शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

रावण

श्री राम को सेना सहित समुद्र पार कर श्रीलंका जाने के लिये सेतु का निर्माण करना था । सेतु निर्माण के संकल्प और सफलता के लिये हवन-पूजन आदि कर्मकाण्ड के लिये उस समय के प्रकाण्ड वेद-विद्वान एवं सर्वश्रेष्ठ पुरोहित के रूप में रावण को आमंत्रित किया गया । युद्ध की तैयारी में एक शत्रु को दूसरे शत्रु के सहयोग की आवश्यकता थी । सेतु निर्माण में पुरोहित बनकर रावण ने न केवल अपने शत्रु को सहयोग किया बल्कि यजमान राम को अपने उद्देश्य में सफल होने का आशीर्वाद भी दिया । विश्व इतिहास में नैतिक चरित्र के ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं ।

रावणकृत शिवताण्डव स्तोत्र हर किसी के लिये आसान गायन नहीं है, “जटाटवी गलज्जल प्रवाहपावितस्थले । गलेऽवलम्ब्य लम्बिताम भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्” -जैसे अद्भुत शिवस्तोत्र का रचनाकार रावण, वेद-विद्वान और महान चिकित्सा विशेषज्ञ दशग्रीव हमारी घोर घृणा और तिरस्कार का पात्र हो गया । मंत्र-तंत्र दक्ष रावण रचित कई मंत्रों का प्रयोग तो वे लोग भी करते हैं जो उसके घोर विरोधी हैं और उससे घृणा करते हैं । आप रावण को एक नोटोरियस किंग कह सकते हैं किंतु उसकी उपलब्धियों की क्रेडिट से उसे कैसे वंचित कर सकते हैं!      

सामवेद की ऋचाओं के गायन में प्रवीण रावण ने वेदपाठ के स्वाभाविक उच्चारण के लिये पदपाठकी रचना की जिसे परवर्त्ती वेदपाठियों द्वारा अपनाया गया । शब्द और ध्वनि विज्ञान में दक्ष रावण ने शब्दों के अर्थानुरणन के लिये Onomatopoeia और alteration की विधि विकसित की । ज्योतिष विज्ञान को समृद्ध करते हुये दशग्रीव ने “रावणसंहिता” की रचना की । रावण द्वारा संस्कृत में रचित ग्रंथ प्रकृत कामधेनुने डेयरी एवं विटरनरी साइंस को समृद्ध किया, युद्ध कला के लिये युद्धिश तंत्रकी रचना की, फ़ार्मेकोलॉज़ी को समृद्ध करने के लिये डिस्टिलेशन की पद्धति का विकास किया और अर्क प्रकाशनामक ग्रंथ की रचना की । डाय्ग्नोसिस के लिये नाड़ी विज्ञान पर संस्कृत भाषा में रचना की जिसे आज भी “रावणकृत नाड़ी विज्ञानम्” के नाम से व्यवहृत किया जाता है । स्त्री रोग, प्रसूति तंत्र एवं बाल रोग में निष्णात रावण ने मंदोदरी के अनुरोध पर कुमार तंत्रनामक ग्रंथ की रचना की जिसमें इन विषयों से सम्बंधित एक सौ से अधिक रोगों की चिकित्सा का वर्णन किया गया है । शिव रसतंत्र और टॉक्ज़िकोलॉज़ी के आराध्यदेव हैं इसीलिये प्राचीन भारत के रस साधक” (फ़ार्मेकोलॉज़िस्ट) और टॉक्ज़िकोलॉसिट शिवभक्त हुआ करते थे । रावण की शिवभक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता । मर्करी और सल्फ़र के योग से औषधि निर्माण की विधि को विकसित करने वाला वैज्ञानिक रावण संगीत और कला में भी इस दुनिया को बहुत कुछ दे कर गया है । रुद्रवीणा वादन में दक्ष रावण ने वीणा जैसे एक यंत्र का भी आविष्कार किया जिसे आप रावणहत्था के नाम से जानते और उपयोग करते हैं ।

आज तो किसी रिसर्च का श्रेय लेने के लिये लोग सारी सीमायें तोड़ दिया करते हैं । भाषा-विज्ञान, वेद-विज्ञान, स्वर विज्ञान, युद्धकला, रसशास्त्र (फ़ार्मेकोलॉज़ी), मेडिकल साइंस, डेयरी एण्ड विटरनरी साइंस, ज्योतिष, संगीत, नीतिशास्त्र, प्रशासन और पौरोहित्य आदि में दक्ष विश्रवा पुत्र दशग्रीव वेदपाठी ब्राह्मण होते हुये भी आर्यावर्त्त में तिरस्कृत होता रहा । इस तिरस्कार को जस्टीफाइ करने के सैकड़ों तर्क दिये जाते रहे हैं । किंतु मुझे लगता है कि तिरस्कार की इस तीव्र आँधी में दशग्रीव की विद्वता और अद्भुत विलक्षणता की हम सभी अन्यायपूर्ण ढंग से उपेक्षा करते रहे हैं ।

किसी राजा का तिरस्कार तो हो सकता है किंतु किसी विद्वान और उसकी विद्वता का तिरस्कार किसी समाज के लिये श्राप से कम नहीं होता । भारत में स्वतंत्ररूप से देशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित करने वाले इसरो के वैज्ञानिक नम्बीनारायण के साथ हमने क्या नहीं किया? उन्हें न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक यातनायें भी दी गयीं, बल्कि पच्चीस साल तक जेल में भी बंद रखा गया, किस अपराध में? और इसका परिणाम यह हुआ कि स्पेस शटल के मामले में हमारी आत्मनिर्भरता को दशकों का धक्का लगा । हम लगभग तीन दशक पीछे चले गये ।

