मंगलवार, 25 अगस्त 2026

जातीय समीकरण और सत्ता

 -जातिवाद मुर्दाबाद! जातीय जनगणना जिंदाबाद

-जिसकी जितनी संख्या भारी (अंकसूची छोड़कर), उतनी उसकी भागीदारी (सत्ता और शासकीय सेवाओं में)!

-तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते मारने के लिए उनकी पहचान और संख्या का पता होना आवश्यक है, इसलिए जातीय जनगणना आवश्यक है। 

-सत्ता और शासकीय सेवाओं में भागीदारी के लिए, गुणवत्ता नहीं संख्याबल चाहिए इसलिए जातिवाद का स्थायी होना आवश्यक है। 

-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की बेटियों का शुद्धिकरण (यौनप्रक्षालन) करने और उनसे विवाह करने के लिए जातिवाद का होना आवश्यक है।

-तिलक-तराजू-तलवार को गालियाँ देने, उन्हें मारने-पीटने, उनकी हत्या करने और उन पर एस.सी. एस.टी. अपमान का आरोप लगाकर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि लेने और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमकी देने के लिए जातिवाद की खाइयाँ और भी गहरी करना आवश्यक है।

-ये सब समाज की नहीं, दूषित और भ्रष्ट सत्ता की आवश्यकतायें हैं। इसीलिए क्षतिपूर्ति राशि के आकर्षण को इस तरह परोसा जाने लगा कि एस.सी.एस.टी. एक्ट भारतीय जनता के लिए अफीम बन गया। उसकी पिन्नक सिर चढ़ कर ध्वजारोहण करती है। आरक्षित वर्ग के अपमान को तौलकर उसका मूल्य तय किया जाने लगा, ताकि धन से उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।

-अपमान की क्षतिपूर्ति! यह एक नयी अवधारणा है, नैतिकमूल्यों का मूल्यांकन धनराशि की संख्या पर आकर ठहर जाता है। उसकी इतनी ही गति है।

-सिंहासन तक पहुँचने और फिर उसे दृढ़ता से पकड़े रहने के लिए जातीय समीकरण का गणित लगाते रहना कूटनीतिज्ञों के लिए सरलतम मार्ग होता है।

-कूट/छल नीति का राजनीति से नहीं, अराजकता से संबंध होता है। यह बात उनकी समझ में अच्छी तरह आती है जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और श्रीराम के आदर्शों को सत्ता और समाज दोनों से निरंतर दूर रखा। 

गालीप्रेमी भजनद्वेषी

जेन-जी लड़कियों ने मोदी और उनकी माँ को पोर्नगालियाँ दीं तो सरकार प्रसन्न होकर उनके सामने नतमस्तक हो गई, स्वयं प्रधानमंत्री ने गालीबाजों को गले से लगाने की इच्छा प्रकट की। इसके कुछ ही दिन बाद हनुमान चालीसा का भजन करती युवाओं की भीड़ से रामभक्त होने का पाखंड करने वाली सरकार इतनी कुपित हुई कि गृहमंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस को हिंसा के लिए आदेशित कर दिया गया। 

देश ही नहीं विश्व भर में विश्वगुरु के इस संदेश ने लोगों को हतप्रभ कर दिया। आपातकाल की घोषणा किये बिना दिल्ली में आपातकाल लगा दिया गया। इस अघोषित आपातकाल के लिए भाजपा और मोदी को इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। 

जातिगतआरक्षण, अत्याचारमूलक यूजीसी बिल और जातीय उत्पीड़न को समाप्त करने की याचना के साथ पूरे देश से उमड़ी भीड़ स्वतंत्र भारत का सच्चा मुक्तिआंदोलन है जिसके दमन के लिए संघ के वैचारिक आक्रमणों और भाजपा के हिंसक दमन ने देश भर को हतप्रभ कर दिया है। 

जंतर-मंतर पर युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हनुमान चालीसा का भजन करती भीड़ पर पुलिस की लाठियों के प्रहार ने घोषित कर दिया है कि राममंदिर और हिंदुत्व की बातें भाजपा और संघ के अलतकिया से अधिक और कुछ नहीं था। 

सत्य और नैसर्गिक न्याय की याचना करते भूलुंठित युवाओं पर मोदी सरकार की पुलिस के क्रूर प्रहारों, प्रदर्शनकारी पंडित पंकज धावरिया को बंदी बनाने के बाद चलती गाड़ी से नीचे फेंककर जातिसूचक गालियाँ देते हुये दिल्ली पुलिस की यातनाओं से भयभीत हो गये भय ने धीरे से फुसफुसाकर बता दिया कि भारत में संघ और भाजपा के फासीवाद की घोषणा हो चुकी है जो मोदी के प्रिय "न्यू वर्ल्ड  आॅर्डर" का एक अंश भर है। 

