शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

कोठों से होकर संस्कृति का उद्धार...

दुनिया की हर बुरी चीज से हमें मोहब्बत है किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि हम उसे पसंद भी करते हैं ।

हमें हिंदुत्व से बेपनाह मोहब्बत है, भारतीय संस्कृति और विक्रमादित्य की न्याय प्रणाली में गहरा विश्वास है ...और हम चाहते हैं कि भारत में रामराज्य की स्थापना हो, किंतु...

...किंतु भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए हम भ्रष्टाचार से गहरी मोहब्बत करना हमारी विवशता है । यानी कोठे ख़त्म करने के लिए हमने कोठों पर जाना शुरू कर दिया है । ...यूँ, इसका मतलब यह नहीं है कि हम भ्रष्टाचार को पसंद करते हैं और अब कभी उसका विरोध नहीं करेंगे । जब-जब हमारे विरोधी भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे तब-तब हम उनके ख़िलाफ आग उगलते रहेंगे ।

विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि हम भ्रष्टाचार में सम्मिलित नहीं रहेंगे ...अवसर मिलते ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूब जाना ही तो पुरुषार्थ है । हम पुरुषार्थी हैं, …अवसर भी है ...और इसलिए अब हम कोई भी काम रिश्वत लिए बिना नहीं करेंगे ।

आप हमारे प्रियपात्र हैं क्योंकि आप ईमानदार व्यक्ति हैं ...हम नहीं चाहते कि आपका कोई नुकसान हो, कोई आपको थप्पड़ मारे ...कोई आपके घर में आग लगा दे ...इसलिए व्यावहारिक बनिए और हमें चौथ देना शुरू कर दीजिये । यह एक सामान्य शिष्टाचार है ...और हमारा दावा है कि हम इसी शिष्टाचार के बल पर भारत में रामराज्य की स्थापना कर देंगे । विक्रमादित्य बनने का रास्ता रावणत्व से होकर जाता है इसलिए पहले हम रावण बन गये हैं । यह रास्ता यदि औरंगज़ेबत्व से होकर जाता तो हम औरंगज़ेब भी बनने को तैयार हैं ।

कोठे बुरे हैं ...जब तक हमें अवसर नहीं मिलता, भ्रष्टाचार बुरा है ...जब तक हमें अवसर नहीं मिलता, रिश्वतखोरी बुरी है ....जब तक हमें रिश्वत लेने का अवसर नहीं मिलता । अवसर मिलने पर भी हम भारतीयता और भारतीय संस्कृति के ठेकेदार बने रहते हैं ...और अपनी इस दुष्टता पर हमें गर्व है ।


गुरुवार, 17 सितंबर 2020

मारीज़ुआना – एक स्वीकार्य वर्जना ...

ध्यान से देखिये तो पता चलेगा कि थाली में तो छेद ही छेद हैं ।

एक कलाकार की अल्पायु मृत्यु, …मृत्यु के रहस्य को अनावृत करने की माँग, …माँग पर विवाद, …विवाद पर हंगामा, …हंगामे के बाद विवेचना, …विवेचना के मंथन से निकला हलाहल, …हलाहल में डूबे लोग, ... लोगों को बचाने के अभियान की चर्चा, …चर्चा पर थाली में छेद, … वाक्युद्ध अभी चालू है... ।

हलाहल मारीज़ुआना नहीं बल्कि वह निरंकुशता और स्वच्छंदता है जिसने मारीज़ुआना को एक वर्ज्य वस्तु बना दिया है । वातावरण गरम है, और ड्रग्स को लेकर छोटे परदे पर हंगामा है, किंतु मैं ...

