शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

"वर्ण" - एक वैज्ञानिक अवधारणा

भारतीय मानते हैं कि वरण करने से वर्ण की उपलब्धि होती है। 

वरण, अर्थात् चयन और अनुकूलन की प्रक्रिया। 'वर्ण' एक वर्गीकृत स्थिति की उपलब्धि है जिसे व्यक्तिगत प्रयासों से प्राप्त किया जा सकता है। यह वंशानुगत गुणों के विकास और विशिष्ट स्थिति को प्राप्त करने के लिए अनुकूलन की एक जटिल प्रक्रिया है जिसे समझने की दृष्टि से चतुर्वर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। देश-काल से निस्पृह, संपूर्ण मानव समाज जैविक रूप से (शारीरिक-मनोवैज्ञानिक रूप से) इन विशिष्ट स्थितिगत समूहों में विभाजित है। यह एक नैसर्गिक व्यवस्था है, मनुस्ममृति की नहीं। प्रकृति हमें बनाती है, हम प्रकृति को नहीं बनाते।

दुर्भाग्य से शूद्र संज्ञा को विवादास्पद और विघटन का कारण बना दिया गया, पर शूद्रों में न केवल किसान और शारीरिक श्रमिक सम्मिलित हैं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और उद्योगों में तकनीकी कौशल और विशेषज्ञता रखने वाले तकनीकी व्यक्ति भी सम्मिलित हैं। संपूर्ण मानवीय गतिविधियाँ या तो 1. बौद्धिक गतिविधियों, 2. शारीरिक-मनोवैज्ञानिक गतिविधियों, 3. उद्योग और व्यवसाय से संबंधित गतिविधियों, या 4. कृषि और विभिन्न प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियों के आसपास घूमती हैं। संपूर्ण विश्व इन्हीं गतिविधियों के समूह के अनुसार संचालित होता है। इसलिए वैश्विक समाज भी इसी के अनुरूप व्यवहार करता है, भले ही अन्य सभ्यताओं में इसे इस तरह वर्गीकृत न किया गया हो। ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं के आधार पर मनुष्यों का पूर्ण वर्गीकरण भारतीय मनीषियों की विशिष्ट उपलब्धि है।

अस्सी (गतांक से आगे)

