शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

संविधान महान तो देश महान क्यों नहीं?

            सामान्य स्थितियों में जब किसी देश का सं-विधान चलत-चलते, घिसते-घिसते असं-विधान हो जाय या कोई देश विदेशी सत्ता के अधीन हो जाय तो वहाँ एक नए सं-विधान की आवश्यकता होती है। संविधान परिवर्तन का यही मूल सिद्धांत है जिसके आधार पर विश्व भर में पुराने संविधानों को हटाकर नए संविधानों की रचना की जाती रही है। स्वतंत्र भारत के कर्णधारों को श्रीराम और सम्राट विक्रमादित्य की शासन एवं न्याय व्यवस्था उपयुक्त नहीं लगी इसलिए उन्होंने विदेशी परम्परा के अनुसार पश्चिम के कई देशों के संविधानों का अध्ययन करके एक नए संविधान की रचना की, उन्हें यही उपयुक्त लगा। उनका विश्वास था कि इस संविधान से एक नए भारत की नींव रखी जा सकेगी, पर ऐसा हो सका क्या? भारत अंतर्कलह में फँसता चला जा रहा है और कोई व्यवस्था इसका निदान कर पाने में सफल नहीं हो पा रही है।

मध्यप्रदेश के एक थाना परिसर में, अनुमति लेने के बाद पुलिस कर्मचारियों ने हनुमान चालीसा का पाठ किया तो दिग्विजय सिंह को भारत के संविधान की अवहेलना दिखाई देने लगी और उन्होंने भाजपा को इसके लिए चेतावनी दे डाली। अर्थात् उनके अनुसार भारत में सनातन परम्पराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और भारतीयता से सम्बंधित किसी भी कार्यक्रम का शासकीय कार्यालय में सार्वजनिक आयोजन किया जाना संविधान की अवहेलना है और थाना परिसर में हनुमान की मूर्ति लगाना साम्प्रदायिक है। इसका अर्थ यह हुआ कि दिग्विजय सिंह जैसे बहुत से सनातनविरोधी और इस्लामप्रेमी लोग यह बाध्यता उपस्थित कर रहे हैं कि यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति पौष्टिक भोजन ले रहा है तो उसे वे औषधियाँ भी खानी ही होंगी जो एक रुग्ण खा रहा है, हिमालय के लोगों को भी वही कपड़े पहनने होंगे जो एक अरबी पहनता है, हिन्दुस्थान में रहने वाले हर व्यक्ति को “जय श्रीराम” नहीं बल्कि “या हुसैन” कहना ही होगा। फ़िलिस्तीन के लिए चिंतित होने वाले दिग्विजय सिंह जैसे लोग इज्राइली लड़कियों के साथ पाशविक यौनहिंसा पर और इस समय ब्रिटेन में हो रही हिंसा पर कभी कुछ नहीं कहेंगे। राजपूत राजवंश के रक्त में इतनी अभारतीयता दुःखद और विस्मयकारी है।

           इस समय देश में सब कुछ संविधान के अनुरूप ही हो रहा है, चाहे वह साम्प्रदायिक हिंसा हो, सेना पर पथराव हो, देश को विभाजित करने के नारे हों, न्यायालय के निर्णयों को “मानबो ना” कहकर किसी मुख्यमंत्री के द्वारा अस्वीकार करना हो, सर तन से जुदा का नारा हो, खुले आम हिन्दुओं को मंदिरों के सामने लटका कर जीवित जला देने की धमकियाँ हों, छद्म परिचय से हिन्दू लड़कियों से शारीरिक संबंध स्थापित कर निकाह करना हो, धर्मांतरण करना हो, साम्प्रदायिक पहचान को छिपाते हुए देवी-देवताओं के नाम से ढाबे-भोजनालय और दुकानें खोलना हो, अवैध विदेशी घुसपैठियों को भारत की वे सभी सुविधाएँ उपलब्ध करवाना हो जिनके लिए वे पात्र नहीं हैं, सनातन प्रतीकों और धरोहरों पर बलात् अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध न्यायालय में हिन्दू पक्ष के लिए लड़ने वाले अधिवक्ताओं को हत्या कर देने की धमकियाँ देना हो, …सब कुछ संविधान के अनुरूप है! यही कारण है कि ऐसी घटनाओं पर विघटनकारी नेताओं से लेकर न्यायालयों के मीलॉर्ड्स के कक्ष तक एक गहरा मौन छाया रहता है।

