बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

प्रमाण

बिना कोई प्रमाण

मानना ही होगा तुम्हें
कि "भगवान ने नहीं
पंडितों ने बनाईं जातियाँ"
और तोड़ दिया समाज
खोद डाली खाइयाँ
इसलिए तोड़ देंगे हम
बंधन जात-पात के
बनवाकर प्रमाणपत्र
दलित, अतिदलित, महादलित
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति
और पिछड़े होने का
अपना, अपने बच्चों का
कि वे आज जो हैं
वही बने रहना चाहते हैं
अनंतकाल तक
लेते रहेंगे आरक्षण
कोसते रहेंगे पंडितों को
देते रहेंगे गालियाँ
मारते रहेंगे चार जूते
प्रतिदिन
तिलक तराजू और तलवार को
क्योंकि भगवान ने नहीं
पंडितों ने बनाईं हैं जातियाँ।

हम लिपिबद्ध करेंगे यह इतिहास
कि पंडितों ने बनाईं हैं जातियाँ
करके जातिगणना
लिख डालेंगे ग्रंथ
और हो जाएगें अमर
बनकर आरक्षित और उत्पीड़ित
करते रहेंगे उत्पीड़न
तिलक, तराजू और तलवार का।

हम दलित हैं
विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं
इसलिए
हम साफ करायेंगे अपने जूते
ब्राह्मणों से
और करेंगे विवाह
उनकी बेटियों से
भगा देंगे ब्राह्मणों को
भारत से बाहर
क्योंकि हम
दलित, शोषित और उत्पीड़ित हैं।
इतिहास
परिभाषित करेगा हमें
धरती के सर्वाधिक
"डरे हुये, शोषित लोग"।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

शक्ति, शोषण और अत्याचार

यूजीसी रेगुलेशन पर पूरे देश में उबाल है। दो ध्रुव एक बार फिर आमने-सामने हैं। संचार माध्यम पारस्परिक घृणा से विषाक्त हो रहे हैं। एक-दूसरे को चुनौतियाँ दी जा रही हैं। कंचना यादव ने सवर्णों को फंसाये जाने की आवश्यकता बताते हुये अपने लोगों को प्रोत्साहित किया। इस बीच एक और आरोप हवा में उछाल दिया गया है -

"ब्राह्मणों ने तीन हजार साल तक हमारा शोषण किया और हमें शिक्षा से वंचित रखा। यदि यूजीसी रेगुलेशन वापस लिया गया तो हम सवर्णों को देश से बाहर खदेड़ देंगे।"

यह आरोप बहुत गंभीर है, प्रायः ऐसे आरोपों पर ब्राह्मणों  को कम ही उद्वेलित होते हुये देखा गया है। किंतु जेएनयू जैसी संस्था में भी जब "ब्राह्मण-बनिया भारत छोड़ो" के नारे लगने लगें तो समझा जाना चाहिए कि बात अब आगे बढ़ चुकी है और उत्तर दिया जाना आवश्यक है। 

१. शिक्षा और गुरुकुल सदा से राज्य (सत्ता) के अधीन और उसके द्वारा पोषित व संरक्षित रहे हैं न कि ब्राह्मणों के एकाधिकार में। 

२. पिछले तीन हजार वर्षों में कितने ब्राह्मण राजा हुये हैं जिन्होंने किसी को भी शिक्षा से वंचित रखा? गुरुकुलों में प्रवेशपात्रता का विधान था, आज की शैक्षणिक संस्थानों में भी है। 

३. बाबा भीमराव के पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर थे, क्या कोई अशिक्षित व्यक्ति सूबेदार हो सकता है?

४. वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषियों में स्त्रियों सहित सभी वर्ण के ऋषियों की सहभागिता क्या सिद्ध करती है?आज भी संतों में हर वर्ण के लोगों का सम्माननीय स्थान है।

५. यदि ब्राह्मणों से इतनी शत्रुता और घृणा है तो सतनामी एवं अन्य आरक्षित समूहों के लोग ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के उपनाम यथा- तिवारी, उपाध्याय, चतुर्वेदी, जोशी, पाठक, व्यास, भदौरिया, बघेल, तोमर, चौहान... आदि क्यों लिख रहे हैं?

