गुरुवार, 26 मार्च 2026

देशप्रेम का प्रमाण और राष्ट्रनिर्माण

मुस्लिम नेता और विचारक प्रायः यह कहा करते हैं कि हमें किसी को अपने देशप्रेम का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन सांसद इकरा हसन ने सदन में अपने देशप्रेम का प्रमाण दे ही दिया, वह भी बिना किसी माँग या पृच्छा के ही। उन्होंने अयातुल्ला ख़ामेनेई की महानता की तुलना मोदी की ५६ इंच की छाती से करते हुये बता दिया कि ख़ामेनेई मोदी से श्रेष्ठ हैं। प्रकारांतर से इकरा हसन ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत के लिए मोदी नहीं, अयातुल्ला ख़ामेनेई उपयुक्त शासक है।

इधर मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि भारत में मुसलमानों के बिना हिंदुत्व नहीं, अर्थात् इस्लाम है तो हिंदुत्व है। क्या सचमुच हिंदुत्व के मूल में इस्लाम है? क्या सचमुच हिंदुत्व के सिद्धांतों को इस्लामिक दर्शन से ही पोषण प्राप्त हुआ है। क्या सचमुच पहले इस्लाम आया फिर सनातन आया अर्थात इस्लाम वैदिक काल से भी पहले अस्तित्व में आया! क्या अरब में इस्लाम के उदय के समय भारत में कोई धर्म या मानव सभ्यता नहीं थी! क्या ईसवी सन् ७१२ से पहले भारत में हिंदुत्व जैसा कुछ भी नहीं था! कुछ भी नहीं था तो क्या था! इस्लाम से पहले भारत में क्या कोई सभ्यता नहीं थी?
मैं भ्रमित हो गया हूँ, मोहन भागवत जैसा परमपूज्य जब कुछ कहता है तो विचार करना पड़ता है। हमने अभी तक जो सुना, जो पढ़ा और जो मंथन किया उसके अनुसार तो वैदिक सभ्यता और सनातन धर्म दुनिया के सबसे प्राचीन पदार्थ हैं,  ...क्या मैंने जो पढ़ा और सुना वह सब मिथ्या था!
मोहन भागवत यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता बल्कि राष्ट्रनिर्माण की बात करता है। परमपूज्य अवतारी पुरुष ने यह नहीं बताया कि राष्ट्रनिर्माण के लिए "आवश्यक" और "बाधक" तत्व क्या हैं।
हम पुनः इकरा हसन के भाषण पर आते हैं। मोहन भागवत जिस हिंदुत्व रहित राष्ट्रनिर्माण का उपदेश दे रहे हैं क्या उसके लिए भारत की सत्ता दिवंगत ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी को सौंप दी जानी चाहिए?

थोड़ा सा मुसलमान

कहानी संग्रह "थोड़ा सा मंटो" के बाद अब "थोड़ा सा मुसलमान" मेरी अगली पुस्तक का नाम हो सकता है।

