शुक्रवार, 5 मार्च 2021

फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ क्रिप्टो रिलीजियसनेस...

         - मैंने उसे सदैव श्रद्धा और पाखण्ड के बीच में खड़ा पाया है ।

-      भीड़ के लिये जो साध्य होता है, भीड़नियंत्रक के लिये वह साधन मात्र होता है । इस दर्शन को जिन्ना ने बड़ी शिद्दत से स्वीकार किया था इसलिये आप इसे जिन्ना-दर्शन भी कह सकते हैं । 

-      श्रद्धा हो या पाखण्ड, दोनों का प्रतिपाद्य विषय तो एक ही है ।

-      धर्म और ईश्वर के अस्तित्व में उसका लेश भी विश्वास नहीं होता फिर भी वह धर्म और ईश्वर की बात करता है और इन दोनों विषयों के अस्तित्व को बहुत प्रभावी तरीके से बनाये रखना चाहता है ।

-      “धर्म और ईश्वर जैसे अस्तित्वहीन विषयों के अस्तित्व को बनाये रखना भीड़ पर नियंत्रण और शासन करने के लिये अति आवश्यक है” – यह भीड़नीतिज्ञों का अपना दर्शन है जिसे सत्ताप्रतिस्पर्धी बड़ी श्रद्धा से स्वीकार कर लिया करते हैं ।

-      भीड़ ...जो निर्धन है, भीड़ ...जिसकी प्रमुख आवश्यकता दो जून की रोटी और जीवन की सुरक्षा है, भीड़...जो धर्म और ईश्वर में अपने दुःखों के निवारण का उपाय खोजती है, भीड़ ...जो अस्तित्वहीन में अपने जीवन का अस्तित्व पा लेती है, इस भीड़ का एक अलग ही दर्शन है जिस पर चर्चा तो होती है किंतु स्वीकार कोई नहीं करता ।

-      धर्म और ईश्वर की चर्चा किये बिना किसी का काम नहीं चलता, न उनका जो इनके अस्तित्व में विश्वास रखते हैं और न उनका जो इनके अस्तित्व में लेश भी विश्वास नहीं रखते ।

-      आस्तिक और नास्तिक दोनों जिस बिंदु पर आकर खड़े होते हैं वहाँ भूख और सुरक्षा की नहीं बल्कि धर्म और ईश्वर की चर्चा होती है ।

-      जो आस्तिक हैं वे धर्म और ईश्वर को केवल श्रद्धा से देख पाते हैं और इन्हें अपने सिर-माथे पर रखने का प्रयास करते हैं ।

-      जो नास्तिक हैं वे धर्म और ईश्वर को केवल कुटिल दृष्टि से देख पाते हैं और इन्हें अपनी टेँट में खोंसकर रखना पसंद करते हैं ।

-      भीड़ समझ चुकी है कि उन्हें अपना भाग्यविधाता स्वयं ही बनना होगा, माननीय जी तो पिछली कई सदियों से केवल अपनी ही तिजोरियाँ भरते रहे हैं ।

-      भीड़ के “दुःख” दूर करने के लिये नहीं, चर्चा और योजना बनाने के लिये उपयोग में लाये जाते हैं ।

-      बंजर को उपजाऊ बनाने के स्वप्न दिखाने के लिये बंजर को निरंतर बनाये रखना तुम्हारी सत्ता का मूल सिद्धांत है जिसे यह भीड़ समझ चुकी है ।

-      तुम्हें देखने, सुनने और बोलने की शक्ति मिली पर तुमने इन शक्तियों का कभी सदुपयोग नहीं किया इसलिये भीड़ को पत्थर की मूर्तियों से अपनी बात कहनी पड़ती है ।

-      भीड़ के दुःखों का कोई विध्नहर्ता नहीं होता इसलिए मूर्ति के आगे नतमस्तक होना भीड़ को आत्मशक्ति देता है, और तुमने तो बंगाल की भीड़ से उसका एक मात्र यह अधिकार भी छीन लिया न!  

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

शेयर मार्केट में अभूतपूर्व अफ़रा-तफ़री...

