रविवार, 19 सितंबर 2021

जन्नत – एक सपना एक सच

         शराब हराम है यहाँ ख़ुदा के बंदों के लिये, मगर जन्नत में भरपूर उपलब्ध है और परोसी जाती है ख़ुदा के बंदों के लिये । अंगूर की शराब की नदियाँ और नहरें बहती हैं वहाँ । औरतों के लिये पर्दे में रहना वाज़िब है यहाँ, मगर जन्नत में वे बहुत झीने लिबास में घूमती हैं ...अपनी ख़ूबसरती नुमाया करती हुयी । एक अफ़गानी लड़की ने बताया है कि औरतों को बुर्कों में कैद करके रखने वाले तालिबान को किसी औरत का ज़िस्म चाहिये होता है फिर चाहे वह बच्ची का हो या तरुणी का, ज़िंदा औरत का हो या फिर मुर्दा का, …ज़िस्म में कोई और शर्त नहीं होती सिवाय इसके कि वह निहायत बुढ्ढी न हो ।

धरती की ज़िंदगी जन्नत की ज़िंदगी से इतनी उलट क्यों है? क्या इस्लाम के कायदे जन्नत में मान्य नहीं, या फिर वहाँ के कायदे यहाँ से कुछ अलग हैं? बस, कुछ अज़ीब सा लगा तो पूछ दिया, इरादों पे शक न करना मेरे!

हर मज़हब की समाज व्यवस्था उनकी अपनी ज़रूरतों और मान्यताओं के अनुसार तय की जाती है । उसूल है कि किसी को इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये (इसमें यह शर्त और जोड़ी जानी चाहिये कि – “जब तक कि इससे दूसरे लोग नकारात्मक रूप से प्रभावित न हो रहे हों”)।

इस्लाम की दुहाई देने वाले कुछ संगठनों को फिदायीन की ज़रूरत होती है जिसका संदेश आम आदमी तक उनकी मज़हबी मान्यताओं को पुष्ट करने के रूप में पहुँचता है । फिदायीन हमला उनकी ज़रूरत हो सकती है लेकिन उसके प्रभाव से उन लोगों को अपनी ज़िंदगी से हाथ धोना पड़ता है जिनका कोई ग़ुनाह नहीं होता सिवाय इसके कि वे उनके द्वारा घोषित काफ़िर होने के अपराधी होते हैं । कोई अपनी मर्ज़ी से काफ़िर पैदा नहीं होता, उनकी तरह इन्हें भी अपने धर्म में आस्था होती है फिर भी वे उनकी ज़िद के अनुसार काफ़िर होने के अपराधी होते हैं । हिंदू किसी की स्वतंत्रता के हरण को मान्यता नहीं देते, वे औरतों पर ज़ुल्म-ओ-सितम को जायज़ नहीं ठहराते, वे कम उम्र लड़कियों से बलात यौनदुराचार को अपना हक मानने की ज़िद को जायज़ नहीं ठहराते, वे किसी की लूटी हुयी सम्पत्ति को माल-ए-गनीमत मानते हुये उसे धार्मिक कृत्य मानने का समर्थन नहीं करते ....फिर भी वे काफ़िर कहलाते हैं और उनका कत्ल कर देना ख़ुदा की शान में किया हुआ सबब माना जाता है । कुल मिलाकर जो ग़ैरमुस्लिम हैं वे उनकी जीवनशैली और मान्यताओं से बुरी तरह प्रभावित होते हैं इसलिये आज हमें भी फ़िदायीन की फ़िलॉसफ़ी पर चर्चा के लिये बाध्य होना पड़ रहा है ।

मैं एक ब्राह्मण युवक को जानता हूँ जिसने एक मुस्लिम लड़की से निकाह करने के लिये इस्लाम कुबूल कर लिया है, वह डॉक्टर है और अब इस्लामी मान्यताओं का समर्थक है । उसने धर्म बदलने के साथ ही अपनी मान्यताएँ, अपने विश्वास, अपने धार्मिक कर्मकाण्ड और अपने पूर्वज भी बदल लिये हैं । अब उसके नये (एडॉप्टेड) पूर्वज अरबी हो गये हैं जो कि वास्तव में नहीं है । अब उसके वास्तविक पूर्वज उसके शत्रु हो गये हैं जो कि वास्तव में नहीं हैं । अब उसे बचपन में याद की हुयी संस्कृत में लिखी स्तुतियाँ पाखण्ड लगने लगी हैं । अब वह “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता...” को फ़िज़िक्स, कैमिस्ट्री और मेडिकल साइंस के परिप्रेक्ष्य में देखता है तो उसे यह सब निहायत बेवकूफ़ाना लगता है । अब वह पहले की तरह हिंदी नहीं बल्कि उर्दू बोलने लगा है और बात-बात में इंशाअल्ला और सुभान अल्लाह या फिर अल्हम्दुलिल्लाह कहने लगा है (निकाह से पहले, शायद यह सब उसे साइंटिफ़िक लगा होगा) । बहरहाल, अब वह भारत में शरीया कानून चाहता है और इसके लिये वह सब कुछ करने के लिये तैयार है जो एक मुसलमान को करने के लिये आदेशित किया जाता है । आदेश देने वाला कोई मौलवी होता है जिसकी तालीम से ज़्यादा तालीम एक डॉक्टर की होती है ...ऐसा मैं नहीं कहता, बल्कि आम लोगों द्वारा माना जाता है ।

फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ फिदायीन समझने के लिये हमें इन तमाम घटनाओं को भी ध्यान में रखना होगा । हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि एक महिला डॉक्टर, जो कि एक सरकारी अस्पताल में गायनेकोलॉज़िस्ट है, सरकारी प्रिस्क्रिप्शन पर अपने हिंदू मरीज़ों को रोजे और अल्लाह में ईमान लाने की बात लिख कर देती है (कुछ वर्षों तक हुयी शिकायतों के बाद शायद उस पर कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही की गयी है) । हम यह नहीं कहेंगे कि अनुशासनात्मक कार्यवाही और सालों चलने वाली जाँचों के ढकोसले पर्याप्त है या नहीं बल्कि यह कहना चाहेंगे कि एक चिकित्सक की मानसिकता इस्लाम को लेकर कितनी वैज्ञानिक हो सकती है!    

