मंगलवार, 8 सितंबर 2026

राजहठ

आदेश है

कि लोग सोचें

केवल तुम्हारी तरह

रहें 

केवल तुम्हारी तरह

जियें भी

तो केवल तुम्हारी तरह

क्योंकि तुम बनाना चाहते हो 

विश्वगुरु

पता नहीं 

स्वयं को 

या पूरे देश को!

किंतु मैं

नहीं बनना चाहता विश्वगुरु

बनकर

तुम्हारा वैचारिक दास।

संभव ही नहीं है 

सच हो पाना 

तुम्हारा हठ।

तुम इसे ही कहते हो

लोकतंत्र

मैं इसे ही कहता हूँ

आॅब्सेसिव कंपल्सिव बिहैवियर

जिसके लिए जाना होगा तुम्हें

किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास

हाँ!

तुम रुग्ण हो

जान चुका है पूरा देश।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

निसर्ग में

निसर्ग में देखी है किसी ने 
कोई व्यवस्था
किसी आरक्षण की!
 
नहीं उगता धान
किसी मरुस्थल में
वह चिल्लाया-
हम पाँच करोड़ साल से प्यासे हैं
हमें देना ही होगा 
शस्य श्यामला का आरक्षण।
बबूल भी बोले-
इतने सुंदर सुरभित पुष्प
तरुणी को ही क्यों
हमें क्यों नहीं?
काँटों भरी तन्वंगी 
छुईमुई क्यों रहती पीछे
वह भी भुनभुनाई-
हमारे साथ भेदभाव होता है
हमें तो कोई छूता भी नहीं
हम दलित हैं
हमें सुकोमलता और सौंदर्य का
आरक्षण दो कमल सा।
मादा तिलचट्टी क्यों रहती पीछे
उसने माँग की- 
हमें तो शिव के नंदी से ब्याह करना है।
दादर रेलवे स्टेशन पर घूमते 
मोटे धूँस ने भाषण दिया-
जब तक नहीं होगा 
हमारा पाणिग्रहण
स्वर्ग की कामधेनु से
समानता नहीं आ सकती ब्रह्माण्ड में। 
सारी सुविधाएँ स्वर्ग में क्यों
नर्क में भी क्यों नहीं!
उधर दहाड़ा
अंतरिक्ष में विचरता
धूमकेतु आवारा-
हमें भी चाहिए आरक्षण
जैवविविधता का
सारी विविधता पर
धरती का ही आरक्षण क्यों?
पूरे ब्रह्माण्ड में 
होड़ लगी थी 
कुछ न कुछ माँगने की
कृष्णविवर ने भी माँग की
जिसकी जितनी शक्ति भारी
उसकी उतनी हिस्सेदारी 
हमारा गुरुत्वाकर्षण सर्वाधिक है
हमें भी मिलना चाहिए
सूर्य सा सम्मान
और सृष्टि का अधिकार।

ब्रह्मा जी बोले-
जिस दिन मिल जाएँगे सबको
सारे अनधिकृत अधिकार
ब्रह्माण्ड बन जायेगा
लोकतांत्रिक भारत के
सरकारी प्रकल्पों सा
और तब 
रौद्र नृत्य करना होगा
नटराज को, 
देखना चाहोगे !

रविवार, 6 सितंबर 2026

स्वर्णमूर्ति

आगे बढ़ना
हिमालय पर चढ़ना होता है
जिसके लिए उतारने होते हैं
एक-एक कर अपने सारे बोझ।
आगे की यात्रा 
शून्य की यात्रा है
संकुचित से विराट की यात्रा 
जहाँ सब कुछ 
छोड़ देना होता है एक-एक कर
और तुम 
मंदिर बनवा रहे हो
ताकि स्थापित हो सके 
तुम्हारी स्वर्णमूर्ति!
भगवान बनने का 
ऐसा ही अदम्य दुस्साहस
हिरण्यकश्यप ने भी किया
दशानन ने भी किया
और अब तुम भी कर रहे हो
उपेक्षा कर इस सत्य की भी
कि प्रतिपल बनते इतिहास में
लिखा जा रहा है सब कुछ।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

राजा सड़ा क्यों

यदा यदा हि धर्यस्य ग्लानिर्भवति भारत!