         आज सुबह निर्धारित समय पर ठीक नौ बजे शेयर मार्केट खुला, पंद्रह मिनट के प्री ओपेन सेशन के बाद अभी ट्रेडर्स और इंवेस्टर्स ने अपना कामकाज प्रारम्भ किया ही था कि नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज अचानक दस बजकर सात मिनट पर पक्षाघात का शिकार हो गया । अंततः ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर एक्स्चेंज को बंद किया गया, गोया शेयर मार्केट की बत्ती गुल हो गयी हो । आर्टीफ़िशियल इण्टेलीजेंसी के ज़माने में एक्स्चेंज को यह समझने में ही पूरे एक घण्टे तेंतीस मिनट का समय लग गया कि पूरा एक्स्चेंज पिछले लगभग डेढ़ घण्टे से डीप हाइबरनेशन में जा चुका है । इस बीच ट्रेडर्स और इनवेस्टर्स परेशान रहे और एक्स्चेंज के होश में आने का इंतज़ार करते रहे । पूरा देश यह जानने के लिये बेकरार रहा कि आख़िर एक्स्चेंज को हुआ क्या । पर किसी को कुछ भी पता नहीं चल सका । सारे वैकल्पिक डिवायसेज़ को दिन भर साँप सूँघता रहा और आर्टीफ़िशियल इंटेलीजेंसी सन्यास धारण कर पता नहीं किस कंदरा में जाकर अंतर्धान हो गयी ।

शाम को, मार्केट बंद होने के मात्र आधे घण्टे पहले यानी तीन बजे के लगभग नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज की ओर से पहली सूचना दी गयी कि तीन बजकर पैंतालीस मिनट पर आज का सेशन पुनः प्राम्भ किया जायेगा जो शाम को पाँच बजे तक चलेगा ।

यह भारतीय शेयर मार्केट के लिये एक अभूतपूर्व दिन था जिसे आधुनिक टेक्नोलॉजी ने दिन भर बंधक बनाये रखा और ज़िम्मेदार लोग चादर तानकर सोते रहे । घोर आई.टी. युग में इतनी बड़ी लापरवाही अक्षम्य है, कम से कम देश को यह ख़बर तो दी ही जा सकती थी कि मामला है क्या? तकनीकी गड़बड़ी स्वाभाविक है किंतु तीव्रगति इनफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के युग में इतना गहरा सन्नाटा आक्रोश उत्पन्न करता है । फ़िलहाल हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ज़िम्मेदार लोगों को तनिक सी ज़िम्मेदारी निभाने की भी प्रेरणा प्रदान करे ।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

अनुभूति की स्वतंत्रता...


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बाद अब यह “अनुभूति की स्वतंत्रता” का नया काल प्रारम्भ हो चुका है । मामला है जनाने ज़िस्म में मर्दाने मूड और मर्दाने ज़िस्म में जनाने मूड की अनुभूति का । उम्र है गधा-पचीसी की और संविधान है बिल्कुल ताजा-ताजा जिसकी टर्मिनोलॉज़ी भी अभी तक कुछ लोगों के अतिरिक्त आम लोगों को ठीक से नहीं मालुम ।

जन्म के समय अस्पताल की नर्स ने जिस जवजात को लड़की के रूप में पहचाना था वह आज पंद्रह साल के बाद नहीं चाहती कि उसे लड़की के रूप में सम्बोधित किया जाय । उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ दिया गया सम्बोधन उसे अपमानजनक लग सकता है और ऐसा करना उसके मानवीय अधिकारों का हनन है । आज हमारी नयी पीढ़ी ने अपने परिचय और अपनी नयी-नवेली जीवनशैली के लिये एक नया और अद्भुत संविधान बना लिया है जिसमें तीन, चार या छह प्रकार के लिंग न होकर पूरे बावन प्रकार के लिंग भेद किये गये हैं । धर्म, जाति और लिंग के अनुसार समाज में किसी भेदभाव को अस्वीकार करने वाली नयी क्रांतिकारी पीढ़ी ने अपने लिये बावन प्रकार के लिंग भेद स्वीकार कर लिये हैं, नयी पीढ़ी के चिंतन में यह आश्चर्यजनक विरोधाभास है ।