लोक हित के लिये राजाओं से जीवनभर युद्ध करने वाले श्रीकृष्ण को मथुरा से पलायन करना ही पड़ा । इसरो में शोध करने वाले हमारे वैज्ञानिक रहस्यपूर्ण ढंग से या तो गायब हो जाते हैं या फिर आत्महत्या कर लेते हैं । प्रतिभा पलायन और आत्महत्या की घटनाओं से आर्यावर्त्त अपनी वैज्ञानिक क्षमताओं को खोता जा रहा है । यदि आप सजग और हर पल चौकन्ने नहीं हैं तो आज कोई भी आपकी रिसर्च चुरा कर सारा श्रेय अपनी झोली में डाल लेता है और आप हाथ मल कर रह जाते हैं । चलिए छोड़िये, हम कलियुग से वापस त्रेतायुग में चलते हैं जहाँ रावण का वध हो चुका है और श्रीराम को अयोध्या लौटने के लिये तीव्र गति वाले वाहन की जुगाड़ करनी है ।

श्रीलंका की धरती पर लड़े गये युद्ध में अयोध्या की विजय हुयी, लंकेश का वध कर दिया गया । विजयी श्रीराम के पास एयरोप्लेन नहीं था, श्रीलंका से वापस आने के लिये उन्हें अपने शत्रु रावण के पुष्पक विमान का सहारा लेना पड़ा । आज के खोजी वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि उस समय श्रीलंका में रावण के पास कई एक एयर हैंगर्स थे जिनमें विमानों को रखा जाता था । यह खोज अभी भी चल रही है ।

जिस रावण का पतन उसके अहंकार के कारण हुआ, उसी ने अपने आराध्य शिव को अपने सिर काट-काट कर समर्पित कर दिये थे । क्या अर्थ है इसका? वाज़ ही अ मॉन्स्टर ऑफ़ टेन हेड्स? नो, मेडिकली सच अ मॉन्स्टर कैन नॉट सर्वाइव, हैव यू सीन अ सच पर्सन इवर? वी मे हैव टू हेड लाइंस इन अवर पाम्स बट नेवर टू हेड्स ऑन अवर नेक । इट इज़ सिम्बोलिक, जस्ट सिम्बोलिक । कथा है कि विश्रवापुत्र बचपन से ही बहुत सुदर्शन और बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न था । माँ ने बच्चे के गले में एक माला पहना दी जिसके मनकों में उसके चेहरे का प्रतिबिम्ब दिखायी देता था । साथियों ने इसीकारण उसे दशग्रीव कहना शुरू कर दिया । किंतु मुझे लगता है कि विश्रवा पुत्र की विलक्षणता के कारण उसे दशग्रीव की संज्ञा दी गयी होगी । ही वाज़ अ सुपर इंटेलीज़ेण्ट पर्सन हैविंग मल्टीडायमेंशनल पर्सनॉलिटी – “बहुमुखी प्रतिभा” । अपने अहंकार को समाप्त करने के लिये ही रावण ने अपनी दक्षतायें और उपलब्धियाँ अपने आराध्य को समर्पित करने का प्रयास किया जिसे सिम्बोलिकली “सिर काट कर चढ़ाना” कहा गया ।  

हमने रावण की बहुत सी उपलब्धियों को अपना तो लिया है किंतु उसका लेश भी श्रेय हम रावण को देना नहीं चाहते । कम से कम ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान में रावण की उपलब्धियों को स्वीकार करते समय हमें उसका ऋणी होना ही चाहिये । हमें विभीषण का भी ऋणी होना चाहिये जिसने रावण की मृत्यु का रहस्य हमारे आराध्य श्रीराम के समक्ष उजागर कर दिया किंतु हमने विभीषण का भी अपमान किया और उसके नाम को ही विश्वासघात का मुहावरा बना डाला । श्रीराम विजयी होकर वापस अयोध्या पहुँचे, तो हमने राम के पारिवारिक जीवन की इतनी निंदा कर डाली कि उन्हें अग्नि परीक्षा के बाद भी अपनी पत्नी को राजमहल से निष्कासित करना पड़ा । हम आर्यावर्त के निवासी न तो रावण के साथ न्याय कर सके, न विभीषण के साथ, न श्रीराम के साथ और न श्रीकृष्ण के साथ । हम अपने सनातनधर्म के साथ भी न्याय कहाँ कर पा रहे हैं! न हम अपने धर्म को अक्षुण्ण रख पा रहे हैं, न अपने मंदिरों को लुटने और तोड़े जाने से बचा पा रहे हैं, न अपने देश की सीमाओं को बचा पा रहे हैं और न अपने समाज को धर्मांतरण से बचा पा रहे हैं फिर भी हमें अपने आर्यत्व पर इतना गर्व है कि हम फूले नहीं समाते । 

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

सावधान ! कोरोना का खेला चालू आहे...

सत्ता में बैठे लोगों ने कोरोना युद्ध की कमान तो अपने हाथ में ले ली लेकिन अब संक्रमण एवं मौतों को नियंत्रित न कर पाने की पराजय का ठीकरा डॉक्टर्स और जनता पर फोड़ कर अपनी अकाउण्टेबिलिटी से पल्ला झाड़ लिया है । कैमरे और लाइट की दुनिया में आने से पहले मैं बायोटेक्नोलॉज़ी का छात्र रहा हूँ और वायरोलॉज़ी एवं सेलुलर बायोलॉज़ी में अच्छी रुचि होने के कारण कोरोना युद्ध के लिये बनायी जाने वाली नीतियों का तमाशा भी समझता रहा हूँ । आज एक-एक कर जब सारी सच्चाइयाँ सामने आती जा रही हैं तो राजनैतिक दलों के प्रवक्ता स्वीकार करने लगे हैं कि केवल सत्ता को ख़ुश करने के लिये वैज्ञानिकों ने झूठे आँकड़े पेश किये और वैक्सीन की असंतोषजनक कार्मुकता को छिपाया । डॉक्टर्स और वैज्ञानिकों पर आरोप लगाते समय असावधानीवश भाजपा के प्रवक्ता धोखे में अपनी कार्यप्रणाली की पोल भी खोलने लगे हैं । सत्ता को ख़ुश करने के लियेयह एक ऐसा सच है जो सत्ता की कार्यप्रणाली, आई.ए.एस. अधिकारियों और वैज्ञानिकों से सत्ता की अपेक्षाओं की वास्तविकता को कटघरे में खड़ा करता है । इसका अर्थ यह हुआ कि सत्ता ऐसा वातावरण निर्मित कर सकने में असफल रही है जिसमें आई.ए.एस. अधिकारी, डॉक्टर्स और वैज्ञानिक सही तथ्य प्रस्तुत कर सकें, वे बाध्य हैं सत्ता को एन-केन प्रकारेण ख़ुश करने के लिये जिसके लिये उन्हें झूठे आँकड़े और झूठी बातें निर्मित करनी पड़ती हैं । इस तरह की कार्यप्रणाली से सत्ता ख़ुश होती है लेकिन उसका ख़ामियाजा जनता को ही नहीं बल्कि पूरी सभ्यता को भुगतना पड़ता है ।

