गुरुवार, 3 जनवरी 2019

हाइकु के साथ मोमो ही चलेगा


उनकी ज़िद थी
कि हाइकु सुना के मानेंगे...
हमने हाँ कह दी,
वे सुनाने लगे...
जब तक हम समझ पाते
हाइकु का ओर-छोर
हाइकु ख़त्म हो गयी। 

हमसे शिकायत करने लगे
लम्बा आलाप सुनने के अभ्यस्त
हमारे ही कान
“यह क्या मज़ाक है मियाँ!”

हमने अपनी गुवाहाटी वाली दादी जी से पूछा
ये कट चाय स्टाइल की कविता का
हिंदुस्तान में क्या काम ! 
वहीं रहने देतीं न इसे जापान में !
दादी जी को हाइकु बहुत पसंद थे
गोया
चिली सॉस के साथ गरम-गरम मोमो
दादी जी बोलीं ....
जिउंदा रे पुत्तर
पाँच-सात-पाँच की खेप में
चाहो तो बड़ा भी कर सकते हो
हाइकु को खींचकर
यानी
ऊँटों के क़ाफ़िले की तरह
एक के पीछे एक हाइकु
जापान से चीन तक
नन्हें-नन्हें मोमो खाते हुये
(ख़बरदार जो समोसे का नाम लिया
साइज़ तो देखो पहले समोसे का) ।  

अब समझ में आया
इतना कम क्यूँ हो गया है
हिंदुस्तान में क़व्वाली का चलन।   

रविवार, 16 दिसंबर 2018

एक और द्वारिका


होते रहें
वैज्ञानिक भ्रष्टाचार
शीर्ष शोध संस्थानों में
निष्ठावान वैज्ञानिक
लिखते रहें चिट्ठी प्रधानमंत्री कार्यालय को
और फेंक दी जाय उनकी चिट्ठी
कूड़ेदान में
लिखकर मात्र तीन शब्द...
“No Action Required”
तो सहम जाता है राष्ट्रवाद
और
इस गुर्राहट से उत्साहित
विकास की गति और स्थिति को
ठेंगा दिखाती व्यवस्था  
करती है अट्टहास ...
हो रहा विकास
नये भारत का ।
हम
शीघ्र ही बनने वाले हैं विश्वगुरु
फहरायेंगे पताका
अपने श्रेष्ठत्व की ।

"न खाऊँगा न खाने दूँगा" की उद्घोषणा
जब करने लगे परिहास   
और "सत्यमेव जयते" की कामना
कभी न हो पाये पूर्ण
पराजित होता रहे सत्य
और भरा रहे अमृत
केवल रावण की नाभि में
तो फिर-फिर जीता रहेगा रावण,
वैदिक उद्घोषणायें
बनीं रहेंगी स्वप्न ।
अभी अंत नहीं हुआ है
नम्बी नारायण की
यातना कथा का
हम
केवल चीत्कार कर सकते हैं
या फिर पलायन करने को विवश हो सकते हैं
भाग सकते हैं मथुरा से
कृष्ण की तरह ।
चलो !
हम भी बसा लें
एक और द्वारिका
खारे सागर में ।

