बुधवार, 23 सितंबर 2026

केवल उसके लिए

वह लिखता है
न्याय की 
कई परिभाषायें
अलग-अलग रंग के अक्षरों से
जिसकी जैसी जाति
उसके लिए वैसी परिभाषा।
ईश्वर का श्राप 
लगे तो लगे
कैसे भी करके
राजसिंहासन तो मिले।

अचंभित हैं जातियाँ
कोई हँसती हुयी
कोई रोती हुयी
अचंभित सभी हैं।   
उन्हें इस्तीफा चाहिए
क्योंकि एक ने 
नकल होने दी
उन्हें फिर इस्तीफा चाहिए
क्योंकि दूसरे ने 
नकल नहीं होने दी
उन्हें अधिकार है 
इस्तीफा माँगने का
क्योंकि यह अधिकार 
उन्हें दिया है
उनके बाबा ने 
और वे हैं
अपने बाबा के 
अपने नानबायोलाॅजिकल के
अपने परमपूज्य मोहन के
दुलारे
और नकचढ़े
तिलचट्टे।

कब तक

आई आई टी मुंबई है
एक खेत 
जिसमें बोता है बीज
एक समर्पित वैज्ञानिक
एक समर्पित शिक्षक
जिसे बाध्य कर देती है 
तुम्हारी कुव्यवस्था
तुम्हारी कुराजकता
पलायन के लिए
कहीं दूर।

दादी ने बताया था
राजहठ से
रूठ जाया करती है
खेत की मिट्टी
बीज
और मेघ भी।
ग्रहण लग जाता है
खेत की उर्वरता को
अब कोई बीज 
नहीं उगेगा वहाँ
पहले की तरह
यह सब जानकर भी 
हठ नहीं छोड़ना चाहते तुम!

खींचकर सारा सत्व
हर बायोलाॅजिकल से
शनैः शनैः बनाते जा रहे हो तुम 
सब कुछ 
नानबायोलाॅजिकल 
क्या करोगे
इतने बंजर खेतों का! 
अचंभित है विश्व
इतनी निर्लज्जता ओढ़कर
कैसे जी लेते हो तुम!
सूर्य को ओढ़ाकर 
बादलों के लबादे
कब तक बंदी रखोगे तुम!

शनिवार, 19 सितंबर 2026

खेला ही खेला

वे बनाते हैं

जातियाँ

कोई ऊँची, कोई नीची

कोई बहुत नीची, कोई सबसे नीची

फिर करते हैं प्रोत्साहित

कि बहे 

सुगंधित समीर 

"नीची" से "ऊँची" 

और "ऊँची" से "नीची" 

जातियों के बीच

करते हुये नृत्य

जैसे बलिया की 

लहरिया वाली नचनिया

या बनारस की 

बलखाती बाई जी । 

यह एक 

बहुत राजप्रिय खेल है 

जिसमें हैं

बादशाह, बेगम, गुलाम 

और एक भीड़

संख्याओं की 

एक से दस तक 

पर आवश्यक नहीं

कि सर्वशक्तिमान हो बादशाह, 

या बेगम ही

यह तो हो सकता है 

कोई गुलाम भी

या हुकुम की दुग्गी भी।

हम सब हैं

उपकरण

उनके हर खेला के

हम सब हैं

पक्षविहीन 

पंछी बस नाम के। 

इस बार तुरुप का पत्ता 

डाल कर उबाल दिया गया है

चाय की गंदी गंजी में 

और फिर 

हर पत्ता भी तो नहीं होता

चाय का पत्ता

फिर भी

पी तो रहे ही हैं

हम भी, तुम भी

और सरकार के सचिव भी । 


एक खेला और भी है

वे खोदते हैं 

खाइयाँ

गहरी, बहुत गहरी

कुछ इस तरह 

कि बन जाते हैं पर्वत 

ठीक खाई के पार्श्व मेंं

इतने ऊँचे

कि हो जाते हैं वे 

दुर्गम

और अलंघ्य

कोई नहीं जा सकता

इधर से उधर

और उधर से इधर, 

फिर प्रारंभ होती हैं 

योजनाएँ

स्वीकृत होती हैं धनराशियाँ

जिससे कि सुगम हो आवागमन

इधर से उधर

और उधर से इधर

किये बिना समतल

खाइयाँ और पर्वत

वे इसे ही कहते हैं

समानता, सामंजस्य, 

लोकहितकारी योजना,

विकास...