पढ़ा था 

गुना नहीं

रोटी जली क्यों...

घोड़ा अड़ा क्यों...

सुनी थी कहावतें

कभी गुनी नहीं

इसीलिए कभी सीखा नहीं

कि जो बात-बात पर अड़ता है 

वह कभी चलता नहीं

इसलिए फेरना आवश्यक है

रोटी, घोड़ा 

और राजा भी।  


हवायें ऐसी बहीं

कि बोझ बढ़ता गया 

सूचनाओं का

मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर

इतना... कि

वह नहीं रख सका संबंध

विवेक और हृदय से...

मन तो पहले ही उड़ा ले गई थीं

उष्ण

पछुआ हवायें।


तिवारी परिवार जी उठा है फिर

मरा नहीं कोई

नीलमणि तिवारी का बेटा

चाय बेचने लगा है

और बेटी

पकौड़े तलने लगी है

गर्व है योजनाकारों को 

कि देश की प्रति व्यक्ति आय 

बढ़ने लगी है।

अपराधी से सारथी बने लोग

देश के स्वामी बन गये हैं

और उनके नौनिहाल 

पढ़ने लगे हैं

सात समंदर पार

गोरों के देश में, 

लौट कर आएँगे जब

शिक्षा मंत्री बनेंगे भारत के 

और कहेंगे

बाबा साहब के दिए अधिकार से 

पढ़ सका बाहर जाकर

वरना तुमने तो पीने नहीं दिया पानी

पाँच हजार साल से।


बधाई हो!

नीलमणि तिवारी को भी 

मिल गई है नौकरी

दानापुर के सुलभ शौचालय में

सुदामा!

और कितनी प्रगति चाहिए तुम्हें!


बुधवार, 2 सितंबर 2026

विदाई

जो आया है सो जाएगा

तुम्हें भी जाना है

पर नहीं सोचा था

इस तरह जाना चाहते हो तुम 

अपनी दुर्गति के साथ

गालियों, तिरस्कार और अपमान के साथ।

तुम नहीं झुके

जहाँ झुकना था

तुम झुकते रहे

जहाँ कभी नहीं झुकना था।


तुमने 

सम्मान किया पोर्नगालियों का

तिरस्कार किया सम्मान का

भंजन किया भरोसे का

इसलिए 

हमारे लिए तो 

हर पल मरते रहे हो तुम।


थाली के बैंगन से

तुम लुढ़कते रहे 

इधर से उधर और उधर से इधर।

निष्प्रभावी रहे 

हमारे अनुनय, विनय, 

अनुरोध और प्रशंसा...

तुम 

स्वेच्छा से पिछड़ते गये

बड़े गर्व से गिरते गये 

सामान्य से अतिदलित तक,

और घिरते गये

अपने ही शब्दों से

अपनी ही परिभाषाओं से।

ओढ़ते रहे खोखली रजाइयाँ

होते रहे आत्ममुग्ध

अपनी ही बनी उपाधियों से। 


जन्मना हो तुम भी 

हमारी तरह

अजन्मा 

कैसे हो गये?

