रविवार, 12 अप्रैल 2026

हिंदूधर्म

वह सत्ता पाने के लिए धर्म को पृथक  पहचान देता है। उसके नाम में स्वामी है, प्रसाद है और मोर है। तीनों शब्द उस धर्म के अनुयाइयों और संस्कृति में आदरणीय हैं जिसे भारत में "धर्म" की संज्ञा प्राप्त है।

वैदिकभारत के महर्षियों ने सामाजिक और व्यक्तिगत मूल्यों की ऊर्ध्वमुखी गति को प्रशस्त मानते हुये कुछ श्रेष्ठ आचरणों और मनोभावों को पहचान कर लोकहित में प्रकाशित किया, और इसे धर्म की संज्ञा दी। कदाचित् प्रारंभ में यह ब्राह्मणों द्वारा आचरणीय हुआ, इसलिए यह लोक में ब्राह्मणधर्म नाम से भी जाना गया। इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य तीनों वर्णों का धर्म से कोई विरोध था। सभी लोग धर्म के प्रति आदरभाव रखते थे और अपनी-अपनी क्षमतानुरूप उसके आचरण का प्रयास करते थे। शतप्रतिशत अंक लाने वाले को धार्मिक और दस अंक लाने वाले अधार्मिक कभी नहीं माना गया। अधार्मिक वही थे जो धर्मप्रतिकूल आचरण किया करते थे। इस तरह आचरण के आधार पर दो समूह के आचरण वाले समाज में सदा से देखे जाते रहे हैं, आज भी हैं- धार्मिक और अधार्मिक। अपनी पृथक पहचान के लिए ध्वज, नाम, संज्ञा आदि में बहुलता और विशिष्टता एकदेशज तो हो सकती है पर व्यापक नहीं। वैदिक धर्म को ही विभिन्न कालखंडों में ब्राह्मण धर्म, आर्य धर्म या हिंदू धर्म की संज्ञायें दी जाती रहीं, इन सबकी पहचान एक ही है, तात्विक अवधारणा भी एक ही है। इसलिये यह कहना कि हिंदू धर्म का कोई शास्त्रोक्त उल्लेख नहीं है, उतना ही सत्य है जितना यह कहना कि भारत और इंडिया दो पृथक देश हैं क्योंकि वेदों-पुराणों आदि में तो इंडिया कहीं लिखा ही नहीं है।
परवर्ती कालों में स्थानीय मान्यताओं, मूल्यों और सभ्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न मत और संप्रदाय भी अस्तित्व में आते रहे जिन्हें राजनैतिक कारणों से धर्म न होते हुये भी धर्म की संज्ञा दी जाती रही। इस सौरमंडल में धरती एक है, सूर्य एक है, धर्म भी एक है, ये अनेक नहीं हो सकते।
सभी धर्म ईश्वर का मार्ग बताते हैं, यह बड़ी धूर्तता से गढ़ा गया कुविचार है जैसे यह विचार कि ब्रह्माण्ड के सभी स्थूल पिंड एक समान होते हैं।
धर्म को लेकर नाम और पहचान का संकट राजनैतिक धूर्तता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हाँ! इसे कलियुग में पतन की प्रतिस्पर्धा अवश्य माना जा सकता है।
विविथता और अनेकता में एकता का उपदेश कितना तात्विक है!
सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, धूम्रकेतु, वामन तारा और कृष्णविवर आदि ब्रह्माण्डीय पिंडों के विभिन्न समूहों को एक ही कैसे मानना जा सकता है? यदि ये सब एक ही होते तो इनकी विविथता का कोई औचित्य ही नहीं था। सबका रक्त एक समान होता तो इनके चार समूह क्यों होते और क्यों उनमें इनकाम्पेटिबिलिटी होती?
सत्ता के लिए निर्मित चक्रव्यूहों का अस्तित्व उनके पूर्ण होने तक ही रहता है, उसके बाद नहीं। धर्म और अधर्म का ध्रुवीय अस्तित्व सदा रहता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

भगनील दर्शन

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा!