रविवार, 23 अगस्त 2026

आरक्षण का अधिकार

हर किसी को अपने पतन या उत्थान का अधिकार प्राप्त है । यह अधिकार सदा से आरक्षित रहा है, संविधान निर्माण के पहले से ही। 

आज मेरी बात आपको प्रतिकूल दिशा में जाती सी प्रतीत होगी। मैं सदा आरक्षण के विरोध में लिखता रहा हूँ। आज मैं इसके दूसरे स्वरूप को देख पा रहा हूँ। 

आज, अभी थोड़ी देर पहले तक मैं लिखता रहा कि आरक्षण नैसर्गिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, अन्याय है, अमानवीय है और अप्राकृतिक है। अब मैं समझ पा रहा हूँ कि आरक्षण पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा, क्योंकि आरक्षण प्रकृति की व्यवस्था है। 

अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले तनिक ठहरकर, बहुत अधिक नहीं, मात्र शरीर रचना विज्ञान, परमाणु संरचना, सृष्टि की प्रक्रिया, ब्रह्मांडीय विन्यास और गणित के कुछ व्यावहारिक अनुबंधों पर दृष्टि अवश्य डाल लीजिए। 

इन सभी में एक सैद्धांतिक समानता है, अ-समानता और विरुद्धता की समानता। दाहिने और बायें अंगों की संरचनाओं एवं कार्यों में अ-समानता, परमाणु की संरचना में परस्पर विरोधी गुणों की अनिवार्यता, सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अ-समान गुण-कर्मों की अनिवार्यता, ब्रह्मांड की अवस्थिति में तो अ-समानता और विरुद्धता की भरमार है, और गणित में मूल संख्याओं का योग भी अ-समान ही होता है।  

अ-समानता प्राकृतिक है, समानता का हठ अप्राकृतिक है। परिवार और समाज में अ-समानता देखी जाती है, उसका होना अपरिहार्य है। उसकी संरचना और अवस्थिति का आधार भी अ-समान है, और यही अ-समानता का गुण प्रकृति का आरक्षण है। इस आरक्षण को समाप्त कौन कर सकता है! इसीलिए फ़िजिक्स के विद्वान ने दहाड़ते हुए कहा- "किसी माई के लाल ने अपनी माँ का दूध नहीं पिया जो इस आरक्षण को समाप्त कर दे"। (वैसे जिस भी बच्चे की माँ जन्म देते ही मर नहीं गयी, उसने अपने बच्चों को दूध तो पिलाया ही है। बहुत कम दुर्भाग्यशाली बच्चे होते हैं जो माँ के दूध से वंचित रहते हैं)

...तो सिद्ध हुआ कि अ-समानता प्रकृति का अपरिहार्य गुण-कर्म है, और इस संदर्भ में प्रकृति ने अपनी व्यवस्था में शतप्रतिशत आरक्षण बना कर रखा है। 

...तो यह भी सिद्ध हुआ कि सामाजिक समानता की कल्पना और उसकी माँग एक अव्यावहारिक हठ है। प्रकृति की व्यवस्था में अ-समानता का आरक्षण है, समानता का नहीं।

वैक्सीन, वायरस और व्यापार

आग पर रोटी पकती है तो क्या सूरज पर पका लें! माइक्रोब्स रोग उत्पन्न करते हैं और इम्युनिटी भी, तो क्या उनका स्वागत करें और उन्हें अपने शरीर में निर्बाध प्रवेश करने दें? 

माइक्रोब्स और शरीर के बीच में आती है हाइजीन की अवधारणा और म्यूटेशन एवं वैरिएन्ट्स के रहस्य। 

मैं अपने छात्र जीवन से ही वैक्सीनेशन के विरोध में खड़ा होता रहा, लोग उपहास करते रहे, शिक्षक भी और सहपाठी भी, पर मैं खड़ा रहा। और अब जबकि anti HIV वैक्सीन की चर्चा हो रही है तो एंटी कोरोना वैक्सीन का भूत भी एक बार पुनः झाँकने लगा है। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए जाॅर्ज सोरोस से लेकर मोदी तक पुष्पमाला लेकर खड़े हैं। उद्योगपति हर्षित हैं... बकरे स्वयं आगे आ रहे हैं कटने के लिए। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए और क्या चाहिए!