इन घटनाओं की पुनरावृत्तियों से यह प्रमाणित होता रहा है कि भारत की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था बहुसंख्य लोगों के लिए न्यायपूर्ण, कल्याणकारी और उपयुक्त नहीं है। यह बात मुझे बहुत भयभीत करती है कि भारत में रहकर भी हम भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार जीवनयापन का अधिकार क्यों नहीं रखते! जब विश्वविद्यालयों के व्याख्यानों में इस्लाम को महान और सनातन को तुच्छ बताते हुए धर्मांतरण के लिए प्रेरित करना एवं शिक्षण संस्थानों के परिसरों में सनातनविरोधी/ भारतविरोधी कार्यक्रम करना संविधान के अनुरूप माना जाने लगे तो निश्चित ही ऐसे संविधान को तुरंत हटा दिए जाने की आवश्यकता है।

भारत का वर्तमान संविधान महान है पर उसका पालन करने वाला यह देश महान नहीं हो सका, क्यों? कौन सी बाधाएँ हैं महान होने में? देश में विघटनकारी और हिंसक घटनाओं पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा? भारत की सम्प्रभुता को बारम्बार ललकारने वालों पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं हो पाती? भारत का बहुसंख्य हिन्दू स्वयं को असुरक्षित और भयभीत अनुभव क्यों करता है? क्या भारत का संविधान भारतीयों के लिए कम और सत्ताधीशों के लिए अधिक है? क्या संविधान में इन प्रश्नों का भी कोई उत्तर है?

रविवार, 14 जुलाई 2024

मृत्यु के बाद उभरता सत्य

            यद्यपि ब्राह्मणों को कोसने और गालियाँ देने वालों की कमी नहीं है, तथापि लोग हैं कि ब्राह्मण होने का भ्रम उत्पन्न करने का मोह संवरण नहीं कर पाते।

जवाहरलाल की बेटी फ़िरोज़ जहाँगीर गाँढी से निकाह करके “गाँढी” न होकर “गांधी” हो जाती है, उनके बेटे भी गुजराती उपनाम गांधी होने का भ्रम बनाए रखते हैं। राजीव गाँढी का बेटा रौल विंची अपना नाम राहुल लिखना प्रारम्भ करता है और जातीय भ्रम को और भी प्रगाढ़ बनाने के लिए कोट के ऊपर यज्ञोपवीत धारण कर स्वयं को दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण घोषित कर देता है। दूसरी ओर राजीव गाँढी की बेटी प्रियंका “बढेरा परिवार” में विवाह करके भी बढेरा न होकर गांधी ही बनी रहती है।

वर्णव्यवस्था, जातिप्रथा, क्षत्रियों, ब्राह्मणों और वेदों को कोसने वाले लोगों में जातीय उपनामों को लेकर ऐसे मोह का उद्देश्य केवल जातीय भ्रम उत्पन्न करके वह सामाजिक लाभ प्राप्त करना होता है जिसके लिए वे स्वयं को पात्र नहीं मानते। छत्तीसगढ़ में अनुसूचितजाति के कुछ सतनामी लोग अपने नाम के साथ तिवारी, उपाध्याय, पांडे, व्यास, जोशी, चतुर्वेदी, पाठक, तोमर, भदौरिया, सेंगर, सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, राठौर, चौहान, चंदेल और बघेल आदि लिखकर जातीय भ्रम उत्पन्न करने के लिए जाने जाते हैं। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि शासकीय सेवाओं के समय ये स्वयं को सतनामी प्रमाणित करते हैं, सामाजिक परिचय के लिए छ्द्म उपनाम सवर्णों के अपना लेते हैं, विवाह के समय बौद्धपद्धति को अपना लेते हैं और अध्यात्म के स्तर पर बाबा भीमराव अम्बेडकर को अपना इष्टदेव मानकर उनकी पूजा करते हैं। यह एक विचित्र घालमेल है जहाँ केवल भ्रमों के जाल ही जाल होते हैं।

बिलासपुर के स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित एक शोक समाचार तो और भी अद्भुत है – “बिलासपुर, वैशाली अपार्टमेंट, टिकरापारा, मन्नू चौक निवासी बबीता पांडेय का ९ जुलाई को निधन हो गया है। उनकी अंतिम यात्रा १० जुलाई को दोपहर ३ बजे उनके निवास स्थान से तोरवा क्रिश्चियन कब्रिस्तान के लिए निकलेगी। वे संजय पांडेय की पत्नी एवं सागर पांडेय की माता थीं”।

छत्तीसगढ़ और पंजाब में छद्मउपनाम वाले ईसाइयों और बौद्धों की भरमार है। ये लोग ईसाई बपतिस्मा या बौद्धधम्म ग्रहण करने के बाद भी साहू, यादव, भदौरिया और पांडेय आदि ही बने रहने का भ्रम उत्पन्न करके भारतीय व्यवस्था का एक साथ विरोध और समर्थन करके क्या संदेश देना चाहते हैं यह समझ पाना सरल नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की क्या कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?