जब आप भाजपा-कांग्रेस-सीपीएम के बंद कूपों से निष्ठापूर्वक बाहर निकलकर अपने स्व-भाव में प्रवेश करते हैं तो स्वयं को सर्वथा भिन्न पाते हैं। इस दृष्टि से मैं स्वयं को थोड़ा सा साम्यवादी, थोड़ा सा मुसलमान और बहुत सा सनातनी पाता हूँ। मुझे लगता है इस तरह हम सनातनी दर्शन के लौकिक स्वरूप का एक विहंगम परिदृश्य अपने सामने पाते हैं।
वर्षों पहले मैंने दुर्गा और सरस्वती पूजा के विकृत होते आयोजनों पर कुछ लेख लिखकर सांप्रदायिक टकरावों की आशंका को लेकर सचेत किया था। आज हम उन शंकाओं को सच होता देख रहे हैं। हमें अपने ही देश में अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों, उत्सवों और परंपराओं के लिए सरकारी सुरक्षा की आवश्यकता होने लगी है। जब देश में विभाजनकारी शक्तियाँ निर्भय हों, सांप्रदायिक आतंक के सामने सत्ता निर्बल हो, जनता सुषुप्तावस्था में हो तब ऐसे आनुष्ठानिक आयोजनों के लौकिकस्वरूप पर चिंतन करना आवश्यक हो जाता है।
आज मैं मूर्ति को लेकर उसके वैज्ञानिक महत्व के बाद भी इस्लामिक अवधारणा के साथ खड़े होने के लिए विवश हो रहा हूँ। विश्व भर में समय-समय पर मूर्तियों को जिस तरह तोड़ने और उन्हें अपमानित करने की घटनायें होती रही हैं, उन पर मंथन किया जाना आवश्यक है। देवी-देवताओं से लेकर राजनैतिक व्यक्तियों तक की मूर्तियों के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किये जा सकते। मूर्तियाँ बनवाकर युगों तक अमर रहने के लोभ से अमिताभ बच्चन और मायावती जैसे लोगों को भी मुक्त होना चाहिए। विगत कुछ वर्षों में मार्क्स, स्टालिन, मुजीबुर्रहमान, भीमराव और मोहनदास की मूर्तियाँ भी कट्टरपंथियों के लक्ष्य पर रही हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से मैं मोहनदास का विरोधी रहा हूँ, पर जिस तरह उनकी मूर्ति के साथ किशोरवय बच्चों द्वारा अश्लील और अपमानजनक व्यवहार प्रदर्शन किया गया है वह स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं मूर्तिनिषेध की इस्लामिक परम्परा के साथ स्वयं को बरबस ही खड़ा पाता हूँ। विरोध और घृणा प्रदर्शन के लिए मूर्तियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाना विचारों से बहुत आगे बढ़कर उनका भौतिक रूपांतरण है जो भीड़ को हिंसा के लिए उत्तेजित करता है। बस, यहीं पर मैं थोड़ा सा मुसलमान हो जाना चाहता हूँ। यदि हम मूर्तियों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो चौक-चौराहों पर उनकी स्थापना का क्या औचित्य!

बुधवार, 25 मार्च 2026

मणिपुर डायरी

सहृदयता का दण्ड

आदिवासियों का धर्मांतरण भारत की एक गंभीर समस्या रही है। यह सेवन सिस्टर्स की ही नहीं, असम, झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी ऐसी समस्या है जिसके सामने सरकारें तो नतमस्तक होती ही रही हैं, वे लोग भी नतमस्तक हुये हैं जो धर्मांतरण को अभी तक राष्ट्रांतरण मानते रहे हैं। विगत वर्षों में मणिपुर के आदिवासियों और धर्मांतरित हुये ईसाइयों के बीच हुए रक्तसंघर्ष ने देश-विदेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। 
धर्मांतरण की घटनाओं से व्यथित फ़िल्म निर्देशक सुजल मिश्र के मन में इस विषय को लेकर एक फ़िल्म बनाने का विचार तो पहले से ही था पर जब उन्होंने कुंभ मेले में माला बेचने वाली मोनालिसा को देखा तो उनके मन में स्लम डाॅग के पात्र झिलमिलाने लगे। बस, उन्होंने तय कर लिया कि उनकी नई फ़िल्म "डायरी आफ़ मणिपुर" की नायिका यही लड़की होगी। यह इतना सरल नहीं था, एक तो अशिक्षित ऊपर से भाषा और संवाद में कच्ची मोनालिसा को फ़िल्म के अनुरूप प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती थी। सुजल को लगा, वे एक अति साधारण लड़की को विशिष्ट बनाने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी उस बंजारा परिवार ने कभी नहीं की होगी। बस सुजल यहीं धोखा गये।
मोनालिसा की नई पारी फ़िल्म अभिनय ही नहीं बोली और भाषा जैसे प्रारंभिक बिंदुओं से भी प्रारंभ हुयी। सुजल को पल-पल चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
अंततः फ़िल्म पूरी हुयी तो सुजल उसका प्रमोशन उसी स्थान से करने के इच्छुक थे जहाँ से उन्होंने मोनालिसा को फ़िल्म के लिए लिया था। किंतु प्रयागराज प्रशासन ने निर्जन हो चुके संगम पर मात्र पंद्रह-बीस लोगों के एक दल को भी इसकी अनुमति नहीं दी। दूसरी ओर मोनालिसा भी बिना बताये ब्याह रचाने अपने प्रेमी के साथ केरल चली गयी। फ़िल्म का प्रमोशन नहीं हो सका। क्या योगी जी के भी राज में धर्मांतरण के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनायी गयी फ़िल्म का यही मूल्यांकन है!
सुजल पर वज्रपात तो तब हुआ जब धर्मांतरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म की नायिका स्वयं लव-जेहाद की शिकार हो गई। यह फ़िल्म के उद्देश्यों के विरुद्ध एक गहरा षड्यंत्र था। माओवादियों की समानान्तर जनतानासरकार की ही तरह एक अन्य समानांतर पटकथा एक ही मंच पर रची जाती रही। भीतर ही भीतर चल रही इस एक और अंतरकथा की लेश भी भनक सुजल को नहीं लग सकी। परिणामतः फ़िल्म प्रमोट होने से पहले ही अंतर्विवादों में फँस गयी।