हम कुछ नहीं कहेंगे, जनसंख्या भी तो कम होनी चाहिए न! प्रकृति संतुलन करती है, यहाँ अतिज्ञानी लोग प्रकृति का अधिकार स्वयं ले चुके हैं। एपस्टीन एक बार पुनः चर्चा में है, ...कि कोविड पूर्वनियोजित था, WHO की भूमिका भी पूर्वनियोजित थी। सबका साथ था...स्वास्थ्य के विरुद्ध विष बाँट कर अपने विकास का। लाॅकडाउन हुआ, थाली बजी, वैक्सीन लगा, ...और अब हो रहा है हृदयाघात, आकालमृत्यु। योजना सफल हो रही है। जनसंख्या कम हो रही है, उद्योग विस्तारित हो रहे हैं। कल क्या होने वाला है? ....छोड़िये, बाद में सोचेंगे, अभी तो अपनी बच्चियों को एंटीकैंसर वैक्सीन (Anti HIV) लगवाना है... ताकि इस बार उनकी देह में कैंसर की फसल अच्छी हो।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

बीजिंग से अहमदाबाद

मुँह खुला ही रहता है 

चिर बुभुक्षित

ड्रैगन का

निगलने को कुछ भी

किसी भी दिशा में

मिल जाए जो भी

जहाँ भी।

चौकन्ने

मंथर गति से चलते

ड्रैगन की तीक्ष्ण दृष्टि से

बचेगा नहीं

असावधान रहेगा जो भी

और 

नहीं होगी दूरदृष्टि

जिसमें भी।


तुम तो गाते रहे 

हिंदी-चीनी भाई-भाई

और उधर बासठ हो गया।

तुमने कहा कुछ नहीं हुआ

डोकलाम में 

और उधर बनती रहीं 

सैन्य अधोसंरचनायें ताक्सिन में,

बनते रहे दो सैन्यमार्ग 

अरुणाचल में

साठ किलोमीटर भीतर तक।

तुम झूठ बोलते रहे  

पल-पल

आत्मविश्वासपूर्ण अभिनय के साथ।

कौन हो तुम?

चौकीदार तो नहीं हो सकते

नायक भी नहीं हो सकते

बंधु भी नहीं, सखा भी नहीं

ओह ! अब समझा 

तुम जो हो

वह बताएगा कौन!

सुनने के बाद

अपना सही परिचय 

मृत्युदंड निश्चित है

इसलिए सत्यवादी मौन है

गूँजता है तो केवल तुम्हारा ही 

अट्टहास दिग्दिगंत में

पर अब और नहीं

तैयार हो गये हैं कुछ लोग

करने अनावृत सारे रहस्य

भले ही मिले

क्यों न मृत्युदंड

और तुम!

तुम तो मरते ही रहते हो पल-पल

तुम्हें क्या पड़ता है 

कोई अंतर 

किसी के मरने से!

बेताल बेसुर

गाते रहे वर्षों से 

मन की बात

केवल अपनी

बिना सुने 

किसी और के मन की 

बेताल जो ठहरे!

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्रजा से संवाद

संवाद दृश्य-१. (सिर हिलाते और उंगली दिखाते हुये, धमकाने की भाव भंगिमा के साथ भीड़ को संबोधित करते हुये) - 

"...मुझे बताइये, ऐसे व्यक्ति को मौका मिल जाए... तो हिसाब चुकता करेगा या नहीं करेगा? तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम हमें मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे..."

कट..कट..कट..

खलनायक को ऐसा ही होना चाहिए, ऐसी ही भाषा, ऐसी ही भाव भंगिमा, इतना ही खल-कपटी और इतना ही मिथ्याभाषी। लोग इसे ८०० साल बाद हुआ विष्णु का अवतार मानते हैं, कोई कोहनूर तो कोई विश्वगुरु। 

अनुरागी कवि के शब्दों में-  "जा को चिमचा जितनो भारी, मनमानी छवि देखय न्यारी।।

कुछ और देखने के लिए चलिए, आगे चलते हैं...

हाथ में धनुष-बाण लिए एआई निर्मित नानबायोलाॅजिकल भगवान का चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। भगवान का स्वांग रचना महानता और ईश्वरीय अनुभूति उत्पन्न करने में सहायक होता है। हर कोई भगवान बन जाने के लिए लालायित रहता है। आप इसे ढिठाई, धृष्टता और निर्लज्जता कह कर दुःखी हो सकते हैं। पर निस्संदेह भारत में ऐसे लोगों की भरमार है जो अवतारी कहलाने और मान लिए जाने के लिए लालायित रहते हैं। पूजन-वंदन भला किसे नहीं सुहाता! 

