शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

विद्या ददाति अविनयम् ...

गाँव में आये दिन लोगों को आपस में झगड़ा करते देखा करता था । बहुत छोटे-छोटे स्वार्थों और बहुत बड़े-बड़े अहंकारों ने उन्हें उग्र और हिंसक बना दिया था ।

बचपन में हमें न जाने कितनी बार विद्या ददाति विनयम्की सूचना दी गयी थी । जब हम बड़े हुये तो विदित हुआ कि यह मात्र सूचना ही नहीं बल्कि एक रहस्य भी है ।

अब मुझे विनय की तलाश थी ।

हम उत्साहपूर्वक विद्वानों की सभा में गये, वहाँ कलह तो मिली पर विनय नहीं मिला ।

विनय को खोजने हम पढ़े-लिखे लोगों की बस्तियों में गये, विनय को खोजते रहे, विनय नहीं मिला । हम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के पास गये, वहाँ हमें विद्या मिली जिसे लेकर विद्यार्थियों के दो गुटों में खूनी संघर्ष हो रहा था, वहाँ विनय की तलाश करने का कोई अर्थ नहीं था ।

हम संगीतकारों और कलाकारों के पास गये, कलह वहाँ भी मिल गयी पर विनय नहीं मिला । पता चला कि विनय अपनी गर्ल फ़्रेण्ड के साथ रिलेशनशिप में था । एक दिन कलह ने इतनी कलह की कि विनय को आत्महत्या कर लेनी पड़ी ।

विनय इस दुनिया में कहीं नहीं है । विद्या है, कलह है पर विनय नहीं है । 

हमने पढ़ा कुछ और देखा कुछ और और यह भी कोई कम रहस्य की बात नहीं ।

पता चला है कि विनय की मौत की जाँच करने वाले दो गुटों ने भी आपस में कलह शुरू कर दी है ।

 

2...

आभार...

सत्य के उद्घाटन के लिए हम कलियुग के वर्तमान चरण के आभारी हैं । हम उन अतिविद्वानों के भी बहुत आभारी हैं जो टीवी डिबेट्स में हर घड़ी सत्योद्घाटन में लीन रहते हैं । हम टीवी कार्यक्रमों के आयोजकों और प्रस्तुतकर्ताओं के भी बहुत आभारी हैं जिनके कारण हम सत्य को जान पाते हैं ।

और अब फ़्लैशबैक में असली बात...

मोतीहारी वाले मिसिर जी के अनुसार – सत्य का असली रहस्योद्घाटनकर्त्ता वह होता है जो सत्ता में नहीं होता । हर विपक्षी ने हमें आज तक यही ज्ञान दिया है कि अभी जो सत्ता में है वह नालायक है, लायक तो केवल हम हैं किंतु दुर्भाग्य से अभी हम सत्ता में नहीं हैं ।

इसका अर्थ यह हुआ कि हम सदा से नालायकों द्वारा ही शासित होते रहे हैं और आज भी नालायकों द्वारा ही शासित हो रहे हैं ।      

हम टीवी डिबेट्स के इसलिए भी बहुत आभारी हैं कि उन्हीं के कारण हम उस सत्य का दर्शन कर पा रहे हैं जिसे अभी तक हर सत्यान्वेषी हम सबसे छिपाता रहा है, जैसे यही कि तोता-मैना के किस्सों की तरह रामायण भी एक गल्पकाव्य है, राम एक काल्पनिक चरित्र है किंतु कुतुबुद्दीन चौहान वल्द निज़ामुद्दीन तोमर ही राम का एकमात्र जीवित और असली वंशज है इसलिए इस देश पर हुक़ूमत करने का हक केवल मुसलमानों का ही है और यह भी कि भारत में हिंदुत्व को निरंतर अपमानित करते करना ही सेक्युलरिज़्म का सम्मान करना है, सेक्युलरिज़्म नेरूजान का वह गोदपुत्र है जिसे हिंदुत्व से नफ़रत है । 


शनिवार, 25 जुलाई 2020

हिन्दू की प्रामाणिकता...

इससे पहले कि हम हिन्दू शब्द को भारत की जड़ों में से खोदकर बाहर निकालें हमें आज के वैज्ञानिक युग का सम्मान करते हुये बाबर के पूर्वजों, चिलियन नेटिव हर्ब प्यूमस बोल्डस और नोवल कोरोना वायरस को भी वैदिक साहित्य में से खोजकर बाहर निकालना होगा ।

        पहले मैं प्यूमस बोल्डस की बात करूँगा । यह लगभग 1989 के आसपास की बात है जब सत्यान्वेषी एक वैज्ञानिक द्वारा मुझसे कहा गया कि मुम्बई की एक दवा कम्पनी प्यूमस बोल्डस नाम की जड़ी-बूटी से एक औषधि बनाती है किंतु कुछ व्यापारिक कारणों से उसे भारतीय जड़ी-बूटी सिद्ध करना आवश्यक है और इसके लिए अथर्ववेद में से किसी ऐसी जड़ी-बूटी को निकालकर सामने लाना है जो अभी तक अनआइडेण्टीफ़ाइड प्लांट मानी जाती है ।