६. जातियाँ कौन बनाता है, ब्राह्मण या सरकारें? किस ग्रंथ या सरकारी अभिलेख में ब्राह्मणों द्वारा जाति बनाये जाने का उल्लेख है? कृपया बतायें।

७. वर्ष १९६७ में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के भोटिया, जौनसारी, थारू, बुक्सा और राजी लोगों को अनुसूचित जनजाति में किसने सम्मिलित किया, तत्कालीन सत्ता ने या ब्राह्मणों ने?

८. समय-समय पर स्वयं को आरक्षित श्रेणी में सम्मिलित किये जाने के लिए किये जाने वाले उग्र आंदोलन किसने किये, पटेलों और गुर्जरों... आदि ने या ब्राह्मणों ने?

९. धर्मांतरण के बाद भी आपको अपनी जातियों से चिपके रहने के लिए किसने बाध्य किया, क्या ब्राह्मणों ने?

१०. जाति से विरोध है तो जातीय जनगणना रोकने और जातियाँ समाप्त करने के लिए आंदोलन क्यों नहीं करते, तब कोई ब्राह्मण आपका विरोध करे तो उसे आप कोई भी दंड दे सकते हैं, हम आपके साथ होंगे। 

११. शूद्र शब्द आपके लिए इतना घृणित क्यों है? जबकि तकनीकी ज्ञान में दक्ष और रचनात्मक कार्य में कुशल हर व्यक्ति शूद्र हुआ करता था। आधुनिक संदर्भ में इंजीनियर और डाॅक्टर आदि को भी आप शूद्र मान सकते हैं जो कि बुद्धि और कर्मठता के समन्वय की स्थिति है। अपनी रचनात्मक दक्षता से कृषि एवं उद्योग आदि के माध्यम से अर्थतंत्र की रीढ़ बनकर समर्पित रहने वाले कर्मठ लोग शूद्र हुआ करते थे, इतने महत्वपूर्ण और सम्माननीय शब्द को घृणित बना दिये जाने के षड्यंत्रों पर भी चिंतन करने की आवश्यकता है।

१२. साधु, संत, बाबा... केवल ब्राह्मण ही नहीं हर वर्ग के लोग होते हैं, सबको सम्मानित माना जाता है, कोई भी व्यक्ति उनकी जाति पूछे बिना उनके चरण स्पर्श, प्रणाम या ॐनमोनारायण करता है, हिंदू समाज की यही व्यवस्था रही है। साधु, संत ऋषि-मुनि, शिक्षक और आचार्य जातियों से ऊपर माने जाते रहे हैं। 

१३. धर्मपाल ने बहुत शोध और अथक परिश्रम से बारह खंडों में एक पुस्तक लिखी है "The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century" जिसमें धर्मपाल जी ने अठारहवीं शताब्दी के भारत में शिक्षा की तत्कालीन स्थिति का वह विवरण दिया है जो ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने अभिलेखों में किया था। जो लोग यह मानते हैं कि ब्राह्मणों ने कुछ लोगों को तीन हजार साल तक शिक्षा से वंचित रखा, उन्हें यह पुस्तक पढ़ना चाहिए।

१४. मन से हीन भावनाओं और ब्राह्मणों के प्रति आधारहीन विद्वेष को समाप्त कर हिंदू समाज की गौरवपूर्ण पुनर्स्थापना के लिए संकल्प लेना हर भारतीय का दायित्व है जिसमें आप सबका स्वागत है। समाज का कोई भी वर्ग त्याज्य नहीं, स्वीकार्य होता है तभी कोई देश समृद्ध हो पाता है।

