सोमवार, 10 सितंबर 2018

पत्रकारिता का महानायक - सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन से ...


शासकीय सेवाओं में सम्मान की तलाश...

सुप्र यानी सुरेंद्र प्रपात सिंह का विश्वास है कि जातिगत आधार पर शासकीय सेवाओं में दिये जाने वाले आरक्षण से उनके सम्मान की तलाश पूरी होती है । हम इसका अर्थ यह भी निकाल सकते हैं कि उनके लिये शासकीय सेवा का उद्देश्य लोकहित में गुणवत्तापूर्ण भागीदारी नहीं बल्कि व्यक्तिगत सम्मान भर पाना है ।

सुरेंद्र प्रताप सिंह को पत्रकारिता का महानायक माना जाता है । नवभारत टाइम्स आदि समाचार पत्रों में समय-समय पर प्रकाशित उनके सम्पादकीय लेखों का संकलन किया है आर. अनुराधा ने और पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है राजकमल प्रकाशन ने ।

पुस्तक को सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, राजनीति-कांग्रेस, राजनीति-तीसरा मोर्चा, राजनीति-भाजपा, चुनाव-राजनीति, कश्मीर-समस्या समाधान, राजकाज-भ्रष्टाचार, अर्थनीति, समाज-संस्कृति, पत्रकारिता और परिशिष्ट में वर्गीकृत कर सजाया गया है । परिशिष्ट में फ़िल्म पारके चुनिंदा संवादों के अतिरिक्त गणेश जी के दूध पीने और उपहार सिनेमा अग्निकाण्ड पर टीवी रिपोर्टिंग के कुछ अंशों का समावेश किया गया है ।

मुझे लगता है कि सप्र जी के आलेखों पर गम्भीर विमर्श की आवश्यकता है । मैं धीरे-धीरे उनके आलेखों पर अपने विचार रखने का प्रयास करूँगा ।

पुस्तक के सामाजिक न्याय खण्ड का पहला लेख है मुद्दा नौकरी नहीं सम्मान हैजिसमें सुप्र आरक्षण के प्रबल समर्थन में खड़े दिखायी देते हैं । वे “समाज में बराबरी का अधिकार पाने के लिए” शासकीय सेवाओं में जातिगत आरक्षण हेतु कई शताब्दियाँ भी कम ही मानते हैं । उनके अनुसार, इस सम्बंध में वे विमर्श तो चाहते थे किंतु इसके लिये उन्हें मित्रवत वातावरण का अभाव नज़र आया । सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के लिये वे ऐतिहासिक और आनुवंशिक कारणों को उत्तरदायी मानते हैं साथ ही अनारक्षित वर्ग द्वारा आरक्षण के विरोध में दिये गये किसी भी तर्क को स्वीकार करने के लिये वे तैयार भी नहीं होते । वे मानते हैं कि हिंदू समाज में शोषण और दमन का जो व्यवस्थित चक्र हजारों साल से जाति व्यवस्था को आधार बनाकर चलाया जाता रहा है उसे एक बार उल्टा चलाए बिना जाति व्यवस्था को समाप्त कर पाना छलावा ही होगा । सप्र जी जातीय पिछडेपन को सवर्णों की साज़िश मानते हैं जो शोषित वर्ग के जायज अधिकारों को हड़पना चाहते हैं । उनके अनुसार आरक्षण का विरोध करने वाले फासीवादी होते हैं जिन्हें तर्क और न्याय से चिढ़ होती है ।  
सात दशकों में आरक्षण से हुये सामाजिक परिवर्तनों की वास्तविकता को देख चुकने के बाद भारतीय समाज को उसका निष्पक्ष गुणात्मक विश्लेषण करना चाहिए । हमें यह सत्य स्वीकार करना होगा कि शासकीय सेवाओं में आरक्षण का उद्देश्य यदि वर्ग विशेष का विकास करना है तो यह सिर्फ़ उतने कुनबे का ही मात्र आर्थिक विकास भर होगा, समग्र समाज और देश का सर्वाङ्गीण विकास नहीं । क्योंकि कोई भी शासकीय सेवा पूरे समाज के लिये होती है न कि केवल एक परिवार के लिये ! यही कारण है कि पिछले सात दशकों के बाद भी लोगों का पिछड़ापन दूर नहीं हो सका है । आरक्षण का व्यक्तिगत लाभ केवल कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गया है ।