रविवार, 9 दिसंबर 2018

अमृत नहीं रहा अब दूध


एक समय था जब गोदुग्ध को अमृततुल्य माना जाता था । राजा दिलीप को जब संतान की आवश्यकता हुई तो उन्होंने (पत्नी अरुंधती के साथ) कुलगुरु की आज्ञा से नंदिनी नामक गाय की जंगल में जाकर सेवा की । गाय के निरंतर सम्पर्क में रहने और पंचगव्य का सेवन करने से उन्हें यथासमय संतान की प्राप्ति हुई । यह आख्यान हम सभी जानते हैं किंतु अब हम यह भी जानने लगे हैं कि ऑटिज़्म, मधुमेह, अल्ज़ाइमर्स, हृदयरोग और उच्चरक्तचाप जैसी व्याधियों की अनियंत्रित वृद्धि में एक बहुत बड़ा कारण दूध भी है जो हम ख़रीदकर पीते हैं । तब क्या आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित दूध की औषधीय महिमा मिथ्या है या फिर गोदुग्ध पर हुये नये शोध हमें भ्रमित भर कर रहे हैं ?  
फ़ेस-बुक पर Rakesh Mishra  (https://www.facebook.com/mailrakeshmishra?fref=ufi&rc=p) पूछते हैं – “यह बात समझ में नहीं आती कि ऐसे मुद्दों पर सारे मूर्घन्य चुप्पी क्यों साधे हुये हैं ? FSSAI का अलग विचार, एक्सपर्ट्स लोगों के अलग विचार, सो कॉल्ड dairy associations, कोऑपरेटिव सोसाइटीज के अलग विचार...आखिर सच्चाई या मामला क्या है..?”
वास्तव में हम संदेहों, विश्वासघातों, झूठ और षड्यंत्रों के युग में जी रहे हैं । सभी पक्षों को जानने के बाद सत्य का अनुसंधान स्वयं के विवेक से हमें ही करना होगा । पहले तो जानिये दूध की उस बीटा प्रोटीन के बारे में जो इस सारे विवाद के मूल में है – 
In general, milks from Guernsey, Jersey, Asian herds, human milk, and others (sheep, goat, donkeys, yaks, camel, buffalo, sheep, etc.) contain mostly A2 beta casein. Milks from Holstein Friesian contain mostly A1 beta casein. The Holstein breed (the most common dairy cow breed in Australia, Northern Europe, and the United States) carries A1 and A2 forms of beta caseins in approximately equal amounts. More than 50 percent of the Jersey breed carries the A2 beta casein variant, but with considerable variation among the herd, and more than 90 percent of the Guernsey breed carries the A2 beta casein variant.
1-     Two major protein groups are present in cow’s milk – approximately 82 percent of protein is casein and approximately 18 percent is whey protein. Both groups have excellent nutritional benefits.
2-   Caseins are a group of proteins. Among the caseins, beta casein is the second most abundant protein (about one-third of the caseins) and has an excellent nutritional balance of amino acids.
3-   The beta casein group has two common variants: A1 and A2 beta casein. Most milk contains a mixture of these proteins. Approximately 60 percent of the beta casein is A2, and 40 percent is A1.
4-   The proportion of A2 and A1 beta casein in milk can vary with different breeds of dairy cattle – A2 milk contains only A2 beta casein.

भारतीय देशी गायों और विदेशी गायों के दूध में अंतर का कारण है कैसीन प्रोटीन की अमीनो एसिड चेन के 67वें क्रम पर संलग्न हिस्टीडीन या प्रोलीन । विदेशी गायों (बोस टॉरस) के दूध (ए-1) में 67वे% क्रम पर है हिस्टीडीन जबकि भारतीय गायों (बोस इण्डिकस) के दूध (ए-2) में संलग्न है प्रोलीन ।
ए-1 प्रोटीन वाला दूध पीने से पाचन के बाद उसके अमीनो एसिड्स टूट कर बीटा कैसोमॉर्फ़ीन-7 बनाते हैं जो ओपिएट स्वभाव का होता है और हमारी सुरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकता है । ऐसे दूध के लगातार स्तेमाल से ऑटिज़्म, शिज़ोफ़्रेनिया, डायबिटीज़ टाइप-1 और हृदयरोग सम्भावित है । जबकि देशी गाय के औषधीय गुणों से तो पूरी दुनिया सदियों से परिचित है ही ।

The two proteins are almost identical — they each contain 209 amino acids.
The only difference between A1 and A2 is a difference in the 67th amino acid in the chain.
At this position, A1 has a histidine amino acid, while A2 has a proline amino acid.
The entire basis of the supposed problem with A1 milk is its pesky histidine amino acid at position 67.
That one amino acid change means when the A1 protein is broken down, it can create the peptide beta-casomorphin (BCM-7).
BCM-7 is related to the opiate family. They can affect blood pressure and immune system and may cause diseases ranging from autism and schizophrenia to type 1 diabetes and heart disease.