“अंगूर की शराब की नहरें” जो धरती पर नहीं होतीं, जन्नत में हैं, उनके चित्र तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान ने नॉर्थ वज़ीरिस्तान में अपने फिदायीन सेंटर में नुमाया कर दिये हैं ।  फिदायीन सेंटर में जन्नत के नज़ारे की अगली नुमाइश में बहत्तर हूरों के चित्र लगाये गये हैं, जो वास्तव में बम्बइया फ़िल्म अभिनेत्रियों के चित्र हैं और जो हिंदू होने की वज़ह से काफ़िर भी हैं । माना जाता है कि “काफ़िर की औरतें माल-ए-गनीमत” होती हैं और उन पर ख़ुदा के बंदों का पूरा हक हुआ करता है । ज़िंदा लोगों की तस्वीर लेना या नुमाया करना इस्लाम में हराम है, लेकिन काफ़िर औरतों की तस्वीरों की नुमाइश जायज़ है मानी जाती है । यह मानना और न मानना कहाँ से और कौन तय करता है, उसका आधार क्या है ...किसी को नहीं पता । मुझे उस ब्राह्मण युवक की याद आ रही है जो डॉक्टर है और अब मुसलमान भी है । यदि वह गज़वा-ए-हिंद के लिये फिदायीन बन जाय तो वायदे के मुताबिक उसे भी अल्लाह के हाथों से अंगूर की शराब की नहर में से जाम पर जाम पीने को मिलेंगे और ख़ूबसूरत बहत्तर हूरें भी मिलेंगी जिनके लिबास एकदम पारदर्शी हैं ...और जिनसे उनके ज़िस्म का वह सब कुछ नुमाया होता रहता है जिसकी इस्लाम में इजाज़त नहीं हुआ करती । ओफ़्फ़ ! ऊपर वाले ने धरती, जहन्नुम और जन्नत के डिपार्टमेंट्स में इतना ज़मीं-आसमाँ का फ़र्क क्यों किया है?      

सँभल जाइये

 रचते-रचते ही रंग ये निखर पायेगा

कभी तो जरा सा सबर कीजिये ।

वक़्त करवट बदलने को तैयार फिर

आप भी थोड़ा सा अब सँभल जाइये ।  

आ गये हम फिर से अपने शहर

आप भी थोड़ा सा अब ठहर जाइये ।

हाँ सजाया सँवारा है हमने इसे

पृष्ठ इतिहास के भी पलट लीजिये ।

था छुआ मैंने तुमको गज़ल जानकर

यूँ फुफकार ना, मान भी लीजिये ।

पूजते हम वतन को माँ मानकर

आँच आने न देंगे ये सुन लीजिये ।

हाँ ये भारत, सुनो तुम, मेरे बाप का है

मेरे बाप के बाप के बाप के भी बाप का है 

लूटने अब न देंगे सँभल जाइये ।

हो कौन तुम और आये कहाँ से  

पूछ पुरुखों से अपने समझ लीजिये ।

जिनके आदर्श कासिम, बख़्तयार औ बाबर

वे भी कातिल लुटेरे हैं लिख लीजिये ।

है वीरों की आदर्शों की ये धरती

गुरु गोविंद, बंदा, तात्या औ मंगल

रानी झाँसी ओ नीरा को गुन लीजिये ।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

“बिना खड्ग बिना ढाल”

 ...अर्थात भारत का वह इतिहास जिसकी चर्चा नहीं होती

सन् उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद जन्म लेने वाली पीढ़ी को यही पढ़ाया और सुनाया जाता रहा कि भारत के लिये जो किया केवल नेहरू और गाँधी ने किया । गाँधी ने खेत जोता और नेहरू ने फसल बोयी जिसके परिणामस्वरूप उनकी प्रजा को एक आधुनिक और औद्योगिक भारत की फसल काटने का सुअवसर प्राप्त हुआ ।

हर साल पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को हमें बताया जाता रहा कि नेहरू का अर्थ है “कुर्बानियों वाला ख़ानदान”। इंदिरा जी ने देश के लिये अपने प्राणों की कुर्बानी दी, उनके दोनों बेटों ने भी देश के लिये प्राणों की कुर्बानी दे दी, फिर इंदिरा जी की बड़ी बहू सोनिया मायनो ने भी प्रधानमंत्री पद की कुर्बानी दे दी ।

उन्नीस सौ सैंतालीस में नेहरू के सामने कुर्बानी न देने की विवशता थी । कहा जाता है कि देश पहली बार स्वतंत्र हुआ था, नेहरू ने किसी तरह सुभाष बाबू को हटाकर और वल्लभ भाई पटेल को किनारे लगाकर प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ किया था, वे अपनी कुर्बानी दे देते तो अंग्रेज़ों के 17 प्रोविंसेज़ और भारतीय राजाओं के 565 प्रिन्सली स्टेट्स का एकछत्र बादशाह कौन बनता!   

जन्म लेने के बाद से भारतीय इतिहास की एकमात्र गाथा हम सब सुनते रहे हैं कि गाँधी ने हमें “बिना खड्ग बिना ढाल” ब्रिटिश पराधीनता से मुक्त कराया और स्वतंत्रता दिला दी । हम बड़े हुये तो एक विदेशी ने बताया कि चौदह अगस्त की आधी रात को ब्रिटिशर्स ने भारत में अपनी हुकूमत वाले सत्रह राज्यों (प्रोविंसेज़) की सत्ता भारत की अंतरिम सरकार के रसूख़दार जवाहरलाल नेहरू को हस्तांतरित कर दी थी, जिसे सुबह होते ही “स्वतंत्रता” कहकर प्रचारित कर दिया गया था । जिन सत्रह राज्यों पर कभी भारतीय राजवंशों का राज्य हुआ करता था, उन्हें छल-बल से ब्रिटिशर्स ने हथियाया और फिर जब भारतीय क्रांतिकारियों ने उनकी नाक में दम कर दिया और ब्रिटेन की अपनी हालत भी कई कारणों से ख़राब होने लगी जिसके कारण वे भारत में और अधिक झेल सकने की स्थिति में नहीं रहे तब उन्होंने उन सत्रह राज्यों की कमान पूर्व राजवंशों को न सौंपकर नेहरू को सौंप दी । इस तरह भारत के सत्रह राज्यों की एकमुश्त बादशाहत नेहरू को मिल गयी, यानी नेहरू पूरे भारत के बादशाह बनने के स्थान पर मात्र सत्रह राज्यों के ही मालिक बन सके । लेकिन नेहरू के सपनों में भारत के वे 565 राज्य और भी थे जिन पर ब्रिटिश सत्ता की हुकूमत नहीं थी बल्कि वे स्वतंत्र राज्य थे और जिनके अपने-अपने राजा, महाराजा, सुल्तान या नवाब थे ।