अब जब कोरोना का डबल म्यूटेण्ट दहशत मचाता घूम रहा है और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गयी तो राजनीतिज्ञों ने आरोप लगा दिया कि जनता ने ही नियमों का पालन नहीं किया । राजनीतिज्ञों का दूसरा आरोप है कि डॉक्टर्स ने कोरोना वायरस की प्रकृति, वैक्सीन की कार्यक्षमता और कोविड 19 के उपचार के बारे में सही तथ्यों को छिपाकर सत्ता को अँधेरे में रखा (यानी विश्वासघात किया?) ।

मैं कोरोना के शुरुआती दिनों को याद करता हूँ जब फ़िल्म सिटी में रसूखदार लोग और जनता को उपदेश देने वाले नेतागण गले में मास्क लटकाकर या ठोड़ी के पास सरका कर घूमा करते थे । मौलाना मोहम्मद साद के धार्मिक मरकज़ में देश-विदेश के लोगों का जमावड़ा लगा रहा और दिल्ली के अधिकारी उनसे नियमों का पालन करने के लिये प्रार्थना करते रहे । शाहीन बाग का जमावड़ा हो या किसान आंदोलन का या फिर कुम्भ स्नान का ताजा मामला, सभी जगह भीड़ को नियंत्रित करने में असफल प्रशासन और सरकार ने अपनी दुर्बलताओं और असमर्थताओं का ही प्रदर्शन किया है । एक ओर लॉक-डाउन और ठीक उसी समय अनियंत्रित भीड़ के आगे पानी भरती हमारी सत्ता । जन आंदोलनों और सामूहिक धार्मिक क्रियाकलापों पर न सत्ता का नियंत्रण था और न सुप्रीम कोर्ट ने ही कोई प्रभावी संज्ञान लिया । विरोधाभास की चरम स्थिति के साथ जनता को अपने हाल पर मरने के लिये छोड़ दिया गया और अब सत्ता के प्रवक्ता कहते घूम रहे हैं कि वैक्सीन समाधान नहीं है, हर किसी को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन ही होगा ।

जहाँ तक डॉक्टर्स और साइंटिस्ट्स की बात है तो यह समझना होगा कि सत्ता ने अपने तंत्र को सच बोलने के लिये उपयुक्त स्थितियाँ निर्मित नहीं कीं और जिसने सच बोला भी तो उसकी बात को सुना ही नहीं गया । कोरोना वैक्सीन के वर्तमान इण्डीविडुअल की सेलुलर कार्मुकता अनिश्चित है, उसकी क्षमता और कार्य-अवधि भी बहुत कम है, और सच बात तो यह है कि आज कोरोना की जितनी भी वैक्सीन्स व्यवहार में लायी जा रही हैं वे सब आज भी अपने ट्रायल फ़ेज़ में ही हैं यह इसी से प्रमाणित है कि वैक्सीन के दूसरे डोज़ के अंतराल के बारे में डॉक्टर्स को भी पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ कुछ भी पता नहीं है, सब कुछ अनुमानों और हाइपोथीसिस के सहारे आगे होता जा रहा है । साइण्टिस्ट्स ने तो यह भी बता दिया कि इस वैक्सीन के उपयोग से कोरोना के कई और नये म्यूटेण्ट्स बनने की सम्भावना है और मात्र एक साल बाद ही यह वैक्सीन निष्प्रभावी हो जायेगा । इस सबके बाद भी वैक्सीन के पीछे जनता की गाढ़ी कमायी में आग लगायी जा रही है । दुःखद बात यह है कि जॉन्सन एण्ड जॉन्सन की वह वैक्सीन ख़रीदने का मन भारत ने बना लिया है जिसे उसके वैस्कुलर इम्बोलिज़्म वाले साइड इफ़ेक्ट के कारण अमेरिका ने रिजेक्ट कर दिया है । 

दुनिया भर की प्राचीन सभ्यतायें इस तरह के संकटों का समय-समय पर सामना करती रही हैं । कहीं प्रकृति ने संतुलन बनाया तो कहीं उन्नत सभ्यताओं ने सत्य का अनुसंधान करते हुये सामाजिक जीवनशैली में अस्पर्श्यता को अपनाया । कभी विदेशी आक्रमणकारियों ने तो कभी राजनीतिक बेहयाई ने भारत की प्राचीन जीवनशैली को वैदिक और मनुवादी सोच कहते हुये विकृत किया और सोशल डिस्टेंसिंग को ब्राह्मणवादी अभिषाप कहते हुये छुआछूत की विकृत परिभाषायें गढ़ डालीं जबकि भारतीय समाज की वर्णव्यवस्था नेचुरो-साइंटिफ़िक व्यवस्था रही है जहाँ किसी प्रकार के सामाजिक वर्गभेद का कोई स्थान नहीं होता । आज हर कोई छुआछूत का ही उपदेश “सोशल डिस्टेंसिंग” के नाम से देने लगा है । स्पर्श में डिस्क्रिमिनेशन और भोजन में शुचिता की आवश्यकता को यदि आप छुआछूत कहते हैं तो आज पूरी दुनिया को क्या उसी की आवश्यकता नहीं है?              