पश्चिम की खिड़की

स्वतंत्रता सभी प्राणियों का नैसर्गिक अधिकार है किंतु स्वतंत्रता में यदि आत्मानुशासन न हो तो वह स्वच्छंदता हो जाती है जो अंततः अव्यवस्था और कालांतर में परतंत्रता का कारण बनती है।
पश्चिमी समाज की पारिवारिक संरचना के संबंधों में आत्मानुशासन की जो शिथिलता है उसके परिणाम अब वहाँ के लोगों को त्रस्त करने लगे हैं। अब उन्हें पूरब की खिड़की से आने वाली प्रत्यग्र वायु आकर्षित करने लगी है।
भारत में कौमार्यत्व की पवित्रता को पुरुष वर्चस्व और उसकी दासता का उपकरण मानने वाली स्त्रियों के वैचारिक आंदोलन किशोरियों को आकर्षित करते हैं। इसे क्रांति की प्रचंड लहर माना जाने लगा है। परिणामतः नूतन बयार की उत्कट लालसा उन्हें अविवाहित संबंधों की ओर ले कर उड़ चली है। पश्चिम में असमय मातृत्व का बोझ किशोरियों को ही झेलना पड़ रहा है, किशोरों को नहीं। नारीमुक्ति आंदोलनकारियों के पास इस समस्या का कोई स्पष्ट समाधान दिखाई नहीं देता।
नारीमुक्ति आंदोलन स्त्री-पुरुष साहचर्यता की नैसर्गिक व्यवस्था को विवाहमुक्त संबंधों में तो परिवर्तित कर सकते हैं पर उसकी आवश्यकता को नकार नहीं सकते।
पश्चिम में गृहविहीन किशोरों-किशोरियों की स्थिति सरकारी सहयोगों के बाद भी सुधर नहीं पा रही है। उन्मुक्त सहवास के अवांछित परिणामों और अनिश्चित भविष्य ने उन्हें घातक द्रव्यों के सेवन की ओर धकेल दिया है।
नारीमुक्ति आंदोलन वाली स्त्रियों के एक वर्ग ने तो पुरुष से प्रतिशोध लेने की ठान ली है। अच्छे पदों पर कार्यरत ये उच्चशिक्षित नारियाँ पुरुषों के प्रति अभद्र शब्दों, वाचिकहिंसा और अपमानजनक टिप्पणियों को स्त्रीशौर्य का आवश्यक उपकरण मानती हैं। उनकी तीक्ष्ण गालियों के स्तर नें समकक्ष शिक्षित पुरुषों को तो छोड़िये अशिक्षित और अपराधीवृत्ति के पुरुषों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आश्चर्यजनक तो यह है कि उनकी गालियों में यौनक्रिया के विद्रूप शब्दचित्र तो होते ही हैं, पुरुष की माँ-बहन को भी नहीं छोड़ा जाता। यह कैसी नारीमुक्ति है जिसके प्रतिशोध के लक्ष्य से नारी भी मुक्त नहीं!
नयी बयार के लिए उमड़ती भीड़ में हेरोइन और कोकीन जैसे द्रव्यों से भी अधिक घातक मदकारी द्रव्यों का प्रचलन  अमेरिका के लिए तो चुनौती है ही, अब भारत के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। अमेरिका का यह शोधपत्र सभी देशों के लिए गंभीर चेतावनी है -
For years, students in middle and high schools across the country were urged to “just say no” to drugs and alcohol. But it’s no secret that the Drug Abuse Resistance Education (D.A.R.E.) program, which was typically delivered by police officers who urged total abstinence, didn’t work. A meta-analysis found the program largely ineffective and one study even showed that kids who completed D.A.R.E. were more likely than their peers to take drugs (Ennett, S. T., et al., American Journal of Public Health, Vol. 84, No. 9, 1994Rosenbaum, D. P., & Hanson, G. S., Journal of Research in Crime and Delinquency, Vol. 35, No. 4, 1998)


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

अस्सी

देश में यौनोत्पीड़न की कम से कम अस्सी विदित घटनायें प्रतिदिन हो रही हैं, अविदित घटनाएँ तो इतनी अधिक हैं कि उनका अनुमान भी लगा सकना आसान नहीं है। अस्सी की पटकथा में छह वर्ष की बच्चियाँ और दस वर्ष के बालक भी सम्मिलित हैं जो तापसी पन्नू को व्यथित करते हैं। आज से देश भर में "अस्सी" का प्रदर्शन हो रहा है। तापसी चाहती हैं कि दर्शक इसे न्यायाधीश की तरह देखें।

"अस्सी" की व्यथा से भिन्न इसी युग की स्त्री की एक और व्यथा है जो स्त्रीमुक्ति की छटपटाहट से परिपूर्ण है। दोनों व्यथाओं में दो तत्व उभय हैं -यौनोत्पीड़न और पुरुष वर्चस्व।

आधुनिक समय में पुरुषवर्चस्व के विरुद्ध नारी-मुक्ति, नारी-सशक्तिकरण और नारी-उत्थान जैसे तत्व स्त्रीविमर्श के प्रमुख विषय रहे हैं जिन पर चर्चाओं-परिर्चाओं से लेकर शोध और साहित्यसृजन तक की यात्रायें होती रही हैं। 

आज की उच्चशिक्षित स्त्रियों के एक वर्ग ने प्रत्यग्र वायु के लिए पूरब की खिड़की बंद कर पश्चिम की खिड़की खोल ली है। 

वे मानती हैं कि स्त्री की स्वतंत्रता और उत्थान में बाधक 'कौमार्य सुरक्षाकेंद्रित' एक ऐसा तंत्र है जिसे पुरुष ने स्त्री को अपनी यौनदासी बनाये रखने के लिए स्थापित किया है।