Milk fat components with potential anticancer activity

Luis M. Rodr´ıguez-Alcala´1,2, M. Pilar Castro-Gomez ´ 3 , L´ıgia L. Pimentel1 and Javier Fontecha 3

During many years, the milk fat has been unfairly undervalued due to its association with higher levels of cardiovascular diseases, dyslipidaemia or obesity, among others. However, currently, this relationship is being re-evaluated because some of the dairy lipid components have been attributed potential health benefits. Due to this, and based on the increasing incidence of cancer in our society, this review work aims to discuss the state of the art concerning scientific evidence of milk lipid components and reported anticancer properties. Results from the in vitro and in vivo experiments suggest that specific fatty acids (FA) (as butyric acid and conjugated linoleic acid (CLA), among others), phospholipids and sphingolipids from milk globule membrane are potential anticarcinogenic agents. However, their mechanism of action remains still unclear due to limited and inconsistent findings in human studies

बीटा केसीन के जैविक संकटों के अतिरिक्त आजकल मिलने वाले कॉमर्शियल दूध के भी अपने संकट कोई कम नहीं हैं । सामान्यतः गर्भधारण के पश्चात गायें दूध देना बंद कर देती हैं किंतु धन के लोभ में आजकल गायों को गर्भधारणकाल में भी इंजेक्शन और दवाइयाँ देकर दूध देने के लिए बाध्य किया जा रहा है जिसे व्यावसायिक दुग्धोत्पादन कहते हैं । यह कॉमर्शियल दूध ए-1 केसीन युक्त हो सकता है और नहीं भी किंतु इसके संकट का मूल कारण है ईस्ट्रोजन मेटाबोलाइट्स । इंजेक्शन देकर निकाले गये दूध में ईस्ट्रोजन मेटाबोलाइट्स की प्रचुर मात्रा होती है जिसके कारण ऐसे दूध के सेवन से मनुष्य में स्तन कैंसर की सम्भावनायें बढ़ गयी हैं । देखिये Volker Hanf  और Wolfgang Körner  का यह विमर्श –   
  
Consumption of Cow's Milk and Possible Risk of Breast Cancer


Increased levels of estrogen metabolites (EM) are associated with cancers of the reproductive system. One potential dietary source of EM is milk. In this study, the absolute quantities of unconjugated (free) and unconjugated plus conjugated (total) EM were measured in a variety of commercial milks (whole, 2%, skim, and buttermilk). The results show that the milk products tested contain considerable levels of EM; however, the levels of unconjugated EM in skim milk were substantially lower than that observed in whole milk, 2% milk, and buttermilk. Whole milk contained the lowest overall levels of EM while buttermilk contained the highest. As anticipated, soy milk did not contain the mammalian EM measured using this method. The relatively high levels of catechol estrogens detected in milk products support the theory that milk consumption is a source of EM and their ingestion may have a dietary influence on cancer risk.