जिसमें मिला दो, लागे उस जैसा ।।

संघ और भाजपा का अध्यात्म दर्शन इसी महान गीत से ऊर्जित है। संघ और भाजपा के अभी तक के चरित्र और कार्यों से स्पष्ट हो चुका है कि उनका अपना कोई रंग नहीं, अपना कोई सिद्धांत नहीं, अपना कोई चिंतन और विचार नहीं। उनका एकमात्र लक्ष्य और धर्म राजसिंहासन है जिसे प्राप्त करने के लिए वे जिसमें "मिलते" हैं उसका ही रूप-रंग-सिद्धांत-आदर्श ...सब कुछ "ग्रहण" कर लेते हैं। आप इसे चार्वाक दर्शन का परिवर्द्धित रूप मान सकते हैं।
इसका वर्तमान उदाहरण विचारणीय है, जिसमें भाजपाइयों का रंग भगवा से नील हो गया है, यही है भगनील दर्शन। वास्तव में यह तो 'हमारा' मूल्यांकन था कि संघ और भाजपा सनातन संस्कृति के लिए समर्पित संगठन हैं। हमारा यह मूल्यांकन त्रुटिपूर्ण था, सत्य यह है कि ये लोग न कभी भगवा थे, न आज नीले हैं, न कभी हरे होंगे। ये लोग अपने लक्ष्य के लिए भगवा, नीला, हरा... या किसी भी अन्य रंग में अपनी सुविधानुसार मिल कर वैसा ही रंग-रूप-ग़ुण-सभ्यता-संस्कृति... आदि ग्रहण कर लेने की "अनुकूलन क्षमता" से संपन्न हैं। ये प्रवचनप्रिय लोग सतोगुण से द्वेष रखते हुये रजोगुण और तमोगुण प्रधान हैं तभी तो इतने घनघोर भौतिकवादी हैं। रजोगुण की एक विशेषता होती है- Association and Dissociation, अर्थात इन्हें स्थायित्व अच्छा नहीं लगता। इसको अपनाया, उसको त्यागा, भगवा त्यागा, नीला अपनाया, कल को नीला त्यागकर हरा अपना लेंगे, फिर कुछ समय पश्चात हरा त्यागकर काला अपना लेंगे। इससे एसोसिएशन, उससे डिसोसिएशन... किसी भी तरह चिड़िया की आँख का बेधन होना चाहिए। यही सच्चा ईश्वर है, यही सच्चा धर्म है, यही सच्चा मार्ग है, ....और जीवन का सारतत्व भी यही है। जब पूरा देश "हिंदुत्वा" के चक्रव्यूह में उलझा हुआ था तब संघ और भाजपा अपने अगले रंग का चयन करने में व्यस्त थे। नील तो आ गया, अब हरित रंग की प्रतीक्षा है।
अब यह अष्टकुलीय वज्जीसंघ की प्रजा को निर्णय करना होगा कि मगध के राजसिंहासन का रंग क्या होना चाहिए!

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

नया भगवान

हठ कर बैठ गया

आमरण अनशन पर
सोचकर
कि कल तक
पंक्तिबद्ध खड़े होंगे
कई मंत्री
लेकर संतरे का रस।
मैं नहीं पिऊँगा रस
करूँगा हठ
"मैं तो चंद्र खिलौना लै हों"।
फिर
जब मनुहार करेगा विश्व
तो पी लूँगा रस
गटागट
फिर मैं करूँगा
विजयनृत्य
जय जयकार होगी मेरी
मिल जाएगा मुझे
धरती का सबसे बड़ा पुरस्कार
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।

पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

धूम्रकेतु

संविधान है तो क्या हुआ
दिन-प्रतिदिन बढ़ते अत्याचारी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
वेद हैं तो क्या हुआ
अज्ञानी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
राम-कृष्ण की गाथायें हैं तो क्या हुआ
गाथाओं के उपहासक भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।

विक्रय हेतु उपलब्ध हैं
मंडी में मूर्तियाँ
निराकार की
होने के लिए व्याख्यायित
हमसे, तुमसे
और उनसे भी
जिन्हें नहीं होता कोई लेना-देना
किसी भी मूर्ति से।

न्याय के मंदिर में
नहीं सुनाई देती पवित्र शंखध्वनि
सुनाई देती हैं व्याख्यायें
भिन्न-भिन्न
एक ही धारा की।
सच कभी 'झूठ' हो जाता है
तो झूठ भी हो जाता है 'सच'
झूठ नहीं हो पाता 'झूठ'
सच नहीं हो पाता 'सच'
मौन रहती हैं सूर्य रश्मियाँ
नतशिर
कंपित
देखकर सूर्य को
जाते हुए अस्ताचल।

चर्चित होते हैं
कुछ पात्र
अपनी मृत्यु के पश्चात
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ।
राम, कृष्ण, बुद्ध और ईसा
गांधी, भीमराव और पेरियार
जीवित होते तो देखते
वे क्या थे, क्या हो गये
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ
जिनका नहीं है कोई संबंध
उनके होने से।

