गुरुवार, 28 मई 2026

बस्तर से अल्मोड़ा

जल, जंगल, जमीन...

उन्होंने कहा जल, जंगल, जमीन हमारी है, इसके उपभोग का अधिकार हमें है, हम तुम्हें यह सब छीनने नहीं देंगे।
ढपली वाले आये, खूब गीत गाये... "किरांती" वाले गीत, प्रकृति के संरक्षण वाले गीत!
नारे लगते रहे, ढपलियाँ बजाई जाती रहीं...
इस बीच 'चार' (चिरौंजी) और 'आँवला' के वृक्ष लुप्त होते रहे, जल पहुँच से दूर होता गया, और जंगल की जमीन पर पहले कुछ झोपड़ियाँ और फिर पक्के मकान उगते रहे। आमचो बस्तर की ऐसी दुर्गति के लिए उत्तरदायी कौन है?

कल अल्मोड़ा वाले मार्ग पर पैदल चलते-चलते देखा- एक स्थान पर एक बूढ़ी नानी अपने नन्हें से नाती को लेकर एक गाछ के पास गयीं और हँसिये से उसकी डालियाँ काटने लगी। मुझे उत्सुकता हुयी, पास जा कर देखा, अरे! यह तो 'काफल' है।
बूढ़ी नानी के नाती को 'काफल' खाना है, इसलिए माई डालियाँ काट रही थीं। डालियों में कुछ पके, कुछ अधपके और कुछ कच्चे काफल व्यथित हो उठे, मानो कह रहे हों - "आप पके काफल चुन लीजिए, पर डालियों को मत काटिये!"

विज्ञानद्वय (भौतिकशास्त्र और वनस्पतिशास्त्र) के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने सिद्ध किया था कि प्राणियों की तरह वनस्पतियों में भी चेतना होती है और वे बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर अपनी प्रतिक्रियायें देती हैं।
बूढ़ी नानी का हँसिया जैसे ही पहली डाल पर पड़ा, काफल का गाछ पीड़ा से चीख पड़ा.... जिसे देवभूमि की बूढ़ी नानी सुन नहीं सकीं। बस्तर में भी तो भीमा राजू कहाँ कभी सुन पाया पीड़ित-शोषित चार और आमला का रुदन!
बस्तर में चार और आँवला दुर्लभ हो गये..., देवभूमि में काफल दुर्लभ होता जा रहा है। तभी तो एक दोना काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है।
मैं उदास हूँ, इसलिए नहीं कि चार वर्ष पहले तक पचास रुपये प्रति दोना मिलने वाला काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है, अपितु इसलिए कि कुछ समय बाद यही काफल एक हजार रुपये में भी नहीं मिलेगा।
राजा ने राजसेवकों से राजमार्ग के किनारे पड़े पत्थरों के वक्ष पर लिखवा दिया है -
"वन से जल, जल से जीवन"।

राजसेवकों ने राजाज्ञा का पालन किया पर इसी बीच शब्दों का उनके अर्थों से तलाक करवा दिया गया। यहाँ हलाला की कोई व्यवस्था नहीं है और प्रेरणादायक नारे भी अब गूँगे हो गये हैं। 

ब्राह्मण कितने विदेशी!

नृवंशों के पलायन और ईरानियन नियोलिथिक फार्मर, मिडिल एशियाई स्टेपी और जाग्रोस आदि कई प्रकार के जेनोम की बहुलता की कहानी में एक जिज्ञासा उभरती है, जब सभी मनुष्य किसी एक ही आदिम स्त्री-पुरुष की संतान हैं तो भौगोलिक आधार पर उनके जेनोम्स में इतनी बहुलतायें क्यों और कैसे उत्पन्न हुई होंगी, और क्या बहुलता की यह शृंखला आज भी बढ़ती ही जा रही है!

