कभी-कभी
प्रकाश से अधिक
मुखर हो जाता है
अंधकार
किंतु केवल तभी
जब उसके पीछे हो
प्रकाश का
प्रबल संबल
किंतु
अंधकार
यह मानता ही कब है!
कभी-कभी
प्रकाश से अधिक
मुखर हो जाता है
अंधकार
किंतु केवल तभी
जब उसके पीछे हो
प्रकाश का
प्रबल संबल
किंतु
अंधकार
यह मानता ही कब है!
स्पेन से आॅस्ट्रेलिया तक
हर कहीं पहुँच चुके हैं
मोहम्मद-बिन-कासिम
फ्रांसीसी!
फ्रांस छोडो़,
ब्रिटिश!
ब्रिटेन छोडो़!
अमेरिकन!
अमेरिका छोडो़!
स्पेनिश!
स्पेन छोडो़!
सारी धरती
हमारी है
यही कहा है हमसे
हमारे अल्लाह ने
और आप कह रहे हैं कि
उन्हें कुछ नहीं मिलेगा
जो करते जा रहे हैं
गजवा-ए-हिंद
चरणबद्ध
दहाड़ते हुए।
कुछ भी तो नहीं है छिपा
जो हो अदृष्टव्य
किसी की भी दृष्टि से!
भारत और विश्व
जैसे-जैसे विराट कृष्ण विवर में निस्तेज होते सौर्यमण्डल और धूमकेतु समाते जा रहे हैं वैसे-वैसे उसकी शक्ति प्रचण्ड होती जा रही है। यह वह सत्य है जिसे जान लेने के बाद ऋषियों ने तमस से बाहर निकलकर ज्योति की ओर गमन करने का सुझाव दिया था। इसमें दो क्रियायें हैं – एक तो है तमस को छोड़कर तमस से बाहर निकलना और दूसरी है प्रकाश की ओर गमन करना। अर्थात् हमें तमस को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर, सही दिशा में गमन करना होगा।
दुर्भाग्य से पूरा विश्व ही तमस को पहचान ही नहीं पा रहा है, तो उसे छोड़ने की प्रक्रिया कैसे प्रारम्भ हो सकेगी! जेलेंस्की को विश्वास है कि वह रूस को झुका देगा, एलन मस्क को विश्वास है कि वह भारत के उद्योग को अपनी मुट्ठी में दबोच लेगा, जॉर्ज सोरोस को विश्वास है कि वह विश्व भर की राजनीति को अपने धन-बल से नचा सकता है, रोटेशील्ड को विश्वास है कि वही हर देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, डोनाल्ड ट्रम्प को विश्वास है कि वह जिसे चाहे उसे मूर्ख बनाकर उस पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है, इज़्रेल को विश्वास है कि वह इस्लामिक आतंक को समाप्त कर देगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश को विश्वास है कि वे भारत को इस्लामिक देश बना लेंगे, मोदी को विश्वास है कि भारत पर एकछ्त्र राज्य करने के लिये भारतीय समाज के टुकड़-टुकड़े कर देना ही एकमात्र प्रशस्त मार्ग है, भारतीय जनता को विश्वास है कि कोई आएगा जो धरती को स्वर्ग बना देगा स्वयं उसे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, तथाकथित दलितों को विश्वास है कि बिना तप किए ही सिद्धियाँ छीन लेना उनका अधिकार है, भारतीय विपक्ष को विश्वास है कि वे हिंसा और उपद्रव से भारत में सत्ता-परिवर्तन कर देंगे, … लोग अपने-अपने स्थापित विश्वास से चिपके हुये हैं। इसी स्थापित विश्वास को छोड़कर बाहर निकलने की आवश्यकता है। क्या ऐसा हो सकेगा? हाँ! हो सकेगा पर पूरी तरह नहीं, आंशिकरूप में होगा। यह भी एक ब्रह्माण्डीय सत्य है कि कुछ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। असंतुलित हो गये सत्य और असत्य में, तमस और प्रकाश में, ज्ञान और अज्ञान में… आनुपातिक परिवर्तन भर होता है अन्यथा ऋणात्मक और धनात्मक आवेश तो सदा ही रहते हैं। हर युग में असुरों के विरुद्ध सुरों को ही युद्ध करना पड़ता है।
आज की स्थिति में सुरों का लगभग अभाव सा है और असुर उन विषाणुओं की तरह शक्तिशाली हो चुके हैं जो किसी जीवित कोशिका में प्रविष्ट हो चुके होते हैं, उनके आकार को छोटा मान लेना बहुत बड़ी रणनीतिक भूल है। नेपाल को छोड़ दिया जाय तो ठीक यही स्थिति हम श्रीलंका और बांग्लादेश में देख चुके हैं। नेपाल में जो हुआ उसके परिणाम शल्यचिकित्सा के परिणाम की तरह दिखायी देने लगे हैं। भारत की जनता को तय करना है कि हम नेपाल बनने जा रहे हैं या बांग्लादेश?
