शनिवार, 22 अगस्त 2026

बीजिंग से अहमदाबाद

मुँह खुला ही रहता है 

चिर बुभुक्षित

ड्रैगन का

निगलने को कुछ भी

किसी भी दिशा में

मिल जाए जो भी

जहाँ भी।

चौकन्ने

मंथर गति से चलते

ड्रैगन की तीक्ष्ण दृष्टि से

बचेगा नहीं

असावधान रहेगा जो भी

और 

नहीं होगी दूरदृष्टि

जिसमें भी।


तुम तो गाते रहे 

हिंदी-चीनी भाई-भाई

और उधर बासठ हो गया।

तुमने कहा कुछ नहीं हुआ

डोकलाम में 

और उधर बनती रहीं 

सैन्य अधोसंरचनायें ताक्सिन में,

बनते रहे दो सैन्यमार्ग 

अरुणाचल में

साठ किलोमीटर भीतर तक।

तुम झूठ बोलते रहे  

पल-पल

आत्मविश्वासपूर्ण अभिनय के साथ।

कौन हो तुम?

चौकीदार तो नहीं हो सकते

नायक भी नहीं हो सकते

बंधु भी नहीं, सखा भी नहीं

ओह ! अब समझा 

तुम जो हो

वह बताएगा कौन!

सुनने के बाद

अपना सही परिचय 

मृत्युदंड निश्चित है

इसलिए सत्यवादी मौन है

गूँजता है तो केवल तुम्हारा ही 

अट्टहास दिग्दिगंत में

पर अब और नहीं

तैयार हो गये हैं कुछ लोग

करने अनावृत सारे रहस्य

भले ही मिले

क्यों न मृत्युदंड

और तुम!

तुम तो मरते ही रहते हो पल-पल

तुम्हें क्या पड़ता है 

कोई अंतर 

किसी के मरने से!

बेताल बेसुर

गाते रहे वर्षों से 

मन की बात

केवल अपनी

बिना सुने 

किसी और के मन की 

बेताल जो ठहरे!

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्रजा से संवाद

संवाद दृश्य-१. (सिर हिलाते और उंगली दिखाते हुये, धमकाने की भाव भंगिमा के साथ भीड़ को संबोधित करते हुये) - 

"...मुझे बताइये, ऐसे व्यक्ति को मौका मिल जाए... तो हिसाब चुकता करेगा या नहीं करेगा? तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम हमें मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे..."

कट..कट..कट..

खलनायक को ऐसा ही होना चाहिए, ऐसी ही भाषा, ऐसी ही भाव भंगिमा, इतना ही खल-कपटी और इतना ही मिथ्याभाषी। लोग इसे ८०० साल बाद हुआ विष्णु का अवतार मानते हैं, कोई कोहनूर तो कोई विश्वगुरु। 

अनुरागी कवि के शब्दों में-  "जा को चिमचा जितनो भारी, मनमानी छवि देखय न्यारी।।

कुछ और देखने के लिए चलिए, आगे चलते हैं...

हाथ में धनुष-बाण लिए एआई निर्मित नानबायोलाॅजिकल भगवान का चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। भगवान का स्वांग रचना महानता और ईश्वरीय अनुभूति उत्पन्न करने में सहायक होता है। हर कोई भगवान बन जाने के लिए लालायित रहता है। आप इसे ढिठाई, धृष्टता और निर्लज्जता कह कर दुःखी हो सकते हैं। पर निस्संदेह भारत में ऐसे लोगों की भरमार है जो अवतारी कहलाने और मान लिए जाने के लिए लालायित रहते हैं। पूजन-वंदन भला किसे नहीं सुहाता! 

कुछ लोगों को चित्र अच्छा नहीं लगता, वे इसे भगवान का अपमान मान कर कानाफूसी कर रहे हैं। हाँ! कानाफूसी ही, प्रत्यक्ष होकर कहने का साहस भी तो होना चाहिए!

कुछ लोगों को कृत्रिम बौद्धिकताजनित भगवान का यह चित्र बहुत प्रभावित भी करता है, वे चित्र देखकर धन्य हो रहे हैं। स्वयं भगवान प्रकट हुये हैं "राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा" का प्रचार करने। 

अति उत्साही और अत्यानुरागी भक्त यह भ्रम उत्पन्न करने में लगे हैं कि जैसे उनके नानबायोलाॅजिकल जी महान कलाकार हैं वैसे ही कौशलेश श्रीराम भी थे,...अर्थात् इतने ही सनातन विनाशक, कपटी और मिथ्याभाषी। 

यह हो क्या रहा है देश में! हम पतन की कितनी और खाइयों में... और कब तक कूदते रहेंगे?