कोरोना की दवाइयाँ अज्ञात हैं, रोकथाम के जो ज्ञात उपाय हैं वे संतोषजनक परिणाम दे सकने में असफल रहे हैं फिर भी इलाज़ हो रहा है और रोकथाम के उपाय भी अपनाये जा रहे हैं । आर.टी.पी.सी.आर. कोरोना की विश्वसनीय जाँच नहीं है फिर भी जाँच आवश्यक है । यह उसी तरह है जैसे हमें हमें रेल का टिकट तो लेना पड़ेगा भले ही रेलों का परिचालन पूरी तरह बंद ही क्यों न हो । यह कैसी वैज्ञानिक सोच है जिसका कोई औचित्य मेरे जैसे विज्ञान के विद्यार्थी रहे व्यक्ति की भी समझ से परे है! क्या कोई मुझे बतायेगा कि, -

1-   यह जानते हुये भी कि कोरोना की जाँच के लिये आर.टी.पी.आर. विश्वसनीय उपाय नहीं है, दूसरी ओर वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि फेफड़ों की कोशिकाओं के तरल द्रव्य (ब्रॉन्को-एल्विओलर लैवेज़) की जाँच से कोरोना संक्रमण की कहीं अधिक भरोसेमंद जानकारी मिल सकेगी, तब आर.टी.पी.आर. पर इतना समय और धन ख़र्च करने की क्या आवश्यकता है?  

2-   Marcia Frellick ने 30 मार्च 2021 के अपने एक लेख – “COVID Vaccines could lose their punch within a year” में मौज़ूदा वैक्सीन की हकीकत का बयान कर दिया है और अब यह जानते हुये भी कि वैक्सीन से उत्पन्न होने वाली इम्यूनिटी हमें कोरोना से हमेशा के लिये राहत नहीं दे सकेगी इसलिये हमें इम्यूनिटी की अगली खेप के लिये फिर कुछ नया करना ही होगा, तब वैक्सीन के पीछे इतना पागलपन क्यों?

3-   विश्व के कई देश वैक्सीन ख़रीद पाने की स्थिति में नहीं हैं, पैंडेमिक से मुक्ति के लिये रोकथाम की सामूहिक प्रक्रियायें अपनायी जानी चाहिये । यदि आप वैक्सीन को इतना प्रभावी मानते हैं तो क्या उसके सिद्धांतों का ईमानदारी पालन कर रहे हैं ? ग़रीब देशों में वैक्सीनेशन किये बिना संक्रमण की श्रंखला को तोड़ पाना सम्भव नहीं है, इस बहुत बड़ी चुनौती का किसी के पास क्या समाधान है?

-अचिंत्य की कलम से कोरोना चिंतन 

महल में अब कभी नहीं आयेंगे मँझले युवराज...

दूसरी शताब्दी में सातवाहन राजवंश के राजा सातकर्णी द्वारा स्थापित कांकेर राज्य को भारत की आज़ादी के साथ ही पंद्रह अगस्त 1947 को भारत गणराज्य के एक हिस्से के रूप में सौंप दिया गया था । लगभग दो साल पहले ही कांकेर पैलेस को उसका वारिस मिला था, पूरे महल में ख़ुशियों की बहार आ गयी थी और जॉली बाबा के चेहरे पर आत्मतुष्टि मिश्रित प्रसन्नता की रौनक थी । जॉली बाबा, यानी कांकेर राजपरिवार के मँझले युवराज, यानी महाराज कुमार सूर्य प्रताप देव जी, यानी राजसी गरिमा के साथ सादगी और मिलनसारिता से भरपूर एक व्यक्तित्व । महल के सेवकों के साथ उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता, इतना दोस्ताना कि महल की पुष्पवाटिका हो या फ़ॉर्म-हाउस उन्हें कर्मचारियों के साथ कुछ न कुछ करते हुये देखा जा सकता था ।

वे बहुत कम बोलते और प्रायः पूर्ण मनोयोग से मेरी बातें सुनते रहते । परिचितों के साथ महफ़िल सजाने, लिखने-पढ़ने और अपनी प्राचीन परम्पराओं को सहेजने के शौकीन जॉली बाबा को खाने-पीने का भी शौक हुआ करता । रसोयी में कोई न कोई प्रयोग करते रहना उनका प्रिय खेल हुआ करता । एक दिन उन्होंने सेवक को इशारा करके रसोयी से मेरे लिये गुलगुले मँगवाये । मेरे एक गुलगुला खाते ही उन्होंने मुस्कराते हुये पूछा – “आप इसकी रेसिपी का कुछ अनुमान लगायेंगे”? मैंने ऐसा स्वादिष्ट और फ़्लेवर्ड गुलगुला पहले कभी नहीं खाया था, मैंने मुस्कराते हुये सिर हिलाया – “यह तो आपको ही बताना होगा”। ....और फिर उन्होंने जो कुछ बताया वह मेरे लिये अकल्पनीय था । ऐसे अद्भुत प्रयोग जॉली बाबा ही कर सकते हैं । उन्हें पता था कि मुझे दूध पीना पसंद है, एक रात महल के लॉन में महफ़िल जमी तो मेरे लिये हलके हरे रंग का दूध मँगवाया गया । हल्के फ़्लेवर के साथ स्मूदी जैसा गाढ़ा और स्वादिष्ट दूध, मैंने पूछा – “एक और प्रयोगक्या है इसमें?” जॉली बाबा ने मुस्कराते हुये बताया – “कीवी का पल्प और कुछ और चीजें”। जिन दिनों एपिक चैनल वाले डॉक्टर गौरव मल्होत्रा ने “राजा-रसोयी और अन्य कहानियाँ” के एक एपीसोड में बम्बू चिकेन के बारे में जॉली बाबा पर एक दृश्य फ़िल्माया था उस समय वे “ट्रेडीशनल क्यूजिंस ऑफ़ छत्तीसगढ़” पर एक किताब लिख रहे थे ।