सुप्र जैसे पत्रकार शासकीय सेवाओं में भी वर्गों के प्रतिनिधित्व की बात करते हैं तो आश्चर्य होता है ।

प्रतिनिधित्व की आवश्यकता समाज को वर्गों में बांटती है । विभिन्न वर्गों के राजनीति में प्रतिनिधित्व की तरह ही शासकीय सेवाओं में भी प्रतिनिधित्व की बात को आश्चर्यजनक रूप से मौलिक अधिकार माना जाने लगा जबकि दोनों की प्रकृति अलग है और उद्देश्य भी । सुप्र को लगता है कि आरक्षित वर्गों की तरह ही पिछड़े वर्गों को भी शासकीय सेवाओं में अपने वर्गीय प्रतिनिधित्व के लिये आरक्षण मिलना चाहिये । किंतु शासकीय सेवाओं में किसी भी वर्ग के आरक्षण की माँग को विवेकसम्मत नहीं माना जा सकता । प्रतिनिधित्व एक सांख्यिकीय हठ है जिसका गुणात्मकता से कोई सम्बंध नहीं होता । और बात जब गुणात्मकता की हो तो कोई समझौता क्यों किया जाना चाहिये ? खोये की मिठायी में नीबू-मिर्च के प्रतिनिधित्व की और भिण्डी की सब्जी में दूध के प्रतिनिधित्व की माँग कितनी व्यावहारिक और वैज्ञानिक हो सकती है इस पर पूरे समाज को चिंतन करने की आवश्यकता है ।
हम यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि जिसे वैज्ञानिक कार्यों में रुचि नहीं है उसे इस कार्य में प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाना चाहिये ? जो क्रिकेट नहीं खेल सकता उसे क्रिकेट में प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाना चाहिये ? जो शिक्षा के लिए सुपात्र नहीं है उसे शिक्षा में प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाना चाहिये ? लोग यह क्यों नहीं समझना चाहते कि गुणात्मक दक्षता के प्रतिनिधित्व के लिये आरक्षण एक अतार्किक, अवैज्ञानिक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था है जो उसके वास्तविक पात्रों के नैसर्गिक अधिकारों के बलात् अपहरण का षड्यंत्र है ।
सप्र ने अपने आलेख में चार बातें बलपूर्वक कहने का प्रयास किया है – 1-सामाजिक बराबरी के लिये जातीय आधार पर आरक्षण जायज अधिकारहै, 2- जातीय दृष्टि से पिछड़े लोगों के जायज अधिकारों को हड़पना सवर्णों की साजिश है, 3- आरक्षण का विरोध करने वाले फासीवादी होते हैं जिन्हें तर्क और न्याय से चिढ़ होती है, 4- दक्षिण अफ़्रीका के गोरे (नस्लीय शोषण की) अपनी सड़ी व्यवस्था तर्कों के सहारे लागू रखना चाहते हैं ।  
शोषण और दमन के लिये सवर्णों को उत्तरदायी ठहराते समय सप्र जी यह नहीं बताते कि जाति विशेष के लोग पिछड़े क्यों ? वे कब पिछड़ गए ? पिछड़े होने से पहले समाज में उनकी स्थिति क्या थी ? पिछड़ेपन के मापदण्ड क्या हैं ? क्या शोषण का उलटा चक्र चलाने से शोषण पर सदा के लिये विराम लग सकेगा ? क्या शोषण के अनवरत चक्र को सभ्य समाज का प्रतीक माना जाना चाहिए ?
हमारे देश के विद्वान जब भी आरक्षण को अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए तर्क प्रस्तुत करते हैं तो वे शोषण और पिछड़ेपन के मूल कारणों के इतिहास की पूरी तरह उपेक्षा सी करते हुये प्रतीत होते हैं । उनके पास एक ही रटा रटाया तर्क होता है कि इस सबका कारण सवर्णों का जातिगत विद्वेष रहा है । वे इस बात पर भी कोई चिंतन प्रायः नहीं करना चाहते कि प्राचीन भारतीय समाज की समाज व्यवस्था के उत्कर्ष और उसके पराभव के वास्तविक कारण क्या रहे ?

