सीखा होगा
संतों ने "सन्यास"
कदाचित्
सेव के वृक्षों से
पहले फलदान
फिर पत्रदान,
दे दिया सब कुछ
हो गये निर्वस्त्र
हिमपात के स्वागत में।
सीखा होगा
संतों ने "सन्यास"
कदाचित्
सेव के वृक्षों से
पहले फलदान
फिर पत्रदान,
दे दिया सब कुछ
हो गये निर्वस्त्र
हिमपात के स्वागत में।
"जातियों में बँटा समाज अभिशाप है, इससे समाज टूटता है और विकास अवरुद्ध होता है"। हमने यही पढ़ा था, यही सुना था। फिर जब हम स्वतंत्र हुए तो जातिवाद समाप्त करने के लिए सरकारों ने कुछ और जातियाँ बनाईं, टूटे समाज को और बाँटा। वर्तमान सत्ता ने इस शिखर को स्पर्श किया, सारी सीमाएँ तोड़ कर अपराध को भी आरक्षित कर दिया। अब...
जाति देखकर पात्रता और कुपात्रता निर्धारित की जाने लगी है। आरक्षित कुछ भी करे वह निर्दोष माना जाएगा, अनारक्षित कुछ भी न करे तो भी अपराधी और दंड का भागी माना जाएगा।
भीड़ की प्रतिक्रिया...
भारत विभाजन के समय भीड़ की अराजक और क्रूरष्ट प्रतिक्रियाएँ इतिहास में अंकित हो चुकी हैं। स्वतंत्र भारत में यह अराजकता और क्रूरता समाप्त नहीं हुई, उसकी तीक्ष्णता और भी बढ़ती चली गई। परिणामतः धार्मिक आधार पर द्विराष्ट्र सिद्धांत मुसलमानों के लिए तो सार्थक रहा पर हिंदुओं के लिए निरर्थक ही नहीं रहा प्रत्युत और भी नकारात्मक होता चला गया। यह निरंतरता आज भी है।
इस बीच देश की सामान्य प्रजा की भूमिका कैसी रही, क्या वह सजग रही? क्या उसने अपने प्रजा धर्म का पालन किया?
आज धर्म को लेकर पूरे विश्व में क्रूर तांडव मचा हुआ है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों की सत्तायें अपने दायित्व को समझ चुकी हैं। भारत में क्यों नहीं? क्या हम एक और उपनिवेशवाद के मुँह में समा जाने वाले हैं? क्या हम विदेशी पराधीनता के चक्र से कभी मुक्त नहीं हो सकेंगे?
...और अंतिम प्रश्न यह कि क्या हमें समुद्रमंथन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए?
कोई अपराध घटित होता है तो पहले अपराधी की जाति देखी जाती है, उसका धर्म देखा जाता है इसके बाद भीड़ निर्धारित करती है कि किसे पीट-पीट कर मार डालना है और किसे ससम्मान छोड़ देना है।
इस सारी अराजकता में न्यायालयों और सत्ताधीशों की भूमिका इस अराजकता को और भी प्रोत्साहित करने वाली रही है। हिंदू में कई और धर्म हो गये, जो सवर्ण थे उसमें से शूद्र वर्ण को दलित बनाकर वर्णविहीन (अवर्ण) कर दिया गया। शेष तीन वर्ण सवर्ण हो गये, चौथा वर्ण भी सवर्ण क्यों नहीं है! वर्णव्यवस्था जो कि वैज्ञानिक है, को समाप्त करने के नाम पर एक और वर्ण, जो कि अवैज्ञानिक है, रच दिया गया। किसने किया यह सब, क्या ब्राह्मणों ने!
सावधान! यह भारतीय सभ्यता और जीवनमूल्यों के अस्तित्व को बचाने का समय है।
जब सत्ता और न्यायालयों में कुपात्रों की भरमार हो जाती है तो अराजकता पल्लवित-पुष्पित होती है। पराधीनता के युग से लेकर आज तक हम दासता के अभ्यस्त होते रहे हैं। यह समाज-राजनैतिक कैंसर है जिसकी मेटास्टेटिस हो चुकी है, और अब शल्य चिकित्सा आवश्यक है।
वैदिक धर्म का संकेत है कि चिकित्सा से पहले समुद्रमंथन करना ही होगा...इस अनुबंध के साथ कि मंथन करने वाले लोग अपने सभी पूर्वाग्रहों का परित्याग कर शुद्ध मन से आगे आएँ। उनका मन कोरा कागज होना ही चाहिए। मंथन होगा तो समाधान भी होगा। सिद्धांतविहीन "अमृतकाल" एक और छलावा ही सिद्ध हुआ है। हमें स्वीकार करना होगा कि मंथन होगा तो विष भी निकलेगा और अमृत भी। विष और अमृत दोनों को धारण करना होगा, बस हमें शिव को खोजना होगा जो विष धारण कर सकें, और कुछ देवताओं को भी जो अमृत का दुरुपयोग न करें।
यौनशिक्षा में क्या?
