शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

ब्राह्मण की हत्या

जनता की माँग पर

माँ की आह पर... 

खेला जाने लगा है

एक और नाटक...

नहीं, 

नाटकों की शृंखला।

लिखी जा चुकी है पटकथा 

अन्यायपूर्ण न्याय की  

मिटाये जा रहे हैं

हत्या के साक्ष्य। 

राजा ने 

लोकतंत्र को 

आज फिर लटका दिया है

फाँसी पर 

आओ, हम सब उत्सव मनायें

अपने स्वाभिमान 

और अधिकारों की अर्थी सजायें

क्योंकि

मीलाॅर्ड ने झिड़क दिया 

डाँट कर चुप कर दिया  

साक्ष्य देती 

भोजपुर की स्त्रियों को  

...इस आश्वासन के साथ

कि बिना सुने साक्ष्य

वे कर देंगे ऐसा न्याय

जो नहीं होगा न्याय।

जानकर भी

देखकर भी

हम नहीं मानना चाहते 

कि हत्यायें 

हमारी नियति हो गई हैं 

न्यायालय के बाहर 

शरीर की 

और न्यायालय के भीतर 

सत्य की। 

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

लिखवाल

 ग्वालियर में हेड पोस्ट आॅफिस की सीढ़ियों के पास लोगों को आते-जाते थोड़ी सी आशा, बहुत सी निराशा और विवशता के विशाल पर्वत पर थक कर बैठे हुये एक मैले-कुचैले वयोवृद्ध "लिखवाल" को प्रायः देखा करता था। मैं सोचता, नगरों में भी कुछ लोग हैं जो चिठ्ठी नहीं लिख सकते, न पढ़ सकते हैं, उनके लिए यह काम करने वाले उपलब्ध लोग विकास को हर पल थप्पड़ मारते से नहीं लगते क्या! 

ग्वालियर वाले लिखवाल केवल चिठ्ठी ही नहीं लिखा करते, आवेदन पत्र भी लिख दिया करते थे, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में। 

बी.एससी. में प्रवेश लेने से पहले तक अपने पड़ोसी के लिए यही काम मैं भी किया करता था, कहीं से आई चिठ्ठी पढ़ कर सुनाना, फिर उसका उत्तर लिखना। दाई कहतीं-" जो शुरू में लिखा जाता है वह सब लिख दो"। ...यानी ...को आशीर्वाद, ...को चरण छू कर पायलागन, ....को बहुत-बहुत प्यार, ...। मैं लिखता, "सबको यथायोग्य", फिर लिखता "अत्र कुशलं तत्रास्तु"। 

कभी-कभी किसी चिठ्ठी के अंत में दाई यह भी लिखवातीं -"थोड़ा लिखा बहुत समझना"। किसी को बुलाना होता तो वे लिखवाया करतीं -"खाना वहाँ खाना तो पानी यहाँ आकर पीना"। 

यह सत्तर का दशक था। एक दिन देखा, सीढ़ियाँ थीं पर वे वयोवृद्ध नहीं थे। उस दिन एक उदासी मेरे पास आकर जो बैठी ...तो रात में सोने के बाद ही उठकर जा सकी।

यह सन् १९४७ के बाद का भारत था। आज सोचता हूँ, हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का कितना सम्मान होता है! 

रविवार, 21 जून 2026

भोजपुर माटी

 भारत भूषण तिवारी का खुला और साफ-सुथरा चरित्र एक शोध का विषय है।

पुलिस ने कई बार उन्हें सम्मानित किया, अपमानित भी किया, फिर एक दिन घेरकर हत्या कर दी। मुख्यमंत्री और मैथिली ठाकुर ने उन्हें अपराधी कहा, पुलिस ने पागल तो पिता ने विक्षिप्त भी कहा। भारत भूषण तिवारी जैसे लोगों को समझ पाना इतना सरल नहीं है  