कुछ परिवारिकेंद्रित अपवादों को छोड़ दिया जाय तो भारत में नारी शिक्षा कभी प्रतिबंधित नहीं रही, प्राचीन भारत में तो कदापि नहीं। जिन परिवारों में प्रतिबंध रहा भी है तो उसका कारण कौमार्यत्वमूलक पवित्रता को ही मानने के उदाहरण विरले ही रहे होंगे।

नारी उत्थान के लिए पुरूष वर्चस्व से स्त्री की स्वतंत्रता की पक्षधर स्त्रियों में से एक वर्ग की विचारनेत्रियों को अपने कौमार्यत्व विषयक क्रांतिकारी विचारों के लिए जाना जाता है। क्रांतिकारी इसलिए कि उन्हें पूर्व के गवाक्ष की अपेक्षा पश्चिम के गवाक्ष से आने वाली हवा में नारी शक्ति की ऊर्जा का प्रवाह अधिक दिखाई देता है। 

आज एक लेखिका के विचार पढ़ने को मिले। उनके लेखन का सार यह है कि स्त्री गुह्यांग की अक्षुणता को नैतिक या धार्मिक मूल्यों से जोड़कर देखना स्त्री को व्यक्तिविशेष की यौनदासी बनाने का कुचक्र है जिससे स्त्री के उत्थान में बाधायें आती हैं। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- A part of the human body can not be considered as a matter of moral values.

लेखिका के उच्चशिक्षित होने के कारण उनके विचारों की पूरी तरह उपेक्षा भी नहीं की जा सकती, ऐसा करना समाज के लिए घातक हो सकता है। भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री और पुरुष के संबंध पूरकता और समानता के साथ अन्योन्याश्रित माने जाते रहे हैं ।

स्त्रीकौमार्यत्व को लेकर दो शब्द प्रक्षेपित किये जाते रहे हैं, एक है पवित्रता और दूसरा है सुरक्षा। दोनों के अंतर को भी समझा जाना चाहिए। पवित्रता के लिए सुरक्षा या सुरक्षा के लिए पवित्रता? 

कौमार्यत्व की स्वतंत्रता के परिणाम नौ माह तक सतत प्रतिफलित होने वाली दैहिक परतंत्रता को आमंत्रित करते हैं। यह स्त्रीदेह की अनिवार्य परिणति है। इससे बचने के लिए उपलब्ध आधुनिक सहज निरोधक उपाय अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। दूसरा उपाय गर्भपात हो सकता है जिसकी पीड़ा भी स्त्री को ही भोगनी होती है।

स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति और उत्थान के मार्ग में कौमार्यत्व कहाँ बाधक है? कौमार्यत्व की शिथिलता स्त्री उत्थान के लिए इतनी महत्वपूर्ण और निर्णायक कैसे हो सकती है? वैदिक और वैदिकोत्तरकाल में भी बेटियों की शिक्षा या आत्मोत्थान के लिए कौमार्यत्व की स्वच्छंदता को आधार नहीं बनाया गया, आज भी नहीं है।

सतत नूतनता की चाह लिए स्त्री की दृष्टि में पश्चिम से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता का प्रतिशत कोई अर्थ नहीं रखता। पूरब से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता के साथ उगते सूर्य के प्रकाश का एक तत्व और भी है जो पश्चिम से आने वाली वायु में नहीं होता, जो प्रकाश है भी वह अस्ताचलगामी सूर्य का है, जिसके बाद अंधकार अनिवार्य होता है।

क्रमशः... 

