रविवार, 18 अक्तूबर 2020

एक पिटीशन, नो रिलीजन...

मोतीहारी वाले मिसिर जी इंसानी दुनिया के सभी लौकिक धर्मों को समाप्त कर दिये जाने के पक्ष में हैं । यह पहली बार नहीं है जब इस विषय पर उनसे हमारी गम्भीर चर्चा हुयी है । गोरखपुर वाले ओझा जी भी सदा की तरह उन्हीं के साथ खड़े दिखायी देते हैं । बल्कि आज तो उन्होंने एक कदम और आगे बढ़कर यहाँ तक कह दिया कि यदि आप शांति, स्वास्थ्य और सुख चाहते हैं तो आपको दुनिया के समस्त अत्याधुनिक संसाधनों से विरत होना ही होगा । मैंने जानना चाहा कि क्या वे विज्ञान और अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों को समाप्त कर दिये जाने की ओर संकेत कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा – “हाँ! मैं चाहता हूँ कि मनुष्य की मशीनों पर निर्भरता समाप्त हो और वह आत्मनिर्भर एवं पुरुषार्थी बने । हम एक नकारात्मक और पंगु सभ्यता के विकास की होड़ में लगे हुये हैं” ।

धर्म के वर्चस्व को लेकर दुनिया भर में पहले भी विनाशकारी युद्ध होते रहे हैं । आज हम पुनः आर्मीनिया और अज़रबैजान के रूप में क्रिश्चियनिज़्म और इस्लामिज़्म को आमने-सामने एक-दूसरे को तबाह करते हुये देख रहे हैं । धर्म की सुप्रीमेसी को लेकर होने वाले विवादों और युद्धों में धार्मिक ध्रुवीकरण होना इस बात का प्रतीक है कि हम किसी भी “इज़्म” को लेकर कितने दुराग्रही हैं । इस्लामिज़्म के पक्ष मे टर्की, पाकिस्तान और ईरान आदि देश अज़रबैजान के साथ खड़े हो चुके हैं । नागोर्नो-क़ाराबाख़ में कुछ मोर्चों पर आर्मीनियाई सेना को पीछे हटना पड़ा है । युद्ध के नियमों के विरुद्ध दोनों देश एक-दूसरे की बस्तियों पर घातक आक्रमण कर रहे हैं जिससे बड़ी संख्या में दोनों ओर के निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं । अज़रबैजान के सैनिक तो आर्मीनियाई सैनिकों के कटे हुये सिर लेकर वीडियो भी बना रहे हैं । यह धार्मिक उन्माद की क्रूर पराकाष्ठा है ।

मोतीहारी वाले मिसिर जी पहले भी कह चुके हैं कि – “कोई भी लौकिक धर्म कितना ही अच्छा क्यों न हो अपने जन्म के साथ ही विकृति की ओर चल पड़ता है । यह उसी तरह है जैसे कोई जीव जन्म लेने के बाद निरंतर बुढ़ापे और अनिवार्य मृत्यु की दिशा में यात्रा प्रारम्भ कर दिया करता है । भारत में भी धार्मिक उन्माद और धार्मिक वर्चस्व की होड़ एक विनाशकारी पथ पर निरंतर आगे की ओर बढ़ती जा रही है । इसे रोकना होगा अन्यथा महाविनाश को कोई भी रोक नहीं सकेगा ...और इसे रोकने का एक ही मार्ग है – सभी लौकिक धर्मों का अंत” ।

हमने मिसिर जी से पूछा कि क्या वे चीन का अनुसरण करने की बात कह रहे हैं तो उन्होंने कहा- “नहीं, हम स्केण्डेनेवियन कंट्रीज़ के नागरिकों की लौकिक धर्मों पर निर्भरता को अस्वीकार करने वाली सोच की बात कर रहे हैं” ।

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

आंदोलन – विकास के लिए नहीं, पिछड़ने के लिए...

