रविवार, 3 मई 2026

हो रहा शत्रुबोध

तुम "प्रतिभा" को

"सामान्य" कहते हो
क्या सचमुच
प्रतिभा "विशिष्ट" नहीं होती?
तुम जिन्हें विशिष्ट मानते हो
उन्हें आरक्षण देते हो
क्योंकि
तुम जानते हो
उनमें प्रतिभा होती
तो यह शिथिलता नहीं होती
तब
तुम उन्हें भी नष्ट करने के
षड्यंत्र करते।
तुम्हारा शत्रु
न अगड़ा है, न पिछड़ा
न दलित, न कोई और
केवल वह है
जिसमें प्रतिभा है
मैं इसे
संज्ञाओं से बलात्कार कहता हूँ
अर्थ को अनर्थ
और अनर्थ को अर्थ करने का
षड्यंत्र कहता हूँ।
तुम इसी तरह
सदा से नष्ट करते रहे हो प्रतिभायें
मूर्खों को दास बनाने
और प्रतिभाओं को
कुंठित करने के लिए,
तुम हत्यारे हो
प्रतिभाओं के ही नहीं
मानवता के भी।
तुम
कभी गोरे अंग्रेज होते हो
कभी काले अंग्रेज होते हो
वास्तव में
तुम मानवता के
सबसे बड़े शत्रु होते हो। ।

शनिवार, 2 मई 2026

ब्राह्मण की बेटी

दिन

मजदूर दिवस
वर्ष 
दो हजार छब्बीस।
पुणे का नसरापुर गाँव
गाँव का प्यासा भीमाजी कांबले
एक ब्राह्मण बच्ची
आयुषी कुलकर्णी
आई थी ननिहाल
एक दलित
एक ब्राह्मण
दलित ने देखे पैंसठ वसंत
बच्ची ने चार
बच्ची को नहीं पता वसंत
दलित को पता
वसंत में कैसे करते हैं पतझड़।
बच्ची के पूर्वज
आये थे यूरेशिया से
ऐसा लोग कहते हैं।
भीमाजी के पूर्वज
मूलनिवासी
ऐसा लोग मानते हैं।
सत्य
कितने लोग जानते हैं!

दो-

सरकार कहती है
नेता कहते हैं
इस देश के संसाधनों पर
पहला अधिकार
दलितों का
अर्थात
उपभोग के लिए
धरती उनकी, विधान उनका
देश उनका, न्याय उनका
सरकार उनकी
और
नन्हीं सी बच्ची भी उनकी
इसलिए
मूलनिवासी ने किया
यूरेशियन बच्ची से यौनदुष्कर्म
फिर पीटा, पत्थर से कुचला
फिर गाड़ दिया
गोबर के ढेर में।

तीन-

सम्राट ने
अदला-बदली कर दी है
संज्ञाओं की
एक अच्छे समाधान के लिए
अब
कुकर्म को पुण्य कहना
हत्या को मोक्ष कहना
अपराध को न्याय कहना
पीड़ित को उत्पीड़क कहना
सच्चा समाधान है
दलित हितकारी है।
इस नव्य न्याय के अनुसार
पीड़ित वह बच्ची नहीं
वह दलित वृद्ध है
और उत्पीड़क वह वृद्ध नहीं
वह बच्ची है
अतः
गोबर के ढेर में से
निकालकर बच्ची का शव
कड़े से कड़ा दंड दो
दलित को
भारतरत्न दो
और लिपिबद्ध करो
इतिहास की नन्हीं सी
एक बूँद यह भी
कि दलित प्यासे हैं
पिछले पाँच हजार सालों से।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

भगवान

वह सृजित करता है 

जातियाँ ही नहीं, 

पाप

पुण्य 

और भगवान भी। 

वह 

समुच्चय है 

सभी शक्तिमानों की शक्तियों का

अवतारी है

स्वयं भी

बात करता है ईश्वर से

बात के निपात से 

सबको अचंभित करता है। 

उसके राज्य में 

जो भी सच बोलता है

वह 

उसे मार कर खा जाता है। 

वह चढ़ता है

सीढ़ियों पर रखकर अपने चरण

कुचलकर दमन करते हुए 

हर उपभोग की जा चुकी सीढ़ी का।

वह पिछड़े से दलित हो गया 

बनते-बनते विश्वगुरु 

नहीं बन सका विश्वगुरु 

पर बन गया

अवतारी भगवान

भगवान की जय हो!

जो नहीं बोलेगा जय 

वह मारा जाएगा

साक्षात काल के हाथों

इसलिए

भगवान की बार-बार जय हो!

