सोमवार, 20 मई 2019

विभाजन


बलात् कब्ज़ा वाले कश्मीर के भी दो टुकड़े हो गये एक पी.ओ.के. और दूसरा ख़ूबसूरत हुंजा घाटी वाला गिलगित-बाल्टिस्तान । पाकिस्तान सरकार द्वारा किया गया यह बटवारा केवल चीन को ख़ुश करने के लिये है ।  जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर एक नया राज्य बनाये जाने की बहुत दूरदर्शी आवश्यकता है ...पता नहीं राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से इस पर कोई विचार हो भी रहा है या नहीं ! बुरा विभाजन हो गया, अच्छे विभाजन के बारे में हम कब सोचेंगे?  



मुझे पता है, इस विषय पर कश्मीरी अलगाववादी और उनके समर्थक धारा 370 की ढाल लेकर सामने आ जायेंगे । ढाल लेकर टूट पड़ने वाले बुद्धिजीवी और नीतिकार शिमला समझौते के परिप्रेक्ष्य में तब कोई प्रतिरोध नहीं करते जब पाकिस्तानी हुक्मरान गिलगित-बाल्टिस्तान को एक अलग सूबा बना देते हैं । यानी दुनिया की आँखों में धूल झोंकते हुये शिमला समझौते का उल्लंघन किया जा सकता है, कश्मीर घाटी में एथनिक जेनोसाइड किया जा सकता है, महबूबा और शबनम लोन जैसे लोग कश्मीर को भारत से अलग कर लेने की धमकी दे सकते हैं ...लेकिन भारत की बेहतरी के लिये धारा 370 समाप्त करने या लद्दाख को एक नया प्रांत बनाने के बारे में कोई पहल नहीं की जा सकती ।
हम भारतीय आत्ममुग्धता से पीड़ित रहने वाले लोग हैं इसलिये हमें बारबार इतिहास के पन्ने पलट कर देखने की आवश्यकता है । मेरा संकेत भारत विभाजन की ओर है ।  
तत्कालीन ब्रिटिश भारत में धार्मिक बहुलता के आधार पर भारत विभाजन की माँग की गयी थी । भारत विभाजन हो गया अब इस बात की क्या सुनिश्चितता कि स्वतंत्र भारत में धार्मिक समीकरण बदलने पर यह इतिहास कभी पुनः दोहराया नहीं जायेगा जबकि कई मुस्लिम नेता पिछले एक दशक से एक और भारत विभाजन की धमकी देते रहे हैं । मोहम्मद अली जिन्ना किसी समय भारतीय एकता के समर्थक हुआ करते थे, किंतु बाद में सत्ता और धार्मिक पहचान की अदम्य भूख के आगे वे झुक गये और भारत विभाजन की ज़िद पर अड़ गये । क्या यही इतिहास उन लोगों द्वारा नहीं दोहराया जा सकता जो आज भारत के समर्थक हैं ? मत भूलिये कि पिछले एक दशक से टी.वी. डिबेट्स पर आने वाले लोगों ने एक और भारत विभाजन के बीज बोने शुरू कर दिये हैं ।

जिन्हें यह भरोसा है कि अब भारत का और विभाजन नहीं होगा उन्हें इतिहास स्मरण रखने की आवश्यकता है ।
जब हिंदू और मुसलमान एक साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे तो किसी ने नहीं सोचा था कि कभी भारत का विभाजन भी होगा, किंतु विभाजन हुआ और वह भी बहुत नृशंसतापूर्वक । वर्ष 1947 में किसी ने नहीं सोचा था कि पाकिस्तान कश्मीर पर आक्रमण करके उसका एक बड़ा हिस्सा हड़प लेगा, किंतु ऐसा हुआ । वर्ष 1948 में किसी ने नहीं सोचा था कि पाकिस्तान कलत पर आक्रमण कर उसे पाकिस्तान में मिला लेगा, किंतु ऐसा हुआ और आज पूरा बलूचिस्तान पाकिस्तान से आज़ाद होने के लिये हाथ-पाँव मार रहा है । वर्ष 1962 में किसी ने नहीं सोचा था कि चीन कभी भारत पर आक्रमण भी कर सकता है, किंतु आक्रमण हुआ और हमने भारत के लिये सामरिक महत्व का दो हजार वर्ग किलोमीटर का लद्दाखी भूभाग अक्साई-चिन खो दिया । वर्ष 1965 में किसी ने नहीं सोचा था कि जरा सा पाकिस्तान भारत पर आक्रमण करने का कभी दुस्साहस भी कर सकेगा किंतु यह दुस्साहस हुआ । और इससे भी पहले 1919 में जब ब्रिटिश हुकूमत ने गांधी जी से प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों को ब्रिटेन की ओर से युद्ध में सम्मिलित होने का सहयोग माँगा और पुरस्कार में भारत को आज़ाद कर देने का वादा किया तब भी किसी ने नहीं सोचा था कि ऊधम सिंह, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों की हिंसा का विरोधी और अहिंसा का पुजारी महात्मा भारतीय जवानों को हिंसा करने के लिये ब्रिटेन का साथ देने की घर-घर जाकर वकालत करेगा और युद्ध के बाद अंग्रेज़ अपने वादे से पूरी तरह मुकर जायेंगे । यहाँ यह भी स्मरणीय है कि जो गांधी देश की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेज़ों के विरुद्ध हथियार उठाने को हिंसा मानते थे वही गांधी आज़ादी का पुरस्कार पाने के लिये भारतीय जवानों को विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों की ओर से हथियार उठाकर हिंसा करने की प्रेरणा देने को उचित मान रहे थे ।

इतिहास में कुछ और पीछे चलते हैं, वर्ष 1905 में जब लॉर्ड कर्ज़न ने धार्मिक बहुलता के आधार पर बंगाल का विभाजन किया तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह 1946-47 के भारत विभाजन का पूर्वाभ्यास है और हिंदूबहुल पश्चिमी बंगाल आगे चलकर मई 2019 में एक बार फिर इस्लामिक बहुल प्रांत बनने की ओर तीव्रता से बढ़ता दिखायी देगा और हमारी माननीया सांसद श्रीमती साज़दा अहमद बंगाल में न केवल रामनाम और हिंदूवाद के पूर्ण बहिष्कार की घोषणा कर देंगी बल्कि बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों को बसाने की सार्वजनिक प्रतिज्ञा भी करेंगी, किंतु यह सब हुआ ।   

गुरुवार, 16 मई 2019

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद...