वे कलियुग में जन्मे चंद सतजुगियों में से एक हैं। पुस्तकीय ज्ञान को जब जीवन का आदर्श बनाया जाता है तो पूरी दुनिया उसे ही शत्रु मानने लगती है, और सरकार आतंकवादी या राष्ट्रद्रोही मानकर हत्या कर देती है। चंद्रशेखरआजाद और भगत सिंह जैसे न जाने कितने आदर्शवादी युवक सत्ताओं की भेंट चढ़ गये, आगे भी चढ़ते रहेंगे। इन सबको पता है कि यथार्थ का धरातल बहुत ऊबड़-खाबड़ और पथरीला होता है फिर भी वे उसी पथ के दावेदार होते हैं। यह भी एक नशा है, सात्विकता का नशा, जिसके सामने  कालकूट का विष भी हल्का लगता है। भारत भूषण तिवारी कलयुग में सतयुगी बनकर आये, एक संदेश दिया और चलते बने। ऐसे चरित्रों को समझना हर किसी के लिए शक्य नहीं होता। मैं उस लड़के के लिए बहुत व्यथित हूँ.... और गौरवान्वित भी। 

बक्सर जिले के अधिवक्ताओं, जिनमें एक मुसलमान भी सम्मिलित हैं, को मेरा साधुवाद ! सोमवार को यह दल भारत भूषण  तिवारी के हत्यारों के विरुद्ध न्यायालय में वाद प्रस्तुत करने जा रहा है। बिहार की धरती को नमन! बिहार के लोगों को नमन!        

शनिवार, 20 जून 2026

रक्तरंजित

भोजपुर के युवा लोकक्रांतिकारी भारत भूषण तिवारी अब नहीं हैं। बिहार सरकार और उसकी पुलिस ने उनकी हत्या कर दी। पुलिस ने भीड़ के अनुरोध को ठुकराकर युवा क्रान्तिकारी की हत्या की, इसे पूरे देश ने देखा, सरकार ने नहीं। यह तो कुछ भी नहीं है, स्वतंत्र भारत की पुलिस ने बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंज देव को उनके राजमहल में घुस कर गोलियों से छलनी कर दिया था। महाराजा निहत्थे थे और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें केवल इसलिए मरवा दिया क्योंकि आदिवासी उन्हें अपना देवता मानते थे, और महाराजा उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकार को बनाये रखने के पक्ष में थे। शासन-प्रशासन ने महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को भी पागल और विक्षिप्त घोषित कर दिया था।अर्थात् जो पागल है, विक्षिप्त है उसे जीने का अधिकार नहीं है। जो चालाक और धूर्त है उसे सम्मान और प्रतिष्ठापूर्वक जीने का अधिकार है, ...यही लिखा है न संविधान में?

बिहार की जनता पुलिस से अनुरोध करती रही "गोली मत चलाइये"। पर पुलिस ने एक ऐसे युवक को मार डाला जिसे जनता ज़िंदा रहने देना चाहती थी। मदांध सत्ता ने भारत के लोकतंत्र को उस स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ लोक को अपनी भी चिंता करने का कोई आधिकार नहीं।

लोकनिर्माण के कार्यों में भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण और झूठे आश्वासनों के विरुद्ध सरकार को ललकारने वाले भारत भूषण तिवारी को क्या पागल कहा जा सकता है? जनता जिसे अपना भगवान मानने लगी थी वह युवक सरकार को विक्षिप्त लगता है! क्या इस युवक की लड़ाई किसी को आतंकित करने के लिए है या भ्रष्टतंत्र को सुधर जाने की चेतावनी! सरकार तो आज तक सुभाषचंद्र बोस और सरदार भगतसिंह जैसों को भी आतंकवादी ही मानती है। 

....नहीं, यह देश सरकार की इस निरंकुशता को स्वीकार नहीं करेगा। हम सब भारत भूषण के लोकसुधार अभियान के संघर्ष को आगे ले जाएँगे। बिहार में निर्माणाधीन सेतु कब तक गिरते रहेंगे? बाढ़ में कब तक लोग बेघर होते रहेंगे?                              

