मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

धम्मचक्र के साथ सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक अन्याय करते लोग



कल दो अप्रैल को अनुसूचित जाति-जनजाति संयुक्त मोर्चे द्वारा भारत बन्द का आह्वान किया गया और पूरे देश में बलपूर्वक व्यापारिक प्रतिष्ठान बन्द करवा दिये गये, चक्का जाम किया गया और हिंसक आन्दोलन में दस लोगों हत्या कर दी गयी । गनीमत है कि इस बार के विरोध-प्रदर्शन की हिंसा और हैवानियत गुजरात के पाटीदार आन्दोलन की तरह व्यापक और क्रूर नहीं हो सकी । 
एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अन्य पिछड़ा वर्ग समर्थित संयुक्त मोर्चे द्वारा हिंसक प्रदर्शन किए गये और सनातन धर्म के अनुयायियों की आस्था व मान्यताओं को आहत व अपमानित किया गया । प्रदर्शनकारियों के हाथों में भीमराव आम्बेडकर और धम्मचक्र के ध्वज थे । सामाजिक अन्याय के विरुद्ध दिये गये उत्तेजक भाषणों में सनातन संस्कृति, वैदिक साहित्य और ब्राह्मणों को जी भर अपमानित किया गया । बुद्ध के धम्मचक्र के नीचे सामाजिक अन्याय के चक्र को और भी गति प्रदान की गयी । प्रेम और शांति की स्थापना के लिए घृणा और हिंसा का चक्र चलाया गया । देश भर में अराजकता का वातावरण बन गया, स्वयं को दलित कहने वाले लोगों की अराजक भीड़ ज़बर होती गयी और  अवसरवादियों ने अपनी दूरदृष्टि में 2019 के लोकसभा चुनावों को अपना लक्ष्य बनाते हुये सत्ता के गणित का आकलन-विकलन प्रारम्भ कर दिया । इस बीच नेताओं, विचारकों और बुद्धिजीवियों को साँप सूँघता रहा और किसी ने भीमसेना से यह पूछने का साहस नहीं किया कि सामाजिक न्याय पाने के लिए सामाजिक अन्याय का यह चक्र आख़िर कब रुकेगा ?
आरोप है कि सवर्णों (मुख्यतः ब्राह्मणों और क्षत्रियों) ने अनुसूचित जातियों को हजारों साल तक सताया और उन पर अमानुषिक अत्याचार किये । यह सामाजिक अन्याय का एक काल था । उधर अफ़्रीका के लोगों को मध्य एशिया और योरोप की दास मण्डी में बेचे जाने और उन पर पाशविक अत्याचार करने का एक दीर्घ युग भी देखा गया है । ह्यूमन ट्रेफ़िकिंग पूरे विश्व में आज भी न्यूनाधिक अभिषाप बना ही हुआ है । हर समाज में विकृतियाँ आती हैं, फिर कुछ समय बाद क्रांति होती है और एक नयी व्यवस्था लागू होती है । उस नयी व्यवस्था में पुनः कुछ समय बाद विकृतियाँ आती हैं और फिर क्रांति होती है । कृति-विकृति और क्रांति का यह चक्र सदा से चलता रहा है ।
भारत के सन्दर्भ में जातीय अत्याचार हमारी सभ्यता पर कलंक के रूप में जाने जाते रहे हैं । निश्चित ही इस विकृति के कुछ कारण रहे होंगे जो शनैः शनैः एक विकृत परम्परा को जन्म देते रहे । हमें एक बात सदैव स्मरण रखना चाहिये कि मौलिक अधिकारों का हनन हो या अन्य कोई सामाजिक अत्याचार, इनका कर्ता सबल और अधिकार सम्पन्न व्यक्ति ही होता है । कोई श्रमिक किसी के साथ क्या अत्याचार कर सकेगा ! कोई निर्बल किसी को क्या सतायेगा ! कौन है सबल, कौन है अधिकार सम्पन्न ? कोई ब्राह्मण-क्षत्रिय या कोई दबंग और राजा ?
भारत के प्राचीन इतिहास को देखिये ! राज सत्ता तो क्षत्रियों के साथ-साथ वनवासियों से लेकर आज की अनुसूचित जातियों और पिछड़ा वर्ग तक सभी के हाथों में खेलती रही है । राजसत्ता पर प्रायः क्षत्रियेतर जातियों का ही वर्चस्व रहा है । ब्राह्मणों के राज्य का इतिहास तो बहुत अल्प है । अब प्रश्न यह उठता है कि जब राजसत्तायें क्षत्रियेतर जातियों के आसपास ही प्रायः घूमती रही हैं तो कोपीनधारी और भिक्षाटन करने वाला ब्राह्मण इतना सबल और शक्तिसम्पन्न कैसे हो गया कि राजसत्ता की समकक्ष जातियों को  सताने लगा ?
हमें यह समझना होगा कि सामाजिक अन्याय शक्तिसम्पन्न लोगों और सत्ताधीशों द्वारा ही किये जा सकते हैं... किये जाते रहे हैं... फ़िर वे किसी भी जाति, धर्म या वर्ग के क्यों न हों । हमें यह भी समझना होगा कि शक्त्तिसम्पन्न और सत्त्ताधीशों की जाति का नाम हमेशा “ज़बर” ही स्वीकार किया जाना चाहिये । ज़बर हमेशा से कमज़ोर को सताता रहा है । गुर्जर, भील, गोंड आदि समूहों या सवर्णेतर अन्य समुदायों के राजाओं ने अपनी-अपनी जाति के लोगों का कब कितना उत्थान किया ? यदि उत्थान किया होता तो आज वे ही सबसे आगे होते, सबसे सम्पन्न और शिक्षित होते । दूसरी ओर प्रचीन भारत की परम्परा में ऋषियों, मुनियों और संतों में ब्राह्मणेतर जाति के लोगों ने भी न केवल सम्मान अर्जित किया बल्कि समाज में पूज्य भी होते रहे हैं । आज भी साधु-संत की जाति नहीं पूछे जाने की परम्परा हमारे देश में प्रचलित है । भारतीय समाज परम्परा गुणात्मक विकासोन्मुख रही है जिसके आगे किसी जाति-धर्म का कभी कोई स्थान नहीं रहा ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिये दिये गये निर्णय के विरुद्ध हिंसक उपद्रव और हनुमान के चित्र पर थूक कर उसे जूते से पीटने का पूर्वाग्रही घृणापूर्ण प्रदर्शन भी उसी सामाजिक अन्याय की पुनरावृत्ति है जिसके विरोध में इतना बवाल किया गया । यह प्रदर्शन किसी समाधान की दिशा में नहीं बल्कि समस्याओं के चक्र की दिशा में ही और भी आगे बढ़ा है ।       