खोजबीन करने पर पता चला कि प्यूमस बोल्डस नामक जड़ी-बूटी फ़ेमिली मोनीमिएसी की एक सदस्य है और इस फ़ेमिली के तीन सौ सदस्यों में से एक भी सदस्य भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में नहीं पाया जाता । यह मूलतः चिली में उगने वाली जड़ी-बूटी है जिसे आजकल फ़्रांस में भी उगाया जाने लगा है । दवा कम्पनी का साइंटिस्ट प्यूमस बोल्डस को अथर्ववेद के किसी अनआइडेण्टीफ़ाइड हर्ब की पहचान देने के लिए कितना भी पैसा देने के लिए तैयार था । इस पापाचार के लिए मैं तो तैयार नहीं हुआ पर बनारस के एक विद्वान तुरंत तैयार हो गये ।

        यह विज्ञान और कूटरचित प्रमाणों का युग है जिसमें भारतीय तर्कशास्त्र का कहीं कोई स्थान नहीं है । यह मूर्खतापूर्ण हठ और अहंकार का युग है जहाँ सत्य का कहीं कोई स्थान नहीं है । यह वह युग है जहाँ बलिया के सिताबदियारा गाँव में जन्म लेने वाले बच्चे के भारतीय होने के प्रमाण ऑक्सफ़ोर्ड यूनीवर्सिटी में तलाशे जाते हैं । यह वह युग है जिसमें कम्पाइलेशन को रिसर्च मान कर ज्ञान के अहंकार में  डूब जाया जाता है । यह वह युग है जिसमें सूर्य से आने वाले फ़ोटॉन्स को जब तक फ़िज़िक्स के तयशुदा साँचों में ढालकर प्रमाणित न कर लिया जाय तब तक धरती पर पड़ने वाले उसके किसी भी स्वाभाविक प्रभाव को स्वीकार कर लेना अवैज्ञानिकता और पिछड़ापन का प्रमाण माना जाता है । 

विदेशी लुटेरे बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था इसका कोई भी प्रत्यक्षदर्शी विश्व के किसी भी कोने में उपस्थित नहीं है । बाबर के आक्रमण और उसकी बर्बरता की प्रामाणिकता के लिए वैदिक साहित्य को खँगालना आज की वैज्ञानिक परम्परा का एक अपरिहार्य हिस्सा है । इसी तरह भारत में आजकल फैल रहे नोवल कोरोना वायरस को भी वैदिक साहित्य में खोजना होगा ।

इन तीनों का ही भारत से किसी न किसी रूप में सम्बंध रहा है, किंतु प्रचलित मान्यता के अनुसार सम्बंधों की प्रामाणिकता के लिए वैदिक साहित्य में भी इनका उल्लेख होना अनिवार्य है ।

वैदिक साहित्य में मुझे राक्षसों का तो उल्लेख मिला पर लुटेरे बाबर का कहीं नाम दिखायी नहीं दिया इसलिए सबूतों और किसी जीवित प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में यह दावा ख़ारिज़ किया जाना चाहिए कि बाबर ने कभी भारत पर आक्रमण किया था और लूटपाट एवं हत्यायें की थीं । अथर्ववेद में मुझे अद्भुत जड़ी-बूटियों का उल्लेख तो मिला पर प्यूमस बोल्डस का कहीं कोई नाम दिखायी नहीं दिया इसलिए यह दावा भी ख़ारिज़ किया जाना चाहिए कि मुम्बई की किसी दवा कम्पनी ने प्यूमस बोल्डस का उपयोग करके साल 1989 में कोई दवा बनायी थी । वैदिक साहित्य में मुझे रोगोत्पादक अदृश्य शक्तियों का उल्लेख तो मिला जो रक्तमांसप्रिय होती हैं और जो रूप परिवर्तन में दक्ष होती हैं पर मुझे नोवल कोरोना वायरस-19 का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिला । अतः यह दावा भी ख़ारिज़ किया जाना चाहिये कि वुहान से आये किसी वायरस ने भारत में इस समय तबाही मचा रखी है ।

अब बात आती है भारत में हिन्दुओं के प्रामाणिक अस्तित्व की । वैदिक साहित्य में हिन्दू शब्द का कहीं कोई उल्लेख न मिलने से स्पष्ट है कि भारत में हिंदुओं का कोई अस्तित्व है ही नहीं । जो है ही नहीं उसे सिद्ध करने की क्या आवश्यकता, और सूर्य को अपने होने की प्रामाणिकता सिद्ध करने की क्या आवश्यकता!

वास्तव में भारत में ज्ञानपिपासु आर्यों का सदैव अस्तित्व रहा है जो अपनी ज्ञानपिपासा के लिए वसुधैव कुटुम्बकम् मानते हुये विश्व के सुदूर देशों में भ्रमण करते रहे हैं । यह भारत है जो ब्राह्मण होने और आर्य होने के लिए विश्व के हर व्यक्ति का आह्वान करता रहा है । कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” ~ ऋ. ९/६३/५

तत्कालीन विश्व में ब्राह्मण और आर्य बनने के लिए तप करना गौरवपूर्ण कार्य हुआ करता था । पाणिनि सूत्र की उद्घोषणा -“आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः” यह सूचना देती है कि ब्राह्मण बनने का प्रयास तो सभी देशों में किया जाता है किंतु श्रेष्ठ ब्राह्मण तो आर्य ही होते हैं ।

कौन है आर्य?