वर्ष 2014 में भाजपा की (मोदी की) सरकार आयी तो सारे विपक्षी हिंदू-राष्ट्रवाद को लेकर सशंकित हो उठे । केंद्र में भाजपा की सरकार आने से भारत को संघीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से मुक्त करने का स्वप्न देखने वालों को झटका लगना स्वाभाविक था ।
भारत की एक बहुत बड़ी विडम्बना यह रही है कि यहाँ हर किसी के मन में अपने क्षेत्र का शहंशाह बनने की प्रबल इच्छा रहती है । कश्मीर में तो ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है, अफ़ज़ल गुरु भी उन्हीं में से एक था । भारत की संसद पर आक्रमण करने के दोषी अफ़ज़ल गुरु को वर्ष 2014 में मृत्यु दण्ड दे दिया गया जिसे भारत के अलगाववादियों का एक बहुत बड़ा समूह अपनी पराजय के रूप में देख रहा था ।
कश्मीर भारत की एक दुःखती हुयी रग है । वर्ष 1990-91 में जब मण्डल आयोग को लेकर पूरे देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह का विरोध हो रहा था, जयपुर के आमेर पैलेस के एक बड़े से हॉल में सुबह-सुबह हमने सुना कि रामबाग में दुकानों को आग लगा दी गयी है और शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया है । इस घटना के मात्र दो दिन पहले ही आमेर पैलेस के इसी हॉल में मेरी भेंट एक कश्मीरी छात्र से हुयी थी जिसने कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा और घाटी में दशकों से छाई दहशत का बयान किया था ।  
कश्मीर घाटी को हिंदू-मुक्त बनाने के लिए इस्लामिक कट्टर पंथियों के दशकों से कहर ढा रहे अमानुषिक अत्याचार घाटी के हिंदुओं पर दिनोदिन बढ़ते जा रहे थे और भारत की तत्कालीन सरकार कश्मीरी हिंदुओं को सुरक्षा दिला सकने में असफल हो रही थी । जयपुर में रहते समय मेरी अच्छी मित्रता हो गयी थी उस कश्मीरी छात्र से । वह जब भी मुझसे मिलने आता तो उसकी चर्चाओं में कश्मीर एक मुख्य विषय हुआ करता । वर्ष 1990-91 में इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीरी पंडितों को अपनी बहू-बेटियाँ वहीं छोड़कर कश्मीर घाटी खाली कर देने का फ़रमान दे दिया गया था जिससे कश्मीरी पंडित दहशत में थे । अराजकता, असामाजिकता, जेनोसाइड, क्रूरता और अमानवीय आचरण की यह एक चरम स्थिति थी जिसके बाद कश्मीर घाटी खाली होने लगी और कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बनने को विवश हो गये । कश्मीर या भारत की सरकार अपने नागरिकों को सुरक्षा देने का अपना संवैधानिक दायित्व पूरा कर सकने में पूरी तरह असफल सिद्ध हो चुकी थीं जिससे भारत के इस्लामिक कट्टरपंथी और गज़वा-ए-हिंद अभियान के रणनीतिकार उत्साहित थे । वर्ष 2014 में भाजपा की मोदी सरकार के आने के बाद इन रणनीतिकारों ने दिल्ली और प्रधानमंत्री मोदी को अपने कठोर विरोध का केंद्र बना लिया था ।
वर्ष 2016 में फरवरी के नवें दिन दिल्ली के विश्वविख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्वयं को अलगाववादी बुद्धिजीवी मानने वाले कुछ युवकों ने कश्मीरी कवि आगा शाहिद अली के काव्य संकलन –“The country without a post office” जो कि मूल रूप से “Kashmir without a post office” के नाम से लिखी गयी थी, पर चर्चा के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसका एक छद्म किंतु मुख्य उद्देश्य संसद पर आक्रमण करने वाले अफज़ल गुरु के मृत्युदण्ड की तीसरी बरसी मनाकर देश और दुनिया को अलगाववाद की नीति का संदेश देना था ।      
क्रिटिक को प्रगति का अनिवार्य तत्व और अपना आदर्श मानने वाली जे.एन.यू. की संस्कृति इस बार अपने उछाल पर थी । अलगाववादी बुद्धिजीवियों ने भारत की राजधानी के प्रख्यात विश्वविद्यालय परिसर में पाकिस्तान ज़िंदाबाद’, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह’, ‘हम क्या चाहते आज़ादी’, 'हम लेके रहेंगे आज़ादी', 'गो इंडिया गो बैक', 'संग-बाजी वाली आज़ादी’, 'कश्मीर की आज़ादी तक जंग रहेगी – जंग रहेगी', 'भारत की बर्बादी तक आज़ादी की जंग रहेगी', 'हम छीन के लेंगे आज़ादी, लड़के लेंगे आज़ादी', 'तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा', 'तुम कितने मकबूल मारोगे, हर घर से मकबूल निकलेगा', 'अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं', 'अफ़ज़ल तेरे ख़ून से इंकलाब आएगाऔर इंडियन आर्मी को दो रगड़ा'… जैसे उत्तेजक नारे लगाकर भारत के प्रधानमंत्री को अपना संदेश देने का फिर एक सफल प्रयास किया ।
राजनीति की भाषा में इस तरह के नारे अलगाववाद और हिंसक विद्रोह की भूमिका माने जाते हैं ।  अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैंऔर तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगाजैसे नारों से भारत के सर्वोच्च न्यायालय एवं भारत राष्ट्र की सम्प्रभुता को सार्वजनिकरूप से चुनौती दी जाती रही ...पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत की भीरु प्रजा भी इस बगावती ऐलान को देखती और सुनती रही ।    
इन अलगाववादी बुद्धिजीवियों में जे.एन.यू. के अध्येताओं के साथ-साथ कुछ कश्मीरी युवक-युवतियाँ भी सम्मिलित थे । इनमें से कई लोग मार्क्स और शोपेनहॉर को अपना आदर्श मानते थे और केरल में प्रारम्भ हुये “किस ऑफ़ लव” आंदोलन के भागीदार रह चुके थे ।
जे.एन.यू. परिसर में हुयी इस बगावत से वामपंथी विचारधाराओं को पटखनी देने और अपनी हिंदूवादी विचारधारा को प्रखर करने का एक संयोगजन्य अवसर सत्तारूढ़ दल को मिल चुका था । अब राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति, राजद्रोह और राष्ट्रद्रोह जैसे भारीभरकम शब्दों पर वैचारिक और कूटनीतिक बहस पूरे देश में प्रारम्भ हो गयी । भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे शब्दों और इन पर होने वाली बहसों से भारत की आम प्रजा परिचित हो रही थी । जे.एन.यू. बगावत के अगुआ रहे कन्हैया कुमार भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान के लिये आमंत्रित किये जाने लगे । न चाहते हुये भी कन्हैया कुमार को पूरे देश ने एक बगावती राजनेता के रूप में स्थापित होते हुये देखा । मार्क्सवादी दल ने कन्हैया कुमार को बेगूसराय संसदीय क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाकर राजनीतिक अखाड़े में उतारा तो कन्हैया कुमार पर एक सुस्थापित राजनेता की मोहर भी लग गयी । इस माह के अंतिम सप्ताह में बेगूसराय की प्रजा के निर्णय की प्रतीक्षा पूरे देश के साथ-साथ दुनिया भर की वामपंथी सत्ताओं को भी है ।