सवर्ण समुदाय में जातिप्रथा की सीमाएँ तो लगभग समाप्त हो चुकी हैं। वे किसी भी जाति या धर्म के लोगों से विवाह सम्बंध स्थापित कर रहे हैं, इसके बाद भी वे गालियों और अपमान के पात्र बने हुए हैं। सवर्णेतर समुदाय के लोग जाति और वर्णव्यवस्था का विरोध तो करते हैं, उन्हें गालियाँ देते भी नहीं थकते पर जाति और वर्ण व्यवस्था सूचक छद्म-उपनामों को अपनाकर उनसे चिपके भी रहना चाहते हैं। ऐसे लोग ही जाति और वर्ण व्यवस्था की जड़ें और भी सुदृढ़ करने में लगे हुए हैं। जब आप जाति और वर्ण व्यवस्था का विरोध करते हैं, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को गालियाँ देते हैं, उनका अपमान करते हैं तो उनके उपनामों को अपना कर किस प्रकार की क्रांति का संदेश देना चाहते हैं? दूसरी ओर जब आप ईसाई सम्प्रदाय की दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं तो हिन्दुओं/सिखों के उपनामों से चिपके रहकर क्या संदेश देना चाहते हैं?

शनिवार, 6 जुलाई 2024

हम ख़ुशी-ख़ुशी विदेशियों को अपना देश सौंप दिया करते हैं

            काल ईसवी सन् ७१२, स्थान चच राजवंश का सिंधराज्य। चच राजवंश के कुल राजाओं की संख्या तीन।

आठवीं शताब्दी में भारतीयों ने अपना पश्चिमी सीमांत राज्य अरब के सत्रहवर्षीय आक्रामक मोहम्मद-बिन-कासिम को सौंप दिया था। आज उसी सिंध के लोग आक्रामक और यौनदुष्कर्मी कासिम को अपना आदर्श मानते हैं और सिंध के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले राजा दाहिर को मानते हैं अपना शत्रु। राजा दाहिर अपने शासनकाल में सिंध पर हुये दो अरबी आक्रमणों को विफल कर चुके थे पर सिंध नदी के किनारे अरोर के अंतिम युद्ध में अपने राज्य के बौद्धों के विश्वासघात के कारण वीरगति को प्राप्त हुये।

ईसा छठी शताब्दी में भारत की ईरान सीमा को स्पर्श करते सिंध के राजा साहसी राय निःसंतान थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके मंत्री, जो कि कश्मीरी ब्राह्मण मंत्री थे, वहाँ के राजा बने और चच वंश की स्थापना की। चच के बाद उनके बेटे दाहिर के अल्पवयस्क होने के कारण चच के भाई चंदर ने सन् 637 से 644 तक सिंध पर राज्य किया और बौद्ध-धर्म ग्रहण कर अपने राज्य का राजधर्म भी बौद्ध घोषित कर दिया जिससे सिंध के ब्राह्मण उनसे अप्रसन्न हो गये। दाहिर ने राज्यारोहण के बाद सनातन को पुनः सिंध का राजधर्म घोषित किया जिससे वहाँ के बौद्ध कुपित हो गये।

भारत की नई पीढ़ी जिनका नाम भी नहीं जानती, भारत के लिए सपरिवार बलिदान हो जाने वाले उन्हीं राजा दाहिर का सोलह जून को १३१२वाँ बलिदान दिवस था। ईसवी सन् ७१२ में जब अरबी आक्राणकारी मोहम्मद-बिन-कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया तो राजा दाहिर से अप्रसन्न वहाँ के बौद्धों ने निरोनकोट और सिवस्तान में स्थान-स्थान पर कासिम के स्वागत की तैयारियाँ की थीं।

अरब में अपने ख़लीफ़ा के विरुद्ध विद्रोह करने वाले दो भाइयों माविया-बिन-हारिस-अलाफ़ी और मोहम्मद-बिन-हारिस-अलाफी, जो कि रिश्ते में पैगम्बर साहब के सम्बंधी थे, ने सिंध के मकरान शहर में राजा दाहिर से शरणप्राप्त की थी पर युद्ध के समय हम इस्लाम से गद्दारी नहीं कर सकतेकहकर सिंध छोड़ कर चले जाने वाले अल्लाफ़ी भाइयों ने कासिम से मिलकर उसे सहयोग न किया हो, ऐसा नहीं हो सकता (इस्लाम के प्रति मुसलमानों के समर्पण और काफ़िरों के विरुद्ध अलतकिया अभियान उनका दीर्घकालीन इतिहास रहा है जिसकी हमारे नेताओं और सामाजिक ठेकेदारों द्वारा सदा से उपेक्षा कर गंगा-जमुनी तहज़ीब की बयार बहायी जाती रही है)।

