शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

पहचान


यहूदी देश... इस्लामिक देश... ईसाई देश...
कहाँ है हिंदू देश ?
इज़्रेल अत्याधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों और उपलब्धियों वाला देश है किंतु यह भी पर्याप्त नहीं लगा उसे । आख़िर अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों की पहचान के अतिरिक्त उसे एक और पहचान... धार्मिक पहचान की ज़रूरत क्यों पड़ी ? और क्यों उसे अपनी राष्ट्रीय राजधानी तेल अबीब से यरूशलम ले जाने का निर्णय करना पड़ा जिसका तुरंत ही अमेरिका द्वारा समर्थन भी कर दिया गया ?
हम इस विषय पर चिंतन करेंगे किंतु इससे पहले इज़्रेल की उस आंतरिक स्थिति पर भी चर्चा करना आवश्यक है जिसमें 47 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों ने संसद में इसका विरोध किया । यूँ 53 प्रतिशत बहुमत के आधार पर ज़्यूस नेशन बिल को गणितीय मज़बूती के साथ पारित कर दिया गया । यह अंतर बहुत अधिक नहीं है, दूसरे 47 प्रतिशत मतों को यूँ ही कूड़ेदान में नहीं फेका जा सकता । ज़ाहिर है कि आने वाले दिनों में इज़्रेल की 20 प्रतिशत अरबी मुस्लिम जनता अपनी धार्मिक और भाषायी पहचान को स्थापित करने के लिए संघर्ष करेगी । यहाँ यह स्पष्ट करना प्रासंगिक है कि अरबी अब इज़्रेल की आधिकारिक भाषा नहीं रही, इसका स्थान अब हिब्रू ने ले लिया है । वर्षों से अपनी धार्मिक और भाषायी पहचान स्थापित करने के संघर्ष में एक ओर जहाँ यहूदियों को सफलता मिली है वहीं अरबों को उनकी धार्मिक और भाषायी पहचान के खोने का दुःख उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करेगा ।
किंतु वास्तव में मामला न तो धर्म का है और न भाषा का । असली मामला तो है प्राकृतिक और औद्योगिक संसाधनों पर अपने-अपने वर्चस्व की सियासत का । चारों ओर अरब देशों से घिरे इज़्रेल को शह देने वाले अमेरिका के अपने स्वार्थ हैं जो हमेशा की तरह किसी भी मामले में घी डालने का काम करते हैं ।
हमें भारत के संदर्भ में इस पूरी घटना को देखने की आवश्यकता है । भारत में मुसलमानों के लिये उनके धर्मगुरुओं द्वारा शरीया कानून की माँग करना एक देश के भीतर दो तरह की व्यवस्थाओं की स्थापना की माँग करना है जिसके दूरगामी परिणाम कैसे हो सकते हैं इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । यह सब तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश के भीतर आइसिस और पाकिस्तान के झण्डों को लहराने की बढ़ती घटनाओं के साथ तिरंगे को जलाने और भारत के हजार टुकड़े करने की कसमें खाए जाने की घटनायें अनियंत्रित होती जा रही हों, जब कश्मीर में दशकों से दहकती आग रोज-ब-रोज भड़कती जा रही हो, जब पूर्वांचल के अल्पसंख्यक हिंदुओं को बहुसंख्यक और बहुसंख्यक ज़मात के लोगों को अल्पसंख्यक माने जाने के अज़ीब गणित को सुधारने की चिंता किसी को न होती हो... ।
अंत में हमेशा की तरह यह फिर कहना चाहूँगा कि वास्तव में धर्म का दृष्टव्य और प्रभावी स्वरूप सियासत में ही देखने को मिलता है जिसका एकमात्र उद्देश्य लोगों में असुरक्षा का भय उत्पन्न कर अपनी हुक़ूमत स्थापित करना रहा है ।         

बुधवार, 11 जुलाई 2018

पर्यटन और पर्यावरण



प से पर्यटन, प से पर्यावरण । एक से मोहब्बत, दूसरे से बेहद नफ़रत । हम भारतीय इसका पूरा पालन करते हैं... कैसे ? देखिये एक शब्द चित्र ...

