शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

अस्सी

देश में यौनोत्पीड़न की कम से कम अस्सी विदित घटनायें प्रतिदिन हो रही हैं, अविदित घटनाएँ तो इतनी अधिक हैं कि उनका अनुमान भी लगा सकना आसान नहीं है। अस्सी की पटकथा में छह वर्ष की बच्चियाँ और दस वर्ष के बालक भी सम्मिलित हैं जो तापसी पन्नू को व्यथित करते हैं। आज से देश भर में "अस्सी" का प्रदर्शन हो रहा है। तापसी चाहती हैं कि दर्शक इसे न्यायाधीश की तरह देखें।

"अस्सी" की व्यथा से भिन्न इसी युग की स्त्री की एक और व्यथा है जो स्त्रीमुक्ति की छटपटाहट से परिपूर्ण है। दोनों व्यथाओं में दो तत्व उभय हैं -यौनोत्पीड़न और पुरुष वर्चस्व।

आधुनिक समय में पुरुषवर्चस्व के विरुद्ध नारी-मुक्ति, नारी-सशक्तिकरण और नारी-उत्थान जैसे तत्व स्त्रीविमर्श के प्रमुख विषय रहे हैं जिन पर चर्चाओं-परिर्चाओं से लेकर शोध और साहित्यसृजन तक की यात्रायें होती रही हैं। 

आज की उच्चशिक्षित स्त्रियों के एक वर्ग ने प्रत्यग्र वायु के लिए पूरब की खिड़की बंद कर पश्चिम की खिड़की खोल ली है। 

वे मानती हैं कि स्त्री की स्वतंत्रता और उत्थान में बाधक 'कौमार्य सुरक्षाकेंद्रित' एक ऐसा तंत्र है जिसे पुरुष ने स्त्री को अपनी यौनदासी बनाये रखने के लिए स्थापित किया है।

कुछ परिवारिकेंद्रित अपवादों को छोड़ दिया जाय तो भारत में नारी शिक्षा कभी प्रतिबंधित नहीं रही, प्राचीन भारत में तो कदापि नहीं। जिन परिवारों में प्रतिबंध रहा भी है तो उसका कारण कौमार्यत्वमूलक पवित्रता को ही मानने के उदाहरण विरले ही रहे होंगे।

नारी उत्थान के लिए पुरूष वर्चस्व से स्त्री की स्वतंत्रता की पक्षधर स्त्रियों में से एक वर्ग की विचारनेत्रियों को अपने कौमार्यत्व विषयक क्रांतिकारी विचारों के लिए जाना जाता है। क्रांतिकारी इसलिए कि उन्हें पूर्व के गवाक्ष की अपेक्षा पश्चिम के गवाक्ष से आने वाली हवा में नारी शक्ति की ऊर्जा का प्रवाह अधिक दिखाई देता है। 

आज एक लेखिका के विचार पढ़ने को मिले। उनके लेखन का सार यह है कि स्त्री गुह्यांग की अक्षुणता को नैतिक या धार्मिक मूल्यों से जोड़कर देखना स्त्री को व्यक्तिविशेष की यौनदासी बनाने का कुचक्र है जिससे स्त्री के उत्थान में बाधायें आती हैं। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- A part of the human body can not be considered as a matter of moral values.

लेखिका के उच्चशिक्षित होने के कारण उनके विचारों की पूरी तरह उपेक्षा भी नहीं की जा सकती, ऐसा करना समाज के लिए घातक हो सकता है। भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री और पुरुष के संबंध पूरकता और समानता के साथ अन्योन्याश्रित माने जाते रहे हैं ।

स्त्रीकौमार्यत्व को लेकर दो शब्द प्रक्षेपित किये जाते रहे हैं, एक है पवित्रता और दूसरा है सुरक्षा। दोनों के अंतर को भी समझा जाना चाहिए। पवित्रता के लिए सुरक्षा या सुरक्षा के लिए पवित्रता? 

