बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई झरना....
रविवार, 6 सितंबर 2026
स्वर्णमूर्ति
गुरुवार, 3 सितंबर 2026
राजा सड़ा क्यों
यदा यदा हि धर्यस्य ग्लानिर्भवति भारत!
पढ़ा था
गुना नहीं
रोटी जली क्यों...
घोड़ा अड़ा क्यों...
सुनी थी कहावतें
कभी गुनी नहीं
इसीलिए कभी सीखा नहीं
कि जो बात-बात पर अड़ता है
वह कभी चलता नहीं
इसलिए फेरना आवश्यक है
रोटी, घोड़ा
और राजा भी।
हवायें ऐसी बहीं
कि बोझ बढ़ता गया
सूचनाओं का
मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर
इतना... कि
वह नहीं रख सका संबंध
विवेक और हृदय से...
मन तो पहले ही उड़ा ले गई थीं
उष्ण
पछुआ हवायें।
तिवारी परिवार जी उठा है फिर
मरा नहीं कोई
नीलमणि तिवारी का बेटा
चाय बेचने लगा है
और बेटी
पकौड़े तलने लगी है
गर्व है योजनाकारों को
कि देश की प्रति व्यक्ति आय
बढ़ने लगी है।
अपराधी से सारथी बने लोग
देश के स्वामी बन गये हैं
और उनके नौनिहाल
पढ़ने लगे हैं
सात समंदर पार
गोरों के देश में,
लौट कर आएँगे जब
शिक्षा मंत्री बनेंगे भारत के
और कहेंगे
बाबा साहब के दिए अधिकार से
पढ़ सका बाहर जाकर
वरना तुमने तो पीने नहीं दिया पानी
पाँच हजार साल से।
बधाई हो!
नीलमणि तिवारी को भी
मिल गई है नौकरी
दानापुर के सुलभ शौचालय में
सुदामा!
और कितनी प्रगति चाहिए तुम्हें!
बुधवार, 2 सितंबर 2026
विदाई
जो आया है सो जाएगा
तुम्हें भी जाना है
पर नहीं सोचा था
इस तरह जाना चाहते हो तुम
अपनी दुर्गति के साथ
गालियों, तिरस्कार और अपमान के साथ।
तुम नहीं झुके
जहाँ झुकना था
तुम झुकते रहे
जहाँ कभी नहीं झुकना था।
तुमने
सम्मान किया पोर्नगालियों का
तिरस्कार किया सम्मान का
भंजन किया भरोसे का
इसलिए
हमारे लिए तो
हर पल मरते रहे हो तुम।
थाली के बैंगन से
तुम लुढ़कते रहे
इधर से उधर और उधर से इधर।
निष्प्रभावी रहे
हमारे अनुनय, विनय,
अनुरोध और प्रशंसा...
तुम
स्वेच्छा से पिछड़ते गये
बड़े गर्व से गिरते गये
सामान्य से अतिदलित तक,
और घिरते गये
अपने ही शब्दों से
अपनी ही परिभाषाओं से।
ओढ़ते रहे खोखली रजाइयाँ
होते रहे आत्ममुग्ध
अपनी ही बनी उपाधियों से।
जन्मना हो तुम भी
हमारी तरह
अजन्मा
कैसे हो गये?
जाओ
हम विदा देते हैं तुम्हें
अब मत आना कभी
लौटकर
इस धरती पर।
शनिवार, 29 अगस्त 2026
सत्ता और संविधान
व्यापारी ने व्यापारी से युद्ध किया
व्यापारिक,
व्यापारी हारा, व्यापारी जीता
व्यापार की मृत्यु हुई।
व्यापारी ने दास बनाया
पूरे देश को
व्यापारी ने सत्ता संभाली
पूरे देश की
नाम रखा "ब्रिटिश इंडिया"।
फिर क्रांति के लिए बजी
रणभेरी
हिंसा हुयी
कुछ मारे गये
कुछ ताक में थे
अवसर की,
नाटक किया स्वतंत्रता संग्राम का
लिख लिया अपना संविधान
करते हुये अनुकरण
विदेशी संविधानों का
जिसमें नहीं होता कुछ भी
देशी।
सत्ता गई, सत्ता आई
पर क्रांति नहीं हुई
सत्ता परिवर्तन हुआ।
गोरों के चाबुक
ले लिए कालों ने,
पहले देश परतंत्र था
फिर प्रजा परतंत्र हुई।
व्यापार आज भी रहता है
सत्ता के केंद्र में।
सारी नीतियाँ
सारे विधान
सारी व्यवस्था
रहती है
व्यापार केंद्रित।
तुमसे छीने गये
तुम्हारे कुटीर उद्योग
छीना गया व्यापार
और थमा दिये गए
व्यापारिक दक्षता के नाम
बना कर जातियाँ
जो पिछड़ती गईं
खोती गईं अपना अस्तित्व
होते हुये रूपांतरित
वैश्य और शूद्र से
दलित
अतिदलित
और महादलित तक।
व्यापार
आज भी है
सत्ता के केंद्र में।
बड़े-बड़े प्रधानमंत्री
होते हैं नतमस्तक
सम्राट
रोटे शील्ड और
व्यापारी
वास्को द गामा और
शी जिन पिंग के समक्ष।
संविधान
लिखे जाते हैं
इन्हीं के लिए।
राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ और हिंदू
मोहन भागवत कहते नहीं थकते कि "हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवनशैली है"।
बृहस्पति आगम के अनुसार "हिमालय से हिंदमहासागर तक का भूभाग हिंदु-स्थान है"।
इस भूभाग के निवासी "हिंदुओं" की जीवनशैली, जीवनमूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं में मौलिक समानतायें होनी चाहिए। क्या सचमुच समानतायें हैं?
माना कि रिलीजन "धर्म" का पर्याय नहीं, और "हिंदू धर्म" जैसी कोई अवधारणा वेदों में नहीं है। पर "वैदिक धर्म" तो है न! कालांतर में यही वैदिक धर्म "सनातन धर्म" और "हिंदू धर्म" के नाम से लोकव्यवहार में जाना जाता रहा है। संघ धर्म को लेकर इतना हठी और अविवेकी क्यों है? हिंदू को यदि आप भौगोलिक परिचय मानते हैं तो स्पष्ट है कि भारत में केवल हिंदू समुदाय ही रहता है जिनमें से कई लोग वैदिक धर्म को नहीं मानते। तब वे क्या मानते हैं? वे "जो" मानते हैं उसे तात्विक दृष्टिकोण से धर्म नहीं, रिलीजन कहा जाता है। रिलीजन और धर्म के इस अंतर से स्पष्ट है कि विश्व में केवल दो ही समुदाय हो सकते हैं, एक धर्मपरायण और दूसरा रिलीजनपरायण। इन दोनों में कई असमानतायें हैं जिसके कारण उपद्रव दिखाई देते हैं। क्या हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध आदि जीवनशैलियाँ भारत में व्यवहृत नहीं हैं? तब "हिंदू" भौगोलिक परिचय और "हिंदू जीवनशैली" में समानता होनी चाहिए जो कि नहीं है। अर्थात भारत के कुछ लोग धार्मिक हैं और कुछ लोग धार्मिक न होकर रिलीजियस हैं, और इनमें परस्पर विद्वेष एवं प्रतिकूलताएँ भी हैं जिनके हिंसक परिणाम हम सब देखते और भोगते रहते हैं।
संघ और भाजपा के पास समावेशिता और समानता जैसे कुछ शब्द हैं जो एक नया बखेड़ा खड़ा करते हैं और हम अंततः समाज को असमाधान की स्थिति में ही पाते हैं।
संघ और भाजपा सत्य से भागकर एक स्वैच्छिक कल्पना को सत्य बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसने समाज में असमानता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन्हें स्वीकार करना होगा कि असमानता पूरे विश्व का सत्य है जिसे समाप्त नहीं, नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है।
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
पुराकथा भवितव्यता
पुराकथा यह है कि जब-जब धर्म की हानि (धर्म के अनुयायियों की संख्यात्मक और गुणात्मक न्यूनता) होती है तब-तब समाज में क्रूरता, अत्याचार और अपराधों की वृद्धि होती है। छोटे अत्याचारी भी बड़े अत्याचारियों से त्रस्त होने लगते हैं। हर कोई अभिमानी और स्वयं को ईश्वर मानने लगता है, ठीक हिरण्यकश्यप की तरह, नानबायोलाॅजिकल सा। यह वैचारिक और सामाजिक असंतुलन की पराकाष्ठा है जिसका अंत सुनिश्चत है। जगत के संचालन का यही कालक्रम (क्रोनोलाॅजिकल आॅर्डर) है, द सो काल्ड न्यू वर्ल्ड आॅर्डर। भारत सहित विश्व भर में व्याप्त इन सभी व्याधियों की यही प्रोग्नोसिस है।
रावण तो अपने काल का प्रकाण्ड विद्वान था, कई विषयों में पंडित, आविष्कारक और शोधकर्ता भी। किंतु उसके अहंकार ने उसे धर्मच्युत किया और फिर उसका अंत भी किया। रावण, दुर्योधन, ओट्टोमन साम्राज्य के सुल्तान आदि से लेकर ओसामा बिन लादेन तक हर अधर्मी का अंत होता रहा और हर युग का कुशासन अपने उत्तरकालीन सुशासन से स्थानापन्न किया जाता रहा। इस बार भी यही पुरानी कहानी अपनी पुनरावृत्ति के लिए नेपथ्य के गहन अंधकार में तैयार हो रही है। धर्म, जाति, वर्ग,भाषा आदि के आधार पर समाज को बाँटने और सत्ता हथियाने वालों का भी अंत होना ही है। परमशक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्थाई और अंतिम नहीं होता। तुम्हारा संविधान तो कदापि नहीं।
बड़े गर्व से तुम जो संविधान रचते हो, उसका उल्लंघन भी तुम्हीं करते हो, फिर छल करके उसमें संशोधन भी करते हो। जो सच्चे लोग तुम्हारे रचे संविधान के अनुरूप चलते हैं वे कष्ट भोगते हैं, जो तुम्हारे संविधान की प्रतिपल धज्जियाँ उड़ाते हैं वे ऐश्वर्य भोगते हैं। किंतु प्रकृति रचित अलिखित संविधान में कोई संशोधन नहीं होता, वह निर्दुष्ट है इसलिए अपरिवर्तनीय है। उसे हर किसी को मानना ही होगा।
प्रकृति और समाज का अपना पृथक धर्म होता है, जिसका पालन अनिवार्य है। कालक्रम से इसमें शिथिलता आती है पर वह स्थाई नहीं होती। जो प्रतिलोम हो जाता है उसे अनुलोम होना ही होता है। यह तुम्हारा रचित संविधान नहीं, प्रकृति का निर्दुष्ट और अक्षुण्ण संविधान है जो वैश्विक है, सनातन है, हर किसी के लिए सर्वोपरि है।
जिन्होंने हर तरह के पाप और क्रूरता को ईश्वर का आदेश प्रचारित कर निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता को ही धर्म कहना प्रारंभ कर दिया है, वे सब भी अपने अंत की ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति भी संतुलन साधने में लगी हुई है।
...तो क्या अनुकूल काल की प्रतीक्षा करें! नहीं, यह भी नहीं, कर्म करना भी प्राकृतिक धर्म का अपरिहार्य अंग है। हम गहन तिमिर में छटपटा रहे हैं, भोर होने तक प्रतीक्षा करनी होगी। तमस से ज्योति की ओर... ! यजन तो करना ही होगा न!
मंगलवार, 25 अगस्त 2026
जातीय समीकरण और सत्ता
-जातिवाद मुर्दाबाद! जातीय जनगणना जिंदाबाद
-जिसकी जितनी संख्या भारी (अंकसूची छोड़कर), उतनी उसकी भागीदारी (सत्ता और शासकीय सेवाओं में)!
-तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते मारने के लिए उनकी पहचान और संख्या का पता होना आवश्यक है, इसलिए जातीय जनगणना आवश्यक है।
-सत्ता और शासकीय सेवाओं में भागीदारी के लिए, गुणवत्ता नहीं संख्याबल चाहिए इसलिए जातिवाद का स्थायी होना आवश्यक है।
-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की बेटियों का शुद्धिकरण (यौनप्रक्षालन) करने और उनसे विवाह करने के लिए जातिवाद का होना आवश्यक है।
-तिलक-तराजू-तलवार को गालियाँ देने, उन्हें मारने-पीटने, उनकी हत्या करने और उन पर एस.सी. एस.टी. अपमान का आरोप लगाकर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि लेने और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमकी देने के लिए जातिवाद की खाइयाँ और भी गहरी करना आवश्यक है।
-ये सब समाज की नहीं, दूषित और भ्रष्ट सत्ता की आवश्यकतायें हैं। इसीलिए क्षतिपूर्ति राशि के आकर्षण को इस तरह परोसा जाने लगा कि एस.सी.एस.टी. एक्ट भारतीय जनता के लिए अफीम बन गया। उसकी पिन्नक सिर चढ़ कर ध्वजारोहण करती है। आरक्षित वर्ग के अपमान को तौलकर उसका मूल्य तय किया जाने लगा, ताकि धन से उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।
-अपमान की क्षतिपूर्ति! यह एक नयी अवधारणा है, नैतिकमूल्यों का मूल्यांकन धनराशि की संख्या पर आकर ठहर जाता है। उसकी इतनी ही गति है।
-सिंहासन तक पहुँचने और फिर उसे दृढ़ता से पकड़े रहने के लिए जातीय समीकरण का गणित लगाते रहना कूटनीतिज्ञों के लिए सरलतम मार्ग होता है।
-कूट/छल नीति का राजनीति से नहीं, अराजकता से संबंध होता है। यह बात उनकी समझ में अच्छी तरह आती है जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और श्रीराम के आदर्शों को सत्ता और समाज दोनों से निरंतर दूर रखा।