...किंतु मैं पहले की तरह आज भी मारीज़ुआना को लीगलाइज़ किए जाने के पक्ष में हूँ । एक चमत्कारी औषधि के दुरुपयोग ने उसे वर्ज्य बना दिया है । पश्चिम के कई देशों में मेडिकल मारीज़ुआना के लिए डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर निर्धारित अवधि के लिए मारीज़ुआना सेवन की अनुमति प्रदान की जाती है । कैंसर के केसेज़ में कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स को कम करने और शीघ्र रिकवरी के लिए मेडिकल मारीज़ुआना के निर्धारित डोज़ से होने वाले चमत्कार की ख्याति पूरी दुनिया में है । केवल मजे के लिए और बिना पर्याप्त कारण के मारीज़ुआना का सेवन विषाक्त ही नहीं घातक भी है ।

कौन नहीं जानता कि भारत में मारीज़ुआना का बड़ी मात्रा में सेवन किया जाता है ...कैंसर रोगियों द्वारा नहीं बल्कि कुछ बाबाओं और नसेड़ी शौक़ीनों के द्वारा । इसके अंतर सम्बंधों को समझना होगा ।

दहशत और आतंक के लिए अत्याधुनिक हथियार चाहिये, हथियारों के लिए बेशुमार पैसे चाहिये, बेशुमार पैसे कमाने के लिए ड्रग्स का धंधा चाहिये, ड्रग्स को खपाने के लिए उपभोक्ता चाहिये, उपभोक्ता तैयार करने के लिए बेशुमार पैसे वाले लोग चाहिये, बेशुमार पैसा किसके पास है ?

...तो ड्रग्स का धंधा आतंक से जुड़ा हुआ है और आतंक हथियारों के धंधे से जुड़ा है । आतंक सत्ता को चुनौती देने वाली एक समानांतर व्यवस्था है जिसके मूल में हथियार और ड्र्ग्स का क्रूर खेल है । बड़े-बड़े प्रतिष्ठित देश हथियार बनाते हैं सेना के लिए भी और आतंकवादियों के लिए भी । यह एक बहुत बड़ा उद्योग है, इस उद्योग को समाप्त करने की इच्छाशक्ति फ़िलहाल कहीं दिखाई नहीं देती ।

 

गोराई टु कैप ऑफ़ गुड होप एण्ड मेरी थाली सिर्फ़ मेरी...

वे युवावस्था के दिन थे और वह मेरी पहली मुम्बई यात्रा थी । कई बार जाने के बाद भी दिलवाली दिल्ली तो मुझे कभी नहीं लुभा सकी लेकिन दादर स्टेशन उतरते ही मायानगरी मुम्बई मेरे दिल-ओ-दिमाग में जो बसी तो आज तक बसी हुयी है ।

एक दिन गोराई बीच पहुँच कर गाइड ने बताया था – “यहाँ से समंदर के रास्ते सीधे चले जाइए तो आप कैप ऑफ़ गुड होप पहुँच जायेंगे ...और समंदर का यह बीच ड्र्ग्स के धंधेवालों के लिए स्वर्ग है

मैंने पूछा था – “जब आपको यह सब पता है तो पुलिस तक यह बात क्यों नहीं पहुँची?”

गाइड ने मेरी ओर देखा फिर हँस दिया, गोया कह रहा हो कि बिहारी बहुत बुद्धिमान होते हैं, लेकिन तुम बुद्धू बिहारी हो ।

मुम्बई, अंडरवर्ल्ड और ड्रग्स के रिश्ते वर्षों पुराने हैं । यह बात मेरी जवानी के दिनों में मुम्बई के गाइड ने मुझे बतायी थी । अब आज इतने दिनों के बाद बकौल गाइड मैं वही बात सायकिल सवार साम्राज्ञी को बताना चाहता हूँ ...इस क़ैफ़ियत के साथ कि मैंने कभी किसी की थाली में खाना नहीं खाया है ।    

ड्रग वहाँ भी है ड्रग यहाँ भी है...

ऑनर बना रहे इसलिए पाप को घर में ही दफ़न कर दो । यह आत्मघाती सोच है जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता । रविकिशन ने इण्डस्ट्री में सफाई की बात की है इससे इण्डस्ट्री बदनाम कैसे हो गयी?

ड्रग ही नहीं ज़िंदा ग़ोश्त का शौक भी है हमारे शहर की नयी पीढ़ी को ...