आज की प्रगतिशील नयी पीढ़ी टीन टाक” (किशोरवार्ता) में ज़ेण्डर प्रोनाउनऔर सेक्स एक्स्प्रेशनपर गम्भीर चिंतन करने लगी है । ये इतने नये शब्द हैं कि इन्हें अभी शब्दकोष में स्थान नहीं मिल सका है । मोतीहारी वाले मिसिर जी निराश होकर कहते हैं कि दुनिया में समस्याओं के अम्बार लगे हैं, मानव सभ्यता विनाश के कगार पर खड़ी है और नयी पीढ़ी ज़ेण्डर प्रोनाउनऔर सेक्स एक्स्प्रेशनजैसे अस्तित्वहीन शब्दों को गढ़ने और उनकी व्याख्या में डूबी हुयी है ।

हर तरह के विभेद का विरोध करने वाली किशोर पीढ़ी ज़ेण्डर आइडेंटिटी और सेक्सुअल ओरिएण्टेशन को अलग-अलग दृष्टि से देखना चाहती है । आज से मात्र तीन दशक पहले तक पर्वर्टेड सेक्सुअल बिहैविअर को भारतीय समाज में वर्ज्य माना जाता था ...इतना वर्ज्य कि लोग इस पर चर्चा भी नहीं करना चाहते थे किंतु अब ऐसा नहीं है । नयी पीढ़ी बड़े गर्व के साथ अपने पर्वर्टेड सेक्सुअल बिहैविअर का परिचय ट्रांस”, “गेया लिस्बियनकहकर देने लगी है । यह एक ऐसी किशोर अपसंस्कृति है जिस पर समाजशास्त्रियों को गम्भीर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है और इसे यूँ ही भाड़ में नहीं जाने दिया जा सकता । 

हमारी सभ्य नयी पीढ़ी नहीं चाहती कि उन्हें उनके उस लिंग से पहचाना जाय जो वे जन्म से अपनी एनाटॉमिकल संरचना के साथ लेकर आये हैं बल्कि वे चाहते हैं कि उन्हें उनके मूड और अनुभूति के अनुसार पहचाना जाय । यह हमारे समाज के एल.जी.बी.टी.क्यू. प्लस क्रांति के अगले चरण का एक हिस्से जैसा प्रतीत होता है । ख़ुलासा यह है कि यदि किसी लड़के का मूड है कि आज उसे लड़की के रूप में जाना व पहचाना जाय किंतु आपने ऐसा नहीं किया तो उसे बहुत बुरा लग सकता है और यह उसके मानवीय अधिकारों और अभिव्यक्ति व अनुभूति की स्वतंत्रता का हनन होगा । यही बात लड़कियों के बारे में भी है । हमारी नितांत ताजी नयी पीढ़ी में एक वर्ग ऐसा भी हो जो अपनी एनाटॉमिकल संरचना (Cisgender) के साथ ही अपनी पहचान बनाये रखना चाहता है, ऐसे लोगों को स्ट्रेटकी संज्ञा दी गयी है और उन्हें दकियानूस व पिछड़ा हुआ माना जाने लगा है । 

टीनेज़र्स कांस्टीट्यूशन ऑफ़ सेक्स एण्ड ज़ेण्डर आइडेंटिटी के अनुसार – “Gender identity is not about someone’s anatomy, it is about who they know them self to be. There are many different gender identities, including male, female, transgender, gender-neutral, non-binary, agender, pangender, genderqueer, two-spirit, cisgender, third gender, gender fluid, and all, none or a combination of these”.

“Gender expression is about how someone acts and presents themselves to world. For example, does someone wear makeup? Do they wear dresses? Do they prefer to only wear pants? Gender expression is not related to someone’s gender or sex but rather about personal behaviors and interests. A cisman may wear nail polish or a trans woman may not like wearing dresses. Sometimes people don’t express their gender in the way they would like to because they don’t feel safe to do so. This is why it’s important to not assume someone’s gender just based how they look, but  rather by checking in with them. Gender expression is also deeply tied to culture”. 

अंग्रेज़ी के शब्दकोष में आपको agender, pangender, genderqueer, two-spirit, cisgender, और gender fluid जैसे गढ़े हुये नये शब्द अभी खोजने से भी नहीं मिल सकेंगे । सोशल मीडिया पर हमारे टींस अपने नाम के साथ अपने लिये सम्बोधित किए जाने वाले Gender pronoun के कोड भी लिख दिया करते हैं, यथा – She/her या him/he या zi/hir या they.   

