शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

भारतीय राजनीति के दो मौलिक तत्व

मोतीहारी वाले मिसिर जी भारतीय राजनीति के दो मूल तत्व बताते हैं, प्रथम यह कि राजनीति एक ऐसी बटलोई है जिसमें कुछ भी पका कर खाया जा सकता है। बस, खाने वाले में दृढ़इच्छा शक्ति होनी चाहिये। क्रांतियों और युद्धों का इतिहास बताता है कि पकाने वाला कोई और होता है, खाने वाला कोई और होता है। और द्वितीय यह कि भारत में भले ही गणतंत्र और राजतंत्र के लिए सदा संघर्ष होता रहा है किंतु यहाँ की प्रजा राजतंत्र के लिए स्वयं को सर्वाधिक उपयुक्त प्रमाणित करती रही है

वे यह भी बताते हैं कि आम भारतीय अपने नायक को मनुष्य के रूप में नहीं बल्कि केवल भगवान के रूप में ही स्वीकार करना चाहता है। भगवान कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान भीम, भगवान गांधी, भगवान नेहरू, भगवान लालू और उनके पुत्र, भगवान मुलायम, भगवान ... आदि इसके उदाहरण हैं। भगवानों के सहारे सत्ता कबाड़ने में बहुत बड़ा सहयोग मिलता है। जब हम अयोग्य किंतु धूर्त होते हैं तो हमें अपने प्रभुत्व के लिए एक भगवान गढ़ने और उसका भक्त होने की आवश्यकता होती है। हम भगवान के नाम पर सत्ता के लिए संघर्ष करते हैं और राजा बनते हैं। भगवानों की श्रेणी में माओजेदांग, कार्ल मार्क्स, लेनिन और स्टालिन के बाद इंदिरा, सोनिया, राहुल और मोदी भी आते हैं। जब हम किसी व्यक्ति और उसकी बातों को धरती का अंतिम सत्य मानने लगते हैं तो वह व्यक्ति भगवान हो जाता है और उसकी कही हर बात ईश्वरीय आदेश हो जाया करती है। राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक गुण्डागर्दी का इतना व्यापक स्वरूप और कहीं देखने को नहीं मिलेगा।

भारतीय राजनीति के उत्कर्ष और अपकर्ष के उभय तत्वों का मंत्रज्ञान भगवान बुद्ध ने एक बार अजातशत्रु के मंत्री वर्षकार को भी दिया था।    

“नृपराज्य-गणराज्य-नृपराज्य” सत्ता व्यवस्था का यह एक स्वाभाविक चक्र है। भारत में लगभग एक हजार साल तक गणतंत्रात्मक और राजतंत्रात्मक परम्पराओं को स्थापित करने के लिए तत्कालीन सत्ताओं में संघर्ष होता रहा है। गणराज्य नृपराज्य में और नृपराज्य गणराज्य में बदलते रहे हैं। महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध के समय में उत्तरपूर्वी भारत गणराज्यों का प्रधान क्षेत्र था जिनके मुख्य प्रतिनिधि लिच्छवि, विदेह, शाक्य, मल्ल, कोलिय, मोरिय, बुली और भग्ग आदि हुआ करते थे।

एक बार अजातशत्रु ने अपने मंत्री वर्षकार को गौतम बुद्ध के पास भेजकर वज्जीसंघ को जीतने का उपाय पूछा। बुद्ध ने आनंद को संबोधित करते हुये अप्रत्यक्ष रूप से मंत्री वर्षकार को उत्तर दिया – “हे आनंद!

- जब तक वज्जियों के अधिवेशन एक पर एक और सदस्यों की प्रचुर उपस्थिति में संपन्न होते हैं;

- जब तक वे अधिवेशनों में एक मन से बैठते हैं, एक मन से उठते हैं और एक मन से संघकार्य सम्पन्न करते हैं;

- जब तक वे पूर्वप्रतिष्ठित व्यवस्था के विरोध में नियमनिर्माण नहीं करते, पूर्वनियमित नियमों के विरोध में नवनियमों की

अभिसृष्टि नहीं करते और जब तक वे अतीत काल में प्रस्थापित वज्जियों की संस्थाओं और उनके सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं;

- जब तक वे वज्जि-अर्हतों और गुरुजनों का सम्मान करते हैं, उनकी मंत्रणा को भक्तिपूर्वक सुनते हैं;

- जब तक उनकी नारियाँ और कन्यायें शक्ति और अपचार से व्यवस्थाविरुद्ध व्यसन का साधन नहीं बनायी जातीं;

- जब तक वे वज्जिचैत्यों के प्रति के प्रति श्रद्धा और भक्ति रखते हैं, जब तक वे अपने अर्हतों की रक्षा करते हैं, उस समय तक हे

आनंद! वज्जियों का उत्कर्ष निश्चित है, अपकर्ष सम्भव नहीं।

अजातशत्रु ने भगवान बुद्ध के संदेश में छिपे निहितार्थ को समझा और लिच्छविगणतंत्र की व्यवस्था में पारस्परिक फूट, संस्था सिद्धांतों के बहिष्कार, नैतिक व चारित्रिक पतन, आर्थिकभ्रष्टाचार, कदाचार, स्वेच्छाचारिता, गुरु और स्त्री का अपमान, वेश्यावृत्ति और लोकरक्षा के प्रति उदासीनता आदि दुर्गुणों को संचारित करके लिच्छवि गणतंत्र की जड़ें काट डालीं और वैशाली गणतंत्र को समाप्त कर मगध राजतंत्र स्थापित किया। बाद में लॉर्ड मैकाले ने भी यही मंत्र ब्रिटिश सत्ता को देकर भारत की जड़ें काट डालीं और भारत को सदियों के लिए अपना वैचारिक और आर्थिक दास बना लिया। ...और अब भारत का गणतंत्र एक बार फिर राजतंत्र को आमंत्रित कर रहा है। भारत के सभी गण-सदस्यों में गौतम बुद्ध शाक्य के उसी सिद्धांत की नकारात्मक व्याख्या और पालना की होड़ लगी हुयी है। ममता, लालूपुत्र, मुलायमपुत्र और सोनियापुत्र ही नहीं बल्कि अन्य कई लोग भी यदि सम्पूर्ण भारत नहीं तो कम से कम एक-एक राज्य के स्वतंत्र शासक बनने के लिए ही सही, किसी भी स्तर तक गिरने के लिए तैयार हैं।  

