शनिवार, 29 अगस्त 2026

सत्ता और संविधान

व्यापारी ने व्यापारी से युद्ध किया

व्यापारिक, 

व्यापारी हारा, व्यापारी जीता

व्यापार की मृत्यु हुई।

व्यापारी ने दास बनाया

पूरे देश को

व्यापारी ने सत्ता संभाली 

पूरे देश की

नाम रखा "ब्रिटिश इंडिया"।

फिर क्रांति के लिए बजी

रणभेरी

हिंसा हुयी

कुछ मारे गये

कुछ ताक में थे

अवसर की,

नाटक किया स्वतंत्रता संग्राम का

लिख लिया अपना संविधान

करते हुये अनुकरण

विदेशी संविधानों का

जिसमें नहीं होता कुछ भी 

देशी।

सत्ता गई, सत्ता आई 

पर क्रांति नहीं हुई

सत्ता परिवर्तन हुआ। 

गोरों के चाबुक 

ले लिए कालों ने, 

पहले देश परतंत्र था

फिर प्रजा परतंत्र हुई। 

व्यापार आज भी रहता है

सत्ता के केंद्र में।

सारी नीतियाँ

सारे विधान

सारी व्यवस्था

रहती है

व्यापार केंद्रित।

तुमसे छीने गये 

तुम्हारे कुटीर उद्योग

छीना गया व्यापार

और थमा दिये गए

व्यापारिक दक्षता के नाम

बना कर जातियाँ

जो पिछड़ती गईं

खोती गईं अपना अस्तित्व

होते हुये रूपांतरित

वैश्य और शूद्र से

दलित

अतिदलित

और महादलित तक। 

व्यापार 

आज भी है

सत्ता के केंद्र में।

बड़े-बड़े प्रधानमंत्री

होते हैं नतमस्तक 

सम्राट 

रोटे शील्ड और 

व्यापारी

वास्को द गामा और  

शी जिन पिंग के समक्ष।

संविधान 

लिखे जाते हैं

इन्हीं के लिए।

राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ और हिंदू

 मोहन भागवत कहते नहीं थकते कि "हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवनशैली है"। 

बृहस्पति आगम के अनुसार "हिमालय से हिंदमहासागर तक का भूभाग हिंदु-स्थान है"। 

इस भूभाग के निवासी "हिंदुओं" की जीवनशैली, जीवनमूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं में मौलिक समानतायें होनी चाहिए। क्या सचमुच समानतायें हैं?

माना कि रिलीजन "धर्म" का पर्याय नहीं, और "हिंदू धर्म" जैसी कोई अवधारणा वेदों में नहीं है। पर "वैदिक धर्म" तो है न! कालांतर में यही वैदिक धर्म "सनातन धर्म" और "हिंदू धर्म" के नाम से लोकव्यवहार में जाना जाता रहा है। संघ धर्म को लेकर इतना हठी और अविवेकी क्यों है? हिंदू को यदि आप भौगोलिक परिचय मानते हैं तो स्पष्ट है कि भारत में केवल हिंदू समुदाय ही रहता है जिनमें से कई लोग वैदिक धर्म को नहीं मानते। तब वे क्या मानते हैं? वे "जो" मानते हैं उसे तात्विक दृष्टिकोण से धर्म नहीं, रिलीजन कहा जाता है। रिलीजन और धर्म के इस अंतर से स्पष्ट है कि विश्व में केवल दो ही समुदाय हो सकते हैं, एक धर्मपरायण और दूसरा रिलीजनपरायण। इन दोनों में कई असमानतायें हैं जिसके कारण उपद्रव दिखाई देते हैं। क्या  हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध आदि जीवनशैलियाँ भारत में व्यवहृत नहीं हैं? तब "हिंदू" भौगोलिक परिचय और "हिंदू जीवनशैली" में समानता होनी चाहिए जो कि नहीं है। अर्थात भारत के कुछ लोग धार्मिक हैं और कुछ लोग धार्मिक न होकर रिलीजियस हैं, और इनमें परस्पर विद्वेष एवं प्रतिकूलताएँ भी हैं जिनके हिंसक परिणाम हम सब देखते और भोगते रहते हैं। 

संघ और भाजपा के पास  समावेशिता और समानता जैसे कुछ शब्द हैं जो एक नया बखेड़ा खड़ा करते हैं और हम अंततः समाज को असमाधान की स्थिति में ही पाते हैं। 

संघ और भाजपा सत्य से भागकर एक स्वैच्छिक कल्पना को सत्य बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसने समाज में असमानता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन्हें स्वीकार करना होगा कि असमानता पूरे विश्व का सत्य है जिसे समाप्त नहीं, नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