चौदह अगस्त सन् उन्नीस सौ सैंतालीस की आधीरात को एकमुश्त सत्रह राज्यों की बादशाहत पाकर नेहरू रात भर में ही एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन चुके थे । उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा छोड़े गये हथियारों के भारी ज़ख़ीरों के साथ एक सुसज्जित सेना भी विरासत में प्राप्त हुयी थी । नेहरू के सामने चीन और रूस के उदाहरण थे जहाँ कम्युनिज़्म के नाम पर छोटे-छोटे राजाओं से उनके राज्यों को छीनकर दो बड़े राष्ट्र बनाये जा चुके थे ।  

नेहरू को सत्रह नहीं बल्कि भारत के 565 स्वतंत्र राज्यों की भी बादशाहत चाहिये थी । इस काम के लिये उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी पटेल की सेवायें लीं । शरीर से अस्वस्थ पटेल ने अपने राजनीतिक कौशल से 565 राज्यों की बादशाहत सचमुच में “बिना खड्ग बिना ढाल” लाकर नेहरू की झोली में डाल दी । नेहरू अब भारत के सभी 582 राज्यों के मालिक बन चुके थे । यानी ब्रिटिश राज्य ने अपने अधीन रहे भारत के मात्र सत्रह राज्यों को ही हस्तांतरित किया था शेष 565 राज्य नेहरू की किस्मत और पटेल के कौशल से नेहरू को प्राप्त हुये थे ।

ब्रिटिश हुकूमत वाले सत्रह राज्यों से मुक्त होने के लिये तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, सुभाषचंद्र बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, सरदार भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे न जाने कितने क्रांतिकारियों के अतिरिक्त बेशुमार गुमनाम क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया था । तमाम संसाधनों के बाद भी ब्रिटिश अधिकारी भारतीय क्रांतिकारियों के गुरिल्ला युद्ध से ख़ौफ़ खाने लगे थे । ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा भारतीयों पर किये जाने वाले नृशंस अत्याचारों के किस्सों से पूरी दुनिया में ब्रिटेन की बदनामी हो चुकी थी । फिर एक समय आया जब योरोप को महामारी और भुखमरी का ही सामना नहीं करना पड़ा बल्कि विश्वयुद्ध का भी सामना करना पड़ा । स्थितियाँ ब्रिटिशर्स के हाथ से खिसकती जा रही थीं । वे एक साथ सभी मोर्चों पर लड़ सकने की स्थिति में नहीं थे अंत में उन्होंने भारत से भाग जाने में ही अपना कल्याण समझा किंतु विघ्नसंतोषी ब्रिटिशर्स ने भागने से पहले भारत में बबूल और नागफनी की भरपूर फसल ऐसी बोयी कि जिसे आज तक हम भारतीय काटने के लिये विवश हैं । अंग्रेज़ों ने भारत के टुकड़े किये और ऐसे लोगों को सत्ता का हस्तांतरण किया जो तन से भारतीय किंतु मन और चिंतन से ब्रिटिशर्स थे ।

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

मनुष्य से श्रेष्ठ कौन?

         मुझे महाभारत के शांतिपर्व के एक श्लोक पर टिप्पणी के लिये कहा गया है । गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रवीमि, न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्” – (महाभारत, शांतिपर्व, 229/20)

मैं ईराक और अफ़गानिस्तान से ही प्रारम्भ करता हूँ, जहाँ अमेरिकी सैनिक, तालिबान, आइसिस और आम नागरिकों के बीच हिंसा की घटनायें पिछले कुछ दशकों से होती आ रही हैं । टीवी पर प्रसारित होने वाले समाचार और दृश्य दर्शकों के मन में भय, उत्तेजना, दुःख और निराशा उत्पन्न करते हैं । इन्हीं दृश्यों में से कुछ दृश्य ऐसे भी हैं जो करुणा और आशा भी उत्पन्न करते हैं । इन सभी दृश्यों, भावों और अनुभूतियों का कारण क्या है?

एक दृश्य में अमेरिकी सैनिकों ने आइसिस के कुछ आतंकियों को पकड़ लिया है । आइसिस के लोगों ने अमेरिकी सैनिकों को पकड़ा होता तो वे उनकी नृशंस हत्या कर देते किंतु अमेरिकी सैनिकों ने ऐसा नहीं किया ...उन अमेरिकी सैनिकों ने, जिनके हृदय में 9/11 की क्रूरष्ट घटना के चित्र सदा के लिये अंकित हो चुके हैं, पकड़े गये आतंकियों को अपनी बोतल से निकालकर पानी पिलाया । टीवी का दर्शक क्रूरता और मनुष्यता के दोनों पक्षों से साक्षात्कार करता है ।

दूसरे दृश्य में एक हजारा अफ़गानी स्त्री गाँव के बाहर तड़पते हुये एक घायल व्यक्ति को पानी भी देती है और रोटी भी । घायल व्यक्ति तालिबान लड़ाका है जो हजारा अफगानियों को देखते ही गोली मार देता है या स्त्रियों को देखते ही उन पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ता है । स्त्री को नहीं पता कि जान बच जाने के बाद वह पुरुष उस स्त्री के साथ किस तरह का व्यवहार करेगा । इस दृश्य में दर्शक स्त्री के उन उत्कृष्ट गुणों का साक्षात्कार करते हैं जो स्त्री को आदरणीय और पूज्य बनाते हैं।