यौनविज्ञान की शिक्षा या यौनसंबंधों की शिक्षा!
यौनविज्ञान चिकित्सा का विषय है, जबकि यौनसंबंधों की शिक्षा कामशास्त्र और यौनव्यापार से संबंधित विषय है।
प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल मुक्त यौनसंबंधों के पक्ष में पहले भी वक्तव्य देती रही हैं, इस बार केवल इस अनुबंध के साथ कि मुक्तयौनसंबंधों के परिणामस्वरूप यदि कभी गर्भधारण हो जाए तो लड़की को छोड़ न दिया जाए।
भारतीय समाज जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि से यह विषय विचारणीय है। लड़की को न त्यागने का अनुबंध स्वागतेय है, किंतु हमारे सामाजिक मूल्य यह मानते रहे हैं कि ऐसा तो केवल विशेष स्थितियों में ही होना चाहिए। मुक्यतयौनसंबंध नित्य जीवन का अभ्यास नहीं होना चाहिए अन्यथा भ्रष्टाचार की तरह यह भी एक नया आदर्श बन जाएगा। प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल ने यह नहीं बताया कि इस अनुबंध का विस्तार विवाह तक होना चाहिए या केवल बच्चे के पालन-पोषण के दायित्व तक ही! जैसा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में होता है।
गर्भधारणोपरांत लड़की का त्याग न करना एक सामाजिक दायित्व एवं सामाजिक चिकित्सा है, ... मुक्त यौनसंबंधजनित उस अवांछित मनोदैहिक स्थिति की चिकित्सा... जिसके मूलकारण को हमारे ऋषि-मुनि चारित्रिक विचलन बताकर निंदनीय कहते रहे हैं। इस Social treatment से पहले क्या हमें इस स्थिति के preventive measures पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए!
भारतीय ही नहीं, अन्य भी सुसंस्कृत समाजों में मुक्तयौन संबंधों को हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है, आज भी देखा जाता है। मुक्यतयौनसंबंधों वाले समाज कितने विकसित और सुसंस्कृत हो सके हैं, यह देखा जा सकता है। बात फिर पलट कर सामाजिक ताना-बाना, उसका शिल्प और उच्च जीवन मूल्यों पर आकर ठहर जाती है। योग दर्शन और अध्यात्मिक मूल्यों का ध्वज लेकर चलने वाले देश का आदर्श पश्चिमी समाज का भौतिक विचलन होना चाहिए या भारतीय सांस्कृतिक मूल्य! अच्छा हो यदि प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल इस विषय पर और प्रकाश डाल सकें।
यौनशिक्षा की बात करते समय हमें शिक्षा प्रक्रिया और उसके परिणामों पर भी विचार करना चाहिए।
सीखने की आदर्श प्रक्रिया में मान्य स्रोतों से गृहण की हुयी सूचना और उसके व्यावहारिक सदुपयोग का सुयोग होता है, जो गुरुकुल प्रणाली में ही संभव है। बिना सदुपयोग के हम सीखते कुछ नहीं, केवल सूचनाओं का निष्क्रिय संग्रहण भर करते हैं, जिसका सदुपयोग न्यूनतम किंतु दुरुपयोग ही अधिक देखा जाता रहा है। यही कारण है कि सचिव जैसे उच्चपद पर पहुँचे बहुत कम लोग ही भ्रष्टाचार से स्वयं को अछूता रख पाते हैं।
मुक्तयौन संबंध होंगे, तो गर्भनिरोधकों का भी प्रयोग होगा, कदाचित् असफल होने पर गर्भधारण होगा... और इस विवश एवं अवांछनीय स्थिति में लड़की को बेचारी न बनाया जाए, पुरुष उस पर अपने संरक्षण की कृपा बनाये रखे। क्या इससे स्त्री स्वाभिमानी हो पायेगी?