कुछ लोगों को चित्र अच्छा नहीं लगता, वे इसे भगवान का अपमान मान कर कानाफूसी कर रहे हैं। हाँ! कानाफूसी ही, प्रत्यक्ष होकर कहने का साहस भी तो होना चाहिए!

कुछ लोगों को कृत्रिम बौद्धिकताजनित भगवान का यह चित्र बहुत प्रभावित भी करता है, वे चित्र देखकर धन्य हो रहे हैं। स्वयं भगवान प्रकट हुये हैं "राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा" का प्रचार करने। 

अति उत्साही और अत्यानुरागी भक्त यह भ्रम उत्पन्न करने में लगे हैं कि जैसे उनके नानबायोलाॅजिकल जी महान कलाकार हैं वैसे ही कौशलेश श्रीराम भी थे,...अर्थात् इतने ही सनातन विनाशक, कपटी और मिथ्याभाषी। 

यह हो क्या रहा है देश में! हम पतन की कितनी और खाइयों में... और कब तक कूदते रहेंगे?

भगवान जी ने अपने श्रुमुख से उवाचा -" मैं अतिपिछड़े वर्ग से आता हूँ। मैं दलित वर्ग से आता हूँ। मैं चाय बेचा करता था"।

ब्राह्मणों पर छुआछूत का आरोप लगाने वाले भगवान ने कभी नहीं बताया कि उनके हाथ की बनी चाय पीने वालों में से कितने लोगों ने भगवान जी से उनकी जाति पूछी? कितने लोगों ने उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया? कितने लोगों ने उनकी छुई चाय पीने से मना किया...?

अमर होने के लिए अमरत्व जैसे किसी गुण की क्या आवश्यकता! प्रचार और निर्लज्जता ही पर्याप्त है। वासुदेव और कौशलेश को प्रजा भगवान मान कर पूज सकती है तो मुझे क्यों नहीं! वे भी शासक थे, मैं भी शासक हूँ। मैं किसी से कम हूँ क्या!

चीनी अतिक्रमण

एक दूसरे को आरोपित कर स्वयं को राष्ट्रवादी और भारत प्रेमी बताने वाली सरकार भी झूठ बोलती रही और चीन भारत में आतिक्रमण करता रहा। अरुणांचली नागरिक दुःखी हैं, जितना अतिक्रमण से हैं उससे भी अधिक सरकार के उस झूठ से हैं जो प्रचार करता है कि वहाँ कोई चीनी अतिक्रमण नहीं हुआ है। सेवन सिस्टर्स वाले हमारी तरह मिथ्याभाषी नहीं होते। सीमावर्ती गांवों के लोग चीनी सैनिकों के सामने जाकर उनका विरोध कर रहे हैं, स्त्रियाँ उनके सामने जाकर चीख-चीख कर रो रही हैं कि सैनिक वापस चले जायें, वहाँ के नागरिक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि भारत चीनी अतिक्रमण के विरुद्ध कुछ करे। वे गूगल सेटेलाईट मैप से अतिक्रमित स्थानों के चित्र भेज रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि शेष भारत के लोग, अरूणाचल और भारत सरकार भी गूगल मैप देखे। 

मैकमोहन रेखा लाँघकर ताक्सिन और उसके आसपास के स्थानों पर चीनी सेना ने अपनी रणनीणिक अधोसंरचनाओं का निर्माण कर लिया है जिसमें टनल और लंबी सड़कें भी सम्मिलित हैं जिससे अब गाँव वाले उन चारागाहों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय आदिवासी अपने स्तर पर मुखर होते रहे जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। उन्हें लगने लगा है कि वे अधिक समय तक भारतवासी नहीं रह पायेंगे, अरुणाचल प्रदेश भी तिब्बत की तरह ड्रैगन के मुँह में जाने वाला है। वे चीनी नहीं बनना चाहते, भारतीय ही बने रहना चाहते हैं। अरुणाचली युवक उग्र नहीं होते, प्रकृति से वे सौम्य और शांत होते हैं। पर कब तक?

ढीठ सरकार नहीं सुनती तो अब वे स्वयं निकल रहे हैं...अपना भारत बचाने के लिए। "ताक्सिन चलो, भारत बचाओ अभियान" के स्वर गूँजने लगे हैं। पूरा भारत इस अभियान के समर्थन में है। सेवन सिस्टर्स के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। वहाँ हमारी ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरें हैं। 

देश रहे या भाड़ में जाय, सरकार में बैठे अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं का क्या बिगड़ेगा! उन्हें चिंता क्यों होगी, पर हमें तो है।

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