स्थान - मुंशियारी का खलिया टॉप, समय अपरान्ह चार बजे के आसपास । पर्यटन के बुरी तरह दीवाने भारतीयों के छोटे-बड़े कई समूह खलिया टॉप पर विचरण करते हुये, प्राकृतिक सौंदर्य को पी लेने की काव्यात्मक अनुभूति से सर्वथा शून्य चीखते हुये, बड़े गर्व से मित्रों को दिखाने के लिये फ़ोटो खीचते हुये, चिप्स और कुरकुरे चबाते हुये .....बेहद व्यस्तता का आलम...
युवक ने पाउच में से चिप्स का अंतिम टुकड़ा निकालकर लड़की के मुँह में ट्रांसफर कर दिया, खाली पाउच वहीं फेक दिया । लड़की ने अपने बैग में से कोक की दो केन निकालीं, एक ख़ुद अपने मुँह से चिपकायी, दूसरी युवक की ओर बढ़ा दी ।

वे खाऊँ-चबाऊँ शैली की अंग्रेज़ी में किसी हिन्दी फ़िल्म की अंग्रेज़ी फ़िल्म से तुलनात्मक खाल उधेड़ते हुये धीरे-धीरे कोक पीते रहे । कोक ख़त्म हुआ तो प्रतियोगिता की बारी आयी ...खाली केन को फेकने की प्रतियोगिता । अत्यंत हर्षित मनोभावना के साथ दोनों ने अपनी-अपनी कोक की खाली केन फेकी ....लड़की की केन ज़्यादा दूर तक गयी किंतु लुढ़कते-लुढ़कते एक झाड़ी से टकराकर उसके आगोश में समा गयी । लड़की हर्ष से चीखी ,,,गोया फीफा वर्ल्ड कप जीत लिया हो । युवक की केन थोड़ी पीछे रह गयी थी लेकिन लुढ़कते हुये लड़की की केन से कुछ और आगे निकल कर कहीं अदृश्य हो गयी । इस बार ध्वनि प्रदूषण करने की बारी युवक की थी ...वह एक विस्फोटक ध्वनि के साथ किकिआया । लड़की को बुरा लगा, वह हारना नहीं चाहती थी । लड़की ने पानी की खाली बोतल फेंकी, युवक के लिये यह एक अनुकरणीय धर्म था, उसने भी अपने थैले से पानी की खाली बोतल निकालकर फेकी । । लड़की की बोतल पीछे रह गयी, वह दौड़ती हुयी गयी और अपनी बोतल को पाद प्रहार से गति प्रदान की । युवक चीखा ...बेइमानी है ....।
लड़की प्रफुल्लित थी ...उसके लिये परिणाम महत्वपूर्ण था ...माध्यम या संसाधन नहीं । उसने चीखते युवक के मुँह को हाथ से दबाने का प्रयास किया ...युवक ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन स्वीकार करते हुये लड़की से गुत्थम-गुत्था होने का निर्णय कर लिया ।

आगे का दृश्य अन्य पर्यटकों के लिये एक श्रेष्ठ मनोरंजन प्रमाणित हुआ और मुंशियारी के खलिया टॉप की धरती मैदान से आये इस प्रेमी युगल की हरकतों से धन्य हो गयी ।

रविवार, 8 जुलाई 2018

सत्ता दर्पण


1-  
सिकंदर महान
मोहम्मद बिन क़ासिम महान  
अकबर महान का बाप बाबर महान .......
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शातिर व्यापारी महान
.........................
तड़प रहे थे
भारत की जनता के कल्याण के लिये
अपने वतन से दूर
डालकर अपनी जान ज़ोख़िम में ?

ताकत की चाटुकारिता
करती रही है महिमा मण्डित 
कातिलों, लुटेरों और ज़ाहिलों को
इतिहास में होता रहा है यशोगान
ख़ुश होते रहे हैं लोग
कहते हुये उन्हें "वीर" और "महान" ।
हम आज भी रहते हैं लालायित
कर देने को न्योछावर
अपना सबकुछ
कुछ संगठित गुण्डों को ।

न जाने कितनी बार बहती रही हैं
ख़ून की नदियाँ
लूटे जाते रहे हैं हम
होते रहे हैं क्रूर बलात्कार
जलायी जाती रही हैं फसलें
विषाक्त किये जाते रहे हैं जलस्रोत
महान योद्धाओं द्वारा
और तुम कहते हो कि होता रहा है यह सब
प्रजा के कल्याण के लिए ?

हम आज भी हैं मुग़ालते में
कि आते हैं हुक़ूमत के भूखे
करने
हमारा उद्धार
और
होने ही वाली है वारिश
सुखों और न्याय की ।

2-  
सत्ता सुंदरी
रोज करती है एक शादी
किसी न किसी नये पाखण्ड से ।
आभामण्डल हो न जाय धूमिल
उनकी न्यायप्रियता के पाखण्ड का
इसलिये
पहनाते रहते हैं वे
कानून का
एक-एक कर नया ज़ामा
अपने शातिर इरादों को ।

प्रजा को
अपना-अपना सिला जामा
पहनाने की प्रतिस्पर्धा में
मशगूल हैं
दक्षिण भी... वाम भी ... ।
यह क्रूर तमाशा
और कब तक देखते रहेंगे हम ?

3-  
कभी नहीं लिखा गया
सच्चा इतिहास
कि होती रही है जंग
मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही
पिण्डारियों और मोहम्मद-बिन-क़ासिम के बीच ।
होते रहे हैं खेत
वे लोग
जो
न पिण्डारी हैं
और न मोहम्मद-बिन-क़ासिम ।
जंग में शामिल
दोनों पक्ष हैं ज़ाहिल
एक-दूसरे की परिभाषाओं में
और हम
लगाते रहे हैं प्लास्टर
बड़ी कुशलता से
हिग्स बोसॉन के सपनों का
अपने-अपने पक्षकार की परिभाषाओं में,
बनाते रहे हैं उन्हें
महान  
होते रहे हैं ख़ुश
देखकर उन्हें
पहनते हुये राजमुकुट ।

4-  
उफ़्फ़....
यह साधु भी
रावण ही निकला
उठा ले गया
इस बार फिर
सीता को .......
........................
और देख रहे हैं हम
चुराते हुये काजल
रावण को, हमारी आँखों से ।  

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

धम्मचक्र के साथ सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक अन्याय करते लोग



कल दो अप्रैल को अनुसूचित जाति-जनजाति संयुक्त मोर्चे द्वारा भारत बन्द का आह्वान किया गया और पूरे देश में बलपूर्वक व्यापारिक प्रतिष्ठान बन्द करवा दिये गये, चक्का जाम किया गया और हिंसक आन्दोलन में दस लोगों हत्या कर दी गयी । गनीमत है कि इस बार के विरोध-प्रदर्शन की हिंसा और हैवानियत गुजरात के पाटीदार आन्दोलन की तरह व्यापक और क्रूर नहीं हो सकी । 
एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अन्य पिछड़ा वर्ग समर्थित संयुक्त मोर्चे द्वारा हिंसक प्रदर्शन किए गये और सनातन धर्म के अनुयायियों की आस्था व मान्यताओं को आहत व अपमानित किया गया । प्रदर्शनकारियों के हाथों में भीमराव आम्बेडकर और धम्मचक्र के ध्वज थे । सामाजिक अन्याय के विरुद्ध दिये गये उत्तेजक भाषणों में सनातन संस्कृति, वैदिक साहित्य और ब्राह्मणों को जी भर अपमानित किया गया । बुद्ध के धम्मचक्र के नीचे सामाजिक अन्याय के चक्र को और भी गति प्रदान की गयी । प्रेम और शांति की स्थापना के लिए घृणा और हिंसा का चक्र चलाया गया । देश भर में अराजकता का वातावरण बन गया, स्वयं को दलित कहने वाले लोगों की अराजक भीड़ ज़बर होती गयी और  अवसरवादियों ने अपनी दूरदृष्टि में 2019 के लोकसभा चुनावों को अपना लक्ष्य बनाते हुये सत्ता के गणित का आकलन-विकलन प्रारम्भ कर दिया । इस बीच नेताओं, विचारकों और बुद्धिजीवियों को साँप सूँघता रहा और किसी ने भीमसेना से यह पूछने का साहस नहीं किया कि सामाजिक न्याय पाने के लिए सामाजिक अन्याय का यह चक्र आख़िर कब रुकेगा ?
आरोप है कि सवर्णों (मुख्यतः ब्राह्मणों और क्षत्रियों) ने अनुसूचित जातियों को हजारों साल तक सताया और उन पर अमानुषिक अत्याचार किये । यह सामाजिक अन्याय का एक काल था । उधर अफ़्रीका के लोगों को मध्य एशिया और योरोप की दास मण्डी में बेचे जाने और उन पर पाशविक अत्याचार करने का एक दीर्घ युग भी देखा गया है । ह्यूमन ट्रेफ़िकिंग पूरे विश्व में आज भी न्यूनाधिक अभिषाप बना ही हुआ है । हर समाज में विकृतियाँ आती हैं, फिर कुछ समय बाद क्रांति होती है और एक नयी व्यवस्था लागू होती है । उस नयी व्यवस्था में पुनः कुछ समय बाद विकृतियाँ आती हैं और फिर क्रांति होती है । कृति-विकृति और क्रांति का यह चक्र सदा से चलता रहा है ।