मंगलवार, 14 मई 2019

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा

हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को हर भारतीय के कान इस गीत को सुनते आ रहे हैं । वर्ष में दो बार उन्हें लगता है कि उनका देश दुनिया के दीगर मुल्कों से कुछ ख़ास है...

सब लोगों की तरह हमें भी लगता है कि हमारा देश कुछ ख़ास है जहाँ वर्ष में दो बार हमें अपने महान होने का अनुभव होता है । साल के बाकी तीन सौ तिरेसठ दिन हम रोज की तरह हीनभावना से ग्रस्त बने रहते हैं क्योंकि किसी भी अन्याय का विरोध करने पर चारों ओर से लोग हमें सीख देने इकट्ठे होने लगते हैं – ”यह इण्डिया है यार ! यहाँ सब चलता है अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ लेगा ...चुपचाप घर बैठो और जो जैसा चल रहा उसे वैसा ही चलने दो ....तुम ईश्वर नहीं हो जो कुछ बदल सकोगे ....दूसरों को अपने अनुसार नहीं बल्कि ख़ुद को लोगों के अनुसार बदलना सीख लो तो सुखी रहोगे ...”।
यह इण्डिया है जहाँ हम जीवन भर न्याय के लिये संघर्ष करते-करते परलोक सिधार जाते हैं और सत्यमेव जयते की हमारी आशा पूरी नहीं हो पाती ।
अब हम आते हैं भारत से प्रतिभाओं के पलायन की परम्परा पर । पलायन हमारे देश की परम्परा बन चुकी है । भारत की प्रतिभाओं और वैज्ञानिकों को काम न करने देने की कसम खाये बैठे अधिकारियों की हर बार जीत होने की परम्परा बन चुकी है । इसरो के वैज्ञानिकों की हत्या कर देने की परम्परा बन चुकी है । उनकी हत्याओं पर हर किसी के ख़ामोश बने रहने की परम्परा बन चुकी है । अकारण हल्ला करते रहने वाली मीडिया की अति संवेदनशील मुद्दों पर बिल्कुल चुप बने रहने की परम्परा बन चुकी है । दिन-रात एक-दूसरे पर गंदे से गंदा कीचड़ उछालने में व्यस्त रहने वाले माननीयों के महत्वपूर्ण विषयों से अनजान बने रहने की परम्परा बन चुकी है । यह देश परम्परावादियों का देश है ।
सरस्वती के चीरहरण की घटनायें चौथे स्तम्भ के लिये भी उपेक्षित होती हैं । कभी-कभार कोई बात उजागर हो ही गयी तो माननीयों द्वारा कह दिया जाता है कि यह सब विदेशी ताकतें करवा रही हैं हमारे देश में । विदेशी ताकतों पर थोप कर सारे आरोप हम ख़ुद को पाक-साफ मान कर चुप बैठ जाते हैं ।
इसरो के वैज्ञानिकों की हत्यायें अमेरिका, फ़्रांस या रूस के इशारों पर होती रहती हैं ... इसमें हमारे भोले माननीय निर्दोष हैं ...वे क्या कर सकते हैं बेचारे !
हत्या करवाने वाला कोई भी विदेशी हो पर हत्या करने वाला भारतीय कौन है ...इसकी जाँच न होने देने के लिये कौन भारतीय उत्तरदायी है ?
सत्ता हो या विपक्ष हर किसी को लक्ष्मी से प्रेम है ... वर्ष में मात्र एक दिन रस्म निभाने के लिये हम सरस्वती की पूजा करने का ढोंग कर लेते हैं ...इसके बाद तो पूरे साल सरस्वती की नितांत उपेक्षा करते रहने वाले हम लोग कभी शर्मिंदा न होने के अभ्यस्त हो चुके हैं ।   