कौमार्यत्व की स्वतंत्रता के परिणाम नौ माह तक सतत प्रतिफलित होने वाली दैहिक परतंत्रता को आमंत्रित करते हैं। यह स्त्रीदेह की अनिवार्य परिणति है। इससे बचने के लिए उपलब्ध आधुनिक सहज निरोधक उपाय अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। दूसरा उपाय गर्भपात हो सकता है जिसकी पीड़ा भी स्त्री को ही भोगनी होती है।

स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति और उत्थान के मार्ग में कौमार्यत्व कहाँ बाधक है? कौमार्यत्व की शिथिलता स्त्री उत्थान के लिए इतनी महत्वपूर्ण और निर्णायक कैसे हो सकती है? वैदिक और वैदिकोत्तरकाल में भी बेटियों की शिक्षा या आत्मोत्थान के लिए कौमार्यत्व की स्वच्छंदता को आधार नहीं बनाया गया, आज भी नहीं है।

सतत नूतनता की चाह लिए स्त्री की दृष्टि में पश्चिम से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता का प्रतिशत कोई अर्थ नहीं रखता। पूरब से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता के साथ उगते सूर्य के प्रकाश का एक तत्व और भी है जो पश्चिम से आने वाली वायु में नहीं होता, जो प्रकाश है भी वह अस्ताचलगामी सूर्य का है, जिसके बाद अंधकार अनिवार्य होता है।

विरोध की अंतरधाराएँ-४

भीमाकोरेगाँव दोहराने की धमकियाँ

*महारों को गर्व है कि उन्होंने सन् १८१८ में ०१ जनवरी को अपने ब्राह्मणराजा के विरुद्ध हुये युद्ध में एक विदेशी ब्रिटिश व्यापारिक कंपनी का साथ दिया और पेशवा को पूना छोड़कर बिठूर भागने के लिए विवश कर दिया था।*

पेशवा की सेना में मराठवाड़ा के हिंदू सैनिकों के साथ-साथ अरब सैनिक भी थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग लिया किंतु महार इसे ब्राह्मण विरुद्ध दलित युद्ध के रूप में देखते रहे हैं जबकि १८१८ में 'दलित' जैसा कोई शब्द किसी के लिए भी प्रयुक्त ही नहीं होता था। राजाओं की सेना में महार योद्धाओं का होना और बाद में यूरोपियन्स द्वारा 'महार रेजिमेंट' का निर्माण उनके युद्धकौशल, दक्षता और उनके क्षत्रियत्व गुणों के मूल्यांकन का ही तो परिणाम था। महार रेजिमेंट आज भी है जिसमें अन्य जाति के लोग भी सम्मिलित हैं। क्या यह सब उनके साथ जातीय भेदभाव का परिणाम था? सनातन परंपरा में तो योद्धाओं को क्षत्रिय माना जाता रहा है।

छत्रपति शिवाजी की सेना में भी महार योद्धा हुआ करते थे। उनके साथ भेदभाव कब हुआ, किसने किया?

भीमाकोरेगाँव युद्ध में ब्रिटिशर्स का साथ देने वाले महारों के उत्तराधिकारी अब एक बार फिर ब्राह्मणों के विरुद्ध ताल ठोंकने लगे हैं, कारण तब भी अज्ञात था, आज भी अज्ञात है।