१५. रही बात प्रताड़ना की, तो प्रताड़ना करने वाला स्वयं मे पतित और दुष्टबुद्धि होता है, वह कोई भी हो सकता है...पंथ, समुदाय, जाति निरपेक्ष। दुष्टों को जब भी अवसर मिलता है वे अपने से निर्बल का शोषण करते हैं, और ऐसे दुष्ट हर जाति एवं समूहों में रहे हैं, आज भी हैं। जब अहंकार, शक्ति और दुष्टता का मिलन होता है तब शोषण की स्थितियाँ उत्पन्न होती है। जिसके पास सत्ता, या सत्ता में सहभागिता या किसी कुपात्र को प्राप्त अधिकार हैं और वह शक्तिशाली भी हो तो दुष्टता करेगा। ब्राह्मण का इतिहास तो प्रायः कोपीनधारी और भिक्षाजीवी होने का रहा है। शूद्र और क्षत्रिय ही प्रायः राजा रहे हैं। वैश्य किसी झंझट में नहीं पड़ते, और प्रायः समझौतावादी और सहनशील प्रवृत्ति के होते हैं। अब विचार करिये किसके द्वारा किसका शोषण किये जा सकने की प्रायिकता हो सकती है! तीन हजार साल से शोषण और उत्पीड़न की बात काल्पनिक और निराधार है। हाँ, पिछली कुछ शताब्दियों में नैतिक पतन के कारण ऐसी घटनायें हुयी है, किंतु वह ब्राह्मण की प्रकृति नहीं है, ब्राह्मण की परंपरा नहीं है, वह अपवाद है और ऐसी घटनाओं की निंदा करने में ब्राह्मण ही आगे भी रहे हैं।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

अथ वर्ण व्यवस्था रहस्यम्

 "जनो यत्कर्म वृणोति स तस्य वर्णः"

अर्थात् कर्म के अनुसार वरण (चयन) किए गए लोग। 
हम अपने गुणों और प्रारब्ध के अनुरूप कर्म का चयन करते हैं। यह प्राकृतिक व्यवस्था है। वरण का आधार कर्म है न कि जन्म। हर व्यक्ति कुछ न कुछ वरण करता ही है। बिना वरण किये उसकी गति संभव नहीं। अस्तु हर व्यक्ति चार में से किसी एक वर्ण का अधिकारी होता ही है। स्पष्ट है कि हम सब सवर्ण ही होते हैं, इसे विशिष्ट बल देकर पृथक करने की आवश्यकता नहीं जैसा कि किया जा रहा है।
स+वर्ण=सवर्ण। वर्ण? चतुर्वर्ण ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)। बस इतना ही classification है, जो प्राकृतिक है। किसी मनुष्य ने नहीं किया यह वर्गीकरण। पूरा विश्व इतने में ही समाहित है। अंतर केवल इतना है कि भारतीयों ने इस वर्गीकरण को समझा और स्वीकार किया, ठीक उन वनस्पति/जन्तुशास्त्रियों की तरह जिन्होंने वनस्पति/जन्तुजगत के प्राकृतिक वर्गीकरण को पहचाना और स्वीकार किया। नामकरण तो व्यावहारिक उपयोगिता के लिए है, जो अपनी-अपनी भाषा और समझ के अनुसार कुछ भी हो सकता है। मटर पैपिलियोनेसी ही रहेगी, यहाँ भी और अफ्रीका या नीदरलैण्ड में भी। मनुष्य होमोसीपिएन्स ही रहेगा भारत में भी और पाकिस्तान में भी। Qualitative or morphological classification is just to understand the nature of any species for our convenience and further study or re-search.

...तो इस तरह सभी सवर्ण ही होते हैं, वास्तव में सवर्णेतर कुछ नहीं है, हो ही नहीं सकता । एससी, एसटी,ओबीसी आदि राजनीतिक छल के लिए गढ़े गये शब्द हैं, जिनका प्राकृतिक व्यवस्था से कोई संबंध नहीं। राजनीतिक छद्म अयोग्यसत्ताओं की आवश्यकता है, समाज की नहीं। समाज की एकजुटता अयोग्य सत्ताओं के लिए घातक होती है इसलिए राजव्यवस्थायें धूर्ततापूर्वक समाज का विभाजन करती हैं। मनुस्मृति या अन्य किसी भी आर्ष ग्रंथ में अनुसूचितजाति, जनजाति, दलित, अगड़ा, पिछड़ा... जैसा कोई उल्लेख नहीं है। बुद्धि, क्षमता, दक्षता, व्यवसाय और आजीविका की दृष्टि से चारो वर्णों में प्रकृति ने कहीं कोई आरक्षण नहीं किया। राजस्थान के मीणा यूपी बिहार के ब्राह्मणों से किसी भी स्तर पर कम नहीं बल्कि आगे ही हैं। किंबहुना, सब सवर्ण होते हैं, अ-वर्ण कोई नहीं होता, हो ही नहीं सकता। अ-वर्ण या सवर्णेतर कहना तो ऐसा ही है जैसे जल को हाइड्रोजन-आॅक्सीजन रहित कहना, सूर्य की किरण को सात रंग से मुक्त कहना...। प्रकाश में सात रंग नहीं होंगे तो वहाँ उजास नहीं अंधकार होगा। सवर्ण न होना प्राणरहित होना है। लोकबोली में सब उसे शव कहते हैं, जो हर किसी को एक दिन होना ही है। अतः भ्रमित न हों, हम सब सवर्ण हैं, यहाँ तक कि दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों को हर दिन धमकाने वाला डोनाल्ड ट्रंप भी।