पुराकथा भवितव्यता

पुराकथा यह है कि जब-जब धर्म की हानि (धर्म के अनुयायियों की संख्यात्मक और गुणात्मक न्यूनता) होती है तब-तब समाज में क्रूरता, अत्याचार और अपराधों की वृद्धि होती है। छोटे अत्याचारी भी बड़े अत्याचारियों से त्रस्त होने लगते हैं। हर कोई अभिमानी और स्वयं को ईश्वर मानने लगता है, ठीक हिरण्यकश्यप की तरह, नानबायोलाॅजिकल सा। यह वैचारिक और सामाजिक असंतुलन की पराकाष्ठा है जिसका अंत सुनिश्चत है। जगत के संचालन का यही कालक्रम (क्रोनोलाॅजिकल आॅर्डर) है, द सो काल्ड न्यू वर्ल्ड आॅर्डर। भारत सहित विश्व भर में व्याप्त इन सभी व्याधियों की यही प्रोग्नोसिस है।

रावण तो अपने काल का प्रकाण्ड विद्वान था, कई विषयों में पंडित, आविष्कारक और शोधकर्ता भी। किंतु उसके अहंकार ने उसे धर्मच्युत किया और फिर उसका अंत भी किया। रावण, दुर्योधन, ओट्टोमन साम्राज्य के सुल्तान आदि से लेकर ओसामा बिन लादेन तक हर अधर्मी का अंत होता रहा और हर युग का कुशासन अपने उत्तरकालीन सुशासन से स्थानापन्न किया जाता रहा। इस बार भी यही पुरानी कहानी अपनी पुनरावृत्ति के लिए नेपथ्य के गहन अंधकार में तैयार हो रही है। धर्म, जाति, वर्ग,भाषा आदि के आधार पर समाज को बाँटने और सत्ता हथियाने वालों का भी अंत होना ही है। परमशक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्थाई और अंतिम नहीं होता। तुम्हारा संविधान तो कदापि नहीं। 

बड़े गर्व से तुम जो संविधान रचते हो, उसका उल्लंघन भी तुम्हीं करते हो, फिर छल करके उसमें संशोधन भी करते हो। जो सच्चे लोग तुम्हारे रचे संविधान के अनुरूप चलते हैं वे कष्ट भोगते हैं, जो तुम्हारे संविधान की प्रतिपल धज्जियाँ उड़ाते हैं वे ऐश्वर्य भोगते हैं। किंतु प्रकृति रचित अलिखित संविधान में कोई संशोधन नहीं होता, वह निर्दुष्ट है इसलिए अपरिवर्तनीय है। उसे हर किसी को मानना ही होगा। 

प्रकृति और समाज का अपना पृथक धर्म होता है, जिसका पालन अनिवार्य है। कालक्रम से इसमें शिथिलता आती है पर वह स्थाई नहीं होती। जो प्रतिलोम हो जाता है उसे अनुलोम होना ही होता है। यह तुम्हारा रचित संविधान नहीं, प्रकृति का निर्दुष्ट और अक्षुण्ण संविधान है जो वैश्विक है, सनातन है, हर किसी के लिए सर्वोपरि है।

जिन्होंने हर तरह के पाप और क्रूरता को ईश्वर का आदेश प्रचारित कर निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता को ही धर्म कहना प्रारंभ कर दिया है, वे सब भी अपने अंत की ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति भी संतुलन साधने में लगी हुई है। 

...तो क्या अनुकूल काल की प्रतीक्षा करें! नहीं, यह भी नहीं, कर्म करना भी प्राकृतिक धर्म का अपरिहार्य अंग है। हम गहन तिमिर में छटपटा रहे हैं, भोर होने तक प्रतीक्षा करनी होगी। तमस से ज्योति की ओर... ! यजन तो करना ही होगा न!

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

जातीय समीकरण और सत्ता

 -जातिवाद मुर्दाबाद! जातीय जनगणना जिंदाबाद

-जिसकी जितनी संख्या भारी (अंकसूची छोड़कर), उतनी उसकी भागीदारी (सत्ता और शासकीय सेवाओं में)!

-तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते मारने के लिए उनकी पहचान और संख्या का पता होना आवश्यक है, इसलिए जातीय जनगणना आवश्यक है। 

-सत्ता और शासकीय सेवाओं में भागीदारी के लिए, गुणवत्ता नहीं संख्याबल चाहिए इसलिए जातिवाद का स्थायी होना आवश्यक है। 

-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की बेटियों का शुद्धिकरण (यौनप्रक्षालन) करने और उनसे विवाह करने के लिए जातिवाद का होना आवश्यक है।

-तिलक-तराजू-तलवार को गालियाँ देने, उन्हें मारने-पीटने, उनकी हत्या करने और उन पर एस.सी. एस.टी. अपमान का आरोप लगाकर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि लेने और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमकी देने के लिए जातिवाद की खाइयाँ और भी गहरी करना आवश्यक है।

-ये सब समाज की नहीं, दूषित और भ्रष्ट सत्ता की आवश्यकतायें हैं। इसीलिए क्षतिपूर्ति राशि के आकर्षण को इस तरह परोसा जाने लगा कि एस.सी.एस.टी. एक्ट भारतीय जनता के लिए अफीम बन गया। उसकी पिन्नक सिर चढ़ कर ध्वजारोहण करती है। आरक्षित वर्ग के अपमान को तौलकर उसका मूल्य तय किया जाने लगा, ताकि धन से उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।

-अपमान की क्षतिपूर्ति! यह एक नयी अवधारणा है, नैतिकमूल्यों का मूल्यांकन धनराशि की संख्या पर आकर ठहर जाता है। उसकी इतनी ही गति है।

-सिंहासन तक पहुँचने और फिर उसे दृढ़ता से पकड़े रहने के लिए जातीय समीकरण का गणित लगाते रहना कूटनीतिज्ञों के लिए सरलतम मार्ग होता है।

-कूट/छल नीति का राजनीति से नहीं, अराजकता से संबंध होता है। यह बात उनकी समझ में अच्छी तरह आती है जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और श्रीराम के आदर्शों को सत्ता और समाज दोनों से निरंतर दूर रखा। 

गालीप्रेमी भजनद्वेषी

जेन-जी लड़कियों ने मोदी और उनकी माँ को पोर्नगालियाँ दीं तो सरकार प्रसन्न होकर उनके सामने नतमस्तक हो गई, स्वयं प्रधानमंत्री ने गालीबाजों को गले से लगाने की इच्छा प्रकट की। इसके कुछ ही दिन बाद हनुमान चालीसा का भजन करती युवाओं की भीड़ से रामभक्त होने का पाखंड करने वाली सरकार इतनी कुपित हुई कि गृहमंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस को हिंसा के लिए आदेशित कर दिया गया। 

देश ही नहीं विश्व भर में विश्वगुरु के इस संदेश ने लोगों को हतप्रभ कर दिया। आपातकाल की घोषणा किये बिना दिल्ली में आपातकाल लगा दिया गया। इस अघोषित आपातकाल के लिए भाजपा और मोदी को इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। 

जातिगतआरक्षण, अत्याचारमूलक यूजीसी बिल और जातीय उत्पीड़न को समाप्त करने की याचना के साथ पूरे देश से उमड़ी भीड़ स्वतंत्र भारत का सच्चा मुक्तिआंदोलन है जिसके दमन के लिए संघ के वैचारिक आक्रमणों और भाजपा के हिंसक दमन ने देश भर को हतप्रभ कर दिया है। 

जंतर-मंतर पर युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हनुमान चालीसा का भजन करती भीड़ पर पुलिस की लाठियों के प्रहार ने घोषित कर दिया है कि राममंदिर और हिंदुत्व की बातें भाजपा और संघ के अलतकिया से अधिक और कुछ नहीं था। 

सत्य और नैसर्गिक न्याय की याचना करते भूलुंठित युवाओं पर मोदी सरकार की पुलिस के क्रूर प्रहारों, प्रदर्शनकारी पंडित पंकज धावरिया को बंदी बनाने के बाद चलती गाड़ी से नीचे फेंककर जातिसूचक गालियाँ देते हुये दिल्ली पुलिस की यातनाओं से भयभीत हो गये भय ने धीरे से फुसफुसाकर बता दिया कि भारत में संघ और भाजपा के फासीवाद की घोषणा हो चुकी है जो मोदी के प्रिय "न्यू वर्ल्ड  आॅर्डर" का एक अंश भर है। 

रविवार, 23 अगस्त 2026

आरक्षण का अधिकार

हर किसी को अपने पतन या उत्थान का अधिकार प्राप्त है । यह अधिकार सदा से आरक्षित रहा है, संविधान निर्माण के पहले से ही। 

आज मेरी बात आपको प्रतिकूल दिशा में जाती सी प्रतीत होगी। मैं सदा आरक्षण के विरोध में लिखता रहा हूँ। आज मैं इसके दूसरे स्वरूप को देख पा रहा हूँ। 

आज, अभी थोड़ी देर पहले तक मैं लिखता रहा कि आरक्षण नैसर्गिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, अन्याय है, अमानवीय है और अप्राकृतिक है। अब मैं समझ पा रहा हूँ कि आरक्षण पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा, क्योंकि आरक्षण प्रकृति की व्यवस्था है। 

अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले तनिक ठहरकर, बहुत अधिक नहीं, मात्र शरीर रचना विज्ञान, परमाणु संरचना, सृष्टि की प्रक्रिया, ब्रह्मांडीय विन्यास और गणित के कुछ व्यावहारिक अनुबंधों पर दृष्टि अवश्य डाल लीजिए। 

इन सभी में एक सैद्धांतिक समानता है, अ-समानता और विरुद्धता की समानता। दाहिने और बायें अंगों की संरचनाओं एवं कार्यों में अ-समानता, परमाणु की संरचना में परस्पर विरोधी गुणों की अनिवार्यता, सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अ-समान गुण-कर्मों की अनिवार्यता, ब्रह्मांड की अवस्थिति में तो अ-समानता और विरुद्धता की भरमार है, और गणित में मूल संख्याओं का योग भी अ-समान ही होता है।  

अ-समानता प्राकृतिक है, समानता का हठ अप्राकृतिक है। परिवार और समाज में अ-समानता देखी जाती है, उसका होना अपरिहार्य है। उसकी संरचना और अवस्थिति का आधार भी अ-समान है, और यही अ-समानता का गुण प्रकृति का आरक्षण है। इस आरक्षण को समाप्त कौन कर सकता है! इसीलिए फ़िजिक्स के विद्वान ने दहाड़ते हुए कहा- "किसी माई के लाल ने अपनी माँ का दूध नहीं पिया जो इस आरक्षण को समाप्त कर दे"। (वैसे जिस भी बच्चे की माँ जन्म देते ही मर नहीं गयी, उसने अपने बच्चों को दूध तो पिलाया ही है। बहुत कम दुर्भाग्यशाली बच्चे होते हैं जो माँ के दूध से वंचित रहते हैं)

...तो सिद्ध हुआ कि अ-समानता प्रकृति का अपरिहार्य गुण-कर्म है, और इस संदर्भ में प्रकृति ने अपनी व्यवस्था में शतप्रतिशत आरक्षण बना कर रखा है। 

...तो यह भी सिद्ध हुआ कि सामाजिक समानता की कल्पना और उसकी माँग एक अव्यावहारिक हठ है। प्रकृति की व्यवस्था में अ-समानता का आरक्षण है, समानता का नहीं।

वैक्सीन, वायरस और व्यापार

आग पर रोटी पकती है तो क्या सूरज पर पका लें! माइक्रोब्स रोग उत्पन्न करते हैं और इम्युनिटी भी, तो क्या उनका स्वागत करें और उन्हें अपने शरीर में निर्बाध प्रवेश करने दें? 

माइक्रोब्स और शरीर के बीच में आती है हाइजीन की अवधारणा और म्यूटेशन एवं वैरिएन्ट्स के रहस्य। 

मैं अपने छात्र जीवन से ही वैक्सीनेशन के विरोध में खड़ा होता रहा, लोग उपहास करते रहे, शिक्षक भी और सहपाठी भी, पर मैं खड़ा रहा। और अब जबकि anti HIV वैक्सीन की चर्चा हो रही है तो एंटी कोरोना वैक्सीन का भूत भी एक बार पुनः झाँकने लगा है। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए जाॅर्ज सोरोस से लेकर मोदी तक पुष्पमाला लेकर खड़े हैं। उद्योगपति हर्षित हैं... बकरे स्वयं आगे आ रहे हैं कटने के लिए। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए और क्या चाहिए!

हम कुछ नहीं कहेंगे, जनसंख्या भी तो कम होनी चाहिए न! प्रकृति संतुलन करती है, यहाँ अतिज्ञानी लोग प्रकृति का अधिकार स्वयं ले चुके हैं। एपस्टीन एक बार पुनः चर्चा में है, ...कि कोविड पूर्वनियोजित था, WHO की भूमिका भी पूर्वनियोजित थी। सबका साथ था...स्वास्थ्य के विरुद्ध विष बाँट कर अपने विकास का। लाॅकडाउन हुआ, थाली बजी, वैक्सीन लगा, ...और अब हो रहा है हृदयाघात, आकालमृत्यु। योजना सफल हो रही है। जनसंख्या कम हो रही है, उद्योग विस्तारित हो रहे हैं। कल क्या होने वाला है? ....छोड़िये, बाद में सोचेंगे, अभी तो अपनी बच्चियों को एंटीकैंसर वैक्सीन (Anti HIV) लगवाना है... ताकि इस बार उनकी देह में कैंसर की फसल अच्छी हो।