मंगलवार, 13 नवंबर 2018

सबरमलय



नवम्बर 2018 की एक सुबह उत्कल प्रांत के रायगढ़ा नगर की एक गली में मेरी भेंट होती है नागेंद्र साय से । रायगढ़ा में काले परिधान और माथे पर चंदन का लेप लगाये कई लोगों को आते-जाते देखा तो मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं सका । मैं एक छोटी सी दुकान में पहुँचता हूँ जहाँ काले कपड़े पहने नागेंद्र साय ने अभी-अभी अपनी दुकान खोली है । बातचीत हुयी तो उन्होंने बताया कि वे कन्नी (पहली बार अनुष्ठान करने वाले) हैं और अय्यप्पा स्वामी की पूजा के लिए 41 दिनों का अनुष्ठान (मण्डलम्) कर रहे हैं । इस अनुष्ठान के बाद वे सह्याद्रि पर्वतमाला के एक हिस्से में स्थित सबरीमाला (सबरमलय) के मंदिर में अय्यप्पा स्वामी के दर्शन करने जायेंगे । यहाँ वर्ष भर चलने वाली सामान्य पूजा को कुमकुम पूजा, वैशाख में होने वाली को विषुपूजा, माघ में होने वाली को मण्डलपूजा और मकर संक्रांति के दिन होने वाली पूजा को मकरविलक्कु पूजा कहते हैं ।

नागेंद्र साय 
पिछले कुछ दिनों से अक्षर से प्रारम्भ होने वाले सबरीमाला, स्वामी अय्यप्पा, स्त्री प्रवेश और सुप्रीम कोर्ट जैसे शब्द बहुत अधिक चर्चा में रहे हैं । मैंने तुरंत सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बारे में कन्नी स्वामी की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कहा – “सबका अपना-अपना विचार है, दस से पचास आयु वर्ग की महिलाओं को यदि लगता है कि अय्यप्पा स्वामी के नियम को भंग करना उचित है तो यह उनका व्यक्तिगत मत है । मंदिर तो हर किसी के लिए खुला है, कोई भी जा सकता है किंतु मंदिर की आस्था के विषय पर लोगों को विचार करना चाहिये । मंदिर में प्रवेश करना और आस्था के साथ प्रवेश करना, दोनों अलग-अलग विषय हैं । पूजा के लिए प्रवेश करना है तो आस्था अनिवार्य है । आस्था के अभाव में केवल प्रवेश करने के हठ को पूरा किया जा सकता है किंतु तब पूजा की विधि और उद्देश्य कुछ भी पूरे नहीं हो सकेंगे । किसी भी देवस्थल में हठ, अहंकार, विद्रोह और नियमभंग जैसे विकारों का कोई स्थान नहीं होता । अय्यप्पा स्वामी ब्रह्मचारी हैं और पूजा के लिए सात्विक अनुष्ठान का विधान करते हैं”।
नागेंद्र साय ने अधिक जानकारी के लिए बाहर निकलकर आवाज़ दी – “गुरु स्वामी....”
गुरु स्वामी एक युवक हैं जो पिछले कई वर्षों से अय्यप्पा स्वामी के लिए अनुष्ठान करते आ रहे हैं । नागेंद्र जी उन्हीं की देखरेख में अपना अनुष्ठान कर रहे हैं ।
मैंने अपना प्रश्न गुरुस्वामी के सामने भी रखा । उन्होंने भी बिना किसी उत्तेजना के अपनी प्रतिक्रिया दी – “मंदिर के अपने नियम हैं, भक्तों को सोचना चाहिए कि वे नियम का पालन करें या नहीं, नियम भंग करने से उन्हें क्या उपलब्ध होगा! निषेध स्त्रियों का नहीं बल्कि केवल एक निश्चित आयु वर्ग की स्त्रियों का है । इसलिए सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के हठ पर सर्वाधिक चिंतन तो प्रवेशार्थी स्त्रियों को ही करना चाहिए”।
सबरीमाला के अय्यप्पा स्वामी की पूजा एक कठिन साधना (मण्डलम्) के साथ प्रतिवर्ष कार्तिक मास के कुछ दिन पहले से प्रारम्भ हो जाती है । पहली बार साधना करने वाले को कन्नी स्वामी कहा जाता है जिन्हें 41, 61 या 108 दिन तक पूरी तरह सात्विक जीवन व्यतीत कर स्वयं को सबरीमाला मंदिर में स्वामी अय्यप्पा के समक्ष प्रस्तुत होने के लिए पात्रता प्राप्त करनी होती है । यह एक कठिन अनुष्ठान है जिसमें पत्नी एवं घर की सभी स्त्रियों का योगदान भी समान होता है । यह सात्विक जीवन जीने का एक अभ्यास है जिससे सात्विकता के मानदण्ड स्थिर बने रहते हैं । गुरुस्वामी ने बताया कि साधक एक कच्चे नारियल में छेद कर उसके पानी को निकालकर उसे घी से भर कर पूजा सामग्री (नैवेद्य आदि) के साथ पोट्टली (इरामुडी) में रखकर मंदिर जाता है । नारियल फोड़ने पर यदि जमा हुआ घी नारियल के आकार का प्राप्त होता है तो इसे शुभता का प्रतीक माना जाता है ।
और मजे की बात यह है कि अय्यप्पा स्वामी के मंदिर के पास एरुमेल्लि में वावर का एक मक़बरा भी है जिसके दर्शन के बिना स्वामी अय्यप्पा की पूजा पूरी नहीं मानी जाती ।