रविवार, 21 अप्रैल 2019

औद्योगिक शैली का हमारी संस्कृति और सभ्यता पर प्रभाव


आधुनिक विकासवादियों ने इण्डस्ट्रियल कल्चरनामक एक नये पद की संरचना करके यह भ्रम उत्पन्न करने में पूर्ण सफलता प्राप्त कर ली है कि यह भी एक प्रकार की कोई संस्कृति है जो विकास के लिये अनिवार्य है । मैं कभी भी इसे संस्कृति स्वीकार नहीं कर सका इसलिये इस पद का हिंदी अनुवाद औद्योगिक शैलीकिया जाना उचित समझता हूँ । सभ्यता संस्कृतिका वह प्रकटस्वरूप है जो नितांत व्यक्तिगत होकर भी अपने व्यापक प्रभाव के कारण समाज में निर्दुष्ट प्रकाशित होता है । इण्डस्ट्रियल कल्चरमें, प्रथमतः प्रकाशित हो सकने जैसा कुछ भी है ही नहीं, दूसरे, यह अपने जिस भी रूप में प्रकट होता है वह निर्दुष्ट नहीं है । 
भारतीयों के मस्तिष्क में पश्चिमी जगत के बारे में स्थापित हो चुके विचार एक ऐसे स्वप्न जगत की आभासी रचना करते हैं जहाँ उच्च मानवीय आदर्श हैं, निष्ठावान लोग हैं, वैज्ञानिक उपलब्धियों से सुसज्जित चमत्कारपूर्ण जीवन जीने के समस्त संसाधन हैं, जीवन को सुविधाजनक बनाने वाले अत्याधुनिक उपकरण हैं, वैज्ञानिकविकास है, सुखी जीवन है, सुसंस्कृत और सुसभ्य समाज है । किंतु यह उतना ही सच है जितना किसी भारतीय फ़िल्म स्टूडियो का बनावटीपन और उसके बाहर फैली सड़ाँध भरी गन्दगी जिसे फ़िल्म के दर्शक कभी नहीं जान पाते ।
पश्चिमी जगत औद्योगिक विकास का दीवाना है । इस दीवानेपन ने उसे मानवीयता की सारी सीमायें तोड़ फेकने के लिये उत्साहित और प्रेरित किया है । पैसे की दीवानगी से प्रेरित पश्चिमी उद्योगपतियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी निर्मम और क्रूर उद्योग की अपसंस्कृतिमूलक शैली स्थापित करने के पाप का दुस्साहस किया है । इसका ताज़ा उदाहरण है स्वाइन फ़्लू । आप स्मरण कीजिये, लगभग सारी नयी-नयी बीमारियाँ पश्चिमी देशों से ही शेष विश्व में फैलती रही हैं फिर मामला एंथ्रेक्स का हो, सार्स का हो, ईबोला का हो या बर्डफ़्लू का । आप जानते हैं कि AIDS के मामले में भी कारण हैतीनहीं योरोपीय देश ही रहे हैं । कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में न्यूक्लियर बम नहीं बल्कि क्रूर स्वास्थ्य उद्योगही वर्तमान सभ्यता के विनाश का कारण बने । 
          दुर्भाग्य से स्वास्थ्य के क्षेत्र में होने वाले आविष्कारों के व्यावहारिक उपयोगों की निरापदता सिद्ध करने केलिये थर्ड पार्टी साइंस रिसर्चका अभी तक उतना प्रचलन नहीं हो सका है जितना होना चाहिये । यद्यपि कुछ आदर्श वैज्ञानिकों ने सैद्धांतिक क्रांति करते हुये थर्ड पार्टी साइंस रिसर्चका बीड़ा उठाया हुआ है किंतु अनैतिक प्रोपेगैण्डा के इस युग में उनकी रिसर्च के परिणाम आम जनता तक बहुत कम पहुँच पाते हैं । 
जनवरी 1976 में Fort Dix NJ के एक सैनिक की ऑटोप्सी से ओरिजिनल स्वाइन फ़्लू का पहला केस उद्घाटित हुआ था तथापि उसकी मृत्यु के कारणों में स्वाइन फ़्लू की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी । इसके पश्चात् 2009 के वसंत तक स्वाइन फ़्लू का कोई भी केस सामने नहीं आया । इसके कुछ ही महीनों बाद स्वास्थ्य के बाज़ार में एक वैक्सीन ने पदार्पण किया जिसकी सुरक्षाविश्वसनीयता के लिये किसी क्लीनिकल ट्रायल की कोई आवश्यकता तक नहीं समझी गयी । इस बीच फ़िलाडेल्फ़िया के एक होटल में 34 लोगों की मृत्यु Legionnair’s disease से हो गयी जिसे NIH (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ) ने स्वाइन फ़्लू से होना प्रचारित किया । अमेरिकी मीडिया और सरकारी अधिकारियों ने स्वाइन फ़्लू का हउवा खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
सामान्यतः किसी वैक्सीन को निर्माण के पश्चात ट्रायल आदि की प्रक्रिया से गुज़रने में एक वर्ष का समय लगता है किंतु “1976 स्वाइन फ़्लू वैक्सीनमात्र कुछ ही हफ़्तों में आविष्कृत होकर बाज़ार में आ गयी । पैसा कमाने के शॉर्टकट तरीके को अपनाते हुये यू.एस.पब्लिक हेल्थ सर्विसेज के वैज्ञानिकों द्वारा वैक्सीन बनाने के लिये स्वाइनफ़्लू के वाइल्ड स्ट्रेन में एक ऐसे स्वाइन फ़्लू वायरस के जीन्स का मिश्रण किया गया जो मैनमेड था और अपेक्षाकृत अधिक घातक था । दस सप्ताह में यह वैक्सीन अमेरिका के 50 मिलियन लोगों को लगाया गया जिसमें से 25 की मृत्यु हो गयी और 565 लोग Guillain Barre Syndrome के शिकार हो गये । सरकार की योजना शतप्रतिशत जनता के वैक्सीनेशन की थी किंतु वैक्सीन के कॉम्प्लीकेशंस से मचे हड़कम्प के कारण यूएस सरकार को अपना वैक्सीन प्रोग्राम दस सप्ताह बाद ही बन्द करना पड़ा ।
इंफ़्ल्युन्जा के लिये Orthomyxovirus समूह के इंफ़्ल्युंजा ए नामक उपसमूह में से एक वायरस है H1N1. जिसके सात सौ से भी अधिक स्ट्रेन्स का पता लगाया जा चुका है । फ़्लू वायरस के इतने सारे स्ट्रेन्स और फिर उनमें सहज म्यूटेशन की अधिकता स्वाइन फ़्लू वैक्सीन की उपयोगिता को अवैज्ञानिक सिद्ध करने के लिये पर्याप्त हैं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्यों के साथ वैक्सीन निर्माताओं और फ़ार्मास्युटिकल्स के आर्थिक सम्बन्ध विचारणीय हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करते हैं । वैक्सीन किस तरह एक निर्मम भयादोहक उद्योग बन गया है इसे जानने के लिये टिम ओशी का लेख -  गुडबाय स्वाइन फ़्लू : बुटीक पैंडेमिकपढ़ा जा सकता है । 
इस पूरे क्रूर और अवैज्ञानिक खेल में WHO की विश्वसनीयता इसलिये और भी संदेह के घेरे में आती है कि आख़िर उसे मई 2010 में Pandemic की परिभाषा अचानक क्यों बदलनी पड़ी ? नयी परिभाषा के अनुसार पैण्डेमिक के लिये अब किसी बीमारी का गम्भीर और मारक होना तथा कई देशों में फैलना आवश्यक नहीं रह गया है । निश्चित ही इस परिभाषा के पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य न होकर एक क्रूर अर्थशास्त्र झाँक रहा है ।

