलों का परिचालन पूरी तरह बंद ही क्यों न हो । यह कैसी वैज्ञानिक सोच है जिसका कोई औचित्य मेरे जैसे विज्ञान के विद्यार्थी रहे व्यक्ति की भी समझ से परे है! क्या कोई मुझे बतायेगा कि, -

1-   यह जानते हुये भी कि कोरोना की जाँच के लिये आर.टी.पी.आर. विश्वसनीय उपाय नहीं है, दूसरी ओर वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि फेफड़ों की कोशिकाओं के तरल द्रव्य (ब्रॉन्को-एल्विओलर लैवेज़) की जाँच से कोरोना संक्रमण की कहीं अधिक भरोसेमंद जानकारी मिल सकेगी, तब आर.टी.पी.आर. पर इतना समय और धन ख़र्च करने की क्या आवश्यकता है?  

2-   Marcia Frellick ने 30 मार्च 2021 के अपने एक लेख – “COVID Vaccines could lose their punch within a year” में मौज़ूदा वैक्सीन की हकीकत का बयान कर दिया है और अब यह जानते हुये भी कि वैक्सीन से उत्पन्न होने वाली इम्यूनिटी हमें कोरोना से हमेशा के लिये राहत नहीं दे सकेगी इसलिये हमें इम्यूनिटी की अगली खेप के लिये फिर कुछ नया करना ही होगा, तब वैक्सीन के पीछे इतना पागलपन क्यों?

3-   विश्व के कई देश वैक्सीन ख़रीद पाने की स्थिति में नहीं हैं, पैंडेमिक से मुक्ति के लिये रोकथाम की सामूहिक प्रक्रियायें अपनायी जानी चाहिये । यदि आप वैक्सीन को इतना प्रभावी मानते हैं तो क्या उसके सिद्धांतों का ईमानदारी पालन कर रहे हैं ? ग़रीब देशों में वैक्सीनेशन किये बिना संक्रमण की श्रंखला को तोड़ पाना सम्भव नहीं है, इस बहुत बड़ी चुनौती का किसी के पास क्या समाधान है?

-अचिंत्य की कलम से कोरोना चिंतन