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नॉटनल वाले नीलाभ श्रीवास्तव अंतर्जाल पर लाए हैं ई.पुस्तकालय । इस पुस्तकालय में वार्षिक शुल्क के आधार पर मनचाही पुस्तकें पढ़ी जा सकेंगी । अब पहले की तरह हर पुस्तक के लिए अलग-अलग शुल्क नहीं देना होगा यानी बारम्बार पेमेंट का झंझट समाप्त ।

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शनिवार, 10 नवंबर 2018

उपहार



प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते समय सुरसती को एक दिन यह पता चला कि उसका जन्म छोटी जाति में हुआ है और इसीलिए उसे कुछ ऐसी सुविधाओं की पात्रता है जिनके लिए उसी विद्यालय में पढ़ने वाले ऊँची जाति के लोगों को नहीं है । सुविधाओं का यह उपहार विश्वविद्यालयीन शिक्षा और उसके बाद के जीवन में भी निरंतर बना रहा । उपहार बरसते रहे, सुरसती की झोली भरती रही । उसके साथ के अन्य लोग जो पढ़ने में बहुत अच्छे हुआ करते थे, अपनी खाली झोली के साथ धीरे-धीरे पिछड़ते चले गए और वह आगे निकलती चली गई । जैसे-जैसे उसे विशिष्ट सुविधाओं के उपहार मिलते रहे वैसे-वैसे वह ऊँची जाति के लोगों की दृष्टि में हेय से हेय होती चली गयी । तभी एक दिन उसके घर में पादरी का आगमन हुआ । उसने एक आयातित प्रभु और उसके सु-समाचार को सामाजिक सम्मान पाने का एकमात्र उपाय बताया । पादरी अगले दिन भी आया... और उसके अगले दिन भी ....। पादरी अब हर रविवार को आने लगा, सुरसती के घर में सपनों की वारिश होती रही । घर के लोगों को लगा कि यदि वे पादरी की बात मान कर प्रभु यीशु की शरण में चले जाएं तो उन्हें सामाजिक हेय दृष्टि से मुक्ति मिल जाएगी और वे भी प्रतिष्ठित नागरिक बन जायेंगे ।
सुरसती के घर में पुराने और जीर्ण-शीर्ण हो चुके भारत का स्थान एक नया परदेश लेता जा रहा था । भारत की पुरानी तस्वीर धुंधली होने लगी, येरुशलम की नयी विदेशी तस्वीर निखरने लगी । सब कुछ बेहद आकर्षक और दिव्य सा लगने लगा था ।   
फिर एक दिन सुरसती का परिवार प्रभु यीशु की शरण में चला गया । सुरसती अब सेराफ़िना जॉन हो गयी, परिवार के सब लोगों ने अपनी परम्परागत देहाती बोली का परित्याग कर दिया, अब वे सभी लोग अंग्रेज़ी मिश्रित खड़ी बोली बोलने लगे थे । उनके नाश्ते में बेकरी वाली ब्रेड और अण्डा सम्मिलित हो गया, शराब भी अब पहले से अधिक पवित्र लगने लगी थी । उनकी नवीन आस्था उन्हें भारत की धरती से दूर येरुशलम की कल्पना में ले गयी, अब उन्हें योरोपीय देश आकर्षक ही नहीं अपने भी लगने लगे थे । आस्था के साथ-साथ धीरे-धीरे पहनावा, तौरतरीके, भोजन, परम्परायें ...सब कुछ बदलता चला गया । पैर छूना और नमस्कार करना अब उन्हें दकियानूसी लगने लगा था, हाथ मिलाकर अभिवादन करना या फिर गाल में गाल स्पर्श कर चुम्बन करना अधिक गरिमामयी लगने लगा था । उन लोगों को अपने राष्ट्रीय पूर्वजों को स्मृत करने की अपेक्षा प्रभु यीशु और मदर मेरी मरियम को स्मृत करना अधिक अच्छा लगने लगा । चर्च में उन्हें अपने ही जैसे लोगों से सम्मान तो मिला ही, ऊँची जाति के लोगों जैसी श्रेष्ठता का आभास भी होने लगा । भारत के भीतर एक नया इण्डिया आकार लेने लगा था जिसे ऊँची जाति के लोगों की उपेक्षा के बाद भी बढ़ने से रोका नहीं जा सकता था ।  
भारत का एक बहुत छोटा सा हिस्सा अब सुदूर येरुशलम से जुड़ चुका था । सुरसती उर्फ़ सेराफ़िना जॉन अपने साथ पढ़ने वाले ऊँची जाति के लोगों से बहुत दूर जा चुकी थी । विद्यालय में खींची गयी विभेदक रेखा ने वर्गभेद की खाइयों को और भी गहरा कर दिया था । सरकार इन खाइयों को पाटने का वादा करती रही, खाइयाँ और भी गहरी होती चली गयीं । दो पहाड़ों के बीच बनने वाली खायी कभी पहाड़ बन सकी है भला!  

