गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

भारत की भ्रूणहत्या

            भारत में रहकर भारत के विरुद्ध कुवैचारिक आंदोलन करना बहुत सरल हो जाता है यदि सत्ता भी भारत के विरुद्ध वातावरण तैयार करने की इच्छा से कूट क्रियाओं और षड्यंत्रों में लिप्त हो। मैं बात कर रहा हूँ स्वातंत्र्योत्तर भारत के अभारतीयकरण की, जिसमें पराधीनता युग की परम्पराओं, स्मृतियों, कुविचारों और दुष्प्रचारों को सुस्थापित किये जाने के सफल प्रयास किये जाते रहे।

जवाहरलाल ने प्रसादयुग की परिष्कृत हिंदी के स्थान पर फ़ारसी और अरबी मिश्रित हिंदी बोली को प्राथमिकता क्यों दी, यह विचारणीय विषय होना चाहिए। उन्होंने इस्लामिक पराधीनता वाले भारत की राजशाही बोली, जो कि तुर्क, फ़ारसी और मुगल शासकों द्वारा विकसित की गयी बोली “उर्दू” थी, को भारत पर थोपने के लिये जनता को प्रोत्साहित किया, जबकि अभिजात्य लोगों के बीच उन्हें अंग्रेजी बोलना पसंद था। समृद्ध द्रविड़ भाषाओं के कारण यह काम दक्षिण भारत में सम्भव नहीं था इसलिये उत्तर भारत पर ही उर्दू थोपी जाती रही। जवाहरलाल का वश होता तो तो वे हिंदी को देवनागरी के स्थान पर फ़ारसी लिपि में लिखने की भी अनुशंसा करते। स्वतंत्र भारत पर स्वतंत्र भारत के शासक के द्वारा यह प्रथम आक्रमण था जो भाषाहत्या के रूप में था। बाद में हिंदी और द्रविड़ भाषायी विवाद को लेकर भी हिंसा होने लगी और दर्पण की तरह भारत एक स्थान पर चटक गया।

साधारण जनमानस में स्वातंत्र्योत्तर भारत में भारत के भारतीयकरण की अपेक्षा की गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ। पराधीनता की पीड़ादायी स्मृतियों को सम्मानित करने के लिये भवनों, मार्गों, राजप्रासादों, दुर्गों और अन्य राष्ट्रीय महत्व के स्थानों के नाम क्रूर और अत्याचारी विदेशी शासकों के नाम पर ही जाने जाते रहे, जबकि इनमें से अधिकांश स्थान भारतीय शासकों द्वारा निर्मित किंतु विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अपने अधिकार में लिये हुये थे, उनके द्वारा निर्मित नहीं। भारत पर भारत की स्वतंत्र सत्ता द्वारा पूरी धूर्तता के साथ किया गया यह दूसरा आक्रमण था जिसने भारत की स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व की हत्या करने का प्रयास किया।

भारत पर स्वतंत्र भारत के शासकों द्वारा तीसरा आक्रमण शिक्षा के पश्चिमीकरण और सनातन मूल्यों की हत्या के लिये किये जाने वाले विविध आक्रमणों के रूप में था जिसमें रोमिला थापर जैसे लोगों द्वारा लिखी गई काल्पनिक कहानियों को इतिहास बताकर विद्यार्थियों को परोसा जाता रहा । परिणामस्वरूप आज भारत की कम से कम तीन पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क में भारत के प्रति घृणा और विद्रोह की भावना स्थायीरूप से घर कर चुकी है। इस घृणा की जड़ों ने भारत की अपनी भाषा, स्थानीय बोलियों, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और पूर्वजों के त्याग-बलिदान आदि में घुसकर उन्हें बुरी तरह जकड़ लिया है। आज की तिलचट्टा पार्टी इसका एक ताजा उदाहरण है।

दर्पण अब कई स्थानों से टूट चुका है, दर्पण को तोड़ने के प्रयास अनवरत चल रहे हैं। भारत ही नहीं, पूरे विश्व के लिये यह संक्रांतिकाल है जिसमें हम सबको अपनी-अपनी भूमिकायें सुनिश्चित करनी ही होंगी।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

तुम

 तुम 

हमें गालियाँ देते रहे

पीटते रहे

बलात उठा ले जाते रहे 

हमारी बहनों-बेटियों को

देते रहे धमकियाँ

देश से भगाने की

हमारी बेटियों से ही नहीं

हमारे इतिहास से भी 

करते रहे बलात्कार

लगाते रहे 

हम पर ही मिथ्या आरोप

और हमें ही 

ठूँसते रहे कारा में 

न्याय के नाम पर

करते रहे अत्याचार

ऐसी ही अराजक, 

अनियंत्रित 

और अमानवीय घटनाओं की बाढ़ में 

बहा होगा वह आर्यपथ 

जिससे होकर आया-जाया करते थे 

सभी वर्णों के लोग..

और विवश होकर 

बना ली होगी दूरी 

ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों ने... 