जो आकृति, प्रकृति, सभ्यता, शिष्टता, धर्म, कर्म, विज्ञान, आचार, विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे ही 'आर्य' कहते हैं । “कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन । तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः” ।। -(वशिष्ठ स्मृति) । ये वे पैरामीटर्स हैं जिन्हें प्राप्त करते हुये आर्य बनना पड़ता है । ये वे शर्तें हैं जिन्हें पूर्ण करने के पश्चात ही आर्य की उपाधि प्राप्त हो पाती है । बर्बर, घुसपैठिये और आक्रमणकारी को आर्य नहीं कहते । भारत पर अनार्यों ने सदा ही आक्रमण किया है पर आर्यों का ऐसा कहीं कोई इतिहास नहीं मिलता । महाकोषकार कहते हैं – “महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः”। -(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)

 

मेरा सांसारिक परिचय क्या है?

निश्चित ही मैं हिन्दू नहीं हूँ, मैं आर्यावर्त का मूलनिवासी सनातनधर्मी ब्राह्मण आर्य कुलोत्पन्न कौशल किशोर मिश्र हूँ । मेरे वास्तविक परिचय से अनजान किसी अनार्य व्यक्ति ने मुझे श्वेतवस्त्रधारी या खल्वाट मानुष कहकर पुकारा और अपनी डायरी में भी लिख लिया, आप इसे ही मेरा वास्तविक परिचय मान बैठे? मेरा सही और पूरा परिचय जितना मैं जानता हूँ उतना कोई और कैसे जान सकता है?     

दीर्घकाल से मेरा प्रयास रहा है कि मैं यथासम्भव अपने लेखों और परिचय में हिंदू शब्द का प्रयोग न करूँ ।

हमें किसी को कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है, किंतु अपना सही परिचय देने की आवश्यकता अवश्य है, और सही परिचय के लिए आवश्यक है कि ईरानियों की तरह पहले हम स्वयं को पहचानें और स्वीकार करें कि हम आर्यावर्त निवासी सनातनधर्मी आर्य हैं ।

मेरी तरह अग्निपूजक ईरानियों को भी स्वयं के आर्य होने का गर्व है । ईरान के बादशाह सदा अपने नाम के साथ आर्यमेहर' की उपाधि लगाते रहे हैं । फ़ारसी में 'मेहर' का अर्थ है सूर्य । ईरान के लोग अपने को “सूर्यवंशी क्षत्रिय आर्य” मानते है और विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में अपने आर्य होने का इतिहास बड़े गर्व से बच्चों को पढ़ाते हैं – “कुछ हजार साल पहले आर्य लोग हिमालय से उतर कर आये और यहाँ का जलवायु अनुकूल जानकर यहीं बस गए” (चंद हज़ार साल पेश जमाना माजीरा बजुर्गी अज़ निजा़द आर्या अज़ कोहहाय कफ् काज़ गुज़िश्त: बर सर ज़मीने की इमरोज़ मस्कने मास्त कदम निहाद्धन्द। ब चूं.आबो हवाय  ई सर ज़मीरा मुआफ़िक तब' अ खुद याफ्तन्द दरीं जा मस्कने गुज़ीदत्र ब आंरा बनाम खेश ईरान ख़यादन्द - (जुग़राफ़िया पंज क़ितअ बनाम तदरीस रहसल पंजुम इब्तदाई” -सफ़ा ७८; कालम १, मतब अ दरसनहि तिहरान, सन् हिजरी १३०९, सीन अव्वल व चहारम अज़ तर्फ़ विज़ारत मुआरिफ् व शरशुद)

हिंदीभाषियों को नहीं आती हिंदी

उत्तरप्रदेश की इण्टरमीडिएट परीक्षा के हिंदी विषय में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि मुझे आश्चर्यचकित नहीं करती । योजनाबद्ध तरीके से हिंदी के पाठ्यक्रम से हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकारों की रचनाओं के लोप होते रहने के बाद हिंदी के छात्रों की इतनी दुर्गति तो होनी ही थी । पिछले वर्ष मैंने बस्तर विश्वविद्यालय में अध्ययनरत बी.ए. के एक छात्र से जयशंकर प्रसाद और पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के बारे में पूछा तो उत्तर मिला -“मैं तो गाँव में रहता हूँ, जगदलपुर में होंगे कोई तो मैं नहीं जानता”।  

आज साहित्य के स्नातक छात्र अनामदास का पोथा, कामायनी, रश्मिरथी और निहारिका जैसी महान कृतियों के नाम भी नहीं जानते । आज के छात्र शरत्, महादेवी वर्मा, निराला, सुमित्रानंदन पंत, आशापूर्णा देवी और फ़णीश्वरनाथ रेणु जैसे महान लोगों की रचनायें नहीं पढ़ा करते । मैं इसके लिए छात्रों से अधिक उस व्यवस्था को दोषी मानता हूँ जिसने हिंदी के पाठ्यक्रम से हिंदी की प्रतिनिधि रचनाओं से भी छात्रों का कभी परिचय नहीं होने दिया ।