तीन साल पहले यानी 2016 में हमारे छोटे से शहर के एक अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल में मुझे हेल्थ अवेयरनेस का कार्यक्रम करना था । कार्यक्रम के बाद स्कूल के शिक्षक ने अगले कार्यक्रम के लिए जो विषय दिया वह स्कूली छात्रों में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति के सम्बंध में था । तभी एक शिक्षिका ने कहा –“केवल नशा ही नहीं, सेक्सुअल बिहैवियर तो और भी अधिक चिंता का विषय है, उस पर भी एक कार्यक्रम होना चाहिये”।

मैं अवाक था जब मुझे बताया गया कि हायर सेकेण्ड्री स्तर के उस विद्यालय के छात्र-छात्रायें पढ़ने-लिखने के स्थान पर नशे और सेक्स की दुनिया में डूबते जा रहे हैं । लड़कियों की इसमें बराबर की सहभागिता है और उनमें नार्योचित शील-संकोच का अभाव भविष्य के एक ऐसे समाज का एक चित्र प्रस्तुत करता है जो बहुत भयावह है ।

पिछले साल यानी 2019 में जिस अस्पताल में मेरा स्थानांतरण हुआ उसके पास कई और सरकारी कार्यालय हैं और मिडिल स्तर के तीन विद्यालय भी । एक दिन ओपीडी में मुझे कुछ अज़ीब सी अप्रिय गंध महसूस हुई तो कर्मचारियों से कहीं कुछ जलने के बारे में पूछताछ करने पर मुझे बताया गया कि ओपीडी की खिड़की जहाँ बाहर की ओर खुलती है वहाँ किशोर लड़के आकर गाँजा पिया करते हैं । गाँजे की गंध से पहली बार परिचित हुआ । बात खुली तो पता चला कि किशोरवय लड़के-लड़कियाँ शराब, गाँजा और सेक्स के लिए अस्पताल बंद होने के बाद उस परिसर का खुलकर स्तेमाल करते हैं और यह सब वहाँ वर्षों से होता आ रहा है ।

इसके बाद मैंने कई बार ओपीडी से निकलकर गँजेड़ी लड़कों को समझाने की कोशिश की, हावभाव से वे लड़के बहुत ग़ुस्ताख़ और असामाजिक लग रहे थे । फिर दो बार मैंने पुलिस को फोन करके बुलाया, पुलिस वालों ने भी गँजेड़ी किशोरों को समझाया और कार्यवाही करने की चेतावनी दी ।

हमार आसपास आज भी सब कुछ यथावत चल रहा है और अब मैंने किसी से कुछ भी कहना बंद कर दिया है ।

माननीया सांसद जया बच्चन के वक्तव्य के बाद तो अब मुझे और भी चुप रहना चाहिये वरना कोई माननीय आरोप लगा सकता है कि मैं उनके शहर को बदनाम कर रहा हूँ और उनकी थाली में छेद कर रहा हूँ । 


मंगलवार, 15 सितंबर 2020

फ़िल्म उद्योग का कोई सम्बंध नहीं है ड्रग माफ़िया से – गृह विभाग, भारत सरकार

गंधर्वलोक पापमुक्त होता है क्योंकि वहाँ सत्य ही सत्य है, वहाँ सौंदर्य ही सौंदर्य है, वहाँ शक्ति ही शक्ति है, वहाँ ऐश्वर्य ही ऐश्वर्य है । जहाँ ऐश्वर्य होता है वहाँ पाप नहीं होता ।

गंधर्वलोक के किसी भी कलाकार को नशे से मुक्ति के लिए कभी नशामुक्ति केंद्र में जाने की आवश्यकता नहीं होती । गंधर्वलोक में शोषण, कुंठा, अवसाद और ड्रग्स लेने के कारण कभी कोई आत्महत्या नहीं करता । गंधर्वलोक की फ़िल्मों में काली दुनिया का कोई संत काला पैसा नहीं लगाता, और न कभी कोई दाउद वहाँ के किसी मामले में कोई हस्तक्षेप करता है ।  

