रविवार, 1 मार्च 2026

"समझ" और "विश्वयुद्ध"

संघ और भागवत को समझने के लिए ऐसा कुछ भी कठिन नहीं है जैसा कि वे कहते हैं। हाँ, मोदी को समझना अवश्य सरल नहीं, कम से कम मेरे लिए तो नहीं। हिंदू अहित के मूल्य पर मोहनदास की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के समर्थक रहे मोदी ने कल कहा कि वे ईरान का समर्थन नहीं करते। "कट्टरवाद को आर्थिक सहायता देने वाले किसी भी देश को समर्थन देने का प्रश्न ही नहीं उठता।"


मोतीहारी वाले मिसिर जी कहते हैं -
"मोदी बीच-बीच में एक ऐसी चमक छोड़ दिया करते हैं जिससे उनके विरोधी भी चमत्कृत हो जाया करते हैं।"

मोदी आगे बढ़ते हैं फिर पीछे हटते हैं, विवाद उत्पन्न करते हैं फिर उसका  समाधान करते दिखाई देते हैं, जातिवाद की आलोचना करते हैं फिर अपने कट्टर समर्थक सवर्णों पर निर्मम आक्रमण भी करते हैं, राष्ट्रीय एकता की बात करते-करते विभाजन और विघटन के बीज बो देते हैं, 'न खायेंगे न खाने देंगे' की शपथ लेते हैं फिर अपने कट्टर विरोधियों को उनके अपराधों और भ्रष्टाचार के लिए बढ़ावा भी देते हैं, राजनीतिक शुचिता की बात करते हैं फिर अपनी ही पार्टी के अच्छे और समर्पित नेताओं को उठाकर नेपथ्य में फेक देते हैं, विपक्ष के ठुकराये हुये नेताओं का स्वागत करते हैं और दुनिया भर के देशों से सर्वोच्च पुरस्कार बटोर लाते हैं, प्रत्यक्षतः ईरान के साथ नहीं हैं पर संकट के समय ईरान को चावल और दवाइयाँ भेज देते हैं।

एक साथ नौ देशों पर सीधा आक्रमण करने वाले ईरान का धार्मिक नेता ख़ामेनेई मारा जा चुका है। युद्ध को लेकर ब्रिटेन तो अपने विरोधी अमेरिका के साथ आ गया पर फ्रांस ने स्वयं को इस युद्ध से अलग रहने का वक्तव्य दे दिया है। लखनऊ और श्रीनगर में शिया संप्रदाय के लोग ईरान के समर्थन में प्रदर्शन पर उतर आये हैं जबकि पाकिस्तान के लोगों ने कराची और इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी है। उधर पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों के देश जाॅर्डन पर भी ईरान ने आक्रमण कर दिया है। क्या सचमुच इस्लामिक विश्व की अवधारणा को ग्रहण लग चुका है!

तकनीकी दृष्टि से मध्य एशिया में विश्वयुद्ध प्रारंभ हो चुका है। धन-बल की  अनियंत्रित हुयी शक्ति में हो रहा विस्फोट सब कुछ शांत करने की दिशा में बढ़ता जा रहा है। जो हो रहा है वह अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। शक्तियों का संतुलन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इस युद्ध में बदलते वैश्विक समीकरणों का लाभ भारत को भी मिलने जा रहा है, जबकि पाकिस्तान की स्थिति "न घर के न घाट के" वाली होने जा रही है।

सेक्युलर बाम्हन विरुद्ध ब्राह्मण

ब्राह्मण कोई जाति नहीं, एक अर्जित स्थिति है जिसे बनाये रखने के लिए निरंतर कर्मयोग की आवश्यकता होती है, अन्यथा "अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा" नियमों की तरह अनिवार्यअनुबंध का उल्लंघन होते ही कारण बताओ पत्र से लेकर सेवामुक्ति तक कुछ भी हो सकता है। कर्मयोग की निरंतरता एक अट (अनुबंध) है जिसका क्षरण होते ही पदच्युति अनिवार्य है। इस दृष्टि से कोई व्यक्ति सदा ब्राह्मण नहीं रह सकता। दुर्भाग्य से ब्राह्मणोचित आचरण में निरंतर परिमार्जन के अभाव में हर ब्राह्मण उपाधिधारी व्यक्ति ब्राह्मण हो ही नहीं सकता।