शनिवार, 8 सितंबर 2018

मंथन


कौन करे
किसका अभिनंदन
कुल गर्दभ के करते मंथन ।
बस ! यही तेरा एक इष्ट !
शेष
केवल अनिष्ट, केवल अनिष्ट !

चिंतनशून्य हुए जब-जब तुम
तर्कशून्य हुए तब-तब तुम   
रीति उपेक्षित
सागर मंथन की  
नहीं वासुकी नहीं मंदराचल
चहुँ ओर व्याप्त तुमुल कोलाहल
हो रहा क्रंदन ही क्रंदन ।
हैं सूने सारे देवालय  
प्रज्वलित नहीं कहीं कोई दीप
तिमिर गहन में
पथ विहीन तू
चला जा रहा किधर बता तो !   

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

पहचान


यहूदी देश... इस्लामिक देश... ईसाई देश...
कहाँ है हिंदू देश ?
इज़्रेल अत्याधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों और उपलब्धियों वाला देश है किंतु यह भी पर्याप्त नहीं लगा उसे । आख़िर अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों की पहचान के अतिरिक्त उसे एक और पहचान... धार्मिक पहचान की ज़रूरत क्यों पड़ी ? और क्यों उसे अपनी राष्ट्रीय राजधानी तेल अबीब से यरूशलम ले जाने का निर्णय करना पड़ा जिसका तुरंत ही अमेरिका द्वारा समर्थन भी कर दिया गया ?
हम इस विषय पर चिंतन करेंगे किंतु इससे पहले इज़्रेल की उस आंतरिक स्थिति पर भी चर्चा करना आवश्यक है जिसमें 47 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों ने संसद में इसका विरोध किया । यूँ 53 प्रतिशत बहुमत के आधार पर ज़्यूस नेशन बिल को गणितीय मज़बूती के साथ पारित कर दिया गया । यह अंतर बहुत अधिक नहीं है, दूसरे 47 प्रतिशत मतों को यूँ ही कूड़ेदान में नहीं फेका जा सकता । ज़ाहिर है कि आने वाले दिनों में इज़्रेल की 20 प्रतिशत अरबी मुस्लिम जनता अपनी धार्मिक और भाषायी पहचान को स्थापित करने के लिए संघर्ष करेगी । यहाँ यह स्पष्ट करना प्रासंगिक है कि अरबी अब इज़्रेल की आधिकारिक भाषा नहीं रही, इसका स्थान अब हिब्रू ने ले लिया है । वर्षों से अपनी धार्मिक और भाषायी पहचान स्थापित करने के संघर्ष में एक ओर जहाँ यहूदियों को सफलता मिली है वहीं अरबों को उनकी धार्मिक और भाषायी पहचान के खोने का दुःख उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करेगा ।
किंतु वास्तव में मामला न तो धर्म का है और न भाषा का । असली मामला तो है प्राकृतिक और औद्योगिक संसाधनों पर अपने-अपने वर्चस्व की सियासत का । चारों ओर अरब देशों से घिरे इज़्रेल को शह देने वाले अमेरिका के अपने स्वार्थ हैं जो हमेशा की तरह किसी भी मामले में घी डालने का काम करते हैं ।
हमें भारत के संदर्भ में इस पूरी घटना को देखने की आवश्यकता है । भारत में मुसलमानों के लिये उनके धर्मगुरुओं द्वारा शरीया कानून की माँग करना एक देश के भीतर दो तरह की व्यवस्थाओं की स्थापना की माँग करना है जिसके दूरगामी परिणाम कैसे हो सकते हैं इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । यह सब तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश के भीतर आइसिस और पाकिस्तान के झण्डों को लहराने की बढ़ती घटनाओं के साथ तिरंगे को जलाने और भारत के हजार टुकड़े करने की कसमें खाए जाने की घटनायें अनियंत्रित होती जा रही हों, जब कश्मीर में दशकों से दहकती आग रोज-ब-रोज भड़कती जा रही हो, जब पूर्वांचल के अल्पसंख्यक हिंदुओं को बहुसंख्यक और बहुसंख्यक ज़मात के लोगों को अल्पसंख्यक माने जाने के अज़ीब गणित को सुधारने की चिंता किसी को न होती हो... ।
अंत में हमेशा की तरह यह फिर कहना चाहूँगा कि वास्तव में धर्म का दृष्टव्य और प्रभावी स्वरूप सियासत में ही देखने को मिलता है जिसका एकमात्र उद्देश्य लोगों में असुरक्षा का भय उत्पन्न कर अपनी हुक़ूमत स्थापित करना रहा है ।         