रविवार, 19 अप्रैल 2026

संविधान संशोधन

वज्जीसंघ की अट्टकुलीय राजधानी वैशाली में राजपुत्रों के हठ पर एक विधान पारित हुआ- आठों राज्यों में जो भी होगी अनिंद्य सुंदरी कन्या वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे नगर की वधू होकर "नगरवधू" कहलाएगी। 

मातृहीना ब्राह्मण कन्या आम्रपाली को उसके पिता ने पूरे नगर की दृष्टि से छिपाने के यथासंभव प्रयास किए पर वह अनिंद्य सुंदरी थी, ख्याति प्रकाशित हुई और अंततः राजपुत्रों ने उसका अपहरण कर लिया।
मगध में राजकुल की कुदृष्टि ने एक ब्राह्मण कन्या को समारोहपूर्वक नगरवधू बना ही लिया।
फिर एक दिन आम्रपाली के देखते ही देखते वज्जीसंघ बिखर गया। 
औपनिवेशिक पराधीनता के बाद भारत में एक बार पुनः लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य स्थापित हुआ, आयु है लगभग आठ दशक मात्र। एक बार पुनः भारत के नये राजा ने ब्राह्मणों को जन्म लेते ही अपराधी घोषित कर दिया है। तब वज्जीसंघ का पराभव हुआ, अब इस राजा की बारी है।
नये सम्राट संविधान में परिवर्तन (संशोधन नहीं) करके
सदन में स्त्रियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे, पर वज्जीसंघ के आठ राजाओं के राजपुत्रों की तरह भाग्यशाली नहीं निकले, संविधान में अतार्किक और अव्यावहारिक परिवर्तन नहीं कर सके। सम्राट तो सदन में स्त्रियों की संख्या नहीं बढ़ा सकेगा, किंतु वैशाली की नगरवधू भारत को  पुनर्जन्म देने के लिए तैयार हो चुकी है।
अभी, जब स्त्री सांसद उनकी दृष्टि में पर्याप्त नहीं हैं तब भी तो सदन चल नहीं पाता, सदस्य संख्या बढ़ने से...
सांसदों में तलवारें अवश्य चलेंगी।
तलवारें चलेंगी तो वज्जीसंघ का उपसंहार हो जाएगा। फिर कोई राजपुत्र किसी ब्राह्मण की अनिंद्य सुंदरी कन्या को नगरवधू बनाने का बिल पारित करने का हठ नहीं करेगा। हम मगध के नये जन्म का स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

वंचितx१०टु द पाॅवर पाँच लाख

अठारहवीं शताब्दी के तीसरे दशक में

सिंधिया राजवंश के संस्थापक
राणोजीराव सिंधिया को
नहीं था पता
कि बीसवीं शताब्दी में
जब जातीय वर्गीकरण करेगा
कोई राजा
वह चिन्हित करेगा
सिंधिया के वंशजों को
पिछड़ा।
महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया
हो गये हैं अब
वंचित, पीड़ित शोषित
और पिछड़ा।
ना...ना...
भगवान ने नहीं
किसी ब्राह्मण ने नहीं
किसी पंडित ने नहीं,
एक अति पिछड़े सम्राट ने
जो कुछ वर्ष पहले ही बना था
पिछड़ा,
फिर एक दिन अचानक
बन गया अति पिछड़ा भी
उसी ने...
उसी सम्राट ने बना दिया
महाराजा राणोजीराव सिंधिया के
राजवंश को
पिछड़ा।

किसी को नहीं पता
कब कोई राजा बना देगा
किसी को भी दलित या अगड़ा
पिछड़ा या अति पिछड़ा
या कुछ और ...
यथा,
अति-अति पिछड़ा
या नितांत गड़बड़ा
या धरती का
"सर्वाधिक वंचित
इन टु टेन टु द पाॅवर पाँच लाख...
साल से प्यासा" ।

राजा घोषित करता है
पहले स्वयं को अछूत
फिर किसी को भी अछूत
और थोप देता है
अपने सारे अपराध
ब्राह्मणों पर
कोसते हुये उनके पूर्वजों को
और देते हुये दंड
उनके वंशजों को,
सदा से
यही तो होता आया है
अन्यथा आप ही बताइए
किस पंडित ने
कब बनाई थीं
जातियाँ
और उनके वर्गीकरण?

संकल्प

'गंगा-यमुना' भी मेरी

'कूभा' भी मेरी
रणजीत-दाहिर की
धरती भी मेरी।
टुकड़े-टुकड़े भी गिनने को
अब ना बचेंगे
सदी आठवीं से जो सहते रहे हैं।
'गंगा-जमुनी है तहज़ीब'
रटते रहे जो
वार छल से वही
हम पे करते रहे हैं।

नवासों के नवासों को भी शरण दी
अपने घर हम तभी से
गँवाते रहे हैं।
चाहते 'शांति' हम
'जंग' पर वो अड़े हैं।
'भाईचारे' के धोखे में
क्यों सब पड़े हैं!
"सर तन से जुदा" भी
वो कर रहे पर
गुणसूत्र उनमें
खोजते हम रहे हैं।
देश लुटता रहा
देखते सब रहे हैं
झूठे गीतों में हम सब
भरमते रहे हैं।
हम गुणसूत्र अपने
उधर खोजते हैं
वो गुणसूत्र अपने 
हमें दे रहे हैं।
उनकी तहज़ीब में
रेत की आँधियाँ
गंगा-यमुना पे आँखें
गड़ाये रहे हैं।
ये बेचते सदा
स्वाभिमान सबका
कलंकित धर्म-वेद करते रहे हैं।
अब ना हम रुकेंगे
ना कुछ सहेंगे
प्राण अर्पित भी करने पड़े तो करेंगे।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

यह रथ खड़ा क्यों है!