भारत के सन्दर्भ में जातीय अत्याचार हमारी सभ्यता पर कलंक के रूप में जाने जाते रहे हैं । निश्चित ही इस विकृति के कुछ कारण रहे होंगे जो शनैः शनैः एक विकृत परम्परा को जन्म देते रहे । हमें एक बात सदैव स्मरण रखना चाहिये कि मौलिक अधिकारों का हनन हो या अन्य कोई सामाजिक अत्याचार, इनका कर्ता सबल और अधिकार सम्पन्न व्यक्ति ही होता है । कोई श्रमिक किसी के साथ क्या अत्याचार कर सकेगा ! कोई निर्बल किसी को क्या सतायेगा ! कौन है सबल, कौन है अधिकार सम्पन्न ? कोई ब्राह्मण-क्षत्रिय या कोई दबंग और राजा ?
भारत के प्राचीन इतिहास को देखिये ! राज सत्ता तो क्षत्रियों के साथ-साथ वनवासियों से लेकर आज की अनुसूचित जातियों और पिछड़ा वर्ग तक सभी के हाथों में खेलती रही है । राजसत्ता पर प्रायः क्षत्रियेतर जातियों का ही वर्चस्व रहा है । ब्राह्मणों के राज्य का इतिहास तो बहुत अल्प है । अब प्रश्न यह उठता है कि जब राजसत्तायें क्षत्रियेतर जातियों के आसपास ही प्रायः घूमती रही हैं तो कोपीनधारी और भिक्षाटन करने वाला ब्राह्मण इतना सबल और शक्तिसम्पन्न कैसे हो गया कि राजसत्ता की समकक्ष जातियों को  सताने लगा ?
हमें यह समझना होगा कि सामाजिक अन्याय शक्तिसम्पन्न लोगों और सत्ताधीशों द्वारा ही किये जा सकते हैं... किये जाते रहे हैं... फ़िर वे किसी भी जाति, धर्म या वर्ग के क्यों न हों । हमें यह भी समझना होगा कि शक्त्तिसम्पन्न और सत्त्ताधीशों की जाति का नाम हमेशा “ज़बर” ही स्वीकार किया जाना चाहिये । ज़बर हमेशा से कमज़ोर को सताता रहा है । गुर्जर, भील, गोंड आदि समूहों या सवर्णेतर अन्य समुदायों के राजाओं ने अपनी-अपनी जाति के लोगों का कब कितना उत्थान किया ? यदि उत्थान किया होता तो आज वे ही सबसे आगे होते, सबसे सम्पन्न और शिक्षित होते । दूसरी ओर प्रचीन भारत की परम्परा में ऋषियों, मुनियों और संतों में ब्राह्मणेतर जाति के लोगों ने भी न केवल सम्मान अर्जित किया बल्कि समाज में पूज्य भी होते रहे हैं । आज भी साधु-संत की जाति नहीं पूछे जाने की परम्परा हमारे देश में प्रचलित है । भारतीय समाज परम्परा गुणात्मक विकासोन्मुख रही है जिसके आगे किसी जाति-धर्म का कभी कोई स्थान नहीं रहा ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिये दिये गये निर्णय के विरुद्ध हिंसक उपद्रव और हनुमान के चित्र पर थूक कर उसे जूते से पीटने का पूर्वाग्रही घृणापूर्ण प्रदर्शन भी उसी सामाजिक अन्याय की पुनरावृत्ति है जिसके विरोध में इतना बवाल किया गया । यह प्रदर्शन किसी समाधान की दिशा में नहीं बल्कि समस्याओं के चक्र की दिशा में ही और भी आगे बढ़ा है ।       

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

शांति के लिए यह भी सही...


1-
हनुमान हैं
शक्ति के प्रतीक
नफ़रत से
जिन पर थूकने
और
जिन्हें जूते लगाने का दुस्साहस है जिनमें
वे ख़ुद को दलित कहते हैं ...
इससे बड़ा गुस्ताख़ झूठ
और क्या हो सकता है भला !

2-
हे भीमपुत्रो !
थूकने
और जूते लगाने से
मिलता है यदि न्याय
और होता है प्रवाहित प्रेम
तो मुझ पर भी थूको...
मुझे भी लगाओ जूते ...
शायद इसी तरह हो सके स्थापित
अमन-चैन
हमारे भारत में ।
मंज़ूर है मुझे
यह सौदा भी
अपनी मातृभूमि की सुख-शांति के लिए !