आंदोलन होते हैं, आग लगायी जाती है, चक्का जाम किया जाता है, मारपीट होती है, गोलियाँ चलती हैं ...आंदोलनकारियों की माँग़ होती है कि उन्हें भी पिछड़ा, दलित, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में शामिल कर लिया जाना चाहिये ..क्योंकि आगे न बढ़कर केवल पीछे जाना उनका अधिकार है । कोपीनधारी और भिक्षुकवृत्ति विप्र विस्मित है ...जाट, गुर्जर, यदु जैसे न जाने कितने राजवंश के लोग आरक्षित होना चाहते हैं, सरकार की बैसाखियों पर चलने के लिए अपनी टाँगें लोड़ देने की गुहार कर रहे हैं ...उन्हें हर हाल में आरक्षण चाहिये । 

स्वाधीन भारत में आंदोलन होते हैं क्योंकि जाटों को आरक्षण चाहिये, पटेलों को आरक्षण चाहिये, गुर्जरों को आरक्षण चाहिये... सबको आरक्षण चाहिये । आंदोलन में क्रांति की धुन होती है, जनधन की हानि होती है, हम आगे बढ़ने के लिए नहीं बल्कि पीछे जाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं । हमें आरक्षण के बल पर सरकारी नौकरी चाहिये, कर्ज़ माफ़ी चाहिये, मुकदमे हटाये जाने चाहिये ...हमें सारी सुविधायें चाहिये ...आरक्षण की योग्यता पर ।

भरतपुर के नीरज गुर्जर शिक्षित नेता हैं, कैमरे के सामने अंग्रेज़ी में बोलकर अपनी योग्यता को फ़ोर्टीफ़ाइड करके पेश करने में दक्ष हैं और चाहते हैं कि सरकार उनके ऊपर पिछड़े होने की मोहर लगा दे । भारत के लोग अद्भुत हैं । राजवंश के लोग प्रजावंश के उत्तराधिकारी बन जाने के लिए अधीर हो रहे हैं । उन्हें संसद और विधान सभा की आरक्षण वाली सीट से टिकट भी चाहिये ....यानी राजवंश के लोगों को राजवंश में पुनः प्रवेश के लिए आरक्षण की बैसाखी चाहिये ।  

सरकार आरक्षण समाप्त नहीं कर सकती किंतु सरकारी संस्थान समाप्त कर सकती है । मोतीहारी वाले मिसिर जी सरकारी संस्थानों के निजीकरण का समर्थन करने लगे हैं ....क्योंकि इससे उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ने की सुनिश्चितता है ....और इसलिए भी कि तब सरकारी नौकरियों के अवसर और भी कम हो जायेंगे और निजी संस्थानों में नौकरियों के लिए लोगों को आरक्षण की योग्यता से मोहभंग हो जायेगा ।

 

सरकारी कम्पनियों का निजीकरण...

बस्तर में भी निजीकरण का विरोध हो रहा है क्योंकि नगरनार प्लांट से सरकार अपनी हिस्सेदारी समाप्त कर रही है ।

कई सरकारी बैंक निजी किए जा चुके हैं । मुम्बई का एक पोर्ट अदाणी समूह ने ख़रीद लिया है और रेलवे में निजी क्षेत्रों की हिस्सेदारी बढ़ रही है । अव्यवस्था और घाटे के केंद्र बन चुके सरकारी संस्थान समाप्त होने की चर्चा से ही आरक्षणप्रेमी लोग परेशान होने लगते हैं, वे चाहते हैं कि घाटे में रहने वाले सभी सरकारी संस्थान बने रहने चाहिये ।

सरकारी कम्पनियों के शेयर्स से दूर रहने की सलाह पर शेयर मार्केट के दलालों की मोहर सरकारी कार्यप्रणाली की वह जन्मकुण्डली है जिसका अध्ययन हमें दुःखी और निराश करता है ।

पाकिस्तान के डेढ़ सौ फ़ाइटर जेट तबाही मचायेंगे आर्मीनिया में...