एक अन्य दृश्य में तालिबान दुष्कृत्यों की कल्पना से भयभीत एक माँ अपनी दुधमुहीं बच्ची को काबुल हवाई अड्डे की दीवाल पर खड़े अनजान विदेशी सैनिक की ओर उछाल देती है । माँ की आँखों में आँसू हैं और हृदय जैसे बैठा जा रहा हो । संकट के उन क्षणों में उस माँ को विश्वास है कि अनजान विदेशी सैनिक उसकी बच्ची को अपने देश ले जायेगा और अपनी बेटी की तरह पालेगा ।  

          हमें अपने जीवन में कई बार परस्पर विरोधी भावों, घटनाओं और स्थितियों का सामना करने के लिये विवश होना पड़ता है । हम क्रूरता का सामना करते हुये मनुष्यता की आशा में आगे बढ़ते जाते हैं । यह एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की यात्रा है, यह मनुष्य की मनुष्यता की ओर यात्रा है । यह “तमसोमा ज्योतिर्गमय” का संकल्प है ।

“गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रवीमि, न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्” – (महाभारत, शांतिपर्व, 229/20)

मनुष्य तो आपस में युद्ध करते हैं, एक-दूसरे के प्रति हिंसक और क्रूर होते हैं, स्वार्थ के लिये विश्वासघात करते हैं तब मनुष्य के लिये श्रेष्ठ कौन है? स्वामिभक्त श्वानया हल जोतने वाले बैल... या दूध देने वाली गाय... या यात्रा और युद्ध में काम आने वाले हाथी-घोड़ा और ऊँट... या मनोरंजन करने वाले गंधर्व... या वरदान देने वाले देव...???

रहस्य की बात यह है कि इस सबके बाद भी “...न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्” । अनेक दुर्गुणों के बाद भी मनुष्य के लिए मनुष्य से श्रेष्ठ और कोई नहीं है, यहाँ तक कि ब्रह्म भी नहीं । सुरों, असुरों, दैत्यों, दानवों और राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियों के भंडार हैं, किंतु उनके पास वे शक्तियाँ नहीं हैं जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाने के लिये आवश्यक हैं । दूध की श्रेष्ठता उसके दुग्धत्व में ही है जो दूध के अतिरिक्त अन्यत्र असम्भव है । अमृत की श्रेष्ठता उसके अमृतत्व में ही है जो अमृत के अतिरिक्त अन्यत्र अप्राप्य है । विष की मारकता उसके विषत्व में ही है जो विष के अतिरिक्त अन्यत्र अप्राप्य है । दूध हो या अमृत या फिर विष, किसी को किसी अन्य चीज से फ़ोर्टीफ़ाइड नहीं किया जा सकता । मनुष्य के इष्ट के लिये मनुष्यता के गुणों से युक्त मनुष्य ही चाहिये ...मनुष्य के इष्ट के लिये मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं ।

फिर प्रश्न उठता है, कैसा मनुष्य? तालिबान और आइसिस के लड़ाके भी मनुष्य जैसे ही दिखायी देते हैं । हम ऐसा मनुष्य कहाँ से खोज कर लायें जो वास्तव में मनुष्य हो... जिसके अंदर मनुष्यता हो?

मनुष्य जैसे दिखने वाले पढ़े-लिखे लोग भी निराश करते हैं, स्वयंभू सभ्य लोग भी निराश करते हैं, वैभवसम्पन्न लोग भी निराश करते हैं, तब मनुष्यता वाला मनुष्य कहाँ से मिलेगा?

संस्कारात् ... संस्कार से मिलेगा ऐसा मनुष्य । संस्कार कहाँ से मिलेगा?

मूसलयुद्ध करने वाले यदुवंशियों को संस्कार क्यों नहीं मिल सका? देवकी के भाई कंस को संस्कार क्यों नहीं मिल सका? विभीषण के भाई दशग्रीव को संस्कार क्यों नहीं मिल सका?

संस्कार भी एक यात्रा है, आत्मचेतना की यात्रा, पूर्वजन्मकृत कर्मफलों की यात्रा । हमारे संस्कारों के लिये हम ही उत्तरदायी हैं । बात फिर कर्मयोग पर आकर ठहर जाती है... उन लोगों पर आ कर ठहर जाती है जो अपने समाज और राष्ट्र के लिये इज़्रेल की तरह कर्मयोग के लिये समर्पित और निष्ठावान होते हैं ।

सोमवार, 13 सितंबर 2021

व्यावहारिक हिंदी का स्वरूप एवं उसकी स्वीकार्यता

         पूर्व में विदेशी शासन और फिर वैश्वीकरण के साथ आये तकनीक, व्यापार, विज्ञान, राजकीय प्रशासन और न्याय विषयक विदेशी शब्दों की बाहुल्यता से भारतीय भाषाओं के कलेवर और उनके उच्चारण में परिवर्तन होता रहा है । भाषा की एक स्वाभाविक गति होती है जो तत्कालीन स्थितियों, आवश्यकताओं और प्रवाह की सुगमता से प्रभावित होती है । भाषा को जीवित रहने के लिये समावेशी होना होता है, किंतु ध्यान यह भी रखना है कि भाषा का पूरी तरह रूपांतरण न हो जाय अन्यथा एक भाषा दूसरी भाषा को पूरी तरह निगल जायेगी ।

दैनिक व्यवहार में हिन्दी के प्रचलित स्वरूप ने हिन्दी के अस्तित्व के सामने आज कई तरह की चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं । केवल हिन्दी दिवस के ही दिन इस तरह के चिंतन और मंथन करने की परम्परा छोड़कर हमें सतत सजग और प्रयत्नशील होना होगा । भाषा हो या जीवन, उसके अस्तित्व की रक्षा और जीवंतता के लिये सतत परिमार्जन और चिंतन आवश्यक है ।