एक दिन सुबह-सुबह पैलेस की दीवाल के पास पके पीले फलों से लदे दो-तीन बड़े वृक्ष दिखायी दिये । पास जाकर देखा, अरे यह तो खिरनी है । मैंने जॉली बाबा को उलाहना दिया – “आपने कभी बताया नहीं खिरनी के बारे में”? मासूम सा उत्तर मिला – “मुझे इसके उपयोग के बारे में कुछ नहीं मालुम इसलिये नहीं बताया”। मैंने कहा – “माइमोसॉप्स हेक्ज़ेण्ड्रा, इसके फल मीठे और पौष्टिक होते हैं, दरगाह पर चढ़ाते हैं लोग । बचपन में उदेतापुर के पास एक खिरनी वाला बाग हुआ करता था, हम बच्चे लोग खिरनी के लिये धमाचौकड़ी मचाया करते थे । बाद में कई साल बाद गाँव गया तो पता चला कि खिरनी वाले बाग का तो अब कहीं नाम-ओ-निशां भी नहीं रहा । इसके बाद मुम्बई में एक बार गोराई बीच पर खिरनी बिकते हुये देखी थी ...और आज एक मुद्दत के बाद यहाँ देख रहा हूँ”।

फ़ॉर्म हाउस पर ट्यूब वेल के हौज़ में ग़र्मियों की एक शाम स्नान की मस्ती, महल की बघवा खोली के गाइड बने जॉली बाबा, राजमहल की एण्टिक्स के बारे में विस्तार से बताते हुये जॉली बाबा, राजमहल के एक हिस्से में अपने विदेशी अतिथियों के लिये पंचकर्म थेरेपी केंद्र खोलने के बारे में विचारविमर्श करते हुये जॉली बाबा, महल के पीछे के खेतों और जंगली पेड़ों पर बैठी चिड़ियों का दूर से उनकी बोली सुनकर ही परिचय कराते जॉली बाबा, महल के दशहरा उत्सव में एक सामान्य नागरिक की तरह भीड़ में खड़े जॉली बाबा ढेरों दृश्य हैं जो आज मेरी आँखों के सामने एक-एक कर आते जा रहे हैं ।

कुछ महीने पहले जॉली बाबा से फ़ोन पर बात हुयी थी, वे मिलना चाहते थे किंतु कोरोना संक्रमण के कारण मेरा पैलेस जाना सम्भव नहीं हो सका । उन्होंने मेरे साथ मिलकर बहुत कुछ करने के लिये कुछ सपने देखे थे, मैं ही समय नहीं निकाल सका । अब वह समय कभी नहीं आयेगा । घूमक्कड़ी के शौकीन जॉली बाबा मात्र पैंतालीस की उम्र में आज सुबह बिना कुछ बताये एक अनंत यात्रा पर निकल पड़े । मैं हतप्रभ हूँ, जॉली बाबा अब नहीं हैं ।

महाराज कुमार सूर्य प्रताप देव 

रॉयल फ़ेमिली के कुछ ख़ुशनुमा पल जो अब स्तब्ध हो गये हैं   

सादगी से परिपूर्ण आम लोगों के साथ महाराज कुमार सूर्य प्रताप देव (सफेद पतलून और टी शर्ट में) 

अपने ही महल के परिसर में भीड़ का एक हिस्सा बने जॉली बाबा (भगवा कुर्ते में)

जॉली बाबा को अच्छा लगता है राजमहल के विभिन्न हिस्सों की साज-सज्जा में पुरानी चीजों का उपयोग 

महल का कोना-कोना आज उदास है ।

कांकेर पैलेस को लगता है जैसे जॉली बाबा यहीं कहीं हैं 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

माओ की जन अदालत में कोबरा बटालियन के जवान की पेशी

         3 अप्रैल 2021 को तर्रेम के जंगलों में हुये गुरिल्ला युद्ध में युद्धबंदी बनाये गये सी.आर.पी.एफ़. की कोबरा बटालियन की 210वीं वाहिनी के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को अंततः 8 अप्रैल को माओ की जनअदालत में पेश किया गया जहाँ उन पर आरोप लगाये गये और फिर निर्णय का अधिकार लगभग बीस गाँवों के हजारों लोगों के जनसमूह पर छोड़ दिया गया । उपस्थित जनसमूह में माओ समर्थकों ने सैन्यबलों पर अत्याचारों का आरोप लगाते हुये सैनिक को सजा देने का आग्रह किया जबकि अन्य कई ग्रामीणों ने रिहा कर दिये जाने का फ़ैसला सुनाया । इट सीम्स टु मी ऐज़ इफ़ स्क्रिप्टेड एण्ड वेल ड्रामेटाइज़ ।

जनताना सरकार की कार्यप्रणाली और जन-अदालत के तौर तरीकों का संदेश प्रसारित किये जाने की दृष्टि से माओवादियों का यह एक प्रदर्शन मात्र था । इससे पहले कोबरा जवान को रस्सी से बाँधकर तीन दिन तक तर्रेम के आसपास के पंद्रह गाँवों में घुमाया गया जिससे माओवादियों के दो उद्देश्य पूरे हुये, पहला यह कि गाँवों में उनकी दहशत की बादशाहत में थोड़ा और इज़ाफ़ा हुआ और दूसरा यह कि उन्होंने सरकार सहित पूरी दुनिया को यह संदेश देने में सफलता प्राप्त कर ली कि दण्डकारण्य में माओ की जनताना सरकार की हुक़ूमत चलती है छत्तीसगढ़ सरकार की नहीं । भारत की स्वतंत्रता के बाद भी कश्मीर से लेकर दण्डकारण्य तक भारतीय सैन्यबलों को कई बार इस तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ा है । यह हमारी सम्प्रभुता के दावों की सच्चायी उजागर करने का एक उदाहरण मात्र है ।