भगवान जी ने अपने श्रुमुख से उवाचा -" मैं अतिपिछड़े वर्ग से आता हूँ। मैं दलित वर्ग से आता हूँ। मैं चाय बेचा करता था"।

ब्राह्मणों पर छुआछूत का आरोप लगाने वाले भगवान ने कभी नहीं बताया कि उनके हाथ की बनी चाय पीने वालों में से कितने लोगों ने भगवान जी से उनकी जाति पूछी? कितने लोगों ने उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया? कितने लोगों ने उनकी छुई चाय पीने से मना किया...?

अमर होने के लिए अमरत्व जैसे किसी गुण की क्या आवश्यकता! प्रचार और निर्लज्जता ही पर्याप्त है। वासुदेव और कौशलेश को प्रजा भगवान मान कर पूज सकती है तो मुझे क्यों नहीं! वे भी शासक थे, मैं भी शासक हूँ। मैं किसी से कम हूँ क्या!

चीनी अतिक्रमण

एक दूसरे को आरोपित कर स्वयं को राष्ट्रवादी और भारत प्रेमी बताने वाली सरकार भी झूठ बोलती रही और चीन भारत में आतिक्रमण करता रहा। अरुणांचली नागरिक दुःखी हैं, जितना अतिक्रमण से हैं उससे भी अधिक सरकार के उस झूठ से हैं जो प्रचार करता है कि वहाँ कोई चीनी अतिक्रमण नहीं हुआ है। सेवन सिस्टर्स वाले हमारी तरह मिथ्याभाषी नहीं होते। सीमावर्ती गांवों के लोग चीनी सैनिकों के सामने जाकर उनका विरोध कर रहे हैं, स्त्रियाँ उनके सामने जाकर चीख-चीख कर रो रही हैं कि सैनिक वापस चले जायें, वहाँ के नागरिक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि भारत चीनी अतिक्रमण के विरुद्ध कुछ करे। वे गूगल सेटेलाईट मैप से अतिक्रमित स्थानों के चित्र भेज रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि शेष भारत के लोग, अरूणाचल और भारत सरकार भी गूगल मैप देखे। 

मैकमोहन रेखा लाँघकर ताक्सिन और उसके आसपास के स्थानों पर चीनी सेना ने अपनी रणनीणिक अधोसंरचनाओं का निर्माण कर लिया है जिसमें टनल और लंबी सड़कें भी सम्मिलित हैं जिससे अब गाँव वाले उन चारागाहों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय आदिवासी अपने स्तर पर मुखर होते रहे जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। उन्हें लगने लगा है कि वे अधिक समय तक भारतवासी नहीं रह पायेंगे, अरुणाचल प्रदेश भी तिब्बत की तरह ड्रैगन के मुँह में जाने वाला है। वे चीनी नहीं बनना चाहते, भारतीय ही बने रहना चाहते हैं। अरुणाचली युवक उग्र नहीं होते, प्रकृति से वे सौम्य और शांत होते हैं। पर कब तक?

ढीठ सरकार नहीं सुनती तो अब वे स्वयं निकल रहे हैं...अपना भारत बचाने के लिए। "ताक्सिन चलो, भारत बचाओ अभियान" के स्वर गूँजने लगे हैं। पूरा भारत इस अभियान के समर्थन में है। सेवन सिस्टर्स के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। वहाँ हमारी ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरें हैं। 

देश रहे या भाड़ में जाय, सरकार में बैठे अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं का क्या बिगड़ेगा! उन्हें चिंता क्यों होगी, पर हमें तो है।

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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गोमाता

राम भी वह

माधव भी वह

पर 

किंचित भी राम नहीं

किंचित भी माधव नहीं

संघ के चिंतन ने

राम तो छीने ही

छीन लिए माधव भी


गोमाता और धर्म से 

पृथक करता जो

जीवनशैली को

पूछते हैं कौशलेश

पूछते हैं वासुदेव

धर्म से पृथक

अस्तित्व

जीवनशैली का

बताओ तो राम माधव!

ना-ना-ना

बुड़बक न बना पाओगे

उत्तर तो देना ही होगा

किसी न किसी को

आज

प्रत्याशी को

या कल

मतदाता को

सोच लो जी भर

कौन दे उत्तर!

पहचान

 वे मिटा रहे हैं

पहचान के चिन्ह

एक-एक कर, 

नाम

वेश-भूषा

परंपरा

भाषा

संस्कार 

और सभ्यता...

ताकि आसान हो सके

हत्या

एक देश की।

सभ्यतायें

इस तरह भी मार दी जाती हैं

भाषायें 

इस तरह भी मार दी जाती हैं

और जीत लिया जाता है 

एक युद्ध

बिना लड़े कोई युद्ध।


युद्ध लड़ने में

अनिश्चित है हार-जीत

पहचान समाप्त कर देने से 

निश्चित हो जाता है सब कुछ

पहले से ही।


तिब्बत को तो मार रहा है 

चीन

ब्रिटेन को मार रहा है 

इस्लाम

किंतु भारत को मार रहा है

भारत ही

सुना तुमने!