टर्की, पाकिस्तान और ईरान वह तिकड़ी है जो केवल इस्लाम के नाम पर एकजुट होकर आर्मीनिया को तबाह कर देने के लिए परमाणुशक्ति का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकने वाली । भारत के जम्मू-काश्मीर को नागोर्नो-क़ाराबाख़ बना देने के लिए व्याकुल फ़ारुख़ अब्दुल्ला नामक एक आदमी तो पहले ही कह चुका है कि पाकिस्तान ने एटम बम ईद पर चलाने के लिए नहीं बना रखे हैं ।           


गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

गांधी जी की आत्मा के नाम एक खुला पत्र...

हे स्वर्गीय मोहनदास करमचंद गांधी जी !

खेद है कि मैं आपको नमस्ते या राम-राम नहीं लिख सकूँगा क्योंकि भारत में अभिवादन के ये शब्द भगवावाद और फासीवाद के प्रतीक हो गये हैं किंतु अस्सलाम वालेकुम या सलाम जैसे शब्द भी नहीं लिख सकूँगा क्योंकि हमारी भाषा में अभिवादन के भावसमृद्ध शब्दों का लेश भी अभाव नहीं है । अस्तु, मैं सीधे-सीधे अपनी बात लिख रहा हूँ, बुरा मत मानियेगा ।

यह सच है कि हमारी पीढ़ी ने उस समय तक जन्म न होने के कारण स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं दिया किंतु उस समय बोई गयी व्यवस्थायें पल्लवित-पुष्पित होकर आज हमें यह सोचने के लिए विवश करने लगी हैं कि किसी नागरिक के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में स्वतंत्रता का औचित्य क्या है ?

आपने अपने युग में हुये धार्मिक दंगों में नृशंस हिंसा का तांडव देखा है, हम अपने युग में होने वाले धार्मिक दंगों की हिंसा से उत्पीड़ित हो रहे हैं । यह एक सुस्थापित तथ्य है कि विदेशी आक्रमणकारी शासक बनकर भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करने के हर तरह के उपाय करते रहे हैं किंतु स्वतंत्रता के बाद भी इस प्रक्रिया पर विराम नहीं लग सका । उन्हीं विदेशी आक्रमणकारियों के वंशजों द्वारा भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करने और भारत की रही सही डेमोग्राफ़ी को पूरी तरह बदल देने के षड्यंत्र भारत में आज भी फलीभूत हो रहे हैं ।

हे गांधी जी की आत्मा जी ! हम आपको सूचित करना चाहते हैं कि आज की पीढ़ी को विरासत में जो भारत मिला है वहाँ (असम में) सरकारी सहयोग से चलने वाले दीनी तालीम वाले मदरसों को सामान्य स्कूलों में रूपांतरित किए जाने, क़ाफ़िर की लड़की को प्रेमजाल में फाँसकर धर्मांतरण किये जाने की घटनाओं का विरोध किये जाने और मुस्लिम शासन में मंदिरों को ढहा कर उनके स्थान पर बनायी गयी मस्ज़िदों को पूर्ववत सनातनी आराधना स्थल बनाये जाने की माँग करने से भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सेक्युलरिज़्म के संकटग्रस्त हो जाने के हो-हल्ला से परेशान होकर मुझे प्रायः आपकी याद आती रहती है । भारत में इस्लामिक हुक़ूमत लाने, पूरे भारत को धर्मांतरित करने और क़ाफ़िरों को काटकर फेक देने जैसी भयभीत करने वाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खुलेआम मिलने वाली धमकियों ने हमारा जीना दुर्लभ कर दिया है ।