बुधवार, 11 जुलाई 2018

पर्यटन और पर्यावरण



प से पर्यटन, प से पर्यावरण । एक से मोहब्बत, दूसरे से बेहद नफ़रत । हम भारतीय इसका पूरा पालन करते हैं... कैसे ? देखिये एक शब्द चित्र ...

स्थान - मुंशियारी का खलिया टॉप, समय अपरान्ह चार बजे के आसपास । पर्यटन के बुरी तरह दीवाने भारतीयों के छोटे-बड़े कई समूह खलिया टॉप पर विचरण करते हुये, प्राकृतिक सौंदर्य को पी लेने की काव्यात्मक अनुभूति से सर्वथा शून्य चीखते हुये, बड़े गर्व से मित्रों को दिखाने के लिये फ़ोटो खीचते हुये, चिप्स और कुरकुरे चबाते हुये .....बेहद व्यस्तता का आलम...
युवक ने पाउच में से चिप्स का अंतिम टुकड़ा निकालकर लड़की के मुँह में ट्रांसफर कर दिया, खाली पाउच वहीं फेक दिया । लड़की ने अपने बैग में से कोक की दो केन निकालीं, एक ख़ुद अपने मुँह से चिपकायी, दूसरी युवक की ओर बढ़ा दी ।

वे खाऊँ-चबाऊँ शैली की अंग्रेज़ी में किसी हिन्दी फ़िल्म की अंग्रेज़ी फ़िल्म से तुलनात्मक खाल उधेड़ते हुये धीरे-धीरे कोक पीते रहे । कोक ख़त्म हुआ तो प्रतियोगिता की बारी आयी ...खाली केन को फेकने की प्रतियोगिता । अत्यंत हर्षित मनोभावना के साथ दोनों ने अपनी-अपनी कोक की खाली केन फेकी ....लड़की की केन ज़्यादा दूर तक गयी किंतु लुढ़कते-लुढ़कते एक झाड़ी से टकराकर उसके आगोश में समा गयी । लड़की हर्ष से चीखी ,,,गोया फीफा वर्ल्ड कप जीत लिया हो । युवक की केन थोड़ी पीछे रह गयी थी लेकिन लुढ़कते हुये लड़की की केन से कुछ और आगे निकल कर कहीं अदृश्य हो गयी । इस बार ध्वनि प्रदूषण करने की बारी युवक की थी ...वह एक विस्फोटक ध्वनि के साथ किकिआया । लड़की को बुरा लगा, वह हारना नहीं चाहती थी । लड़की ने पानी की खाली बोतल फेंकी, युवक के लिये यह एक अनुकरणीय धर्म था, उसने भी अपने थैले से पानी की खाली बोतल निकालकर फेकी । । लड़की की बोतल पीछे रह गयी, वह दौड़ती हुयी गयी और अपनी बोतल को पाद प्रहार से गति प्रदान की । युवक चीखा ...बेइमानी है ....।
लड़की प्रफुल्लित थी ...उसके लिये परिणाम महत्वपूर्ण था ...माध्यम या संसाधन नहीं । उसने चीखते युवक के मुँह को हाथ से दबाने का प्रयास किया ...युवक ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन स्वीकार करते हुये लड़की से गुत्थम-गुत्था होने का निर्णय कर लिया ।