राजा ने कहा
अपनी प्रजा से -
तुम अत्याचार करते रहे
लाखों वर्षों तक
हमारे भाइयों पर
तुम उन्हें जीने नहीं देते थे
उत्पीड़ित करते थे
अपमानित करते थे
लाखों वर्षों तक ।
अब बदला लेंगे हमारे भाई
हमारी प्रजा से
जो आकर बस गई थी
हमारे देश में
लाखों साल पहले ।
राजा ने विधान बनाया
राजा के भाइयों ने संकेत समझा
और फिर प्रारम्भ हुआ
ऐसा उत्पीड़न
जिसकी योजना बना ली गयी
इस सभ्य युग में
और प्रजा
प्रतीक्षा कर रही है
कहाँ छिपे मोरे श्याम !
आवो
अब और सहा नहिं जाय ।
राजा अट्टहास कर रहा है
सुनकर अपनी प्रजा का
आर्तनाद ।
क्या हम सचमुच सभ्य हैं?
इटली जल
रहा है, फ़्रांस जल रहा है, और
अब अन्य भी कई देशों को जलाने की धमकियाँ दी जा रही हैं । कौन हैं ये लोग? क्यों जला देना देना चाहते हैं सब कुछ?
यह वामपंथ
और इस्लाम की युति है जो पूरे विश्व में इस्लाम का शासन चाहती है। वामपंथ और इस्लाम
में धार्मिक तत्वों को लेकर कहीं कोई समानता नहीं फिर भी वे एक साथ हैं, क्योंकि दोनों के पथ अराजकता से होकर आगे बढ़ते हैं।
संपत्ति
को आग लगाकर, दुकानों में तोड़फोड़ कर, सामान को लूटकर ये लोग हर्ष से कितने उन्मादित हो रहे हैं। इस समय इटली और
फ़ांस में यही हो रहा है। क्या ये सभ्य लोग हैं? इन दोनों ही
देशों के साथ भारत के सम्बंधों का इतिहास अच्छा नहीं रहा है पर यह प्रतिशोध का समय
नहीं है, हमें सच को सच और झूठ को झूठ कहना होगा। हमें इटली
और फ़्रांस के मूल नागरिकों के साथ खड़े होना होगा। यह मानवता की रक्षा का विषय है,
और सबसे ज्वलंत विषय भी।
फ़्रांस और
इटली के शासकीय भवनों, प्राचीन स्थापत्य कलाओं, दुकानों और पार्क में खड़ी कारों को तोड़कर और उनमें आग लगाकर नष्ट किया जा रहा
है, भीड़ में उन्माद है क्योंकि वे निर्भीक हैं। वे निर्भीक हैं क्योंकि शासन तंत्र
निर्बल है और उसमें किसी अच्छे संकल्प का अभाव है। यद्यपि जॉर्जिया मेलोनी पहले से
ही जॉर्ज सोरोस की रक्तरंजित चालों का अनुमान लगाती रही हैं, फिर भी वे कुछ नहीं कर पा रही हैं। इधर भारत में मोदी भी कुछ नहीं कर पा रहे
है।
यह भीड़ धरती
की सबसे क्रूर विचारधारा वाले असभ्य लोगों की भीड़ है। पहले ये आपस में झगड़ा करते हैं, फिर दयनीय
बनकर दूसरे देशों में शरण माँगते हैं, फिर उसी देश, वहाँ के समाज, वहाँ की सभ्यता और संस्कृति पर आक्रमण करते हैं। यह सब इसलिए
होता है क्योंकि देश के सत्ताधीश अच्छाई और बुराई, शत्रु और मित्र, न्याय और अन्याय में भेद नहीं कर पाते, उनमें दूरदर्शिता
का अभाव होता है और वे अपने पूर्वजों के पापों का फल भोगने के ईश्वरी विधान से बँधे
हुये होते हैं।
पश्चिमी
सेक्युलरिज्म का यह सबसे काला पक्ष है। यद्यपि सनातन दर्शन में सहिष्णुता, समावेशिता
और समानता के बीज हैं पर भारतीय उपमहाद्वीप के बाद अब भारत में भी इसी मानसिकता के
साथ उपद्रव प्रारम्भ होने लगे हैं।
अभी मैं
यू-ट्यूब पर एक वीडियो देख चुकने के बाद लोगों की टिप्प्णियाँ देख रहा हूँ –
“इंशा-अल्लाह, शीघ्र ही हम ब्रूसेल्स में भी आ रहे हैं।“
“हम स्पेन
में आ रहे हैं, यूके और नीदरलैंड में भी।“
“इंशा अल्लाह
एक दिन यह धरती हमारी होगी।“
“जिस दिन
हरी रोशनी हमारे पास होगी, तुम सब समाप्त हो जाओगे।“
“इस समस्या
का समाधान फ़्रांस के विभाजन के बाद ही होगा, हमें फ़्रांस में हमारे लिए
एक नया देश चाहिये”।
“क्या फ़्रांस
में सरकार और सेना नहीं है?”