बुधवार, 28 जनवरी 2026

वोल्गा के पार

आया फिर नव विधान

अब क्या होगा...
पूछ रहे हैं लोग
बढ़ रहा असंतोष
होने लगा अनियंत्रित 
जन आक्रोश।
क्या मिला
बनाकर लोकघाती नवविधान!
हमने बताया
मिला तो है
कोई समझे तब तो!
कोई देख सके तब तो!
समाज में उबाल है,
जातियों में खाइयाँ
हो रही हैं गहरी
और भी गहरी,
तैयारी प्रचंड है
भगाने की हमें
क़ारून दरिया
या
वोल्गा के पार।
सत्ता के लिए
यही तो अनुकूलतम है
बाटम फ़िशिंग के लिए
फेकना होता है उलीच-उलीच
सरल तरल
दूर-दूर
इतनी दूर
कि आ न सके फिर कभी
पलट कर।
दुर्लभ होती है
राजयोग की ऐसी अद्भुत उर्वरता ।
चलो,
हम भगाये जाने से पहले ही
भाग चलें
कहीं और
धरती बहुत बड़ी है,
हम तो अपने तप से
जी लेंगे कहीं भी
जैसे जिये श्रीराम
सरयू के पार
जैसे जिये श्रीकृष्ण
मथुरा से दूर।
हमारी तो चिंता के विषय हैं
माइनस ४० अंक वाले
"डाॅक्टर शाब जी" से
अपनी चिकित्सा करवाने वाले
वे रोगी
जो होंगे
बंधु तुम्हारे ही
सब के सब आरक्षित
शतप्रतिशत ।
हम तो अभी तक
इसीलिए रुके हैं यहाँ
खाकर भी तुम्हारी गालियाँ
होकर भी तुमसे प्रताड़ित 
कि हम तो चले जायेंगे
वोल्गा के पार
या क़ारून के किनारे
या कहीं भी
किसी भी भाड़ में
पर तुम्हारा क्या होगा
हमारे जाने के बाद!

सोमवार, 26 जनवरी 2026

जातीय खाइयों का गहरीकरण

समावेशिता की आड़ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट रेगुलेशन/नए नियम एकपक्षीय होने से देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गहरी असमानता और भेदभाव उत्पन्न करने वाले प्रतीत हो रहे हैं जिसके कारण विशेष रूप से सवर्ण वर्ग के छात्रों का शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य बाधित होने की स्थितियाँ निर्मित हो रही हैं। यह नियम प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध भी है जिसके शिकार सवर्ण छात्र होंगे और देश भर में कुंठा एवं प्रतिभा पलायन की स्थितियाँ उत्पन्न होंगी। शिक्षानीति का उद्देश्य सभी वर्गों को साथ लेकर चलना होना चाहिए, न कि जातीय भेदभाव के आधार पर किसी एक वर्ग के अधिकारों का हनन कर दूसरे वर्ग के लिए अन्यायवर्द्धक उर्वरभूमि तैयार करना। न्याय के नाम पर एक के साथ अन्याय करके दूसरे को उसके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करना किसी भी दृष्टि से सभ्य समाज का प्रतीक नहीं हो सकता। न्याय के नाम पर कोई भी कानून यदि एकपक्षीय होगा तो उसका परिणाम दीर्घकालीन सामाजिक विभाजन के रूप में सामने आ सकता है। ऐसे कानूनों के कारण हर छात्र को आपसी वैमनस्य की स्थिति में धकेले जाने की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। भारत का संविधान समानता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित है। ऐसे में किसी भी निर्णय समिति का "संतुलित, बहुवर्गीय और समावेशी" होना अनिवार्य है। एक ही जाति वर्ग द्वारा लिए गए निर्णय सवर्ण छात्रों के अधिकारों और विश्वास को ही प्रभावित करते हैं।

