शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

द्वैत कविता

 मोतीहारी वाले मिसिर जी की "द्वैतकविता"


दो भगवान

एक मेरा,

दूसरा तेरा।

दो धर्म

एक प्राकृतिक, 

दूसरा राजनीतिक।

दो राम

एक जनता का, 

दूसरा सत्ता का।

दो सत्य

एक जन का, 

दूसरा जन-प्रतिनिधि का।

दो झूठ

एक जनता का, 

दूसरा सरकार का।

दो देश

एक सनातनियों का, 

दूसरा घुसपैठियों का

दो दूध

एक केवल उसकी माँ का, 

दूसरा बकरी का।

दो गाय

एक माता, 

दूसरी काटकर खाई जाने वाली।

दो आज़ादी

एक जो मिली नहीं, 

दूसरी जो मिलकर भी बची नहीं।

वह

 वह सामान्य था

पिछड़ा हो गया

फिर अतिपिछड़ा हो गया

फिर दलित हो गया

अब अतिदलित भी हो गया

जैसे-जैसे 

चढ़ता गया शिखरों पर

सत्ता के

वह गिरता गया।  

वह होता जाता है निरंतर

और भी अधिक 

वंचित, पीड़ित, शोषित...

सत्ता की उपलब्धियों के साथ।

यह नया समाजविज्ञान है

बिना किसी वैज्ञानिक तथ्य के

कि चढ़ते हुए शिखर पर

होता जाता है नायक

कितना नालायक

और कितना पतित

झपटने के लिए चरमानंद

जैसे 

पतन में प्राप्त करते हैं

चरमानंद

एप्स्टीन की दुनिया के लोग।

बुधवार, 4 नवंबर 2026

माँ गंगा ने बुलाया है

मनाया जायेगा 

गंगा उत्सव

देश भर की नदियों के घाटों पर 

देने के लिए संदेश

कल्याणकारी

और पर्यावरणप्रेमी सरकार का 

कि करो स्वच्छ

नदियाँ

जो होती रहती हैं प्रतिपल प्रदूषित

सरकार की अनुमति से 

बड़े-बड़े उद्योगपतियों द्वारा

उनके उद्योगों से निकलने वाले 

विषाक्त कचरे से। 

यह संदेश है

जनता के लिए

जिसके पास नहीं होता 

कोई उद्योग 

फैलाने के लिए प्रदूषण।

सफाईकर्मी का काम 

केवल जनता के हिस्से में है

सरकार की जय हो

उद्योगपतियों की जय हो

पराजय तो 

केवल जनता के हिस्से में है

जनताजनार्दन जी!

प्रवचन समाप्त हुआ

अब लग जाइये काम पर

साफ कर डालो सारी नदियाँ 

और बता दो दुनिया को

कि तुम नहीं

तुम्हारी सरकार करती है

असीमप्रेम  

पर्यावरण से ।

In my own ways

कश्मीर से त्रिपुरा तक़ 

असुरक्षित है

पुलिस

सेना

और आम नागरिक।

राजा

आत्ममुग्ध है 

कि उसने दबोच लिया है

राजसिंहासन

फिर क्यों न व्याप्त हो यहाँ 

निरंकुशता और अराजकता।

बढ़ते ही जा रहे हैं

पुलिस और सेना पर 

अपराधियों के हिंसक आक्रमण

तथापि

वे इसे सुशासन कहते हैं और 

पुरस्कृत करते हैं

स्वयं को

अपनी श्रेष्ठतम 

शासन व्यवस्था के लिए।

इधर

आत्ममुग्धता में निमज्जित

हमारे अतिबुद्धिजीवी गाँव में

स्वयं को 

सभ्य

सुसंस्कृत 

और आभिजात्य मानने वाले लोग

सुन रहे हैं संगीत

पी रहे हैं मदिरा

खा रहे हैं कड़कनाथ

कहते हुए-

ओह! डाॅक्टर मिश्रा!

प्लीज़!

नो वर्ल्डली अफ़ेयर्स,

आय डोन्ट लाइक पाॅलिटिक्स

लेट मी इंज्वाय माय लाइफ

इन माय आॅन वेज़।


इस विशाल भीड़ में 

सुन पा रहे हैं 

मात्र कुछ लोग 

देश को

कराहते हुए

गहन पीड़ा से,

जहाँ सुरक्षित नहीं 

सेना

वैज्ञानिक

और प्रतिभा

वहाँ कैसे हो सकती है सुरक्षित

देश की सीमा!

सोमवार, 2 नवंबर 2026

थप्पड़

राजनीतिक काकटेल, बोले तो सम्मेलन ब्राह्मणों का, प्रबोधन ब्राह्मणद्वेषी का ! 