यह एक रोचक जिज्ञासा है। यह सत्य है कि देश-काल-वातावरण के अनुसार लोगों को अपनी जीवनशैली में यथोचित परिवर्तन करने होते हैं जो जीवित रहने के लिए आवश्यक है। यह एक तरह का सूक्ष्म और अपेक्षाकृत स्थायी अनुकूलन है जो अंततः किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की शारीरिक-मानसिक संरचना पर दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। नृवंशों के पलायन और बसावट की यह एक अंतहीन स्थिति है जो सदा से होती आई है, सदा होती रहेगी।
हम सभी के पूर्वज घुमंतू से कबीलों, फिर गांवों, पुरों और नगरों से होते हुये राज्यों और देशों में बसते रहे हैं। यह उसी तरह है जैसे भारत के कुछ वनवासी क्षेत्रों में झूमकृषि परंपरा वाली सभ्यता।
जीवनशैली में दीर्घकालीन परिवर्तन अंततः शरीर और जेनोम्स की संरचना में एनाटाॅमिकल परिवर्तन करते हैं जो उनकी फिजियोलाॅजिकल स्थिति को भी किंचित परिवर्तित करते ही हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सिकलिंग के प्रभावितों में मलेरिया की प्रतिरोधी क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। सिकलिंग के रोगियों को मलेरिया नहीं होता। उनमें पाई जाने वाली हीमोग्लोबिनोपैथी का अस्तित्व ही मलेरियारोधी होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है।
अब हम ब्राह्मणों के विदेशी होने की सत्यता पर विचार करेंगे। जेनेटिक विश्लेषण बताते हैं कि वास्तव में हर देश का हर नागरिक विदेशी नृवंशों का मिश्रण होता है। जंबूद्वीप निवासी ब्राह्मणों में भी मिश्रित जेनोम्स पाये जाते हैं। एक समय जंबूद्वीपीय सभ्यता अपने किंचित स्थानीय अनुकूलनों के साथ एशिया के एक विस्तृत भूभाग पर कुछ साम्यताओं के साथ प्रचलित हुआ करती थी, जिसमें यव (जौं) एवं तंडुल प्रधान कृषि का बड़ा योगदान था। लैंडलाॅक क्षेत्र के निवासियों के विपरीत समुद्रतटीय क्षेत्रों के निवासियों की जीवन शैली में जलीय जीवजंतुओं और वानस्पतिक उपलब्धताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसी तरह की अन्य भिन्नताओं ने भी कई प्रकार के जेनोम्स को जन्म देकर कई नृवंशों को जन्म दिया। तो हम ब्राह्मणों के जेनोम्स का विकास जाग्रोस पर्वत (वर्तमान ईरान) से लेकर सिंधुघाटी तक के क्षेत्र एवं बहुत थोड़ी मात्रा में वर्तमान एशिया और वर्तमान यूरोप के एशियाई सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के मिश्रण से माना जाता है। जेनोम्स में परिवर्तन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम है।
एक समय तो भारत का सीमा विस्तार तिब्बत से लेकर पश्चिम में बैक्ट्रिया और जाग्रोस तक था ही। क्या तब के अफ़ग़ानिस्तान और जाग्रोस के आसपास बसे लोग भारतीय नहीं थे! क्या आज के पाकिस्तानियों को भारतीय नृवंशों का वंशज नहीं माना जायेगा!
जाग्रोस पर्वत शृंखला से निकलने वाली कारुन, करखेह और देज नदियों के उपजाऊ क्षेत्रों में बसे "जाग्रोस जेनोम युक्त" लोगों का सिंधु नदी घाटी के लोगों से मेल-मिलाप स्वाभाविक है, इसे तत्कालीन परिस्थितियों की दृष्टि से देखिये, कौन विदेशी है!
मैं हिंदी पट्टी की जनजातीय सहित सभी समुदायों और अफ्रीकी जनजातीय लोगों की जीवनशैली, परंपराओं, गीतशैली, और उच्चारण में अद्भुत समानता से सदा अचंभित होता रहा हूँ। हमारे उच्चारण और जीवनशैली में अफ्रीका हमारे बहुत समीप है जबकि यूरोप से हमारा कुछ भी साम्य नहीं मिलता।
मनुस्मृति की सुनी सुनाई एक-दो बातों को लेकर मनुस्मृति के प्रति घृणा और तिरस्कार की तरह ही जेनेटिक्स जैसे क्लिष्ट विषय का मात्र एक वाक्य पढ़कर और शेष संदर्भ को छिपाकर कोई नया सत्य नहीं गढ़ा जा सकता।

