बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

घर वापसी

परमज्ञानी ने बताया

तो पता चला
भारत में रहने वाले
सभी लोग हिंदू हैं
अरब से नहीं आया
कोई मुसलमान या रोहिंग्या
कोई बौद्ध या बांग्लादेशी घुसपैठिया
ईसाई भी नहीं आया कोई
येरुशलम से
सब एक हैं, सब हिंदू हैं
सब भारतीय हैं
और...
कोई भी भारतीय हो सकता है
हिंदुओं का ठेकेदार।

जी! समझ गया
त्रेता और द्वापर में
यक्ष, राक्षस
दैत्य और असुर भी
भारतीय थे
नहीं आये थे अन्य ग्रह से।
पर नहीं समझा
कि क्यों होते रहे युद्ध
उन सबके मध्य
और असुरों के वध पर
क्यों मनाते रहे उत्सव
आप सब ?

और हाँ!
भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री
भारतीय नहीं
अरबमूल का था
करता रहा हत्या
हिंदुओं के इतिहास की
करता रहा महिमा मंडन
विदेशी लुटेरों का
क्योंकि तुम्हारे जैसे छद्माचारी
लेते रहे हैं जन्म
हर युग में।

वह तो बताया
यह क्यों नहीं बताया
कि धरती का हर वासी
मनुष्य है केवल
संतान हैं सभी
मनु-सतरूपा की।
होनी चाहिए सबकी
घर वापसी
बनाना चाहिये सबको
केवल मनुष्य।

घर वापसी!
किसका घर? कैसा घर?
किसकी वापसी?
जिन्हें तुम रखना चाहते हो
बुलाकर अपने घर
वे तैयार बैठे हैं
करने हमें बेघर।

जब बता ही रहे हो
तो यह भी बता देते
कि रावण भी तो हिंदू था
जिसका करते हो प्रतिवर्ष
वध और दहन
मनाते हो विजयादशमी
करते हो गर्व।

हिंदू के दहन का गर्व!
लज्जा नहीं आती तुम्हें?
क्यों नहीं की रावण की
प्रतीकात्मक घर वापसी ?

बहुत उपदेश देते रहे हो
बुराई पर अच्छाई की विजय का
असत्य पर सत्य की विजय का
पर क्यों खड़े हो गये
बुराई के साथ ?
असत्य के साथ ?
परमपूज्य जी!
इतने बुड़बक भी नहीं हैं हम
जितना बूझे हो तुम।

आरक्षण की भौतिकी

Physics of the reservation

तुम्हें मिला

आरक्षण का त्वरण
गति तीव्र हुयी तुम्हारी
और उड़ चले तुम
जहाँ-तहाँ
अंतरिक्ष में।
तुमने खो दी धरती
दिक्-काल विजय की चाह में
हो त्वरणाधीन
उड़ने लगे यत्र-तत्र-सर्वत्र
यह जाने बिना
कि होते ही विस्फारित
द्रव्यमान
कम हो जाता है गुरुत्वबल
जो थाम लेता है त्वरण
और रुक जाती है उड़ान।

बड़े से बड़ा पिंड भी
कितना भी सयाना हो
कितना भी उग्र हो
या हो निरंकुश प्रचंड
धूमकेतु सा
उसे टकराना ही होता है
कभी न कभी
किसी न किसी धरती से
जो सहती सब मौन हो
सतत आघात
बिना परिवाद,
यही तो है मनुस्मृति का
यथार्थ संवाद!

पढ़ा तो होगा ही
कि ज्यामितीय परिणमन है 
गुरुत्वाकर्षण बल
दिक् और काल का,
जो हैं तो
अदृश्य
पर प्रभावी उतने ही
कि निगल लें जो भी मिले
स्थूल भी
सूक्ष्म भी
द्रव्य भी
रश्मि भी।

भटकते हुये धूमकेतु
ठौर कब पाते हैं!
ठौर किसे देते हैं!
वे तो टकराते हैं केवल
किसी भी
शस्य श्यामला थरती से
हो जाते हैं नष्ट फिर
कंपित कर धरती।
पर धरती भी
रुकती है कहीं भला!