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

संविधान


रुक जाएं,
नदियों से कह दो
बहने से पहले
संविधान बन जाने दो ।
उगे नहीं,
सूरज से कह दो
उगने से पहले
संविधान बन जाने दो ।
संविधान से श्रेष्ठ नहीं
कोई नियामक सत्ता
अणुओं, ग्रहपिण्डों, नक्षत्रों से कह दो
भौतिक धर्म निभाने से पहले
संविधान बन जाने दो ।
भारत का इतिहास स्मरण करने से पहले
अपने पूर्वजों को सम्मानित करने से पहले
संविधान बन जाने दो ।
ठहरो !
धरती ! तत्क्षण ठहरो !
अपने पथ पर घूर्णन से पहले
संविधान बन जाने दो ।

रे पाखण्डी! 
भोली-भाली दुनिया को
कितना और ठगोगे ?
ताजे पुष्पों की सुवास को
शीतल समीर में घुलने से रोक रहे हो
संविधान के साथ राम को तौल रहे हो ।
संविधान से राम नहीं हुआ करते हैं
राम नाम के बल पर जग में
जाने कितने संविधान हुआ करते हैं ।
संविधान के गीत बाद में लिखते रहना
अपनी थोथी ढपली ख़ूब बजाते रहना 
पाखण्ड रचाने से पहले
कुछ तो लाज करो
चलते रहना राजनीति की कुटिल चाल
दुष्टचाल चलने से पहले 
रामलला का उनके घर में मंदिर तो बन जाने दो ।

संविधान-प्रतिसंविधान


-कई बार सुसाइडल नोट संघर्ष का वह अंतिम तरीका होता है जिसके बल पर कोई आत्महत्या करने वाला मृत्यु के बाद भी अपने संघर्ष को न्याय मिलने की आशा से जारी रखना चाहता है । ...किंतु यह अंतिम उपाय भी यदि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाय तो इसे सभ्य समाज की क्रूरष्ट धृष्टता और उन तमाम तंत्रों की धूर्तता माना जाना चाहिए जिसमें कोई व्यक्ति जीने में असफल रहने के बाद आत्महत्या के लिए विवश हो जाता है ।