...क्योंकि वहाँ मोनिका वेदी होती है जिसका कभी किसी अंडरवर्ल्ड से सम्बंध नहीं रहता, वहाँ गुलशन कुमार की मौत होती है जिसमें कोई षड्यंत्र नहीं होता, वहाँ सलमान ख़ान होता है जो कभी किसी काले हिरण का शिकार नहीं करता, वहाँ संजय दत्त होता है जिसके पास कभी कोई ग़ैरकानूनी हथियार नहीं होता, वहाँ अब्दुल राशिद होता है जो कास्टिंग काउच से कभी किसी लड़की का शोषण नहीं करता ।

हम आशा करते हैं कि साम्राज्ञी जी को यह मुलम्मा पसंद आयेगा ।

थाली में छेद किसने किया ?

थाली में बहुत से छेद थे जिन्हें रंगीन फूलों के ढेर से ढक कर रखने की सुनियोजित परम्परा थी । यह बात बहुत से संतों को मालुम थी, किंतु जैसी कि परम्परा थी, इसे गोपनीय बनाने रखने के मिशन में हर कोई सम्मिलित होता चला गया । बड़े-बड़े स्वयम्भू भूपति सारा तमाशा देखते और जानते रहे किंतु उन्हें अपनी परम्पराओं से गहरी मोहब्बत थी इसलिए वे हमेशा गहरी ख़ामोशियों के बीच मुस्कराते रहे ...और नैतिक निष्ठा से समझौते करते हुये अपने ऐश्वर्य में वृद्धि करते रहे । ।

थाली के छेदों को कँगना ने देखा ...रवि किशन ने देखा ...मानवी तनेजा ने देखा ...और भी बहुत से लोगों ने देखा और गहरे सन्नाटे को चीरने के लिए कूद कर सामने आ गये । रवि किशन ने आवाज़ उठायी कि थाली में जो छेद हैं उन्हें भरा जाय और यह सुनिश्चित किया जाय कि भविष्य में अब कोई दूसरा छेद न हो ।

सायकिल सवार साम्राज्ञी को यह बात अच्छी नहीं लगी । उन्हें ही क्या ...और भी बहुत से कलाकारों को यह बात अच्छी नहीं लगी । जो साम्राज्ञी सुशांत सिंह राजपूत की असामायिक मृत्यु के हंगामे पर ख़ामोश रही वह अचानक मुखर हो गयी । साम्राज्ञी ने रविकिशन को आरोपित कर दिया । एक कलाकार ने दूसरे कलाकार को आरोपित कर दिया । एक माननीय ने दूसरे माननीय पर कीचड़ उछाल दिया ।

मायानगरी के स्वयंभू सम्राट बहुत पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि वे राजनीति के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं थे और अब वे कभी राजनीति में नहीं आयेंगे । मुझे याद नहीं आता साम्राज्ञी की राजनीतिक यात्रा में कभी कुछ भी उल्लेखनीय रहा हो ।

गंधर्वलोक की ख़ामोशियाँ के बीच काँव-काँव...

वे सब हमेशा की तरह तमाशबीन बने रहना चाहते थे, अपने चारो ओर फैल रही गंदगी से उन्हें कभी कोई ऐतराज़ नहीं हुआ । समारोहों में मुस्कराते हुये पुरस्कार लेने वाले चेहरे, आत्मप्रशंसा के मुलम्मे में झूमते रहने वाले चेहरे अचानक काँव-काँव करने लगे क्योंकि ...

...क्योंकि एक नारी शक्ति ने अपने चारो ओर फैली सड़ाँध से परेशान होकर नाक-भौं सिकोड़नी ही नहीं शुरू कर दी बल्कि सफाई की बात भी कह दी ।

सुशांत सिंह की मृत्यु पर चुप्पी साधे लोग अचानक बोल पड़ते हैं, रिया चक्रवर्ती की ग़िरफ़्तारी उन्हें अन्याय लगती है । हर बात में पटर-पटर बोलने वाले मोतीहारी वाले मिसिर जी को यह सारा तमाशा गहरी विरक्ति से भर देता है ।

गंधर्व लोक के बनावटी चेहरे हमारे आदर्श क्यों हैं?      