पुलिस इनकाउंटर की जाँच की माँग होने लगी है, उससे क्या होगा????

एक और सच्चा क्रांतिकारी चला गया। चंद्रशेखर, भगतसिंह, सुभाष....और भारत भूषण तिवारी रोज नहीं जन्म लेते। बिहार में जो बिजली कड़की और उजाला हुआ वह रुकना नहीं चाहिए। दिख भी रहा है... यह रुकेगा नहीं, रुकना चाहिए भी नहीं।

हमें ही नहीं, पूरे देश को भारत भूषण तिवारी पर गर्व है। बिहार के भोजपुर की धरती पर गर्व है जहाँ पहले भी कुँवर वीरसिंह जैसे क्रांतिकारी जन्म लेते रहे हैं। वास्तव में यह लड़का जाते-जाते अपने नाम को सार्थक कर गया। 

गुरुवार, 18 जून 2026

कुप्रथा

 माँग कर रहे हैं लोग

कि सरकार बनाये 

एक विधान ऐसा

कुछ जजिया कर जैसा

कि ब्राह्मणों को ब्याहनी होगी 

अपनी बेटी 

किसी दलित के साथ।

अंबेडकर ने भी तो ब्याही थी 

अपनी बेटी सावित्री

भीमराव सकपाल के साथ

बनाये बिना कोई विधान

और दिया अपना उपनाम

अंबेडकर भी।

कितनी निभी, पता नहीं!

क्या क्रांति हुयी, पता नहीं!

क्या शिक्षा मिली, पता नहीं!

बाध्यकारी विधान बनेगा 

तो कदाचित्

भारत विश्वगुरु बनेगा

और कार्यकारी होगा यह विधान

पूरे विश्व में।

बन गया विधान 

तब एक दिन

महेश मणि के घर आई

एक नन्हीं परी

घर-परिवार डूबा 

मनाने उत्सव

फिर उसी रात्रि 

गला दबा दिया महेश मणि ने

नन्हीं परी का। 

सब अचंभित!

ऐसा क्यों किया महेश मणि ने!

प्रश्नों का अंत नहीं।

न्यायालय में बताया

महेश मणि ने

अब मेरी कोई बेटी 

नहीं ब्याही जाएगी 

किसी दलित के साथ।

समय चलता रहा

फिर...

यह परंपरा बन गयी

एक नई कुप्रथा

तो दलितों ने कहा

ब्राह्मण होते हैं 

स्त्री विरोधी

जन्म से हत्यारे        

राक्षस

नरपिशाच...                            

इन्हें नहीं मिलना चाहिए               

जीने का अधिकार।

होना ही चाहिए इनका

"सर तन से जुदा"

जब मिलें 

तभी

जहाँ दिखाई दे जाएँ

वहीं। 


निर्बल का विवश समाधान

जब बनती है कुप्रथा

तब भी 

मौन रहते हैं

राजसिंहासन

उनसे नहीं पूछा जाना चाहिए

कोई प्रश्न।

बस

तुम बने रहो

विनम्र सेवक

राजसिंहासन के

कुचलकर अपनी आत्मा।



शनिवार, 13 जून 2026

युगपरिवर्तन

सतयुगी लोग सत्य के अधिक समीप हुआ करते थे इसलिए अधिक सुखी थे। कालांतर में जब धर्म का एक स्तंभ ध्वस्त हुआ तो सतयुग समाप्त हुआ। त्रेतायुग में धर्म का और भी क्षरण हुआ जिसने द्वापर को आमंत्रित किया। द्वापर में धर्म के तीन स्तंभों का पतन हुआ तो कलियुग को संसार की सत्ता प्राप्त हुयी। अब कलियुग धर्म के शेष रहे एकमात्र स्तंभ पर डोल रहा है। जिस दिन इस अंतिम स्तंभ का पतन होगा तब..., तब क्या होगा! यह भौतिक विज्ञान और तत्वदर्शन का विषय है, इस पर फिर कभी चर्चा होगी।