आने वाला है
लोकतंत्र का पंचवर्षीय पर्व
भगवा 'नीला' हो गया है
'नीला' भीम हो गया है।
कहा था वेदव्यास ने
आते ही अरुण के
नहीं रहता शून्य का नील
और नील जब होता है व्याप्त
कर देता है वध
अरुण का।
अरुण
अब नहीं है कहीं
धूम मची है
भीम की
पिछड़ा भीम, अगड़ा भीम
मेरा भीम, तेरा भीम
इसका भीम, उसका भीम
जितने लोग, उतने भीम।
भीम 'संविधान' हो रहा है
संविधान 'भीम' हो रहा है।
शक्ति 'सीता' बनकर
बैठी है शोकमग्न
अशोक वृक्ष के नीचे
श्रीराम की प्रतीक्षा में।
सीता के लिए
स्थायी है तमस
आने-जाने का काम तो
प्रकाश का है
जिसे
अब चाहता ही कौन है!

बहुत शक्तिशाली हैं
मायावी धूम्रकेतु
कोई वाशिंगटन में
कोई तेहरान मे
और भारत में तो
बड़ी भीड़ है इनकी।
क्या सचमुच
तैयार हो रहा है समय
लेकर करवट
सत्यमेव जयते के लिए!

रविवार, 5 अप्रैल 2026

शत्रुबोध की पैथोलाजिकल फिलासफी

आज का ज्वलंत विषय है नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा अर्थात अपसंस्कृति का कूटनीतिक चरित्र।

विश्व भर में नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा वर्तमान सभ्यता की सबसे बड़ी समस्यायें बन चुकी हैं। इनका मानवीकरण किया जाय तो ये वैचारिक और राजनीतिक हिंदूकुश की घटनायें हैं जो प्रतिपल घटित होती जा रही हैं।

दर्शन और भौतिक विज्ञान में सूक्ष्म की विराटशक्ति को स्वीकार किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से एक हिंदू संगठन को हम अपने सनातनी समाज का एक महत्वपूर्ण अंग मानते रहे, इतना अपना कि अपने शरीर की सूक्ष्मकोशिका और कभी-कभी कोशिकाअवयव के समान... यानी एक माइक्राॅन से भी सूक्ष्म, जिससे वह सनातनी समाज में विराटशक्ति के साथ स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण कर सके। किंतु हुआ क्या! संगठन ने हमारी सदाशयता का लाभ उठाकर नैनोप्लास्टिक की तरह मिमिक्री प्रारम्भ कर दी। एक विधर्मी द्रव्य को हम पहचान नहीं सके और उसे अपने ही पोषण के अंश से प्रोटीन-कोरोना बनाते रहे। 
(Cells often mistake nanoplastics for nutrients or foreign agents and actively pull them inside via processes like endocytosis or macropinocytosis. Once inside, they can accumulate in organelles like lysosomes. Upon entering biological fluids, nanoplastics interact with proteins, lipids, and carbohydrates, creating a "protein corona" around themselves. This coating makes them behave like biological particles, masking them from immediate immune clearance and allowing them to be transported throughout the body.)
संगठन के सूक्ष्म विचार जो कि वास्तव में संकुचित थे, ब्लड-ब्रेन-बैरियर को बड़ी सुगमता से पार कर तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचने लगे। संगठन की कार्यप्रणाली नैनोप्लास्टिकवत हमारी मस्तिष्क की तंत्रिकाओं की एपोप्लास्टी (कोशिका मृत्यु) की कारण बनती गई और हमें कुछ भी पता ही नहीं चला।
(Nanoplastics can trigger cell membrane damage, oxidative stress, and inflammatory responses,releasing cytokines, similar to the body's response to pathogens. They can impair energy metabolism, disrupt mitochondrial function, and cause cellular apoptosis i.e. cell death.) 
जहाँ संगठन नैनोप्लास्टिक की तरह हमारे चिंतन को प्रभावित कर एपोप्लास्टी का कारण बनता गया वहीं उसके राजनीतिक प्रकल्प हमारे विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध करते रहे और हम कुछ समझ ही नहीं सके। सनातनियों के प्रति उसकी कार्यप्रणाली कार्सिनोमा की तरह फलती-फूलती रही। कार्सिनोमा कोशिकायें हमारी सामान्य कौशिकाओं का रूप धारण कर हमें ही खाती रहीं और हमें अपने भीतर छिपे शत्रु की भनक तक नहीं लगी।