पाश्चात्य औद्योगिक शैली के सिद्धांत उत्पादमूलक व्यापार को प्राथमिकता देते हैं जिसमें बेचने के लिये उत्पाद पहले निर्मित किया जाता है, बाद में उसकी आवश्यकता निर्मित की जाती है, यानी कुछ भी स्वाभाविक और आवश्यक नहीं होता । यही वह सिद्धांत है जो विज्ञान, उद्योग और व्यापार को क्रूरतम बनाता है । हम स्वाइन फ़्लू की आधुनिक औषधि के निर्माण के माध्यम से इस बात को समझने का प्रयास करेंगे । 
स्वाइनफ़्लू की दवा के नाम से दुनिया भर में प्रसिद्ध टैमीफ्लू (ओसेल्टैमीवर फ़ॉस्फ़ेट) का निर्माण सब्ज़ियों को स्वादिष्ट बनाने के लिये स्तेमाल होने वाले एक मसाले से किया जाता है जिसका नाम है चक्रफूल या बादियान । इसका छोटा सा वृक्ष चीन और ताइवान का निवासी है, भारत में यह अरुणांचल प्रदेश में पाया जाता है जिसे स्टार अनिस या इल्लिसियम वेरम के नाम से जाना जाता है ।  इसमें पाये जाने वाले शिकिमिक एसिड का औषधीय प्रभाव न्यूरामिनाइडेज़ इनहिबिटर्स होता है अर्थात् यह स्वाइन फ़्लू के वायरस की वृद्धि की प्रक्रिया में जेनेटिक मैटेरियल के रिप्लीकेशन को रोकता है । सन 2005 में यह औषधि एवियनफ़्लू (बर्डफ़्लू) के लिये प्रभावी मानी गयी किंतु बाद में इसे स्वाइन फ़्लू के लिये भी विश्वस्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रभावी एवं प्रशंसनीयकरार दिया गया जिससे बढ़ती माँग के कारण पूरी दुनिया के रसोईघरों से चक्रफूल गायब होने लगा । ऐसी स्थिति में जापान की सोफ़िया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इसके विकल्प के रूप में एक और जड़ी-बूटी को खोज निकाला जिसे जिंक्गो बाइलोबा के नाम से जाना जाता है । चिकित्साविज्ञानियों में स्वाइन फ़्लू पर टैमीफ़्लू के प्रभावों एवं दुष्प्रभावों को लेकर परस्पर विरोधी विचार हैं । इसके स्तेमाल से सामान्य उल्टी और सिरदर्द से लेकर लिवर में सूजन, एलर्जिक रिएक्शन, एपीडर्मल नेक्रोलिसिस (चमड़ी का गलना), कार्डियक एरीदमिया (हृदय-गति,गति की लयबद्धता में कमी), मानसिक विकार, मधुमेह में वृद्धि, आँतों से ख़ून आना आदि साइड इफ़ेक्ट्स तो पाये ही गये हैं गुइलेन बेयर और स्टीवेंस ज़ॉन्सन जैसे गम्भीर सिण्ड्रोम और मृत्यु होने की भी शिकायतें पायी गयी हैं । चिंतन का विषय यह है कि हमारे गरम मसालों में से एक चक्रफूल ने आज तक कभी किसी के स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुँचाया किंतु जैसे ही उसके एक घटक को अलग किया गया वैसे ही वह हानिकारक हो गया । शरीर के किसी अंग को काट कर अलग कर देने से शरीर का जो हाल होता है वही हाल चिकित्सा विज्ञानियों ने चक्रफूल का कर दिया है । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या टैमीफ़्लू का निर्माण इतना आवश्यक था ? यदि आवश्यक था तो चक्रफूल एवं जिंक्गो बाइलोबा के उपयोग को ही क्यों नहीं प्रचारित किया गया ? और इसका सीधा सा उत्तर यह है कि यदि सरलतम उपलब्ध उपायों को प्रचारित किया जायेगा तो छद्म रिसर्च और अनैतिक प्रचार की बदौलत टैमीफ़्लू बनाने वाली रोश कम्पनी हर साल कई बिलियन डॉलर का व्यापार कैसे कर पाती ! 
 
चक्रफूल, Star anise, Badiane, Illicium verum 

 
Fossil tree, Ginkgo biloba, Salisburia adiantifolia 


भविष्य का इतिहास




घटनाओं की पुनरावृत्ति ब्रह्माण्डीय घटनाक्रम का परिणाम है इसीलिये तो इतिहास भी ख़ुद को दोहराता रहता है । किंतु आज हम बीते हुये इतिहास की नहीं, भविष्य के इतिहास की बात करेंगे... उस इतिहास की बात..., जिसकी भूमिका बहुत कुछ रची जा चुकी है । घटनायें, जो होने वाली हैं उनका पूर्वानुमान अब कठिन नहीं रह गया । चलिये, कुछ उड़ान भी भर ली जाय जिससे घटित होने वाला इतिहास ठीक-ठीक देखा जा सके ।