हे गांधी जी की आत्मा जी ! यशपाल की मानें तो साल 1947 में बँटवारे के समय लाहौर में सिखों की लड़कियों के साथ होने वाले दुष्कर्मों की घटनाओं पर दिल्ली में शरणार्थी शिविरों के सिख प्रतिनिधि मण्डल को दी गयी आपकी सलाह मुझे भयभीत करती है इसलिए हम आपसे यह नहीं पूछेंगे कि भारत के सनातनी लोगों को अपनी प्राणरक्षा और सम्मान को बचाने के लिए क्या करना होगा ।

सम्प्रति, हम सनातनी लोग इस्लामिक स्कॉलर्स, मौलवियों, इस्लामिक एक्टिविस्ट्स और भारत विरोधी राजनेताओं द्वारा अपने ऊपर थोपे गये जिन विचारों और व्यवस्थाओं को मानने और स्वीकार करने के लिए विवश किये जा रहे हैं उनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं – 

-      भारतीय मदरसों में दीनी तालीम दिया जाना सेक्युलरिज़्म है किंतु भारत में कुम्भ का आयोजन भगवावाद, संघवाद, फासीवाद और हिटलरशाही है ।

-      मुस्लिम युवक का किसी क़ाफ़िर को दुश्मन मानना किंतु उसकी लड़की से प्रेम करके उसका धर्मांतरण करना और उससे निक़ाह करना शरीयत के अनुसार ज़ायज़ है किंतु किसी हिंदू युवक का किसी मुसलमान की लड़के से प्रेम करना सेक्युलरिज़्म के ख़िलाफ़ है ।

-      भारत में हजारों मंदिरों को ध्वस्त कर उनके ऊपर मस्ज़िद का निर्माण ज़ायज़ है जबकि इस तरह की मस्ज़िदों को पूर्ववत् मंदिर में रूपांतरित करने की माँग़ करना सेक्युलरिज़्म के ख़िलाफ़ है ।

यदि सेक्युलरिज़्म और गंगा-जमुनी तहज़ीब का यही अर्थ और उद्देश्य है तो निस्संदेह भारत की संस्कृति और सभ्यता को बचाये रख पाना असम्भव है, और हम इस तरह की किसी व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक क्रांति करने के लिए बाध्य हैं ।

स्वाधीन भारत में संविधान और क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते वक्तव्य...

इण्डिया में इण्डियन पीनल कोड की धारा 124-ए के विरुद्ध खुलेआम सार्वजनिक वक्तव्यों पर आमजनता, प्रबुद्धजनता, नेता, अभिनेता, साहित्यकार, अतिबुद्धिजीवियों और माननीय सुप्रीम कोर्ट की अद्भुत् ख़ामोशी मुझे हैरान नहीं, परेशान करती है । मुझे नहीं मालुम, इन वक्तव्यों पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी –

1-   “चीन के सहयोग से लद्दाख को भारत से खाली करवाया जाय”। – दिनांक 15.10.2020 को जी.न्यूज़ कार्यक्रम में पीडीपी के नेता मोहित भान का आह्वान ।

2-   “जम्मू-कश्मीर में धारा 370 फिर से बहाल करने के लिए चीन से सहयोग लेना चाहिये” । - दिनांक 12.10.2020 को जी.न्यूज़ के एक कार्यक्रम में डॉ. फ़ारुख़ अब्दुल्ला का वीडियो संदेश ।

 

-      हम हैं स्वतंत्र भारत के भयभीत सनातनी नागरिक       

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

संविधान की शपथ लेकर संविधान पर वार...