केरल जाकर अपने प्रेमी से हाई प्रोफ़ाइल निकाह करके मोनालिसा ने ढोल बजाते हुये घोषित कर दिया है कि लव जेहाद एक अच्छी परंपरा है, यह भारतीय समाज में समानता, सांप्रदायिक स्वतंत्रता और भाईचारा स्थापित करने का उत्तम उपाय है इसलिए मणिपुर डायरी का कोई औचित्य नहीं।
मोनालिसा को इसी रूप में प्रोजेक्ट किया जाता रहेगा। यह लव जेहाद को प्रोत्साहित करने के लिए एक सुनियोजित और बहुत बड़ा षड्यंत्र है।
मोनालिसा! तुम एक साथ दो परस्पर  विपरीत भूमिकाओं को बड़ी कुशलता से निभाती रहीं। एक में अभिनय करती रहीं, और दूसरी में उसके ठीक विपरीत भूमिका को अपने जीवन के लिए जीती रहीं! मानना पड़ेगा, तुम्हें तो माताहारी होना चाहिए था।

शक्ति जब अनियंत्रित होकर विकृत होती है तो फिर वह किसी के लिए भी पूजनीय नहीं रह जाती, वह अपने परिवेश के साथ स्वयं को भी समाप्त कर लेती है।

इस बार बाबा भारती नहीं जीत सके, डाकू खड्ग सिंह जीत गया। बंजारिन लड़की के लिए सुजल के मन में उपजी सहृदयता का यही पारितोषिक है!
हमने मोतीहारी वाले मिसिर जी को पूरी कथा बताई तो कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने धनुषभंग की कथा सुनाते हुये इतना ही कहा - "जब परशुराम को श्रीराम के अवतारी होने का प्रमाण मिल गया और राम ने शरसंधान कर उसका लक्ष्य पूछा तो परशुराम ने उत्तर दिया था - हे प्रभु इस शर से मेरे पाप और पुण्य दोनों को लक्ष्य कर नष्ट कर दीजिए।"
सुजल को अपने कार्यों की श्रेष्ठता और उनके उद्देश्यों पर गर्व की अनुभूति थी। ईश्वर ने मोनालिसा के रुप में आकर सुजल को संदेश दे दिया कि अब परशुराम को पुनः अपने तप में लीन जाना चाहिए"।