त्रेतायुग में टिश्यू कल्चर, आई.वी.एफ़, जेनेटिक स्टडी, कैटारेक्ट की शल्यक्रिया और प्लास्टिक सर्जरी जैसी अनेक उपलब्धियाँ अविश्वसनीय सी लगती हैं, पर सत्य हैं। वहीं त्रेतायुग और कलियुग में राक्षसों के उत्पात, वैज्ञानिकों की तप-साधना में विघ्न, नरमांस भक्षण, नारी अपहरण और यौनोत्पीड़न जैसी कुछ नकारात्मक घटनाओं को लेकर अद्भुत समानतायें पढ़ने को मिलती हैं।
आज हमें एपस्टीन फ़ाइल की पैशाचिक घटनायें और विश्वस्तरीय आभिजात्य वर्ग के लोगों की उसमें संलिप्तता व्यथित करती है।
ऐसी न्यूनाधिक घटनायें सभी कालखंडों में होती रही हैं। तब अंतर क्या है इन युगों में! यह एक विचारणीय विषय होना चाहिए।
अंतर है अन्याय का समर्थन और प्रतिकार करने वालों एवं संस्कार विरोधियों और अपसंस्कृति के शोधन के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के अनुपात में ह्रास या वृद्धि।
त्रेत्रायुग से लेकर इस युग तक उत्कृष्टता के क्षरण और निकृष्टता के उत्कर्ष में निरंतर वृद्धि देखी गयी है।
एक अंतर और भी है, कलियुग में प्रवंचकों की भीड़ है जिसमें आम जनता से लेकर राजनेताओं, अभिनेताओं, संतों और वैज्ञानिकों में आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा है।
विषाणु आयुधों के निर्माता कौन हैं! मिथ्या और भ्रामक शोधपत्र प्रकाशित करवाने वाले शोधकर्ता और वैज्ञानिक कौन हैं! खाद्य और पेय पदार्थों में मिलावट के व्यापार में सम्मिलित लोग कौन हैं! इतिहास और विज्ञान की कूटरचित व्याख्यायें करने वाले लोग कौन हैं! देश के टुकड़े-टुकड़े करने की प्रतिज्ञा करने वाले लोग कौन हैं!
कलियुग की सबसे बड़ी विशेषता है ऋत में अनृत और अनृत में ऋत की प्रतीति। यह प्रतीति तक ही सीमित नहीं, यह हठ की पराकाष्ठा को स्पर्श करने की उद्दंड घोषणा भी है जो सत्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

डीएनए की ऐसी तैसी

सुना है, मीलाॅर्ड ने हुक्म दिया है कि पेट में बच्चा किसी का भी हो, पर बच्चे का बाप वही माना जाएगा जो महिला का पति होगा।

मीलाॅर्ड जी को साष्टांग दंडवत! यही न्याय है और यही है असली वाला मानवाधिकार! पेट में बच्चे होंगे प्रेमी के, पालनकर्ता होगा जोरु का दासानुदास। अब पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं होगा, न्यायालयों से भीड़ कम हो जायेगी, डीएनए औचित्यहीन हो जाएगा


यह व्यवस्था शानदार, प्रगतिवादी और सर्वहारा के लिए कल्याणकारी है। हजारों जातियों के स्थान पर पूरा देश केवल दो जातियों में वर्गीकृत किया जाएगा - एक जाति कोयल, दूसरी जाति कागा। एक जन्म देने वाला, दूसरा पालने वाला। गंगाराम कोयल, रामबरन कागा।

विवाहगीत में बड़ी-बूढ़ियाँ गायेंगी - "एक डाल पर कोयल बैठा, उसी डाल पर कागा... दाना लाने कोई गया, कोई बीज डाल के भागा... बोलो है ना! है ना है  ना...