आपने भीमाकोरेगाँव में अंग्रेजों के साथ मिलकर अपने ही राजा के अरब और हिन्दू सैनिकों (जिनमें से कुछ आपके गाँव के पड़ोसी पूर्वज भी रहे होंगे) का नरसंहार किया जो महारों के लिए कितना गर्व का विषय है, यह तो आप ही तय कर सकेंगे। एक ओर तो आप वैसा ही नरसंहार पुनः दोहराने की धमकी दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर आपका यह भी आरोप है कि ब्राह्मणों ने मंदिरों में पूजा करने और शिक्षा से आपको हजारों-लाखों वर्षों तक वंचित रखा ...और इसीलिए अब आप ब्राह्मणों से उनका सब कुछ छीन लेने की आभासी संचार माध्यमों पर और जनसभाएँ कर धमकियाँ देने लगे हैं। आप ब्राह्मणों से छीन लेना चाहते हैं उनके प्रतीक, उनके मौलिक अधिकार, उनकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उनकी बेटियाँ भी... फिर भी आप स्वयं को ही वंचित, शोषित और पीड़ित कहते हैं! इतना बड़ा झूठ बोलने का दुस्साहस कहाँ से लाते हैं आप लोग!

आप तो यह भी कहते हैं कि भारत कभी मंदिरों का देश नहीं रहा, यहाँ जो हैं वे सब बौद्ध मठ हैं। हम पुरातात्त्विक तथ्यों में गये बिना आपसे पूछते हैं कि मंदिर थे नहीं फिर भी हजारों सालों तक ब्राह्मणों ने आपको मंदिरों में जाने से रोका? आपको शिक्षा से वंचित रखा किंतु आश्चर्य यह कि फिर भी आप सैन्यप्रशिक्षण प्राप्त करते रहे! 

विरोधाभासों और मनगढंत आरोप गढ़ने की सारी सीमायें तोड़कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

इतिहास यह है कि भीमाकोरेगाँव युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य भीमा नदी के किनारे १ जनवरी १८१८ में लड़ा गया। कंपनी सेना की ओर से महार रेजिमेंट के ८३४ सैनिकों और पेशवा की ओर से २८००० सैनिकों ने युद्ध लड़ा था जो अनिर्णीत रहा किंतु उसके बाद पेशवा को अंग्रेजों से कुछ पेंशन लेकर संधि करनी पड़ी और पुणे से बिठूर जाना पड़ा। 

ब्रिटिशकंपनी ने इस संधि के उपलक्ष्य में कोरेगाँव में एक विजय स्तंभ बनवाया और प्रतिवर्ष ०१ जनवरी को वहाँ शौर्यदिवस मनाया जाने लगा। 

यद्यपि यह युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य हुआ पर महारों ने १९४७ के बाद इसे ब्राह्मणों पर महारों की विजय के रूप में मनाना प्रारंभ किया। महार आज भी इसे इसी रूप में मना कर भी जातिवाद का आरोप ब्राह्मणों पर लगाते नहीं थकते।  

भीमाकोरेगाँव इतिहास के संदर्भ में आपकी पूर्व एवं वर्तमान भूमिकाओं को किस तरह देशभक्ति और तथाकथित मनुवाद एवं ब्राह्मणवाद का प्रमाण माना सकता है, यह विचार भी आप ही कर सकते हैंं। 

क्रमशः...

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

विरोध की अंतरधाराएँ- ३

(वैज्ञानिक की निष्ठा)

ब्राह्मणीय चरित्र और निष्ठा पर वामसेफियों के निरंतर प्रहारों के बीच एक युवा ब्राह्मण ने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया है। ब्राह्मणों की ऐसी दाधीचि परंपरा हमारे लिए गर्व का विषय है। 

मानव मस्तिष्क पर यांत्रिकीय नियंत्रण के गंभीर दुष्परिणामों की आशंकाओं के कारण विश्वविख्यात ए.आई. प्रतिष्ठान एंथ्रोपिक के वैज्ञानिक मृणांक शर्मा त्यागपत्र दे चुके हैं और अब वे कविताएँ लिखेंगे। 