हुआ यह कि बेशुमार प्रदूषण ने अंततः एक दिन चेतावनी दे दी कि बस ! अब और नहीं, तुम्हें अपने लिये एक नया आशियाना खोजना ही होगा । अन्न-जल-हवा... सब कुछ विषाक्त हो गया, लोग विचित्र बीमारियों से ग्रस्त होकर मरने लगे । भारत के राजाओं को पहले तो लगा कि यह सब आम जनता के लिये है, हमारे लिये तो अभी भी सब कुछ पूर्ण शुद्ध रूप में सेवकों द्वारा उपलब्ध करवाया जाता रहेगा ...सदा की तरह .. किंतु ऐसा हुआ नहीं । कुछ राजा भी तड़प-तड़प कर मर गये तो बाकी राजाओं के कान खड़े हुये । उन्हें वैज्ञानिकों की बात माननी पड़ी ।
तय हुआ कि शीघ्र ही किसी दूसरे ग्रह की खोज की जाय । कारिंदों की तरह वैज्ञानिकों ने हुक़्म की तामील की । भाग-दौड़ शुरू हो गयी । वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह को उपयुक्त पाया और वहाँ नयी बस्तियाँ बसानी शुरू कर दी गयीं । ममता, मायावती, उमा भारती, राहुल, सोनिया, वाड्रावंश, अब्दुल्लावंश, मुफ़्तीवंश, मुलायमवंश, लालूवंश, आज़म ख़ान, योगी, मोदी,...जैसे सभी राजाओं ने मंगल ग्रह पर जाकर अपने-अपने लिये सुरक्षित इलाके खोज लिये । आडवाणी जैसे लोगों को धरती पर ही छोड़ दिया गया, नये ग्रह पर उनकी कोई भूमिका किसी को नज़र नहीं आयी । ज़रूरत के कुछ वैज्ञानिकों, सेवकों और चमचों को भी दरबार सजाने के लिये मंगल पर बुला लिया गया ।
यह वह समय था जब राजा तो थे किंतु उनके राज्य नहीं थे, राज्यों की सीमायें नहीं थीं, प्रजा नहीं थी । सभी राजा शासन करने की प्रचण्ड इच्छा से लबालब भरे हुये थे । शेष लोग उनकी भक्ति के लिये स्वयं को तैयार कर चुके थे, उन्हें धरती की तरह यहाँ भी शासित ही रहना था । इसी बीच पता चला कि ब्रह्माण्डीय डार्क मैटर के वेश में कन्हैया, उमर ख़ालिद, शबनम लोन, उमर अब्दुल्ला आदि भी मंगल ग्रह पर पहुँच गये हैं ।
हुकूमत के मौलिक अधिकार को लेकर प्रारम्भ हुयी वैचारिक सुगबुगाहट शीघ्र ही एक सैद्धांतिक युद्ध में बदल गयी । हमेशा आपस में लड़ते रहने वाले राजवंश के लोग एक मंच पर आ गये और उन्होंने तय किया कि राजवंशों में नये लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिये ।
शबनम लोन ने ख़िलाफत में मोर्चा खोल दिया कि मंगल ग्रह किसी की बपौती नहीं है, अपनी-अपनी दमखम के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपने लिये एक नया मुल्क बना सकता है, उसकी सीमायें तय कर सकता है और सुल्तान बन सकता है । मोदी और उनके साथ के लाइक माइण्डेड राजाओं ने कहा – “हमारे पूर्वजों ने तो पहले ही कह दिया था ...वीर भोग्या वसुंधरा
कन्हैया ने देखा कि यहाँ तो युद्ध जैसे हालात उत्पन्न हो रहे हैं किंतु गनीमत यह थी कि आयुधों के अभाव में मल्लयुद्ध के अतिरिक्त और कुछ सम्भावना फ़िलहाल वहाँ नहीं थी । कन्हैया को पृथ्वी ग्रह पर अपने हिरासत वाले दिनों का ख़ौफ़ ताज़ा हो आया तो उसने अरेबिक हिक़मत से व्यूह रचना शुरू कर दी । 
जिस समय मोदी आदि अपने-अपने राज्यों के लिये प्राकृतिक सम्पदा सम्पन्न किसी भूभाग की खोज में लगे हुये थे उस समय उमर अब्दुल्ला और कन्हैया जैसे लोग मंगल पर आराम कर रहे थे । उन्हें राज्य के लिये किसी भूभाग को खोजने की कोई ज़ल्दी नहीं थी ...और न कोई चिंता । ये लोग बचपन में मोहम्मद बिन क़ासिम के किस्सों के साथ-साथ कौवा और गिलहरी वाली कहानी पढ़ चुके थे । कन्हैया ने मौज में आकर गुनगुनाया - "तू चल मैं आता हूँ ...चुपड़ी रोटी खाता हूँ ..हरी डाल पर बैठा हूँ ..." 
इधर गिलहरी की तरह बड़े परिश्रम से मोदी आदि राजाओं ने अपने-अपने लिये भूभागों की खोज कर ली और अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये । राज्य स्थापित होते ही मायावती ने मूलनिवासी होने का दावा करते हुये स्वयं को पूरे मंगल ग्रह की एकमात्र स्वामिनी घोषित कर दिया । संयोग से मंगल पर राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाओं का अभी तक उदय नहीं हो सका था ।
अतिक्रमण सम्प्रदाय के पुरोधा उमर अब्दुल्ला ने अपने लोगों के साथ एक रात मोदी के राज्य पर चढ़ाई कर दी और एक बड़ा हिस्सा हथिया लिया । वीरभोग्या वसुंधरा का सिद्धांत फलीभूत हो गया, मोदी जैसे राजागण चिचियाते रह गये ...उनकी सुनने वाला कोई नहीं था ।
नये ग्रह पर मायावती नामक अतिमहत्वाकांक्षी स्त्री मूलनिवासी की बहस छेड़ चुकी थी और मोदी आदि राजाओं को अपदस्थ कर अपनी दावेदारी के लिये हाथ-पाँव मार रही थी । मूलनिवासी की बहस के खण्डन-मण्डन में हर कोई कूद पड़ा । मोदी आदि राजाओं ने कहा – “हम सभी धरती से आकर यहाँ बसे हुये हैं, कोई भी समुदाय यहाँ के मूलनिवासी की दावेदारी कैसे कर सकता है “?  
कन्हैया और शबनम लोन ने देखा तो एक दिन उन्होंने भी आपस में मंत्रणा की मंगल किसी की बपौती नहीं है । यहाँ कौन हुक़ूमत करेगा यह मोदी कैसे तय कर सकते हैं ! हममे से हर किसी को मंगल पर हुकूमत करने का अधिकार है । हमें मोदी के हजार टुकड़े कर देना चाहिये और उनके राज्य पर अपनी हुकूमत क़ायम कर लेनी चाहिये । वीरभोग्या वसुंधरा का सिद्धांत हमारे लिये भी लागू होता है ।
शीघ्र ही पूरे मंगल पर हुक़ूमत का अधिकारविषय पर ग्रहव्यापी बहस छिड़ गयी ।
जिस समय भारतीय राजा बहस में लगे हुये थे ठीक उसी समय शी जिन पिंग नामक छोटी-छोटी आँखों वाला एक महाकाइयाँ आदमी चुपचाप मंगल की ज़मीन पर खूँटे गाड़ता हुआ अपने राज्य की सीमा निर्धारित करने में लगा हुआ था । शी जिन पिंग निरंतर खूँटे गाड़ता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था उसे रोकने वाला वहाँ कोई भी नहीं था ।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