विरोध की अंतरधाराएँ-४

भीमाकोरेगाँव दोहराने की धमकियाँ

*महारों को गर्व है कि उन्होंने सन् १८१८ में ०१ जनवरी को अपने ब्राह्मणराजा के विरुद्ध हुये युद्ध में एक विदेशी ब्रिटिश व्यापारिक कंपनी का साथ दिया और पेशवा को पूना छोड़कर बिठूर भागने के लिए विवश कर दिया था।*

पेशवा की सेना में मराठवाड़ा के हिंदू सैनिकों के साथ-साथ अरब सैनिक भी थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग लिया किंतु महार इसे ब्राह्मण विरुद्ध दलित युद्ध के रूप में देखते रहे हैं जबकि १८१८ में 'दलित' जैसा कोई शब्द किसी के लिए भी प्रयुक्त ही नहीं होता था। राजाओं की सेना में महार योद्धाओं का होना और बाद में यूरोपियन्स द्वारा 'महार रेजिमेंट' का निर्माण उनके युद्धकौशल, दक्षता और उनके क्षत्रियत्व गुणों के मूल्यांकन का ही तो परिणाम था। महार रेजिमेंट आज भी है जिसमें अन्य जाति के लोग भी सम्मिलित हैं। क्या यह सब उनके साथ जातीय भेदभाव का परिणाम था? सनातन परंपरा में तो योद्धाओं को क्षत्रिय माना जाता रहा है।

छत्रपति शिवाजी की सेना में भी महार योद्धा हुआ करते थे। उनके साथ भेदभाव कब हुआ, किसने किया?

भीमाकोरेगाँव युद्ध में ब्रिटिशर्स का साथ देने वाले महारों के उत्तराधिकारी अब एक बार फिर ब्राह्मणों के विरुद्ध ताल ठोंकने लगे हैं, कारण तब भी अज्ञात था, आज भी अज्ञात है।

आपने भीमाकोरेगाँव में अंग्रेजों के साथ मिलकर अपने ही राजा के अरब और हिन्दू सैनिकों (जिनमें से कुछ आपके गाँव के पड़ोसी पूर्वज भी रहे होंगे) का नरसंहार किया जो महारों के लिए कितना गर्व का विषय है, यह तो आप ही तय कर सकेंगे। एक ओर तो आप वैसा ही नरसंहार पुनः दोहराने की धमकी दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर आपका यह भी आरोप है कि ब्राह्मणों ने मंदिरों में पूजा करने और शिक्षा से आपको हजारों-लाखों वर्षों तक वंचित रखा ...और इसीलिए अब आप ब्राह्मणों से उनका सब कुछ छीन लेने की आभासी संचार माध्यमों पर और जनसभाएँ कर धमकियाँ देने लगे हैं। आप ब्राह्मणों से छीन लेना चाहते हैं उनके प्रतीक, उनके मौलिक अधिकार, उनकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उनकी बेटियाँ भी... फिर भी आप स्वयं को ही वंचित, शोषित और पीड़ित कहते हैं! इतना बड़ा झूठ बोलने का दुस्साहस कहाँ से लाते हैं आप लोग!

आप तो यह भी कहते हैं कि भारत कभी मंदिरों का देश नहीं रहा, यहाँ जो हैं वे सब बौद्ध मठ हैं। हम पुरातात्त्विक तथ्यों में गये बिना आपसे पूछते हैं कि मंदिर थे नहीं फिर भी हजारों सालों तक ब्राह्मणों ने आपको मंदिरों में जाने से रोका? आपको शिक्षा से वंचित रखा किंतु आश्चर्य यह कि फिर भी आप सैन्यप्रशिक्षण प्राप्त करते रहे! 

विरोधाभासों और मनगढंत आरोप गढ़ने की सारी सीमायें तोड़कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

इतिहास यह है कि भीमाकोरेगाँव युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य भीमा नदी के किनारे १ जनवरी १८१८ में लड़ा गया। कंपनी सेना की ओर से महार रेजिमेंट के ८३४ सैनिकों और पेशवा की ओर से २८००० सैनिकों ने युद्ध लड़ा था जो अनिर्णीत रहा किंतु उसके बाद पेशवा को अंग्रेजों से कुछ पेंशन लेकर संधि करनी पड़ी और पुणे से बिठूर जाना पड़ा। 

ब्रिटिशकंपनी ने इस संधि के उपलक्ष्य में कोरेगाँव में एक विजय स्तंभ बनवाया और प्रतिवर्ष ०१ जनवरी को वहाँ शौर्यदिवस मनाया जाने लगा। 