उक्त कानून में यह भी देखा जा रहा है कि नीति निर्धारण और निर्णय समितियों में सामाजिक संतुलन और विविध प्रतिनिधित्व का अभाव है जिससे कानून की ड्राफ्टिंग पर निष्पक्षता को लेकर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।

अब विचार यह करना है कि—

UGC के इस एकपक्षीय एवं सवर्ण छात्रों के विरुद्ध प्रभाव डालने वाले काले कानून/ड्राफ्ट रेगुलेशन को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए या नहीं!

क्या इस तरह सवर्ण, SC/ST/OBC सहित सभी वर्गों के छात्रों के लिए समान अवसर, मेरिट और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सकेगी!

नीति निर्धारण समितियों में सभी सामाजिक वर्गों का संतुलित और पारदर्शी प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए या नहीं!

क्या इस संबंध में छात्रों, शिक्षकों, शिक्षाविदों एवं राज्य सरकारों से व्यापक संवाद नहीं किया जाना चाहिए!

निर्णय समितियों में सामाजिक विविधता का अभाव क्या किसी नवविधान या नीति को एकपक्षीय,पक्षपातपूर्ण और अविश्वसनीय नहीं बनाता है!

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

पुनः आदिमतंत्र

आदिमतंत्र से
राजतंत्र
अधिनायकतंत्र
और लोकतंत्र से होते हुए
निरंकुशतंत्र तक की यात्रा में
उभय है शक्ति
कभी मर्यादित
कभी अमर्यादित ।

आवश्यक है शक्ति
अनुशासित शासन के लिए
पर संरक्षण की धौंस में पनपी
तुम्हारी निरंकुशता
नहीं है स्वीकार।
भूल गये हो तुम
शक्ति
अमर्यादित हो
तो पलटता है चक्र
शासनतंत्र का।

इस बार
समाप्त हो जाओगे तुम
दुर्लभ भूगर्भीय खनिजों
और तेल के पीछे-पीछे
भागते हुए
कभी इधर
कभी उधर।
बालहठ से भी बड़ा तुम्हारा हठ
कि खेलने दो मुझे
तुम्हारे स्वाभिमान
और सबकी स्वतंत्रता से
अन्यथा
जीने नहीं दूँगा किसी को।
तुम्हारा हठ
कि छीन लूँगा
धरती, नभ और पाताल
सभी लोक और सभी दिशायें
क्योंकि "महान हूँ मैं"।
सबको पता है
तुम्हारा यह सच
जो नहीं पता है तुम्हें
कि इतना बड़ा भी नहीं है
तुम्हारा विषबुझा उत्तरीय
कि ढक सको
पूरी धरती।
हठ
समेट लेने का पूरी धरती
कभी हो सका है पूरा
किसी भी बलशाली का!
सावधान!
समीप ही है
तंत्र का संक्रांति काल।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

धर्म

सतत

पदाघातों से

वाहनों के आघातों से 

कट कर 

हो जाते हैं अ-पथ

वे सुपथ

बढ़ जाता है जिनपर

आवागमन 

पर ...

नहीं होता

सर्वेक्षण 

और जीर्णोद्धार

सतत।

 

निर्जन होना होता है

एक दिन

ऐसे हर पथ को

जहाँ नहीं होता 

सर्वेक्षण 

और जीर्णोद्धार

सतत।


मूल्यविहीन हो जाते हैं 

वे मूल्य

वे विचार

वे सिद्धांत

और वे कर्म

जिनका नहीं होता

समय-समय पर परिमार्जन

और पुनर्मूल्यांकन।


भाग्यवान हैं वे सब

जो रहते हैं सजग

करते हैं स्वागत

आलोचनाओं का

ताकि कर सकें

आत्मावलोकन

और फिर परिमार्जन

देते हुये गति को सम्मान

जड़ता के विरुद्ध।


...तभी तो धर्म है

सनातन...

सार्वकालिक...

और सार्वदेशिक।


गतिमान है ब्रह्माण्ड

गतिमान है जग, 

इस जगत में 

जो ठहर जायेगा 

उसे समाप्त होना होगा

एक दिन

यह सुनिश्चित है।