पूर्वाग्रहों से परे

आरक्षण का वैज्ञानिक विश्लेषण

शिथिलता को सक्रियता के पतन की अपेक्षा होती है, तब जो स्थिति प्राप्त होती है वह हमें सतत निष्क्रियता की ओर ले जाती है।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है, शिखर से उतरने की प्रक्रिया में पीछे जो छूटता जाता है वह शृङ्ग होता है।
गतिज भौतिकी का यही नियम है, -संयोग और वियोग की तरह संकुचन और विमोचन की प्रक्रियायें परस्पर विरोधी होती हैं और एक साथ घटित होती हैं।
भीमराव आंबेडकर ने ब्राह्मण कन्या से विवाह किया, उनकी बहनों के विवाह भी ब्राह्मण युवकों के साथ हुये। यह क्या प्रदर्शित करता है, घृणा या श्रेष्ठता का वरण? दूसरी ओर उन्होंने तत्कालीन तथाकथित जातियों के आधार पर गुणात्मक अवमूल्यन के आरक्षण की संस्तुति करना उचित समझा। इस तरह गतिज भौतिकी के सिद्धांतों के विरुद्ध एक वर्ग विशेष को आगे बढ़ने के लिए अनुलोम गति की अपेक्षा प्रतिलोम गति सुनिश्चित की गयी। मानव सभ्यता के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना थी जिस पर पूरा विश्व आज भी आश्चर्यचकित होता है। तत्कालीन राष्ट्रनायकों में यदि वास्तव में दलितों के उत्थान के प्रति सच्ची निष्ठा होती तो वे बौद्धिक और गुणात्मक शिथिलता की बात सोचते भी नहीं। यह तो प्रकृति का विधान है कि हम शरीर के जिस अंग को सक्रिय नहीं रखते वह कुछ समय के पश्चात निष्क्रिय हो जाता है। तो क्या आरक्षण की आड़ में, भारतीय समाज को पंगु बनाने का यह कोई षड्यंत्र था?
इस विधान के स्थूल और सूक्ष्म परिणामों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि आरक्षण से आर्थिक विकास तो हुआ पर बौद्धिक और नैतिक स्तर पर समाज का एक वर्ग आगे नहीं बढ़ सका। आगे बढ़ा होता तो अब तक आत्मनिर्भर होकर सामान्य प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हो चुका होता। इसके विपरीत इस वर्ग ने आरक्षण को अपना स्थाई अधिकार मान लिया। इस बीच राजनैतिक कुचक्रों ने जातीय विद्वेष को निरंतर प्रोत्साहित किया। स्मरण रखिये, यह कलियुग है, शासक अपना लाभ देखते हैं, शासित का नहीं। यह सिद्धांत हर किसी के लिए समझना आवश्यक है।

प्रतियोगिता परीक्षा का दर्शन

शिक्षा के लिए विद्यार्थी की पात्रता परीक्षा प्राचीन काल से रही है; तब भी, जब हमारे यहाँ गुरुकुल हुआ करते थे। उसका स्वरूप आज के स्वरूप से पूरी तरह भिन्न हुआ करता था जिसमें नैतिक मूल्यों का परीक्षण सर्वोपरि हुआ करता था। यही कारण है कि प्राचीन काल के भारत में विद्यार्थीजीवनोपरांत बने राजसेवकों, विद्वानों और शिक्षकों आदि में भ्रष्टाचार का स्थान लगभग नगण्य था। आज तो मंत्रालयों के सचिव जैसे उच्चाधिकारियों के भी जीवन से नैतिक शुचिता लगभग समाप्त होती जा रही है।
सारांश यह कि विकृत ग्राह्यता के कारण कुपात्रों को दी गयी विद्या "ज्ञान" में परिणमित नहीं होती, "सूचना" भर होकर रह जाती है जिसके परिणाम केवल अशिव ही होते हैं।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

विरोध की अंतरधाराएँ -१

(जातीयविभाजन की गहरी होती खाइयाँ)

विक्रम संवत् २०८२, का फाल्गुन माह भारतीय समाज के लिए दुःखद होता जा रहा है। यूजीसी के समर्थन और विरोध की आग अब सांस्कृतिक युद्ध में रूपांतरित होती जा रही है। महाशिवरात्रि के दिन पुजारी की हत्या और इससे पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय में रुचि तिवारी के साथ तहर्रुश गेमिया की क्रूर घटना एवं पश्चिमी भारत में ब्राह्मण पत्रकारों पर हिंसक आक्रमण की घटनाओं पर विराम नहीं लग पा रहा है। ब्राह्मणों को खुलकर अश्लील गालियाँ देने और भारत छोड़ने की धमकियों की प्रतिस्पर्धा में अब बौद्धपुजारी भी सामने आ चुके हैं। 

देश-विदेश में भारतीय संस्कृति और आर्ष परंपराओं के विरुद्ध कई वैचारिक अंतरधाराएँ पहले से ही प्रवाहित होती रही हैं। 