हिन्दी के उपयोग को लेकर शिक्षित लोगों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उनमें भाषा का स्तर, अमानकता, पर्यायवाची शब्द, नवीन शब्द निर्माण ... आदि प्रमुख हैं जिनका समाधान विद्वत्परिषद द्वारा प्रशिक्षणों के माध्यम से करने की अपेक्षा की जाती है । वास्तव में देखा जाय तो ये समस्याएँ उत्पन्न ही इसलिए हुई हैं कि हम मानक हिन्दी और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से दूर होते चले गये और इस कारण उत्पन्न हुयी रिक्तता को भरने के लिये विदेशी भाषा के शब्दों को, बुभुक्ष की तरह अपनी भाषा में स्वीकार करते चले गये । आधुनिक जीवन और आजीविका के लिये हम अपने घर और गाँव से ही दूर नहीं चले गये बल्कि क्षेत्रीय लोकबोलियों से भी दूर चले गये । किसी भी परिष्कृत भाषा को भाषायी प्राणशक्ति क्षेत्रीय बोलियों से प्राप्त होती है । लोक वह क्षेत्र है जहाँ बोलियों का प्रवाह होता है, नये शब्द प्रचलन में आते हैं और परिष्कृत भाषा साँस ले पाती है । हमें उन भोजपुरीभाषियों और पंजाबियों का ऋणी होना चाहिये जिन्होंने मारीशस, सूरीनाम और कनाडा में रहकर भी अपनी मातृ बोलियों को जीवित बनाये रखा । 

दैनिक जीवन में हिन्दी के वर्तमान स्वरूप ने हिन्दी भाषियों के सामने जो चुनौतियाँ खड़ी की हैं उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार किये जाने की आवश्यकता है, जैसे  १- संचार माध्यमों में हिन्दी का अशुद्ध उच्चारण, यथा – तरँह, हाँथ, साँथ, हाँथी, कौंवाँ, आध्यात्म आदि । संचार माध्यमों का अनुसरण करते हुये बच्चों के साथ-साथ बड़े भी इसी तरह का त्रुटिपूर्ण उच्चारण करने लगे हैं । संचार के इतने बड़े माध्यमों को व्याकरण की मर्यादाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिये । २- दूरभाष के विभिन्न माध्यमों में लिखित वार्तालाप की भाषा तो हिन्दी या क्षेत्रीय बोली ही होती है किंतु लिपि रोमन हो गयी है, इसके दुष्परिणाम अभी से देखने में आने लगे हैं । मैं इसे भाषा के प्रति भ्रष्ट आचरण मानता हूँ, यह एक बहुत ही गम्भीर विषय है जिस पर गम्भीरता से चिंतन कर परिष्कार किये जाने की आवश्यकता है । ३- विद्यालयों/महाविद्यालयों में हिन्दी के व्यवहार और कलेवर को इतना तरल और समावेशी बना दिया गया है कि उसने हिंग्लिश का रूप धारण कर लिया है जिससे हिन्दी का मूलस्वरूप ही समाप्त हो गया है । भाषा के प्रवाह के लिये लचीलापन होना चाहिये किंतु इतना भी नहीं कि भाषा अपना मौलिक स्वरूप ही खो दे । हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि रूस, चीन, फ़्रांस, ज़र्मनी आदि देशों में चिकित्सा और अभियांत्रिकी जैसे विषयों का अध्ययन-अध्यापन उनकी अपनी भाषाओं और लिपियों के माध्यम से ही किया जा रहा है । ४- क्षेत्रीय स्तर पर साहित्यिक हिन्दी के स्वरूप ने मुझे बहुत निराश किया है । हिन्दी के अधिकांश क्षेत्रीय साहित्यकार अभी तक खड़ी हिन्दी, क्षेत्रीय शब्द और व्याकरण के बीच तालमेल बिठा सकने में सफल नहीं हो सके हैं जिसके दुष्परिणाम उनके लेखन में स्पष्ट दिखायी देते हैं । यही कारण है कि मैला आँचल के बाद अब हमें इस तरह की नयी कृतियाँ प्रायः दिखायी ही नहीं देतीं । ५- परिष्कृत और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के व्यावहारिक स्वरूप के प्रति साहित्यकारों में अरुचि चिंता का विषय है । मैं उनके बहुत से किंतु-परंतु का कोई उत्तर देने से पहले आग्रह करूँगा कि वे वाराणसी के विश्वविद्यालयों में होने वाले कार्यक्रमों में कभी-कभी सम्मिलित होने की कृपा अवश्य करें । ६- मुझे चीनी भाषा के “नी हाओ” और “शेशे” के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं आता किंतु चीनियों को हिन्दी भाषा के बहुत से शब्द आते हैं । यही हाल मंगोलिया, ताज़िकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, अफ़गानिस्तान, रूस, ईरान और दक्षिण अफ़्रीका आदि देशों का है । हमें अफ़गानी बोलियाँ नहीं आतीं किंतु अधिकांश अफ़गानी हिन्दी अच्छी तरह बोल लेते हैं । निश्चित ही इसका सम्पूर्ण श्रेय हमारी फ़िल्मों और सुगम संगीत को जाता है । फिर भी मैं कहूँगा कि हिन्दी के स्तर को लेकर अधिकांश फ़िल्मों और धारावाहिकों ने गम्भीरता नहीं दिखायी है । गन्ने का रस अच्छा है किंतु उसे अमृत कहकर नहीं परोसा जा सकता । जब कोई अहिन्दीभाषी पहली बार हिन्दी सुनता है तो उसकी ग्रहणशीलता अपने उच्च स्तर पर होती है अतः हिन्दी का प्रथम स्वरूप, वह जैसा भी हो, अधिक प्रभावी और स्थायी होता है।

कई बार हमें विदेशी ध्वनियों के यथावत उच्चारण के आग्रह से उत्पन्न कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है । हमसे अपेक्षा की जाती है कि अरबी-फ़ारसी के नुक्तों और चीनी बोलियों की ध्वनियों को हिन्दी में समाहित करने के लिये हमें देवनागरी में लिपिकीय और सांकेतिक परिवर्तन करने चाहिये । मुझे ऐसा कोई आग्रह उचित नहीं लगता । हर भाषा में अन्य भाषाओं की ध्वनियों और संकेतों का होना आवश्यक नहीं है । यदि हम ध्वनियों को अपनाना चाहते हैं तो हमें भाषा के शुद्ध स्वरूप को ही क्यों नहीं अपना लेना चाहिये! हिन्दी की मौलिकता को नष्ट करने की क्या आवश्यकता? विदेशी ध्वनियों की स्वीकार्यता लिपिकीय स्तर पर देवनागरी में मुझे स्वीकार्य नहीं है । यूँ भी, बोली और भाषा की प्रकृतियाँ भौगोलिक और पारम्परिक आवश्यकताओं से प्रभावित होती हैं । देवनागरी लिपि में कोई परिवर्तन किया जाय उससे अच्छा होगा कि ध्वनिप्रेमी चीनी, अरबी या फ़ारसी का प्रयोग उनके शुद्ध और सम्पूर्ण रूप में किया करें ।