राजनीतिक क्षेत्र में तीव्रता से परिवर्तित हो रही स्थितियों में "ब्राह्मण" की तरह ही "नेता" को भी नये सिरे से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।
जाति और धर्म से परे "नेता" ने मनुष्य कुल की एक स्वतंत्र प्रजाति के रूप में स्वयं को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। यह पारंपरिक पहचान से पृथक है जिसकी निष्ठा न तो समाज के प्रति होती है और न देश, मानवीय मूल्य, नैसर्गिक सिद्धांत, न्याय या किसी भी शास्त्रसम्मत विधि-विधान के प्रति। यह एक ऐसी प्रजाति है जिससे भयभीत रहने वाले विद्वानों और वैज्ञानिकों को तो छोड़िये, ऋषि, महर्षि, देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि सभी प्राणी "नेता" के प्रत्यक्ष होते ही उसे झुककर "पायलागन" करते हैं पर उसके जाते ही गालियों की ऐसी वर्षा करते हैं मानो मुनसियारी में बादल फट गया हो।

यूजीसी रेगुलेशन के साथ सवर्ण विरोधी विभिन्न हुंकारों और नये आदेश के संदर्भ में एक जिज्ञासा...
पहले आदेश पढ़ लें -
"हर संस्था श्रेष्ठता को अपना संस्कार बनाये।" -मोदी

...और अब जिज्ञासा -
"श्रेष्ठता का अवमूल्यन और निकृष्टता का मूल्यांकन ही जब जातीय अधिकार का विधान बना दिया जाय तब "संस्कार" जैसे तत्व की आवश्यकता और प्रासंगिकता को किस दृष्टि से समझा जाना चाहिए ?"

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ए.आई. और आई.टी.

कृत्रिम बौद्धिकता ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात कर दिया है। कुछ लोग भयभीत हैं कि कृत्रिम बौद्धिकता हमारी स्वाभाविक नैतिक चेतना को कुंठित कर मस्तिष्क की प्राकृतिक बौद्धिकता को निष्क्रिय कर सकती है। हम यांत्रिकीय नियंत्रण के दास बनकर रह जायेंगे जो अंततः इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा। जबकि कुछ लोग इसे समय की आवश्यकता मान कर इसलिए भी उत्साहित हैं क्योंकि एआई के हस्तक्षेप से सूचना प्रौद्योगिकी और भी सरल एवं तीव्र हो जायेगी, यांत्रिककार्य सुगम और लगभग त्रुटिहीन होंगे, युद्ध में लक्ष्यसंधान और प्रहार सटीक होने लगेंगे, शेयरमंडी  में व्यापार के अनुमान सटीक होंगे... । यह सब तो होगा, पर क्या इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा न्यूनतम और सत्ता विस्तार की भूख अनियंत्रित और घातक नहीं हो जायेगी! युद्ध में जय-पराजय की क्षीण संभावनाओं के साथ दोनों ही पक्षों के महाविनाश की आशंकायें प्रबल नहीं हो जायेंगी! शेयरमंडी की गति में एकरूपता नहीं हो जाएगी! खेल प्रतिस्पर्धाओं में रोमांच को पलीता नहीं लग जाएगा! ...!!!