बौद्धसमाज ने भीमराव आंबेडकर को संविधाननिर्माण के एकमात्र योद्धा के रूप में श्रेय देते-देते भगवान के अवतार के रूप में स्थापित करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर ली है जिससे एक ओर तो भीमराव की मानवीय प्रतिभा नेपथ्य में बहुत पीछे चली गयी तो दूसरी ओर श्रीराम, श्रीकृष्ण, महावीर और सिद्धार्थ गौतम जैसी विभूतियों के अवतारत्व पर भी प्रश्न खड़े हो गये हैं। क्या हमारे समाज में स्वार्थों और षड्यंत्रों की एक ऐसी अंतरधारा सदा से विद्यमान रही है जो मानवेतर शक्तियों को अनुकूल अवसर पाते ही अपनी आवश्यकताओं के अनुसार गढ़ने और थोपने में समर्थ होती रही है? कहीं इसीलिए तो नहीं इन अंतरधाराओं की विषाक्तता को समझकर धर्म को अफीम माना जाने लगा? 

मानवीय प्रतिभाओं की हत्या कर देने में सक्षम होने से कोई भी अतिवादी विचार किसी भी तरह समाज के लिए शुभ नहीं हो सकता। इस अशुभता को प्रोत्साहित और संरक्षित करने में जहाँ शासन-प्रशासन बड़ी रुचि के साथ अपनी भूमिका निभाता रहा है वहीं  आम जनता भी वैचारिकअतिवाद के जनकों और प्रचारकों के षड्यंत्रों को समझने में असफल होती रही है। 

सावधान! इतिहास, पुरातात्त्विक तथ्यों और वैज्ञानिक सत्य को पूरी तरह उलट कर एक सर्वथा नवीन और विकृत इतिहास को गढ़ने की दक्षता किसी भी सभ्यता की हत्या कर देने में सक्षम है।

क्रमशः...

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

महाशिवरात्रि

 शिवशक्ति (Cosmic energy) के तीनों स्वरूपों-  सृजन (Creation, Evolution), लय (Harmony) और विलय (Disappearance, Envolution) में असंतुलन का चरमकाल है कलियुग। अब संतुलन की साधना अपरिहार्य है।

चेतना जागरण और शक्ति संतुलन की रात्रि "महाशिवरात्रि" प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी हो! इसी ऐषणा के साथ, जय महाकाल!


हे शिव! हे महाकाल!

त्रयंबकेश्वर विराट! 

चेतन ! अब जाग-जाग 

हो रहा प्रतिकूल काल ।

अ-शिव हुआ जग

कर असंतुलन

धरती का दोहन ।

कर्मविरत तृष्णा महान

धर्मविरत ले शक्तिपाश

निकले बनने सब रावण महान!

पोषण से द्वेष लिए

शोषण की चाह लिए

ध्वंस का मान लिए

चल पड़े करने 'सृजन'!

किसका सृजन? कैसा सृजन?

है राजदण्ड भी खड़ा 

अट्टहास कर रहा 

विध्वंस ही तो है 'सृजन' ! 

गा रहे 'समानता'

बाँटकर 'असमानता'

निकल पड़े रावण सब

धारण कर साधुवेश

निर्बल निरुपाय हुयीं

देश की वैदेहियाँ सब। 

पोषण की चाह नहीं

शिव की यह राह नहीं

पर

शोषण अधिकार मान

"निर्बल हूँ" चीख-चीख

छीन रहे सब आरक्षण

क्या सचमुच ये निर्बल हैं?

कर छिन्न-भिन्न मर्यादा

लाँघ-लाँघ लक्ष्मण रेखा

छीन रहा वह शक्तिस्रोत

कर अनधिकृत आधिपत्य, 

हों न क्यों शिव कुपित! 

हो रही

छीना-झपटी

कंपित हैं दिग् दिगंत।

घुमड़ रहे कृष्णमेघ

गरज-गरज युद्धघोष

निरंकुश लोभ

विस्तृत हो सुरसा बन 

हो जाए जब प्रचण्ड

करना ही होगा तब 

शक्ति का संतुलन

रोकना होगा उन्हें

युद्ध को उद्यत हुये जो।

कैसे हो नव सृजन!

साधी क्या कभी ताल?

अस्थिर है लय

विकराल है विलय

किंतु अब कर विराम,

थिर ! थिर ! थिर !

चल उठ

संकल्प ले

शिवसाधना ! शिवसाधना !