सोमवार, 23 मार्च 2026

इनमें से कोई नहीं

जो विवेकी है 

वह करुणा से भरा है 

जो करुणा से भरा है 

वह उदार है

जो उदार है 

वह सहिष्णु है

जो सहिष्णु है 

वह शोषित है

जो शोषित है 

वह वंचित है

जो वंचित है 

वह सुदामा है।

ब्राह्मण

सौंप कर तुम्हें सत्ता

स्वयं सुदामा हो जाता है

जिस पर आरोप हैं 

कि उसने 

नहीं ढकने दिये तुम्हें स्तन

नहीं पीने दिया तुम्हें जल

नहीं लेने दिया तुम्हें ज्ञान

राज्याश्रित गुरुकुलों में।

ब्राह्मण 

अवाक है

भीग कर काँप रहा है 

आरोपों की वर्षा में,

भयभीत है

तुम्हारी धमकियों से।

राजा 

अट्टहास कर रहा है

देखकर दुर्दशा

सुदामा की।

हे राजाधिराज!

आप शक्तिशाली हैं

क्यों नहीं कर देते 

एक और हिंदूकुश

एक और उन्नीस नब्बे

एक और चितपावन नरसंहार

जी लेना फिर

जी भर 

ढककर स्तन

पीकर जल

और लूट कर सारा ज्ञान।

किंतु ध्यान रहे

ब्राह्मण मरता नहीं

क्षत्रिय हारता नहीं

वैश्य निरुपाय होता नहीं

और शूद्र अनुद्यमी होता नहीं।

तुम 

इनमें से कोई भी नहीं हो।

रविवार, 22 मार्च 2026

कब तक

युद्ध
कभी तो रुकेगा
पर कब?
बचाने महाविनाश
और अधिक होने से पहले
या उसके बाद?
महत्वपूर्ण है
व्यक्तिगत लाभ
और अहंकार से अधिक
तुरंत रोकना
इस महाविनाश को।
पहल जो भी करेगा
झुकने की
फलों से लदी डालियों की तरह
वही माना जाएगा महान।
भारत कहता है-
दृढ़ता तोड़ती है
मृदुता जोड़ती है
इसलिए प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए
कि कौन होगा पहले मृदु
और महान
इतिहास के पृष्ठों में ही नहीं
लोगों के हृदयों में भी।
अमेरिका तो नया है
पर बहुत पुरानी संस्कृतियाँ हैं
इज्रेल और ईरान की,
कोई नहीं चाहेगा
इन्हें खो देना
सदा के लिए
महाभारत युद्ध की तरह।

शनिवार, 21 मार्च 2026

अभियान घरवापसी

हिंदूराष्ट्र का सपना बेचने वाले डीएनए विशेषज्ञ मोहन भागवत मुसलमानों की घर वापसी की बात करते हैं। उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इंद्रेश कुमार ने दस लाख हिंदू कन्याओं को मुसलमानों से निकाह करने के लिए प्रेरित कर उन्हें मुस्लिम घरों में पहुँचा दिया। यह बात स्वयं इंद्रेश कुमार ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मार्च २०२६ में बताई। इंद्रेश का विचार है कि इस तरह हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम घरों में जाकर उन्हें बदल देंगी।

इंग्लैण्ड में शरणार्थी बनकर गये मुसलमानों ने अभी हाल ही में एक प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने नारा दिया- "अंग्रेजो इंग्लैंड छोड़ो"।
ईरान के कट्टरवादी सांप्रदायिक ख़लीफ़ा ख़ामेनेई की मृत्यु के बाद भारत के मुसलमानों ने स्वयं को भारतीय नहीं, ईरानी बताया और देश भर में रोते हुए प्रदर्शन किये। और यहाँ इंद्रेश को लगता है कि हिंदू लड़कियाँ मुसलमानों को बदल देंगी। इस बदलाव की प्रक्रिया और स्वरूप कैसा होगा यह इंद्रेश ने अविमुक्तेश्वरानंद को नहीं बताया।

