सोमवार, 27 जून 2022

“चुप्पी वाले दिन” - मालिनी गौतम, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन

         आज प्रस्तुत है भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित मालिनी गौतम के काव्यसंग्रह “चुप्पी वाले दिन” की ऑन लाइन समीक्षा में हुयी चर्चा पर एक चर्चा।  

“गिने-चुने लोग”

इतना बड़ा देश! इतने हिन्दीभाषी प्रांत, फिर भी साहित्यिक चर्चाओं-परिचर्चाओं में गिने-चुने लोग ही सम्मिलित होते हैं। मैं इस उपेक्षा से पीड़ित होता हूँ किंतु इस पीड़ा का स्त्रीपीड़ा या दलितपीड़ा से कोई सम्बंध नहीं है। यह पीड़ा हिन्दी साहित्य जगत की व्यापक पीड़ा है। यह कला की पीड़ा है, यह उस लेखन की पीड़ा है जो कहीं भी अंकुरित हो जाती है... कितनी भी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी।

मैं दो घटनाओं की चर्चा करना चाहूँगा। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में व्योमेश शुक्ल निर्देशित राम की शक्ति पूजाका मंचन था, मैंने चिकित्सालय से आकस्मिक अवकाश लिया, ऑन लाइन टिकट बुक करवायी, और बस्तर के दक्षिणी छोर से दिल्ली जा पहुँचा। प्रेक्षागृह पूरी तरह भरा हुआ था, बाद में पता चला कि दर्शकों में अधिकांश लोग थिएटर्स के छात्र और शिक्षक थे। 

कुछ वर्ष पहले हमारे नगर में एक अंतरराज्यीय नाट्य कार्यक्रम हुआ था। सरकारी कार्यक्रम में दर्शकों के बैठने की अच्छी व्यवस्था के बाद भी 20-22 गिनते-गिनते दर्शकों की गणना पूरी हो गयी। बाद में पता चला कि वास्तविक दर्शक मात्र 5-6 लोग ही थे, शेष दर्शक अगले नाटक के कलाकार थे। यदि पूरे नगर के केवल शिक्षक ही आ जाते तो कुर्सियाँ कम पड़ जातीं। मुझे किसी भी साहित्यिक या बौद्धिक कार्यक्रम में अपने नगर के शिक्षकों की अनुपस्थिति बहुत पीड़ित करती है। हमारे छोटे से नगर में कई विद्यालयों के अतिरिक्त एक विश्वविद्यालय, एक मेडिकल कॉलेज, एक इंजीनियरिंग कॉलेज, दो पॉलीटेक्निक कॉलेज, तीन-चार नर्सिंग कॉलेज, कई डिग्री कॉलेज, एक उद्यानिकी महाविद्यालय और एक कृषि महाविद्यालय है।

अंतरराज्यीय नाट्य कार्यक्रम में मात्र 5-6 दर्शकों की उपस्थिति ने मुझे झकझोर दिया। हमारे समाज का चिंतन, लोक के प्रति संवेदना, अनुभूतियों की क्षमता, चरित्र और अद्भुत उदासीनता का पीड़ादायी दृश्य हमारे सामने था। कार्यक्रम के अंत में मैंने कलाकारों से पूछा -1- दर्शकविहीन प्रेक्षागृह में अभिनय करने से कैसा लगता है? 2- आपको कैसा लगता है जब आप देखते हैं कि जिन दर्शकों के लिए आपने इतना परिश्रम किया है उन्हें ही इसमें कोई रुचि ही नहीं है? 3- आपका संदेश केवल 5-6 लोगों तक ही पहुँच सका, यह नाटक की असफलता है या समाज की? 4- क्या आपको नहीं लगता कि यह समाज कितनी गहरी नींद में है और उसे जगाने के आपके सारे प्रयास व्यर्थ होते जा रहे हैं?

दुःखी मन से उन्होंने जो उत्तर दिया उसमें और मालिनी जी के उत्तर में तनिक भी अंतर नहीं है। नृत्य, नाटक, कविता, संगीत... सब कुछ रचा जाता रहेगा, भले ही उन्हें देखने-सुनने वाला कोई न हो। सूरज रोज उगता रहेगा, भले ही किसी को उसके प्रकाश की आवश्यकता न हो।

और अब “चुप्पी वाले दिन” पर चर्चा से पहले एक बूस्टर डोज़ –

चुप्पी वाले दिन / होते हैं बहुत उष्ण / और स्पंदन से पूर्ण /

शब्दहीन ध्वनि करते ये दिन / बीज बोते हैं / क्रांति के / प्रतिसंस्कार के ॥

सड़क पर पड़ी प्लास्टिक की बोतलों ने देखे हैं /

कुछ सजे-धजे दिन / बहुत से चुप्पी वाले दिन /

किंतु स्पंदनशून्य नहीं ॥

कचरा बीनने वाले की निधि है / रिक्त और उपेक्षित बोतल /

जो ध्वनि करती रही / चुप्पी वाले दिनों में भी ॥

निश्चित ही किसी रचनाकार के लिए कविता की संप्रेषणीयता एक मर्मविज्ञान है। अनिल पाण्डेय पूछते हैं –आम आदमी की आवाज पर क्या अन्य लोग भी चिंतित होते हैं!”

