मंगलवार, 12 मई 2026

ग्लानिर्भवति भारत

हमने विश्वास किया 

उस पर

स्वयं से भी अधिक
और सम्मोहित हो
देखते रहे वही
उतना ही
जो 
और जितना
दिखाता रहा वह ।
हम नहीं देख सके वह सत्य
जो वह छिपाता रहा सबसे
यह चमत्कार ही था
काला जादू सा
कि हम देख पाते हैं
केवल वही
और केवल उतना ही
जो 
और जितना
दिखाना चाहता है वह
सामने खड़ी
सम्मोहित भीड़ को।
फिर एक दिन अनायास
एक तीव्र चक्रवात ने
रख दिया उधेड़ कर
और दिखा दिया वह भी
जो नहीं देख सके हम
अपनी खुली आँखों से कभी।
वह प्रवंचक
संत का वेश धर
पल-पल करता रहा सीताहरण
और अब
जबकि लुट चुकी हैं
सभी सीतायें
उसने उलट दी है
हमारी झोली
जिसे लेकर
इतने वर्षों से
वह दिखाता रहा था काला जादू
लूटता रहा था हम सबको
दिखा-दिखा कर कूट चमत्कार
लुटाता रहा था रेवड़ियाँ
शत्रुओं को हमारे
छीनकर हमसे ।
आज उसने फिर फेका है जाल
कि फिर बचायें हम 
बहुत सा धन
काटें
अपना पेट और तन
कि वह फिर लुटा सके रेवड़ियाँ
हमारे शत्रुओं को।

रविवार, 3 मई 2026

हो रहा शत्रुबोध

तुम "प्रतिभा" को

"सामान्य" कहते हो
क्या सचमुच
प्रतिभा "विशिष्ट" नहीं होती?
तुम जिन्हें विशिष्ट मानते हो
उन्हें आरक्षण देते हो
क्योंकि
तुम जानते हो
उनमें प्रतिभा होती
तो यह शिथिलता नहीं होती
तब
तुम उन्हें भी नष्ट करने के
षड्यंत्र करते।
तुम्हारा शत्रु
न अगड़ा है, न पिछड़ा
न दलित, न कोई और
केवल वह है
जिसमें प्रतिभा है
मैं इसे
संज्ञाओं से बलात्कार कहता हूँ
अर्थ को अनर्थ
और अनर्थ को अर्थ करने का
षड्यंत्र कहता हूँ।
तुम इसी तरह
सदा से नष्ट करते रहे हो प्रतिभायें
मूर्खों को दास बनाने
और प्रतिभाओं को
कुंठित करने के लिए,
तुम हत्यारे हो
प्रतिभाओं के ही नहीं
मानवता के भी।
तुम
कभी गोरे अंग्रेज होते हो
कभी काले अंग्रेज होते हो
वास्तव में
तुम मानवता के
सबसे बड़े शत्रु होते हो। ।

शनिवार, 2 मई 2026

ब्राह्मण की बेटी

दिन

मजदूर दिवस
वर्ष 
दो हजार छब्बीस।
पुणे का नसरापुर गाँव
गाँव का प्यासा भीमाजी कांबले
एक ब्राह्मण बच्ची
आयुषी कुलकर्णी
आई थी ननिहाल
एक दलित
एक ब्राह्मण
दलित ने देखे पैंसठ वसंत
बच्ची ने चार
बच्ची को नहीं पता वसंत
दलित को पता
वसंत में कैसे करते हैं पतझड़।
बच्ची के पूर्वज
आये थे यूरेशिया से
ऐसा लोग कहते हैं।
भीमाजी के पूर्वज
मूलनिवासी
ऐसा लोग मानते हैं।
सत्य
कितने लोग जानते हैं!

