ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का विवाह दलितों से करने की बाध्यता का विधान।
एक समय ऐसा भी था जब गेहूँ पर किसानों को लेवी देनी होती थी। लेवी यानी गेहूँ की कुल उपज का एक निश्चित भाग सरकार को सरकारी मूल्य पर बेचने की बाध्यता। बाजार मूल्य उससे कुछ अधिक होता था। अब ब्राह्मणों की बेटियों पर वैवाहिक लेवी की माँग उठ रही है। ब्राह्मण की बेटी न हुई, गेहूँ की उपज हो गई।
जो ब्राह्मण इस माँग से व्यथित और अपमानित अनुभव कर रहे हैं उन्हें सोशल मीडिया पर गोलीबारी दी जा रही हैं और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमनियाँ भी दी जा रही हैं। यह कश्मीरी पंडितों वाला प्रारूप है।
लोग मानते हैं कि देश में बढ़ते हर पाप के लिए वर्तमान सत्ता नहीं, बल्कि केवल विपक्ष ही दोषी है। विघ्नसंतोषी लोग नहीं चाहते कि मोदी को विष्णु के अवतार के रूप में भगवान मानकर सुस्थापित किया जाए।
ब्राह्मणों और दलितों के बीच वैवाहिक संबंधों के विषय में मैं प्रायः वैज्ञानिक तथ्यों के साथ लिखता रहा हूँ। विचारणीय है कि अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह के लिए सरकारें क्यों प्रयासरत हैं? जबकि धर्मांतरण और जातीय व्यवस्था के पीछे सरकारों की ही चालें रहती हैं। कुछ-कुछ समयान्तराल पर नये वर्ग और नयी जातियों का सृजन करने वाली सरकारें सारा दोष ब्राह्मणों पर थोपकर जाति उन्मूलन का सपना दिखाने में भी सबसे आगे रहती हैं? यह शुद्ध डायलिमा है, यानी लोकतांत्रिक व्यभिचार।
पहली बात तो यह कि जातियाँ किसी ने नहीं बनाईं, न पंडितों ने, जैसा कि मोहन भागवत ने दुष्प्रचार किया है, और न ईश्वर ने, जैसी कि लोगों में धारणा है। जातियाँ राजा तय करते रहे हैं, और वे लोग भी जिन्हें व्यावसायिक वर्चस्व की इच्छा रही है, यथा केरल के कन्नाड़ी निर्माता, जिन्होंने व्यावसायिक वर्चस्व के लिए गोपनीयता बनाये रखी। व्यवसाय हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं। और जीवनशैली कुछ अन्य घटकों के साथ मिलकर जेनेटिक परिवर्तन के कारण बन जाते हैं, यही कारण है कि सवर्णेतर समुदाय की कई जातियों में हीमोग्लोबिनोपैथी विकसित हुई जो अचिकित्स्य है। वंश परंपरा से चलने वाली इन व्याधियों की विश्व में कहीं कोई सफल चिकित्सा नहीं है। सरकारों से प्रभावित मेडिकल साइंस ने इसका दीर्घकालीन उपाय बताया है "अंतर्जातीय विवाह", जो मेरी समझ में आज तक नहीं आया। यह वैसा ही जैसे किसी की दारू छुड़वाने के लिए ख़ुद भी उसके साथ बैठकर दारु पीने लगना। सवर्ण द्वेषी और सनातन (हिंदू) विरोधी सरकारें चाहती हैं कि सवर्ण भी इस व्याधि से पीड़ित हों जिससे कुछ नहीं तो समाज में व्याधिक समानता ही लाई जा सके। यानी, मूर्ख को विद्वान नहीं बना सकते तो विद्वान की भ्रूणहत्या तो कर ही सकते हैं जिससे सामाजिक श्रेष्ठता की सारी प्रायिकतायें और संभावनाएँ समाप्त की जा सकें।
अब जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से भारत और शेष विश्व में हीमोग्लोबिनोपैथी से प्रभावित होने वाली जातियों के बारे में पूछ सकते हैं।
सारांश यह कि समाज में हर तरह की विषमताओं के लिए विभिन्न घटक उत्तरदायी होते हैं जिसमें परिस्थितिजन्य समझौते और जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सत्य है जिसे झुठलाने का कोई दुष्ट प्रयोजन ही हो सकता है।
कुछ आरक्षित लोगों ने तो माँग कर दी है कि उन्हें ब्राह्मणों की बेटियों से विवाह में आरक्षण दिया जाय। यानी आरक्षित विधानसभा/लोकसभा सीट की तरह ब्राह्मणों को अपनी बेटी आरक्षित कोटे से ब्याहने की बाध्यता। यह भी एक तरह का जजिया कर है। "मोदी द ग्रेट विष्णु अवतारम्" उनकी यह माँग पूरी कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करके एक और महानता के आत्मबोध में डुबकियाँ लगाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। वे तो चाहते हैं कि भारत से सवर्णों का उन्मूलन होना ही चाहिए।