तकनीक जब सर्वसुलभ होती है तो वह विशेषज्ञों के नियंत्रण से निकलकर जनसामान्य के हाथों में पहुँच जाती है, तब मनुष्य और यंत्र के मध्य बनने वाले संबंध प्रायः स्वेच्छाचारिता से परिपूर्ण होते हैं। यंत्र के काम करने की अपनी सुनिश्चित पद्धति होती है जबकि उसके उपयोगकर्ता द्वारा यंत्रों-उपकरणों के परिचालन की अनिश्चित।
कंप्यूटर के साथ हमारे विकृत व्यवहार ने तो एर्गोनाॅमिक्स जैसे एक नये ही विषय को जन्म दे दिया है, पर उसे भी कितने लोग जानते हैं, और जो जानते भी हैं उनमें से कितने उसका पालन कर पाते हैं!
आज हम ऐसे विभिन्न उपकरणों से घिरे हुये हैं जिनके अभाव में जीवन की गति थमती हुयी सी लगने लगती है।
अब हमें एआई के मूड को समझना होगा अन्यथा अच्छे और शुभ परिणाम नहीं मिलेंगे। वहाँ विवेक नहीं होता,  सांख्यिकीय गणनायें होती हैं। गणित वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होता है जबकि सांख्यिकी संभावित परिणामों के साथ चलती है।
आशंका है कि मनुष्य मस्तिष्क की स्वाभाविक गतिविधियाँ भी गंभीररूप से प्रभावित होंगी और तंत्रिकीय शिथिलता अंत में निष्क्रियता की स्थिति को प्राप्त हो सकती है।
एआई के आगमन से कयी उद्योगों में उथल-पुथल की आशंकायें निर्मूल नहीं हैं। जब चलचित्र महीनों के स्थान पर मिनटों में बनने लगेंगे तब क्या रेडियो और टेलिग्राम की तरह चलचित्र का संसार भी सिमट नहीं जायेगा!
चमत्कारी कृत्रिम बौद्धिकता का मूल "कार्यनिष्पादनक्रम समूह का यांत्रिकीय निर्देशन" (अल्गोरिदम) है। आशंका है कि यह तकनीकी सक्रियता का वह चरम है जो सभ्यता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होने वाली है।

