"भूत" अंधविश्वास है, "वर्तमान" सत्य है, आने वाला कल मेरा ही बनाया हुआ "भविष्य" होगा।
जहाँ मैं खड़ा हूँ धरती वहीं से प्रारंभ होती है। "इस्लाम से पहले कुछ नहीं था", फिर "बुद्ध से पहले कुछ नहीं था", अब "मूलनिवासी से पहले कुछ नहीं था"। ऊँच-नीच और बलपूर्वक वर्चस्व की यह मौलिक प्रवृत्ति है जो सदा रही है, सदा रहेगी, भले ही अधिक संतुलन के साथ रहे। समाज और सत्ता को इस प्रवृत्ति के अधीन रहने की बाध्यता होती है।सत्ता और समाज में विभिन्न स्तरों पर बढ़ता असंतुलन आत्मावलोकन की आवश्यकता का संकेत है। हम सब सभी स्तरों पर सब कुछ असंतुलित करने में लगे रहते हैं, प्रकृति उसे संतुलित करने का प्रयास करती रहती है। संतुलन और असंतुलन की यह एक सतत प्रक्रिया है likewise wearing and tearing then again wearing phenomenon in all the living tissues.
जो स्वयं को हिंदू नहीं. प्रकृति पूजक मानते हैं वे भी प्रकृति को कहीं न कहीं असंतुलित ही कर रहे हैं, यह सब पहले भी होता रहा है पर अब यह असंतुलन कैंसर में रूपांतरित होने लगा है। मूलनिवासी और विदेशी जैसे निराधार विवाद अब विघटन से विभाजन की दिशा में बढ़ चले हैं। जातीय नरसंहार किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, यदि आप सबल हैं तो निर्बल को धरती का एक टुकड़ा दे दीजिए, पहले भी ऐसा हो चुका है। यद्यपि इन विभाजनों के परिणाम कितने सफल रहे हैं यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार की वर्तमान स्थितियों से स्पष्ट है।
यदि अभी भी इस बढ़ते असंतुलन की चिकित्सा न की गयी तो हम सिंधुघाटी सभ्यता के अवसान की पुनरावृत्ति करेंगे।
सत्तायें कभी भी दीर्घकाल तक लोककल्याणकारी नहीं रह पाती अन्यथा न कभी रामराज्य का अंत होता और न विक्रमादित्य की न्यायव्यवस्था का।
जब राजा अपने धर्म और कर्तव्य से विमुख होता है तब प्रजा के दायित्व प्रधान और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। दुर्भाग्य से शताब्दियों की पराधीनता के बाद भी प्रजा अपने दायित्वों को समझ नहीं पा रही है। तब की पराधीनता और आज की स्वतंत्रता में केवल नाम में अंतर है, सत्ताव्यवस्था में सैद्धांतिक समानता वही है। प्रजा यदि अभी भी अपने दायित्वों को स्वीकार करने और निभाने में सक्षम नहीं होती तो प्रकृति ऐसे समाज का अंत कर नवनिर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी।