गुरुवार, 12 मार्च 2026

सर्वनाश

नृत्यरत

सत्ता-नेतृत्व,
निरंकुश
षड्यंत्ररत
कालनेमि गुट
हुंकारित...

"करेगा संशय जो
नेतृत्व की निष्ठा पर
सत्ता की स्वेच्छा पर
होगा सर्वनाश
विरोध के स्वरों का।"

सुनकर हुईं हतप्रभ
देवी सरस्वती जी।
कौन है यह, किसने दिया श्राप!
किसने बना लिया बंदी
चिंतन, मंथन
और वैचारिक प्रक्रिया की
सहज अभिव्यक्ति को!
राजसत्ता
हो गई
सर्वोपरि
सर्वशक्तिमान
और इतनी असहिष्णु!
इतनी निरंकुश!
किसकी है हुंकार
कौन यह होलिका
कौन यह सूर्पनखा
चीख-चीख कर रही
लांछित सत्य को
वांछित असत्य को!

सुनो ऐ कृष्णविवर!
सुनो ऐ भस्मासुर!
शक्तिशाली हो तुम
किंतु नहीं
हो अमर
लिख लिया तुमने
अपनी ही लेखनी से
अपना मृत्युपत्र
सावधान!
अंत
कृष्ण विवरणों का
आ गया है निकट।

मंगलवार, 10 मार्च 2026

आठ मार्च का सूर्यग्रहण

तुम देने लगते हो हमें

भद्दी-भद्दी गालियाँ
जब तुम बंद कर देते हो
भींच कर मेरा मुँह
जब तुम ठूँस देते हो हमें
घसीट कर कारा में
तब समझ जाते हैं लोग
कि तुम्हारे पास
अब नहीं बचे हैं कुतर्क भी
कि सिद्ध कर सको हमें अपराधी।
तुम इसे राष्ट्रवाद कहते हो
लोग इसे असुरवाद कहते हैं।

बहुत बोझिल होता है
अहंकार
ईश्वरत्व और श्रेष्ठता का
उद्धारक और महानता का।
हमने देखा है
अहंकार को
दब कर कुचलते हुये
अपने ही बोझ से,
हम तो फिनिक्स हैं
जल कर भी जी उठेंगे फिर
पर नहीं मिलता अवसर
अहंकारी को पुनः।

मालायें
कितनी भी धारण कर ले रावण
वह साधु नहीं हो जाता
झूठ
कितना भी क्यों न कर ले सिंगार
वह सच नहीं हो पाता
सावधान!
निकट आ गया है
बहुरूपियों का अंत।
यह अघोषित आपातकाल
बहुत भारी पड़ने वाला है तुम्हें।

जिन्हें समझा था दीपस्तंभ
वे चित्र निकले
जिन्हें समझा था स्वर
वे मूक निकले
पर सदा मौन रहने वाला मैं
आज बोल सकता हूँ
भूल गये हो तो बता दूँ
अँधेरों को भी
छँटना ही पड़ता है एक दिन।
रावण!
तुम्हें मरना ही होगा!

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

परिभाषायें

ऋषि कामना करते रहे

सर्वे भवंतु सुखिनः
पर व्याधियाँ होती रहीं, होती रहेंगी,
ऋषि कामना करते रहे
विश्व का कल्याण हो
पर युद्ध होते रहे, होते रहेंगे।
सब कुछ होता रहेगा
ऋषि भी कामना करते रहेंगे
परिभाषायें
कभी सीधी, कभी उलटी
कभी सजाई, कभी छिछियाई
गढ़ी जाती रहेंगी।

परिभाषायें
नये चोले में करती हैं उत्पात
धूर्तता का नया नाम आस्था
उत्पीड़क का नया नाम उत्पीड़ित
शोषक का नया नाम शोषित।

"अपराधी"
हो प्रशंसित, हो सम्मानित
"निष्ठावान"
हो भयभीत, हो अपमानित
कर रहे निर्माण
एक नये युग का।
एक दिन
उठा ले गये कुछ लोग
ऋषिपुत्री होलिका
बनाकर चमार।
होली
अब नहीं मनेगी,
मनाये जाएँगे
केवल भीमपर्व
गायी जायेगी भीमचालीसा
भारत बनेगा भीमलैण्ड
रहेंगे मूलनिवासी
कदाचित् कोई नयी प्रजाति!

बनेगा विधान
कि ब्याही जाएगी
ब्राह्मण दुहिता
मूलनिवासी को
फिर करना होगा पलायन
यूरेशिया में कहीं।

मारे जाने लगे पुजारी
पता नहीं क्यों
पीटे जाने लगे ब्राह्मण
पता नहीं क्यों
जलायी जाने लगी मनुस्ममृति
पता नहीं क्यों!
जाने बिना पुजारी
समझे बिना ब्राह्मण
पढ़े बिना मनुस्ममृति
लिख दिया 'अपराधी'
कहते हुये "न्याय"।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

अधिकार

बन दुर्बल

वह बार-बार
भर हुंकार
छीनता अधिकार।

अधिकार,
तमस में सुषुप्त हो
दीर्घकाल जीने का!
अधिकार,
अनंतकाल आरक्षित हो
शिथिलता में शक्ति का!
विद्रोह किया तुमने
है करना अब तुम्हें ही
संधान भी उत्तर का।

ऋषिवाणी मौन है
आरक्षण के उबाल पर
पता है ऋषियों को
तपाये बिना स्वर्ण
जब प्रमाणित होगा 'शुद्ध'
अबुद्ध घोषित होंगे 'बुद्ध'
होने लगेगा प्रकाश भी अवरुद्ध
कुपथ पर चलेंगे सब
होगा फिर धर्मयुद्ध।

हठ से
तमस
नहीं होता उजास,
रात
नहीं होती भोर,
पक्षीवृंद
नहीं करते कलरव,
कलियाँ
नहीं होतीं कुसुमित,
कुक्कुट भी
बाँग नहीं देते,
शिथिलता
दृढ़ता नहीं होती,
अयोग्यता
योग्यता नहीं होती,
केवल
मिलते हैं अवसर
छीन लेने के
दूसरों के अवसर
होने के सिंहासनारूढ़
प्रवंचना और धूर्तता के।

बौद्ध
जब हठ करता है
बुद्ध
तब मौन रहता है
जानकर भी सब कुछ
कि मान बैठे जिसे तुम
अपना अधिकार
वह तो तमस है।
और तुम
भरे तमस
किये हठ
उलीच रहे कृष्ण मेघ
सूरज के मंडल पर।
भृकुटि तान सूर्य को
घूर रहे कुपित मेघ
मैं दलित, तू दूर हट!
रे! विदेशी दूर हट!

तमस के भय से
आ न रहा पास
कोई उजास
और तुमने मढ़ दिया
फिर एक कलंक
कि अहंकारी है उजास
करता है भेदभाव
मानता है दलितों को
नीच, खल और अछूत।

रविवार, 1 मार्च 2026

"समझ" और "विश्वयुद्ध"

संघ और भागवत को समझने के लिए ऐसा कुछ भी कठिन नहीं है जैसा कि वे कहते हैं। हाँ, मोदी को समझना अवश्य सरल नहीं, कम से कम मेरे लिए तो नहीं। हिंदू अहित के मूल्य पर मोहनदास की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के समर्थक रहे मोदी ने कल कहा कि वे ईरान का समर्थन नहीं करते। "कट्टरवाद को आर्थिक सहायता देने वाले किसी भी देश को समर्थन देने का प्रश्न ही नहीं उठता।"


मोतीहारी वाले मिसिर जी कहते हैं -
"मोदी बीच-बीच में एक ऐसी चमक छोड़ दिया करते हैं जिससे उनके विरोधी भी चमत्कृत हो जाया करते हैं।"

मोदी आगे बढ़ते हैं फिर पीछे हटते हैं, विवाद उत्पन्न करते हैं फिर उसका  समाधान करते दिखाई देते हैं, जातिवाद की आलोचना करते हैं फिर अपने कट्टर समर्थक सवर्णों पर निर्मम आक्रमण भी करते हैं, राष्ट्रीय एकता की बात करते-करते विभाजन और विघटन के बीज बो देते हैं, 'न खायेंगे न खाने देंगे' की शपथ लेते हैं फिर अपने कट्टर विरोधियों को उनके अपराधों और भ्रष्टाचार के लिए बढ़ावा भी देते हैं, राजनीतिक शुचिता की बात करते हैं फिर अपनी ही पार्टी के अच्छे और समर्पित नेताओं को उठाकर नेपथ्य में फेक देते हैं, विपक्ष के ठुकराये हुये नेताओं का स्वागत करते हैं और दुनिया भर के देशों से सर्वोच्च पुरस्कार बटोर लाते हैं, प्रत्यक्षतः ईरान के साथ नहीं हैं पर संकट के समय ईरान को चावल और दवाइयाँ भेज देते हैं।

एक साथ नौ देशों पर सीधा आक्रमण करने वाले ईरान का धार्मिक नेता ख़ामेनेई मारा जा चुका है। युद्ध को लेकर ब्रिटेन तो अपने विरोधी अमेरिका के साथ आ गया पर फ्रांस ने स्वयं को इस युद्ध से अलग रहने का वक्तव्य दे दिया है। लखनऊ और श्रीनगर में शिया संप्रदाय के लोग ईरान के समर्थन में प्रदर्शन पर उतर आये हैं जबकि पाकिस्तान के लोगों ने कराची और इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी है। उधर पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों के देश जाॅर्डन पर भी ईरान ने आक्रमण कर दिया है। क्या सचमुच इस्लामिक विश्व की अवधारणा को ग्रहण लग चुका है!

तकनीकी दृष्टि से मध्य एशिया में विश्वयुद्ध प्रारंभ हो चुका है। धन-बल की  अनियंत्रित हुयी शक्ति में हो रहा विस्फोट सब कुछ शांत करने की दिशा में बढ़ता जा रहा है। जो हो रहा है वह अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। शक्तियों का संतुलन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इस युद्ध में बदलते वैश्विक समीकरणों का लाभ भारत को भी मिलने जा रहा है, जबकि पाकिस्तान की स्थिति "न घर के न घाट के" वाली होने जा रही है।

सेक्युलर बाम्हन विरुद्ध ब्राह्मण

ब्राह्मण कोई जाति नहीं, एक अर्जित स्थिति है जिसे बनाये रखने के लिए निरंतर कर्मयोग की आवश्यकता होती है, अन्यथा "अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा" नियमों की तरह अनिवार्यअनुबंध का उल्लंघन होते ही कारण बताओ पत्र से लेकर सेवामुक्ति तक कुछ भी हो सकता है। कर्मयोग की निरंतरता एक अट (अनुबंध) है जिसका क्षरण होते ही पदच्युति अनिवार्य है। इस दृष्टि से कोई व्यक्ति सदा ब्राह्मण नहीं रह सकता। दुर्भाग्य से ब्राह्मणोचित आचरण में निरंतर परिमार्जन के अभाव में हर ब्राह्मण उपाधिधारी व्यक्ति ब्राह्मण हो ही नहीं सकता।

राजनीतिक क्षेत्र में तीव्रता से परिवर्तित हो रही स्थितियों में "ब्राह्मण" की तरह ही "नेता" को भी नये सिरे से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।
जाति और धर्म से परे "नेता" ने मनुष्य कुल की एक स्वतंत्र प्रजाति के रूप में स्वयं को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। यह पारंपरिक पहचान से पृथक है जिसकी निष्ठा न तो समाज के प्रति होती है और न देश, मानवीय मूल्य, नैसर्गिक सिद्धांत, न्याय या किसी भी शास्त्रसम्मत विधि-विधान के प्रति। यह एक ऐसी प्रजाति है जिससे भयभीत रहने वाले विद्वानों और वैज्ञानिकों को तो छोड़िये, ऋषि, महर्षि, देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि सभी प्राणी "नेता" के प्रत्यक्ष होते ही उसे झुककर "पायलागन" करते हैं पर उसके जाते ही गालियों की ऐसी वर्षा करते हैं मानो मुनसियारी में बादल फट गया हो।

यूजीसी रेगुलेशन के साथ सवर्ण विरोधी विभिन्न हुंकारों और नये आदेश के संदर्भ में एक जिज्ञासा...
पहले आदेश पढ़ लें -
"हर संस्था श्रेष्ठता को अपना संस्कार बनाये।" -मोदी

...और अब जिज्ञासा -
"श्रेष्ठता का अवमूल्यन और निकृष्टता का मूल्यांकन ही जब जातीय अधिकार का विधान बना दिया जाय तब "संस्कार" जैसे तत्व की आवश्यकता और प्रासंगिकता को किस दृष्टि से समझा जाना चाहिए ?"