दस हजार साल पहले सभी गायों के दूध में होती थी ए-2 केसीन । फिर प्राकृतिक कारणों से हीमोग्लोबिनोपैथी की तरह केसीनोपैथी की घटना हुयी जिसमें एक जेनेटिक म्यूटेशन हुआ और हिस्टीडीन ने प्रोलीन को भगा कर उसके स्थान पर अपना कब्ज़ा जमा लिया । ये कब्ज़ा करने वाले कभी किसी का भला नहीं किया करते । धीरे-धीरे दूध में आयी गंगा-जमनी संस्कृति वाली ए-1 और ए-2 मिश्रित प्रोटीन । आज भारत में अधिकांश यही दूध मिल रहा है । सरकार ने देशी गायों के लिए कृत्रिम गर्भाधान केंद्र खोले, उन्हें होल्स्टीन और फ़्रीज़ियन साँड़ों का गंगा-जमनी संस्कृति वाला सीमेन दिया जिससे अगली पीढ़ी का गोवंश गंगा-जमनी संस्कृति से ओतप्रोत हो गया । यह सब एक सोची समझी व्यावसायिक रणनीति के अंतर्गत किया जाता रहा जिसके दूरगामी परिणाम अब अपने पूरे शबाब पर हैं । भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भी देशी गायों की संकर प्रजातियाँ फल-फूल रही हैं और उनका ए-1 ए-2 मिश्रित दूध अपनी गंगा-जमनी संस्कृति का परचम लहरा रहा है । तो क्या हुआ जो भारत में हृदय रोगियों और ऑटिज़्म के रोगियों की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा होता जा रहा है । जब हल्ला हुआ ...जो कि रणनीति का ही एक हिस्सा था, तो बड़े-बड़े मालिक लोग जोर-शोर के साथ ए-2 दूध की कम्पनियाँ खोल कर मार्केट में आ गये । यह दूध सामान्य दूध से महंगा है और हर जगह उपलब्ध भी नहीं है । लेकिन अगर आप चाहें तो कम्पनी बहादुर का ए-2 दूध अपनी दुकान में लाकर अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते हैं ।  