खदबदाहट

आज से लगभग 137 वर्ष पूर्व कुछ लोगों ने भारत में एक वृक्षारोपण किया था जिसपर कई पंछियों ने समय-समय पर अपना बसेरा बनाया। अब एक-एक कर कई पंछी दशकों पुराने पेड़ को छोड़कर कहीं और के लिए उड़ान भरने लगे हैं। आरोपों-प्रत्यारोपों की बौछारें भी आने लगी हैं। कहा जा रहा है कि दशकों पुराना पेड़ अब लोकतांत्रिक नहीं रहा। पेड़ से लटकी डालों ने स्पष्टीकरण दिया है कि जो पंछी उड़ कर कहीं और जा रहे हैं वे आवश्यकता से अधिक महत्वाकांक्षी होते जा रहे थे और वृक्ष के मालिक (जवाहरलाल नेहरू) का स्थान स्वयं लेना चाहते थे। पंछियों ने इस स्पष्टीकरण को यह कहते हुये अस्वीकार कर दिया है कि यह उड़ान, महत्वाकांक्षा के लिए नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए है। यानी खदबदाहट सत्ता की नहीं बल्कि वैचारिक है। और हाँ! 18 दिसम्बर 1885 को यह वृक्षारोपण किया था ब्रिटिश नागरिक ए. ओ. ह्यूम, दादा भाई नौरोजी और दिनशा वाचा जैसे कुछ लोगों ने, किंतु बाद में गांधी जी ने नेहरू जी को इसका मालिक बना दिया। नेहरू अब नहीं रहे किंतु उस वृक्ष पर एकमात्र स्वामित्व आज भी उन्हीं का माना जाता है।

इतिहास के पृष्ठों में लिखा है कि स्वतंत्रता से पूर्व अप्रैल 1946 में ब्रिटिश इण्डिया की 15 कांग्रेस राज्य समितियों को अपना अध्यक्ष चुनना था जिसे वायसराय की एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल का वाइस प्रेसीडेंट बनाया जा सके, काउंसिल के वाइस प्रेसीडेंट को ही सत्ता हस्तांतरण के बाद स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री भी नामांकित किया जाना तय था। अंग्रेजों ने कांग्रेस के अतिरिक्त तत्कालीन अन्य किसी भी क्रांतिकारी दल को सत्ता हस्तांतरण के लिए उपयुक्त नहीं माना और कांग्रेस को ही भारत का भाग्यविधाता मनोनीत कर दिया।

इससे पहले 1940 में रामगढ़ अधिवेशन में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था जो अप्रैल 1946 तक अपने पद पर बने रहे। भविष्य की राजनैतिक सम्भावनाओं को देखते हुये वे आगे भी अध्यक्ष बने रहना चाहते थे किंतु 20 अप्रैल 1946 को गांधी ने नेहरू के पक्ष में अपनी एकमात्र पसंद से सभी प्रतिद्वंदियों को सूचित किया जबकि कांग्रेस के अन्य लोग सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे इसलिए 15 में से 12 राज्य समितियों में पटेल को ही कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने की स्वाभाविक सहमति बनी। यह वह समय था जब प्रदेश कांग्रेस कमेटी ही अध्यक्ष को मनोनीत कर सकती थी या चुन सकती थी।  

ब्रिटिश सत्ता वाले 15 में से 12 राज्य समितियों ने पार्टी अध्यक्ष के लिए पटेल को नामित किया जबकि नेहरू को एक भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने नामित नहीं किया। गांधी की इच्छा को पूरा करते हुये कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य आचार्य कृपलानी द्वारा नेहरू का नाम एक कागज पर लिखकर प्रस्तावित किया गया जबकि इसके लिए उनके पास कोई अधिकार नहीं था। यह पूरी तरह घरमानी मनमानी थी जिसमें आम सहमति का कोई स्थान नहीं था। सुभाष चंद्र बोस को पहले ही किनारे लगाया जा चुका था। तत्कालीन भारतीय राजनीति में गांधी की इच्छा, असहयोग, हठ और आमरण अनशन की धमकी ही सर्वोपरि हुआ करती थी। दूसरी ओर अनधिकृत और अलोकतांत्रिक रूप से सरदार पटेल पर दबाव डाला जाने लगा कि वे नेहरू के पक्ष में अपना नाम वापस ले लें। नेहरू अतिमहत्वाकांक्षी थे, वे कांग्रेस में दूसरा स्थान लेने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, नेहरू की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए गांधी का पूरा समर्थन ही नहीं बल्कि हठ भी सर्वोच्च था। मौलाना आज़ाद और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं को इसका सदा पश्चाताप बना रहा कि उन्होंने गांधी की इच्छा पूरी करने के लिए सत्य और निष्ठा का गला घोंटते हुये नेहरू का समर्थन किया।

यह खदबदाहट भारत के सभी राजनैतिक दलों में है, चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षायें सत्य और निष्ठा का गला घोटती रही हैं। विभिन्न पेड़ों से उड़कर यत्र-तत्र विचरण कर रहे सभी पंछियों को एक मंच पर एकत्र होकर अब देश और समाज के बारे में सोचना चाहिये। यूँ भी, स्वतंत्रता के समय अधिकांश देशी राज्य स्वतंत्र थे और कभी ब्रिटिश राज्य के अधीन नहीं रहे जबकि स्वतंत्रता के बाद उन सभी राज्यों का एन-केन-प्रकारेण भारत संघ या पाकिस्तान में विलय किया गया था।  