नेपथ्य से...
उन्होंने झूठ गढ़े, झूठी कहानियाँ लिखीं, हमें अपना शत्रु प्रचारित किया और अब झूठी शत्रुता का प्रतिशोध लेने के लिए चारो ओर से आक्रमण प्रारंभ कर दिए हैं। यह संग्राम अब उनके वर्चस्व से बहुत आगे बढ़कर हमारे अस्तित्व की रक्षा पर आकर टिक गया है।
दृश्य एक-
नानबायोलाॅजिकल भगवान जी उवाच-
"अच्छाआआआऽ तुम हमें कुएँ से पानी नहीं भरने देते थे! अच्छाआआआऽ तुम हमारे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे! अच्छाआआआऽ तुम हमारी माँ-बहनों के साथ अत्याचार करते थे! बताओ, आज अगर उन्हें मौका मिल जाए तो कोई बदला लेगा कि नहीं! बताओ, लेगा कि नहीं लेगा!"
दृश्य दो-
नानबायोलाॅजिकल भगवान जी उवाच-
"अगर वार करना है तो मुझ पर वार करो, मेरे दलित भाइयों पर मत करो...!"
नेपथ्य से आती एक ध्वनि -
दोनों दृश्य देश की उन स्थितियों को हाईलाइट करते हैं जो विशुद्ध काल्पनिक और तथ्यविहीन हैं।
दृश्य तीन-
जेन-जी की अनियंत्रित और निरंकुश भीड़। पोर्नगालियों के नारे और गीत। अमर्यादित वेश-भूषा में लड़की बने हुये लड़के.. कामुकनृत्य करते हुए। विश्वगुरु बने भारत में परिवर्तन की चाहत लिए आंदोलनकर्ताओं के मुँह से झरती हुयी गालियाँ और केवल गालियाँ।
दृश्य चार-
दृश्य तीन पर धार्मिक ठेकेदार की प्रतिक्रिया - "पिछली तीन पीढ़ियों में आज की जेन-जी पीढ़ी सबसे बुद्धिमान पीढ़ी है। उनके प्रश्नों के उत्तर देने होंगे।"
नेपथ्य से उभरती एक ध्वनि - "गाली का उत्तर गाली में दे दें क्या? पर वह तो हमारा संस्कार नहीं है! आप दे सकते हैं, दे दीजिए।"
दृश्य तीन पर पंतप्रधान की प्रतिक्रिया -
"ये सब हमारे भटके हुए बच्चे हैं, मैंने उन्हें माफ़ कर दिया है। मैं इन पोर्नगालीबाज लड़कियों को अपने गले से लगाना चाहता हूँ।"
नेपथ्य से आती एक ध्वनि -
"जिन्हें लगाना चाहते थे गले, वे पड़ गये तुम्हारे गले। अब निपटो इनसे।"
नेपथ्य से आती एक और ध्वनि-
"तीन पीढ़ियों में सबसे बुद्धिमान पीढ़ी देश चलाने के लिए सत्ता परिवर्तन चाहती है, उनका स्वागत क्यों नहीं करते आप?"
नेपथ्य से आती एक और तुमुल ध्वनि -
जेजेजेजे जेऽऽऽऽऽऽ भीम!
अल्लाह-हू-अकबर...