-पिछले महीने एक अधिकारी ने आत्महत्या कर ली । सुसाइडल नोट में उसने अपने विभाग के कई उच्चाधिकारियों को अपनी आत्महत्या के लिए उत्तरदायी ठहराया था । पुलिस ने सुसाइडल नोट बरामद किया किंतु रसूखदारों पर कोई कार्यवाही नहीं हो सकी ।

-किसी को जीने का अधिकार कौन देता है ? कौन है वह अधिकारी जो दूसरों के लिए जीने के अधिकार तय करता है ?
-सभ्य समाज के मनुष्य ने बड़े गर्व से यह घोषणा करने में तनिक भी विलम्ब नहीं किया कि उसका लिखा संविधान हर किसी को जीने का अधिकार देता है ।
-गाँव के एक असभ्य ने जिज्ञासा से पूछा – “क्यों ? संविधान में न लिखा होता तो क्या हर किसी को जीने का अधिकार नहीं मिलता”?
-महानगर के सभ्य ने कहा – “मनुष्य निर्मित संविधान सर्वोपरि है, हमने इसे धर्म और ईश्वर निरपेक्ष बनाया है । संविधान का सम्मान और पालन करना हर मनुष्य के लिए अनिवार्य है । संविधान का उल्लंघन करने वाला दंड का भागी होता है” ।
-असभ्य ने पुनः जिज्ञासा की –“संविधान तो ईश्वर का भी है किंतु उसने इसे लिखने की कभी आवश्यकता नहीं समझी ...दण्ड वह भी देता है ...बिना किसी पक्षपात के । किंतु तुम ईश्वर के संविधान को क्यों नहीं मानना चाहते”?
-सभ्य ने कहा –“क्योंकि वह अलिखित है, और जो अलिखित है उसका कोई अस्तित्व नहीं”।
-असभ्य ने पुनः पूछा –“अलिखित तो ग्रेट ब्रिटेन का संविधान भी है, क्या उसका भी कोई अस्तित्व नहीं”?

-सभ्य को असभ्य के बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर खोजने होंगे । 
-असभ्य ने तर्कों से सिद्ध होना पाया कि ईश्वर सर्वोपरि है और धर्म है उसका संविधान ।
-सभ्य ने भी अपने तर्क विकसित कर लिए हैं कि ईश्वर एक अनावश्यक कल्पना है और धर्म एक ऐसा पाखण्ड ... जिसकी मनुष्य समाज के लिए कोई उपादेयता नहीं है ...और इसीलिए मनुष्य को ईश्वर और धर्म निरपेक्ष होना चाहिए । ईश्वर और धर्म मनुष्य निर्मित संविधान से ऊपर नहीं हो सकते ।

-असभ्य यह जाना चाहता है कि ठेकेदार संविधान के होते हुये भी लोग आत्महत्यायें क्यों कर लिया करते हैं ? संविधान के होते हुये भी वह कौन सी व्यवस्था है जो संविधान से भी ऊपर है और जो किसी को आत्महत्या के निर्णय तक पहुँचने के लिए विवश कर दिया करती है ?
-असभ्य्य यह भी जानना चाहता है कि जिस संविधान को सर्वोपरि घोषित कर दिया गया, उसे कोई अलिखित प्रतिसंविधान प्रतिक्षण कैसे और क्यों आँख दिखाता रहता है ?
-क्या अलिखित प्रतिसंविधान डार्क मैटर का ही एक प्रभावी स्वरूप है ?

बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

ब्राह्मण का सच – स्वामी धर्मबंधु


पराधीन भारत में विदेशी आक्रमणकारियों के लक्ष्य पर ब्राह्मण ही अधिक रहे हैं । स्वाधीन भारत में तो ब्राह्मण होना एक अभिषाप मान लिया गया है । भारतीय समाज में जो ब्राह्मण अपनी अध्यात्मिक चेतना और निस्पृह सामाजिक आराधना के कारण सर्व सनातन समाज में अनुकरणीय और पूज्य माना जाता था वही ब्राह्मण अब घोर तिरस्कार का पात्र हो गया है । लोकसेवा और लोककल्याणकारी अनुसंधानों में अपना जीवन समर्पित कर देने वाला कोपीनधारी अकिंचन ब्राह्मण उपेक्षित हुआ तो भारतीय समाज छिन्न-भिन्न होता चला गया । भारत की विभिन्न शक्तियों में समन्वय और संतुलन बनाकर चलने वाला लोकसेवक ब्राह्मण आज दुर्दशा और उपेक्षा का शिकार है । भारत की दुर्दशा के लिए इतिहासकारों से लेकर आम जनता तक हर कोई ब्राह्मणों को ही उत्तरदायी मानकर उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करने लगा है । उसे ब्राह्मणेतर जातियों के शोषण, उन पर अत्याचार और सामाजिक वर्गभेद के लिए उत्तरदायी होने के अपराध से लांछित किया जाने लगा । यह सब आरोपित करते समय लोग शोषण के मूल सिद्धांत की उपेक्षा कर कुतर्कों से अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते देखे जाते हैं । भिक्षावृत्ति वाला अकिंचन ब्राह्मण किसी का क्या शोषण करेगा ? शोषण वे करते हैं जो सत्ता में होते हैं या धन और बाहुबल से युक्त होते हैं । आम जनता का शोषण राजा कर सकता है, पूँजीपति कर सकता है, या फिर दबंग लोग कर सकते हैं । इतिहास साक्षी है कि भारत पर अधिकांश समय तक ब्राह्मणेतर जातियों ने ही शासन किया है, पूँजीपति या उद्योगपति वे कभी रहे नहीं, और भिक्षाटन करने वाला दबंग तो हो ही नहीं सकता । ब्राह्मणेतर राजाओं के आगे सदा सिर झुकाने वाला, उन्हें मंत्रणा देने वाला, कुटिया में रहने वाला, ब्राह्मणेतर लोगों को अवतार मानकर उनकी स्तुति करने वाला ब्राह्मण आततायी कैसे हो सकता है भला ! किंतु इन तर्कों पर विचार किए बिना ही उसे चिर अपराधी मान लिया गया । समाज के किसी वर्ग को अपराध किए बिना ही अपराधी घोषित कर देना बहुत बड़ा अत्याचार है । स्वामी धर्मबंधु जी ने इस विषय पर अपनी लेखनी चलायी है जो स्वागतेय है । स्वागतेय इसलिए भी क्योंकि यह वह समय है जब ब्राह्मण हीन भावना से ग्रस्त होकर कुंठित होता जा रहा है । ब्राह्मण को ही नहीं पूरे भारतीय समाज को ब्राह्मणों का सच जानना ही चाहिए । प्रस्तुत है, स्वामी धर्मबंधु जी का अविकल आलेख । - कौशलेंद्र    

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है...?

 में जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोड़ा, नष्ट किया, वे आज इस देश में अतीत भुला दोके नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं।
जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों का विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है । किंतु ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में "काल्पनिक" पुराने पापों के लिए दोषी मान लिए गए हैं ।
आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं । ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।

वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं दिया । बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े-बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें ।
किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है । एक झूठ को सौ बार बोला जाए और उसका किसी के द्वारा सशक्त विरोध न किया जाय तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है ।
आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचें, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें । क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहिये, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से । खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं । आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ-साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं ।
यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी, ताकि वे भारतीय समाज के टुकड़े-टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें ।
सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली ।
        ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं हैं । वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वही मृग है । आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी । क्या यह स्थिति स्वीकार्य है ? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं; सब ने ब्राह्मणों के साथ सिर्फ छलावा ही किया है ।
ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं ! क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हैं जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो ?
        शुंग, कण्व, सातवाहन आदि द्वारा किया गया अल्पकालीन शासन सभी विजातियों और विधर्मियों को क्यों कचोटता है ? चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में ।
        भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त, चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा । चाणक्य का उत्तर था – मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना । क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं ?
श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है ।
संयोगवश, श्रीकृष्ण जो कि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल OBC के अंतर्गत आरक्षित जाति मानी गयी है ।
यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसा कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी ? (उस सन्दर्भ में यदि ब्राह्मण ईश्वर की कृति हैं जैसा कि कुछ मूर्ख कहते हैं) देवों के देव महादेव शिव को पुराणों के अनुसार किराट जाति का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में ST की श्रेणी में पाए जाते हैं
दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है । जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और, या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और, या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का । उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन । क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं ? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं ?
        एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है - निर्धन ब्राह्मण' जो कि उनका एक गुण माना गया है । समाज में सबसे माननीय स्थान संन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)
ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें । इस बारे में एक अमरीकी लेखक आलविन टाफलर ने भी कहा है कि हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।
सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों । अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका । श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई । बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना ।
हाँ ! यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए, और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी । इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते ?
और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता ? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे । इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया ।
जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, कबीरदास, विवेकानंद आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं । तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता ! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फ़ायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे ।
जिन दो पुस्तकों में वर्ण (जाति नहीं) व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे मनु जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है श्रीमदभगवदगीता जिसके रचियता थे व्यास जो कि ब्राह्मणेतर वर्ग की मछुआरन के पुत्र थे । यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं ।