विज्ञान के छात्रों से हमारा कहना है कि हम भी विज्ञान के छात्र रहे हैं, हमने भी फ़िज़िक्स और केमिस्ट्री की ओर अधिक ध्यान दिया फिर भी हमारे समय में हिंदी में अच्छे अंक न लाने वाला पूरी कक्षा में कदाचित ही कभी कोई छात्र रहा हो ।


जौहर और श्रीराममंदिर

वे राजा दाहिर की रानी और दोनों राजकुमारियों की तरह महीनों की यातनायें भोगते हुये विदेशी धरती पर क्रूर लोगों के बीच अपमानजनक आचरण के साथ मरना नहीं चाहती थीं । इसलिए तत्कालीन परिस्थितियों ने भारतीय राजवंशी स्त्रियों के समक्ष आत्मदाह का मार्ग प्रशस्त किया । यह वह समय था जब स्त्रियों को लूटने वाले क्रूर विदेशी आक्रांताओं से बचने के लिए भारत की राजपूत स्त्रियों के पास आत्मदाह के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था । स्त्रियों को आज भी ऐसी क्रूरष्ट यातनायें भोगते हुये मरने के लिए बाध्य होना पड़ता है । हमारी लोकतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्थायें इसे रोक पाने में पूरी तरह असफल रही हैं ।
मुझे इस बात की गहन वेदना है कि भारतीय संविधान और कानून के छिद्रों ने क्रूरष्ट अपराध करने के लिए नाबालिगों को प्रोत्साहित करने की अराजक परम्परा को जन्म दिया है । निर्भया काण्ड के बाद ऐसे नाबालिग अपराधियों की संख्या में ख़ूब वृद्धि हुयी है ।
भारत वाली (नेपाल और पाकिस्तान वाली नहीं) अयोध्या में मर्यादापुरुषोत्तम माने जाने वाले और जनमानस के प्रेरणास्रोत रहे श्रीराम मंदिर का पुनर्निर्माण होने जा रहा है । इस बीच बलूचिस्तान में एक स्थानीय मौलाना के हुक़्म से एक खेत में निकली भगवान बुद्ध की एक हजार सात सौ साल पुरानी मूर्ति को तोड़ कर नष्ट कर देने का समाचार भयभीत करने वाला है । इस्लाम के नाम पर भारतीय सभ्यता और जनआस्थाओं से जुड़ी प्राचीन मूर्तियों, मंदिरों और पुस्तकालयों को नष्ट करने का एक दीर्घकालीन इतिहास विदेशी आक्रांताओं द्वारा लिखा जाता रहा है । भारतीय उपमहाद्वीप की महाशक्तियाँ पिछले चौदह सौ सालों से मूर्तियों, मंदिरों और पुस्तकालयों की रक्षा कर पाने में पूरी तरह असफल रही हैं । हम कैलाश पर्वत, मानसरोवर, शारदापीठ और तक्षशिला जैसे भारतीय अस्तित्व के परिचायक रहे पवित्र स्थानों को वापस ले पाने में भी आजतक असफल ही रहे हैं ।
...तो क्या स्त्रियाँ जन्म लेना बंद कर दें? ...तो क्या मंदिर निर्माण नहीं किये जाने चाहिये?
समय बदला और जौहर को सामाजिक कुरीति मानते हुये अपराध घोषित कर दिया गया । किंतु यह भी समस्या का समाधान नहीं था । जौहर बंद हो गया पर स्त्रियों की सम्मानजनक सुरक्षा का प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया । तब लड़कियों की सुरक्षा और उनके विवाह में होने वाली परेशानियों से जूझने की सम्भावनाओं ने भ्रूणहत्या का मार्ग खोज लिया और लड़कियों की गर्भ में ही हत्या की जाने लगी । समस्या का समाधान अभी भी नहीं मिल सका ।
कन्या भ्रूणहत्या को तो अपराध घोषित कर दिया गया किंतु क्रूर नाबालिग यौनापराधियों पर लगाम कसने के सार्थक उपायों पर कोई योजना आज तक नहीं बन सकी । स्त्री सम्मान और सुरक्षा के प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं । जब तक हम क्रूरष्ट अपराध करने वाले नाबालिगों को वयस्कतुल्यअपराधी मानना स्वीकार नहीं करेंगे तब तक स्त्री सम्मान और सुरक्षा की सारी योजनायें धूर्ततापूर्ण छल के अतिरिक्त और कुछ नहीं होंगी ।
भारत में श्रीराममंदिर का पुनर्निर्माण होने जा रहा है, उधर पाकिस्तान में कृष्ण मंदिर की नींव तोड़ दी गयी । भारत में इस्लामिक कट्टरपंथियों और उनके चाटुकार हिंदू राजनीतिज्ञों द्वारा श्रीराम के ऐतिहासिक अस्तित्व पर आज भी निर्लज्ज और निराधार टिप्पणियाँ की जा रही हैं और श्रीराम मंदिर पुनर्निर्माण का विरोध भी अनवरत किया जा रहा है ।    
भारत के बहुत से लोग नहीं चाहते कि श्रीराममंदिर का पुनर्निर्माण किया जाय । श्रीराम ने तो मात्र एक व्यक्ति की टिप्पणी का आदर करते हुए सीता को अग्निपरीक्षा का आदेश दिया था, आज वे होते तो इतने लोगों के विरोध पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती!
क्या भारत के लोग इतने समर्थ हैं कि वे सोमनाथ जैसी घटनाओं की पुनरावृत्तियों को रोक सकें ? यदि नहीं तो उन्हें श्रीराम मंदिर पुनर्निर्माण का कोई नैतिक अधिकार नहीं है ।