आतंकवादी बनकर भारत पर हमला करने के कई ख़तरे हैं लेकिन बिना किसी ख़तरे के ...बल्कि भारत की शाही सुविधाओं का उपभोग करते हुये भारत के विरुद्ध षड्यंत्र करने और भारतीय संविधान से विश्वासघात करने का एक शाही तरीका भी कुछ लोगों ने ईज़ाद कर लिया है । यह एक क़माल का तरीका है जिसमें शिकार ख़ुद अपने शिकारी की रक्षा करने के लिए विवश होता है और बारम्बार शिकार होता रहता है । इस तरीके को स्तेमाल करने के लिए किसी भी तरह भारत की संसद में सदस्य की हैसियत पाना होता है या महज़ एक अलगाववादी नेता बनना होता है । भारतीय संसद का सदस्य बनने के बाद भारतीयों की कमाई से शाही ज़िंदगी जीते हुये और भारत सरकार द्वारा उपलब्ध करायी गयी सुरक्षा सुविधाओं का उपभोग करते हुये पाकिस्तान जाकर भारत की सरकार को गिराने के लिए निवेदन करने या कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए चीन की मदद लेने की इच्छा प्रकट की जा सकती है ।

एक सांसद रहते हुये डॉक्टर फ़ारुख़ अब्दुल्ला का चरित्र हमेशा ही भारत विरोधी रहा है । यह आदमी भारत की संसद में भारत के एक संसदीय क्षेत्र का सम्माननीय प्रतिनिधि है किंतु भारत की संसद द्वारा लायी गयी एक व्यवस्था के विरुद्ध चीन का सहयोग लेने की बात करता है और जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करके एक अलग रियासत बनाने के लिए पाँच अगस्त 2020 को लंदन या वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन में सम्मिलित न हो पाने से दुःखी होता है । यह आदमी भारत की संसद का सदस्य है किंतु केवल अपनी मज़लूम क़ौम के लिए चिंतित होने की बात कहता है भारत के लिए नहीं । यह आदमी डॉक्टर है और उसका मानना है कि उसकी “मज़लूम क़ौम के लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतान को पकड़ लिया है”, उन लोगों का “अल्लाह में पक्का ईमान नहीं है” । यह आदमी “अल्लाह का दामन थामकर” अपनी “क़ौम को मुश्किल से निकालना” चाहता है । भारत का नमक खाने वाले इस आदमी का ख़याल है कि जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्य धारा से जोड़ने की नयी व्यवस्था से उसकी मज़लूम क़ौम मुश्किल में आ गयी है ।      

और सबसे क़माल की बात तो यह है कि डॉक्टर फ़ारुख़ अब्दुल्ला नामक ज़हरीले आदमी के भारतविरोधी कृत्यों को देशद्रोह मानना एक ग़ुस्ताख़ी है,यूँ वह बात अलग है कि पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री और पी.ओ.के. के वज़ीर के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला दर्ज़ करवा देना वहाँ की सियासत के लिए बहुत मामूली सी बात है ।

          ...तो मैं ख़ुशी-ख़ुशी यह ग़ुस्ताख़ी करना चाहता हूँ और भारत के एक ज़िम्मेदार नागरिक की हैसियत से डॉक्टर फ़ारुख़ अब्दुल्ला नामक आदमी पर सांसद रहते हुये भारत के विरुद्ध चीन की मदद लेने का मंसूबा रखने के ज़ुर्म में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ करने की माँग़ करता हूँ ।

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

धर्म-युद्ध का तेरहवाँ दिन...

उठाकर अपना सिर

देखता है एक बच्चा

आसमान में उड़ते युद्धक विमान ।  

भर जाता है गर्व से

भूख से बिलबिलाता छोटा सा बच्चा

सोचता है  

कर ली है कितनी तरक्की

उसके मुल्क ने!

 

होते ही विमान के ओझल

वह फिर माँगने लगता है

भीख

फैलाकर अपने नन्हें हाथ

दे दाता के नाम तुझको अल्ला रक्खे...।

युद्ध

जिस दिन होगा

मर जायेगा यह बच्चा

उड़ जायेंगे हवा में

ज़िस्म के कतरे कतरे 

किसी क्लस्टर बम के गिरने से ।

मर जायेंगे

बहुत से सैनिक

बहुत से परिंदे,

रहेंगे जीवित 

केवल वे

जिन्होंने शुरू की थी जंग ।

बैठेंगे फिर

एक ही टेबल पर

करेंगे 

एक समझौता वार्ता  

और फिर करेंगे हुक़ूमत

अपनी-अपनी रियाया पर ।

2-

महासंहारक हथियारों के

इस ज़ख़ीरे पर

इतराते समय

कितने बेशर्म

और ग़ुस्ताख़ हो जाया करते हो तुम

धूर्त!  