दाह संस्कार


सूरज को अस्ताचलगामी हुये लगभग तीन घण्टे बीत चुके थे । आकाश में छाये नम बादलों ने अँधेरे की चादर को और भी गहरा कर दिया था । अप्रैल की बेमौसम झमाझम वारिश में दरवाज़े पर किसी गाड़ी के आने की आवाज़ से डॉक्टर दागी को विस्मय हुआ, सोचने लगे – इस समय कौन हो सकता है भला!
बाहर निकले तो सामने अपने जिला अधिकारी को मुस्कराते हुये देखकर और भी विस्मय हुआ, अचानक मुँह से निकला – “सर ! इतनी वारिश में?”
अंदर आते ही जिला अधिकारी डॉक्टर भट्ट ने “भारत सरकार सेवार्थ” की मोहर वाला एक खुला लिफाफा डॉ. दागी की ओर बढ़ाते हुये कहा – “यह कार्य भी मेरे ही हाथों से सम्पन्न होना था”।
डॉ. दागी का विस्मय बढ़ता ही जा रहा था । प्रमोशन की कोई सम्भावना तो नहीं फिर यह पत्र कैसा कि अधिकारी को स्वयं इतनी वारिश में घर आना पड़ा । पत्र खोलकर जैसे ही डॉक्टर दागी ने पढ़ा तो उनके पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी । राज्यपाल के आदेशानुसार पचास वर्ष की आयु पूरी होने पर लोकहित में उन्हें बिना पूर्व सूचना के अनिवार्य सेवा निवृत्त कर दिया गया था ।
डॉक्टर भट्ट ने मुस्कराते हुये एक और कागज़ उनकी ओर बढ़ाते हुये कहा – “इस पर पावती दे दीजिये”।
दागी ने तुरंत हस्ताक्षर कर पावती जिला अधिकारी की ओर बढ़ायी ही थी कि डायरेक्टर का फ़ोन आ गया । भट्ट ने उल्लसित होते हुये बताया – “यस सर ! तामीली हो गयी है, पावती भी ले ली है, … नहीं-नहीं कोई दिक्कत नहीं हुयी”।
देशी घी में भुने हुये तालमखाने मुँह में डालकर चाय का कप उठाते हुये भट्ट ने मुस्करा कर कहा – “अब ऐसे मौके पर चाय तो नहीं पीनी चाहिये लेकिन बन गयी है तो पी लेता हूँ”।
डॉक्टर दागी उन गिने–चुने डॉक्टर्स में से एक थे जो झीनी चदरिया को बड़े जतन से दागी होने से बचाने के लिए “सत्यमेव जयते” की आशा में संघर्ष करते-करते समाज और विभाग की दृष्टि में “बेचारा” की उपाधि से विभूषित हो चुके थे ।
अपने साथ हुये इस अन्याय से डॉक्टर दागी तिलमिला उठे, निर्णय किया कि वे इस फ़रमान के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट जायेंगे ।
हाईकोर्ट में सरकारी अधिवक्ता डॉक्टर दागी को अनिवार्य सेवानिवृत्त किये जाने के संदर्भ में “मूलभूत नियम छप्पन के नियम दो (क)” की प्रासंगिकता को स्पष्ट नहीं कर पा रहे थे । महाधिवक्ता ने मुख्यमंत्री को संदेश भिजवाया कि चुनाव सिर पर है और यह निर्णय उनके विरुद्ध जा सकता है । विचार-विमर्श के बाद न्यायाधीश ने सरकार को एक अभ्यावेदन समिति बनाकर डॉक्टर दागी के प्रकरण पर पुनर्विचार करने का आदेश परित किया । अभ्यावेदन समिति में सचिव स्तर के उच्चाधिकारियों को सम्मिलित किया गया जिन्हें हर स्थिति में साठ दिन के अंदर अपने निर्णय से हाईकोर्ट को अवगत कराना था । साठ दिन पूरे होने पर भी अभ्यावेदन समिति कोई निर्णय नहीं कर सकी । अब सिलसिला प्रारम्भ हुआ तारीख़ों पर तारीख़ें खिसकने का । इस बीच विधानसभा चुनाव हो गये, सत्तापक्ष का सूपड़ा साफ हो गया और नयी सरकार का गठन भी हो गया ।
इस बीच एक घटना और भी हुयी, वह यह कि एक दिन अचानक डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर सत्यव्रत त्यागी ने दागी को फ़ोन पर “शासकीय जीवन” में “व्यावहारिक” बनने का उपदेश देते हुये परामर्श दिया कि “अस्तित्व की रक्षा के लिए सत्य-निष्ठा ही पर्याप्त नहीं है । मुद्रा हर किसी की आवश्यकता है और इसके बिना कुछ भी नहीं हो सकता
दागी ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया – “न्याय यदि न्यायिक तरीके से नहीं मिल सकता तो मैं उसे ख़रीदने के पक्ष में नहीं हूँ” ।
व्यवस्थामें संलिप्त न होने के हठ पर हुयी कई दौर की चर्चाओं में दागी को अब तक यह अहसास करवा दिया गया था कि वे एक पापी और अवांछित व्यक्ति हैं जो सामाजिक परम्पराओं को निभाने के विरुद्ध हैं । उनके जीवन की असफलताओं का एकमात्र कारण उनका थोथा आदर्शवाद है जिसे त्यागे बिना उनकी मुक्ति सम्भव नहीं है । 
त्यागी ने एक दिन दागी को फ़ोन पर सूचना दी कि उन्हें सेवा में पुनः बहाल कर दिया गया है । लेकिन किस्टारम जैसे दुर्गम और माओवाद प्रभावित स्थान में पोस्टिंग से बचने के लिये कुछ “व्यवस्था” करनी होगी ।