मैं एक ऐसे मंदिर की सुरक्षा के लिए चिंतित हूँ जो अपने पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में है और जो आने वाले समय में हिंदुओं की सामूहिक हत्या और भारत विभाजन का कारण बनने वाला है ।

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

मुसिक्का (मास्क) भी हो सकता है कोरोना का स्रोत...

प्रथम राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के समय जब आमजनता के लिए मास्क लगाना अनिवार्य किया गया तभी मैंने इसके उपयोग के तरीके और मेडिकल वेस्ट की तरह साइंटिफ़िक डिस्पोज़ल न किए जाने पर सवाल खड़े करते हुए आम जनता को जागरूक करने की माँग की थी ।  तब इस बात पर किसी ने भी ध्यान देना आवश्यक नहीं समझा । आज महीनों बाद, जबकि इस बीच “अनहाइजेनिक यूज़ ऑफ़ मास्क” ने अपनी बहुत कूछ भूमिका निभा डाली है, हमारे सामने एक और साइंटिफ़िक संदेह परोस दिया गया है ।

शायद पिछले महीने की बात है जब कुछ चिकित्साविज्ञानियों ने कोरोना के हर केस में वेंटीलेटर के अंधाधुंध स्तेमाल की आवश्यकता के औचित्य पर सवाल खड़े किए थे ।

मैंने अपने दीर्घजीवन में चिकित्सा विज्ञान को इतना कनफ़्यूज़्ड और पैरालाइज़्ड पहले कभी नहीं पाया । प्रोबेबलिटीज़ के हिलते हुए पिलर्स पर बैठकर इतना साइंटिफ़िकाना ग़ुरूर कहाँ से आता है!

जो भी हो, कोरोना के कारण बदली हुई परिस्थितियों में जीवनशैली में परिवर्तन आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य भी है । किंतु प्रश्न यह है कि परिवर्तन कैसा हो ? थोपी गयी जीवनशैली में भी एप्रोप्रिएट मोडीरेशंस पर गम्भीरता से चिंतन किया जाना चाहिये था, जिसकी आज भी उपेक्षा की जा रही है ।

मोतीहारी वाले मिसिर जी महीनों से पूछे जा रहे हैं हैं कि नाक और मुँह तो ढक लिया रंग-बिरंगे डिज़ायनर मुसिक्का से लेकिन इन मटकती आँखों का क्या ? हवा में तैरते ड्रॉपलेट्स पर बैठे वायरस जी ने आँखों को निशाना बना लिया तो ?

मिसिर जी के सवालों का ज़वाब कभी कोई नहीं देता, उनके सारे प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं । मिसिर जी कहते रहे कि “हई मुसिक्कवा से कुच्छो ना होई, मुखवा आ कपारे मं बढ़ियाँ से गमछवा बाँधे के बा, ..आ अँखिया मं चसमवा पहिंरे के बा... तब नू कोरोनवा से बचाव होई

गोरखपुर वाले ओझा जी का अंग़्रेज़ी-हिंदी-भोजपुरी मिक्स वाला मुखवाक्य क़ाबिल-ए-ग़ौर है – “इट इज़ अभर ब्रेन भिच लुक्स द भिज़िबल एण्ड इनभिज़िबल थिंग्स, आइज़ आर जस्ट अ टूल । बड़का बड़का वैज्ञानिक अँखिया फार-फार के भकुआता है पर साइंटिफ़िक एलीमेंट लोहकबे नईं करता है स्ससुरा” ।

 कयास लगते रहे कोरोना बढ़ता गया

इलाज़ करते रहे मर्ज़ बढ़ता गया, गोया किसी फूट गये बाँध से बहती विशाल जलराशि जिसमें जलमग्न हो गयी हो आसपास की धरती । सारी हिकमतें धरी की धरी रह गयीं । 

फ़्लाइट्स बंद, रेल बंद, बस बंद... ठहर गयी दुनिया । क़यास लगते गये, उपाय बढ़ते गये, रायता फैलता गया ।

फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग, लॉक डाउन, Quaranitine, वेंटीलेटर, क्लोरोरोक्वीन फ़ॉस्फ़ेट, रेमडेसिविर, फ़ेबीफ़्लू, फ़ेवीलाविर और वैक्सीन ट्रायल्स से होते हुये प्रोटीन रिच डाइट, नीबू पानी, त्रिकटु चूर्ण, अश्वगंधा, सोंठ, लौंग, कालीमिर्च, स्टार एनिस ...और आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट पर आ कर ठहर गयी दुनिया । पिछले सात महीनों से ठहरी हुयी दुनिया को फिर-फिर चलाने के प्रयास होते रहे हैं । इस बीच नोवेल कोरोना वायरस ने लाख विरोध के बाद भी दुनिया के लगभग हर देश में अपनी सरकार बना ही ली । रपट पड़े तो हर गंगा की तर्ज़ पर भारत के लोगों ने भी आख़िरकार कोरोना के साथ ही रहने का मूड बना लिया है ।  

भारत में अवैध घुसपैठियों का विरोध होता रहता है, घुसपैठिये अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक होते रहते हैं और फिर एक दिन अपनी सरकार भी बना लेते हैं । पता नहीं किसने भारत के जनजीवन में व्याप्त यह सुलभता कोरोना को बता दी । कोरोना भी आ गया, पहले अल्पसंख्यक होकर आया और अब बहुसंख्यक होकर दहशत फैलाने लगा है ।

मोतीहारी वाले मिसिर जी का तो साफ कहना है – “जंगली बिल्ली को शेर बनाकर पेश करने से न जाने कब बाज आयेंगे लोग! अच्छा चलो शेर ही सही पर उसे भी थोड़े से प्रयास से पकड़ने की अपेक्षा न्यूक्लियर बम से उड़ाने की योजना बनाने का क्या औचित्य?” 

मास्क नहीं लगाने पर ज़ुर्माना एक लाख...

अब झारखण्ड में मास्क न लगाने वाले को एक लाख रुपये का अर्थदण्ड देना होगा और लॉकडाउन का उल्लंघन करने वाले को दो साल तक जेल की हवा का सेवन करना होगा । झारखण्ड सरकार ने यह फ़रमान तब जारी किया है जब दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने मास्क की उपयोगिता पर ही कई सवालिया निशान लगा दिये हैं । समाचार है कि कोरोना का कम्युनिटी स्प्रेड शुरू हो चुका है और दुनिया से कटकर घर में सुरक्षित रहने वालों से भी कोरोना मोहब्बत करने लगा है ।

अमेरिका की सड़कों पर कुछ माह पहले लॉकडाउन और मास्क के विरोध में लोगों ने प्रदर्शन किया था । मेरी आँखों के सामने उस प्रदर्शनकारी महिला की छवि घूमने लगी है जो चीख-चीख कर कह रही थी – “किसी के जीने के तरीके को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता । हम कैसे जियें यह हमें तय करने दीजिये

तब मुझे उस महिला की बुद्धि पर तरस आया था । आज इतने दिनों बाद जबकि दुनिया भर की आधुनिक सरकारों और वैज्ञानिकों के उपाय निष्फ़ल होते जा रहे हैं, मुझे उस अमेरिकी महिला की बातों में बहुत दम दिखायी दे रहा है ।  

मेडिकल प्रोटेक्शन ऑर्डीनेन्स में अग्रणी झारखण्ड...

अब झाखण्ड में चिकित्सा सेवाओं से जुड़े किसी भी व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार करने पर होगी ग़ैरज़मानती ग़िरफ़्तारी । झारखण्ड के डॉक्टर सरकार के आभारी हैं । भारत की सभी राज्य सरकारों को इस तरह के अध्यादेश लाने चाहिये ।  