यदि सम्भव हो तो सड़े हुये लोकतंत्र, जो अब निरंकुशतंत्र में बदल चुका है, को हटाकर भारत में पुनः एक विशाल राजतंत्र स्थापित किया जाना चाहिए। याद कीजिये, ईसापूर्व 321 में चंद्रगुप्त ने नंद वंश के घनानंद को हराकर तत्कालीन गणतांत्रिक व्यवस्था समाप्त करते हुये मौर्य वंश की राजतंत्रात्मक व्यवस्था स्थापित की थी।

रविवार, 21 अगस्त 2022

समुद्र गुप्त और इस्लाम

        यू-ट्यूब पर “आलमी जंक्शन” ने बताया कि गुप्तवंश के सम्राट चंद्रगुप्त (कार्यकाल 319 ईसवी से 335 ईसवी) के पुत्र महाराजाधिराज समुद्रगुप्त (जन्म 318-अवसान 380 ईसवी, कार्यकाल 335-375 ईसवी) का मोहम्मद साहब से रिश्ता था। किस्सा यूँ बताया गया कि सम्राट चंद्रगुप्त का विवाह एक पारसी बादशाह ख़ुशरू परवेज़ की बेटी मेहरबानो से हुआ था। विवाह के बाद मेहरबानो का नाम बदलकर चंद्रलेखा रख दिया गया। इस विवाह से चंद्रगुप्त को जो बेटा हुआ उसका नाम समुद्रगुप्त रखा गया। बादशाह ख़ुशरू परवेज़ की एक और बेटी थी जिसका नाम था शहरबानो। मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन ने ईरान पर हमला करके बादशाह और उसकी बेटी को कैद करके मदीना भेज दिया और ईरान में इस्लाम की हुकूमत स्थापित की। बाद में इमाम हुसैन ने बादशाह की बेटी शहरबानो से शादी कर ली जिससे एक बेटा हुआ, नाम रखा गया “अली-अकबर-इब्न-ए-इमाम-हुसैन” (कहीं-कहीं इस नाम के स्थान पर अली-इब्न-हुसैन-ज़ैनल-आबिदीनभी लिखा हुआ मिलता है)। तो इस तरह समुद्रगुप्त और अली-अकबर-इब्न-ए-इमाम-हुसैन आपस में मौसेरे भाई हुये।

आलमी जंक्शन ने किस्से को आगे बढ़ाते हुये बताया कि जब कर्बला का युद्ध हुआ तो इमाम हुसैन ने समुद्रगुप्त को पत्र लिखकर सेना भेजने का संदेश दिया। समुद्रगुप्त ने राहिब दत्त नामक ब्राह्मण की अगुआई में एक सैन्य टुकड़ी ईराक की ओर भेज दी। समुद्रगुप्त की सैन्यटुकड़ी जब ईराक में कर्बला के मैदान तक पहुँची तब तक युद्ध समाप्त हो चुका था और इमाम हुसैन को मारा जा चुका था। ब्राह्मण सेनापति राहिब दत्त को मोहम्मद साहब के नवासे की हत्या से गहरा दुःख हुआ और उन्होंने उम्मैयद ख़लीफ़ यज़ीद पर हमला करके बदला ले लिया। बाद में उस भारतीय सैन्य टुकड़ी के लोग वहीं बस गये और हुसैनी ब्राह्मण के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

तो आलमी जंक्शन के अनुसार यह किस्सा है हुसैनी ब्राह्मणों का। बताया जाता है कि पञ्जाब और उसके आसपास पाये जाने वाले दत्त लोग अपने पूर्वज राहिब दत्त की स्मृति में स्वयं को हुसैनी ब्राह्मण मानने लगे हैं।

 

“आलमी जंक्शन” का यह किस्सा मज़ेदार लगता है किंतु इस किस्से पर भरोसा करने से पहले इसका ऐतिहासिक विश्लेषण आवश्यक है।

1-    किस्से के अनुसार कर्बला का युद्ध इस्लामिक उत्तराधिकार के लिए उम्मैयद ख़लीफ़ यज़ीद प्रथम और हुसैन-इब्न-अली के बीच लड़ा गया। तारीख़ थी 10 अक्टूबर 680 ईसवी। जबकि गुप्तवंश के सम्राट चंद्रगुप्त (319-335) के पुत्र समुद्रगुप्त का कार्यकाल है - 335-375 ईसवी, अर्थात सम्राट समुद्रगुप्त की मृत्यु के तीन सौ पाँच साल बाद कर्बला का युद्ध लड़ा गया था जिसमें समुद्रगुप्त के सैन्यसहयोग का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। समुद्रगुप्त और हुसैन-इब्न-अली के किस्से को इतिहास की तारीख़ों ने गवाही देने से बिल्कुल मना कर दिया है तो भी इस किस्से के अगले हिस्से का विश्लेषण अभी शेष है।

2-    इतिहास के अनुसार ईसवी सन 680 में उम्मैयद ख़लीफ़ यज़ीद प्रथम ने पैगम्बर मोहम्मद के नवासे हुसैन-इब्न-अली की कर्बला के मैदान में हत्या कर दी और अगले तीन साल तक यानी 683 में अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण तक हुकूमत की। “आलमी जंक्शन” के अनुसार (कर्बलायुद्ध के तीन साल बाद 683 में) समुद्रगुप्त के ब्राह्मण सेनापति राहिब दत्त ने उम्मैयद ख़लीफ़ यज़ीद को युद्ध में मारकर इमाम हुसैन की मौत का बदला लिया और वहीं बस गये। अद्भुत, भारतीय सेना ने विदेशी धरती पर तीन साल तक प्रवास करते हुये हुसैन का बदला लेने के लिए प्रतीक्षा की!   