मोतीहारी वाले मिसिर जी कहते हैं – “रिया आ शोविक के ग़िरफ़्तारी दुःखद बा । दू गो नवका झाड़ बॉढ़े-पउढ़े से पहिलहीं मुरझा गॉइलन । उनकर भविस्य पर ग्रिहन लाग गॉइल बा । पर सनी देव जी के आपन काम कॉरे के परी । अनुसासन आ नियाय के स्थापना करे खातिर कुल दुःख सहन करे के चाहीं”। 

हम मिसिर जी की भावनाओं का सम्मान करते हैं । चक्रवर्ती परिवार इस घटना से पूरी तरह बिखर गया है किंतु इस पूरे प्रकरण में रिया के पिता के दायित्वों की असफल भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती । हम सुशांत सिंह को भी पूरी तरह निर्दोष नहीं मान सकते । यदि उनके अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति होती तो वे इस दलदल से निकल सकते थे । बहरहाल यह सब बहुत बड़ा पाठ है समाज के लिए ...हमें रिया के पिता की भूमिकाओं और सुशांत सिंह की मनः स्थितियों के विश्लेषण से बहुत कुछ सीखना और सँभलना होगा ।

हमें बोलना ही होगा...

आवश्यक नहीं कि हम मोतीहारी वाले वयोवृद्ध मिसिर जी की हर बात से सहमत हों ...फिर भी उनकी सजग दृष्टि और समाज के प्रति उनकी व्यथा हमें उनकी ओर आकर्षित करती है । एक दिन हमने पूछा – “मिसिर जी ! हर बात में आप क्यों कूद पड़ते हैं? आपकी चिंता से क्या होगा ? अब इस चौथेपन में आपको सन्यास लेकर भगवान का भजन नहीं करना चाहिए?”   

मिसिर जी की ओर से कोई आवाज़ नहीं आयी तो हमें लगा कि शायद फ़ोन कट गया है । हम दोबारा फोन लगाने ही वाले ही थे कि उनकी गम्भीर आवाज़ सुनायी दी – “सजग रॉहब तऽभिये नू भजन होई भगवान के रचल सिरस्टी के । चुप रहलीं तऽ अफगानिस्तान बॉन गऽइल , चुप रहलीं तऽ अरबी आ फिरंगी बिदेसिया के गुलाम हो गऽइलीं, चुप रहलीं तऽ हम बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक हो गऽइलीं, चुप रहलीं तऽ हमार पहचान मिटाय के कुल अभियान सफल हो गइल, अभियो कॉहतऽड़ के चुप रॉहे के चाहीं ? ए हो बचवा सुनॉ ...हमरा के गोली मार दऽ हम चुप हो जाइब”।

मिसिर जी का यह उत्तर हमें हमें भारत की कोटि-कोटि प्रजा के प्रति अपने दायित्वों के लिए ललकारता है ।

मिसिर जी ! हमसे भारी भूल हो गयी । आप बोलिये, आपको बोलना ही होगा ।  

सोमवार, 14 सितंबर 2020

पी.ओ.के. आ मुम्बई के मुक्ति ज़रूरी बा...

बकौल मोतीहारी वाले मिसिर जी – “कॉन्गना के बक्तब्य मँऽ अऽइसन कवन बात बा के ऑतना हंगामा हो रऽहल बा । पीओके आ मुम्बई दूनों हमार हॉ । ई बतिया अ‍ॅकदम सत्य बा के कोई-कोई लोग पीओके आ मुम्बई के बंधक बना के अ‍ॅपना पाकेट में रख लेले बाड़न सऽ । हम तऽ जे.एन.यू. के भी बंधक अस्थिती मँ देखले बानी । घबरइहा झन बेटी ! कुल भारत तोहरए साथ बा । पीओके मुक्त कराये के बा ...मुम्बइयो मुक्त कराये के बा”।

सही बात है, मुम्बई की तुलना पीओके से करने में गद्दारी जैसी कौन सी बात है ? यह हवा में गाँठें लगाना है । क्या आप पीओके को भारत का हिस्सा नहीं मानते? (और क्या यह भी सच नहीं है कि भारत के भीतर बहुत से पाकिस्तान जब-तब भारत को तबाह करते रहते हैं ?)  