डीएनए प्रेम की बायोप्सी

अथ सजातीय-विजातीय वास कथा।

महर्षि पुनर्वसु आत्रेय उवाच-
"लोकोऽयं पुरुष संमितः"
शरीर में प्रविष्ट किसी भी विजातीय द्रव्य (Foreign body) को शरीर में तब तक रहने का अधिकार नहीं होता जब तक कि वह पूरी तरह सजातीय (Assimilate) न हो जाय। ग्रहण किए अन्न-जल को शरीरकोशिकाओं का कोई न कोई घटक बनना ही होता है। यह शरीर का अपरिहार्य प्रकृतिधर्म है। विजातीय से सजातीय में रूपांतरित होने की इस प्रक्रिया को आप पाचन के नाम से जानते हैं। जो पच गया वह शरीर का घटक बन कर तुल्य रूप-गुण-धर्म वाला (Assimilated) हो गया, जो नहीं पच सका वह तुल्य रूप-गुण-धर्म वाला न होने के कारण अपशिष्ट के रूप में शरीर द्वारा बाहर फेक दिया जाता है। शरीर का कोई भी अपवर्ज्य द्रव्य अपनी उसी पहचान के साथ वहाँ रहने का हठ नहीं कर सकता और न इसके लिए किसी न्यायालय में जा सकता है, यह नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है। किंतु इसके विपरीत अवैध घुसपैठिये रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों को देश से बाहर निकालने के स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय भारत में उनके रहने के अधिकार को विचारणीय मानता है।
शारीरक्रिया की यही वैज्ञानिक पद्धति
Social-physiology के रूप में समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रयुक्त होती है, जिसे नये संदर्भों में इन्हीं नैसर्गिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से समझना होगा। भारतीय वांग्मय में "पुरुषोऽयं लोकसंमितः" की अवधारणा और "लोकोऽयं पुरुष संमितः" में सैद्धांतिक रूप से कोई अंतर नहीं। यावन्तो हि लोके (मूर्तिमन्तो) भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके। जब पुरुष लोक की तरह होता है तो लोक भी पुरुष की ही तरह होता है। जब आप परमाणु संरचना और मात्राभौतिकी (Quantum physics) के परिप्रेक्ष्य में शारीरक्रिया (Bio-Physiology) की घटनाओं को देखेंगे तो "पुरुषोऽयं लोक संमितः" और "लोकोऽयं पुरुष संमितः" का वैज्ञानिक सत्य समझ में आने लगेगा। हमारा
शरीर किसी भी विजातीय द्रव्य (Foreign body) को स्वीकार नहीं करता और उसे शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया प्रारंभ कर देता है।
विदेशों में रहने वाले सनातनी प्रवासियों और भारत में रहने वाले पारसियों की सफलता का यही रहस्य है। वे जिस भी देश में जाते हैं उसके अनुसार स्वयं को बना लेते हैं, ये उस देश की परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का न केवल वाचिक सम्मान करते हैं अपितु उनका व्यावहारिक आचरण भी अपना लेते हैं।
रोग तभी उत्पन्न होते हैं जब खाया हुआ भोजन पचने के स्थान पर अपनी पृथक सत्ता और पहचान के साथ शरीर में रहने का हठ करता है। विवाद और सामाजिक व्याधियाँ तभी उत्पन्न होती हैं जब कोई प्रवासी अपनी मान्यताओं, जीवनशैली और सांप्रदायिक अवधारणाओं को विदेशी धरती पर जाकर वहाँ के स्थानीय नागरिकों पर थोपने ही नहीं लगता अपितु उन्हें इसके लिए हिंसक क्रियाओं से बाध्य भी करता है। आमाशय में पहुँचा दाल-भात उसी रूप और अपनी उसी पहचान के साथ वहाँ नहीं रह सकता, उसे रूपांतरित होना ही होगा। दाल-भात का जो अंश रूपांतरित नहीं हो सकेगा उसे बाहर जाना ही होगा। यही प्रकृति (Physiological phenomenon) है, इसके प्रतिकूल जो भी घटनायें और स्थितियाँ होती हैं वे सब विकृतियाँ (Pathological states) है जो अंततः व्याधिकारक होती हैं और उपचार न होने पर अनियंत्रित होकर मृत्यु का कारण बनती हैं।
भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर के देशों में फैली विकृतियाँ अपनी पहचान और अस्तित्व को थोपने में लगी हुयी हैं जिनका उपचार हर देश को करना ही होगा। अन्यथा रुग्ण कोशिकाओं का अनियंत्रित विस्तार और बढ़ती संख्या अर्बुद (Carcinomatic growth) बनकर पूरे देश में व्याप्त (metastasize) हो जाएगी और अंत में उसे समाप्त कर देगी। शरीर के निष्प्राण होते ही व्याधि का भी अस्तित्व नहीं रहता।
जिन्हें अपनी विशिष्टपहचान के साथ विश्व पर शासन करने की अदम्य चाहत है उन्हें समझना होगा कि विजातीय बनकर रहने का हठ किसी के लिए भी शुभ नहीं होता। शरीरांत के साथ ही सभी व्याधियों के भी अंत होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
सारांश यह कि भारत में यदि रहना है तो भारत जैसा बनना होगा। भारतीय मूल्यों का सम्मान न कर सको तो कम से कम उनका अपमान तो न ही करो।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

यूजीसी रेगुलेशन :- बम या बुलबुला

संघ और भाजपा के जाल में फँसे मध्य और उत्तर भारतीय दलितों की अपमानजनक, विघटनकारी और हिंसक हुंकार की प्रतिक्रिया ने देश के सभी वर्गों को जहाँ झकझोर कर रख दिया है वहीं सांप्रदायिक शक्तियों को भी अपनी रोटियाँ पकाने का सुअवसर उपलब्ध करवा दिया है। कुछ लोग इसे सवर्णविरोधी षड्यंत्र मान रहे हैं तो कुछ लोग मात्र एक चुनावी चाल भर। यदि यह एक चुनावी रणनीति भर है तो भी लोकतांत्रिक मूल्यों पर क्रूर प्रहार होने के कारण संकटजनक है। समूह विशिष्ट के विरुद्ध ऐसी उन्मूलनकारी कूटनीति संभवतः अन्यत्र किसी देश में नहीं होती होगी। कई तटस्थ विचारक इसे जातीय ध्रुवीकरण का एक धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र मान रहे हैं। ऐसे विचारकों में संघ और भाजपा के समर्थक ही नहीं प्रत्युत दलित वर्ग के भी विवेकशील लोग सम्मिलित हैं जो समावेशी समाज के लिए एक शुभ संकेत है। इस पूरे प्रकरण में रविशंकर प्रसाद, संविद पात्रा, बाँसुरी स्वराज और सुधांशु त्रिवेदी जैसे लोगों का रहस्यमय मौन कई और प्रश्नचिन्ह खड़े करता है।