3-    यदि यह मान भी लिया जाय कि समुद्रगुप्त की सेना के सेनापति राहिब दत्त ने उम्मैयद ख़लीफ़ यज़ीद को मारकर हुसैन की मौत का बदला लिया तो भी भारतीय सेना का यज़ीद से इमाम हुसैन का बदला लेने के लिए तीन साल तक ईराक में प्रवासी बनकर रहना किसी भी दृष्टि से व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता।

4-    ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार समुद्रगुप्त को लिच्छवि दौहित्र भी कहा जाता था जिसका अर्थ है “लिच्छवियों का नाती”। वास्तव में, चंद्रगुप्त का विवाह ईरानी बादशाह ख़ुशरू परवेज़ की बेटी मेहरबानो से नहीं बल्कि लिच्छवि राजकुमारी “कुमार देवी” के साथ हुआ था जिनके संयोग से लिच्छवि दौहित्र समुद्रगुप्त का जन्म हुआ था।

5-    पर्शिया के सासानियन बादशाह ख़ुशरू परवेज़ का शासनकाल ईसवी सन् 590 से 628 ईसवी तक रहा है। ईरान में ख़ुशरू नाम का एक और राजा हुआ है जिसका जन्म हुआ था 512 ईसवी में और मृत्यु हुयी थी 579 ईसवी में, उसने ईरान पर 531 से 579 तक राज्य किया था किंतु शहरबानो और मेहरबानो नाम की उसकी किसी शहज़ादी का नाम इतिहास में नहीं मिलता।

6-    इतिहास गवाही देता है कि हुसैन-इब्न-अली की पत्नियों में से एक शहरबानो सासानिद साम्राज्य के अंतिम राजा यज़्देज़र्द तृतीय की बेटी थी जिनसे अली-अकबर-इब्न-ए-इमाम-हुसैनया “अली-इब्न-हुसैन-ज़ैनल-आबिदीन” का जन्म हुआ था। पर्शिया के अंतिम सासानियन राजा यज़्देगर्द तृतीय का कार्यकाल ईसवी सन् 632 से 651 तक रहा है। किंतु इतिहास में मेहरबानो नाम की इनकी किसी बेटी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में, हुसैन-इब्न-अली के बेटे अली-इब्न-हुसैन-ज़ैनल-आबिदीन का जन्म राजा यज़्देज़र्द-तृतीय की बेटी शहरबानो से हुआ था न कि राजा ख़ुशरू परवेज़ की किसी बेटी से। 

सावधान! जो लोग मानते हैं कि इतिहास अपने घर की खेती है, जैसा चाहो बो डालो और काट डालो, ऐसे लोगों के दूरदर्शी उद्देश्यों को यदि समय रहते नहीं पहचाना गया तो सभ्यता समाप्त होने में देर नहीं लगेगी, भले ही वह कितनी भी समृद्ध क्यों न हो।

कौन हैं हुसैनी ब्राह्मण

सनातनी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच महाभारत काल का एक पुराना सम्बंध बताया जाता है। यूँ, यह एक गम्भीर शोध का विषय है कि महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष की सेनाओं की पराजय के बाद पराजित राजाओं और उनकी सेनाओं का क्या हुआ? कुछ लोग बताते हैं कि कौरवों के वध के बाद कौरव पक्ष के बहुत से लोग गांधार जा कर बस गये और कुरु कहलाए। कालांतर में गांधार के सनातनियों, जिनमें सभी वर्णों के लोग थे, और कुरुओं ने पश्चिम की ओर प्रस्थान किया और ईराक आदि अरब देशों में यत्र-तत्र बस गये। अरबों की देखा-देखी इन्होंने भी अपने कई कबीले बना लिये और वहाँ के रहन-सहन को अपना लिया। पैगम्बर मोहम्मद का सम्बंध जिस कुरेश कबीले से बताया जाता है वह कुरुवंशियों का ही एक कबीला था यही कारण है कि कुरेश कबीले के लोग अपने पूर्वजों की तरह शिव को अपना आराध्य मानते रहे। बताया जाता है कि कुरेश या कुरेशी लोगों ने अरब में कई शिव मंदिरों की स्थापना की थी, पैगम्बर मोहम्मद के सगे चाचा कई शिवमंदिरों के पुजारी थे। अरब में यत्र-तत्र बसे सनातनियों ने स्थानीय लोगों से अपने सम्बंध स्थापित किये और वहीं की सभ्यता में रच बस गये, इन्हीं में से कुछ लोग स्वयं को हुसैनी ब्राह्मण मानते हैं। दत्त उपनाम वाले इन ब्राह्मणों को मोहियाल भी कहा जाता है जिसका अर्थ है भिक्षाटन करने वाले ब्राह्मण नहीं बल्कि भूस्वामी और योद्धा ब्राह्मण।

एक किस्सा यह भी है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा महाभारत युद्ध में घायल हो गये थे और पराजय की पीड़ा एवं लज्जा के कारण गांधार की ओर पलायन कर गये। उनके वंशज भी कालांतर में अपनी मुख्यभूमि भारत से दूर अरब की ओर ही आगे बढ़ते रहे। इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर एक तरह से इन सभी के लिए सदा के लिए त्याज्य हो चुके थे। अश्वत्थामा के वंशजों में इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के लिए घृणा एवं आक्रोश था यही कारण है कि महाभारत युद्ध के बाद अरब देशों की ओर गये सनातनियों में भारत के प्रति आक्रामक भाव बना रहा। ब्राह्मण होने के कारण अश्वत्थामा के अरबी वंशजों ने कालांतर में हुसैनी ब्राह्मण के रूप में अपनी पहचान बना ली।     

पता नहीं इन किस्सों में कितना इतिहास है, कितना अनुमान है और कितना गल्प! जो भी हो, यह भी एक मज़ेदार किस्सा है, जिसकी पड़ताल आवश्यक है।