राजा दाहिर की सेना में ज्ञानबुद्धि और मोक्षवासव नामक दो बौद्ध भी थे जिन्होंने युद्ध में अपने राजा के साथ विश्वासघात किया और जब कासिम की सेना हार रही थी तभी पूर्वनियोजित षड्यंत्र के अनुसार राजा दाहिर पर अग्निबाणों की वर्षा कर दी जिसके कारण उनका हाथी नदी की ओर भागा और सेना में भगदड़ मच गयी। महाराज दाहिर हाथी के हौदे से नीचे गिर गये फिर घेर कर बंदी बनाने के बाद उनकी हत्या कर दी गयी। चच राजवंश के तीसरे और अंतिम शासक राजा दाहिर की हत्या में उन दो बौद्धों की भूमिका ने भारत के इतिहास को सदा के लिए बदल कर रख दिया। इस्लामी परम्परा के अनुसार ब्राह्मणराजा का सर तन से जुदाकरके अरब ले जाया गया।

धोखा करके युद्ध जीतने वाला मोहम्मद-बिन-कासिम जब भारत से वापस गया तो उसके साथ था महाराजा दाहिर का कटा हुआ सिर, जंजीरों में जकड़ी उनकी महारानी एवं दोनों राजकुमारियाँ सूर्यकुमारी एवं परमाल, सिंध की सैकड़ों युवा स्त्रियाँ, हजारों युद्ध बंदी, और अकूत सम्पत्ति। रास्ते भर में और अरब पहुँचने के बाद महारानी, दोनों राजकुमारियों और अन्य बंदी स्त्रियों के साथ क्या-क्या नहीं किया गया होगा इसकी कल्पना भी हम लोगों के लिए अकल्पनीय है। आज भारत में चचवंश के अंतिम शासक का नाम भी लेने के लिए कोई राजनेता तैयार नहीं है।

इतिहास को झुठलाते भारतीय

           भारत में विदेशी आक्रमणकारियों, अत्याचारियों और लुटेरों को महान निरूपित करने के लिए उनके नामों और उनके नाम वाले भवनों, स्मारकों, रेलवे स्टेशंस, मार्गों और गलियों को स्वतंत्र भारत के राजनेताओं द्वारा बहुत सहेजकर रखा गया है। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि यह भारत पर भारत के लोगों द्वारा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आक्रमण है, जिसकी घोर निंदा का अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है

आज भारत के राजनेताओं में इतना साहस नहीं है कि वे विदेशी आक्रमणकारियों के स्थान पर अपने राष्ट्रीय गौरवों और महान राजाओं के कार्यों का गुणगान कर सकें और उनकी स्मृतियों को भावी पीढ़ियों के लिए सहेज सकें। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि भारत अभी भी स्वतंत्र नहीं हुआ है, हम आज भी भौतिक, मानसिक और सांस्कृतिक रूप से पराधीन हैं। पराधीनता की इन बेड़ियों को तोड़ना ही होगा अन्यथा यह देश भारत न रहकर कुछ और ही हो जायेगा, और इस ऐतिहासिक अपराध के लिए हम सब उत्तरदायी होंगे।  

पाकिस्तान के कुछ लोग जिस बात को समझने लगे हैं, वह भारत के लोगों को भी समझनी होगी। देखिये, क्या कहते हैं वे

पंजाब दशकों तक अपने असल इतिहास को झुठलाता रहा है और एक ऐसा काल्पनिक इतिहास गढ़ने की कोशिश में जुटा रहा जिसमें वो राजा पोरस और महाराजा रणजीत सिंह समेत असली राष्ट्र नायकों और सैकड़ों किरदारों की जगह गौरी, गज़नवी, सूरी और अब्दाली जैसे नए राष्ट्रनायक बनाकर पेश करता रहा है जो पंजाब समेत पूरे उपमहाद्वीप का सीना चाक करके यहाँ के संसाधन लूटते रहे” – पत्रकार जावेद लांगाह, क्वेटा, पाकिस्तान।

अब वक़्त आ गया है कि पाकिस्तान में बसने वाली तमाम क़ौमों के बच्चों को स्कूलों में सच बताया जाय और उन्हें अरब और मुग़ल इतिहास के बजाय अपना इतिहास पढ़ाया जाय” – दरम ख़ान, पाकिस्तान।

पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा स्थापित किए जाने पर कट्टरवादियों को सम्बोधित एक टिप्पणी – “महाराजा रणजीत सिंह पंजाब पर शासन करने वाले पहले पंजाबी थे अगर सिंध सरकार एक ऐसी ही प्रतिमा राजा दाहिर की भी लगा दे तो आपको गुस्सा तो नहीं आयेगा, कुफ्र और गद्दारी के फतवे तो नहीं जारी होंगे?” – पत्रकार निसार खोखर, पाकिस्तान