यूजीसी रेगुलेशन वरदान नहीं अभिश्राप

भारत में आरक्षण का स्वरूप पूरी तरह समाजमनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुये सामाजिक विघटन के नये-नये आयाम स्थापित करने वाला रहा है। यह पूरी तरह विघटनकारी और नैसर्गिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।
दस वर्ष के लिए प्रावधानित आरक्षण का स्वरूप विकृत कर "थोड़ा देकर सब कुछ छीन लेने" के सिद्धांत पर पुनर्गढ़ित कर परोसा जाने लगा है। आरक्षण पाने वाले वर्तमान की क्षुद्र उपलब्धि को ही संपूर्ण निधि समझ बैठे हैं जबकि वास्तव में वे अपने भविष्य का अपना सबकुछ खो रहे हैं। आरक्षण का वर्तमान स्वरुप वह अफीम है जिसे अगले दो सौ सालों तक आप एक वर्ग को खिलाकर समाज को अपंग बनाने का कुचक्र रच रहे हैं।
मोहन भागवत! आप देश को आग में झोंकने का दुस्साहस कर भारत के एक और मोहनदास बन गये हैं । सवर्णों और भारतीय इतिहास पर आपके मनगढ़ंत आरोप ऐतिहासिक तथ्यों से परे और निराधार ही नहीं धूर्ततापूर्ण भी हैं कि-
१. जातियाँ पंडितों ने बनाईं,
२. सवर्ण पिछले दो हजार वर्षों से दलितों  का शोषण और उत्पीड़न करते आ रहे हैं।
इसीलिए आवश्यक होने पर उन्हें अगले दो सौ वर्षों तक आरक्षण दिया जाना चाहिए। यह विचार निंदनीय ही नहीं कुत्सित और वीभत्स भी है।
इस तरह के वैचारिक षड्यंत्र ने भारतीय इतिहास का एक और कलंकित अध्याय लिखना प्रारंभ कर दिया है।
कलियुग में सत्य, धर्म, करुणा और प्रेम जैसी संज्ञायें केवल प्रवचन और छल के लिए ही प्रयुक्त होने लगी हैं, वास्तविकता से इनका कोई संबंध नहीं होता। हिंदुत्व की काल्पनिक बयार से सम्मोहित हम सब उसे पूजनीय मानते रहे जो जोड़ने का छल करके समाज को तोड़ने में लगा रहा है।
जिसे २०० साल तक आरक्षित रखे जाने का प्रस्ताव किया गया है उसे आरक्षण के दो सौ वर्ष और देकर उसे कुछ देने की इच्छा है या उसके पास जो है उसे भी छीन लेने का षड्यंत्र है? प्रकृति का सिद्धांत है, शरीर के जिस भाग का व्यवहार और अभ्यास नहीं किया जाता वह निष्क्रिय हो जाता है। ये कौन चिंतक, विचारक और हिंदुत्व के स्वयंभू मठाधीश हैं जो समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग का बौद्धिक विकास कुंठित करने का षड्यंत्र कर रहे हैं!
सावधान! अजीत भारती जैसे हजारों युवकों की आँखों में धूल नहीं झोंक जा सकती।
विवेक पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। जिस तरह कुछ ब्राह्मण इस कुचक्र के समर्थन में खड़े दिखाई देने लगे हैं उसी तरह कुछ दलित भी इस कुचक्र के विरोध में खड़े होने लगे हैं। सनातन संस्कृति को इस तरह विनष्ट नहीं होने दिया जायेगा। राष्ट्रप्रथम के लिए समर्पित सभी भारतीय एक हैं, उन्हें बाँटने के षड्यंत्र सफल नहीं होने दिये जाएँगे।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