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

शांति के लिए यह भी सही...


1-
हनुमान हैं
शक्ति के प्रतीक
नफ़रत से
जिन पर थूकने
और
जिन्हें जूते लगाने का दुस्साहस है जिनमें
वे ख़ुद को दलित कहते हैं ...
इससे बड़ा गुस्ताख़ झूठ
और क्या हो सकता है भला !

2-
हे भीमपुत्रो !
थूकने
और जूते लगाने से
मिलता है यदि न्याय
और होता है प्रवाहित प्रेम
तो मुझ पर भी थूको...
मुझे भी लगाओ जूते ...
शायद इसी तरह हो सके स्थापित
अमन-चैन
हमारे भारत में ।
मंज़ूर है मुझे
यह सौदा भी
अपनी मातृभूमि की सुख-शांति के लिए !

बुधवार, 21 मार्च 2018

जे.एन.यू. के नाम एक चिट्ठी


  
सुनो विद्वानो !  
बस्तर में आज फिर...
मार दिये गये कुछ जवान
जैसे कि मार दिये जाते हैं
आये दिन ।
बस्तर में आज  फिर...
हवा में उछल गये मांस के लोथड़े
जैसे कि उछलते रहते हैं
आये दिन
घात लगाकर किये गये विस्फोटों में ।
तुम कहते हो
कि सैनिक तो होते ही हैं मरने के लिये
लेकिन
जैसे ही मरता है कोई राष्ट्रघाती
व्यथित हो जाते हो तुम
उमड़ पड़ता है सैलाब
तुम्हारी संवेदनाओं का
हो जाते हो करुणा विगलित
और उमड़ पड़ते हो सड़कों पर
दुष्टों के
मानवाधिकारों की रक्षा के लिए ।
इसलिये
अब तय कर लिया है मैंने
कि नहीं पढ़ाऊँगा-लिखाऊँगा अपने बच्चों को
कहीं वे भी हो गये
आप जैसे ही विवेकहीन तो !            