1947 में भारतीय उपनिवेश का सत्ता हस्तांतरण हुआ था जिसको लेकर भारत में रहने वाले कई गुटों में तभी से सत्ता की छीना-झपटी चल रही है । अलगाववाद की तमाम पगडण्डियाँ बन चुकी हैं । भारत को खण्डित कर अपने-अपने कुनबे स्थापित कर हुक़ूमत के सपने देखने वालों की कमी नहीं है । पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सार्वजनिक मंचों से कई बार ख़ून की नदियाँ बहाने और चुनाव के बाद अपने राजनैतिक शत्रुओं को सजा देने की बात कह चुकी हैं । भारत में सत्ता को लेकर ख़ून की नदियाँ बहाने का इरादा रखने वाले लोग लोकतंत्र को मात्र एक हथियार की तरह स्तेमाल करने लगे हैं ।

भारत के सामने अपनी सम्प्रभुता की रक्षा करने की चुनौती है, एक ओर सत्तालोलुप राजनैतिक दल हैं तो दूसरी ओर है माओवादी सरकार जिसके दहशत के साम्राज्य को टक्कर देने का साहस फ़िलहाल कहीं दिखायी नहीं देता ।

अपने लैपटॉप पर यह सब लिखते-लिखते अचानक मेरी दृष्टि सामने एक जगह अटक जाती है जहाँ मैं ईंटों से लदे गधों के एक समूह को एक दूसरे के पीछे जाते हुये देख रहा होता हूँ । मेरी इच्छा होती है कि मैं इस दृश्य को अपने कैमरे के हवाले कर दूँ और कैप्शन में लिख दूँ –“परम्परा ढोते-ढोते हम कितने सहनशील और फिर प्रतिक्रियाविहीन हो जाया करते हैं”।

 –फ़िल्म सिटी नोयडा से अचिंत्य

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

माओगुरिल्लाओं की दिनचर्या की कुछ झलकियाँ, अचिंत्य की कलम से...

देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार शासनतंत्र स्थापित और तिरोहित होते रहते हैं । हो सकता है चीन के समाज और चीनियों की आवश्यकताओं के लिये माओ ज़ेदॉन्ग (माओ-त्से-तुंग) की नीतियाँ उपयुक्त रही हों किंतु कोई भी एक राजनैतिक व्यवस्था सार्वदेशज और सार्वकालिक नहीं हो सकती । चीन ने अपनी आवश्यकता के लिये भारत से बौद्ध धर्म आयात किया तो भारत के कुछ लोगों ने अपनी आवश्यकता के लिये चीन से उनका माओवाद आयात कर लिया । माओवाद यानी हिंसा से सत्ता की प्राप्ति ।

विश्व भर के रक्तरंजित इतिहास से तो हमने यही जाना है कि सत्ता का रास्ता बंदूक की नली से होकर गुजरता है ...किंतु हमेशा नहीं । सत्ता का रास्ता छल से भी होकर गुजरता है और शिवत्व की राह से होकर भी । फिर भी कोई भी सत्ता आज तक कभी स्थायी नहीं हो सकी । ओट्टोमन साम्राज्य की तरह ब्रिटिश साम्राज्य और मुगल सल्तनत को भी अंततः एक दिन अस्त होना ही पड़ा ।    

यहाँ प्रस्तुत हैं जनवादीक्रांति की राह पर बस्तर के जंगल में माओगुरिल्लाओं के एक दिन की कुछ झलकियाँ –   

भारतीय सुरक्षा बलों को गोलियों और विस्फोटकों से उड़ाने के लिये साथियों को अंतिम निर्देश देते गुरिल्ला अधिकारी 

माओ का सांस्कृतिक विभाग, रात में मोटर सायकल की हेड लाइट की रोशनी में जनवादी गीतों और नाटकों के माध्यम से ब्रेन वाश के रिहर्सल की तैयारी 


भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) की जनताना सरकार के गुरिल्ला अधिकारी

 बुलंद हौसलों के साथ माओवादियों का प्रचारतंत्र, कामरेड गुरिल्लाओं के पीछे ट्राईपोड्स पर रखे हैं उनकी गतिविधियों की शूटिंग के लिये जंगल में अत्याधुनिक कैमरे


रक्तक्रांति के लिये जंगल में गुरिल्लाओं की ट्रेनिंग

जंग का ऐलान, माओ कैम्प में हथियारों के ज़खीरे का निरीक्षण और प्रदर्शन

जंगल है सर्वाधिक सुरक्षित ठिकाना, घर भी वही, युद्धक्षेत्र भी वही और जनताना सरकार का कार्यालय भी
 वही 


गुरिल्ला टुकड़ी ने भोजन तैयार कर लिया है, भारत सरकार को अपनी निर्भयता और बुलंद हौसलों का संदेश देने के लिये भोजन से ठीक पहले एक फ़ोटो सेशन भी ज़रूरी है 

रक्तक्रांति की राह पर, जंगल में अगले पड़ाव की योजना बनाते माओगुरिल्ला 

जंगल-जंगल रक्तक्रांति के लिये लाव-लश्कर के साथ भोजन के बाद अगले पड़ाव की ओर, साथ में है दवाइयों की पेटी लिये एक महिला गुरिल्ला

स्थानीय निवासियों के ब्रेन वाश की तैयारी में ढपली और जनवादी गीतों के साथ माओगुरिल्ला मण्डली


बस्तर के जंगलों में माओ का संसार, अचिंत्य की कलम से...