चलिये, मूल विषय पर आते हैं। प्रयागराज का प्रबुद्ध सम्मेलन, सम्मेलन में केशव मौर्य की जनसभा, जनसभा में ब्राह्मण द्वारा अब्राह्मण से प्रश्न पूछने पर मिश्र जी ने तिवारी जी को थप्पड़ मारा। 

साधारण सी घटना है, किंतु मारने वाला पार्षद है और मार खाने वाला एक सामान्य नागरिक इसलिए घटना का मंथन करने पर अर्थ बहुत गंभीर और चिंताजनक निःसृत होते हैं।

ब्राह्मण ने ब्राह्मण को मारा। 

इसे यूँ भी कहा जा सकता है "दुष्ट ने शुद्ध को प्रताड़ित किया" अथवा "अन्याय ने न्याय को दंडित किया" अथवा "दबंग ब्राह्मण ने दलित ब्राह्मण को पीटा" अथवा "अधिनायकतंत्र ने लोकतंत्र का कंठ दबा दिया" अथवा "टोले के राजा ने अपनी प्रजा को अहंकारवश मारा"। 

घटना एक ही है, विभिन्न कोणों से भिन्न-भिन्न संकेत देने वाली एक घटना जो मस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करती अपितु क्रांति का आह्वान करती है और ब्राह्मणत्व पर प्रश्न भी खड़े करती है।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

एक और प्रतिभापलायन

पीयूष गोयल जी भारत से विदेश भगा दी गई प्रतिभाओं को वापस आने के लिए "देश के विकास" और "देश की प्रतिभा" की दुहाई दे रहे हैं पर जो प्रतिभायें अभी गई नहीं, भारत में ही अपने लिए एक अनुकूल आधार खोज रही हैं, उनके सामने खड़ी प्रतिकूल स्थितियों को समाप्त करने की कोई योजना बनाने का संकल्प नहीं ले पाते। ...और इसी का परिणाम है अनघा राजेश! एक और प्रतिभापलायन, जिसका लाभ उठाएगा अमेरिका। यहाँ तो यूजीसी ऐक्ट को विकास का पैरामीटर मानने और मनुवाद को गरियाने से ही किसी को फुरसत नहीं, संकल्प कौन ले! 

बीआईटी पिलानी की २४ वर्षीया अनघा राजेश ने डीएनए आधारित डाटा संग्रहण की अत्याधुनिक तकनीक में पूरे विश्व को पीछे छोड़ते हुए अद्भुत कार्य किया है। वे भारत में ही अपना उद्यम करना चाहती थीं, पर कार्य की प्रतिकूल परिस्थितियों और प्रतिभा के अवमूल्यन ने उन्हें पलायन के लिए विवश कर दिया। 

हमारे कलियुगी भगवानों को विश्वास है कि वे प्रतिभाहनन के आयुध से जब तक प्रतिभाओं की भ्रूणहत्या करते रहेंगे तब तक वे भारत के भगवान बने रहेंगे। 

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

कहीं और

दिल्ली में धुआँ है

चलो कहीं और चलें

धुयें से दूर

कोलाहल से दूर

अराजकता से दूर

हिमालय की गोद में कहीं!     

हाँ! किसी पहाड़ी गाँव में

यह ठीक लग रहा है, 

इंडस वैली नाम है इसका

हिमालय में इंडस वैली! 

कुछ विचित्र सा नहीं लगा आपको! 

उहूँ...नाम छोड़िए, 

सामने देखिए 

पंचाचूली पर्वत शृंखला

ॐ पर्वत 

पास ही एक अन्य शिखर

जैसे किसी नगर का चित्र।    

जहाँ मिलती है धरती

आकाश से

वहाँ घटित होते हैं 

पल-पल बहुतेरे चित्र

मोतीहारी वाले मिसिर जी ने बताया - 

"जाकी रही भावना जैसी

प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।" 

बहुतेरे चित्र

पर सभी आभासी

इंडस वैली की तरह

जो है तो गाँव 

पर आँखें गड़ाकर देखने से 

दिखता है 

एक और मरता हुआ नगर

कचरा 

और धुआँ। 

दिल्ली की तरह यहाँ भी दो कचरे हैं

एक बौद्धिक

दूसरा भौतिक 

बौद्धिक कचरा आग लगाता है

भौतिक कचरा जलता है

आग धीरे-धीरे लगती है 

कचरे के ढेर में

जिसमें होती हैं 

पाॅलीथिन की थैलियाँ

प्लास्टिक की खाली बोतलें

ब्रेड और बीकानेरी भुजिया की 

खाली थैलियाँ...।  

बौद्धिक कचरा भी

उच्च श्रेणी का है यहाँ

सेना के सेवानिवृत्त उच्चाधिकारी, 

कोई धनाढ्य व्यापारी

या कोई प्रोफ़ेसर.... 

सच कहूँ 

तो यह गाँव है ही सेवानिवृत्त लोगों का

जो आकर बसे हैं यहाँ 

पहाड़ में दिल्ली को जीने

हाँ! ठीक सुना आपने

पहाड़ में

दिल्ली को जीने।   

एक दिन चुपके से कहा

ॐ पर्वत ने मेरे कान में

देखा तुमने

दिल्ली स्वयं चलकर आ गई

हमारे पास 

अब हमें जाना होगा 

यहाँ से

कहीं और दूर।