भारत के लोग स्पष्ट अनुभव कर रहे हैं कि महाराष्ट्र की शिवसेना में लोकतंत्रात्मक सत्ता की गरिमा का पूर्ण अभाव है । कंगना के प्रकरण में शिवसेना के नेताओं ने सामान्य मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है । इससे पहले सुशांत सिंह राजपूत मामले में भी निर्लज्ज होकर पक्षपात करने का खेल खेला जाता रहा । किंतु...   

...जनता की आँखें बहुत तेज हैं और वह समय आने पर अपने अधिकारों का प्रयोग करना सीख गयी है । 

शनिवार, 12 सितंबर 2020

सिद्धांतों का सौदा करने वाले सिद्धांतवादी...

उन्होंने दावा किया था कि वे एक ही रास्ते के दो पथिक हैं, उनकी मंजिलें एक हैं ।

मंजिल क़रीब आने को हुयी तो मंजिल पर दावे को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया । एक ने दामन थाम लिया उन लोगों का जो उनके सैद्धांतिक विरोधी थे ।

सत्ता सुंदरी किसी दूसरे के अँगना में नाचे यह एक पथिक को स्वीकार्य नहीं हुआ । जो रहगुज़र था वह शत्रु हो गया,    सिद्धांतों के सौदे के साथ सत्ता पर क़ब्जा हुआ ...लेकिन इसी बीच सत्ता का नशा सिर चढ़कर उत्पात मचाने लगा । कुछ बदमाश और असामाजिक लोग भोले भण्डारी शिव के सैनिक बनकर उत्पात मचाने लगे ।

दोनों सहयात्री पथिक अब एक-दूसरे के सैद्धांतिक शत्रु हैं जो अगले चुनाव में पुनः मित्र बन सकते हैं और आज के मित्र फिर से शत्रु हो सकते हैं । प्रजा इस सारे तमाशे को देखते समय अब हैरान-ओ-परेशान नहीं होती, उसे भी पता चल चुका है कि सिद्धांत और आदर्श वे काँटे हैं जिनसे सत्ता की मछली फ़ँसाई जाती है । अब भारत की प्रजा भी राजा बनने का ख़्वाब देखने लगी है ...लेकिन हर किसी की किस्मत में तो ऐसा नहीं होता न!

फ़िलहाल, कैलाश पर्वत पर साधनारत शिव छद्मसैनिकों के इस उत्पात से तनिक विचलित हुये फिर उन्होंने शनि देव को पूरा मामला हैण्ड ओवर कर दिया । अब तमाशबीनों को “जैसी करनी वैसी भरनी” की प्रतीक्षा करनी होगी ।  

...लेकिन इस सबके बीच मोतीहारी वाले मिसिर जी गुस्से में बड़बड़ाते हैं – “आख़िर सैद्धांतिकता की दुहाई देने वाले लोग इतने असैद्धांतिक हो कैसे जाते हैं” ?

 

देश के भीतर कई देश...

संजय राउत महाराष्ट्र के, सुशांत सिंह राजपूत बिहार के, रिया चोक्रोवोर्ती बंगाल की और कँगना रानावत हिमांचल प्रदेश की नागरिक हैं । ख़बर है कि महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल और हिमांचल के राजा एक-दूसरे के नागरिकों के ख़िलाफ़ षड्यंत्र कर रहे हैं । भारत की प्रजा को पता करना होगा कि इन पारस्परिक शत्रुओं में से कोई भारतीय भी है या नहीं?

भारत के हजार टुकड़े करने का नारा देने वाले उमर ख़ालिद को नास्त्रेदमस की भूमिका में देखकर मैं हैरान हूँ । 

कोरोना – इनके दावे, उनके वादे...