शिव की महारात्रि

जागृत कर चेतना

संतुलित अब शक्ति कर 

विनाश का विनाश कर

सृष्टि का विकास कर।

अछूत कन्या

"यह ब्राह्मण है, इसे पकड़ो, इसे नंगी करके परेड निकालेंगे आज"।

यह उस तहर्रुश गेमिया की उन्मादी हुंकार थी जो दिल्ली विश्वविद्यालय में घटित हुयी। पिछले कुछ दिनों से भारत में जातीय घृणा अपने चरम की ओर बढ़ती जा रही है। 

स्वयं को "निर्बल, शोषित, उत्पीड़ित और दलित" प्रचारित करने वाली भीड़ ने जिस पत्रकार लड़की पर आक्रमण किया उसे कैसे "सबल, शोषक, उत्पीड़क और अत्याचारी" सिद्ध किया जा सकता है! 

....पर ऐसा हुआ और बिना कुछ सिद्ध किये यह भी "सिद्ध हुआ" मान लिया गया कि लड़की ब्राह्मण है तो वह निश्चित ही अपराधी है, ...इसलिए उस पर आरोप लगाने और किसी न्यायालय में खड़े होकर कुछ भी सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

"भीड़ का अपना संविधान होता है और अपनी ही दंड संहिता भी, जो विभिन्न कालखंडों में सभी मान्य संविधानों और दण्ड संहिताओं से श्रेष्ठ मान ली जाती है।"

आम्बेडकरवादियों के भगवान भीमराव को कन्यादान करते समय उस ब्राह्मण ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन उसके ही दामाद के अनुयायी भीमवाद की ढाल लेकर ब्राह्मणों को अपना शत्रु और अछूत मानकर उनका उत्पीड़न करने लगेंगे। 

अतिउच्चशिक्षित भीमराव के अतिउच्चशिक्षित अनुयायियों ने दशकों तक प्रचारित किया कि ब्राह्मण यूरेशिया से आये विदेशी आक्रमणकारी हैं, जिन्होंने न केवल भारत के मूलनिवासियों (???) को सहस्रों वर्षों तक शिक्षा से वंचित रखा, उनका शोषण किया, उन पर अमानवीय अत्याचार किये, जातियाँ बनायीं, मनुवाद (???) फैलाया, प्रत्युत उनके महादेव को चुराकर अपने वेदों में भी लिख दिया। उच्चशिक्षित भीमवादी "ब्राह्मणों" को अपना पारंपरिक शत्रु मानने लगे हैं। माओवादियों की समानान्तर "जनताना सरकार" की तरह भीमवादियों ने भी अपना एक सर्वथा भिन्न समानान्तर इतिहास और संसार निर्मित कर लिया है। उन्होंने सुनियोजित तरीके से एक-एक कर कई झूठ गढ़े और उन्हें सत्य की तरह स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने अपना नया परिचय गढ़ा और स्वयं को "हम हिन्दू नहीं,भीम वाले हैं" या "आम्बेडकरवादी" कहना प्रारंभ किया। उन्होंने ब्राह्मणों को लक्ष्यकर कुछ संज्ञायें स्थापित कीं, यथा- ब्राह्मणवाद, मनुवाद और हिन्दूवाद इत्यादि। यद्यपि ये संज्ञायें कभी अस्तित्व में नहीं रहीं, किंतु घृणा का विषाक्त धुआँ वायु में तिरता रहा जो अब संघनित भी होने लगा है।

सत्ता और वर्चस्व की लिप्सा किसी से कुछ भी करवा सकती है। यहाँ किसी आदर्श या नैतिक मूल्यों का कोई मूल्य नहीं होता।

विक्रम संवत् २०८२ की महाशिवरात्रि से कुछ ही दिन पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के समीप हुये तहर्रुश गेमिया में एक युवती को ज्ञान के स्नातकों-परास्नातकों-पंडितों (डाॅक्टर्स) की उग्र भीड़ ने घेर लिया। फिर जो हुआ उसे तहर्रुश गेमिया के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है और उसका दृश्यवर्णन करना किसी भी सभ्यसमाज में अनुचित कृत्य माना जाता है। 

इस भीड़ में सम्मिलित उच्चशिक्षित युवक-युवतियाँ स्वयं को वामपंथी, आम्बेडकरवादी और सेक्युलर होने का परिचय देकर गौरवान्वित होते हैं। क्या हमें अपनी शिक्षाव्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है!  क्या शिक्षा सर्वकल्याणकारी नहीं होनी चाहिए? क्या शिक्षा में सुपात्रता और योग्यता के मानदण्डों को पुनः रेखांकित नहीं किया जाना चाहिए? 