इसका उत्तर बोल्शेविक क्रांति और फिर साम्यवादी सरकार के शासन में लेनिन और स्टालिन द्वारा किए गये नरसंहारों में खोजा जा सकता है। आम आदमी जब विशेष हो जाता है तब आम आदमी उसके लिए शत्रु हो जाता है। जाड़े की किसी रात को दिल्ली में यौनदुष्कर्म के बाद चलती गाड़ी से सड़क के किनारे नग्नस्थिति में लड़की को फेक देने वाले भी आम आदमियों के बीच से ही आते हैं और वे लोग भी आम आदमी ही होते हैं जो घटना का वीडियो बनाते हैं और फिर अपनी-अपनी राह चल देते हैं। पिछले वर्ष कर्नाटक में चिकित्सा छात्रा के साथ यौनदुष्कर्म के बाद जीवित जला देने वाले लोग न तो बहुसंख्यक थे, न ब्राह्मण और न विशिष्ट। हमारी संवेदनाओं के भोथरेपन की जड़ों पर भी एक कविता लिखी जानी चाहिये।    

मोतीहारी वाले मिसिर जी को लगता है कि पीड़ा को किसी वर्ग, जाति, समुदाय या किसी सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। पीड़ा तो कहीं भी उग सकती है। पीड़ा का आरक्षण उसकी स्वाभाविकता, तीव्रता और व्यापकता को समाप्त कर देगा। हाँ, यह अवश्य है कि अपनी-अपनी पीड़ा पर्वत से कम नहीं होती, वह पीड़ा ही क्या जो पर्वत न हो!

“वैवाहिक जीवन में लड़के कोरी स्लेट बनकर प्रवेश नहीं करते बल्कि लड़कियाँ करती हैं”। अजय तिवारी जी के इस कथन के सम्बंध में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि कई वर्ष पहले मध्य प्रदेश के एक विख्यात कन्या महाविद्यालय में नशा और देह-व्यापार को लेकर सर्वेक्षण किया गया था जिसके परिणाम बहुत चौंकाने वाले थे।

शोषक पुरुष ही हो यह आवश्यक नहीं, वह कोई भी हो सकता है, जिसके पास शक्ति का अवसर है वह पीड़क और शोषक हो सकता है। सास-बहू के सम्बंधों में पीड़क और पीड़ित दोनों ही स्त्रियाँ होती हैं। कलेक्टर भी पुरुष है जो हर सप्ताह पीड़क की भूमिका में रहता है और जिला स्तर के अधिकारियों को सबके सामने अपमानित करने में गर्व का अनुभव करता है। हम पीड़ा को सीमित या आरक्षित नहीं कर सकते। नूपुर शर्मा बहुसंख्यक वर्ग से हैं किंतु पीड़ित हैं, उन्हें धमकी देने वाले अल्पसंख्यक वर्ग से हैं किंतु पीड़क हैं। वर्चस्व की ललक हम सबके स्वभाव में है, हम स्वयं को संस्कारित कर समावेशी और उदार बनते हैं। यह काम कोई भी कर सकता है, आरजू काज़मी भी और मोतीहारी वाले मिसिर जी भी।

पीड़ित का पक्ष लेना उस न्याय की अपेक्षा करना है जो पीड़ित को मिल नहीं सका, और जिसे इंगित करना हर रचनाकार का लेखनधर्म है। आत्मकेंद्रित संवेदना की अपेक्षा व्यापक संवेदना महत्वपूर्ण है - अजय तिवारी जी की यह बात बहुत अच्छी लगी।

“पीड़ित व्यक्ति पीड़ा का प्रतिकार नहीं कर पाता” – अजय तिवारी जी।

बिल्कुल सही, किंतु पीड़ा केवल स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों और निर्धनों के हिस्से में ही नहीं होती है। पुरुष हो या बहुसंख्यक, वर्तमान में तो वे भी पीड़ित हैं, कौन पीड़क है उनका? बड़ी मछली छोटी को खाती है, फिर एक दिन बहुत सी छोटी मछलियाँ बड़ी मछली को भी खा जाती हैं। यह अवसर की बात है, हर कोई अपने अवसर को पूरी तरह दुह लेना चाहता है।     