ज़ेण्डर प्रोनाउनऔर सेक्स एक्स्प्रेशनको लेकर नवनिर्मित टीनेज़र्स संविधान पर गौसगंज वाले गुस्सैल शुक्ल जी की टिप्पणी कुछ इस तरह की है – “भाई साहब! जब गंगा ही मैली हो चुकी है तो समाज कैसे निर्मल रह सकता है ! बर्गर-पिज्जा खाऊ पीढ़ी के सामने आजीविका की कोई समस्या नहीं है, देह अपने ही बोझ से भारी है, दिमाग खाली है, ऊपर से माँबाप ने बच्चों को संटियाना भी बंद कर दिया है और लेफ़्टियाना सिद्धांत इन ना-लायकों के मनोविनोद के लिये कम पड़ने लगे हैं । तो भाईसाहब! बात ये है कि एल.जी.बी.टी. क्यू प्लस की सतरंगी लहर इनके दिमाग में भी घुस गयी है । अब या तो कोरोना को अपना धर्म निभाने दिया जाय या फिर इस सड़ाँध को रोकने के लिये एक और विवेकानंद की प्रतीक्षा की जाय

फ़िलहाल हम इस उधेड़बुन में हैं कि अपने प्रगतिशील और क्रांतिकारी टीन्स को बावन लिंगों वाले इस कूप से बाहर कैसे निकालें ।    


रविवार, 21 फ़रवरी 2021

ज़ेण्डर मूड से होते हुये...

     आज की समसामयिक चर्चा में “ज़ेण्डर मूड” (बिल्कुल ताजी परम्परा), “कटाक्ष में कुलबुलाती गंदी गालियाँ (Binge)”, “तैमूर का दीवाना मीडिया” (किस्मत हो तो तैमूर जैसी वरना ना हो) और “बंगाल गोया एक अलग मुल्क की हुंकार” जैसे विषयों को सम्मिलित किया जाना आवश्यक हो गया है ।

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जैसे छोटे से शहर में किशोर-किशोरियों के मन-मस्तिष्क में छाये ज़ेण्डर मूड के नशे को देखकर मोतीहारी वाले मिसिर जी का चौंकना हम सबके लिये कान खड़े करने वाला है । यह विषय हमारे लिये भी बिल्कुल नया था इसलिये हमने मिसिर जी से ही पूछ लिया  – अब यह ज़ेण्डर प्रोनाउन और सेक्स एक्स्प्रेशन की कौन सी बला ले आये? उत्तर में मिसिर जी ने जो बताया उसने मुझे कुछ क्षणों के लिये चेतनाशून्य सा कर दिया ।

गोरखपुर वाले ज्ञानी पुरुष ओझा जी को भी नहीं पता कि स्त्रीलिंग, पुल्लिंग, नपुंसकलिंग और उभयलिंग के अलावा आजकल और भी बहुत से लिंग होने लगे हैं । हमारी नयी पीढ़ी की “टीन-टाक यूनीवर्सिटी” ने अब तक कुल 52 लिंग खोज निकाले हैं जिन्हें जानकर अर्धनारीश्वर भी चकित हुये बिना नहीं रहेंगे । हम इसके बारे में शीघ्र ही पृथक से चर्चा करना चाहेंगे, फ़िलहाल इतनी ही बात ...कि वाट्स-अप में हमारे सभ्य घरों के सभ्य बच्चे आजकल इस प्रकार से चैट करते हुये देखे जाने लगे हैं – “हाय! प्रिया! आम स्वीटी अ लिस्बियन । योर बॉडी इज़ वेरी अपीलिंग टु मी । आई लाइक यू । आर यू इंट्रेस्टेड टु हैव सेक्स विद मी?”