शनिवार, 20 अगस्त 2022

सनातनसंस्कृति की मर्यादा

    एक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने वाले ग्यारह अपराधियों को पंद्रह वर्ष का दण्ड भुगतने के बाद बंदीजीवन के आचरण और सुधार के आधार पर रीमिशन पॉलिसी के अंतर्गत कारावास से मुक्त कर दिया गया।

आरोप यह भी है कि एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल और एक हिंदुत्ववादी संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा मुक्त हुये अपराधियों का फूलमाला और मिठाई से स्वागत किया गया, गोया पाकिस्तान की जेल से मुक्त हो कर आये शूरवीर भारतीय सैनिक हों। इस तरह का स्वागत कोढ़ में खाज पैदा करने वाला है। जघन्य अपराधियों का स्वागत यदि उनके घर के सदस्यों द्वारा भी किया जाता है तो ऐसा कृत्य हमारे नैतिक, वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पतन का द्योतक है। निस्संदेह, बलात् यौनदुष्कर्म और वह भी सामूहिक दुष्कर्म जघन्य और अक्षम्य प्रकृति का अपराध है। आयु, धर्म और शत्रुता के आधार पर इसकी क्रूरता और अमानवीयता को हल्के में लिया जाना किसी भी सभ्यसमाज के लिए आत्मघाती है। प्रकृति ऐसे समाज को फलने-फूलने का कोई अधिकार नहीं देती। यदि यह अजमेर शरीफ़ में विश्व के सबसे बड़े और सबसे सुनियोजित यौनदुष्कर्म एवं गजवा-ए-हिन्द के प्रत्याक्रमण के रूप में है तो भी ऐसे निकृष्ट विचारों और कृत्यों का स्वागत नहीं किया जा सकता। युद्ध और प्रतिरोध की शालीन मर्यादा ही सनातन संस्कृति की विशेषता है, यहाँ इस प्रकरण में किसी भी किंतु-परंतु का कोई स्थान नहीं हो सकता। यदि हम भी यौनदुष्कर्म के अपराधियों का स्वागत और महिमामण्डन करना प्रारम्भ कर देंगे तो सनातन हिन्दूसभ्यता पर गर्व करने वाले लोगों और मोहम्मद-बिन कासिम में क्या अंतर रह जायेगा?   

सभ्य समाज के द्वारा ऐसे जघन्य अपराधियों का स्वागत किया जाना निंदनीय ही नहीं अपराधियों को प्रोत्साहित करने का आपराधिक कृत्य भी है। तथापि बिलकिस बानो के बहाने हिंदूविरोधी मानसिकता को एक बार फिर धार्मिक विवाद को हवा देने का अवसर मिल गया है और इसके साथ ही बिल्किस बानो दुष्कर्म के अपराधियों की रिहाई के औचित्य पर भी बहस प्रारम्भ हो चुकी है। यह बहस स्वागतेय है किंतु इसकी सीमा में निर्भया कांड के उस दुर्दांत अपराधी की रिहाई के औचित्य पर भी सोचा जाना चाहिए जिसे अवयस्कता के आधार पर न केवल मुक्त किया गया बल्कि उसे शासन की ओर से स्वावलम्बन और सुरक्षा भी उपलब्ध करवायी गयी।     

यौनदुष्कर्म के अपराधियों के लिए मृत्यु के अंतिम क्षण तक के कारावास के दण्ड से कुछ भी कम नहीं होना चाहिए। वास्तविकता यह है कि न्यायव्यवस्था और हमारा दंडविधान क्रूर अपराधियों को हतोत्साहित और भयभीत नहीं बल्कि निर्भय बनाने वाला है। क्या यह हमारी चिंता का विषय नहीं होना चाहिये!     

सोमवार, 15 अगस्त 2022

स/न- कारात्मकता से मुक्ति कब

         राष्ट्रीय पर्वों पर विभिन्न राजनैतिक दलों के आचरण और वक्तव्यों में जिस सकारात्मकता की अपेक्षा पूरे देश को रहती है उसे पूरा होते हुये देखना एक बहुत बड़ी चुनौती हो गयी है। राजनीतिज्ञों के अमर्यादित और स्तरहीन व्यवहार से उत्पन्न कलह से उकताये नागरिकों को स्वतंत्रता दिवस और स्वाधीनता दिवस के दिन शांति, उत्साह और प्रसन्नता की आशा होती है जो उन्हें नहीं मिल पाती। राजनीति देशपरक न होकर व्यक्तिपरक हो चुकी है। हम किसी व्यक्ति को ईश्वर के रूप में पूजने के लिये लालायित क्यों रहते हैं? क्या ही अच्छा होता यदि सभी राजनैतिक दलों के नेतागण आज के दिन केवल देश के विकास और उसकी सुरक्षा की अविरोधी बातें करते। कम से कम राष्ट्रीय पर्वों के साल भर में आने वाले दो दिन कलहविहीन होने ही चाहिये। भारत को इस वैचारिक पराधीनता से मुक्ति कब मिलेगी?

नेहरू को भगवान की तरह और मोदी को खूँखार खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रतिस्पर्धा ने देश के नैतिक और राजनैतिक चरित्र की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी हैं। यदि हम इन्हें व्यक्ति के रूप में देख पाते तो आज हम देश और समाज के लिए सही नीतियों का चयन कर पाने की स्थिति में खड़े होते।

भारत में प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाया जाता है और केवल उसी दिन हिन्दी को उसका सम्मान दिलाने की बात की जाती है किंतु योजनाकारों के साथ-साथ लगभग पूरा देश आज़ादी के अमृत महोत्सव का ज़श्नमनाने का अभिनय कर रहा है। इस ज़श्न में मैं सम्मिलित नहीं हूँ, कभी हो भी नहीं सकता। मैं अपने देशवासियों के साथ “स्वतंत्रता का अमृत-महा-उत्सव” मनाना चाहता था किंतु मुझे यह उत्सव अकेले ही मनाना पड़ा। उधर भारत की राजधानी में “मीडिल क्लास और ग़रीब” बच्चों को अंग़्रेज़ीभाषी बनाने का अभियान बड़े गर्व के साथ चलाया जा रहा है। विदेशी भाषाओं पर गर्व करने की दासता से हमें मुक्ति कब मिलेगी?