भारत में रहकर भारत के विरुद्ध कुवैचारिक आंदोलन करना बहुत सरल हो जाता है यदि सत्ता भी भारत के विरुद्ध वातावरण तैयार करने की इच्छा से कूट क्रियाओं और षड्यंत्रों में लिप्त हो। मैं बात कर रहा हूँ स्वातंत्र्योत्तर भारत के अभारतीयकरण की, जिसमें पराधीनता युग की परम्पराओं, स्मृतियों, कुविचारों और दुष्प्रचारों को सुस्थापित किये जाने के सफल प्रयास किये जाते रहे।
जवाहरलाल ने प्रसादयुग की परिष्कृत हिंदी के स्थान पर फ़ारसी और अरबी मिश्रित हिंदी
बोली को प्राथमिकता क्यों दी, यह विचारणीय विषय होना चाहिए। उन्होंने इस्लामिक पराधीनता वाले भारत की राजशाही
बोली, जो कि तुर्क, फ़ारसी और मुगल शासकों
द्वारा विकसित की गयी बोली “उर्दू” थी, को भारत पर थोपने के लिये
जनता को प्रोत्साहित किया, जबकि अभिजात्य लोगों के बीच उन्हें
अंग्रेजी बोलना पसंद था। समृद्ध द्रविड़ भाषाओं के कारण यह काम दक्षिण भारत में सम्भव
नहीं था इसलिये उत्तर भारत पर ही उर्दू थोपी जाती रही। जवाहरलाल का वश होता तो तो
वे हिंदी को देवनागरी के स्थान पर फ़ारसी लिपि में लिखने की भी अनुशंसा करते। स्वतंत्र
भारत पर स्वतंत्र भारत के शासक के द्वारा यह प्रथम आक्रमण था जो भाषाहत्या के रूप में
था। बाद में हिंदी और द्रविड़ भाषायी विवाद को लेकर भी हिंसा होने लगी और दर्पण की
तरह भारत एक स्थान पर चटक गया।
साधारण जनमानस में स्वातंत्र्योत्तर भारत में भारत के भारतीयकरण की अपेक्षा की
गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ। पराधीनता की पीड़ादायी स्मृतियों को सम्मानित
करने के लिये भवनों, मार्गों, राजप्रासादों,
दुर्गों और अन्य राष्ट्रीय महत्व के स्थानों के नाम क्रूर और अत्याचारी
विदेशी शासकों के नाम पर ही जाने जाते रहे, जबकि इनमें से अधिकांश
स्थान भारतीय शासकों द्वारा निर्मित किंतु विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अपने अधिकार
में लिये हुये थे, उनके द्वारा निर्मित नहीं। भारत पर भारत की
स्वतंत्र सत्ता द्वारा पूरी धूर्तता के साथ किया गया यह दूसरा आक्रमण था जिसने भारत
की स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व की हत्या करने का प्रयास किया।
भारत पर स्वतंत्र भारत के शासकों द्वारा तीसरा आक्रमण शिक्षा के पश्चिमीकरण और
सनातन मूल्यों की हत्या के लिये किये जाने वाले विविध आक्रमणों के रूप में था जिसमें
रोमिला थापर जैसे लोगों द्वारा लिखी गई काल्पनिक कहानियों को इतिहास बताकर विद्यार्थियों
को परोसा जाता रहा । परिणामस्वरूप आज भारत की कम से कम तीन पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क
में भारत के प्रति घृणा और विद्रोह की भावना स्थायीरूप से घर कर चुकी है। इस घृणा
की जड़ों ने भारत की अपनी भाषा, स्थानीय बोलियों, संस्कृति,
सामाजिक मूल्यों और पूर्वजों के त्याग-बलिदान आदि में घुसकर उन्हें बुरी
तरह जकड़ लिया है। आज की तिलचट्टा पार्टी इसका एक ताजा उदाहरण है।
दर्पण अब कई स्थानों से टूट चुका है, दर्पण को तोड़ने के प्रयास
अनवरत चल रहे हैं। भारत ही नहीं, पूरे विश्व के लिये यह संक्रांतिकाल
है जिसमें हम सबको अपनी-अपनी भूमिकायें सुनिश्चित करनी ही होंगी।
तुम
हमें गालियाँ देते रहे
पीटते रहे
बलात उठा ले जाते रहे
हमारी बहनों-बेटियों को
देते रहे धमकियाँ
देश से भगाने की
हमारी बेटियों से ही नहीं
हमारे इतिहास से भी
करते रहे बलात्कार
लगाते रहे
हम पर ही मिथ्या आरोप
और हमें ही
ठूँसते रहे कारा में
न्याय के नाम पर
करते रहे अत्याचार
ऐसी ही अराजक,
अनियंत्रित
और अमानवीय घटनाओं की बाढ़ में
बहा होगा वह आर्यपथ
जिससे होकर आया-जाया करते थे
सभी वर्णों के लोग..
और विवश होकर
बना ली होगी दूरी
ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों ने...
राज्यपोषित
एक अत्याचारी वर्ग से।
तुमने इसे छुआछूत कहा
और हमें ही बना दिया
अपयश का भागी।
हर युग में रही है
"चित भी तेरी, पट भी तेरी।"