सिकलिंग की घरवापसी
थैलेसीमिया की तरह सिकलिंग भी एक आनुवंशिक हीमोग्लोबिनोपैथी का परिणाम है जो अचिकित्स्य व्याधि है।
चिकित्सा विज्ञान मानता है कि गुणसूत्रीय क्रमिक न्यूनता के साथ इसे धरती से समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए सिकलिंग वालों को सामान्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) लोगों से विवाह करना चाहिए। सिकलिंग मेजर और माइनर (ट्रेट) के आधार पर ऐसे विवाहों की दो स्थितियाँ हो सकती हैं,अर्थात-
१. सिकलिंग मेजर + सामान्य = १००%सिकल सेल ट्रेट
२. सिकल सेल ट्रेट + सामान्य = ५०% ट्रेट और ५०% सामान्य।

यदि हर पीढ़ी के बच्चों के विवाह हर बार सामान्य व्यक्ति से होते रहें तो इस तरह कुछ पीढ़ियों के बाद सिकलिंग समाप्त हो जाएगा। यह एक गणितीय अनुमान है जिसमें ५०% बच्चे सामान्य और ५०% सिकलिंग ट्रेट के होंगे। किंतु एक्स-वाई के खेल इतने सीधे-सरल नहीं होते जितने वे गणितीय (सांख्यिकीय) विश्लेषण में दिखाई देते हैं। कोई नहीं जानता किसी जोड़े के कितने बच्चे होंगे और उनमें से कितने जीवित रहेंगे।
प्रांतीय सरकारें इस तरह के विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए धनराशि भी प्रदान करती हैं। यह लगभग वैसा ही है जैसा कि दो असमान रेखाओं को समान बनाने के लिए बड़ी रेखा को काट कर छोटी के बराबर कर देना। आम जनता के बीच सब कुछ उद्घाटित नहीं किया जा सकता अतः मैं यह नहीं बताऊँगा कि हीमोग्लोबिनोपैथी किन लोगों में होने की प्रायिकता होती है। जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से पृच्छा कर सकते हैं।
सिकलिंग रोगियों की घर वापसी का यह कार्यक्रम कितना सफल होगा, कोई नहीं जानता। यह भी सुनिश्चित नहीं है कि घरवापसी के बाद यह पुनः नहीं होगा। जिन परिस्थितियों में हीमोग्लोबिनोपैथी का जन्म हुआ था, यदि वैसी ही परिस्थितियाँ पुनः उत्पन्न हुईं तो क्या यह फिर नहीं होगा, इसका उत्तर वैज्ञानिकों के पास नहीं है।

इंद्रेश कुमार का मुसलमानों की घर वापसी का तरीका भी सिकलिंग की घर वापसी जैसा प्रतिलोम है, अनुलोम नहीं। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारी लड़की मुस्लिम घर में जाकर घर वापसी कैसे कराएगी? यह गंगा के प्रवाह को बंगाल की खाड़ी से गोमुख तक वापस ले जाने की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक कल्पना है। वर्षों पहले जो लोग मतांतरित हुये उन्हें हमारे घर आना चाहिए या जो मतांतरित नहीं हुये उन्हें मतांतरित घरों में जाना चाहिए? संघ के चिंतक अपने घर का पता या तो भूल गये हैं या फिर उन्होंने घर ही बदल लिया है।
भारत के लोगों ने मोहनदास को समझने में भारी भूल की और अब उनकी मृत्यु के बाद उनका स्थान मोहन भागवत, इंद्रेश कुमार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ले लिया है। तब एक गांधी था, आज उसके बहुत से प्रतिरूप हमारे बीच में हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2026