आज कोरोना के सीरो सर्वे की चौंकाने वाली रिपोर्ट आ गयी है जिसमें बताया गया है कि मई 2020 तक लगभग चौंसठ लाख लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके थे । यह एक रेण्डम सर्वे था किंतु रिपोर्ट में चौंकाने वाली दो बातें ऐसी हैं जिन्होंने कोरोना से सम्बंधित वैज्ञानिकों के अभी तक के दावों को राजनेताओं के वादों की श्रेणी में लाकर पटक दिया है ।

पहली यह है कि कोरोना ने साठ से अधिक उम्र के लोगों की अपेक्षा युवाओं को कहीं अधिक अपना शिकार बनाया जिससे युवाओं में रोगप्रतिरोधक क्षमता अधिक पायी जाने वाली थ्योरी ध्वस्त हो गयी । दूसरी बात यह कि कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं अधिक पायी गयी जिससे ट्रैवेल हिस्ट्री, शहरी प्रदूषण, गाँवों की शुद्ध आब -ओ-हवा आदि की अन्य थ्योरीज़ भी ध्वस्त हो गयीं । यह सब कुछ उतना ही आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित है जितना कि कंगना का आशियाना ध्वस्त किया जाना ।

विचारणीय बात यह भी है कि कोरोना संक्रमितों की संख्या शहरों की अपेक्षा गाँवों में अधिक होने के बाद भी मृत्यु दर शहरों में ही अधिक रही जबकि गाँवों में मृत्यु का इतना शोर-शराबा सुना भी नहीं गया ।

अब तो कुछ भी भरोसे लायक नहीं रहा । सारी गाइड लाइंस, सारे मेडिकल टोटके, लॉक डाउन, मज़दूरों की घर वापसी, भीड़, फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग आदि की कवायदें धरी की धरी रह गयीं और कोरोना मज़े से गाँवों में घूमता रहा और शिकार शहरों में करता रहा ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के लाख हटकने के बाद भी इटली के स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना संक्रमित मृतकों की ऑटोप्सी के बाद अप्रैल 2020 में जो नई गाइड लाइन ज़ारी की है उसने तो कोरोना वायरस के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा दिया है (इस पर भी हम शीघ्र ही एक लेख प्रस्तुत करने वाले हैं) । फ़िलहाल एक बात तो तय है कि अभी तक के सारे वैज्ञानिक दावे धूल में लट्ठ ही मारते रहे हैं । हाँ डॉक्टर्स के लिए इस सदी का सबसे कमाऊ अवसर इससे पहले कभी नहीं आया था ।

एस्प्रिन, क्लोरोक्वीन फ़ॉस्फ़ेट, Remdesivir, गरम पानी से गरारा, संतरे का रस और जैसी तैसी तीमारदारी के बदले में एक लाख रुपये प्रतिदिन की कमायी कम नहीं होती । इन सभी में मूल्यवान दवा Remdesivir की एक वायल की कीमत है चार हज़ार रुपये । एक मरीज़ दस दिन भी रह गया तो केजरीवाल दर से न्यूनतम दस लाख रुपये सीधे हो गये । मैं इसे कमाई का गोल्डेन या डायमण्ड टाइम न कहकर प्लेटिनम टाइम कहना चाहूँगा ।

कल अगरतला की सुमिता ने फ़ोन करके बताया था कि उनकी सहेली के कोरोना संक्रमित पति का गुड़गाँव के एक अस्पताल में पिछले अठारह दिनों से इलाज़ चल रहा है । डॉक्टर साहब का बिल हो गया अठारह लाख रुपये । प्रोफ़ेसर साहब कंगाल हो गये और डॉक्टर साहब मालामाल । जमा पूँजी न्योछावर करने के बाद भी डॉक्टर साहब अभी तक यह नहीं बता रहे हैं कि रोगी की प्रॉग्नोसिस क्या है । बहरहाल सब कुछ लुटाने के बाद मरीज को बिना स्वास्थ्य लाभ के ही वापस घर लाने की तैयारी हो रही है ।