ब्राह्मण तो अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं...
पुरातन काल में जब भी कभी ब्राह्मणों पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी । बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड़ उछाल रहे हैं । इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया ?
औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की हत्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खड़ी की जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके । किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया । यह सब उन्हीं लोगों के इतिहास में दर्ज़ है। क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी औरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?

यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?

कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया । क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की ? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ ! यह कैसा सत्य है? यह कैसा न्याय है ? यह कैसी विवेचना है ?
जब पुर्तगाली भारत आये, तब St. Xavier ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।
यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े । जिन्होंने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा । St. Xavier को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वे उसके रास्ते का काँटा थे, हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर ।
        क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया ? फिर भी St. Xavier के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं, इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण कश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए ।
        आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहाँ अब एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है । क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की ? हत्या की छोड़ये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया ?
और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने कश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया । ५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं।
        आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया । क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की हत्या की ? फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं । यह कैसा तर्क है ?
माननीय भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि “धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना । किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी ब्राह्मणों को मौत के घाट उतार दिया।मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए । क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो ?
१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढ़ाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे । वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे । (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया ।
        ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे । उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया । फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है । उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं । और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए ।

अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति । क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शाचालक ब्राह्मण हैं ? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे ?
दिल्ली के पटेलनगर क्षेत्र में 50 % रिक्शे वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं । आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियाँ ब्राह्मण हैं । इसी प्रकार देश के दूसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं । गरीबी-रेखा से नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है ।
हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहाँ software engineer या scientist का काम मिल जाता है । सहस्राब्दियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं । फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है ? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे ?
कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आँकड़ों के अनुसार वहाँ के वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय - १५६२ रू/ वोक्कालिग जन - ९१४ रू/ मुसलमान - ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन - ६८० रू/ पिछड़ी जनजातियों के जन - ५७७ रू/ और ब्राह्मण - ५३७ रू।

तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी धनवानऔर शोषणकर्ताहै, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है ।

क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है । इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो कब तक उन्हें दोष देते जाओगे ?
क्या हम भूल गए कि वह ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था ? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?
भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से समाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी । सदा से विश्व भर में जिन-जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरि रहा है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि ।
        यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने या अपने कुल के लिए ही रखते दुनिया में मुफ्त बांटने की बजाए इनकी कीमत वसूलते । वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे हैं ।
जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया वसुधैव कुटुंबकंवह ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा लोको सकलो सुखिनो भवन्तु' वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?
इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।
आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है । यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके लोग तो सभी हमेशा से ऊँची पदवी पर बैठे रहे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता?
        अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढ़ने का मौका सबको मिल जाता है । कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा । और ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन-सुन कर ग्लानि से इतना झुक चुका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है ।
आज का ब्राह्मण बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है । नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण । बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज । बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नहीं । ऐसे में भविष्य से क्या आशा.....?

धर्म की जय हो
अधर्म का नाश हो
प्राणियों मे सदभावना हो
विश्व का कल्याण हो ......
इसमे क्या गलत है ?
मानवता का संदेश देने वाला अत्याचारी कैसे हो सकता है ?
चिंतनीय विषय है !