मेरे ख़ून-पसीने की ताक़त को

कितनी चतुरायी से

छिपा लिया है तुमने

इस ज़ख़ीरे के भीतर । 


आर्मीनिया में भी है एक जम्मू-कश्मीर

टर्की एक धर्मनिरपेक्ष देश है

...जहाँ चौहत्तर फ़ीसदी लोग सुन्नी मुसलमान हैं,

...जहाँ की शीर्ष अदालत एक बहुत पुरानी चर्च को मस्ज़िद में तब्दील कर देने का हुक़्म देती है ।

...जहाँ की सेना और हथियार ईसाई बहुल आर्मीनिया पर कहर ढाने के लिये अज़रबैज़ान के लिए उपलब्ध हैं ।

अफ़ीम की खेती...

अफ़ीम की खेती करने के लिए गांधारी के मायके जाने की आवश्यकता नहीं है । दुनिया भर के इंसानों के उपजाऊ दिमाग अफ़ीम से भी अधिक नशीली अफ़ीम पैदा कर सकते हैं । धर्म को अफ़ीम की संज्ञा देने से परेशान होने वाले लोगों को यह समझना होगा कि मानवधर्म के अतिरिक्त अन्य जितने भी मानवरचित धर्म हैं वे वास्तव में राजनीतिक षड्यंत्र के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं ।

धर्मनिरपेक्षता की म्यान में धर्मांतरण  की तलवार...

भारतीयों को वर्षों से यह समझाया जाता रहा है कि दुनिया के सारे धर्म बहुत अच्छे हैं इसलिए धर्मांतरण एक बहुत पुण्य का काम है । भारतीय यह मान लेते हैं कि सभी धर्म अच्छे हैं इसलिए अपना पारम्परिक धर्म त्याग कर किसी विदेशी धर्म को स्वीकार कर लेना ही धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता का प्रमाण है ।

टर्की एक धर्मनिरपेक्ष देश है जो ईसाई बहुल आर्मीनिया के विरुद्ध ईसाइयों को तबाह करने के लिए अज़रबैज़ान जैसी इस्लामिक शक्तियों के पक्ष में खड़ा दिखायी देता है । अज़रबैज़ान की ओर से आर्मीनिया के विरुद्ध लड़ने के लिए जंग में कूद पड़ी ईरानी सेना ने दुनिया को एक संदेश दे दिया है कि युद्ध यदि ग़ैर इस्लामिक मुल्कों से हो तो शिया और सुन्नी अपनी सारी दुश्मनी भूलकर एक हो जाया करते हैं ।

1917 से 1923 तक चली बोल्शेविक क्रांति के बाद नव ग़ठित कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन में भी केवल एक ही पॉलिटिकल धर्म माना गया । ध्यान देने की बात यह है कि क्रिश्चियन और इस्लाम जैसे धर्मों को सोवियत यूनियन की सरकार भी समाप्त नहीं कर सकी । कम्युनिस्ट शासन के दौर में भी मानव निर्मित सभी धर्म बने रहे और सोवियत यूनियन के टूटते ही दबे-ढके रहे धार्मिक विद्वेष का नशा अपने चरम पर आ गया जो नागोर्नो-क़ाराबाख़ के रूप में आज भी सुलग रहा है । धर्म को अफीम यूँ ही नहीं कहा गया । अज़रबैजान की सेना पिछले तेरह दिनों से आर्मीनिया के चर्चों पर हमले करके उन्हें नेस्तनाबूद कर रही है, ...और हम कहते हैं कि सभी धर्म अच्छे होते हैं, …जबकि दुनिया में सर्वाधिक ख़ून-ख़राना धर्म के कारण ही होते रहे हैं ।       

आर्मीनिया में भी है एक जम्मू-कश्मीर...      