गुणांतरण

राजा

अपराधी मानता है
विद्यालय में
प्रवेश लेने के पहले से ही
हर उस विद्यार्थी को
जिसने लिया है जन्म
किसी ब्राह्मण
या क्षत्रिय
या वैश्य कुल में,
बस, इतना ही पर्याप्त है
चलाने के लिए उस पर
कई गंभीर अभियोग
कई काल्पनिक अपराधों के लिए।
दंड का भागी है वह विद्यार्थी
किसी भी काल्पनिक आरोप में,
यह न्यायालय का नहीं
राजा का निर्णय है
उन पूर्वाग्रहों पर आधारित
जिनका नहीं मिलता
कोई प्रमाण।
प्रजा ने याचना की
खीझकर
दुःखी होकर
निराश होकर
मिथ्यारोपों से व्यथित होकर
कि पद
और राजसेवायें तो कर ही दी हैं पृथक
अब
पृथक कर दो
हमारे विद्यालय भी
हमारे विश्वविद्यालय भी
हमारे चिकित्सालय भी
हमारे न्यायालय भी
और
हमारी पुलिस भी।
"स-वर्णों के लिए स-वर्ण
अ-वर्णों के लिए अ-वर्ण"।

यद्यपि
कोई सुदामा
न खड़ा, न लड़ा
तथापि
राजा रहा अड़ा
उसे चाहिए
केवल व्यवधान
समाधान नहीं
इसलिए उसने प्रारंभ करवा दिये हैं
देश भर में हिंदूकुश...
केवल हिंदूकुश,
क्योंकि वह स्वप्न देखता है
विश्वगुरु बनने के
दादा ईदी अमीन बनने के
रावण बनने के
और ईश्वर बनने के भी।
उसने पढ़ा था बचपन में
"सर्वाइवल आॅफ़ द फिटेस्ट" से ही
होता है स्थापित
पहले वर्चस्व
और फिर
विकास...
एक कोषीय से बहुकोषीय
अमीबा से वानर
फिर वानर से मानव।
राजा प्रगतिशील है
वह विकास करेगा
नीम को आम बनायेगा
बेर को केला
पैरों को मस्तिष्क
और
गुदाद्वार को मुँह
करके विच्छेद
मस्तिष्क और मुँह का,
समूल उच्छेदित कर
आम और केला।
राजा
नान-बायोलाॅजिकल है
देना चाहता है "अ-वर्णों" को
सारे अधिकार
छीनकर स-वर्णों से,
देना चाहता है नीम और बेर को
आम और केले के गुण।
यही है राजा का अभियान
"गुणांतरण"
ठीक
जैसे "धर्मांतरण"।

मंगलवार, 12 मई 2026

ग्लानिर्भवति भारत

हमने विश्वास किया 

उस पर

स्वयं से भी अधिक
और सम्मोहित हो
देखते रहे वही
उतना ही
जो 
और जितना
दिखाता रहा वह ।
हम नहीं देख सके वह सत्य
जो वह छिपाता रहा सबसे
यह चमत्कार ही था
काला जादू सा
कि हम देख पाते हैं
केवल वही
और केवल उतना ही
जो 
और जितना
दिखाना चाहता है वह
सामने खड़ी
सम्मोहित भीड़ को।
फिर एक दिन अनायास
एक तीव्र चक्रवात ने
रख दिया उधेड़ कर
और दिखा दिया वह भी
जो नहीं देख सके हम
अपनी खुली आँखों से कभी।
वह प्रवंचक
संत का वेश धर
पल-पल करता रहा सीताहरण
और अब
जबकि लुट चुकी हैं
सभी सीतायें
उसने उलट दी है
हमारी झोली
जिसे लेकर
इतने वर्षों से
वह दिखाता रहा था काला जादू
लूटता रहा था हम सबको
दिखा-दिखा कर कूट चमत्कार
लुटाता रहा था रेवड़ियाँ
शत्रुओं को हमारे
छीनकर हमसे ।
आज उसने फिर फेका है जाल
कि फिर बचायें हम 
बहुत सा धन
काटें
अपना पेट और तन
कि वह फिर लुटा सके रेवड़ियाँ
हमारे शत्रुओं को।