चुनौतियों का सामना – वर्तमान स्थितियों में हमारे सामने हिन्दी की स्वीकार्यता को लेकर क्या-क्या समस्याएँ हैं, इनका चिन्हांकन करने के पश्चात हमें उनके निराकरण की दिशा में आगे बढ़ना होगा । कार्यालयीन उपयोग में हिन्दी की वर्तमान स्थिति को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता । हमें अमानक हिन्दी से मानक हिन्दी की ओर बढ़ना होगा, लिखने एवं बोलने के साथ-साथ तकनीकी दक्षता का संकल्प लेना होगा, व्यावहारिक स्वीकार्यता के लिये विदेशी शब्दों के चयन में तरलता को स्वीकार करने से पहले व्याकरण की दृढ़ता के प्रति संकल्पित होना होगा (यथा डॉक्टरों, टीचरों और स्कूलों नहीं बल्कि डॉक्टर्स, टीचर्स और स्कूल्स) । शब्द लेना अनुचित नहीं किंतु व्याकरण का परित्याग अनुचित है । हमें हिन्दी की समृद्धता के लिये व्यावहारिक हिंदी में शब्दों की प्रासंगिकता, लोकबोली एवं लोकव्यवहार के शब्दों के समावेश की युक्तियुक्त शिथिलता के साथ अन्य भाषा के स्थानापन्न शब्दों के समावेश की स्वीकार्यता को स्थान देना होगा; दुरूहता एवं क्लिष्टताजन्य नकारात्मकता से मुक्ति हेतु सरलता और सहजता के साथ भाषायी समृद्धता के लिये उत्तरोत्तर प्रतिस्पर्धात्मक प्रयास करने होंगे; निज भाषा के स्वाभिमान का वैचारिक जागरण करना होगा, और अंतिम बात यह कि हम अपने दैनिक व्यवहार में हिन्दी को आत्मसात कर सकें तो हिन्दी की यही सबसे बड़ी साधना होगी ।

रविवार, 12 सितंबर 2021

एक ज़िंदा किताब


यह इक्कीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक था जब मोसल के कैदख़ाने में यौनदासी बनने से मना करने पर उन्नीस यज़ीदी लड़कियों को जला देने वाले इस्लामिक उग्रवादियों के हाथ से इस्लामिक स्टेट की सत्ता फिसलने लगी । इस्लामिक स्टेट के जीते हुये शहरों पर एक-एक कर उनकी पकड़ ढीली होने लगी तो बलात् उठायी गयी यज़ीदी और ईसाई लड़कियों में से बिक्री के लिये बची हुयी लगभग तीन हजार लड़कियों को मोसुल और रक्का के सबीया बाजारों में ज़ल्दी से ज़ल्दी बेचने के लिये इस्लामिक ज़िहादियों ने टेलीग्राम और व्हाट्स-एप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का सहारा लेना शुरू कर दिया और ख़रीदारों के लिये अरबी भाषा में लुभावने विज्ञापन देने लगे, जिनके मज़मून कुछ इस तरह हुआ करते थे - A girl for sale: Virgin. Beautiful. 12 years old.... Her price has reached $12,500 and she will be sold soon.

ईराक में स्त्रियों का जीवन ज़हन्नुम से भी बदतर बना देने वाले इस्लामिक स्टेट के गुरिल्लाओं के अत्याचारों की दर्दनाक कहानियों का कोई अंत नहीं है । “Daesh’s Slave” एक ऐसी जीवित पुस्तक है जो फ़्रांसीसी पत्रकार Thierry Oberle द्वारा लिखित और जीनान द्वारा coauthored है ।

अठारह साल की जीनान एक ईराकी कुर्दिश यज़ीदी हैं जिन्होंने आईएस गुरिल्लों की कैद से किसी तरह भागकर कुर्दिस्तान के एक शरणार्थी शिविर में शरण ली है । लेखिकाद्वय की इस पुस्तक ने मोसुल में संचालित एक अंतरराष्ट्रीय “यौनदासी बाजार” के उन स्याह पन्नों को सभ्य समाज के मुँह पर दे मारा है जिनमें यौनदासियों के रूप में यज़ीदी और ईसाई स्त्रियों की ख़रीद-फ़रोख़्त खुले आम होती रही है और संयुक्त राष्ट्र संघ असहाय बना सब कुछ देखता रहा ।   

अठारह साल की जिनान भी उन सैकड़ों लड़कियों में से एक है जिसे सन् 2014 में अल्लाह के नाम पर कई बार बेचा गया, धर्मांतरण के लिये पीटा गया और सामूहिक यौनक्रूरता का शिकार बनाया गया । इस्लाम की इबादत करने वाले गुरिल्लाओं को यक़ीन है कि ग़ैर-इस्लामिक लोगों को मुसलमान बनाने के लिये उनके साथ क्रूरतापूर्वक मारपीट करना पूरी तरह उचित और अल्लाह की ख़िदमत का एक हिस्सा है ।

इस्लामिक यौनख़रीददार उसे कुछ समय या कुछ दिन तक अपने पास रखते थे और फिर किसी दूसरे व्यक्ति को बेच देते थे । तीन माह तक चले इस नारकीय सिलसिले के बीच वह भिन्न-भिन्न उम्र और भिन्न-भिन्न मिजाज वाले लोगों की क्रूरता की शिकार होती रही । आईएस की कैद से भागने से पहले अंतिम बार उसे दो व्यक्तियों ने ख़रीदा था जिनमें से एक सेवानिवृत्त पुलिस वाला था और दूसरा एक इमाम ।

जिनान बताती हैं – “They tortured us, tried to forcefully convert us. If we refused we were beaten, chained outdoors in the sun, forced to drink water with dead mice in it. Sometimes they threatened to torture us with electricity.”

