जब आप "सवर्ण" कहते हैं तो एक और विभाजनकारी समूह का अप्रत्यक्ष संकेत देते हैं। अर्थात कुछ सवर्ण हैं तो कुछ अवर्ण भी होंगे ही। यह ध्वनित है, जिसे धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र कहा जाना उचित होगा।
सवर्ण शब्द दिया ही क्यों, यह कहाँ से आया? चलिए, इस शब्द की बायोप्सी करते हैं। सवर्ण का अर्थ निकलता है वर्ण सहित। वर्ण चार हैं, अर्थात सवर्ण में चारो वर्ण हैं, तीन नहीं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रादि चतुर्वर्ण के बाद सनातन परंपरा/human physiology /व्यावहारिक दृष्टि से पाँचवा कोई वर्ण नहीं होता, हो ही नहीं सकता जैसा कि भारतीय समाज के विभाजन (सामान्य या सवर्ण अर्थात ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्य), पिछडा़, एससी, एसटी, दलित, अतिदलित, महादलित) के उद्देश्य से अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक और कुत्सित प्रयास किया गया है। किसने किया यह विभाजनकारी नया वर्गीकरण?
सनातन परंपरा में तो चारों वर्ण समाहित हैं इसलिये जब हम सवर्ण कहते हैं तो उसमें चारो वर्ण हैं। वास्तव में सवर्ण शब्द ही अवैज्ञानिक और विभाजनकारी है, अर्थात ये लोग सवर्ण के बाद अवर्ण का संकेत दे रहे हैं जिसमें शूद्रों का समावेश किया गया है, वह भी कई और विभाजनों के साथ। यह सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर कुछ लोगों का आसुरी आक्रमण है।
आश्चर्यजनक रूप से संत समाज भी इस विषय पर मौन है। क्या यह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के साथ आसुरी बलात्कार नहीं!
