वह खड़ा था
अकड़ता हुआ
अड़ा था
हर किसी की राह में
फिर एक दिन पसर गया
भरभराकर ढह गया
तुमने कहा
भूस्खलन हुआ
हमने कहा
अहंकार का अंत हुआ
सुना तुमने!
वर्जित है
अति
सर्वत्र ।
वह खड़ा था
अकड़ता हुआ
अड़ा था
हर किसी की राह में
फिर एक दिन पसर गया
भरभराकर ढह गया
तुमने कहा
भूस्खलन हुआ
हमने कहा
अहंकार का अंत हुआ
सुना तुमने!
वर्जित है
अति
सर्वत्र ।
समाज ने समाज का शोषण किया इसलिए समाज में असमानता है, -यह तुमने कहा, कहते ही रहे, जिससे कुछ पीढ़ियों के बाद समाज में तुम्हारा कथन ही स्थापित हो गया।
यह पूरी तरह सच नहीं था, समाज का एक वर्ग अपराधबोध से भर गया, दूसरा वर्ग प्रतिशोध के लिए उग्र हो उठा। तुम यही चाहते थे -समाज में ध्रुवीकरण, जिसे तुमने उत्पन्न किया, प्रोत्साहित किया और संरक्षित भी किया।
सामाजिक सत्य यह है कि सत्ता के तत्व अव्यवस्था की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होते हैं, यही स्वाभाविक है । जब अव्यवस्था होती है तभी लोग किसी सुशासन की अपेक्षा करते हैं। महान सम्राट लोक की इसी अपेक्षा को पूरा करने के प्रयास करते रहे हैं। किंतु यह सत्ता और शासनतंत्र की आदिम स्थिति है। बाद में तो राजपुरुषों और समर्थों द्वारा भय और कुव्यवस्था को ही सत्ता का आधार बनाया जाने लगा। हाँ! सच यही है कि शोषण और अत्याचार का भय दिखाकर सत्ता प्राप्त किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सत्ता प्राप्त होते ही सत्ताधीश जो पहला काम करते हैं वह होता है शोषण और अत्याचार के नये-नये प्रतिमान स्थापित करना। सुशासन का स्वप्न देखने वाली भीड़ को मिलता है कुशासन।
अपने पूर्ववर्तियों की तरह तुमने भी कभी पूरा न किये जाने वाला समानता का आश्वासन दिया और भीड़ को लूटने में तल्लीन हो गये। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में शासन का यही पक्ष अब स्थापित हो चला है जिसका विराट और सर्वाधिक क्रूर स्वरूप है "नयी विश्वव्यवस्था"।
तुम जिस समानता की बात करते हो वह शुद्ध छलावा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगले लाखों वर्षों में भी तुम्हारी परिभाषाजन्य "समानता" फलीभूत होने वाली नहीं। दुर्भाग्य से भीड़ को स्वप्न में डूबना अच्छा लगता है, उसकी यही दुर्बलता तुम्हारा पथ सरल करती है।
तुम प्रतिवाद करोगे कि क्यों नहीं हो सकती समानता! तुम मुझे अराजकतत्व और उपद्रवी कहकर दण्डित करने के सारे उपाय करोगे। तुम ऐसा कर सकते हो, फिर भी सामाजिक समानता नहीं ला सकते, कम से कम वैज्ञानिक तो यही कहते हैं।
हाँ! तुम वैज्ञानिक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद की बात करते हो न! किंतु सच यह है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद भी समानता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि स्वयं प्रकृति ही इसे स्वीकार नहीं करती। तुमने भीड़ से भौतिकी का यह सच सदैव ऱछिपाया कि ब्रह्मांड में बाहर से जो समरूपता दिखायी देती है वह वस्तुतः आभासी है, उसके भीतर प्रतिकूलताजन्य अ-समरूपता ही होती है। सृष्टि के सारे विधान और सूत्र प्रतिकूलताजन्य उस अ-समरूपता के ही परिणाम होते हैं। अधिक दूर मत जाइये, अपने भौतिक शरीर की रचना और क्रियात्मकता को ही लीजिए, क्या वहाँ समरूपता (Symmetry) है! क्या एक ही माता-पिता के सभी बच्चों के व्यवहार और क्षमताओं में समरूपता होती है!