युवा वैज्ञानिक मृणांक आॅक्सफोर्ड विवि से मशीन लर्निंग में पीएच.डी. करने के बाद एंथ्रोपिक में सेफगार्ड टीम के प्रमुख नियुक्त हुये थे। मानव मस्तिष्क पर मशीन का नियंत्रण बौद्धिक जगत में चिंतन और मंथन का विषय रहा है। मृणांक ने मानव मस्तिष्क की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता पर मशीनी नियंत्रण के बढ़ते प्रभागों को नैतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा और एंथ्रोपिक को राम-राम कहकर साहित्य की ओर मुड़ गये। मृणांक शर्मा के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में वामन मेश्राम और चंद्रशेखर रावण जैसे वामसेफियों के अखण्डमौन पर भीमवादियों को विचार करना चाहिए जो यह दुष्प्रचार करते नहीं थकते कि ब्राह्मणों में नैतिकता, निष्ठा और चरित्र का पूरी तरह अभाव होता है।

क्रमशः...

विरोध की अंतरधाराएँ- २

बौद्धभिक्खु सुमित रत्न उवाच-  

"१.सनातन शब्द बौद्ध धर्म का है जिसे हिंदुओं ने ले लिया। बौद्ध ही सनातन है। हिंदू धर्म तो यूरेशिया से आये विदेशी आक्रमणकारियों का धर्म है। २. भारत में सभी हिंदूमंदिर बौद्ध मठों को तोड़कर बनाये गये हैं। ३. हमारे पास ऐसे ८४ हजार मंदिरों के प्रमाण हैं जो बौद्धमठों को तोड़कर बनाये गये हैं। ४. अयोध्या के राममंदिर और तिरुपतिमंदिर सहित  भारत के सभी प्रमुख मंदिर बौद्धमठ थे जिनपर मनुवादियों ने अधिकार कर लिया।"

बौद्ध और भीमभक्त यह प्रचारित और स्थापित करने में सफल हुये हैं कि धर्म और सभ्यता का प्रारम्भ बुद्धयुग से ही हुआ है और भीमराव आंबेडकर ने भारत के मूलनिवासियों की महिलाओं को स्तन ढकने व पुरुषों को शिक्षा का अधिकार दिया। जब उच्चशिक्षित और शासन के उच्चपदाधिकारी लोग आमजनता के सामने दहाड़ते हुये ऐसे निराधार वक्तव्य देते हैं तो सुनने वालों के मन में तर्क-वितर्क का कोई स्थान नहीं रह जाता। वे वही मानते हैं जो उन्हें बताया जाता है। इन छद्म विद्वानों ने बौद्धरामायण जैसी पुस्तकें लिखकर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बलात्कार ही नहीं किया है प्रत्युत भारत विभाजन की एक और आधारशिला रख दी है। 

सुमितरत्न ही नहीं, बहुत से उच्चशिक्षित लोग भी यही मानते और प्रचारित करते हैं कि हिन्दू लोग यूरेशिया से आये अत्याचारी विदेशी आक्रमणकारी हैं । ऐसे लोगों में जज, कलेक्टर, कमिश्नर, डाॅक्टर, आईपीएस अधिकारी और मंत्री लोग भी सम्मिलित हैं। 

इन लोगों ने अपने विचारों की प्रामाणिकता के लिए मनगढ़ंत अत्याचारों, मिथ्या इतिहास और निराधार   किस्सों को गढ़कर बड़ी-बड़ी पुस्तकों को प्रकाशित किया है। 

यह विडंबना है कि उनका गढ़ा शतप्रतिशत झूठ स्थापित-मंडित होता जा रहा है और हम न तो उसका सशक्त खंडन कर पा रहे हैं और न भारतीय सभ्यता के सत्य को सामने ला पा हे हैं। हम इतने असमर्थ और निर्बल क्यों हैं?खंडन-मंडन के लिए हमारे पास कोई सुदृढ़ और परिपक्व योजना क्यों नहीं है? सावधान! हिन्दूविरोध अब केवल विचार तक ही सीमित नहीं रहा, हिंसक घटनाओं में रूपांतरित हो चुका है।