दो-

सरकार कहती है
नेता कहते हैं
इस देश के संसाधनों पर
पहला अधिकार
दलितों का
अर्थात
उपभोग के लिए
धरती उनकी, विधान उनका
देश उनका, न्याय उनका
सरकार उनकी
और
नन्हीं सी बच्ची भी उनकी
इसलिए
मूलनिवासी ने किया
यूरेशियन बच्ची से यौनदुष्कर्म
फिर पीटा, पत्थर से कुचला
फिर गाड़ दिया
गोबर के ढेर में।

तीन-

सम्राट ने
अदला-बदली कर दी है
संज्ञाओं की
एक अच्छे समाधान के लिए
अब
कुकर्म को पुण्य कहना
हत्या को मोक्ष कहना
अपराध को न्याय कहना
पीड़ित को उत्पीड़क कहना
सच्चा समाधान है
दलित हितकारी है।
इस नव्य न्याय के अनुसार
पीड़ित वह बच्ची नहीं
वह दलित वृद्ध है
और उत्पीड़क वह वृद्ध नहीं
वह बच्ची है
अतः
गोबर के ढेर में से
निकालकर बच्ची का शव
कड़े से कड़ा दंड दो
दलित को
भारतरत्न दो
और लिपिबद्ध करो
इतिहास की नन्हीं सी
एक बूँद यह भी
कि दलित प्यासे हैं
पिछले पाँच हजार सालों से।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

भगवान

वह सृजित करता है 

जातियाँ ही नहीं, 

पाप

पुण्य 

और भगवान भी। 

वह 

समुच्चय है 

सभी शक्तिमानों की शक्तियों का

अवतारी है

स्वयं भी

बात करता है ईश्वर से

बात के निपात से 

सबको अचंभित करता है। 

उसके राज्य में 

जो भी सच बोलता है

वह 

उसे मार कर खा जाता है। 

वह चढ़ता है

सीढ़ियों पर रखकर अपने चरण

कुचलकर दमन करते हुए 

हर उपभोग की जा चुकी सीढ़ी का।

वह पिछड़े से दलित हो गया 

बनते-बनते विश्वगुरु 

नहीं बन सका विश्वगुरु 

पर बन गया

अवतारी भगवान

भगवान की जय हो!

जो नहीं बोलेगा जय 

वह मारा जाएगा

साक्षात काल के हाथों

इसलिए

भगवान की बार-बार जय हो!

रविवार, 19 अप्रैल 2026

संविधान संशोधन

वज्जीसंघ की अट्टकुलीय राजधानी वैशाली में राजपुत्रों के हठ पर एक विधान पारित हुआ- आठों राज्यों में जो भी होगी अनिंद्य सुंदरी कन्या वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे नगर की वधू होकर "नगरवधू" कहलाएगी। 

मातृहीना ब्राह्मण कन्या आम्रपाली को उसके पिता ने पूरे नगर की दृष्टि से छिपाने के यथासंभव प्रयास किए पर वह अनिंद्य सुंदरी थी, ख्याति प्रकाशित हुई और अंततः राजपुत्रों ने उसका अपहरण कर लिया।
मगध में राजकुल की कुदृष्टि ने एक ब्राह्मण कन्या को समारोहपूर्वक नगरवधू बना ही लिया।
फिर एक दिन आम्रपाली के देखते ही देखते वज्जीसंघ बिखर गया। 
औपनिवेशिक पराधीनता के बाद भारत में एक बार पुनः लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य स्थापित हुआ, आयु है लगभग आठ दशक मात्र। एक बार पुनः भारत के नये राजा ने ब्राह्मणों को जन्म लेते ही अपराधी घोषित कर दिया है। तब वज्जीसंघ का पराभव हुआ, अब इस राजा की बारी है।
नये सम्राट संविधान में परिवर्तन (संशोधन नहीं) करके
सदन में स्त्रियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे, पर वज्जीसंघ के आठ राजाओं के राजपुत्रों की तरह भाग्यशाली नहीं निकले, संविधान में अतार्किक और अव्यावहारिक परिवर्तन नहीं कर सके। सम्राट तो सदन में स्त्रियों की संख्या नहीं बढ़ा सकेगा, किंतु वैशाली की नगरवधू भारत को  पुनर्जन्म देने के लिए तैयार हो चुकी है।
अभी, जब स्त्री सांसद उनकी दृष्टि में पर्याप्त नहीं हैं तब भी तो सदन चल नहीं पाता, सदस्य संख्या बढ़ने से...
सांसदों में तलवारें अवश्य चलेंगी।
तलवारें चलेंगी तो वज्जीसंघ का उपसंहार हो जाएगा। फिर कोई राजपुत्र किसी ब्राह्मण की अनिंद्य सुंदरी कन्या को नगरवधू बनाने का बिल पारित करने का हठ नहीं करेगा। हम मगध के नये जन्म का स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