अजय तिवारी जी के अनुसार “स्त्री की पीड़ा दमन की पीड़ा है। ...स्त्री कविता पीड़ा का वृतांत समझी जाती है”।

तिवारी जी! पीड़ा स्त्री की हो या पुरुष की उसका स्रोत दमन ही है।

विवेक निराला जी मानते हैं कि “समाज में धर्मनिरपेक्षता को समाप्त करने का प्रयास हो रहा है”। मिसिर जी मानते हैं कि यह तो अच्छी बात है, काश! ऐसा सचमुच में हो पाता! धर्म के प्रति इतनी नकारात्मकता के साथ कोई भी समाज सुखी और समृद्ध नहीं हो सकता। कई साल पूर्व अमेरिका के एक मनोचिकित्सक ने किशोरों और युवकों में एंजायटी और डिप्रेशन की बढ़ती घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए विद्यालय स्तर से ही बाइबिल का अध्ययन अनिवार्य किए जाने की आवश्यकता जतायी थी।

विवेक निराला जी इंगित करते हैं - “...विकास किसका हो रहा है! हाशिए पर आये लोगों की आवाज़ को सामने लाना होगा

निस्संदेह, विकास में कुछ लोग आगे हैं, कुछ लोग पीछे हैं। यह खो-खो का खेल है। वोट देना आपकी विवशता है, एक बार ये पार्टी अगली बार वो पार्टी.... यही क्रम अदल बदल कर चलता रहा है। ये पार्टी भी विकसित, वो पार्टी भी विकसित, यह भी चलता रहेगा। विकास की बात करना वह सीढ़ी है जो पार्टी के नालायकों के लिए विकास के मार्ग उपलब्ध करती है। यहाँ लायक है कौन? सुभाष चंद्र बोस लायक थे, उन्हें हाशिये पर खड़ा कर दिया गया, उनकी आवाज़ को कोई सामने नहीं ला सका।   

मिसिर जी बताते हैं कि अंतिम आदमी को कविता से कोई लेना-देना नहीं होता। वह कविता नहीं पढ़ता।

“...प्रेम निरपेक्ष नहीं होता, जीवन के अन्य संदर्भों से जुड़कर होता है।...जीवन के व्यापक यथार्थ के साथ प्रेम संदर्भित होता है। ...प्रेम की अभिव्यक्ति सम्वेदना की अभिव्यक्ति है” – अनिल राय

अनिल जी! प्रेम सुख और आनंद की अनुभूति है, वेदना तो वहाँ है जहाँ प्रेम का अभाव है। मोतीहारी वाले मिसिर जी प्रेम के लिए सम्वेदना के स्थान पर समानुभूति शब्द का प्रयोग करते हैं।

अदिति जी ने जिस कविता का उल्लेख किया उसकी धमक गज़ब की है –पौधे लगाएँगे/ फोटो खिचाएँगे/ फिर कभी देखने भी नहीं जाएँगे/ और एक दिन पशु सारे पौधे चर जाएँगे॥

वारिश प्रारम्भ होने ही वाली है। वनोत्सव की भी तैयारियाँ प्रारम्भ कर दी गयी हैं। फिर पौधे लगेंगे, फोटो खिंचेगी, कोई उन्हें देखने भी नहीं जायेगा, फिर एक दिन कोई ट्रीगार्ड ले जायेगा और कोई पशु अपने उदर धर्म का पालन करेगा। यह सब हर साल होता रहेगा, यानी हम यह धूर्तता, निर्लज्जता और दुष्टता हर साल करते रहेंगे। हम संवेदनाओं की बात करते हैं, जो कहीं नहीं है, इसीलिए चीन में भारी बाढ़ आ गयी, इसीलिए योरोप के जंगल धू-धू कर जल रहे हैं, इसीलिए हमारी रचनाएँ कालजयी नहीं हो पातीं!

अदिति जी कहती हैं कि “साहित्य वही कालजयी होगा जिसकी चिन्ताएँ बड़ी होंगी”। बिल्कुल यही बात तो मिसिर जी भी कहते हैं। चिंता होगी तभी तो समुद्र मंथन भी होगा।

रविवार, 26 जून 2022

चिकित्सा और इन्टीलेक्चुअल ब्लेस्फ़ेमी

         सनातन परम्परा के महर्षि मानते हैं कि प्राकृतिक सिद्धांतों के साथ तालमेल बनाये रखते हुये मानवकृत तकनीक के सहयोग से चिकित्सा प्रणालियों को उपादेय बनाया जाना चाहिये किंतु दुर्भाग्य से कम से कम भारत में तो ऐसा कर पाने में हम असफल ही रहे हैं। इस असफलता का विश्लेषण ऐसे कटुसत्य को उजागर करता है जो हमारी नैतिकता और वैज्ञानिक सूझ-बूझ पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है।   