जाओ

हम विदा देते हैं तुम्हें

अब मत आना कभी

लौटकर

इस धरती पर।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

सत्ता और संविधान

व्यापारी ने व्यापारी से युद्ध किया

व्यापारिक, 

व्यापारी हारा, व्यापारी जीता

व्यापार की मृत्यु हुई।

व्यापारी ने दास बनाया

पूरे देश को

व्यापारी ने सत्ता संभाली 

पूरे देश की

नाम रखा "ब्रिटिश इंडिया"।

फिर क्रांति के लिए बजी

रणभेरी

हिंसा हुयी

कुछ मारे गये

कुछ ताक में थे

अवसर की,

नाटक किया स्वतंत्रता संग्राम का

लिख लिया अपना संविधान

करते हुये अनुकरण

विदेशी संविधानों का

जिसमें नहीं होता कुछ भी 

देशी।

सत्ता गई, सत्ता आई 

पर क्रांति नहीं हुई

सत्ता परिवर्तन हुआ। 

गोरों के चाबुक 

ले लिए कालों ने, 

पहले देश परतंत्र था

फिर प्रजा परतंत्र हुई। 

व्यापार आज भी रहता है

सत्ता के केंद्र में।

सारी नीतियाँ

सारे विधान

सारी व्यवस्था

रहती है

व्यापार केंद्रित।

तुमसे छीने गये 

तुम्हारे कुटीर उद्योग

छीना गया व्यापार

और थमा दिये गए

व्यापारिक दक्षता के नाम

बना कर जातियाँ

जो पिछड़ती गईं

खोती गईं अपना अस्तित्व

होते हुये रूपांतरित

वैश्य और शूद्र से

दलित

अतिदलित

और महादलित तक। 

व्यापार 

आज भी है

सत्ता के केंद्र में।

बड़े-बड़े प्रधानमंत्री

होते हैं नतमस्तक 

सम्राट 

रोटे शील्ड और 

व्यापारी

वास्को द गामा और  

शी जिन पिंग के समक्ष।

संविधान 

लिखे जाते हैं

इन्हीं के लिए।

राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ और हिंदू

 मोहन भागवत कहते नहीं थकते कि "हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवनशैली है"। 

बृहस्पति आगम के अनुसार "हिमालय से हिंदमहासागर तक का भूभाग हिंदु-स्थान है"। 

इस भूभाग के निवासी "हिंदुओं" की जीवनशैली, जीवनमूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं में मौलिक समानतायें होनी चाहिए। क्या सचमुच समानतायें हैं?

माना कि रिलीजन "धर्म" का पर्याय नहीं, और "हिंदू धर्म" जैसी कोई अवधारणा वेदों में नहीं है। पर "वैदिक धर्म" तो है न! कालांतर में यही वैदिक धर्म "सनातन धर्म" और "हिंदू धर्म" के नाम से लोकव्यवहार में जाना जाता रहा है। संघ धर्म को लेकर इतना हठी और अविवेकी क्यों है? हिंदू को यदि आप भौगोलिक परिचय मानते हैं तो स्पष्ट है कि भारत में केवल हिंदू समुदाय ही रहता है जिनमें से कई लोग वैदिक धर्म को नहीं मानते। तब वे क्या मानते हैं? वे "जो" मानते हैं उसे तात्विक दृष्टिकोण से धर्म नहीं, रिलीजन कहा जाता है। रिलीजन और धर्म के इस अंतर से स्पष्ट है कि विश्व में केवल दो ही समुदाय हो सकते हैं, एक धर्मपरायण और दूसरा रिलीजनपरायण। इन दोनों में कई असमानतायें हैं जिसके कारण उपद्रव दिखाई देते हैं। क्या  हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध आदि जीवनशैलियाँ भारत में व्यवहृत नहीं हैं? तब "हिंदू" भौगोलिक परिचय और "हिंदू जीवनशैली" में समानता होनी चाहिए जो कि नहीं है। अर्थात भारत के कुछ लोग धार्मिक हैं और कुछ लोग धार्मिक न होकर रिलीजियस हैं, और इनमें परस्पर विद्वेष एवं प्रतिकूलताएँ भी हैं जिनके हिंसक परिणाम हम सब देखते और भोगते रहते हैं। 

संघ और भाजपा के पास  समावेशिता और समानता जैसे कुछ शब्द हैं जो एक नया बखेड़ा खड़ा करते हैं और हम अंततः समाज को असमाधान की स्थिति में ही पाते हैं। 

संघ और भाजपा सत्य से भागकर एक स्वैच्छिक कल्पना को सत्य बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसने समाज में असमानता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन्हें स्वीकार करना होगा कि असमानता पूरे विश्व का सत्य है जिसे समाप्त नहीं, नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है।