बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

सेमिनार



डॉक्टर्स का सेमिनार हो
सेमिनार सरकारी हो
काटने के लिए फीता हो
आमंत्रित अतिथि नेता हो
तो कहा जा सकता है
दावे के साथ
कि वहाँ होगा
वह सब कुछ
होना चाहिए
जो कभी नहीं
किंतु
नहीं होगा वह
किया जाता है आयोजित
जिसके लिए सेमिनार ।

अन्दर तक घुस चुकी हैं जड़ें
अलोकतांत्रिक लोकतंत्र की
ऐसे सुनियोजित सेमिनार्स में
जो सिर्फ़
अहम हिस्सा भर होते हैं
बौद्धिक षड्यंत्रों के
होता है जिनका
सीधा सम्बन्ध
नेताओं के विकास से
और
नेताओं के विकास का
भारत के दुर्भाग्य से ।


मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

देवी-देवताओं की मूर्तियाँ क्या हमारी जड़ता की प्रतीक हैं...





असीम की सीमा का यह कैसा प्रगतिवादी प्रश्न ?  


भारत ही नहीं, कुछ देशों को छोड़कर दुनिया भर के देशों में अपनी आस्था और मूल्यों के लिए प्रतीकों के निर्माण की और उनकी पूजा की परम्पराएं रही हैं । परम्परा और परिमार्जन दो परस्पर विरोधी तत्व हैं जो कई टकराहटों को जन्म देते हैं और जिनके कारण समय-समय पर दुनिया भर में मूर्ति पूजाओं का विरोध होता रहा है ।   
मूर्तियों के धार्मिक और व्यावसायिक महत्व को छोड़ दें तो भी मनुष्य जीवन के लिए उनका भावनात्मक, कलात्मक और मनोवैज्ञानिक महत्व रहेगा ही । थोड़ी देर के लिए हम देवी-देवता की मूर्ति को एक आकृति मात्र मान लें और आकृतियों के हमारे जीवन के लिए महत्व पर चिंतन करें तो स्पष्ट हो जायेगा कि यह एक अभिव्यक्ति से अधिक और कुछ भी नहीं है । अभिव्यक्ति को समाप्त नहीं किया जा सकता, उसके स्वरूप भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, वह मूर्ति न होकर गीत-संगीत हो सकती है, ड्रामा-नौटंकी हो सकती है, पेंटिंग हो सकती है, कोई इमारत हो सकती है, कोई पुस्तक हो सकती है, .... कुछ भी हो सकती है, यहाँ तक कि ट्रम्प की हुंकार और किमजोंग का हाइड्रोजन बम भी हो सकती है ।
सिन्धुघाटी, मिस्र, अरब और ग्रीस आदि की प्राचीन सभ्यताओं में भी अभिव्यक्तियों ने मूर्तियों, चित्रों, खेलों, नाटकों आदि के रूप धारण किए हैं । यह अभिव्यक्ति ही है जो ध्वनि, बोली, भाषा और अंत में लिपि के रूप में मूर्तमान होती है । आकृतियाँ तो रहेंगी, बनती रहेंगी, बिगड़ती रहेंगी । वे देवी-देवताओं की मूर्ति के रूप में हो सकती हैं, मनुष्य की अपनी ही प्रतिकृति के रूप में हो सकती हैं, मोनालिसा की मूर्ति हो सकती है, यहाँ तक कि मैडम तुसाद के म्यूज़ियम में अमिताभ बच्चन के रूप में या फिर लखनऊ के पार्कों में मायावती की आदमकद मूर्तियों और उनके हाथियों के रूप में भी हो सकती हैं ।
देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण और उनके व्यापार को लेकर एक बचकाना सा प्रगतिवादी व्यंग्य किया जाता है, जिसने मनुष्य को बनाया क्या मनुष्य उसे बना सकता है ? असीम की सीमा का यह कैसा प्रगतिवादी प्रश्न ?      


यह एक बौद्धिक प्रश्न नहीं हो सकता । प्रथमतः, भौतिक द्रव्य से निर्मित देवी-देवताओं की मूर्तियाँ ही भगवान या ईश्वर हैं, ऐसा किसी भी भारतीय दर्शन में उल्लेख नहीं किया गया है । भारतीय दर्शन तो परम सत्ता को निराकार, निर्गुण, अनादि और अखण्ड मानता है ।  
मूर्त ब्रह्म का जो अंतिम कारण है वह स्वयं में किसी का कार्य कैसे हो सकता है ? यह विज्ञान सम्मत भी है और आध्यात्म सम्मत भी । लोग जो बनाते हैं वह मूर्ति है, ब्रह्म नहीं । निराकार और निर्गुण को कौन बना सकता है ? यदि हम किसी कलाकार की बनायी मूर्ति को भगवान, ईश्वर या ब्रह्म मानने लगें तो हमारा दोष है, मूर्तिकार का नहीं ।