आगे बढ़ते हैं, कटाक्ष में कुलबुलाती गंदी गालियों की बौछार की ओर । यू-ट्यूब पर बिंज ने कुछ कटाक्ष श्रंखलायें प्रस्तुत की हैं । कटाक्ष होना चाहिये ...किंतु इसके लिये सोशल मीडिया पर इस तरह माँ-बहन की गालियों के बिना काम नहीं चल सकता क्या? आख़िर हम समाज और ख़ुद अपने प्रति भी ज़िम्मेदार कब बनेंगे? रिश्तों पर इस तरह कीचड़ पोतना किस संस्कृति का  प्रतीक है? यह कैसा क्रिटिक है? …और आप बड़े अहंकारपूर्वक स्वयं को प्रगतिवादी और क्रांतिकारी मानते हैं! मुझे ऐसी प्रगति और क्रांति पर शर्म आती है ।

ख़ैर इन्हें भी छोड़िये, ये कभी नहीं सुधरेंगे, आगे बढ़ते हैं, सैफ़ अली ख़ान के घर में एक और चिराग ने धमाकेदार इंट्री ले ली है । भारत का मीडिया नतमस्तक हुआ जा रहा है ...तैमूर का भाई तशरीफ़ लाया है ...गोया मुगल सल्तनत के वारिस ने हिंदुस्तान की सर-ज़मीं पर दस्तक दे दी हो । अब तैमूर के भाई की हर साँसउसकी शूशू ...उसकी जम्हाई ...उसकी आँखें ...उसके मुस्कराने और सोने जैसी और न जाने कैसी-कैसी ख़बरें आये दिन परोसी जाती रहेंगी । करीना कपूर और सैफ अली ख़ान के वारिसों से महत्वपूर्ण भारत में और कुछ भी नहीं है ।

और आज की आख़िरी बात ...जो अभी शुरू ही हुयी है ...कि बंगाल में चुनावी समर का रिहर्सल चालू है । पिछले लगभग दो दशक से ममता बनर्जी भारत में यह संदेश देने में सफल होती रही हैं कि वे भारत से अलग बंगाल की अपनी एक पृथक सत्ता बनाये रखने में अधिक विश्वास करती हैं और इसके लिये वे किसी भी सीमा तक गिर सकती हैं । ख़ून की नदियाँ बहा दूँगी ...ईंट से ईंट बजा दूँगी ...बंगाल की माटी बंगाल का मानुष ... बंगाल में बाहरी मानुष स्वीकार नहीं ...इस तरह की हुंकार हमें राजतंत्र की स्मृति दिलाती है जहाँ राजे-रजवाड़े केवल अपने अहं के लिये एक-दूसरे पर हमले करके ख़ून की नदियाँ बहाते रहे हैं । ओफ़्फ़्फ़्फ़्फ़ ... यह महिला जिसे आप सब दीदी कहते हैं ...वास्तव में उसके लिए हमारे पास कोई सम्बोधन नहीं है । भारत की मुख्यधारा का विरोध करने वालों के लिये हमारे पास कोई सम्मानजनक शब्द हो ही नहीं सकता ।

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

लालकिले पर विद्रोह का झण्डा...

आज पाकिस्तानी टीवी मीडिया को भारत के कुछ लोगों ने ख़ुश होने का मौका परोस दिया जिससे पाकिस्तानी मीडिया ने बड़े उत्साह से राहत की साँस लेते हुये प्रसारित किया“सिख आज रात भारत के लालकिले पर कब्ज़ा कर लेंगे । आज रात दिल्ली में बहुत कुछ होने वाला है”।

इतिहास में दर्ज़ हो गया है कि “बहत्तरवें गणतंत्र दिवस के अवसर पर गुरु गोविंद सिंह जी के आदर्शों की धज्जियाँ उड़ाते हुये राजधानी दिल्ली की सड़कों पर कुछ विद्रोही हिंसा और तोड़-फोड़ करने में सफल हुये” ।

किसान आंदोलन के नाम पर दिल्ली में हुयी हिंसा और पुलिस पर हमले के दुस्साहस के बाद किसान संगठन के मासूम नेताओं ने इस अराजकता के लिये ज़िम्मेदार लोगों से अपना पल्ला झाड़ लिया । पुलिस के सिपाहियों पर लाठियों, डण्डों और लोहे की रॉड्स से हमला किया गया और उन्हें ट्रैक्टर से कुचलने का प्रयास किया गया । प्रदर्शनकारियों की भीड़ लाल किले में बलात घुसने में सफल हो गयी, इतने बड़े देश की पुलिस कुछ नहीं कर सकी, उन्हें डर था कि कहीं दंगा और न भड़क जाय । कुछ विद्रोहियों को तलवारें लहराते हुये भी देखा गया । कुछ निहंगों के हाथ में दोधार वाली तलवारें देखी गयीं । टीवी रिपोर्टर्स के साथ मारपीट की गयी । मीडिया को दंगाइयों से भयभीत होना पड़ा और गुरुगोविंद सिंह के आदर्शों और उद्देश्यों का अपमान किया गया ।