इसके बाद कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर दागी की स्थिति पर तरस खाते हुये उन्हें समझाने का भरसक प्रयास किया गया किंतु दागी टस से मस नहीं हुये । तब त्यागी ने एक दिन फोन पर लम्बी समझाइश देते हुये कहा – “आप एक अच्छे आदमी हैं । मैं आपको बचाना चाहता हूँ । अभ्यावेदन समिति के निर्णय के अनुसार आपको सेवा में पुनः बहाल किये जाने का आदेश निकलने ही वाला है किंतु डायरेक्टर साहब आपको चैन से नहीं रहने देंगे । आपको कुछ तो “व्यावहारिक” बनना पड़ेगा अन्यथा आपको माओवादी गढ़ किस्टारम में फेंक दिया जायेगा । और फिर मंत्रालय में भी इंसान ही तो बैठे हैं, यह “व्यवस्था” उनके लिये है, मुझे अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये । बहाली के बाद आपको इतने दिनों का वेतन भी दिया जायेगा, लाखों का सवाल है । कुछ तो “पत्रम-पुष्पम” चढ़ाइये”।
डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर सत्यव्रत त्यागी एक पञ्जीकृत आदर्शवादी थे जो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिये अहर्निश चिंतित रहा करते थे । उनकी चिंता आर्यों की उत्कृष्ट सनातन संस्कृति की रक्षा के लिये भी थी । “त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम् ...” वाला गीत गाते समय वे एक उत्कृष्ट सनातनी और हिंदूधर्म के उद्धारक प्रतीत हुआ करते थे । दूसरी ओर डॉक्टर दागी थे जो सार्वजनिक और शासकीय जीवन में “व्यावहारिक” होने के पाखण्ड के धुर विरोधी थे किंतु पत्नी की समझाइश पर “व्यावहारिक” होने के लिये तैयार हो गये थे । पत्नी ने समझाया था – “आप न्याय को ख़रीद नहीं रहे बल्कि आपके साथ अन्याय न हो और आपको किस्टारम भेज कर परेशान न किया जाय इसके लिए त्यागी के आगे आपको झुकना ही होगा, आख़िर वे आपके अधिकारी हैं”।
पत्नी की समझाइश के आगे झुकते हुये दागी ने त्यागी के आदमी को एक लिफाफे में बीस हजार “भारतीय मुद्रा” रखते हुये वह प्रमाणपत्र भी थमा दिया जो सेंट्रल विजिलेंस ने “सार्वजनिक जीवन में निष्ठावान” बने रहने की शपथ लेने पर डॉक्टर दागी को प्रदान किया था ।
महाप्राण नामक यह व्यक्ति त्यागी का विश्वस्त आदमी था तो दागी की ज़िद को भी अच्छी तरह जानता था । त्यागी के घर पहुँच कर महाप्राण ने टेबल पर लिफ़ाफ़ा और प्रमाणपत्र एक साथ रख दिये फिर कहा – “दागी के ज़मीर की हत्या हो गयी है, सेंट्रल विजिलेंस का प्रमाणपत्र भी उसके ज़मीर की रक्षा नहीं कर सका” । कुछ क्षण रुककर महाप्राण ने अंतिम बात भी कह दी – “वह कल सुबह हिमालय की ओर कहीं चला जायेगा, पता नहीं वापस आयेगा भी या नहीं । उसने लिफ़ाफ़ा देते हुये कहा था कि काश वह “व्यावहारिक” बनने की अपेक्षा रेल के नीचे कट कर मर पाता । मुझे डर है कि कहीं वह सचमुच आत्महत्या न कर ले”।
त्वदीयाय कार्याय गीत गाने वाले त्यागी ने टेबल पर रखे प्रमाणपत्र को उठाया, ध्यान से पढ़ा, कुछ गम्भीर हुये फिर उसे वापस टेबल पर रख कर लिफ़ाफ़ा उठा लिया । महाप्राण हत्प्रभ हुआ किंतु कुछ कहा नहीं । त्यागी ही बोले – “देखिये महाप्राण जी ! दूध का धुला तो मैं भी नहीं हूँ । ये “व्यवस्थायें” प्रशासनिक जीवन में आवश्यक हैं । इनके बिना काम नहीं चलता किसी का । दागी को समझाना कि रेल के नीचे कट कर मत मरे, ज़ल्दी ही सब ठीक हो जायेगा । मैं देखूँगा कि अब उसे कोई परेशान न करे । मैं उसकी पोस्टिंग भी अच्छी जगह करवा दूँगा । वैसे, दागी का अगर मन नहीं है तो मैं लिफ़ाफ़ा वापस कर सकता हूँ किंतु तब उसकी किसी परेशानी के लिये वह स्वयं ही उत्तरदायी रहेगा, अब निर्णय दागी के हाथ में है । वह जैसा चाहे”।
बाहर निकलकर महाप्राण ने खिन्न मन से दागी को फ़ोन लगाया, पूछा – “लिफ़ाफा जीत गया, प्रमाणपत्र हार गया । अब इस हारे हुये प्रमाणपत्र का क्या करूँ? और हाँ! त्यागी ने रेल से कटकर मरने के लिये मना किया है आपको”।  
दागी ने उत्तर दिया – “काश ! मैं इस पाखण्डी दुनिया से विदा हो पाता । अभी तो मैं हिमालय के लिये प्रस्थान कर चुका हूँ । फ़िलहाल आप सेण्ट्रल विजिलेंस वाले प्रमाणपत्र का दाह-संस्कार कर दीजिये”।

डॉक्टर वाणी नटराजन को जब यह सब पता चला तो वे बुदबुदायीं – “तो आख़िर तुम भी मर गये डॉक्टर ! हमने अपना दीपक माना था तुम्हें, आज वह दीपक भी बुझ गया । अब हम किससे प्रेरणा लेंगे... तुम भी हार कर मुर्दों को रिश्वत दोगे... यह आशा नहीं थी... ।

डॉक्टर दागी को लोग आज भी अस्पताल आते-जाते देखा करते हैं किंतु डॉक्टर वाणी नटराजन को अच्छी तरह पता है कि डॉक्टर दागी अब मर चुका है ।