आगे का दृश्य अन्य पर्यटकों के लिये एक श्रेष्ठ मनोरंजन प्रमाणित हुआ और मुंशियारी के खलिया टॉप की धरती मैदान से आये इस प्रेमी युगल की हरकतों से धन्य हो गयी ।

रविवार, 8 जुलाई 2018

सत्ता दर्पण


1-  
सिकंदर महान
मोहम्मद बिन क़ासिम महान  
अकबर महान का बाप बाबर महान .......
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शातिर व्यापारी महान
.........................
तड़प रहे थे
भारत की जनता के कल्याण के लिये
अपने वतन से दूर
डालकर अपनी जान ज़ोख़िम में ?

ताकत की चाटुकारिता
करती रही है महिमा मण्डित 
कातिलों, लुटेरों और ज़ाहिलों को
इतिहास में होता रहा है यशोगान
ख़ुश होते रहे हैं लोग
कहते हुये उन्हें "वीर" और "महान" ।
हम आज भी रहते हैं लालायित
कर देने को न्योछावर
अपना सबकुछ
कुछ संगठित गुण्डों को ।

न जाने कितनी बार बहती रही हैं
ख़ून की नदियाँ
लूटे जाते रहे हैं हम
होते रहे हैं क्रूर बलात्कार
जलायी जाती रही हैं फसलें
विषाक्त किये जाते रहे हैं जलस्रोत
महान योद्धाओं द्वारा
और तुम कहते हो कि होता रहा है यह सब
प्रजा के कल्याण के लिए ?

हम आज भी हैं मुग़ालते में
कि आते हैं हुक़ूमत के भूखे
करने
हमारा उद्धार
और
होने ही वाली है वारिश
सुखों और न्याय की ।

2-  
सत्ता सुंदरी
रोज करती है एक शादी
किसी न किसी नये पाखण्ड से ।
आभामण्डल हो न जाय धूमिल
उनकी न्यायप्रियता के पाखण्ड का
इसलिये
पहनाते रहते हैं वे
कानून का
एक-एक कर नया ज़ामा
अपने शातिर इरादों को ।

प्रजा को
अपना-अपना सिला जामा
पहनाने की प्रतिस्पर्धा में
मशगूल हैं
दक्षिण भी... वाम भी ... ।
यह क्रूर तमाशा
और कब तक देखते रहेंगे हम ?

3-  
कभी नहीं लिखा गया
सच्चा इतिहास
कि होती रही है जंग
मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही
पिण्डारियों और मोहम्मद-बिन-क़ासिम के बीच ।
होते रहे हैं खेत
वे लोग
जो
न पिण्डारी हैं
और न मोहम्मद-बिन-क़ासिम ।
जंग में शामिल
दोनों पक्ष हैं ज़ाहिल
एक-दूसरे की परिभाषाओं में
और हम
लगाते रहे हैं प्लास्टर
बड़ी कुशलता से
हिग्स बोसॉन के सपनों का
अपने-अपने पक्षकार की परिभाषाओं में,
बनाते रहे हैं उन्हें
महान  
होते रहे हैं ख़ुश
देखकर उन्हें
पहनते हुये राजमुकुट ।

4-  
उफ़्फ़....
यह साधु भी
रावण ही निकला
उठा ले गया
इस बार फिर
सीता को .......
........................
और देख रहे हैं हम
चुराते हुये काजल
रावण को, हमारी आँखों से ।