क्रमशः... 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

घर वापसी

परमज्ञानी ने बताया

तो पता चला
भारत में रहने वाले
सभी लोग हिंदू हैं
अरब से नहीं आया
कोई मुसलमान या रोहिंग्या
कोई बौद्ध या बांग्लादेशी घुसपैठिया
ईसाई भी नहीं आया कोई
येरुशलम से
सब एक हैं, सब हिंदू हैं
सब भारतीय हैं
और...
कोई भी भारतीय हो सकता है
हिंदुओं का ठेकेदार।

जी! समझ गया
त्रेता और द्वापर में
यक्ष, राक्षस
दैत्य और असुर भी
भारतीय थे
नहीं आये थे अन्य ग्रह से।
पर नहीं समझा
कि क्यों होते रहे युद्ध
उन सबके मध्य
और असुरों के वध पर
क्यों मनाते रहे उत्सव
आप सब ?

और हाँ!
भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री
भारतीय नहीं
अरबमूल का था
करता रहा हत्या
हिंदुओं के इतिहास की
करता रहा महिमा मंडन
विदेशी लुटेरों का
क्योंकि तुम्हारे जैसे छद्माचारी
लेते रहे हैं जन्म
हर युग में।

वह तो बताया
यह क्यों नहीं बताया
कि धरती का हर वासी
मनुष्य है केवल
संतान हैं सभी
मनु-सतरूपा की।
होनी चाहिए सबकी
घर वापसी
बनाना चाहिये सबको
केवल मनुष्य।

घर वापसी!
किसका घर? कैसा घर?
किसकी वापसी?
जिन्हें तुम रखना चाहते हो
बुलाकर अपने घर
वे तैयार बैठे हैं
करने हमें बेघर।

जब बता ही रहे हो
तो यह भी बता देते
कि रावण भी तो हिंदू था
जिसका करते हो प्रतिवर्ष
वध और दहन
मनाते हो विजयादशमी
करते हो गर्व।

हिंदू के दहन का गर्व!
लज्जा नहीं आती तुम्हें?
क्यों नहीं की रावण की
प्रतीकात्मक घर वापसी ?

बहुत उपदेश देते रहे हो
बुराई पर अच्छाई की विजय का
असत्य पर सत्य की विजय का
पर क्यों खड़े हो गये
बुराई के साथ ?
असत्य के साथ ?
परमपूज्य जी!
इतने बुड़बक भी नहीं हैं हम
जितना बूझे हो तुम।

आरक्षण की भौतिकी

Physics of the reservation

तुम्हें मिला

आरक्षण का त्वरण
गति तीव्र हुयी तुम्हारी
और उड़ चले तुम
जहाँ-तहाँ
अंतरिक्ष में।
तुमने खो दी धरती
दिक्-काल विजय की चाह में
हो त्वरणाधीन
उड़ने लगे यत्र-तत्र-सर्वत्र
यह जाने बिना
कि होते ही विस्फारित
द्रव्यमान
कम हो जाता है गुरुत्वबल
जो थाम लेता है त्वरण
और रुक जाती है उड़ान।

बड़े से बड़ा पिंड भी
कितना भी सयाना हो
कितना भी उग्र हो
या हो निरंकुश प्रचंड
धूमकेतु सा
उसे टकराना ही होता है
कभी न कभी
किसी न किसी धरती से
जो सहती सब मौन हो
सतत आघात
बिना परिवाद,
यही तो है मनुस्मृति का
यथार्थ संवाद!

पढ़ा तो होगा ही
कि ज्यामितीय परिणमन है 
गुरुत्वाकर्षण बल
दिक् और काल का,
जो हैं तो
अदृश्य
पर प्रभावी उतने ही
कि निगल लें जो भी मिले
स्थूल भी
सूक्ष्म भी
द्रव्य भी
रश्मि भी।

भटकते हुये धूमकेतु
ठौर कब पाते हैं!
ठौर किसे देते हैं!
वे तो टकराते हैं केवल
किसी भी
शस्य श्यामला थरती से
हो जाते हैं नष्ट फिर
कंपित कर धरती।
पर धरती भी
रुकती है कहीं भला!