रविवार, 3 मई 2026

हो रहा शत्रुबोध

तुम "प्रतिभा" को

"सामान्य" कहते हो
क्या सचमुच
प्रतिभा "विशिष्ट" नहीं होती?
तुम जिन्हें विशिष्ट मानते हो
उन्हें आरक्षण देते हो
क्योंकि
तुम जानते हो
उनमें प्रतिभा होती
तो यह शिथिलता नहीं होती
तब
तुम उन्हें भी नष्ट करने के
षड्यंत्र करते।
तुम्हारा शत्रु
न अगड़ा है, न पिछड़ा
न दलित, न कोई और
केवल वह है
जिसमें प्रतिभा है
मैं इसे
संज्ञाओं से बलात्कार कहता हूँ
अर्थ को अनर्थ
और अनर्थ को अर्थ करने का
षड्यंत्र कहता हूँ।
तुम इसी तरह
सदा से नष्ट करते रहे हो प्रतिभायें
मूर्खों को दास बनाने
और प्रतिभाओं को
कुंठित करने के लिए,
तुम हत्यारे हो
प्रतिभाओं के ही नहीं
मानवता के भी।
तुम
कभी गोरे अंग्रेज होते हो
कभी काले अंग्रेज होते हो
वास्तव में
तुम मानवता के
सबसे बड़े शत्रु होते हो। ।

शनिवार, 2 मई 2026

ब्राह्मण की बेटी

दिन

मजदूर दिवस
वर्ष 
दो हजार छब्बीस।
पुणे का नसरापुर गाँव
गाँव का प्यासा भीमाजी कांबले
एक ब्राह्मण बच्ची
आयुषी कुलकर्णी
आई थी ननिहाल
एक दलित
एक ब्राह्मण
दलित ने देखे पैंसठ वसंत
बच्ची ने चार
बच्ची को नहीं पता वसंत
दलित को पता
वसंत में कैसे करते हैं पतझड़।
बच्ची के पूर्वज
आये थे यूरेशिया से
ऐसा लोग कहते हैं।
भीमाजी के पूर्वज
मूलनिवासी
ऐसा लोग मानते हैं।
सत्य
कितने लोग जानते हैं!

दो-

सरकार कहती है
नेता कहते हैं
इस देश के संसाधनों पर
पहला अधिकार
दलितों का
अर्थात
उपभोग के लिए
धरती उनकी, विधान उनका
देश उनका, न्याय उनका
सरकार उनकी
और
नन्हीं सी बच्ची भी उनकी
इसलिए
मूलनिवासी ने किया
यूरेशियन बच्ची से यौनदुष्कर्म
फिर पीटा, पत्थर से कुचला
फिर गाड़ दिया
गोबर के ढेर में।

तीन-

सम्राट ने
अदला-बदली कर दी है
संज्ञाओं की
एक अच्छे समाधान के लिए
अब
कुकर्म को पुण्य कहना
हत्या को मोक्ष कहना
अपराध को न्याय कहना
पीड़ित को उत्पीड़क कहना
सच्चा समाधान है
दलित हितकारी है।
इस नव्य न्याय के अनुसार
पीड़ित वह बच्ची नहीं
वह दलित वृद्ध है
और उत्पीड़क वह वृद्ध नहीं
वह बच्ची है
अतः
गोबर के ढेर में से
निकालकर बच्ची का शव
कड़े से कड़ा दंड दो
दलित को
भारतरत्न दो
और लिपिबद्ध करो
इतिहास की नन्हीं सी
एक बूँद यह भी
कि दलित प्यासे हैं
पिछले पाँच हजार सालों से।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

भगवान

वह सृजित करता है 

जातियाँ ही नहीं, 

पाप

पुण्य 

और भगवान भी। 

वह 

समुच्चय है 

सभी शक्तिमानों की शक्तियों का

अवतारी है

स्वयं भी

बात करता है ईश्वर से

बात के निपात से 

सबको अचंभित करता है। 

उसके राज्य में 

जो भी सच बोलता है

वह 

उसे मार कर खा जाता है। 

वह चढ़ता है

सीढ़ियों पर रखकर अपने चरण

कुचलकर दमन करते हुए 

हर उपभोग की जा चुकी सीढ़ी का।

वह पिछड़े से दलित हो गया 

बनते-बनते विश्वगुरु 

नहीं बन सका विश्वगुरु 

पर बन गया

अवतारी भगवान

भगवान की जय हो!

जो नहीं बोलेगा जय 

वह मारा जाएगा

साक्षात काल के हाथों

इसलिए

भगवान की बार-बार जय हो!