वंचितx१०टु द पाॅवर पाँच लाख

अठारहवीं शताब्दी के तीसरे दशक में

सिंधिया राजवंश के संस्थापक
राणोजीराव सिंधिया को
नहीं था पता
कि बीसवीं शताब्दी में
जब जातीय वर्गीकरण करेगा
कोई राजा
वह चिन्हित करेगा
सिंधिया के वंशजों को
पिछड़ा।
महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया
हो गये हैं अब
वंचित, पीड़ित शोषित
और पिछड़ा।
ना...ना...
भगवान ने नहीं
किसी ब्राह्मण ने नहीं
किसी पंडित ने नहीं,
एक अति पिछड़े सम्राट ने
जो कुछ वर्ष पहले ही बना था
पिछड़ा,
फिर एक दिन अचानक
बन गया अति पिछड़ा भी
उसी ने...
उसी सम्राट ने बना दिया
महाराजा राणोजीराव सिंधिया के
राजवंश को
पिछड़ा।

किसी को नहीं पता
कब कोई राजा बना देगा
किसी को भी दलित या अगड़ा
पिछड़ा या अति पिछड़ा
या कुछ और ...
यथा,
अति-अति पिछड़ा
या नितांत गड़बड़ा
या धरती का
"सर्वाधिक वंचित
इन टु टेन टु द पाॅवर पाँच लाख...
साल से प्यासा" ।

राजा घोषित करता है
पहले स्वयं को अछूत
फिर किसी को भी अछूत
और थोप देता है
अपने सारे अपराध
ब्राह्मणों पर
कोसते हुये उनके पूर्वजों को
और देते हुये दंड
उनके वंशजों को,
सदा से
यही तो होता आया है
अन्यथा आप ही बताइए
किस पंडित ने
कब बनाई थीं
जातियाँ
और उनके वर्गीकरण?

संकल्प

'गंगा-यमुना' भी मेरी

'कूभा' भी मेरी
रणजीत-दाहिर की
धरती भी मेरी।
टुकड़े-टुकड़े भी गिनने को
अब ना बचेंगे
सदी आठवीं से जो सहते रहे हैं।
'गंगा-जमुनी है तहज़ीब'
रटते रहे जो
वार छल से वही
हम पे करते रहे हैं।

नवासों के नवासों को भी शरण दी
अपने घर हम तभी से
गँवाते रहे हैं।
चाहते 'शांति' हम
'जंग' पर वो अड़े हैं।
'भाईचारे' के धोखे में
क्यों सब पड़े हैं!
"सर तन से जुदा" भी
वो कर रहे पर
गुणसूत्र उनमें
खोजते हम रहे हैं।
देश लुटता रहा
देखते सब रहे हैं
झूठे गीतों में हम सब
भरमते रहे हैं।
हम गुणसूत्र अपने
उधर खोजते हैं
वो गुणसूत्र अपने 
हमें दे रहे हैं।
उनकी तहज़ीब में
रेत की आँधियाँ
गंगा-यमुना पे आँखें
गड़ाये रहे हैं।
ये बेचते सदा
स्वाभिमान सबका
कलंकित धर्म-वेद करते रहे हैं।
अब ना हम रुकेंगे
ना कुछ सहेंगे
प्राण अर्पित भी करने पड़े तो करेंगे।