 महाराजा दाहिर को सिंध का राष्ट्रनायक क़रार दिए जाने की हिमायत करते हुये पाकिस्तान के डॉक्टर इसहाक़ समीजू लिखते हैं – “हर क़ौम को यह हक़ हासिल है कि जिन भी किरदारों ने अपने देश की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दी उनको श्रद्धांजलि दी जाए     

आस्था की भगदड़

            “यदि आस्था का कोई आधार नहीं होता तो आस्था में इतनी दृढ़ता कहाँ से आती है? आस्थावान लोगों को अपनी गम्भीर व्याधियों से पल भर में मुक्ति मिल जाती है। डॉक्टर जिस गर्भिणी को जच्चा-बच्चा में से किसी एक के जीवित बचने की आशंका बताते हैं वह केवल चमत्कारी बाबा की आस्था के बल पर दोनों की प्राणरक्षा में सफल होती है। थंडर-स्टॉर्म इन्जूरी ...यहाँ तक कि उसके कारण हुये गम्भीर बर्न में भी चिकित्सा से नहीं केवल आस्था और आशीर्वाद से लाभ होने का प्रमाण देने वाले भक्तगण भी सामने आ रहे हैं। इन लोगों के पास आस्था के प्रमाण होते हैं, लोग उससे लाभान्वित होते हैं इसीलिए आस्थावान भक्त अपनी आस्था के केंद्र के प्रति इतने समर्पित होते हैं कि उसके लिए हिंसा और आत्मपीड़ा को भी पुण्य मानते हैं। विवेकशील लोगों के लिए यह सब कुतर्क है। यहाँ तर्कों और कुतर्कों के बीच एक स्थायी विवाद है। हर किसी को अपनी बात तर्कयुक्त और दूसरों की बात कुतर्कपूर्ण लगती है। यह चलता रहेगा, भीड़ का यही धर्म है”– मोतीहारी वाले मिसिर जी।

अंधआस्था सभी सम्प्रदायों और वर्गों में देखने को मिलती है। आवश्यक नहीं कि आस्थावान व्यक्ति अशिक्षित, निर्धन और दुःखी-पीड़ित ही हो, वह उच्च-शिक्षित, राजनेता, धूर्त या अर्थसम्पन्न व्यक्ति भी हो सकता है।   

सिकंदरा राऊ के फुलरई मुगलगढ़ी गाँव में दो जुलाई को बाबा सूरज पाल सिंह जाटवउर्फ़ भोले बाबाउर्फ़ साकार हरिउर्फ़ विष्णु के साक्षात अवतार” उर्फ़ परमेश्वरका आशीर्वाद लेने के लिए एक लाख से अधिक लोग पहुँचे थे। सुबह से पहुँची स्त्रियों को भीषण गरमी और उमस में दोपहर बारह बजे तक बाबा के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी। गरमी और उमस के कारण दूर-दूर से आयी महिलाओं का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, उन्होंने बाबा के प्रशिक्षित सेवादारों से कहा कि उन्हें बाहर खुले स्थान में पहुँचाने में सहयोग करें। प्रशिक्षित सेवादारों ने स्त्रियों को कोई सहयोग नहीं किया क्योंकि यह काम तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को करना था।  

दोपहर को बाबा रामपाल सिंह जाटव उर्फ़ परमेश्वर ...का प्रवचन हुआ और अंत में जब बाबा प्रस्थान कर रहे थे तब उनके चरणों की रज प्राप्त करने के लिए भगदड़ मच गयी। सुदर्शनचक्रधारी और सूट-बूट-टाई वाले बाबा सूरजपाल सिंह जाटव को ईश्वर का अवतार मानने वाले भक्तों को बाबा की चरण-रज चाहिए थी, उस अमूल्य निधि को लूटने के लिए भक्ति में विह्वल आस्थावानों ने संयम और अनुशासन खो दिया, भीड़ ने अपने भगदड़ वाले स्वभाव को प्रकट किया। भगदड़ में फँसी महिलायें सहयोग के लिए चीखने लगीं तो सेवादारों ने सहयोग के स्थान पर उन्हें परमेश्वर “साकार हरिनाम जपने का मंत्र देते हुये आश्वासन दिया कि “कुछ नहीं होगा, बाबा सब ठीक कर देंगे”। कई आस्थावान अपने परमेश्वर की लीला में घायल हो गये और एक सौ इकत्तीस आस्थावानों की मृत्यु हो गयी। रोते-चीखते आस्थावान भक्तों की रक्षा बाबा और उनके सेवादारों ने नहीं की, क्योंकि यह काम तो मुख्यमंत्री को अपनी पुलिस और डॉक्टर्स से करवाना था।