दिल्ली पुलिस को विद्रोह के डर से विद्रोहियों के सामने झुकना पड़ा । कल कोई चंगेज़ ख़ान अपने बीस सैनिकों के साथ आयेगा और दिल्ली पुलिस को डरते हुये उसके सामने भी झुकना पड़ेगा ।

किसान अंदोलन के बीच-बीच में जब प्रदर्शन के दौरान ख़ालिस्तान के झण्डे देखे गये और ख़ालिस्तान ज़िंदाबाद के नारे सुने गये तो किसान नेता मासूम बन गये थे – “हमें तो ऐसी कोई जानकारी नहीं है, सरकार हमें बदनाम कर रही है”। अवसरवादी राजनीतिज्ञों ने भी सरकार पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिये कि “सरकार जानबूझकर अपने विरोधियों को खालिस्तानी, चीनी और पाकिस्तानी कह कर बदनाम कर रही है । यह तो मोदी की पुरानी आदत है”।

अब गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली की सड़कों पर हिंसा होने और विद्रोहियों द्वारा कुछ समय के लिये लाल किले पर कब्ज़ा कर लेने के बाद अवसरवादी नेताओं के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय को भी भारत की आमजनता के सवालों का ज़वाब देना होगा । जनता जानना चाहती है कि गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड में हस्तक्षेप करने से मना करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के जज साहब को किसानों पर भरोसा था या फिर जज साहब में दूरदर्शिता की कमी ?

किसान नेता अपने आंदोलन को हाईजैक होने से बचाने में असफल रहे हैं । किसान नेताओं को तुरंत ग़िरफ़्तार करने के लिये क्या अभी भी किसी पर्याप्त कारण की कमी है?

बुधवार, 20 जनवरी 2021

तांडव ओवर द टॉप...

एक्टर शहज़ाद ख़ान कहते हैं कि वे पैसे के लिये एक्ट करते और डायलॉग बोलते हैं इसलिये किसी ताण्डव से होने वाले विध्वंस से उनका कोई लेना देना नहीं है । अर्थात विध्वंस का सारा दोष पटकथा लेखक और निर्देशक का होता है । वे धमकी वाले अंदाज़ में बारम्बार यह कहना भी नहीं भूलते कि माँग तो ली माफ़ी अब क्या फाँसी चढ़ाओगे ।  

हम इसे एक बेहद ग़ुस्ताख़ी भरी मासूमियत मानते हैं ।

चलो माना कि पटकथा लेखक, निर्देशक, कलाकार, सिनेमेटोग़्राफ़र और स्पॉट ब्वाय ....सभी ने माफ़ी माँग ली । क्या किसी ने यह वादा भी किया कि भविष्य में अब कभी ऐसा दुस्साहस नहीं किया जायेगा ?

माना कि आपके घर की तरह हमारा घर भी पुराना और टूटा-फूटा है, किंतु जिस तरह आप हमारे घर का मज़ाक उड़ाते रहे हैं उसी तरह अपने भी घर का मज़ाक उड़ाने का साहस कर सकेंगे कभी ?

माना कि आप सुधारवादी हैं और सोशल एण्ड रिलीज़ियस रीफ़ॉर्मेशन के लिये हमें थप्पड़ पर थप्पड़ मारना अपना सोशल दायित्व मानते हैं किंतु क्या इसी तरह आप अपने आप को भी थप्पड़ मारने के बारे में कभी सोच पाते हैं ?

आख़िर हर बार सारे निशाने आप हमारे ऊपर ही क्यों साधते हैं ?