         बस्तर के जंगलों में माओ के संसार ने अपनी जड़ें जमा ली हैं । यहाँ माओ की जनताना सरकार की हुकूमत चलती है । जिस देश में ज़रूरी फ़ाइल्स वर्षों नहीं सरकतीं उसी देश में लाल सरकार का कोई सैनिक कागज के कटे-फटे टुकड़े पर लाल रंग से टूटी-फूटी हिंदी में एक हुकुम जारी कर सड़क किनारे किसी पेड़ के तने पर चस्पा कर देता है तो नेशनल हाइवे थम जाता है और भारतीय रेलवे के कोत्तावालसा-किरंदूल मार्ग पर चलने वाली सारी रेलगाड़ियाँ एक-एक सप्ताह तक साँस लेना भी भूल जाती है । भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओ) का सशस्त्र सैन्य संगठन जनताना सरकारके नाम से बस्तर सम्भाग के दण्डकारण्य क्षेत्र सहित छत्तीसगढ़, झारखण्ड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, और मध्य प्रदेश के कई जिलों में एक समानांतर सरकार चलाता है ।

माओ गुरिल्ला क्रूर और वीभत्स युद्ध के लिये जाने जाते हैं । सैन्यबलों के साथ माओ गुरिल्लाओं की अक्सर मुठभेड़ें होती रहती हैं । दोनों पक्षों से मारे जाने वाले लोगों में जनजातीय समूह के लोग भी होते हैं जिनके अधिकारों के लिये इस जंग का दावा किया जाता है ।

दुनिया भर के जंग लड़ने वाले लोग अपनी जंग और विचारधारा को जस्टीफाई करने के लिये असुरक्षा, भय और शोषण से मुक्ति का तर्क देते आये हैं । जनताना सरकार के जनमिलिशिया सदस्य जंगल के लोगों को बताते हैं कि भारत सरकार की नीतियाँ उनके अधिकारों को छीन लेने वाली हुआ करती हैं जिसके कारण वे असुरक्षित हैं, पूँजीपति उनका शोषण करते हैं जिसके कारण वे ग़रीब हैं, पढ़ने-लिखने से अधिक महत्वपूर्ण है जनवादी युद्ध लड़ना । उन्हें बताया जाता है कि जल-जंगल-ज़मीन पर केवल उन्हीं लोगों का अधिकार है, सरकार का नहीं । मैं इस ज़स्टीफ़िकेशन को अर्धसत्य का कूट प्रस्तुतिकरण मानता हूँ ।

कई गाँवों में सरकारी स्कूल और अस्पताल ढहा दिये गये हैं किंतु जंगल में जनताना सरकार की पाठशालायें चलती हैं जिनमें माओवाद की शिक्षा दी जाती है और ढपली बजाकर क्रांति के गीत गाना सिखाया जाता है । आम दुनिया से अलग जंगल में एक दूसरी दुनिया विकसित हो चुकी है जहाँ के नियम-कानून-क़ायदे बिल्कुल अलग हैं । उस दुनिया के लोगों को विश्व के समग्र इतिहास के केवल काले पृष्ठ ही पढ़ाये जाते हैं । उनका धर्म ख़ूनी क्रांति है, उनका कर्म ख़ूनी क्रांति है जिन्हें ख़त्म करने के लिये सरकारों द्वारा वादे और दावे किये जाते रहे हैं, दूसरी ओर दशकों से ये तथाकथित क्रांतियाँ होती रही हैं । वादे और दावे आज भी किये जाते हैं, क्रांतियाँ आज भी होती रहती हैं ।   

लगभग दो दशक पहले बस्तर के जंगलों में फ़िनलैण्ड के ट्राइब्स से मेरी भेंट हुयी थी । मुझे बताया गया था कि वे बस्तर में जल, जंगल, ज़मीन पर जंगल के लोगों के अधिकारों की स्थिति का आकलन करने आये थे । वनोपजों को लेकर सरकारों और बिचौलियों की भूमिका पर माओवादियों की अंगुली बाबा साहब की अंग़ुली वाली मूर्ति की तरह स्थिर हो चुकी है । सरकारों और माओवादियों के अपने-अपने दावे हैं । सरकारें दावा करती हैं कि उन्होंने ट्राइब्स के विकास के लिये बेहतरीन व्यवस्थायें और योजनायें बनायी हैं जबकि माओवादी दावा करते हैं कि सरकारें ट्राइब्स का शोषण करती हैं ।

पिछली शताब्दी के सन् 1991 में दक्षिण बस्तर स्थित उसूर विकासखण्ड में प्रवास के समय मुझे बताया गया कि माओवाद का गढ़ माने जाने वाले उस विकासखण्ड के थाने में साल भर में मात्र अंगुलियों पर ही गिने जा सकने लायक कुछ साधारण से अपराध पंजीबद्ध होते हैं । अपराध करने के बाद अपराधी स्वयं ही थाने जाकर सूचना देता है और आत्मसमर्पण कर देता है । स्थानीय लोगों की आवश्यकतायें बहुत सीमित हुआ करती हैं, वहाँ दहशत का साम्राज्य तब भी था आज भी है किंतु वहाँ का आम आदमी तब भी मस्त था आज भी मस्त है, सरकारें और माओवादी तब भी अपना-अपना काम किया करते थे आज भी किया करते हैं, सरकारी दफ़्तरों में रिश्वतखोरी और सरकारों के विरुद्ध माओ की ख़ूनीक्रांति की जुगलबंदी तब भी थी आज भी है, सरकारी दफ़्तरों के अधिकारियों-कर्मचारियों में माओवाद से दहशत तब भी थी आज भी है किंतु पता नहीं यह कैसी दहशत है जो रिश्वत लेते समय तब भी कहीं काफ़ूर हो जाया करती थी आज भी कहीं काफ़ूर हो जाया करती है । यह एक अद्भुत रहस्य है जिसमें हमारी व्यवस्था और माओवाद का सम्मिलित दर्शन समाया हुआ है । इस दर्शन की एक छोटी सी झलक सन् 2014 में विवेक अग्निहोत्री की फ़िल्म बुद्ध इन अ ट्रैफ़िक जाम” (Buddha in a Traffic jam) में देखने को मिल जायेगी ।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कोरोना से लड़ाई में आपके दायित्व, आपकी तैयारी...

लॉक-डाउन के तमाम नियमों और वैक्सीन को धता वताते हुये कोरोना वायरस ने अपने पैर पसारना जारी रखा है । पोस्ट वैक्सीनल वैस्कुलर इम्बोलिज़्म की कुछ घटनाओं के बाद गायनेकोलॉज़िस्ट डॉ. तस्लीमा नसरीन भी डर गयी हैं और अब दूसरा शॉट लेने का निर्णय नहीं ले पा रही हैं । ऐसी द्विविधा बहुत से लोगों के साथ है ।

कल एक शिक्षित महिला ने मुझसे पूछा – “मैंने मात्र दो दिनों के अंतराल पर अपनी आर.टी. पी.सी.आर. जाँच करवायी । पहली बार यह रिपोर्ट पॉज़िटिव थी जबकि ठीक दो दिन बाद ही निगेटिव हो गयी, क्या ऐसा सम्भव है”? रायबरेली के नीरज वाजपेयी बताते हैं कि आर.टी. पी.सी.आर. की जाँच रिपोर्ट में आने वाली भिन्नताओं से लोगों के मन में संदेह उत्पन्न होने लगे हैं और आम आदमी इसे विश्वसनीय नहीं मान पा रहा, वह बात अलग है कि इसके बाद भी आम आदमी के पास आर.टी. पी.सी.आर. का कोई विकल्प नहीं है । 

इधर न्यूली म्यूटेण्ट कोरोना वायरस ने भी अपने शौर्य प्रदर्शन में परिवर्तन कर लिया है । लंग्स फाइब्रोसिस की विकृति होना अब आवश्यक नहीं है बल्कि नये कोरोना सिण्ड्रोम में आँखों की कन्जेंक्टीवाइटिस, सिरदर्द, बुख़ार, पेट में दर्द या दस्त की शिकायतें मिलने लगी हैं । वैक्सीन से होने वाली इम्यूनिटी की अधिकतम अवधि छह माह होने की उम्मीद की जाती है । ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिये यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है ।

मैं लोगों से पूछता हूँ इतनी बड़ी समस्या से निपटने के लिये आपने क्या तैयारी की है? ड्रॉपलेट इन्फ़ेक्शन को न्यूनतम करने के लिये आप क्या करते हैं? क्या आपने पारिस्थितिक अनुकूलन के लिये अपनी जीवनशैली में कोई परिवर्तन किये हैं? मुझे इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते । सब्जी वाले जोर-जोर से चिल्लाकर सब्ज़ी बेचते है जिससे उसके सामने रखी सब्ज़ियों की सतह पर ड्रॉपलेट्स की एक पर्त बन जाती है । मिठायी वाले जिस हाथ से करेंसी का लेन-देन करते हैं उसी हाथ से मिठायी भी तौलते हैं । स्थानीय प्रशासन से इसे रोकने का लिखित अनुरोध करने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी... किंतु आम आदमी ने अपने स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिये क्या रास्ता निकाला?

ध्यान रखें, कोरोना वायरस को पसंद है मोटापा, हृदयरोग और मधुमेह । कोरोना वायरस सबसे पहले और सर्वाधिक इन्हीं तीन व्याधियों वाले लोगों को अपना शिकार बना रहा है । इन तीनों व्याधियों का सम्बंध रिफ़ाइण्ड ऑयल के सेवन से भी जुड़ा हुआ है । मैं, विगत कई वर्षों से इस सम्बंध में विभिन्न आलेखों के माध्यम से लोगों को सचेत करता रहा हूँ । एक बार फिर से स्मरण करा दूँ कि किसी तेल को रिफ़ाइन करने की प्रक्रिया में जिस पेट्रोकेमिकल हेक्सॉनका स्तेमाल किया जाता है वह अपने आप में कैंसर उत्पादक है । रिफ़ाइण्ड ऑयल के स्तेमाल से ट्राईग्लिसरॉयड का संतुलन भी बिगड़ता है जिसके कारण मोटापा, वैस्कुलर डिस-ऑर्डर्स और हाई ब्लडप्रेशर की शिकायतें हो सकती हैं । आपको यह भी समझना होगा कि आजकल उच्च तापमान पर तेल निकालने की दोषपूर्ण प्रक्रिया प्रचलन में आ चुकी है जिसका विरोध वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता रहा है । घानी से तेल निकालने की प्राचीन प्रक्रिया ही सर्वथा उचित प्रक्रिया है इसलिये अब हमें अपने रसोयी घर से रिफ़ाइण्ड ऑयल को हटा कर घानी से निकाले हुये वर्जिन ऑयल का ही स्तेमाल करना होगा ।

फेफड़ों की बीमारियाँ भी कोरोना को पसंद हैं, इसलिये पल्मोनरी ट्युबरकुलोसिस और दमा जैसी बीमारियों वाले लोगों को भीड़भाड़ से बचना होगा । बर्थडे पार्टी में हमने केक के ऊपर मोमबत्ती सजा कर मुँह से फूँक मारकर बुझाने की अत्यधिक अन-हायजेनिक परम्परा को अपना लिया है । एक ओर हम ड्रॉपलेट इन्फ़ेक्शन रोकने की बात करते हैं और दूसरी ओर फूँक मारकर पूरे केक को ड्रॉपलेट्स से सराबोर कर देते हैं । क्या आपने ऐसे केक का बहिष्कार करना शुरू किया है? सरकारों को दोष देना बहुत आसान है किंतु शायद पहले और सबसे बड़े दोषी हम स्वयं ही हैं ।

कोरोना वायरस को निष्क्रिय करने के लिये अभी तक कोई दवा नहीं मिली है किंतु एण्टीऑक्सीडेण्ट्स, विटामिन सी और हल्दी मिले दूध के निरंतर उपयोग से शरीर में प्रवेश करने वाले किसी भी वायरस के फैलाव को रोकने में मदद मिलती है । कोरोना की युद्ध शैली गुरिल्ला वार की तरह होती है । वैक्सीन हमारे शरीर में माइक्रॉब्स से लड़ने के लिये एक उपयुक्त फ़ौज़ भर तैयार करती है । स्पष्ट है कि इस युद्ध से बेहतर है युद्ध की स्थितियों को समाप्त करना । इसलिये वैक्सीन लेने के बाद भी पूरी सावधानी अनिवार्य है । ध्यान रखें, वैक्सीन लड़ाई को गति देने का एक माध्यम है, लड़ाई को होने से रोकने का अंतिम उपाय नहीं ।