हठी और अंधविश्वासी लोग किसी की बात नहीं मानते और जब वे लूट लिये जाते हैं या उनके प्राणों पर कोई संकट आ जाता है तो वे इसके लिए कभी पुलिस, कभी कलेक्टर, कभी डॉक्टर तो कभी सत्तापक्ष को उत्तरदायी ठहरा देते हैं। भीड़ का अधर्म-प्रेरित ऐसा चरित्र ही उसके कष्टों का कारण है। आस्थावानों को बिना चिकित्सा के चमत्कारी स्वास्थ्य चाहिए, कोर्ट में विजय चाहिए, बेटी के लिए अच्छा वर चाहिए, बेटे के लिए नौकरी चाहिए... सब कुछ चाहिए, बिना पर्याप्त कर्म किए हुए, केवल कृपा के बल पर।  

भगदड़ प्रभावित आस्थावान अभी भी बाबा को ईश्वर मान रहे हैं, उनके चमत्कारों से अभिभूत होकर बाबा का गुणगान कर रहे हैं, उनके अवतारत्व को सिद्ध करने के हठ पर अड़े हुए हैं, उनकी रक्षा के लिए हर तरह का झूठ बोलने, तथ्यों को छिपाने, सरकार से छल करने और पाप करने के लिए तैयार हैं। ऐसा ही आचरण बाबा आसाराम बापू, बाबा सतपाल और बाबा रामरहीम के आस्थावान भक्तों का हम पहले भी देख ही चुके हैं।

घटना के तत्काल बाद बाबा और उसके मैनेजर देवप्रकाश मधुकर किसी अज्ञात स्थान पर छिप गये। इस बीच बाबा के अधिवक्ता ए.पी. सिंह प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि बाबा अस्वस्थ हैं और स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। आस्थावानों को कैंसर जैसी कई गम्भीर व्याधियों से काली-चाय और हैण्ड-पम्प का जल पिलाकर स्वस्थ्य कर देने वाला बाबा अस्वस्थ्य हो गया। भक्त इसे बाबा की लीला मानते हैं। भगदड़ में एक-सौ-तेईस लोगों की मृत्यु को भक्तगण परमेश्वर बाबा सूरज पाल सिंह जाटव की इच्छा मानते हैं। छह जुलाई को बाबा प्रकट हुये और भक्तों को शासन-प्रशासन पर भरोसा करने का उपदेश दिया। शासन-प्रशासन को धता बताने वाला बाबा अब अपनी कृपा और आशीर्वाद पर नहीं बल्कि शासन-प्रशासन पर भरोसा करने का प्रवचन देकर अपना पल्ला झाड़ रहा है।   

पता चला है कि जिला एटा के गाँव बहादुर नगर, पटियाली निवासी बाबा सूरजपाल जाटव राजस्थान के दौसा में अपने भक्त हर्षवर्द्धन मीणा के घर विश्राम के लिए रुका करता था, जो 2020 में जूनियर इंजीनियर भर्ती परीक्षा पेपर-लीक का मुख्य आरोपी है। ये चमत्कारी बाबा इतने प्रभावशाली होते हैं कि राजनेता उनके पापों के विरुद्ध यथासम्भव कोई कार्यवाही नहीं होने देते। बाबाओं के रक्षकों में उनकी चमत्कार विह्वल प्रजा ही नहीं होती, प्रभावशाली राजनेता भी होते हैं जो किसी अभेद्य दुर्ग की तरह बाबा की रक्षा करते हैं। यहाँ निश्चितरूप से सत्तापक्ष और स्थानीय प्रशासन पूर्री तरह दोषी होता है। जब ये बाबा अतिक्रमण करके अवैधरूप से अपने भव्य आश्रम बना रहे होते हैं, चमत्कार दिखा रहे होते हैं, मूर्खतापूर्ण कृत्यों से जनता के साथ छल कर रहे होते हैं तब सरकार और उनके अधिकारी कोई कार्यवाही क्यों नहीं करते? वे किसी गम्भीर घटना होने तक प्रतीक्षा क्यों करते हैं? यह कहने से काम नहीं चलेगा कि वे किसी की आस्था पर आपत्ति नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? यदि संविधान आपको ऐसा करने की अनुमति नहीं देता तो क्या संविधान में संशोधन नहीं किया जाना चहिए? यदि शासन-प्रशासन मूर्ख्तापूर्ण आस्था को संरक्षण देते रहेंगे तो ऐसी घटनायें होती रहेंगी।

जो अतिबुद्धिजीवी, प्रगतिशील, वामपंथी और विपक्षी नेता ब्राह्मणों को समाज का शोषक, अंधविश्वास फैलाने वाले, पाखण्डी और हर तरह के अपराध के लिए उत्तरदायी मानते नहीं थकते उन्हें बाबा आसाराम बापू, बाबा राम रहीम, बाबा रामपाल और बाबा सूरजपाल सिंह जाटव जैसे चमत्कारी बाबाओं से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। 

शुक्रवार, 21 जून 2024

आधुनिक कविता का शिल्प और विषय

 

आधुनिक कविता की आधुनिकता

 