यद्यपि यह युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य हुआ पर महारों ने १९४७ के बाद इसे ब्राह्मणों पर महारों की विजय के रूप में मनाना प्रारंभ किया। महार आज भी इसे इसी रूप में मना कर भी जातिवाद का आरोप ब्राह्मणों पर लगाते नहीं थकते।  

भीमाकोरेगाँव इतिहास के संदर्भ में आपकी पूर्व एवं वर्तमान भूमिकाओं को किस तरह देशभक्ति और तथाकथित मनुवाद एवं ब्राह्मणवाद का प्रमाण माना सकता है, यह विचार भी आप ही कर सकते हैंं। 

क्रमशः...

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

विरोध की अंतरधाराएँ- ३

(वैज्ञानिक की निष्ठा)

ब्राह्मणीय चरित्र और निष्ठा पर वामसेफियों के निरंतर प्रहारों के बीच एक युवा ब्राह्मण ने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया है। ब्राह्मणों की ऐसी दाधीचि परंपरा हमारे लिए गर्व का विषय है। 

मानव मस्तिष्क पर यांत्रिकीय नियंत्रण के गंभीर दुष्परिणामों की आशंकाओं के कारण विश्वविख्यात ए.आई. प्रतिष्ठान एंथ्रोपिक के वैज्ञानिक मृणांक शर्मा त्यागपत्र दे चुके हैं और अब वे कविताएँ लिखेंगे। 

युवा वैज्ञानिक मृणांक आॅक्सफोर्ड विवि से मशीन लर्निंग में पीएच.डी. करने के बाद एंथ्रोपिक में सेफगार्ड टीम के प्रमुख नियुक्त हुये थे। मानव मस्तिष्क पर मशीन का नियंत्रण बौद्धिक जगत में चिंतन और मंथन का विषय रहा है। मृणांक ने मानव मस्तिष्क की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता पर मशीनी नियंत्रण के बढ़ते प्रभागों को नैतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा और एंथ्रोपिक को राम-राम कहकर साहित्य की ओर मुड़ गये। मृणांक शर्मा के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में वामन मेश्राम और चंद्रशेखर रावण जैसे वामसेफियों के अखण्डमौन पर भीमवादियों को विचार करना चाहिए जो यह दुष्प्रचार करते नहीं थकते कि ब्राह्मणों में नैतिकता, निष्ठा और चरित्र का पूरी तरह अभाव होता है।

क्रमशः...

विरोध की अंतरधाराएँ- २

बौद्धभिक्खु सुमित रत्न उवाच-  

"१.सनातन शब्द बौद्ध धर्म का है जिसे हिंदुओं ने ले लिया। बौद्ध ही सनातन है। हिंदू धर्म तो यूरेशिया से आये विदेशी आक्रमणकारियों का धर्म है। २. भारत में सभी हिंदूमंदिर बौद्ध मठों को तोड़कर बनाये गये हैं। ३. हमारे पास ऐसे ८४ हजार मंदिरों के प्रमाण हैं जो बौद्धमठों को तोड़कर बनाये गये हैं। ४. अयोध्या के राममंदिर और तिरुपतिमंदिर सहित  भारत के सभी प्रमुख मंदिर बौद्धमठ थे जिनपर मनुवादियों ने अधिकार कर लिया।"

बौद्ध और भीमभक्त यह प्रचारित और स्थापित करने में सफल हुये हैं कि धर्म और सभ्यता का प्रारम्भ बुद्धयुग से ही हुआ है और भीमराव आंबेडकर ने भारत के मूलनिवासियों की महिलाओं को स्तन ढकने व पुरुषों को शिक्षा का अधिकार दिया। जब उच्चशिक्षित और शासन के उच्चपदाधिकारी लोग आमजनता के सामने दहाड़ते हुये ऐसे निराधार वक्तव्य देते हैं तो सुनने वालों के मन में तर्क-वितर्क का कोई स्थान नहीं रह जाता। वे वही मानते हैं जो उन्हें बताया जाता है। इन छद्म विद्वानों ने बौद्धरामायण जैसी पुस्तकें लिखकर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बलात्कार ही नहीं किया है प्रत्युत भारत विभाजन की एक और आधारशिला रख दी है। 