विकल्प

समाज के विघटनकारी ध्रुवीकरण के लिए जितने उत्तरदायी मोदी, मोहन भागवत और अमित शाह हैं, स्वयं हिंदू समाज भी उनसे कम दोषी नहीं है। भ्रष्टाचार से समझौता कर चुके हिंदू समाज ने मुस्लिम आतंकवाद से मुक्ति की आशा में कांग्रेस के विकल्प स्वरूप भाजपा पर विश्वास किया और उसके भक्त हो गये। मोदी प्रारंभ में तो अवश्य हिंदू राष्ट्र की बात करते रहे पर इसके बाद उन्होंने न केवल सवर्णविरोधी विषाक्त वक्तव्य भी दिये अपितु सनातनियों के सामान्य नागरिक अधिकार छीनने के षड्यंत्र भी करते रहे हैं, जिसके परिणाम स्वरूप सवर्ण इस देश का सर्वाधिक असुरक्षित, पीड़ित और वंचित समूह होता चला गया। हिंदूराष्ट्र की आशा में हम सब मोदी के विषाक्त भाषणों की अनदेखी करते रहे, हमारी भक्ति अपने चरम की ओर बढ़ती रही और मोदी हमारे समूल उच्छेदन के बीज बोते रहे। मोदी के विषाक्त भाषणों के बाद भी लगातार तीन बार हमने मोदी को देश की बागडोर सौंपी, पर कभी विकल्प के बारे में सोचा भी नहीं।

आप अपनी गाड़ी में एक वैकल्पिक चक्का रखते हैं पर लोकतंत्र के रथ में कभी किसी ने वैकल्पिक चक्के की आवश्यकता नहीं समझी। सावधान! किसी एक पर अतिनिर्भरता शोषण के कई द्वार खोलती है। मोदी और उनके मंत्रियों ने केवल उन लोगों की चिंता की जो देश को आगे ले जाना तो दूर सदा बाधक और विनाशक ही बने रहे, वह भी उन लोगों के शोषण और उत्पीड़न के मूल्य पर जो देश के विकास और समृद्धि के सदा से महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। यह केवल विकासकारी तत्वों की उपेक्षा का ही विषय नहीं है, अपितु उनके साथ घृणित अत्याचार और शोषण की क्रूरता का भी विषय है।
हिंदू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में हमने भोगा है -
विद्यालयों में हिंदू बच्चों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न, सांस्कृतिक चिन्हों और प्रतीकों के अपमान की बढ़ती घटनायें, मतांतरण का दबाव, प्रेमजेहाद, भूमिजेहाद, चिकित्सा जेहाद, सांस्कृतिक जेहाद...। हम भोग रहे हैं सर तन से जुदा की क्रूर घटनायें, हिंदू पलायन, खाद्य-पेय पदार्थों में थूक-मूत्र मिलाने की निरंकुश घटनायें, सवर्णों को जूते मारकर यूरेशिया भगाने की धमकियाँ, ब्राह्मण कन्यायों के यौनोत्पीड़न की घटनायें, सवर्ण होने के कारण मारपीट और हत्यायें, आरक्षण के नाम पर सवर्णों को बिना किसी निरीक्षण-परीक्षण के अपराधी मानकर कारागार में डाल देने वाले विधान के प्रस्ताव को न्यायसंगत सिद्ध करने के विनाशकारी हठ, प्रतिभापलायन की स्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए विविध उपाय.... सवर्ण यही सब देखने और भोगने के लिए विवश होते रहे हैं। भाजपा ने अपने राजनीतिक चरित्र से बारंबार प्रमाणित किया है कि हिंदू समाज को तोड़ने में वे कांग्रेस और सपा से भी बहुत आगे निकल चुके हैं। तथापि, यूजीसी रेगुलेशन बिल लाने के लिए मोदी जी और उनकी "यूजीसीसमिति" के लोग धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने सारी नैतिकताओं की लक्ष्मण रेखायें पार कर हिंदुओं को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अभी भी समय है, राष्ट्रवादी नागरिकों को भाजपा, कांग्रेस और सपा के विकल्प गठन पर गंभीरता से विचार करना ही होगा। हम किसी भी वर्तमान राजनैतिक दल पर भरोसा कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। सभी दल अरविंद केजरीवालसंप्रदाय और कांग्रेस का अनुसरण करने की प्रतिस्पर्धा में दौड़े चले जा रहे हैं। जब सत्ता निरंकुश होती है तो जनता को अपने दायित्व निभाने के लिए आगे आना होता है।