देश, काल और वातावरण वे भौतिक घटक हैं जिनसे साहित्य ही नहीं अपितु यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्रभावित होता है। भारत की विभिन्न भाषाओं में लिखी जाती रही कविताओं के साहित्यिक इतिहास को व्यवस्थित करने के लिये इन्हें विभिन्न कालखण्डों में वर्गीकृत करने का प्रयास किया जाता रहा है। यूँ तो हर कविता अपने कालखण्ड की आधुनिक ही होती है पर आधुनिक कविता नित्य-आधुनिक है। उत्तरछायावाद से प्रारम्भ होकर राष्ट्रवाद, गांधीवाद, विप्लववाद, प्रगतिवाद, यथार्थवाद, प्रयोगवाद और नवगीतवाद से होते हुये वर्तमान तक आज हम आधुनिक कविता के वर्तमान स्वरूप को देखते हैं।

 

आधुनिक कविता का शिल्प

कोई भी साहित्य अपने परिवेश से ऊर्जा लेकर चित्रित होता है। साहित्यकार अपने परिवेश की प्रतिध्वनि को चिन्हित कर अपनी निजी प्रतिक्रिया को व्यक्त करता है। यह साहित्यकार पर निर्भर करता है कि वह अपने परिवेश की प्रतिध्वनि को कितना, किस रूप में और क्यों चिन्हित करता है। वास्तव में साहित्यकार अपने कालखण्ड का एक इतिहास लिख रहा होता है जो सही, अपूर्ण, मिथ्या या विकृत भी हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि साहित्यकार की सत्य और समाज के प्रति निष्ठा कितनी और कैसी है। देश-काल-वातावरण का तत्कालीन परिवेश उसकी साहित्यिक ऊर्जा है जिसे वह शब्दों के परिधान से सुसज्जित करता है। वर्तमान काल की आधुनिक कविता ने स्वयं को काव्य के साहित्यिक एवं शास्त्रोक्त बंधनों से प्रायः मुक्त रखा है, यहाँ तक कि कुछ रचनाकारों ने तो गद्यात्मक काव्य की भी रचना की है। छंदमुक्त, अतुकांत और सीधे-सीधे प्रहार करने वाली अंबर रंजना की पेटीकोट शैली की कवितायें भी रची गयीं। भाषा में प्राञ्जलता के स्थान पर बोलचाल की भाषा को अपनाया गया जिसमें फ़ारसी, अरबी और अंग्रेजी के शब्दों की भरमार हुआ करती है। भाषा का यह वह तरल प्रवाह है जो वर्जनापूर्ण मर्यादा को लाँघकर अपने मार्ग में आने वाले सब कुछको स्वीकार करता हुआ चलता है। यहाँ हम कविता के शास्त्रोक्त स्वरूप के स्थान पर अगढ़, निर्बंध और स्वच्छंद स्वरूप के दर्शन करते हैं। वर्तमान कालखण्ड की आधुनिक कविता के शिल्प में स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता का कोई बंधन दिखायी नहीं देता। यही कारण है कि पेटीकोट शैलीकी कविताओं के राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रशंसक और समर्थक मिलते हैं जो अश्लील और सनसनीखेज कविताओं की सामाजिक स्वीकार्यता का स्पष्ट प्रमाण है।

प्रकृति और विकृति किसी चित्रकार या रचनाकार की तूलिका या लेखनी के विषय हो सकते हैं। कोई रचनाकार अपने उद्देश्य को प्रकृति और विकृति की मर्यादाओं में रहते हुये या मर्यादाओं से परे जाकर सार्थक करने का प्रयास करता है।   

 

आधुनिक साहित्य की विशेषतायें

आधुनिकता, वैश्विकता और वैज्ञानिकता को साहित्यविशेषज्ञ आधुनिक साहित्य की विशेषतायें मानते हैं। इस विषय में मेरा मत किंचत् भिन्न है। मुझे लगता है कि हर कविता अपने कालखण्ड की आधुनिक कविता होती है, उसमें वैश्विकता का न्यूनाधिक समावेश हो सकता है किंतु वैज्ञानिकता का समावेश तो हर कालखण्ड में अपेक्षित रहा है। यह बात अलग है कि कोई रचनाकार अपने परिवेश की प्रतिध्वनि को कितने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपनी कविताओं में अनूदित कर पाता है। भारत में साहित्य ही नहीं बल्कि गणित से लेकर दर्शन, रसायनशास्त्र, खगोलशास्त्र, ज्योतिष और चिकित्साशास्त्र जैसे सभी जटिल विषयों को पद्य में भी लिखे जाने की समृद्ध, अनूठी और अद्वितीय परम्परा रही है। स्वर और चित्र हर सभ्यता के प्रारम्भिक और अपरिहार्य घटक रहे हैं, कविता भले ही बाद में लिखी गयी हो परंतु गुनगुनाना तो आदिम मनुष्य का स्वभाव रहा है। आधुनिक कवितायें अतुकांत और गद्यात्मक हो सकती हैं किंतु उनमें भी लयबद्धता का होना ही उन्हें काव्य की श्रेणी में लाता है। नृत्य लास्य हो या तांडव, लयबद्धता तो उसमें होती ही है। मुझे तो आधुनिक कविता को स्वच्छंद कविता कहना कहीं अधिक उपयुक्त लगता है।      