क्राउड इन द मैन


लालबत्ती चौराहे पर
रुकते ही वाहनों के
दौड़ पड़ते हैं बच्चे
उलझे गन्दे बालों वाले
पहने मैले-कुचैले कपड़े
लेकर फूलों की माला
‘ले लो न सर एक’। 
सेठ और साहब
नहीं सुनते गुहार
नहीं देखते उनकी ओर ।
शीशे चढ़ी कार के पास
होकर खड़े 
पत्थर के बुतों को निहारते बच्चे
गोया माँग रहे हों भीख ।
रंग बदलते ही बत्ती का
बच्चे हो जाते हैं निराश
सेठ और साहब के बुत
करने लगते हैं हरकत
और दौड़ पड़ता है काली सड़क पर
महँगी गाड़ियों का रेला ।

गन्दे बच्चों के पास हैं
उजले फूलों की मालायें
उजले लोगों के पास हैं
गन्दे दिल
बेहद उलझे हुये ।

चौराहों पर है
मैन इन द क्राउड
ठीक
उन्हीं चौराहों पर है
क्राउड इन द मैन भी ।

सोमवार, 19 मार्च 2018

कोयलिया


छनन-छनन छन-छन पायलिया
ओढ़ि चली सिंदूरी चुनरिया
मधुमास भये 
दिन चढ़ी गुजरिया ।

संदेह भरे मन
बूढ़े टेसू
ठाड़े कछु ताड़त
पकरि कमरिया ।

घुसत खेत लटपटात
लम्पट पवन मंद पी छेड़त
फुदकि-फुदकि के फुनगी-फुनगी
चुगली करत कोयलिया ।

रविवार, 18 मार्च 2018

वह उठा लाया


वह उठा लाया
रास्ते में पड़ा एक पत्थर
रात भर
छेनी-हथौड़ी की मार
सहता रहा पत्थर
भोर हुई
प्रसव हुआ
सबने देखा
वहाँ बहने लगी थी
कलकल करती एक कविता ।

समूल उखा‌ड़ दिए थे
न जाने कितने कुंवारे पेड़
अवसर की आँधियों ने ।
वह घर उठा लाया
धराशायी हुए कुछ पेड़
सहलाता रहा उनके ज़ख़्म
करता रहा मरहम-पट्टी
फिर कुछ दिनों बाद आयीं
कुछ चिड़ियाँ
गाने लगीं गीत
उन पेड़ों से लिपटकर ।
एक दिन लोगों ने देखा
कि नए पत्ते निकलने लगे हैं
पेड़ की सूखी शाखाओं से
और फुदकने लगी हैं वहाँ
न जाने कितनी कविताएं ।

बुधवार, 14 मार्च 2018

दुःख के स्वाङ्ग


बिहार की बहू नवेली
हरियाणा की बेटी अकेली
हिमांचल की वादियों में
बेटे की सलामती के लिए दिया जलाती बूढ़ी माँ
और झुर्रियों भरे चेहरे पर मुरझायी आँखों से 
प्रतीक्षा करते बूढ़े पिता... मुझे पता है
दुःख का यह पहाड़
एक संवेदनशून्य सूचना की तरह
आपके पास पहुँचने ही वाला है
कि बस्तर के जंगलों में
कुछ और जवानों के
चिथड़े-चिथड़े हो चुके शव
अपनी असामयिक
अंतिम यात्रा की प्रतीक्षा में हैं ।
सबको पता है
कि आपके आँगन में बस चुके अँधेरों को
मुआवज़े की रकम से तौल कर
एक रस्म अदा की जायेगी
सत्ताओं ने इन अँधेरों को
नाम दिया है – “बलिदान
देशभक्ति का
यह एक भावनात्मक मूल्य है
जो दिया जाता है
भावनाशून्य लोगों द्वारा
भोले-भाले लोगों को 
ताकि हुकूमत करते रह सकें
बूढ़े पिण्डारी
जवानों के रक्त के मूल्य पर ।

बस्तर की मैना
सत्ताओं का विरोध करती थी 
क्योंकि वह सदा से
युद्ध का विरोध करती थी ।
एक दिन मार दिया
मैना को भी,  
बस्तर में
अब नहीं पायी जाती
गीत गाने वाली पहाड़ी मैना ।