आर्मीनिया के नागोर्नो-काराबाख़ और भारत के जम्मू-कश्मीर का दर्द बहुत कुछ एक जैसा है । अज़रबैजान का एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान की तरह आर्मीनिया की सीमाओं के अंदर एक छोर पर ईरान और टर्की की सीमाओं को स्पर्श करता है जबकि नागोर्नो-क़ाराबाख़ की स्थिति ठीक जम्मू-कश्मीर जैसी है जिसका कुछ हिस्सा अज़रबैजान ने कब्ज़ा करके रखा हुआ है और कुछ हिस्सा आर्मीनिया के साथ है ।    

            एक समय था जब सोवियत-आर्मीनिया(ईसाई बहुल), सोवियत-अज़रबैजान (मुस्लिम बहुल) और नागोर्नो-क़ाराबाख़ (ईसाई बहुल क्षेत्र जो सोवियत-अज़रबेजान प्रांत द्वारा शासित हुआ करता था) आदि सभी क्षेत्र सोवियत यूनियन के अंतर्गत हुआ करते थे । सोवियत यूनियन के बिखराव के समय जब आर्मीनिया और अज़रबैजान दो स्वतंत्र देश बने तो ईसाई बहुल क्षेत्र नागोर्नो-क़ाराबाख़ ने आर्मीनिया के साथ जाने का फ़ैसला किया किंतु अवसर देखकर मुस्लिम बहुल अज़रबैजान ने नागोर्नो-क़ाराबाख़ के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर उसे पीओके बना लिया जबकि नागोर्नो-क़ाराबाख़ का शेष हिस्सा आर्मीनिया के साथ जाने में सफल हो गया जिसे अज़रबैजान ने मानने से इंकार कर दिया । तबसे यह विवाद आर्मीनिया का एक नया जम्मू-कश्मीर हो गया है । आर्मीनिया भारत की भूमिका में है जबकि अज़रबैजान पाकिस्तान की भूमिका में । इसीलिये कश्मीर न ले पाने के मलाल से दुःखी पाकिस्तान ने अज़रबैजान के पक्ष में खड़े होकर आर्मीनिया को नेस्त-नाबूद करने के लिए अपनी सेना भेज दी ।   

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

मोतीहारी वाले मिसिर जी की डायरी का एक पन्ना...

राष्ट्रीय परिदृश्य...

बद-तमीज़ हम तब भी थे जब लाखों साल पहले पूर्ण गँवार थे, बद-तमीज़ हम आज भी हैं जब पूर्ण शिक्षित हो गये हैं ।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य...

ख़ून बहाने के लिए हम तब भी आमादा रहा करते थे जब असभ्य थे, ख़ून बहाने के लिए हम आज भी आमादा रहते हैं जब सभ्यता के शिखर पर हैं ।

टीवी डिबेट्स...

आदमी आदमी को देखते ही कितना बेशऊर और वैचारिक रूप से हिंसक हो उठता है, यह जानने के लिए आप देख सकते हैं भारतीय टीवी चैनल्स पर सम्भाषा परिषदों में होने वाली डिबेट्स ।

टीवी डिबेट्स का एकमात्र सिद्धांत...

न श्रुणुतव्यं न मंतव्यं वक्तव्यं तु पुनःपुनः ( मैं न तो तुम्हारी बात सुनूँगा, न किसी बात पर विचार करूँगा बल्कि पुनःपुनः बोलता ही रहूँगा)  

कितनी आशा...