राज्यपोषित 

एक अत्याचारी वर्ग से।

तुमने इसे छुआछूत कहा 

और हमें ही बना दिया 

अपयश का भागी। 

हर युग में रही है

"चित भी तेरी, पट भी तेरी।"

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

सुना तुमने

वह खड़ा था

अकड़ता हुआ 

अड़ा था

हर किसी की राह में

फिर एक दिन पसर गया

भरभराकर ढह गया

तुमने कहा

भूस्खलन हुआ

हमने कहा

अहंकार का अंत हुआ

सुना तुमने!

वर्जित है 

अति 

सर्वत्र ।

रविवार, 27 सितंबर 2026

सत्ता और सामाजिक समानता

समाज ने समाज का शोषण किया इसलिए समाज में असमानता है, -यह तुमने कहा, कहते ही रहे, जिससे कुछ पीढ़ियों के बाद समाज में तुम्हारा कथन ही स्थापित हो गया। 

यह पूरी तरह सच नहीं था, समाज का एक वर्ग अपराधबोध से भर गया, दूसरा वर्ग प्रतिशोध के लिए उग्र हो उठा। तुम यही चाहते थे -समाज में ध्रुवीकरण, जिसे तुमने उत्पन्न किया, प्रोत्साहित किया और संरक्षित भी किया। 

सामाजिक सत्य यह है कि सत्ता के तत्व अव्यवस्था की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होते हैं, यही स्वाभाविक है । जब अव्यवस्था होती है तभी  लोग किसी सुशासन की अपेक्षा करते हैं। महान सम्राट लोक की इसी अपेक्षा को पूरा करने के प्रयास करते रहे हैं। किंतु यह सत्ता और शासनतंत्र की आदिम स्थिति है। बाद में तो राजपुरुषों और समर्थों द्वारा भय और कुव्यवस्था को ही सत्ता का आधार बनाया जाने लगा। हाँ! सच यही है कि शोषण और अत्याचार का भय दिखाकर सत्ता प्राप्त किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सत्ता प्राप्त होते ही सत्ताधीश जो पहला काम करते हैं वह होता है शोषण और अत्याचार के नये-नये प्रतिमान स्थापित करना। सुशासन का स्वप्न देखने वाली भीड़ को मिलता है कुशासन। 

अपने पूर्ववर्तियों की तरह तुमने भी कभी पूरा न किये जाने वाला समानता का आश्वासन दिया और भीड़ को लूटने में तल्लीन हो गये। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में शासन का यही पक्ष अब स्थापित हो चला है जिसका विराट और सर्वाधिक क्रूर स्वरूप है "नयी विश्वव्यवस्था"। 

तुम जिस समानता की बात करते हो वह शुद्ध छलावा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगले लाखों वर्षों में भी तुम्हारी परिभाषाजन्य "समानता" फलीभूत होने वाली नहीं। दुर्भाग्य से भीड़ को स्वप्न में डूबना अच्छा लगता है, उसकी यही दुर्बलता तुम्हारा पथ सरल करती है। 

तुम प्रतिवाद करोगे कि क्यों नहीं हो सकती समानता! तुम मुझे अराजकतत्व और उपद्रवी कहकर दण्डित करने के सारे उपाय करोगे। तुम ऐसा कर सकते हो, फिर भी सामाजिक समानता नहीं ला सकते, कम से कम वैज्ञानिक तो यही कहते हैं। 

हाँ! तुम वैज्ञानिक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद की बात करते हो न! किंतु सच यह है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद भी समानता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि स्वयं प्रकृति ही इसे स्वीकार नहीं करती। तुमने भीड़ से भौतिकी का यह सच सदैव ऱछिपाया कि ब्रह्मांड में बाहर से जो समरूपता दिखायी देती है वह वस्तुतः आभासी है, उसके भीतर प्रतिकूलताजन्य अ-समरूपता ही होती है। सृष्टि के सारे विधान और सूत्र प्रतिकूलताजन्य उस अ-समरूपता के ही परिणाम होते हैं। अधिक दूर मत जाइये, अपने भौतिक शरीर की रचना और क्रियात्मकता को ही लीजिए, क्या वहाँ समरूपता (Symmetry) है! क्या एक ही माता-पिता के सभी बच्चों के व्यवहार और क्षमताओं में समरूपता होती है! 

यह जो तुम अपने चारो ओर विविधता देखते हो, क्या समानता होने पर वह संभव है! क्या आरोह-अवरोह के बिना किसी संगीत की कल्पना की जा सकती है! 

मुझे समानताविरोधी समझने की भूल मत कर बैठना। यह तो प्रकृति है जिसके तंत्र में कहीं भी समानता नहीं है। प्रकृति समानता नहीं, संतुलन की अपेक्षा करती है। संपूर्ण सृष्टि का आधार ही संतुलन पर अवलंबित है, समानता पर नहीं। 