पराधीन भारत कितना

क्या भारत सचमुच एक पराधीन देश था जिसे 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली थी?

मोतीहारी वाले मिसिर जी ने खिन्न भाव से पूछा है – “15 अगस्त 1947 के दिन देशी रजवाड़े किस विदेशी पराधीनता से स्वतंत्र हुये थे? भारत के तत्कालीन 565 राज्यों के लिए स्वतंत्रता दिवस का अर्थ क्या है?”

“इन 565 राज्यों में से कई राज्यों ने स्वेच्छा से अपनी पारम्परिक स्वतंत्रता और सम्प्रभुता का त्याग करके भारत संघ में अपने राज्यों के विलय की स्वीकृति दी तो कुछ राजाओं और नवाबों ने कुछ विवशताओं के कारण अपने राज्यों को भारत संघ में विलय की अनुमति प्रदान की। ऐसे सभी राज्यों के लिए भी 15 अगस्त के स्वतंत्रता उत्सव का क्या अर्थ है? 15 अगस्त को मिली स्वतंत्रता का उत्सव उन 21 राज्यों के लिए सचमुच महत्वपूर्ण है जिन्हें ब्रिटिश पराधीनता से मुक्ति मिली।

1947 तक भारत में देशी राज्यों, देशी रियासतों और प्रेसीडेंसी को मिलाकर कुल 579 राज्य हुआ करते थे जिनमें से अधिकांश पूर्ण या आशिक रूप से स्वतंत्र राज्य थे। इनमें से केवल 21 राज्यों में ही ब्रिटिश सरकार की सत्ता थी। राजकोट, नवानगर, ध्रोल, मोरबी, गोंडल, मकरान, खारान और कलात जैसे कई देशी रजवाड़े ब्रिटिश दासता से पूरी तरह स्वतंत्र थे, जबकि हमें आज भी पढ़ाया जाता है कि अंग्रेज़ों ने भारत पर 1947 तक शासन किया। हमें यह कभी नहीं पढ़ाया जाता कि अंग्रेज़ों ने भारत के केवल 21 राज्यों में ही शासन किया और 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश दासता वाले राज्यों को ही स्वतंत्रता मिली थी पूरे भारत को नहीं क्योंकि आज का सम्पूर्ण भारत कभी भी पूरी तरह कम्पनी सरकार या ब्रिटिश शासन के अंतर्गत रहा ही नहीं।

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

सरकारी डॉक्टर की निजी प्रेक्टिस

             बहुत समय पहले की बात है जब एक राज्य के चिकित्सा-डायरेक्टर को औषधि क्रय में भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में डाल दिया गया। गंदी मछली समुदाय की यह एक छोटी सी गंदी मछली थी। भारत भर में ऐसी मछलियाँ बहुतायत से पायी जाती हैं। एक बुलबुला फूट गया, गोया किसी ज्वालामुखी के मुँह में एक कंकड़ फेक दिया गया हो। आम जनता इस भ्रम में थी कि भारत एक बड़े सुधार की दिशा में चल पड़ा है, पर ऐसा हुआ नहीं, 2200 डिग्री फ़ारेनहाइट में तपते ज्वालामुखी के ट्यूब में वह कंकड़ भी उसी लावा का एक हिस्सा बन गया। पानी में बुलबुलों का बनना और फूटना ही भारत की प्रजा की नियति है।

देश भर के रोगियों का विश्वास है कि राजकीय चिकित्सालय की अपेक्षा सरकारी डॉक्टर के घर में परामर्श लेना कहीं अधिक गुणवत्तापूर्ण होता है। यह बात लगभग 90 प्रतिशत सही भी है जिसमें चिकित्सकों का योगदान तीस प्रतिशत और सरकारी व्यवस्था का योगदान सत्तर प्रतिशत होता है। आप किसी भी राजकीय चिकित्सालय के गेट पर खड़े हो जाइए और औचक ही बीस लोगों के प्रेसक्रिप्शन्स का अवलोकन कर लीजिये। आप पायेंगे कि विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए सामान्यतः एक ही जैसी तीन दवाइयाँ उनमें लिखी होती हैं। सरकारी डॉक्टर्स पर प्रतिबंध होता है कि वे 1- बाहर से ख़रीदने के लिए दवाइयाँ नहीं लिख सकते (राजकीय प्रजावत्सलता और करुणा का चरम परचम) और 2- रोगियों को चिकित्सालय में उपलब्ध दवाइयाँ ही दी जानी चाहिये (गोया दवा नहीं पंजीरी हो, चिकित्सा और फ़ार्मेकोलॉजी के इस सिद्धांत को ठेंगा दिखाते हुये कि दवा एक विशिष्ट उत्पाद है जो हर किसी के लिए कॉमन नहीं होती इसलिए हर रोगी के लिए दवा का स्पेसिफ़िक औचित्य चिकित्सक को निर्धारित करना चाहिए)।

इस सरकारी प्रमेय का समीकरण इस प्रकार स्थापित होता है... राजकीय चिकित्सालय का प्रेस्क्रिप्शन= औषधि= पंजीरी= स्वास्थ्य की ऐसी-तैसी। प्रजा को समझना चाहिये कि सरकारी दवाइयों के परिणाम सेक्युलरिज़्म के नहीं बल्कि ईश्वरीय आस्था के समानुपाती हुआ करते हैं, इसलिए सरकारी गोली खाने से पहले बजरंगबली जी का स्मरण करना ही रोगी के प्राणों को संकट से उबार सकता है।

