समाज ने समाज का शोषण किया इसलिए समाज में असमानता है, -यह तुमने कहा, कहते ही रहे, जिससे कुछ पीढ़ियों के बाद समाज में तुम्हारा कथन ही स्थापित हो गया।
यह पूरी तरह सच नहीं था, समाज का एक वर्ग अपराधबोध से भर गया, दूसरा वर्ग प्रतिशोध के लिए उग्र हो उठा। तुम यही चाहते थे -समाज में ध्रुवीकरण, जिसे तुमने उत्पन्न किया, प्रोत्साहित किया और संरक्षित भी किया।
सामाजिक सत्य यह है कि सत्ता के तत्व अव्यवस्था की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होते हैं, यही स्वाभाविक है । जब अव्यवस्था होती है तभी लोग किसी सुशासन की अपेक्षा करते हैं। महान सम्राट लोक की इसी अपेक्षा को पूरा करने के प्रयास करते रहे हैं। किंतु यह सत्ता और शासनतंत्र की आदिम स्थिति है। बाद में तो राजपुरुषों और समर्थों द्वारा भय और कुव्यवस्था को ही सत्ता का आधार बनाया जाने लगा। हाँ! सच यही है कि शोषण और अत्याचार का भय दिखाकर सत्ता प्राप्त किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सत्ता प्राप्त होते ही सत्ताधीश जो पहला काम करते हैं वह होता है शोषण और अत्याचार के नये-नये प्रतिमान स्थापित करना। सुशासन का स्वप्न देखने वाली भीड़ को मिलता है कुशासन।
अपने पूर्ववर्तियों की तरह तुमने भी कभी पूरा न किये जाने वाला समानता का आश्वासन दिया और भीड़ को लूटने में तल्लीन हो गये। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में शासन का यही पक्ष अब स्थापित हो चला है जिसका विराट और सर्वाधिक क्रूर स्वरूप है "नयी विश्वव्यवस्था"।
तुम जिस समानता की बात करते हो वह शुद्ध छलावा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगले लाखों वर्षों में भी तुम्हारी परिभाषाजन्य "समानता" फलीभूत होने वाली नहीं। दुर्भाग्य से भीड़ को स्वप्न में डूबना अच्छा लगता है, उसकी यही दुर्बलता तुम्हारा पथ सरल करती है।
तुम प्रतिवाद करोगे कि क्यों नहीं हो सकती समानता! तुम मुझे अराजकतत्व और उपद्रवी कहकर दण्डित करने के सारे उपाय करोगे। तुम ऐसा कर सकते हो, फिर भी सामाजिक समानता नहीं ला सकते, कम से कम वैज्ञानिक तो यही कहते हैं।
हाँ! तुम वैज्ञानिक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद की बात करते हो न! किंतु सच यह है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद भी समानता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि स्वयं प्रकृति ही इसे स्वीकार नहीं करती। तुमने भीड़ से भौतिकी का यह सच सदैव ऱछिपाया कि ब्रह्मांड में बाहर से जो समरूपता दिखायी देती है वह वस्तुतः आभासी है, उसके भीतर प्रतिकूलताजन्य अ-समरूपता ही होती है। सृष्टि के सारे विधान और सूत्र प्रतिकूलताजन्य उस अ-समरूपता के ही परिणाम होते हैं। अधिक दूर मत जाइये, अपने भौतिक शरीर की रचना और क्रियात्मकता को ही लीजिए, क्या वहाँ समरूपता (Symmetry) है! क्या एक ही माता-पिता के सभी बच्चों के व्यवहार और क्षमताओं में समरूपता होती है!
यह जो तुम अपने चारो ओर विविधता देखते हो, क्या समानता होने पर वह संभव है! क्या आरोह-अवरोह के बिना किसी संगीत की कल्पना की जा सकती है!
मुझे समानताविरोधी समझने की भूल मत कर बैठना। यह तो प्रकृति है जिसके तंत्र में कहीं भी समानता नहीं है। प्रकृति समानता नहीं, संतुलन की अपेक्षा करती है। संपूर्ण सृष्टि का आधार ही संतुलन पर अवलंबित है, समानता पर नहीं।
संतुलन एक गतिशील व्यवस्था है, जो तुम करना ही नहीं चाहते। तुम तो भीड़ को सपनों में खो जाना सिखाते हो, ताकि उसके श्रम पर डाका डालते रहने में तुम्हें सुविधा हो। तुम्हारे विकास के सारे प्रादर्श छोटी रेखा को बढ़ाने में नहीं, प्रत्युत बड़ी रेखा को क्षतिग्रस्त कर छोटी करने के विनाशकारी सिद्धांत पर आधारित हैं। तुम दोनों रेखाओं के विनाश के कुचक्र कर रहे हो, छोटी को कुंठित कर, और बड़ी को लुंठित कर। यह उन शक्तियों के दुरूपयोग का बलात्कार है जो भीड़ ने तुम्हें प्रदान की हैं। सावधान! प्रकृति का धर्म है संतुलन, जो हो कर रहेगा, तुम्हारे अवसान के साथ।