ये वे प्रश्न हैं जिन्हें सत्तर साल बाद नींद से उठकर आँखे मलते हुये एक वर्ग के लोग दूसरे वर्ग से पूछते हैं । यहाँ यह बता दें कि भारत की भीड़ ने हमें इतनी आज़ादी नहीं दी है कि हम वर्ग न लिखकर सीधे-सीधे वर्ग का नाम लिख सकें । हमें इतनी आज़ादी नहीं है कि हम हमारे ऊपर थप्पड़ बरसाने वाले का नाम साफ-साफ बता सकें ।

ख़ैर! सत्तर साल बाद अब जो सवाल हम उछालने लगे हैं उनका उत्तर बहुत आलस भरा है । पहले उत्तर सुन लीजिये – कनक कुम्भ रीतो धरो, ता पै इतनी ऐंठ । काग बसे विष्टा करे, बस कागा की ही पैठ ॥

वे ग़ुलाब के काँटे दिखाकर गुलाब को बदनाम करते रहे और गुलाब अपनी कोमल पंखुड़ियों के गर्व में चुपचाप बदनाम होते रहे ।

ऐसा गर्व किस काम का ?

वे रणभूमि में न जाने कबसे वार पर वार किये जा रहे हैं और हम सिर्फ़ रो-रोकर कोहराम मचाये जा रहे हैं । वे रौद्र ताण्डव ही कर रहे, हम लास्य ताण्डव भी नहीं कर रहे, फिर पराभव की इतनी पीड़ा क्यों ?

क्या हमारे घर में एक भी ऐसा पटकथा लेखक नहीं जो अमृतपूरित कनककुम्भ की पटकथा लिख सके ? क्या हमारे घर में एक भी ऐसा निर्देशक नहीं जो गुलाब की पंखुड़ियों का स्पर्श कर सके ? क्या हमारे घर में एक भी ऐसा कलाकार नहीं जो लास्य तांडव कर सके ?

अब समय नहीं कि हम दूसरों को दोष दें, हमें कर्मभूमि में उतरना होगा । रौद्रताण्डव के उत्तर में लास्यताण्डव करना होगा । यही हमारी आर्ष परम्परा है । यही हमारे अस्तित्व की रक्षा का उपाय है ।   

समुद्र जैसा ऊपर से दिखायी देता है वैसा ही अंदर भी नहीं हुआ करता, उसके अंदर जल-प्रवाह की एक और अंतरधारा होती है... एक सशक्त जलधारा जो किसी को दिखायी नहीं देती । हम जैसे ऊपर से दिखायी देते हैं वैसे ही अंदर भी नहीं हुआ करते, हमारे अंदर बहुत कुछ घटित हो रहा होता है जो ऊपर से किसी को दिखायी नहीं देता । हमें अपने अंदर देखना होगा । हमें स्वयं को देखना होगा ।  

रविवार, 27 दिसंबर 2020

फिसल रहा है किसान आंदोलन...

यह त्रासदीपूर्ण सच है कि कृषि उत्पादों का न्यायसंगत लाभ किसानों को नहीं मिल पाता । यह सच आज़ादी के पहले का भी है और आज़ादी के बाद का भी । ब्रिटिश इण्डिया में किसानों पर लादी गयी नील और कपास की खेती ने भी भारतीयों को आंदोलन के लिये विवश किया था । स्वतंत्र भारत में भी किसानों को समय-समय पर आंदोलन के लिये विवश होते रहना पड़ा है । वर्ष 2020 के अंतिम माह में एक बार फिर पञ्जाब और हरियाणा के किसानों ने दिल्ली की ओर कूच किया और नये कृषिसुधार कानूनों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया । किसी भी आंदोलन को प्रारम्भ करना मुश्किल होता है, उससे भी अधिक मुश्किल होता है प्रारम्भ किये गये आंदोलन को किसी और की झोली में जाने से बचा पाना । यह ठीक किसी भी स्वतंत्रतासंग्राम के लिये किये गये आंदोलन की तरह होता है जहाँ क्रांति कोई और करता है, सत्ता का प्रसाद कोई और ले जाता है ।