राजकीय चिकित्सालयों में ब्रूफ़ेन को पंजीरी का पर्याय माना जा चुका है। यह विज्ञान का चमत्कार है कि सिरदर्द के लिए दी जाने वाली ब्रूफ़ेन के साइड इफ़ेक्ट्स में एक इफ़ेक्ट ख़ुद सिरदर्द भी है। दर्द, दवा, साइड-इफ़ेक्ट और रोगी के बीच की यह एक ऐसी अघोषित फ़ार्मेकोलॉजिकल ट्रीटी है जो हर रोगी के लिए बाध्यकारी होती है।

ठुकराये हुये आशिक को भरोसा होता है कि “जिसने दर्द दिया वही दवा भी देगा”। राजकीय अस्पतालों के रोगियों के मामले में यह उलटा है – “जिसने दवा दी उसी ने दर्द भी दिया”।

सरकारी चिकित्सक के सामने यह बहुत बड़ी समस्या होती है कि सेवानिवृत्त होने तक यदि वह पंजीरी बाँटने तक ही अपने को सीमित रखेगा तो वह बहुत जल्दी अपने चिकित्सा ज्ञान को खो देगा। किसी राजपाश में बँधकर चिकित्सा जैसे बौद्धिक और सतत शोधपरक कार्य को कर पाना उतना ही सम्भव है जितना कि नारियल के पेड़ से आम के फल को प्राप्त कर पाना। वैसे लोकतांत्रिक सरकारों को यह भरोसा होता है कि कुपोषित व्यक्ति से पहलवानी करवायी जा सकती है और कोड़े मार-मार कर किसी गधे से राग मल्हार गवाया जा सकना शत प्रतिशत सम्भव एवं नियमानुकूल है।

आयुर्वेद का गुणगान ही पर्याप्त है

हमारे ऋषियों-मुनियों की महान चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का गुणगान कर लेना ही पर्याप्त होता है, गोया मरते समय भगवान विष्णु का नाम ले लो और सीधे विष्णुलोक का आरक्षण पा लो।

आयुर्वेदिक औषधियों का अन्य दवाइयों की तरह हानिकारक नहीं होना ही आयुर्वेद का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। इस सद्गुण ने औषधि निर्माताओं को मिलावट की भरपूर सम्भावनायें उपलब्ध करवा दी हैं। आयुर्वेद की कुछ औषधियों में मिलावट का स्तर शून्य भी हो सकता है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वह औषधि बहुत अच्छी है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह औषधि शुद्ध नकली है जिसमें औषधि का प्रतिशत शून्य है। आप इसे शुद्ध नकली कह सकते हैं। आयुर्वेद के राजकीय अस्पतालों में सत्यनारायण की कथा के कुछ अंश प्रभावी होते हैं जैसे कि –“हे महराज! आपको देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं है, हमारी नाव में तो केवल लती-पत्तरा है”।

भगवान धन्वंतरि और ऋषियों-मुनियों की महान चिकित्सा पद्धति का गुणगान करने वाले भक्त हर मौसमी व्याधि की सम्भावनाओं को देखते हुये एक शरणागती आदेश प्रसारित कर दिया करते हैं – “...मौसमी व्याधियों की सम्भावनाओं को देखते हुये सभी वैद्य अपने कर्तव्य सुनिश्चित करें और मौसमी व्याधि से ग्रस्त प्राणी को तुरंत समीप के एलोपैथी चिकित्सालय की सेवायें उपलब्ध करवायें”। भारत की प्रजा यह समझ पाने में असमर्थ है कि फिर आयुर्वेदिक वैद्यों और राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालयों को सफेद हाथी की तरह पालने का औचित्य क्या है?

कोविड-19 के चरम प्रकोप वाले युग में राजकीय वैद्यों की नकेल कस दी गयी, उनके हाथ काट दिए गये, उनकी बुद्धि पर ताले डाल दिये गये, उन्हें स्पष्टतः कह दिया गया कि वे कोविड-19 के रोगियों की आयुर्वेदिक औषधियों से चिकित्सा न करें। वहीं, निजी आयुर्वेद चिकित्सक और औषधि निर्माता इस राज-पाश से मुक्त रखे गये जिसके परिणामस्वरूप इन लोगों ने चाँदी ही नहीं काटी बल्कि सोना-हीरा-मोती सब काटा और कोविड-19 के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वह बात अलग है कि कोई भी साइंटिस्ट और कोई भी भारतीय राजा इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।      

शनिवार, 9 जुलाई 2022

थियोक्रेसी और कानून

            ब्रिटिशर्स के बारे में कुख्यात है कि वे बड़े-बड़े अपराध या कांड कानून की सीमा में रहकर करना अधिक पसंद करते थे। उन्होंने एक उत्तराधिकार नियम बनाया जिसके अनुसार ब्रिटिश सत्ता को उन भारतीय राज्यों का उत्तराधिकार मिल जाया करता था जिनके राजाओं का कोई उत्तराधिकारी नहीं हुआ करता था।

किसी की हत्या करनी है तो पहले एक कानून बनाकर हत्या करने का अधिकार अपने लिए सुरक्षित कर लो फिर हत्या करके अपनी पीठ ठोंक लो, यह कहते हुये कि देखो हम कितने नियम-कानून के पाबंद हैं! इस पूरी प्रक्रिया को आप अपनी सुविधा के अनुसार कोई भी नाम दे सकते हैं, यथा – थियोक्रेसी, कानून, दया, भाईचारा, तहज़ीब, धर्म, दीन, मज़हब... या कुछ भी।

याद कीजिये उन चौदह सौ वर्षों को जब योरोप में चर्च सर्वाधिक शक्तिशाली हुआ करते थे। पाँचवी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद सत्ता की शक्तियाँ चर्च की ओर स्थानांतरित होने लगीं जिससे चर्च शक्तिशाली होने लगे। आठवीं शताब्दी के मध्य तक चर्च इतने शक्तिशाली हो गये कि उन्होंने कैथोलिक थियोक्रेसी को आधार बनाकर तीन पैपल स्टेट्स पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इटेलियन पेननसुला में लगभग 1100 साल तक पैपल स्टेट्स सत्ता में बने रहे। यह स्थिति सोलहवीं शताब्दी तक बनी रही।