आरक्षण से समानता का हठ, किंवा कृष्णपक्ष की रात्रि में सूर्योदव का आश्वासन!

शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से लेकर शासकीय सेवाओं में पदोन्नति तक आरक्षण, चुनाव पात्रता में जाति के अनुसार जातीयआरक्षण और फिर लिङ्ग के आधार पर लैङ्गिकआरक्षण, पेट्रोल पंप आवंटन में आरक्षण...; और उनका सिद्धांत है कि आरक्षण से ही समाज में समानता ला पाना संभव है।

कोई अतिविद्वान आरक्षण शब्द का विश्लेषण नहीं करता, जो इसके लपेटे में हैं वे भी नहीं।
जैसे ही हमारे सामने सजा-धजा आरक्षण शब्द प्रस्तुत किया जाता है, सबसे पहले जो चित्र उभरता है वह है पात्रता के मानदण्डों में अनैतिक शिथिलता, दूसरा है इससे प्रभावित किसी सुपात्र की अन्यायपूर्ण उपेक्षा, तीसरा है परिणामों में गुणात्मक अपेक्षा का अभाव, चौथा है किसी सुपात्र की प्रतिभा से समाज और देश को वंचित करने का हठपूर्ण अपराध, और पाँचवा है किसी सुपात्र को कुंठा की कालकोठरी में एक अनपेक्षित जीवन जीने के लिए बाध्य कर देना।
'आरक्षण' की अवधारणा सामाजिक विषमता के सिद्धांत पर आरुढ़ होकर राजसिंहासन का पथ प्रशस्त करती है। यह एक से छीनकर दूसरे को उपकृत करने की अनैतिकता को समाज पर थोपने का षड्यंत्र है। यह लोकतंत्र का विधिसम्मत बना दिया गया परिहास है।  यह एक ऐसा विधान है जो अविधिक और अलोकतांत्रिक है। यह उठकर दौड़ सकने की संभावनाओं की निर्मम हत्या है। यह संभावनाओं को अपंग बनाने का षड्यंत्र है।
आरक्षण एक ऐसा चक्रविहीन रथ है जो कभी गति नहीं कर सका इसलिए पिछले लगभग आठ दशकों से एक ही स्थान पर खड़ा है, और अब तो तुम्हारी ही प्रेरणा से जिसने खड़े रहने को ही अपना मौलिक अधिकार मान लिया है।
किसी व्यक्ति में उसकी नैसर्गिक सक्रियता की संभावनाओं को निष्क्रियता में ढालने का यह हठ समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को अपंग बना रहा है। आठ दशकों से आरक्षण का रथ आज भी वहीं खड़ा है।
ब्रिटिश शासकों की तरह तुम भी कुटीर उद्योगों और शिल्पों के स्वैच्छिक चयन को जातीय कुप्रथा कहकर निंदा करते रहे और परंपरा से प्राप्त दक्षता-प्रवीणता को समाप्त करने के लिए जातीय ढाँचों का निर्माण करते रहे। तुम जातियों का विरोध करके भी जातियाँ बनाते रहे, जातियों के वर्ग और उपवर्ग बनाते रहे, फिर उन सबको भी कभी इधर कभी उधर करते रहे। यह सब न तो प्रकृति के संविधान के अनुरूप है और न किसी ब्राह्मण के धर्मपथ के अनुरूप। तुम्हें यह अच्छी तरह बोध है कि यह सब अनुचित है और इतिहास कभी तुम्हें क्षमा नहीं करेगा इसीलिए महान बनने की महत्वाकांक्षा में तुम षड्यंत्रपूर्वक अपने कुकर्मों के लिए ब्राह्मणों पर दोषारोपण की ब्रिटिश चाल चलते रहे।
ब्राह्मण तो सदा की तरह आज भी जातीय विषमता को स्वीकार नहीं करता। और तुम जातिप्रथा का विरोध करते-करते न केवल जातियाँ बनाते रहे अपितु उनमें घृणा के बीज भी बोते रहे। यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर विदेशी औपनिवेशिक शासकों की परंपरा को ही आगे बढ़ाते हुए तुम्हारा सुनियोजित आक्रमण है जिसके लिए इतिहास में तुम्हारा अभिलेखांकन किया जा चुका है।