रविवार, 19 जुलाई 2020

नेपाल को अपना स्वरूप पहचानना ही होगा

भारत-नेपाल-चीन सीमा विवाद ..2
 ओली की खोली में फुँफकार रहे निर्लज्ज ड्रेगन को हम सब देख रहे हैं । यह नेपाल और भारत दोनों के लिए अशुभ है । के.पी. शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी एशिया की तीसरी सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी मानी जाती है । नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभुत्व का यह एक स्पष्ट प्रमाण है ।
भारत और नेपाल के वर्तमान राजनीतिक टकराव पर माइनिंग इंजीनियरिंग के नेपाली छात्र प्राञ्जल गुरुंग की प्रतिक्रिया आशा का एक दीप जलाती है - दुनिया भर के सत्ताधीशों का एक ही धर्म होता है, सत्ता में हैं तो उसे बनाए रखने के लिए अपनी प्रजा से छल करते रहना और यदि सत्ता से बाहर हैं तो सत्ता को हथियाने के लिए हर तरह के निकृष्ट षड्यंत्र करते रहना। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि जे.एन.यू. की तरह नेपाल का भी शिक्षित वर्ग चीन से बहुत प्रभावित होता रहा है । प्राञ्जल गुरुंग इसके अपवाद हैं ।
भारत-नेपाल सीमा विवाद की सुलगती चीनी चिंगारी को हवा देने कूद पड़ीं मनीषा कोइराला उन भारतीयों से बेहतर हैं जो हर मामले में अपने ही देश के विरुद्ध खड़े नज़र आते हैं । भारत को अपना कर्मक्षेत्र बना चुकीं मनीषा कोइराला आज भारत के विरुद्ध खड़ी हैं । मनीषा! हम आपकी इस ग़ुस्ताख़ी को माफ़ करते हैं ...ध्यान रखना कि हमने आपको केवल बेशुमार दौलत ही नहीं दी बल्कि यश भी दिया है ।
क्या नेपाल विषाक्त हो रहा है?
यह समझ से परे है कि के.पी. ओली ने नेपाल और भारत के हजारों साल पुराने सम्बंधों को पलीता लगाना क्यों शुरू कर दिया? चीन (और चीन समर्थक भारतीय कामरेड्स) से प्रेरित नेपाली कम्युनिष्ट विचारधारा नेपालियों का बौद्धिक गरलीकरण करने में लगी है । राम के प्रति आस्था और शिव के प्रति भक्तिभाव रखने वाले नेपाली हतप्रभ हैं । धारचूला की सड़कों पर खड़ी नयी-पुरानी गाड़ियों पर “धारचूला-कालापानी-कुती” के साइन बोर्ड पढ़कर अब स्थानीय लोगों के मन में एक हलचल होने लगी है – “तिनकर और छांग्रू के बाद क्या अब नाबी, कुती, कालापानी और लिपुलेख भी भारत के हाथ से निकल जायेंगे?”
कैलाश मानसरोवर मार्ग पर स्थित पांग्ला गाँव के लोगों में नेपाल सरकार के प्रति गुस्सा है । वे मानते हैं कि नेपाली प्रधानमंत्री ओली चीन के बहकावे में हैं ।
सनातनी भारतीयों के महत्वपूर्ण अध्यात्मिक तीर्थ कैलाश मानसरोवर आने-जाने के पारम्परिक मार्ग नाबी और कुती पर अपने दावे के बाद लिपुलेख दर्रा, लिम्पियाधुरा और कालपानी पर भी नेपाल ने अपना दावा कर दिया है । यह विवाद नया नहीं है, नेपाल ने पहली बार 1998 में ही भारत के इन क्षेत्रों पर अपना दावा कर दिया था । हमारे पवित्र एवं अध्यात्मिकऊर्जा के शक्तिशाली केंद्र माने जाने वाले कैलाश मानसरोवर को तो चीन पहले ही हड़प चुका है और अब हमें अपने ही तीर्थस्थल तक जाने के लिए चीन से वीसा लेना पड़ता है जिससे चीन को प्रतिवर्ष करोड़ों की आय होती है ।
भारत और नेपाल के बीच की राजनीतिक सीमाओं का इन दोनों ही देशों की आम जनता के लिए कभी कोई अर्थ नहीं रहा, उस समय भी नहीं जब वहाँ के राजवंश की सामूहिक हत्या कर दी गयी और तब भी नहीं जब नेपाल में राजशाही को समाप्त कर लोकतांत्रिक शासन की स्थापना कर दी गयी । मौसम कैसा भी रहा हो, दोनों देशों में सुख और दुःख की भावनात्मक साझेदारी में कभी कोई बाधा नहीं आई । करोड़ों भारतीयों की तरह प्राञ्जल गुरुंग को भी इस बात का दुःख है कि कम्युनिज़्म के दबाव में विश्व के एकमात्र हिंदूराष्ट्र नेपाल की राजनीतिक हत्या कर दी गई है ।
भारत और नेपाल की कला, संस्कृति, लोकपरम्परा, धर्म और अध्यात्म की उभयधारा ने इन दोनों देशों के नागरिकों को कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि वे दो अलग-अलग देशों के नागरिक हैं । चीन इस एकात्मता को समाप्त करना चाहता है जिससे तिब्बत की तरह नेपाल को भी चीन का एक हिस्सा बनाने का चीनी षड्यंत्र सफल हो सके ।
नेपाल में सीमावर्ती गाँवों के सरकारी स्कूलों में बच्चों को चीनी भाषा पढ़ाये जाने का चीनी षड्यंत्र सफल हो चुका है । इन शिक्षकों का वेतन चीनी संस्थाओं द्वारा भुगतान किया जाता है । भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक और वैचारिक उन्मूलन का चीनी षड्यंत्र नेपाल में अपनी जड़ें मज़बूत करता जा रहा है । सावधान! यह षड्यंत्र दोनों देशों के अस्तित्व के लिए अशुभ है ।   
मैंने गुरुंग से पूछा – “नेपाल के प्राचीन गौरव और सांस्कृतिक अस्तित्व पर चीनी संकट छाया हुआ है । इस परिप्रेक्ष्य में आप नेपाल का भविष्य किस तरह देखते हैं?”
उत्तर मिला - “नेपाल का अस्तित्व भारत के साथ ही सम्भव है चीन के साथ कभी नहीं और यह बात नेपाल के नेताओं को समझनी होगी” ।
दो साल पहले धारचूला प्रवास के समय मुझे बताया गया था कि उत्तराखण्ड के वीरान हो चुके गाँवों में नेपाली मज़दूरों ने न केवल बसाहट शुरू कर दी है बल्कि अब तो वे लोग खाली पड़े खेतों में खेती भी करने लगे हैं । भारत के स्थानीय निवासी उनका विरोध सिर्फ़ इसलिए नहीं करते क्योंकि वे नेपाल को एक पृथक राष्ट्र के रूप में नहीं देखते ।   