संघ, सिकलिंग और सवर्ण

यह गंभीर चिंता का विषय है कि डाॅक्टर होने के बाद भी मोहन भागवत अंतरजातीय रोटी-बेटी व्यवहार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। भागवत की गतिविधियाँ महर्षि परंपराओं के विरुद्ध म्लेच्छ परंपराओं की स्थापना के समर्थन में बढ़ती ही जा रही हैं। यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संहारक प्रहार है जिससे सतर्क होने की आवश्यकता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और इंद्रेश कुमार के बीच हुयी एक वार्ता के अनुसार संघ के प्रयासों से दस लाख हिंदू लड़कियों के निकाह मुस्लिम लड़कों से करवाये जा चुके हैं।
संघ के मोहन भागवत इस तरह की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करके सवर्ण समुदाय को भारत से पूरी तरह समाप्त कर देना चाहते हैं।
रोटी व्यवहार तो पूरे भारत में अंतरजातीय ही नहीं अंतरधार्मिक भी स्वीकार किया ही जा रहा है। किंतु अंतरजातीय बेटी व्यवहार स्वीकार करने से पहले चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से भी इसे समझना होगा। जिन्होंने सिकलसेल डिसीज के पीड़ितों की विभिन्न पीड़ादायक स्थितियों को देखा है वे इसकी गंभीरता को अच्छी तरह समझ सकते हैं।
यहाँ सवर्णेतर जातियों में होने वाली सिकलिंग और थैलेसीमिया जैसी आनुवंशिक और अचिकित्स्य व्याधियों के संदर्भ में मोहन भागवत के विचार को समझे जाने की आवश्यकता है।
सिकलिंग जैसी आनुवंशिक व्याधियों से सर्वाधिक प्रभावित लोगों में एसटी के बाद एससी और फिर पिछड़ी जातियाँ हैं, जबकि सवर्ण इस व्याधि से पूरी तरह मुक्त रहते हैं(इस अनुबंध के साथ किसी सवर्ण ने सिकलिंग प्रभावित के साथ अंतरजातीय विवाह न किया हो)
एक अध्ययन में पाया गया है कि सिकल सेल डिसीज एस.सी.डी., सिकल सेल ट्रेट (एस.सी.टी.) और एचबीएस-बीटा-थैलेसीमिया की व्यापकता क्रमशः 1.17% (95% सीआई: 0.79%–1.75%), 5.9% (95% सीआई: 3.8%–8.88%) और 0.37% (95% सीआई: 0.17%–0.83%) अनुमानित की गई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में एस.सी.डी. और एस.सी.टी. की व्यापकता अधिक है। भारत के आदिवासी समुदायों में इसका बोझ सर्वाधिक है।
सिकलिंग और थैलेसीमिया व्याधियों की कोई भी चिकित्सा अभी तक संभव नहीं है। भारत के 17 राज्यों अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और उत्तराखंड में SCD की प्रायिकता अधिक है। 
अन्य प्रभावितों में अफ्रीका की कुछ जनजातियाँ और अमेरिकी नीग्रो मुख्य हैं। इसकी उत्पत्ति और विशिष्ट जातीय समूहों में ही होने के कारण अज्ञात हैं। क्या मोहन भागवत प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
https://www.facebook.com/share/p/18NW6W19QM/

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

जंबूद्वीपे भरतखण्डे

घर से बाहर
जब भी धरे पाँव
लगा ही नहीं कभी
हमारा ही देश है यह!
घर से बाहर
घूमती थीं निर्भय
राजा की रची जातियाँ
खोदती हुई खाइयाँ,
निरंकुश दबंग
सताते हुये निर्बलों को,
स्वेच्छाचारी राजसेवक
लूटते हुये प्रजा को,
और राजपुरुष
रचते हुये चक्रव्यूह
षड्यंत्रों के
आर्यावर्त्त की जनता के विरुद्ध।
बचपन से अब तक
लगा ही नहीं कभी
कि यह देश
हमारा अपना है
हमारे पूर्वजों का है
मंत्रदृष्टा महर्षियों का है।
यहाँ तो हैं
आतंक के बवंडर
असुरक्षा की तेज आँधियाँ
कौन है प्रायोजक इनका, कौन...
बता दूँगा
तो कुपित हो जायेगा राजा
काट देगा जिह्वा।

प्रजा है
नूपुर
बँधी हुई
राजा के पाँवों में
पीपल की पात सी
थरथराती।
हम
परदेस हो चुके अपने ही देस में
परदेसी हैं
या फिर शरणार्थी
खोजते हुये
अपने ही जीवन के
खोए हुये टुकड़े
पल-पल धमकाती
मृत्यु के अट्टहास में।

प्रायोजित भीड़
भरती है हुंकार
ब्राह्मणो! भारत छोड़ो
छोड़कर अपनी बेटियाँ
और
अपनी चल-अचल संपत्तियाँ।
पूरा भारत
लाहौर हो गया है
कश्मीर हो गया है।
सुना है
हमारा भी राजा
डोनाल्ड ट्रंप हो गया है
करता है नृत्य
धधकती ज्वाला की लय पर।