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ए.आई. और आई.टी.

कृत्रिम बौद्धिकता ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात कर दिया है। कुछ लोग भयभीत हैं कि कृत्रिम बौद्धिकता हमारी स्वाभाविक नैतिक चेतना को कुंठित कर मस्तिष्क की प्राकृतिक बौद्धिकता को निष्क्रिय कर सकती है। हम यांत्रिकीय नियंत्रण के दास बनकर रह जायेंगे जो अंततः इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा। जबकि कुछ लोग इसे समय की आवश्यकता मान कर इसलिए भी उत्साहित हैं क्योंकि एआई के हस्तक्षेप से सूचना प्रौद्योगिकी और भी सरल एवं तीव्र हो जायेगी, यांत्रिककार्य सुगम और लगभग त्रुटिहीन होंगे, युद्ध में लक्ष्यसंधान और प्रहार सटीक होने लगेंगे, शेयरमंडी  में व्यापार के अनुमान सटीक होंगे... । यह सब तो होगा, पर क्या इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा न्यूनतम और सत्ता विस्तार की भूख अनियंत्रित और घातक नहीं हो जायेगी! युद्ध में जय-पराजय की क्षीण संभावनाओं के साथ दोनों ही पक्षों के महाविनाश की आशंकायें प्रबल नहीं हो जायेंगी! शेयरमंडी की गति में एकरूपता नहीं हो जाएगी! खेल प्रतिस्पर्धाओं में रोमांच को पलीता नहीं लग जाएगा! ...!!!

तकनीक जब सर्वसुलभ होती है तो वह विशेषज्ञों के नियंत्रण से निकलकर जनसामान्य के हाथों में पहुँच जाती है, तब मनुष्य और यंत्र के मध्य बनने वाले संबंध प्रायः स्वेच्छाचारिता से परिपूर्ण होते हैं। यंत्र के काम करने की अपनी सुनिश्चित पद्धति होती है जबकि उसके उपयोगकर्ता द्वारा यंत्रों-उपकरणों के परिचालन की अनिश्चित।
कंप्यूटर के साथ हमारे विकृत व्यवहार ने तो एर्गोनाॅमिक्स जैसे एक नये ही विषय को जन्म दे दिया है, पर उसे भी कितने लोग जानते हैं, और जो जानते भी हैं उनमें से कितने उसका पालन कर पाते हैं!
आज हम ऐसे विभिन्न उपकरणों से घिरे हुये हैं जिनके अभाव में जीवन की गति थमती हुयी सी लगने लगती है।
अब हमें एआई के मूड को समझना होगा अन्यथा अच्छे और शुभ परिणाम नहीं मिलेंगे। वहाँ विवेक नहीं होता,  सांख्यिकीय गणनायें होती हैं। गणित वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होता है जबकि सांख्यिकी संभावित परिणामों के साथ चलती है।
आशंका है कि मनुष्य मस्तिष्क की स्वाभाविक गतिविधियाँ भी गंभीररूप से प्रभावित होंगी और तंत्रिकीय शिथिलता अंत में निष्क्रियता की स्थिति को प्राप्त हो सकती है।
एआई के आगमन से कयी उद्योगों में उथल-पुथल की आशंकायें निर्मूल नहीं हैं। जब चलचित्र महीनों के स्थान पर मिनटों में बनने लगेंगे तब क्या रेडियो और टेलिग्राम की तरह चलचित्र का संसार भी सिमट नहीं जायेगा!
चमत्कारी कृत्रिम बौद्धिकता का मूल "कार्यनिष्पादनक्रम समूह का यांत्रिकीय निर्देशन" (अल्गोरिदम) है। आशंका है कि यह तकनीकी सक्रियता का वह चरम है जो सभ्यता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होने वाली है।