और भी बहुत कुछ।


और हाँ! 

भोजन में तेल कुछ कम कर देना 

जिससे बचा सको 

कुछ तेल

जलाने एक दिया

मेरे जन्मदिन पर।  

बुधवार, 16 सितंबर 2026

तो और कौन

अंधभक्ति में नीरक्षीर विवेक का कोई स्थान नहीं होता, एक धारणा होती है, जिसके लिए हठ होता है, और यह सब सर्वोपरि माना जाता है। 

वैचारिक परिमार्जन होता है पर हर किसी में हो, यह आवश्यक नहीं। यह संस्कारों और सत्यनिष्ठा पर निर्भर करता है। मैं संघसाहित्य से प्रभावित रहा इसीलिए संघियों की कई अक्षम्य दुर्बलताओं के बाद भी संघ से जुड़ा रहा पर अंततः एक घटना के कारण संघ को सदा के लिए नमस्कार कर लिया। यही स्थिति भाजपा के संबंध में भी रही। अब ग्लानि हो रही है कि जीवन के सत्तरवें दशक तक भाजपा का भक्त क्यों बना रहा! यदि आप स्वाभिमानी, और सच्चे सनातनी हैं तो सदा चिंतनशील रहेंगे और यही वह तत्व है जो आपको हर विकृत व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति के लिए प्रोत्साहित करेगा। आज संघ और भाजपा के वर्तमान स्वरूपों में इन दोनों ही तत्वों का अकाल पड़ गया है। 

कुछ एकांगी सोच के लोग उत्तेजित हो रहे हैं, मोदी नहीं तो और कौन? क्या राहुल को बना दें प्रधानमंत्री! देश को हजारों साल बाद मिला है कोहनूर, इसे खो दिया तो हिंदुत्व की पहचान तक मिट जाएगी। 

श्रीराम और श्रीकृष्ण के बाद भी भारत रहा, आज भी है, आगे भी रहेगा। मोदी भले ही नानबायोलाॅजिकल और विष्णु के अवतार हों पर वह अमर नहीं हैं। एक दिन सबकी तरह उन्हें भी मरना है, तब क्या भारत समाप्त हो जाएगा? 

अंधभक्तों के कुतर्क नितांत मूर्खता के परिचायक हैं। यह न तो राष्ट्रभक्ति है और न सनातनभक्ति । इस सबके विरुद्ध स्वर तो उठने ही चाहिए।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

कालनेमि कभी नहीं मरता

प्रतिकूल स्थितियों में कालनेमि छिप जाते हैं, मरते नहीं। यही प्रवृत्ति माइक्रोब्स की भी होती है। हम सदा माइक्रोब्स से घिरे रहते हैं। इनकी सही पहचान या इन्हें पहचानने की भूल ही हमारा भविष्य तय करती है। 

भाजपा अपने जन्म से ही श्रापित है, जब सत्ता के लिए जनसंघ को नेपथ्य में धकेलकर कांग्रेसीकरण के सिद्धांत के साथ कुछ चालाक लोगों ने हिंदुओं पर मोहिनी डालने की कमान सँभाली थी। हिंदूराष्ट्र का सपना दिखाकर भाजपा ने हिंदुओं के साथ विश्वासघात का नया कीर्तिमान स्थापित करने में सफलता पाई है। देश के बुद्धिजीवी भी भाजपा के भँवरजाल में फँसते गये और अपने सर्वनाश को आमंत्रित करते रहे। पर अब भलीभाँति घायल होने के बाद हिंदुओं का नीरक्षीर विवेक जाग्रत हो गया है और भाजपा एवं कांग्रेस मुक्त भारत का रुझान स्पष्ट होने लगा है।

स्मरण कीजिए, आपातकाल के बाद चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध जो भी खड़ा हुआ वही जीत गया। तब सुपात्र और कुपात्र का भेद समाप्त हो गया था। माना कि वह विरोध और घृणा के चरम का परिणाम था पर उसका परिणाम भी ठीक अगले चुनाव में दिखाई पड़ गया। इंदिरा ने वापस सत्ता सँभाली। अब वैसा ही इतिहास किंचित और परिशोधन के साथ दोहराए जाने के लिए तैयार है। न कांग्रेस, न भाजपा, इस बार नया प्रयोग भारतीय मतदाता की परिपक्वता का परिचय देने की दिशा में प्रवृत्त हो चुका है जो नया विकल्प बनेगा। 

जय हिंदूराष्ट्र !

ब्राह्मण की बेटी गोया गेहूँ की लेवी

ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का विवाह दलितों से करने की बाध्यता का विधान। 

एक समय ऐसा भी था जब गेहूँ पर किसानों को लेवी देनी होती थी। लेवी यानी गेहूँ की कुल उपज का एक निश्चित भाग सरकार को सरकारी मूल्य पर बेचने की बाध्यता। बाजार मूल्य उससे कुछ अधिक होता था। अब ब्राह्मणों की बेटियों पर वैवाहिक लेवी की माँग उठ रही है। ब्राह्मण की बेटी न हुई, गेहूँ की उपज हो गई। 

जो ब्राह्मण इस माँग से व्यथित और अपमानित अनुभव कर रहे हैं उन्हें सोशल मीडिया पर गोलीबारी दी जा रही हैं और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमनियाँ भी दी जा रही हैं। यह कश्मीरी पंडितों वाला प्रारूप है। 

लोग मानते हैं कि देश में बढ़ते हर पाप के लिए वर्तमान सत्ता नहीं, बल्कि केवल विपक्ष ही दोषी है। विघ्नसंतोषी लोग नहीं चाहते कि मोदी को विष्णु के अवतार के रूप में भगवान मानकर सुस्थापित किया जाए। 

ब्राह्मणों और दलितों के बीच वैवाहिक संबंधों के विषय में मैं प्रायः वैज्ञानिक तथ्यों के साथ लिखता रहा हूँ। विचारणीय है कि अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह के लिए सरकारें क्यों प्रयासरत हैं? जबकि धर्मांतरण और जातीय व्यवस्था के पीछे सरकारों की ही चालें रहती हैं। कुछ-कुछ समयान्तराल पर नये वर्ग और नयी जातियों का सृजन करने वाली सरकारें सारा दोष ब्राह्मणों पर थोपकर जाति उन्मूलन का सपना दिखाने में भी सबसे आगे रहती हैं? यह शुद्ध डायलिमा है, यानी लोकतांत्रिक व्यभिचार।

पहली बात तो यह कि जातियाँ किसी ने नहीं बनाईं, न पंडितों ने, जैसा कि मोहन भागवत ने दुष्प्रचार किया है, और न ईश्वर ने, जैसी कि लोगों में धारणा है। जातियाँ राजा तय करते रहे हैं, और वे लोग भी जिन्हें व्यावसायिक वर्चस्व की इच्छा रही है, यथा केरल के कन्नाड़ी निर्माता, जिन्होंने व्यावसायिक वर्चस्व के लिए गोपनीयता बनाये रखी। व्यवसाय हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं। और जीवनशैली कुछ अन्य घटकों के साथ मिलकर जेनेटिक परिवर्तन के कारण बन जाते हैं, यही कारण है कि सवर्णेतर समुदाय की कई जातियों में हीमोग्लोबिनोपैथी विकसित हुई जो अचिकित्स्य है। वंश परंपरा से चलने वाली इन व्याधियों की विश्व में कहीं कोई सफल चिकित्सा नहीं है। सरकारों से प्रभावित मेडिकल साइंस ने इसका दीर्घकालीन उपाय बताया है "अंतर्जातीय विवाह", जो मेरी समझ में आज तक नहीं आया। यह वैसा ही जैसे किसी की दारू छुड़वाने के लिए ख़ुद भी उसके साथ बैठकर दारु पीने लगना। सवर्ण द्वेषी और सनातन (हिंदू) विरोधी सरकारें चाहती हैं कि सवर्ण भी इस व्याधि से पीड़ित हों जिससे कुछ नहीं तो समाज में व्याधिक समानता ही लाई जा सके। यानी, मूर्ख को विद्वान नहीं बना सकते तो विद्वान की भ्रूणहत्या तो कर ही सकते हैं जिससे सामाजिक श्रेष्ठता की सारी प्रायिकतायें और संभावनाएँ समाप्त की जा सकें।

अब जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से भारत और शेष विश्व में हीमोग्लोबिनोपैथी से प्रभावित होने वाली जातियों के बारे में पूछ सकते हैं। 

सारांश यह कि समाज में हर तरह की विषमताओं के लिए विभिन्न घटक उत्तरदायी होते हैं जिसमें परिस्थितिजन्य समझौते और जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सत्य है जिसे झुठलाने का कोई दुष्ट प्रयोजन ही हो सकता है। 

कुछ आरक्षित लोगों ने तो माँग कर दी है कि उन्हें ब्राह्मणों की बेटियों से विवाह में आरक्षण दिया जाय। यानी आरक्षित विधानसभा/लोकसभा सीट की तरह ब्राह्मणों को अपनी बेटी आरक्षित कोटे से ब्याहने की बाध्यता। यह भी एक तरह का जजिया कर है। "मोदी द ग्रेट विष्णु अवतारम्" उनकी यह माँग पूरी कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करके एक और महानता के आत्मबोध में डुबकियाँ लगाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। वे तो चाहते हैं कि भारत से सवर्णों का उन्मूलन होना ही चाहिए। 

रविवार, 13 सितंबर 2026

कृत्रिम बौद्धिकता और जातीय संघर्ष

कृत्रिम बौद्धिकता कितनी बौद्धिक?

एलन मस्क और सैम आल्टमैन ही नहीं, एआई शोधकर्ता जैकब काॅक्सन और एआई चीफ़ डारियो अमोदेई भी एआई की उल्लेखनीय सफलता के बढ़ते परिणामों के प्रति सशंकित हैं। अब यह शिक्षित युवकों के स्वावलम्बन को छीनने तक ही सीमित नहीं है, अपितु उससे कहीं बहुत आगे बढ़कर मानव सभ्यता के एक बार फिर प्रलयलीन हो जाने की आशंकाओं में परिवर्तित होता जा रहा है। 

हाँ! यह हो सकता है, जब महापंडित रावण अविवेकी हो सकता है तो एआई क्यों नहीं! एआई पर काम करते समय वैज्ञानिकों ने बौद्धिकता और विवेकशीलता में तालमेल का कोई प्रयास नहीं किया। वास्तव में कृत्रिम बौद्धिकता के आगे विवेकशीलता को कोई भाव ही नहीं दिया गया। अब यही चूक, या कहिये मदांधता भारी पड़ रही है। 

अब स्थिति यह है कि हम बड़ी द्रुति गति से मानव सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समाप्त करने की दिशा में बढ़ चुके हैं।

जातीय संघर्ष की भेंट चढ़ता भारत!

जातीय गालियाँ, घृणा और असहिष्णुता की पराकाष्ठा की भारत में बाढ़ आई हुई है। यही सब देखने के लिए उड़न खटोले पर आरुढ़ हवा में तैरता "मोगैम्बो ख़ुश ही नहीं, बहुत ख़ुश" हो रहा है।

नैतिकता और नैष्ठिकता के पराभव का लक्ष्य ही आसुरी स्वप्न है, और इसके लिए आवश्यक है अराजकता को हर तरह से प्रश्रय देना। वही हो रहा है। दूर-दूर तक कहीं कोई विश्वामित्र और संदीपन दिखाई नहीं देता, कोई राम और कृष्ण भी नहीं दिखाई देते, राक्षसी शक्तियाँ प्रचंड होती जा रही हैं, और मीलाॅर्ड मौन के दीर्घकालीन हाइबरनेशन में चले गये हैं। अब जो करना है वह गिलहरियों को ही करना होगा।