भारत को मार रहा है भारत ही। 


रविवार, 16 अगस्त 2026

गालीयुग मोहन मन भावय

जेन-जी ने अपने प्रथम आंदोलन का प्रारंभ पोर्नगालियों के साथ किया। संघस्वामी मोहन भागवत जेन-जी से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें सर्वाधिक विचारशील, प्रगतिशील और विचारवान पाया। 
कुछ लोगों को जेन-जी की पोर्नगालियों से आपत्ति हुई। वे उनकी प्रगतिशीलता को समझ नहीं सके। प्रधानमंत्री ने पोर्नगालीबाज नारीशक्तियों को क्षमा कर दिया और उन्हें गले लगाने की इच्छा व्यक्त की।  
किसी ने कहा स्त्री कैसी भी हो, किसी भी स्थिति में स्त्री के चरित्र पर लांछन नहीं लगाया जाना चाहिए। 
जेन-जी आंदोलन में पोर्नगालीबाज लड़कों से अधिक संख्या लड़कियों की रही। 
जब कोई गाली देता है तो वे गालियाँ ही स्त्रीप्रधान होती हैं, यथा माँ की गाली, बहन की गाली या स्त्री जननांगों के वीभत्स क्रियास्वरूपों की गाली...। गाली कभी पुरुष प्रधान नहीं होती। स्त्री मर्म है, सर्वाधिक चोट मर्मस्थल में ही लगती है। इसीलिए पुरुषवाचक गाली नहीं बनी। जेन जी लड़कियाँ भी स्त्रीसूचक गालियाँ ही देती हैं। गाली स्त्रीवाचक होती है पर यह अपमान की पराकाष्ठा है पुरुष के लिए। इसी अपमान में छिपा है स्त्री का महत्व और उसकी प्रतिष्ठा। अपमान तो वह पीड़ा है जो शब्दशर से बिंधकर उत्पन्न होती है। शर स्त्री को चुभता है, पीड़ा पुरुष को होती है। स्त्री-पुरुष संबंधों के इस अति संवेदनशील पक्ष को भारतीय ही समझ सकते हैं जहाँ पैराडाॅक्स की भरमार है। 
...तो स्त्रीसूचक गालियाँ स्त्री से अधिक पुरुष को घायल करती हैं। गाली देना पाप है परंतु यह पुरुष की अपेक्षा स्त्री महत्व और उसके सम्मान को ही अधिक इंगित करता है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

राजनीति

 अतिविद्वान ने कहा

मत करो राजनीति की बातें

वातावरण दूषित होता है

मछलियों की बातें करो

तुम मछुआरे हो,

घंटियों की बातें करो

तुम पुजारी हो,

दूध की बातें करो

तुम ग्वाले हो।

कैसे करूँ

इन सबकी बातें

समझ नहीं पाता मैं।

मछलियों के बीज डाले ही नहीं गये

गाँव के सरकारी पोखर में

जो पहले से थीं भी

उन्हें खा गये

मंत्री जी।

पीतल की घंटियाँ

चुरा ली हैं

मंदिर के

सरकारी सेवकों ने

दूध नकली बनता है

नेता जी की फैक्ट्री में

कोई कोना नहीं

जो मुक्त हो

सरकारी हस्तक्षेप से।

सरकार माने राजनीति

राजनीति माने नेता जी की भैंस

भैंस नेता जी की ही है

क्योंकि लाठी उनकी ही है।

भैंस लेने के लिए रुपयों की नहीं

लाठी की आवश्यकता है

वह लोकोक्ति तो सुनी है न!

"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

तो इस तरह सब कुछ

नेताओं का ही है

सरकार भी

राजनीति भी

देश भी

देश की सारी संपत्ति भी

और तुम कहते हो

अछूत है राजनीति

और राजनीति जो छू रही है सबको

उसका क्या!

केवल छू ही नहीं रही,

पकड़ कर मरोड़ दे रही है

कपड़े सा निचोड़ दे रही है

और तुम कहते हो

दूर रहो राजनीति से!

राजनीति को ही

दूर क्यों नहीं रखते

हम से

हमारे जीवन से

हमारे धर्म से

हमारे सुख-चैन से!

राजनीति

हर लेती है सब कुछ

हर किसी का

और हम

जाने दें उसे यूँ ही

बिना किये दंडित

बिना किये प्रक्षालित!

नहीं

हम निस्पृह नहीं रह सकते

तुम्हारी तरह अवसरवादी नहीं हो सकते।