पूर्वाग्रहों से परे

आरक्षण का वैज्ञानिक विश्लेषण

शिथिलता को सक्रियता के पतन की अपेक्षा होती है, तब जो स्थिति प्राप्त होती है वह हमें सतत निष्क्रियता की ओर ले जाती है।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है, शिखर से उतरने की प्रक्रिया में पीछे जो छूटता जाता है वह शृङ्ग होता है।
गतिज भौतिकी का यही नियम है, -संयोग और वियोग की तरह संकुचन और विमोचन की प्रक्रियायें परस्पर विरोधी होती हैं और एक साथ घटित होती हैं।
भीमराव आंबेडकर ने ब्राह्मण कन्या से विवाह किया, उनकी बहनों के विवाह भी ब्राह्मण युवकों के साथ हुये। यह क्या प्रदर्शित करता है, घृणा या श्रेष्ठता का वरण? दूसरी ओर उन्होंने तत्कालीन तथाकथित जातियों के आधार पर गुणात्मक अवमूल्यन के आरक्षण की संस्तुति करना उचित समझा। इस तरह गतिज भौतिकी के सिद्धांतों के विरुद्ध एक वर्ग विशेष को आगे बढ़ने के लिए अनुलोम गति की अपेक्षा प्रतिलोम गति सुनिश्चित की गयी। मानव सभ्यता के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना थी जिस पर पूरा विश्व आज भी आश्चर्यचकित होता है। तत्कालीन राष्ट्रनायकों में यदि वास्तव में दलितों के उत्थान के प्रति सच्ची निष्ठा होती तो वे बौद्धिक और गुणात्मक शिथिलता की बात सोचते भी नहीं। यह तो प्रकृति का विधान है कि हम शरीर के जिस अंग को सक्रिय नहीं रखते वह कुछ समय के पश्चात निष्क्रिय हो जाता है। तो क्या आरक्षण की आड़ में, भारतीय समाज को पंगु बनाने का यह कोई षड्यंत्र था?
इस विधान के स्थूल और सूक्ष्म परिणामों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि आरक्षण से आर्थिक विकास तो हुआ पर बौद्धिक और नैतिक स्तर पर समाज का एक वर्ग आगे नहीं बढ़ सका। आगे बढ़ा होता तो अब तक आत्मनिर्भर होकर सामान्य प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हो चुका होता। इसके विपरीत इस वर्ग ने आरक्षण को अपना स्थाई अधिकार मान लिया। इस बीच राजनैतिक कुचक्रों ने जातीय विद्वेष को निरंतर प्रोत्साहित किया। स्मरण रखिये, यह कलियुग है, शासक अपना लाभ देखते हैं, शासित का नहीं। यह सिद्धांत हर किसी के लिए समझना आवश्यक है।

प्रतियोगिता परीक्षा का दर्शन

शिक्षा के लिए विद्यार्थी की पात्रता परीक्षा प्राचीन काल से रही है; तब भी, जब हमारे यहाँ गुरुकुल हुआ करते थे। उसका स्वरूप आज के स्वरूप से पूरी तरह भिन्न हुआ करता था जिसमें नैतिक मूल्यों का परीक्षण सर्वोपरि हुआ करता था। यही कारण है कि प्राचीन काल के भारत में विद्यार्थीजीवनोपरांत बने राजसेवकों, विद्वानों और शिक्षकों आदि में भ्रष्टाचार का स्थान लगभग नगण्य था। आज तो मंत्रालयों के सचिव जैसे उच्चाधिकारियों के भी जीवन से नैतिक शुचिता लगभग समाप्त होती जा रही है।
सारांश यह कि विकृत ग्राह्यता के कारण कुपात्रों को दी गयी विद्या "ज्ञान" में परिणमित नहीं होती, "सूचना" भर होकर रह जाती है जिसके परिणाम केवल अशिव ही होते हैं।