भारत-नेपाल-चीन सीमा विवाद

कालापानी

हिमांचल के काँगड़ा जिले में स्थित कालापानी नहीं बल्कि उत्तराखण्ड के धारचूला सब-डिवीज़न में 6180 मीटर की ऊँचाई पर, लगभग एक सौ लोगों की आबादी वाला गाँव कालापानी एक बार फिर चर्चा में है ।

भारत-चीन युद्ध के समय तक तिनकर एवं कुमाऊँ के भूटिया लोग कालापानी और लिपुलेख दर्रे से होते हुये तिब्बत से व्यापार किया करते थे । कैलाश मानसरोवर आने-जाने एवं स्थानीय लोगों के व्यापार का यह एक प्रमुख मार्ग हुआ करता था । कालापानी परम्परा से कुमाऊँ का हिस्सा रहा है । कालापानी ही नहीं उससे भी आगे उत्तर की ओर आपीपर्वत तक की भूमि पर कुमाऊँ स्थित गर्बियांग गाँव के लोगों का पुश्तैनी अधिकार रहा है और वे 1962 में भारत चीन युद्ध के ठीक पहले तक कालापानी की 190 एकड़ भूमि का कृषि एवं पशु चराने के लिए उपयोग करते रहे हैं ।  

भारत से लेकर नेपाल तक विस्तृत ब्यास घाटी में स्थित तिनकर गाँव भी कभी ब्रिटिश इण्डिया का एक हिस्सा हुआ करता था । महाकाली नदी की कई सहायक नदियों में से एक तिनकरखोलानदी छांग्रू गाँव के पास कालीनदी में मिलती है । दोनों नदियों के संगम का वह बिंदु आज नेपाल और चीन की सीमा रेखा तय करता है ।

वर्ष 1816 में ब्रिटिश इण्डिया सरकार और नेपाल नरेश के बीच सुगौली ट्रीटी हुयी थी जिसके अनुसार काली नदी को सीमारेखा मानते हुए नदी से पूर्व की भूमि नेपाल की और पश्चिम की भूमि भारत के हिस्से में स्वीकार की गयी । इस ट्रीटी के बाद वर्ष 1817 में नेपाल के राजा ने तत्कालीन ब्रिटिश इण्डिया सरकार से तिनकर, छांग्रू, नाबी और कुती की भूमि नेपाल को दे दिये जाने की माँग की । तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने ट्रीटी की शर्तों के अनुसार कालीनदी के पूर्व में स्थित तिनकर और छांग्रू गाँव तो नेपाल को दे दिये पर नाबी और कुती गाँव काली नदी के पश्चिम में होने के कारण देने से इंकार कर दिया । इसी ट्रीटी के कारण गर्बियांग गाँव के लोगों को आपी पर्वत तक की अपनी पुश्तैनी भूमि नेपाल के लिए छोड़ देनी पड़ी । 

Sugauli Treaty, Article 5 – “The king of Nepal renounces for himself, his heirs, and successors, all claims to and connexion with the countries lying to the West of the river kali, and engages never to have any concern with those countries or the inhabitants thereof.”

नेपाल सरकार लिम्पियाधुरा को काली नदी का उद्गम मानने लगी है और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा । वर्ष 1865 में ब्रिटिश इण्डिया ने कालापानी झरना को, जो कि आज भी भारत का हिस्सा है, काली नदी (जो तराई में आते ही शारदा नदी के नाम से जानी जाती है) का उद्गम माना और तिनकर एवं काली नदी के संगम से भारत-नेपाल की सीमा शुरू होना निर्धारित किया । आज यह बिंदु तीन देशों की सीमासंधि का बिंदु माना जाता है । अंग्रेजों ने यहाँ भी उलझाने वाली दुष्टनीति अपनाते हुये काली नदी को भारत और नेपाल के बीच की सीमा निर्धारित कर दिया जिसके कारण सीमाविवाद सदा के लिए उत्पन्न हो गया । चीन ने वर्ष 1950 में तिब्बत को अपने अधिकार में ले लिया जिससे आये दिन सीमा विवाद के नये-नये मसले शुरू होने लगे ।

जो भी हो, हम तो एक ही सत्य जानते हैं ...और वह यह कि कैलाश मानसरोवर भारतीयों का पवित्र तीर्थस्थल रहा है । क्या कोई देश अपने तीर्थ स्थल दूसरे देशों में बनाता है और वहाँ आने-जाने के लिये रास्ते भी दूसरे देशों में तलाशता है ? स्पष्ट है कि तिनकर, छांग्रू, गर्ब्यांग, नाबी, कुती, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख, राक्षसताल, मानसरोवर और कैलाशपर्वत अखण्डभारत के हिस्से रहे हैं और आज भी हैं । तिनकर और छांग्रू तो हम अपने सहोदर नेपाल को दे चुके हैं पर कैलाश पर्वत चीन से वापस लेना ही होगा ।