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

गाय जने तो बछिया, बहू जने तो बेटा

Sex sorted semen... 
राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अंतर्गत बछिया के लिए Sex sorted semen का उत्पादन सितम्बर माह से ऋषिकेश में प्रारम्भ हो चुका है । पूरे देश में इस तरह के दस और उत्पादन केंद्र खोले जाने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी गयी है ।
1970 में विकसित हुयी इस तकनीक से एक्स और वाय स्पर्म्स को अलग कर एकत्र कर लिया जाता है जिसका उपयोग कृत्रिम गर्भाधान के लिए होता है ।
आने वाला समय गायों का होगा, बैल केवल स्पर्म उत्पादन केंद्रों में ही मिला करेंगे यानी खेती किसानी के लिए मशीनों पर निर्भरता बढ़ जायेगी । गोवंश में लिंगानुपात पर नियंत्रण अब प्रकृति नहीं मनुष्य का होगा । प्रकृति के कार्यों में इस तरह का हस्तक्षेप कितना उचित है... यह विमर्श का विषय होना चाहिए । हमारी एक गम्भीर आशंका यह भी है कि कहीं आगे चलकर इस तरह का नियंत्रण मनुष्यों के लिंग निर्धारण पर भी तो नहीं होने लगेगा ?
Sex sorted semen की परम्परा यदि मनुष्यों में भी लागू की जाती है तो आने वाला समय क्या कुछ इस तरह का होगा...
1-  कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों की बाढ़ आ जायेगी । कन्या भ्रूण चाहने वालों की संख्या अत्यल्प होने के कारण मेल स्पर्म्स की डिमाण्ड बढ़ जायेगी जिससे लोग अपने स्पर्म्स बेचना शुरू कर देंगे । स्पर्म्स की कई क्वालिटीज़ होंगी, यथा – मज़दूरों वाला, अधिकारियों वाला, व्यापारियों वाला, नेताओं वाला, दबंगों वाला, संगीतकारों वाला ... आदि आदि ।
2-  लिंगानुपात की स्थिति ऐसी होगी कि हर तरफ़ मर्द ही मर्द दिखायी दिया करेंगे जिससे कुछ ही दशकों बाद लड़कियों की संख्या इतनी कम हो जायेगी कि लड़कों को कंवारा रहना पड़ जाएगा और बाज़ार में सेक्स डॉल का व्यापार आसमान छूने लगेगा । ख़ानदान के वारिस के लिए लोगों को अपने-अपने शहर के उन गिने-चुने “संतान केंद्रों” पर निर्भर रहना पड़ेगा जहाँ से उन्हें एक बच्चा भारी कीमत पर मिल जाया करेगा । सरकार को ग़रीब-गुरबा लोगों के लिए कोटा सिस्टम लागू करना पड़ेगा ।
3-  स्त्रियाँ केवल संतान केंद्रों में ही पायी जायेंगी, वह भी गिनी-चुनी । स्कूली बच्चे चित्रों में लड़कियों को देख सकेंगे, ‘से लड़की, सामने एक लड़की का चित्र होगा ।
4-  अख़बारों में इश्तहार छपा करेंगे– “दत्ता संतान केंद्र में उपलब्ध हैं क्वालिटी मदर्स जिन्हें इनसेमीनेट किया जाता है इज़िप्ट और ग्रीक वैज्ञानिकों के मेल स्पर्म्स द्वारा । बत्तीस साल पुरानी हमारी कम्पनी “भारतीय संतान मानक संस्थान” से रज़िस्टर्ड है, शीघ्रता करें रज़िस्ट्रेशन चालू है । विशेष – हमारे केंद्र में दुबई की दो, सीरिया की तीन, इथियोपिया की तीन, लाहौर की एक, कश्मीर की एक, हिमांचल की दो और पञ्जाब की चार अनुभवी मदर्स वारिस उत्पादन के लिए उपलब्ध हैं” ।
5-  देश भर में उपभोक्ता सेवा न्यायालय खोले जायेंगे जिनमें मित्तल और बिड़ला जैसे लोग “संतान वाद” लेकर जाया करेंगे... यथा – बिड़ला का वाद होगा –“हमने लालू संतान केंद्र में दो साल पहले तीन मर्द बच्चों के लिए सैतालीस करोड़ डॉलर में रज़िस्ट्रेशन करवाया था किंतु पैसों के लालच में लालू संतानकेंद्र ने रज़िस्ट्रेशन क्रमांक 737, 738 और 739 वाले मर्द बच्चे मित्तलों को पाँच सौ करोड़ डॉलर में बेच दिया”।
6-  जन समस्या निवारण शिविरों में लोग शिकायत किया करेंगे –“मैं घासीराम वल्द बुधराम खसिया, निवासी ग्राम मुल्ला जिला कांकेर अर्ज़ करता हूँ कि मैंने सरकारी कोटे से मात्र एक मर्द बच्चे के लिए बीस साल पहले पंजीयन करवाया था । मुझे आज तक बच्चा नहीं मिला जबकि संताराम को ग्राम सरपंच ने पैसे लेकर दो मर्द बच्चे दे दिए हैं । मेरे ख़ानदान में एक भी वारिस नहीं है, मैं ग़रीब-गुरबा श्रेणी में आता हूँ, महोदय जी ! मुझे भी एक मर्द बच्चा दिलवाने की किरपा करें और सरपंच के ख़िलाफ़ बच्चा घोटाला करने के लिए कार्यवाही करें”।
7-  चुनावी घोषणा पत्रों में विभिन्न राजनीतिक दल कोटे से मिलने वाले मर्द बच्चों की संख्या एक से दो कर देने का वादा करेंगे ।
मंच पर एक नेता चिल्लायेगा – “भाइयों और बहनों ! पिछले तीन सालों में मेरी सरकार ने सरकारी कोटे से तीस लाख मर्द बच्चे ग़रीब-गुरबा लोगों में बांटे हैं । अगली पंचवर्षीय योजना में हम विदेशी मदर्स आयात करके हर परिवार को एक-एक वारिस देने का वादा करते हैं, बस सरकार हमारी ही बननी चइए । बोलो बननी चइये कि नई बननी चइये ?” विपक्षी दल का नेता चिल्लायेगा –“सरकार धोखेवाज है, उसके आँकड़े झूठे हैं । कहाँ हैं तीस लाख मर्द बच्चे ? हमें तो आपके शहर में सिर्फ़ बूढ़े ही बूढ़े दिखाई दे रहे हैं । अगली बार यदि मेरी सरकार बनी तो हम अमेठी की नेशनल फ़ैक्ट्री में मर्द बच्चा उत्पादन बढ़ाकर पूरे देश में मर्द बच्चों की नदियाँ बहा देंगे । बस आप लोग वोट हमें ही देना” । तीसरे मोर्चे वाला चिल्लाएगा –“ई सब बुड़बक लोग है, झूठ बोलता है । सरकार केवल चायवाला जाति का बच्चा बांट रही है जिनमें से एक्को बच्चा सेकुलर नहीं है, ई देखिए बिसेसग्ग का रपोट जिसमें साफ-साफ लिखा है के सरकार द्वारा बांटा गया कुल बच्चा लोग चायवाला है, न जाने कतना गो बच्चा त किन्नर परजाती बाला बांट दिया है । हमरी सरकार सत्ता में आयेगी त हम बादा करते हैं के हर परिबार को एक-एक सेकुलर बच्चा बांटने का बिबस्था करेंगे । हमरी पाट्टी के फेभर में भोट गिराइये, हमरा सरकार बनाइये आ सेकुलर बच्चा पाइए”।   