भारत के उच्चशिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने निष्पक्षता और समानता की आड़ में एक पक्षपातपूर्ण और  सर्वथा विषमतामूलक  विधान-प्रस्ताव का पक्ष लेते हुये आश्वासन दिया कि इस तरह के पक्षपातपूर्ण विधान के होते हुये भी सवर्णों के साथ अत्याचार नहीं किया जायेगा, ...पर ऐसा नहीं हुआ, प्रत्युत पहले से ही हो रहे अत्याचारों में अनायास तीव्रता आ गयी। दिन-प्रतिदिन बढ़ता हुआ अत्याचार एक दिन तहर्रुश गेमिया बनकर प्रकट हुआ जो सभ्य समाज का सर्वाधिक असभ्य और क्रूरष्ट मनोरंजन माना जाता है। हो सकता है कि शिक्षामंत्री तहर्रुश गेमिया जैसे लिंगभेदी उत्पीड़न को अरबी मनोरंजन का एक अंश मानकर हर्षित और उत्साहित हो रहे हों।

विरोध के अभाव में, हाँ! विरोध के अभाव में ही... आम्बेडकरवादी यह स्थापित करने में सफल होते रहे हैं कि "ब्राह्मण अछूत और निंदनीय" होते हैं, उनकी कन्याओं को  तहर्रुश गेमिया का खिलौना बनाया जाना आम्बेडकरवादियों का मौलिक अधिकार है जो उन्हें उनके भगवान भीमराव ने संविधान के माध्यम से वरदान स्वरूप प्रदान किया है। इसी अधिकार का उपभोग करते हुये एक तकनीकीविद्यालय में आम्बेडकरवादियों की तथाकथित शोषित-पीड़ित-वंचित-दलित भीड़ ने एक तथाकथितरूप से घोषित शोषक-उत्पीड़क-अत्याचारी-सवर्ण शिक्षक को भगवान भीमराव की ईशनिंदा के आरोप में पूर्ण धृष्टता और कृतघ्नता के साथ अपमानित किया और उन्हें भूलुंठित हो भीमराव के चित्र और भीड़ से क्षमायाचना के लिए बाध्य कर दिया। यह सत्य पर असत्य की विजय है। 

एक अन्य विद्यालय में वसंतपंचमी के दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के साथ अहर्निश स्मरणीय भगवान भीमराव के चित्र की पूजा की हिंसक बाध्यता ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि भीमराव अवतारी देवात्मा हैं, जिनका स्थान देवी सरस्वती के समकक्ष है इसलिए ब्राह्मण शिक्षिका को भीड़ का हर आदेश मानना ही होगा।

हे परमपूज्य असहिष्णु आम्बेडकरवादियो! कलियुग के इस कालखण्ड में हमने स्वीकार कर लिया है कि निरपराध ब्राह्मण भी अपराधी होता है, वह दलित और अछूत भी होता है, ब्राह्मणों की बेटियाँ अछूत कन्या होती हैं। कृपा कर अब और मत करना तहर्रुश गेमिया, हमें हमारे उन सभी अपराधों के लिए क्षमा करें जो हमने करना तो दूर, कभी सोचे भी नहीं। 

"नेतृत्व जब-जब निर्बल होता है, भीड़ तब-तब सबल होती है... और तब शासन भी सत्ता का नहीं, भीड़ का होता है।"

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

अपकेन्द्रण

युग बीते

वे केवल जीते
हम केवल हारे
उलझे अपनों में
भटके सागर में
पर नहीं किया समुद्रमंथन
नहीं हो सका अपकेन्द्रण
चरमसान्द्रित अपद्रव्यों का
हहराते कालकूट का।

चलो
एक Centrifuge यंत्र बनायें
विराट
मंदराचल से भी विराट।
असुर तो पहले से ही हैं समक्ष
पर
सुर भी तो त्यागें अपने-अपने
सुविधा कक्ष
है समर प्रत्यक्ष।
अब
करना ही होगा पृथक
अमृत और विष
अब और न होगा
देश विभक्त
खण्ड समाज के
और न होंगे
साधु-संत के
शिविर पृथक।
चार्वाक हैं खड़े बहुत
मौन रहे क्यों वैशेषिकादि
आओ खींचें रेखा
पहचानें वे असत्य सभी
सत्य ओढ़कर डटे हुये जो,
पहचानें छल सारे
भेद
छीनने और त्यागने में
साधु और दस्यु में
भली-भाँति स्वीकारें।
बहुत सो लिए
अब तो जागें!