यह जो तुम अपने चारो ओर विविधता देखते हो, क्या समानता होने पर वह संभव है! क्या आरोह-अवरोह के बिना किसी संगीत की कल्पना की जा सकती है!
मुझे समानताविरोधी समझने की भूल मत कर बैठना। यह तो प्रकृति है जिसके तंत्र में कहीं भी समानता नहीं है। प्रकृति समानता नहीं, संतुलन की अपेक्षा करती है। संपूर्ण सृष्टि का आधार ही संतुलन पर अवलंबित है, समानता पर नहीं।
संतुलन एक गतिशील व्यवस्था है, जो तुम करना ही नहीं चाहते। तुम तो भीड़ को सपनों में खो जाना सिखाते हो, ताकि उसके श्रम पर डाका डालते रहने में तुम्हें सुविधा हो। तुम्हारे विकास के सारे प्रादर्श छोटी रेखा को बढ़ाने में नहीं, प्रत्युत बड़ी रेखा को क्षतिग्रस्त कर छोटी करने के विनाशकारी सिद्धांत पर आधारित हैं। तुम दोनों रेखाओं के विनाश के कुचक्र कर रहे हो, छोटी को कुंठित कर, और बड़ी को लुंठित कर। यह उन शक्तियों के दुरूपयोग का बलात्कार है जो भीड़ ने तुम्हें प्रदान की हैं। सावधान! प्रकृति का धर्म है संतुलन, जो हो कर रहेगा, तुम्हारे अवसान के साथ।
वे बनाते हैं
जातियाँ
कोई ऊँची, कोई नीची
कोई बहुत नीची, कोई सबसे नीची
फिर करते हैं प्रोत्साहित
कि बहे
सुगंधित समीर
"नीची" से "ऊँची"
और "ऊँची" से "नीची"
जातियों के बीच
करते हुये नृत्य
जैसे बलिया की
लहरिया वाली नचनिया
या बनारस की
बलखाती बाई जी ।
यह एक
बहुत राजप्रिय खेल है
जिसमें हैं
बादशाह, बेगम, गुलाम
और एक भीड़
संख्याओं की
एक से दस तक
पर आवश्यक नहीं
कि सर्वशक्तिमान हो बादशाह,
या बेगम ही
यह तो हो सकता है
कोई गुलाम भी
या हुकुम की दुग्गी भी।
हम सब हैं
उपकरण
उनके हर खेला के
हम सब हैं
पक्षविहीन
पंछी बस नाम के।
इस बार तुरुप का पत्ता
डाल कर उबाल दिया गया है
चाय की गंदी गंजी में
और फिर
हर पत्ता भी तो नहीं होता
चाय का पत्ता
फिर भी
पी तो रहे ही हैं
हम भी, तुम भी
और सरकार के सचिव भी ।
एक खेला और भी है
वे खोदते हैं
खाइयाँ
गहरी, बहुत गहरी
कुछ इस तरह
कि बन जाते हैं पर्वत
ठीक खाई के पार्श्व मेंं
इतने ऊँचे
कि हो जाते हैं वे
दुर्गम
और अलंघ्य
कोई नहीं जा सकता
इधर से उधर
और उधर से इधर,
फिर प्रारंभ होती हैं
योजनाएँ
स्वीकृत होती हैं धनराशियाँ
जिससे कि सुगम हो आवागमन
इधर से उधर
और उधर से इधर
किये बिना समतल
खाइयाँ और पर्वत
वे इसे ही कहते हैं
समानता, सामंजस्य,
लोकहितकारी योजना,
विकास...
और भी बहुत कुछ।
और हाँ!