 

कुछ और मिथक

कुछ साहित्यकार मानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों से भारत में आयी बयार के प्रभाव से भारत के लोगों ने जाना कि शिक्षा सबका अधिकार है। माना जाता है कि तत्कालीन समाज में आयी इस बयार ने आधुनिक कविता को भी प्रभावित किया जिसे बाद में प्रगतिशील प्रतिक्रिया के विभिन्न रूपों, यथा दलित कविता, नारी कविता आदि में देखा जाता रहा है। अर्थात् उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व भारत में शिक्षा को सबका अधिकार नहीं माना जाता था। इसे इस रूप में भी कहा गया कि भारतीय समाज में शिक्षा को केवल सवर्णों के अधिकार तक ही सीमित रखा गया, जिसके परिणामस्वरूप छुआछूत, शोषण और वर्गभेद आदि का जन्म हुआ जिसकी स्पष्ट प्रतिध्वनि प्रगतिशीलवादी आधुनिक कविताओं में सुनी जाती रही है। वास्तविकता यह है कि अठारहवीं शताब्दी के भारत में साक्षरता का मान शतप्रतिशत हुआ करता था। भारत में शिक्षा के अधिकार से स्त्रियों या सवर्णेतर लोगों को कभी वंचित नहीं रखा गया। इस तरह की जो भी वंचना दिखायी देती है वह विदेशी आक्रमणकारियों के भारत में शासनकाल के अनंतर होती रही है जिसके लिये भारत की जड़ों और प्राचीन परम्पराओं को दोषी नहीं माना जा सकता। प्रमाण के लिये सत्यान्वेषी जिज्ञासुओं को धर्मपाल रचित “The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century” का अवलोकन करना चाहिये। तथापि यह सत्य है कि पराधीनता के तत्कालीन समाज में आयी विकृतियों ने कई कुरीतियों और शोषण को जन्म दिया किंतु यह भारत की सांस्कृतिक सभ्यता का कभी अंश नहीं रहा।     

दूसरा मिथक यह है कि छायावादी कवितायें तत्कालीन समाज के प्रभाव से अछूती रहीं जिसके प्रतिक्रियात्मक परिणामस्वरूप प्रगतिवाद का जन्म हुआ। साहित्य का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कोई भी कविता अपने परिवेश से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकती। रचना का यह परिवेश तत्कालीन राजसत्ता की शासनव्यवस्था, उस कालखण्ड की आवश्यकताओं, रचनाकार की अपनी व्यक्तिगत क्षमता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे कई घटकों के जटिल संयोजन से निर्मित होता है। यदि कोई परिवेश किसी कवि की रचनाधर्मिता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तो उसकी कविताओं में सीधी प्रतिक्रिया के स्थान पर विचलन का होना स्वाभाविक है। यह विचलन, प्रभावित समाज को हताशा से बचाने का काम करता है। गोस्वामी तुलसीकृत रामचरितमानस, कवितावली और विनयपत्रिका इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।  

 

आधुनिक कविता के विषय

जिस देश की शासनव्यवस्था में अभद्रता, असभ्यता, कुतर्क और हठ को सहिष्णुता मानकर स्वीकार कर लिया जाता है, पूर्वजों का अपमान किया जाता है और भारतीय महापुरुषों की अश्लीलतापूर्ण आलोचना करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानी जाती है, ऐसे परिवेश की प्रतिध्वनि भी तदनुरूप ही होगी। इसीलिये आधुनिक कविता अपने परिवेश के हर अच्छे-बुरे विषय को स्पर्श करती हुयी चलती है। इसमें आर्तनाद है, शोषण है, शोषण के विरुद्ध गालियाँ हैं, विद्रोह की अग्नि है, क्रांति का ज्वार है, कुंठा से उपजी भड़ास है, कुंठित मानस का दैहिक आकर्षण है, वंचना के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। यहाँ विषयों का कोई बंधन नहीं, कोई एक लहर नहीं, हर तरह के विषयों पर रचनाकारों ने अपनी लेखनी चलायी है। यह बात अलग है कि इनमें से कौन से विषय कितने समय तक चल पाते हैं, कौन सी कविता कालजयी हो पाती है और कौन सी मूढ़गर्भ की तरह अकालमृत्यु को प्राप्त होती है।