इन 1100 सालों में सत्ता, समाज, शिक्षा, विज्ञान और व्यापार आदि की सारी शक्तियाँ चर्च के पास केंद्रित हो गयीं। चर्च अपनी इन भौतिक शक्तियों को मनमाने ढंग से बेचने लगे थे, यहाँ तक कि किसी भी पद के लिए एक निर्धारित शुल्क चर्च को देकर कोई भी व्यक्ति उसे प्राप्त कर सकता था। परिणामस्वरूप योरोप का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के दलदल में डूबता चला गया। थियोक्रेसी की सत्ता बनाये रखने के लिए वैज्ञानिक शोधों पर भी चर्चों द्वारा कड़ी नज़र रखी जाने लगी और वैज्ञानिकों को उनके शोधकार्यों के लिए दण्डित किया जाने लगा। योरोपीय समाज और विज्ञान के लिए यह एक अंधकारयुग था। सत्य और सत्ता का गला घोटा जाने लगा जिससे उन्नीसवीं शताब्दी में सत्ता को चर्च के विरुद्ध क्रांति के लिए सामने आना पड़ा और राज्यों ने चर्चों से अपनी सारी शक्तियाँ वापस छीन लीं। 11 फ़रवरी 1929 में लैटिरन ट्रीटी के द्वारा थियोक्रेसी को वेटिकन सिटी तक सीमित कर दिया गया। धार्मिक सत्ता वाले पैपल स्टेट्स टूटकर 11 स्वतंत्र राज्य बने जो बाद में इटली, फ़्रांस और वैटिकन सिटी के हिस्से हो गये।

कैथोलिक थियोक्रेसी के बाद यह एक नया युग था जब समाज, ज्ञान, विज्ञान, सत्ता, राजनीति, व्यवसाय आदि जीवन के सभी पक्षों को धर्म से मुक्त कर दिया गया। यह एक प्रतिक्रियाजन्य एवं एक और विकृत युग का प्रारम्भ था जिसने मनुष्य के आचरण को अधार्मिक बना दिया। भारत ने भी सत्ताहस्तांतरण के साथ ही योरोप के इसी विकृत युग को अपने ऊपर स्वेच्छा से थोप लिया जबकि भारत में इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। भारत में धर्म की अवधारणा पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है जिसे मोहनदास करमचंद और जवाहरलाल नेहरू ने समझने और स्वीकार करने से बिल्कुल मना कर दिया।

पाँचवी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के दो सौ साल बाद यानी सातवीं शताब्दी में एक और थियोक्रेसी ने जन्म लिया जिसे आज इस्लाम के नाम से जाना जाता है। अरब के लोग रोमन साम्राज्य में कैथोलिक थियोक्रेसी के बढ़ते हुये जलवे को देख रहे थे। शायद उन्हें अरब के तत्कालीन यज़ीदी धर्म में रहते हुये सत्ता पाने की कोई आशा नहीं थी इसलिए उन्होंने कैथोलिक थियोक्रेसी के प्रभावों से सीख लेते हुये एक नयी थियोक्रेसी को स्थापित किया जिसके परिणाम उनकी आशा से भी अधिक प्रभावी निकले। बहुत कम समय में इस्लामिक थियोक्रेसी ने सभी महाद्वीपों में अपनी पहुँच बना ली।   

यह इस्लामिक थियोक्रेसी का ही प्रभाव है कि दुनिया में पहला इस्लामिक रिपब्लिक होने का ताज 1956 में पाकिस्तान ने पहना। इस्लामिक मुल्क स्थापित करने का दूसरा स्थान 1958 में मौरितानिया ने बनाया, तीसरा स्थान 1979 में ईरान ने बनाया और चौथा स्थान 2004 में अफगानिस्तान ने बनाया, यानी मात्र 48 वर्षों में चार देश इस्लामिक रिपब्लिक के नाम से स्थापित हुये। एक तरह से देखा जाय तो यह पाकिस्तान की इस्लामिक विजय यात्रा है, जबकि सनातनी परम्परा के लोग अपनी संस्कृति, सभ्यता, जनसंख्या और भूखण्डों को निरंतर खोते जा रहे हैं।

भारत में अघोषित रूप से इस्लामिक थियोक्रेसी की सत्ता लगभग स्थापित हो चुकी है। आज जब ईशनिंदा के आरोप में थियोक्रेटिक्स द्वारा कमलेश तिवारी, कन्हैयालाल एवं ईश्वर सिंह की हत्या की जा चुकी है और नूपुर शर्मा की हत्या की घोषणा की जा चुकी है, हमें गैलीलियो गैलिनी और जियोर्दानो ब्रूनो को भी स्मरण कर लेना होगा।

बिना किसी अपराध के लिए क्षमायाचना कर चुकीं नूपुर शर्मा को, उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने और मृत्यु दण्ड के लिए थियोक्रेटिक्स को सौंप दिये जाने के लिये पूरे देश भर में उत्पात मचा हुआ है। याद कीजिये, बिना किसी अपराध के क्षमायाचना करने वाले गैलीलियो को क्षमादान के बाद भी बंदी बनाये रखा गया और उसी स्थिति में उनकी मृत्यु भी हुयी, जबकि ब्रूनो को 17 फ़रवरी 1600 को रोम में एक चौराहे पर जीवित जला दिया गया था। इन सभी लोगों को ईशनिंदा का आरोपी माना जाता है।

जियोदार्नो ब्रूनो की नृशंस हत्या के बाद कालचक्र चार सौ वर्ष आगे निकल चुका है किंतु इतिहास पिछले दिनों को दोहराने की ज़िद पर एक बार फिर अड़ गया है।