भारत के किसान आंदोलनों में अगले कई सालों तक याद किया जाता रहेगा 2020 का किसान आंदोलन । हमारे सामने प्रस्तुत किये गये वर्तमान परिदृश्य के अनुसार परिश्रम से कभी हार न मानने वाले पञ्जाब और हरियाणा के किसान ग़रीब हैं और कृषि सुधार कानूनों के विरुद्ध दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत हैं । किसान आंदोलन में और भी कई लोगों ने प्रवेश पाने में सफलता पा ली है जो प्रधानमंत्री के मरने और ख़ालिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे हैं । टीवी पर वक्तव्य देने वाले कई तथाकथित किसान नेताओं द्वारा अपमानजनक शब्दों से प्रधानमंत्री का विरोध किया जा रहा है, उन्हें झूठा और किसानों का हत्यारा कहा जा रहा है । भारत के आम आदमी ने चौंककर देखा कि किसान आंदोलन डीविएट होकर एक राजनैतिक आंदोलन का रूप लेने लगा है । आंदोलन की पवित्रता और मूल उद्देश्यों को बचा पाना आंदोलनकारियों के लिये एक बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है ।

किसान आंदोलन में कई संस्थाओं द्वारा आंदोलनकारियों के जीवन को सहज और अरामदायक बनाने के लिये अत्याधुनिक संसाधन उपलब्ध करवाये गये हैं । ये कौन लोग हैं जो ग़रीब किसानों के लिये धन की वर्षा किये दे रहे हैं ?

हम आपको तीस साल पीछे ले चलते हैं । यह कानपुर की आलू मण्डी है जहाँ आढतियों का एकछत्र साम्राज्य है । कई जिलों के किसान ट्रकों में अपना आलू लेकर यहाँ आते रहे हैं और आढ़तिये उनकी आवभगत करते रहे हैं । यहाँ ग़रीब किसानों को रिझाने के लिये कई चीजें हैं, मसलन सुबह-सुबह मलाई वाली चाय, नाश्ते में खोये की मिठाइयाँ, होटल में भोजन की व्यवस्था, रात में सोने के लिये आरामदायक व्यवस्था, और इस सबसे बढ़कर मीठी-मीठी बोली । मौसम के तेवरों को झेलने के अभ्यस्त किसान को आलू मण्डी में ससुराल का सा आभास होने लगता है और सम्मोहित किसान इन चंद दुर्लभ क्षणों को भरपूर जी लेना चाहता है । इस बीच आढ़तिये व्यापारियों से सौदा करते हैं, मोल-भाव करते हैं, किसान का माल तौलवाते हैं, आलू के कुल भार में से आलू में लगी मिट्टी का औसत भार घटा कर व्यापारी से कीमत लेते हैं और फिर किसान से हिसाब-किताब करते हैं । किसान को विदा करने का समय समीप आता है तो आढ़तिये उसे बिल थमाते हैं जिसमें आलू की कीमत में से बारदाना और तौलाई के मूल्य से लेकर धर्मादा खाता के लिये दानराशि और किसान को उपलब्ध करवायी गयी सभी सेवाओं का बाजार मूल्य काट कर शेष राशि उसे बड़े प्यार से थमा दिया करते हैं ।

मण्डी में आलू का मूल्य मिलने से पहले ही किसान एक ख़रीददार बन जाता है ...कई सुविधाओं का । किसान की उपज का मूल्य घर में आने से पहले ही निर्मम मण्डी के तौर तरीकों की भेंट चढ़ने लगता है जो व्यापार का एक सोलह आने कठोरता वाला दस्तूर है ।

कानपुर के आसपास के कई जिलों के किसान वर्षों से आलू की खेती करते रहे हैं, कभी नफ़ा तो कभी नुकसान को झेलते रहे हैं और माँग करते रहे हैं कि उनके क्षेत्र में आलू से स्टार्च और अल्कोहल बनाने की फ़ैक्ट्रीज़ स्थापित की जाएँ जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके । इन किसानों में सैफई के किसान भी हैं और कन्नौज के किसान भी जहाँ डॉक्टर राममनोहर लोहिया के सिद्धांतों पर राजनीति करने वाले किसान हितैषी नेताओं की सरकार लम्बे समय तक राज करती रही है ।    

आंदोलन से पहले किसान को अपनी समस्याओं के मूल स्वरूप को पहचाना होगा और फिसलकर राजनीतिज्ञों के चंगुल में जाने से स्वयं को बचाना होगा ।