सुमितरत्न ही नहीं, बहुत से उच्चशिक्षित लोग भी यही मानते और प्रचारित करते हैं कि हिन्दू लोग यूरेशिया से आये अत्याचारी विदेशी आक्रमणकारी हैं । ऐसे लोगों में जज, कलेक्टर, कमिश्नर, डाॅक्टर, आईपीएस अधिकारी और मंत्री लोग भी सम्मिलित हैं। 

इन लोगों ने अपने विचारों की प्रामाणिकता के लिए मनगढ़ंत अत्याचारों, मिथ्या इतिहास और निराधार   किस्सों को गढ़कर बड़ी-बड़ी पुस्तकों को प्रकाशित किया है। 

यह विडंबना है कि उनका गढ़ा शतप्रतिशत झूठ स्थापित-मंडित होता जा रहा है और हम न तो उसका सशक्त खंडन कर पा रहे हैं और न भारतीय सभ्यता के सत्य को सामने ला पा हे हैं। हम इतने असमर्थ और निर्बल क्यों हैं?खंडन-मंडन के लिए हमारे पास कोई सुदृढ़ और परिपक्व योजना क्यों नहीं है? सावधान! हिन्दूविरोध अब केवल विचार तक ही सीमित नहीं रहा, हिंसक घटनाओं में रूपांतरित हो चुका है।

क्रमशः... 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

घर वापसी

परमज्ञानी ने बताया

तो पता चला
भारत में रहने वाले
सभी लोग हिंदू हैं
अरब से नहीं आया
कोई मुसलमान या रोहिंग्या
कोई बौद्ध या बांग्लादेशी घुसपैठिया
ईसाई भी नहीं आया कोई
येरुशलम से
सब एक हैं, सब हिंदू हैं
सब भारतीय हैं
और...
कोई भी भारतीय हो सकता है
हिंदुओं का ठेकेदार।

जी! समझ गया
त्रेता और द्वापर में
यक्ष, राक्षस
दैत्य और असुर भी
भारतीय थे
नहीं आये थे अन्य ग्रह से।
पर नहीं समझा
कि क्यों होते रहे युद्ध
उन सबके मध्य
और असुरों के वध पर
क्यों मनाते रहे उत्सव
आप सब ?

और हाँ!
भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री
भारतीय नहीं
अरबमूल का था
करता रहा हत्या
हिंदुओं के इतिहास की
करता रहा महिमा मंडन
विदेशी लुटेरों का
क्योंकि तुम्हारे जैसे छद्माचारी
लेते रहे हैं जन्म
हर युग में।

वह तो बताया
यह क्यों नहीं बताया
कि धरती का हर वासी
मनुष्य है केवल
संतान हैं सभी
मनु-सतरूपा की।
होनी चाहिए सबकी
घर वापसी
बनाना चाहिये सबको
केवल मनुष्य।

घर वापसी!
किसका घर? कैसा घर?
किसकी वापसी?
जिन्हें तुम रखना चाहते हो
बुलाकर अपने घर
वे तैयार बैठे हैं
करने हमें बेघर।

जब बता ही रहे हो
तो यह भी बता देते
कि रावण भी तो हिंदू था
जिसका करते हो प्रतिवर्ष
वध और दहन
मनाते हो विजयादशमी
करते हो गर्व।

हिंदू के दहन का गर्व!
लज्जा नहीं आती तुम्हें?
क्यों नहीं की रावण की
प्रतीकात्मक घर वापसी ?

बहुत उपदेश देते रहे हो
बुराई पर अच्छाई की विजय का
असत्य पर सत्य की विजय का
पर क्यों खड़े हो गये
बुराई के साथ ?
असत्य के साथ ?
परमपूज्य जी!
इतने बुड़बक भी नहीं हैं हम
जितना बूझे हो तुम।