भारत और विश्व
जैसे-जैसे विराट कृष्ण विवर में निस्तेज होते सौर्यमण्डल और धूमकेतु समाते जा रहे हैं वैसे-वैसे उसकी शक्ति प्रचण्ड होती जा रही है। यह वह सत्य है जिसे जान लेने के बाद ऋषियों ने तमस से बाहर निकलकर ज्योति की ओर गमन करने का सुझाव दिया था। इसमें दो क्रियायें हैं – एक तो है तमस को छोड़कर तमस से बाहर निकलना और दूसरी है प्रकाश की ओर गमन करना। अर्थात् हमें तमस को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर, सही दिशा में गमन करना होगा।
दुर्भाग्य से पूरा विश्व ही तमस को पहचान ही नहीं पा रहा है, तो उसे छोड़ने की प्रक्रिया कैसे प्रारम्भ हो सकेगी! जेलेंस्की को विश्वास है कि वह रूस को झुका देगा, एलन मस्क को विश्वास है कि वह भारत के उद्योग को अपनी मुट्ठी में दबोच लेगा, जॉर्ज सोरोस को विश्वास है कि वह विश्व भर की राजनीति को अपने धन-बल से नचा सकता है, रोटेशील्ड को विश्वास है कि वही हर देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, डोनाल्ड ट्रम्प को विश्वास है कि वह जिसे चाहे उसे मूर्ख बनाकर उस पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है, इज़्रेल को विश्वास है कि वह इस्लामिक आतंक को समाप्त कर देगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश को विश्वास है कि वे भारत को इस्लामिक देश बना लेंगे, मोदी को विश्वास है कि भारत पर एकछ्त्र राज्य करने के लिये भारतीय समाज के टुकड़-टुकड़े कर देना ही एकमात्र प्रशस्त मार्ग है, भारतीय जनता को विश्वास है कि कोई आएगा जो धरती को स्वर्ग बना देगा स्वयं उसे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, तथाकथित दलितों को विश्वास है कि बिना तप किए ही सिद्धियाँ छीन लेना उनका अधिकार है, भारतीय विपक्ष को विश्वास है कि वे हिंसा और उपद्रव से भारत में सत्ता-परिवर्तन कर देंगे, … लोग अपने-अपने स्थापित विश्वास से चिपके हुये हैं। इसी स्थापित विश्वास को छोड़कर बाहर निकलने की आवश्यकता है। क्या ऐसा हो सकेगा? हाँ! हो सकेगा पर पूरी तरह नहीं, आंशिकरूप में होगा। यह भी एक ब्रह्माण्डीय सत्य है कि कुछ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। असंतुलित हो गये सत्य और असत्य में, तमस और प्रकाश में, ज्ञान और अज्ञान में… आनुपातिक परिवर्तन भर होता है अन्यथा ऋणात्मक और धनात्मक आवेश तो सदा ही रहते हैं। हर युग में असुरों के विरुद्ध सुरों को ही युद्ध करना पड़ता है।
आज की स्थिति में सुरों का लगभग अभाव सा है और असुर उन विषाणुओं की तरह शक्तिशाली हो चुके हैं जो किसी जीवित कोशिका में प्रविष्ट हो चुके होते हैं, उनके आकार को छोटा मान लेना बहुत बड़ी रणनीतिक भूल है। नेपाल को छोड़ दिया जाय तो ठीक यही स्थिति हम श्रीलंका और बांग्लादेश में देख चुके हैं। नेपाल में जो हुआ उसके परिणाम शल्यचिकित्सा के परिणाम की तरह दिखायी देने लगे हैं। भारत की जनता को तय करना है कि हम नेपाल बनने जा रहे हैं या बांग्लादेश?