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

सबरमलय



नवम्बर 2018 की एक सुबह उत्कल प्रांत के रायगढ़ा नगर की एक गली में मेरी भेंट होती है नागेंद्र साय से । रायगढ़ा में काले परिधान और माथे पर चंदन का लेप लगाये कई लोगों को आते-जाते देखा तो मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं सका । मैं एक छोटी सी दुकान में पहुँचता हूँ जहाँ काले कपड़े पहने नागेंद्र साय ने अभी-अभी अपनी दुकान खोली है । बातचीत हुयी तो उन्होंने बताया कि वे कन्नी (पहली बार अनुष्ठान करने वाले) हैं और अय्यप्पा स्वामी की पूजा के लिए 41 दिनों का अनुष्ठान (मण्डलम्) कर रहे हैं । इस अनुष्ठान के बाद वे सह्याद्रि पर्वतमाला के एक हिस्से में स्थित सबरीमाला (सबरमलय) के मंदिर में अय्यप्पा स्वामी के दर्शन करने जायेंगे । यहाँ वर्ष भर चलने वाली सामान्य पूजा को कुमकुम पूजा, वैशाख में होने वाली को विषुपूजा, माघ में होने वाली को मण्डलपूजा और मकर संक्रांति के दिन होने वाली पूजा को मकरविलक्कु पूजा कहते हैं ।

नागेंद्र साय 
पिछले कुछ दिनों से अक्षर से प्रारम्भ होने वाले सबरीमाला, स्वामी अय्यप्पा, स्त्री प्रवेश और सुप्रीम कोर्ट जैसे शब्द बहुत अधिक चर्चा में रहे हैं । मैंने तुरंत सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बारे में कन्नी स्वामी की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कहा – “सबका अपना-अपना विचार है, दस से पचास आयु वर्ग की महिलाओं को यदि लगता है कि अय्यप्पा स्वामी के नियम को भंग करना उचित है तो यह उनका व्यक्तिगत मत है । मंदिर तो हर किसी के लिए खुला है, कोई भी जा सकता है किंतु मंदिर की आस्था के विषय पर लोगों को विचार करना चाहिये । मंदिर में प्रवेश करना और आस्था के साथ प्रवेश करना, दोनों अलग-अलग विषय हैं । पूजा के लिए प्रवेश करना है तो आस्था अनिवार्य है । आस्था के अभाव में केवल प्रवेश करने के हठ को पूरा किया जा सकता है किंतु तब पूजा की विधि और उद्देश्य कुछ भी पूरे नहीं हो सकेंगे । किसी भी देवस्थल में हठ, अहंकार, विद्रोह और नियमभंग जैसे विकारों का कोई स्थान नहीं होता । अय्यप्पा स्वामी ब्रह्मचारी हैं और पूजा के लिए सात्विक अनुष्ठान का विधान करते हैं”।
नागेंद्र साय ने अधिक जानकारी के लिए बाहर निकलकर आवाज़ दी – “गुरु स्वामी....”
गुरु स्वामी एक युवक हैं जो पिछले कई वर्षों से अय्यप्पा स्वामी के लिए अनुष्ठान करते आ रहे हैं । नागेंद्र जी उन्हीं की देखरेख में अपना अनुष्ठान कर रहे हैं ।
मैंने अपना प्रश्न गुरुस्वामी के सामने भी रखा । उन्होंने भी बिना किसी उत्तेजना के अपनी प्रतिक्रिया दी – “मंदिर के अपने नियम हैं, भक्तों को सोचना चाहिए कि वे नियम का पालन करें या नहीं, नियम भंग करने से उन्हें क्या उपलब्ध होगा! निषेध स्त्रियों का नहीं बल्कि केवल एक निश्चित आयु वर्ग की स्त्रियों का है । इसलिए सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के हठ पर सर्वाधिक चिंतन तो प्रवेशार्थी स्त्रियों को ही करना चाहिए”।
सबरीमाला के अय्यप्पा स्वामी की पूजा एक कठिन साधना (मण्डलम्) के साथ प्रतिवर्ष कार्तिक मास के कुछ दिन पहले से प्रारम्भ हो जाती है । पहली बार साधना करने वाले को कन्नी स्वामी कहा जाता है जिन्हें 41, 61 या 108 दिन तक पूरी तरह सात्विक जीवन व्यतीत कर स्वयं को सबरीमाला मंदिर में स्वामी अय्यप्पा के समक्ष प्रस्तुत होने के लिए पात्रता प्राप्त करनी होती है । यह एक कठिन अनुष्ठान है जिसमें पत्नी एवं घर की सभी स्त्रियों का योगदान भी समान होता है । यह सात्विक जीवन जीने का एक अभ्यास है जिससे सात्विकता के मानदण्ड स्थिर बने रहते हैं । गुरुस्वामी ने बताया कि साधक एक कच्चे नारियल में छेद कर उसके पानी को निकालकर उसे घी से भर कर पूजा सामग्री (नैवेद्य आदि) के साथ पोट्टली (इरामुडी) में रखकर मंदिर जाता है । नारियल फोड़ने पर यदि जमा हुआ घी नारियल के आकार का प्राप्त होता है तो इसे शुभता का प्रतीक माना जाता है ।
और मजे की बात यह है कि अय्यप्पा स्वामी के मंदिर के पास एरुमेल्लि में वावर का एक मक़बरा भी है जिसके दर्शन के बिना स्वामी अय्यप्पा की पूजा पूरी नहीं मानी जाती ।

अंतर्जाल पर पुस्तकालय

नॉटनल वाले नीलाभ श्रीवास्तव अंतर्जाल पर लाए हैं ई.पुस्तकालय । इस पुस्तकालय में वार्षिक शुल्क के आधार पर मनचाही पुस्तकें पढ़ी जा सकेंगी । अब पहले की तरह हर पुस्तक के लिए अलग-अलग शुल्क नहीं देना होगा यानी बारम्बार पेमेंट का झंझट समाप्त ।

नीलाभ हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपने पाठकों के लिए रु. 2499 की योजना के स्थान पर मात्र रु.999 की योजना ले कर प्रस्तुत हुए हैं । जिसमें आप मनचाही पुस्तकें पढ़ सकते हैं और साल के अंत में आपकी लाइब्रेरी में आपके द्वारा चुनी हुई 20 किताबें और 25 पत्रिकाओं के अंक आजीवन बने रहेंगे। 
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