“These men are not human. They only think of death, killing. They take drugs constantly. They seek vengeance against everyone. They say that one day Islamic State will rule over the whole world.”

अपनी पुस्तक “Daesh’s Slave” में जीनान लिखती हैं किस तरह उन्हें एक बार मोसुल में एक बड़े से रिसेप्शन हॉल में बेचने के लिये ले जाया गया जहाँ उसकी जैसी और भी सबीया पहले से मौज़ूद थीं – “… dozens of women were gathered there. …The fighters circulated among us, laughing raucously, pinching our backsides.” जीनान ने एक ख़रीददार को किसी से शिकायत करते हुये सुना – “…That one has big breasts. But I want a Yazidi with blue eyes and pale skin. Those are the best apparently. I am willing to pay the price.”

सबीया (यौनदासियों) के बाजार में आने वाले ग्राहकों में सर्वाधिक संख्या ईराक़ी और सीरियाई लोगों की हुआ करती थी लेकिन योरोपीय ग्राहकों को भी कम उम्र की कुर्दिश लड़कियों का चस्का लग चुका था और वे भी सबाया की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिये ऐसे बाजारों में आने लगे थे । ख़ूबसूरत और कम उम्र की लड़कियों को इस्लामिक स्टेट के सरदारों या खाड़ी देशों के अमीर ग्राहकों के लिये सुरक्षित रखा जाता था, जीनान लिखती हैं – “The best-looking girls were reserved for the bosses or wealthy clients from Gulf nations.”

एक बार जब जिनान को बेचा जा चुका था और तमाम लोग उस बिके हुये “livestock” को देख रहे थे तभी उसने एक नये ग्राहक को कहते हुये सुना - “I will exchange your Beretta pistol for the brunette. If you prefer to pay cash it is $150 (133 euros). You can also pay in Iraqi dinars."

सबीया बाजारों में सीरिया, तुर्की और खाडी के अमीरों के लिये विशेषाधिकार सुरक्षित रखे गये थे । एक दिन जीनान ने अपने मालिक अबू ओमर को अबू अनस से अरबी में कहते सुना – “A man cannot purchase more than three women, unless he is from Syria, Turkey, or a Gulf nation,”

कुर्दिस्तान के एक शरणार्थी शिविर में रह रही जीनान को भय है कि अपने गाँव जाने पर उसे मार दिया जायेगा – “If we go back home, there will be other genocides against us. The only solution is that we have a region to ourselves, under international protection.”

भारत में हिंदू राष्ट्र का विरोध करने वालों को जीनान की यंत्रणा से सीख लेने की आवश्यकता है । कठिन समय के लिये कुर्दों के लिये एक कुर्दिस्तान है, मुसलमानों के लिये बहुत सारे देश हैं, यहूदियों के लिये इज़्रेल है किंतु हिंदुओं के लिये कहीं कोई स्थान नहीं है ।   

आख़िरी सबाया The last girl

         उसने सबीया की यातनाओं को देखा ही नहीं भो भी था । पत्थर हो जाने के बाद भी उसके अंदर बची-खुची चेतना ने करवट ली और वह ज्वालामुखी बन गयी । उसने प्रतिज्ञा की कि वह अंतिम सबाया होगी और अब दुनिया की किसी दूसरी लड़की को सबाया नहीं बनने देगी (The last Girl – By Nadia Murad Basee Taha)

त्रेतायुग में अहिल्या चुप रही थी किंतु नादिया चुप नहीं रही, उसने आवाज़ उठायी । साल 2018 में नादिया को शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया किंतु...

क्रूरता की उसी स्क्रिप्ट को तालिबान ने उठा लिया और अफ़गानिस्तान में एक नयी फ़िल्म शूट करने लगा ।

अफगानिस्तान में उठायी गयी लड़कियों को सबीया बनाया जा रहा है, वही दुर्दांत स्क्रिप्ट साल 2021 में फिर से फ़िल्मायी जाने लगी है

नादिया मुराद बसी ताहा ने अभी-अभी अपनी किशोरावस्था की दहलीज़ को पार किया ही था कि अचानक पंद्रह अगस्त 2014 को इस्लामिक स्टेट के कुछ पुरुषों ने उसे स्त्री होने के अपराध में श्राप दे दिया और वह शिला हो गयी । वह लगातार तीन महीनों तक हर पल पर्त दर पर्त शिला होती रही । कई युगों से बड़े इन तीन महीनों के भीतर ही उसने अपनी उम्र की सारी दहलीजों को पार करते हुये अधेड़ उम्र में प्रवेश कर लिया । इस तरह की हजारों लड़कियाँ शिला बनती रही हैं, आज भी बन रही हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ निर्बल होकर सब कुछ देख रहा है क्योंकि ...हर युग में मर्यादापुरुषोत्तम राम नहीं होते ।

एक किसान परिवार में जन्मी कुर्दिश यज़ीदी लड़की की उम्र तब मात्र उन्नीस साल थी जब उसके गाँव पर आइसिस के गुरिल्लों ने अल्लाहू-अकबर बोलते हुये हमला कर दिया था । स्कूली छात्रा नादिया के छह भाइयों को छह सौ अन्य ग्रामीण पुरुषों और वृद्ध स्त्रियों के साथ क़त्ल कर दिया गया । युवा स्त्रियों और लड़कियों को इस्लाम के लिये उठा लिया गया । नादिया उनमें से एक थी जिन्हें मोसुल के एक घर में कुछ और युवा लड़कियों के साथ क़ैद करके रखा गया था । यह तब की बात है जब पश्चिमी सीरिया से लेकर पूर्वी ईराक तक के अठासी हजार वर्गकिलोमीटर भूभाग पर रहने वाले आठ मिलियन वाशिदों पर पच्चीस मिलियन डॉलर के इनामी स्वयम्भू ख़लीफ़ा अबू-बकर-अल-बगदादी का इस्लामी निजाम क़ायम हो चुका था ।

पुरानी स्क्रिप्ट की नयी शूटिंग के लिये अफ़गानिस्तान में भी तालिबान गुरिल्लाओं ने यौनदासी बनाने के लिये बारह से लेकर चालीस साल तक की आयु वाली स्त्रियों को बलात उठाना शुरू कर दिया है । यहाँ भी निजाम-ए-मुस्तफ़ा कायम किये जाने की कवायद चालू है । आतंक और क्रूरता को ख़ुदा की इबादत मानने वाले ख़ुदा के बंदे एक नयी तरह की ख़ुदाई दुनिया बनाने जा रहे हैं ।  