उड़ान

सुदामा

केवल मुट्ठी भर
बैठे
नब्बे प्रतिशत पद पर
निश्चित ही ...अपराधी हैं सब
गाली दो, जूते मारो
कारा में डालो
छूट न पाये कोई सुदामा
मारो काटो देश निकाला दो
यह देश बुद्ध का
बाबा के बंदों का
अब नहीं सहेंगे
सारे पद हम लेंगे
सत्ता भी लेंगे
सारी धरती
सभी कुयें और सारा पानी
हम सब ले लेंगे
छीन के लेंगे
सत्ता के सारे गलियारे
मंदिर से इसरो तक
विप्रों को ना कुछ भी देंगे
सेमीकंडक्टर
एआई
रोबोट
सभी कुछ छीन के लेंगे
लेंगे बेटी भी उनकी
सौगंध भीम की
हम छीन के लेंगे आज़ादी भी।

कुछ कालनेमि भी हुंकारे
भयभीत सुदामा थर-थर काँपे
हे भीमभक्त!
जिस संविधान पर इतना फूले
कुछ पढ़ तो लेते
नेत्र खोल कुछ देख तो लेते
सत्ता में सब भीम के बंदे
ढूँढ सुदामा पटके मारे
भीम रहे फिर भी बेचारे?

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

क्रांति -प्रकृति का आह्वान

"भूत" अंधविश्वास है, "वर्तमान" सत्य है, आने वाला कल मेरा ही बनाया हुआ "भविष्य" होगा।

जहाँ मैं खड़ा हूँ धरती वहीं से प्रारंभ होती है। "इस्लाम से पहले कुछ नहीं था", फिर "बुद्ध से पहले कुछ नहीं था", अब "मूलनिवासी से पहले कुछ नहीं था"। ऊँच-नीच और बलपूर्वक वर्चस्व की यह मौलिक प्रवृत्ति है जो सदा रही है, सदा रहेगी, भले ही अधिक संतुलन के साथ रहे। समाज और सत्ता को इस प्रवृत्ति के अधीन रहने की बाध्यता होती है।

सत्ता और समाज में विभिन्न स्तरों पर बढ़ता असंतुलन आत्मावलोकन की आवश्यकता का संकेत है। हम सब सभी स्तरों पर सब कुछ असंतुलित करने में लगे रहते हैं, प्रकृति उसे संतुलित करने का प्रयास करती रहती है। संतुलन और असंतुलन की यह एक सतत प्रक्रिया है likewise wearing and tearing then again wearing phenomenon in all the living tissues.
जो स्वयं को हिंदू नहीं. प्रकृति पूजक मानते हैं वे भी प्रकृति को कहीं न कहीं असंतुलित ही कर रहे हैं, यह सब पहले भी होता रहा है पर अब यह असंतुलन  कैंसर में रूपांतरित होने लगा है। मूलनिवासी और विदेशी जैसे निराधार विवाद अब विघटन से विभाजन की दिशा में बढ़ चले हैं। जातीय नरसंहार किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, यदि आप सबल हैं तो निर्बल को धरती का एक टुकड़ा दे दीजिए, पहले भी ऐसा हो चुका है। यद्यपि इन विभाजनों के परिणाम कितने सफल रहे हैं यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार की वर्तमान स्थितियों से स्पष्ट है।
यदि अभी भी इस बढ़ते असंतुलन की चिकित्सा न की गयी तो हम सिंधुघाटी सभ्यता के अवसान की पुनरावृत्ति करेंगे।
सत्तायें कभी भी दीर्घकाल तक लोककल्याणकारी नहीं रह पाती अन्यथा न कभी रामराज्य का अंत होता और न विक्रमादित्य की न्यायव्यवस्था का।
जब राजा अपने धर्म और कर्तव्य से विमुख होता है तब प्रजा के दायित्व प्रधान और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। दुर्भाग्य से शताब्दियों की पराधीनता के बाद भी प्रजा अपने दायित्वों को समझ नहीं पा रही है। तब की पराधीनता और आज की स्वतंत्रता में केवल नाम में अंतर है, सत्ताव्यवस्था में सैद्धांतिक समानता वही है। प्रजा यदि अभी भी अपने दायित्वों को स्वीकार करने और निभाने में सक्षम नहीं होती तो प्रकृति ऐसे समाज का अंत कर नवनिर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी।