राजनीतिक काकटेल, बोले तो सम्मेलन ब्राह्मणों का, प्रबोधन ब्राह्मणद्वेषी का !
चलिये, मूल विषय पर आते हैं। प्रयागराज का प्रबुद्ध सम्मेलन, सम्मेलन में केशव मौर्य की जनसभा, जनसभा में ब्राह्मण द्वारा अब्राह्मण से प्रश्न पूछने पर मिश्र जी ने तिवारी जी को थप्पड़ मारा।
साधारण सी घटना है, किंतु मारने वाला पार्षद है और मार खाने वाला एक सामान्य नागरिक इसलिए घटना का मंथन करने पर अर्थ बहुत गंभीर और चिंताजनक निःसृत होते हैं।
ब्राह्मण ने ब्राह्मण को मारा।
इसे यूँ भी कहा जा सकता है "दुष्ट ने शुद्ध को प्रताड़ित किया" अथवा "अन्याय ने न्याय को दंडित किया" अथवा "दबंग ब्राह्मण ने दलित ब्राह्मण को पीटा" अथवा "अधिनायकतंत्र ने लोकतंत्र का कंठ दबा दिया" अथवा "टोले के राजा ने अपनी प्रजा को अहंकारवश मारा"।
घटना एक ही है, विभिन्न कोणों से भिन्न-भिन्न संकेत देने वाली एक घटना जो मस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करती अपितु क्रांति का आह्वान करती है और ब्राह्मणत्व पर प्रश्न भी खड़े करती है।