संतुलन एक गतिशील व्यवस्था है, जो तुम करना ही नहीं चाहते। तुम तो भीड़ को सपनों में खो जाना सिखाते हो, ताकि उसके श्रम पर डाका डालते रहने में तुम्हें सुविधा हो। तुम्हारे विकास के सारे प्रादर्श छोटी रेखा को बढ़ाने में नहीं, प्रत्युत बड़ी रेखा को क्षतिग्रस्त कर छोटी करने के विनाशकारी सिद्धांत पर आधारित हैं। तुम दोनों रेखाओं के विनाश के कुचक्र कर रहे हो, छोटी को कुंठित कर, और बड़ी को लुंठित कर। यह उन शक्तियों के दुरूपयोग का बलात्कार है जो भीड़ ने तुम्हें प्रदान की हैं। सावधान! प्रकृति का धर्म है संतुलन, जो हो कर रहेगा, तुम्हारे अवसान के साथ। 

बुधवार, 23 सितंबर 2026

केवल उसके लिए

वह लिखता है
न्याय की 
कई परिभाषायें
अलग-अलग रंग के अक्षरों से
जिसकी जैसी जाति
उसके लिए वैसी परिभाषा।
ईश्वर का श्राप 
लगे तो लगे
कैसे भी करके
राजसिंहासन तो मिले।

अचंभित हैं जातियाँ
कोई हँसती हुयी
कोई रोती हुयी
अचंभित सभी हैं।   
उन्हें इस्तीफा चाहिए
क्योंकि एक ने 
नकल होने दी
उन्हें फिर इस्तीफा चाहिए
क्योंकि दूसरे ने 
नकल नहीं होने दी
उन्हें अधिकार है 
इस्तीफा माँगने का
क्योंकि यह अधिकार 
उन्हें दिया है
उनके बाबा ने 
और वे हैं
अपने बाबा के 
अपने नानबायोलाॅजिकल के
अपने परमपूज्य मोहन के
दुलारे
और नकचढ़े
तिलचट्टे।

कब तक

आई आई टी मुंबई है
एक खेत 
जिसमें बोता है बीज
एक समर्पित वैज्ञानिक
एक समर्पित शिक्षक
जिसे बाध्य कर देती है 
तुम्हारी कुव्यवस्था
तुम्हारी कुराजकता
पलायन के लिए
कहीं दूर।

दादी ने बताया था
राजहठ से
रूठ जाया करती है
खेत की मिट्टी
बीज
और मेघ भी।
ग्रहण लग जाता है
खेत की उर्वरता को
अब कोई बीज 
नहीं उगेगा वहाँ
पहले की तरह
यह सब जानकर भी 
हठ नहीं छोड़ना चाहते तुम!

खींचकर सारा सत्व
हर बायोलाॅजिकल से
शनैः शनैः बनाते जा रहे हो तुम 
सब कुछ 
नानबायोलाॅजिकल 
क्या करोगे
इतने बंजर खेतों का! 
अचंभित है विश्व
इतनी निर्लज्जता ओढ़कर
कैसे जी लेते हो तुम!
सूर्य को ओढ़ाकर 
बादलों के लबादे
कब तक बंदी रखोगे तुम!

शनिवार, 19 सितंबर 2026

खेला ही खेला

वे बनाते हैं

जातियाँ

कोई ऊँची, कोई नीची

कोई बहुत नीची, कोई सबसे नीची

फिर करते हैं प्रोत्साहित

कि बहे 

सुगंधित समीर 

"नीची" से "ऊँची" 

और "ऊँची" से "नीची" 

जातियों के बीच

करते हुये नृत्य

जैसे बलिया की 

लहरिया वाली नचनिया

या बनारस की 

बलखाती बाई जी । 

यह एक 

बहुत राजप्रिय खेल है 

जिसमें हैं

बादशाह, बेगम, गुलाम 

और एक भीड़

संख्याओं की 

एक से दस तक 

पर आवश्यक नहीं

कि सर्वशक्तिमान हो बादशाह, 

या बेगम ही

यह तो हो सकता है 

कोई गुलाम भी

या हुकुम की दुग्गी भी।

हम सब हैं

उपकरण

उनके हर खेला के

हम सब हैं

पक्षविहीन 

पंछी बस नाम के। 

इस बार तुरुप का पत्ता 

डाल कर उबाल दिया गया है

चाय की गंदी गंजी में 

और फिर 

हर पत्ता भी तो नहीं होता

चाय का पत्ता

फिर भी

पी तो रहे ही हैं

हम भी, तुम भी

और सरकार के सचिव भी । 


एक खेला और भी है

वे खोदते हैं 

खाइयाँ

गहरी, बहुत गहरी

कुछ इस तरह 

कि बन जाते हैं पर्वत 

ठीक खाई के पार्श्व मेंं

इतने ऊँचे

कि हो जाते हैं वे 

दुर्गम

और अलंघ्य

कोई नहीं जा सकता

इधर से उधर

और उधर से इधर, 

फिर प्रारंभ होती हैं 

योजनाएँ

स्वीकृत होती हैं धनराशियाँ

जिससे कि सुगम हो आवागमन

इधर से उधर

और उधर से इधर

किये बिना समतल

खाइयाँ और पर्वत

वे इसे ही कहते हैं

समानता, सामंजस्य, 

लोकहितकारी योजना,

विकास...

और भी बहुत कुछ।


और हाँ! 

भोजन में तेल कुछ कम कर देना 

जिससे बचा सको 

कुछ तेल

जलाने एक दिया

मेरे जन्मदिन पर।