“”इन पर
गोली क्यों क्यों नहीं चलाई जाती?”
2.
भारत में
सत्तापरिवर्तन
सत्तापरिवर्तन
एक गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है किंतु तुम तो सत्ता परिवर्तन चाहते ही नहीं, सत्ता को अनैतिक और अराजक तरीकों से छीनना चाहते हो, उपद्रव करके सत्ता लूटना चाहते हो। सत्ता परिवर्तन और सत्ता लूटने में नैतिकता
और उद्देश्यों का अंतर है।
दुर्बल सत्ताओं
को रण छोड़ना पड़ता है, जैसा कि श्रीलंका, अफ़गानिस्तान
और बांग्लादेश में हुआ । नेपाल में जो हुआ वह जन क्रांति थी, सत्ता की लूट नहीं। अफ़गानिस्तान में रणनीतिक तरीके से आक्रमण करके तालिबानियों
ने अपना शासन स्थापित किया। यह कुछ सौ साल पुरानी परम्परा की पुनरावृत्ति थी।
बांग्लादेश
में विदेशी शक्तियों द्वारा सत्ता को छीना गया और वहाँ एक कठपुतली सरकार स्थापित की
गयी । नेहा बोरा ने स्पष्ट कर दिया है कि वह
नेपाल से नहीं, बांग्लादेश से प्रभावित है। वह सत्तापरिवर्तन
नहीं चाहती, ज़ॉर्ज़ सोरोस और अन्य विदेशी आसुरी शक्तियों से प्रभावित
होकर सत्ता छीनना चाहती है जो भारत में अलोकप्रिय शासक के रहते हुये भी सम्भव नहीं
है।
भारत की
स्थिति इन सबसे बहुत भिन्न और विचित्र है वर्तमान सरकार ने अपने शत्रुओं और विरोधियों
को उत्पन्न करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी। विपक्ष देश की जनता को कभी प्रभावित नहीं
कर सका। भारत की जनता को प्रभावित करने या आकर्षित करने में तिलचट्टों सहित अन्य विपक्षी
दल अभी तक असफल ही रहे हैं। आगे भी वे कुछ अच्छा कर सकेंगे, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि विकल्प के रूप में एक क्षीण
सी प्रकाश की रेखा निकलती प्रतीत हो रही है तथापि साधु वेश में रावणों की भारत में
कभी कमी नहीं रही।
जब आप "सवर्ण" कहते हैं तो एक और विभाजनकारी समूह का अप्रत्यक्ष संकेत देते हैं। अर्थात कुछ सवर्ण हैं तो कुछ अवर्ण भी होंगे ही। यह ध्वनित है, जिसे धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र कहा जाना उचित होगा।
सवर्ण शब्द दिया ही क्यों, यह कहाँ से आया? चलिए, इस शब्द की बायोप्सी करते हैं। सवर्ण का अर्थ निकलता है वर्ण सहित। वर्ण चार हैं, अर्थात सवर्ण में चारो वर्ण हैं, तीन नहीं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रादि चतुर्वर्ण के बाद सनातन परंपरा/human physiology /व्यावहारिक दृष्टि से पाँचवा कोई वर्ण नहीं होता, हो ही नहीं सकता जैसा कि भारतीय समाज के विभाजन (सामान्य या सवर्ण अर्थात ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्य), पिछडा़, एससी, एसटी, दलित, अतिदलित, महादलित) के उद्देश्य से अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक और कुत्सित प्रयास किया गया है। किसने किया यह विभाजनकारी नया वर्गीकरण?
सनातन परंपरा में तो चारों वर्ण समाहित हैं इसलिये जब हम सवर्ण कहते हैं तो उसमें चारो वर्ण हैं। वास्तव में सवर्ण शब्द ही अवैज्ञानिक और विभाजनकारी है, अर्थात ये लोग सवर्ण के बाद अवर्ण का संकेत दे रहे हैं जिसमें शूद्रों का समावेश किया गया है, वह भी कई और विभाजनों के साथ। यह सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर कुछ लोगों का आसुरी आक्रमण है।
आश्चर्यजनक रूप से संत समाज भी इस विषय पर मौन है। क्या यह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के साथ आसुरी बलात्कार नहीं!
कभी-कभी
प्रकाश से अधिक
मुखर हो जाता है
अंधकार
किंतु केवल तभी
जब उसके पीछे हो
प्रकाश का
प्रबल संबल
किंतु
अंधकार
यह मानता ही कब है!