यातना भोगती लड़कियों की दर्दनाक चीखों से चरमानंद की अनुभूति करने वाले आइसिस और तालिबान गुरिल्लाओं की बात करने से पहले इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये कि इस लेख के लिखे जाते समय हिंदुत्व उच्छेदन के लिये दुनिया भर के विद्वान त्रिदिवसीय मंथन करने में लगे हुये हैं । मैं “Dismantling Hindutva” को लक्ष्य कर किये जाने वाले वर्चुअल सेमिनार की बात कर रहा हूँ । भारत विरोधी नेता और धार्मिक विद्वान हिंदू आतंकवाद (?) को एक वैश्विक समस्या मानते हैं । ये लोग ईराक, सीरिया, अफगानिस्तान और कश्मीर घाटी में हो रहे जातीय और धार्मिक नरसंहार की घटनाओं को इस्लामिक धर्मयुद्ध का एक हिस्सा मानते हैं और इसीलिये वे यज़ीदी कुर्दों, शबाकों , शियाओं, हज़ारा अफ़गानियों, ताज़िकों, कश्मीरी पंडितों, और सिखों के ज़ेनोसाइड और यौनशोषण के उत्पीड़न की घटनाओं पर मौन रहना चाहते हैं । मानवता और धर्मनिरपेक्षता का झण्डा उठाये फिरने वाले अतिबुद्धिजीवी वर्ग के विद्वानों को हिंदुत्व से बड़ा ख़तरा और किसी से नहीं लगता, उस हिंदुत्व से जिसकी आइडियोलॉज़ी में हिंसा और शोषण का कोई स्थान नहीं होता, उस हिंदुत्व से जिसने न तो धर्मांतरण के लिए कभी कोई मिशन चलाया और न स्त्रियों को नारकीय यातनायें देने के कभी नये-नये शिखर स्थापित करने में विश्वास किया ।  

नादिया की ही तरह अठारह साल की यज़ीदी लड़की जीनान को भी आइसिस की सामूहिक यौनहिंसा का बारम्बार शिकार होना पड़ा । नादिया और ज़ीनान वे यज़ीदी लड़कियाँ हैं जो आइसिस की जेल से भाग सकने में सफल हुयीं और जिन्होंने पत्थर बन जाने के बाद भी ज़हन्नुम के विरुद्ध अपनी आवाज़ को दुनिया के सामने बुलंद किया । हाँ, पत्थर! ईराक और सीरिया की हजारों अन्य लड़कियों की तरह ज़ीनान और नादिया भी पत्थर हो गयी हैं, हँसी उनके चेहरों से सदा के लिये विलुप्त हो चुकी है और भोगे हुये अथाह दर्द पर्त-दर-पर्त पत्थर की तरह स्थायी भाव ग्रहण कर चुके हैं ।

सोलह दिसम्बर 2016 को नादिया ने संयुक्त राष्ट्र में यज़ीदी लड़कियों की नारकीय पीड़ा को व्यक्त करते हुये दुनिया भर से प्रार्थना की कि “बगदादी ख़लीफ़ा नहीं वहशी है, ख़ुदा के लिये उसे और आइसिस को हमेशा के लिये समाप्त कर दिया जाय”।

बगदादी ने निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा क़ायम करने के लिये ख़ूँखार युवाओं के अलावा पंद्रह से पच्चीस साल की आयु वाली लड़कियों को भी अपने दल में शामिल करने के लिये दुनिया भर में अभियान चला रखे थे । इस्लामिक स्टेट के लड़ाके उठायी हुयी ग़ैर इस्लामिक लड़कियों को मोसुल और रक्का की बाजार में बेचते भी थे और एक-दूसरे को तोहफ़े में भी दिया करते थे । इन लड़कियों को यौनदासी बनाने के लिये बारम्बार बेचा जाता था । ध्यान रहे, हम सभ्यता के शीर्ष युग में जीने का दम भरने वाले लोग हैं । कमाल की बात यह है कि लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें पर्दे में रहने के लिये बाध्य करने वाले लोगों को उन्हीं लड़कियों को अपने क़ैदखाने में रहते वक़्त झीने पारदर्शी कपड़े पहनने के लिये बाध्य किया जाता रहा । “बात नहीं मानने” वाली लड़कियों को बुरी तरह पीटा जाता, उन्हें सिगरेट से जलाया जाता और फिर उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म किया जाता । ध्यान रहे, यह सब निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा की आइडियोलॉज़ी के अनुसार किया जा रहा है । यदि आप इस आइडियोलॉज़ी से सहमत नहीं हैं तो फिर आप काफ़िर हैं और आपको जीने का कोई अधिकार नहीं है । हिरण्यकश्यप, कंस और रावण की आइडियोलॉज़ी समय के साथ निरंतर क्रूर होती जाती है, कभी समाप्त नहीं होती ।

ईराक़ी संसद की यज़ीदी सदस्य वियान दाख़िल ने भी पाँच अगस्त 2014 को संसद में रो-रो कर बताया कि यज़ीदी बहुल सिंजर में ईराकी सरकार “कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी” के माध्यम से ज़ुल्म-ओ-सितम ढा रही है, पाँच सौ से अधिक यज़ीदियों की हत्या कर दी गयी है, कई लड़कियों को बाजार में बेचने के लिये उठा लिया गया है और सैकड़ों लोग भूखे-प्यासे घर छोड़कर भागने को मज़बूर हुये हैं ।

ऋषि के श्राप से अहिल्या शिला हो गयी थी । मर्यादापुरुषोत्तम राम ने भावशून्य अहिल्या का उद्धार किया तब कहीं वह श्राप से मुक्त हो सकी । ईराक और सीरिया में भी हजारों स्त्रियाँ शिला बन गयीं हैं, अब वही सिलसिला अफगानिस्तान में भी शुरू कर दिया गया है । स्त्रियों के शिला बनने का यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा?

*सबाया (यौन दासी), सबीया (यौन दासियाँ)