टीवी डिबेट्स के लिये आमंत्रित राजनेताओं, राजनीतिक विश्लेषकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विचारकों, और धार्मिक स्कॉलर्स की अनियंत्रित परिषदों में एक-दूसरे को चीख-चीख कर चुनौती देने वाले आक्रामक वृत्ति से परिपूर्ण स्वयम्भू नायकों को देख कर सोचता हूँ कि आम जनता को ऐसे असामाजिक लोगों से अपने समाज और देश के कल्याण की क्यों और कितनी आशा करनी चाहिये ?

युद्ध के नियम...

आज, जब कि हम सभ्यता के उत्कर्ष पर हैं, युद्ध के सारे नियमों को तोड़ते हुये युद्ध करना ही युद्ध का नया नियम बन गया है । भले ही इस नियम को कोई भी देश मान्यता न दे किंतु परम्पराओं को तोड़ कर परिवर्तन करने वाले कभी किसी मान्यता की परवाह नहीं किया करते, वे इसे ही क्रांति कहकर इतराते और आत्ममुग्ध हो जाया करते हैं । बस्तर में माओवादियों द्वारा एम्बुश लगाकर हत्या करने के बाद शवों के ऊपर कूद-कूद कर नाचने और उन्हें जूतों से ठोकर मारने वाली परम्परा की पुनरावृत्ति आर्मीनिया-अज़रबैज़ान युद्ध में देखने को मिल रही है ।

ग़नीमत है...

सूखी नदी के किनारे खड़े सूखे पेड़ की एक डाल पर बैठे हीरामन तोते ने एक ठण्डी साँस ली फिर अपनी तोती से कहा – “ग़नीमत है कि परिंदों में इंसानों जैसी कई जातियाँ नहीं होतीं, कई धर्म नहीं होते वरना हम भी इंसानों जैसे ही महापापी, महाक्रूर और महादुष्ट हो गये होते” ।     

अँधियारा करने वाले उजियारों के ये ठेकेदार...  

-      एक-दो नहीं बल्कि एक दर्ज़न से अधिक महिलाओं का यौनशोषण करने वाले पत्रकार मोहम्मद ज़ावेद अकबर का हृदय परिवर्तन हुआ, देश के ग़रीबों का शोषण रोकने के लिए उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और विदेश मामलों के मंत्री बन गये । बंद पड़ी पुरानी डायरी के पन्ने एक दिन अचानक फड़फड़ाये । डायरी के पन्नों में दफ़न यौनशोषण के ज़िन्न ने अँगड़ाई ली, मी टू- मी टू हुआ, डिफ़ेमेशन ने कोर्ट में गुर्राहट भरी, लेकिन...

...लेकिन एक महल जो बड़ी मुश्किल से बनाया था और अभी ठीक से अपनी रौनक बिखेर भी नहीं पाया था ...खण्डहर हो गया ।  और अब तो खण्डहर का सारा किस्सा ही ग़ुम हो गया है ।

-      टीवी क्राइम शो इण्डियाज़ मोस्ट वांटेडके प्रोड्यूसर, एंकर और ब्यूरोक्रेसी टुडेके सम्पादक सुहैब इलियासी दूसरों के क्राइम उजागर करते-करते एक दिन ख़ुद भी क्राइम कर बैठे और अपनी पत्नी अंजू इलियासी की हत्या कर डाली । 

-      तहलका मैग्ज़ीन के मुख्य सम्पादक, पत्रकार, प्रकाशक और उपन्यासकार तरुण तेजपाल सिंह भ्रष्टाचार के विरुद्ध तहलका मचाते-मचाते यौनउत्पीड़न करके एक दिन ख़ुद भी तहलका बन गये । आज उस तहलके का धूमकेतु अंतरीक्ष में दूर कहीं ओझल हो चुका है ।

-      एक और यक्ष प्रश्न...

गरीब-गुरबा की भलाई और न्याय के लिए लड़ते-लड़ते मूक पशुओं का चारा खा जाने वाले के चेहरे पर शर्म की एक भी रेखा किसी ने देखी है आज तक?