भोजन में तेल कुछ कम कर देना
जिससे बचा सको
कुछ तेल
जलाने एक दिया
मेरे जन्मदिन पर।
अंधभक्ति में नीरक्षीर विवेक का कोई स्थान नहीं होता, एक धारणा होती है, जिसके लिए हठ होता है, और यह सब सर्वोपरि माना जाता है।
वैचारिक परिमार्जन होता है पर हर किसी में हो, यह आवश्यक नहीं। यह संस्कारों और सत्यनिष्ठा पर निर्भर करता है। मैं संघसाहित्य से प्रभावित रहा इसीलिए संघियों की कई अक्षम्य दुर्बलताओं के बाद भी संघ से जुड़ा रहा पर अंततः एक घटना के कारण संघ को सदा के लिए नमस्कार कर लिया। यही स्थिति भाजपा के संबंध में भी रही। अब ग्लानि हो रही है कि जीवन के सत्तरवें दशक तक भाजपा का भक्त क्यों बना रहा! यदि आप स्वाभिमानी, और सच्चे सनातनी हैं तो सदा चिंतनशील रहेंगे और यही वह तत्व है जो आपको हर विकृत व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति के लिए प्रोत्साहित करेगा। आज संघ और भाजपा के वर्तमान स्वरूपों में इन दोनों ही तत्वों का अकाल पड़ गया है।
कुछ एकांगी सोच के लोग उत्तेजित हो रहे हैं, मोदी नहीं तो और कौन? क्या राहुल को बना दें प्रधानमंत्री! देश को हजारों साल बाद मिला है कोहनूर, इसे खो दिया तो हिंदुत्व की पहचान तक मिट जाएगी।
श्रीराम और श्रीकृष्ण के बाद भी भारत रहा, आज भी है, आगे भी रहेगा। मोदी भले ही नानबायोलाॅजिकल और विष्णु के अवतार हों पर वह अमर नहीं हैं। एक दिन सबकी तरह उन्हें भी मरना है, तब क्या भारत समाप्त हो जाएगा?
अंधभक्तों के कुतर्क नितांत मूर्खता के परिचायक हैं। यह न तो राष्ट्रभक्ति है और न सनातनभक्ति । इस सबके विरुद्ध स्वर तो उठने ही चाहिए।
प्रतिकूल स्थितियों में कालनेमि छिप जाते हैं, मरते नहीं। यही प्रवृत्ति माइक्रोब्स की भी होती है। हम सदा माइक्रोब्स से घिरे रहते हैं। इनकी सही पहचान या इन्हें पहचानने की भूल ही हमारा भविष्य तय करती है।
भाजपा अपने जन्म से ही श्रापित है, जब सत्ता के लिए जनसंघ को नेपथ्य में धकेलकर कांग्रेसीकरण के सिद्धांत के साथ कुछ चालाक लोगों ने हिंदुओं पर मोहिनी डालने की कमान सँभाली थी। हिंदूराष्ट्र का सपना दिखाकर भाजपा ने हिंदुओं के साथ विश्वासघात का नया कीर्तिमान स्थापित करने में सफलता पाई है। देश के बुद्धिजीवी भी भाजपा के भँवरजाल में फँसते गये और अपने सर्वनाश को आमंत्रित करते रहे। पर अब भलीभाँति घायल होने के बाद हिंदुओं का नीरक्षीर विवेक जाग्रत हो गया है और भाजपा एवं कांग्रेस मुक्त भारत का रुझान स्पष्ट होने लगा है।
स्मरण कीजिए, आपातकाल के बाद चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध जो भी खड़ा हुआ वही जीत गया। तब सुपात्र और कुपात्र का भेद समाप्त हो गया था। माना कि वह विरोध और घृणा के चरम का परिणाम था पर उसका परिणाम भी ठीक अगले चुनाव में दिखाई पड़ गया। इंदिरा ने वापस सत्ता सँभाली। अब वैसा ही इतिहास किंचित और परिशोधन के साथ दोहराए जाने के लिए तैयार है। न कांग्रेस, न भाजपा, इस बार नया प्रयोग भारतीय मतदाता की परिपक्वता का परिचय देने की दिशा में प्रवृत्त हो चुका है जो नया विकल्प बनेगा।
जय हिंदूराष्ट्र !