टीवी पर धुआँधार बहस करने वाले बुद्धिजीवी इस बात पर कभी कोई प्रश्न नहीं पूछते कि ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एण्टीबायोटिक्स और तमाम नयी-नयी औषधियों की बाढ़ के बाद भी हम संक्रामक रोगों पर विजय पा सकने में समर्थ क्यों नहीं हो पा रहे हैं? फ़ैटीलिवर, ओबेसिटी, डायबिटीज-2, नेफ़्राइटिस, ओवेरियन सिस्ट, एन्जायटी, डिप्रेशन और पार्किंसोनिज़्म से लेकर स्किन-डिसीज़ेस एवं हेयर ग्रेइन्ग एण्ड फ़ालिंग जैसी समस्याओं में निरंतर वृद्धि के कारणों पर किसी को चिंतन करने की आवश्यकता क्यों नहीं लगती!

उच्च श्रेणी के विशिष्ट चिकित्साकेंद्रों को छोड़ दें तो शेष चिकित्सा व्यवस्था किसी भी निष्ठावान चिकित्सक को विचलित कर सकती है।

खाद्य तेलों को रिफ़ाइन करने की औद्योगिक चालबाजी का उपभोक्ता की बायोलॉज़िकल आवश्यकताओं से कोई सम्बंध नहीं होता। तेल को लम्बे समय तक ऑक्सीडाइज़्ड होने से बचाया जा सके, केवल इसीलिए उसकी प्रकृति को ही बदल देना इस वैज्ञानिक युग में एक अपराध क्यों नहीं माना जाता? अल्कोहलयुक्त औषधियों को काँच की बोतलें के स्थान पर प्लास्टिक की बोतलों में क्यों रखा जाना चाहिए? माँग में भरे जाने वाले विषाक्त सिंदूर को प्रतिबंधित कर हल्दी-चूने के रोचना के उपयोग के बारे में स्त्रियों को क्यों नहीं जागरूक किया जाना चाहिए? एक्सपायरी दवाइयों के फ़ार्मेकोलॉज़िकल सत्य को छिपाते हुये उन्हें नष्ट कर देने के मिथ्या पाखण्ड पर कोई वैज्ञानिक परिचर्चा क्यों नहीं की जानी चाहिए? अमेरिका की FDA for the Department of Defense द्वारा एलोपैथिक औषधियों पर किए गए Shelf Life Extension Program की रिपोर्ट्स पर सार्वजनिक बहस क्यों नहीं की जाती? आयुर्वेदिक औषधियों के लेबल्स पर एक्सपायरी तारीख लिखने का पुष्ट वैज्ञानिक आधार क्या है? क्या एक्सपायरी दवाइयाँ वास्तव में जानलेवा होती हैं या यह भी मात्र एक औद्योगिक चालबाजी है? इन विषयों पर चर्चा इसलिए नहीं की जाती क्योंकि ऐसा करने से निरंकुश आर्थिक लाभों पर अंकुश लग जायेगा, उपभोक्ता जागरूक हो जाएगा और अरबों रुपयों का तमाशा बंद हो जाएगा।

     अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा एलोपैथिक औषधियों के Shelf Life Extension Program पर किए गये शोध के परिणाम का सार यह है कि 1- औषधि निर्माता द्वारा एक्सपायरी तिथि लिखकर रोगी को सुनिश्चित किया जाता है कि फ़लाँ तिथि के बाद औषधि के उपयोग से लाभ होने की गारण्टी नहीं है। यह निर्धारित अवधि तक किसी औषधि की गुणवत्ता को सुनिश्चित करती है, न कि उसकी मारकता या विषाक्तता को। 2- यदि औषधियों की पैकिंग और रख-रखाव अच्छा हो तो एक्सपायरी तिथि के कई साल बाद तक औषधियों का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा सकता है। 3- कुछ औषधियों की कार्मुकता और प्रभावशीलता एक्सपायरी तिथि के बाद कम हो सकती है जिसे डोज़ बढाकर अपेक्षित लाभ के लिए प्रभावी बनाया जा सकता है। 4- पैकिंग खोल देने के बाद यदि औषधियों का उपयोग न किया जाय तो एक्सपायर हुये बिना भी कोई औषधि नमी आदि के कारण अनुपयोगी एवं हानिकारक हो सकती है। 5- तरल एवं इंजेक्टेबल औषधियाँ यदि अपना रंग बदल दें तो रासायनिक परिवर्तन के कारण वे कभी भी हानिकारक हो सकती हैं।  

पारिस्थितिकी हार रही है

         पर्यावरण और पारिस्थितिकी जैसे शब्द बौद्धिकभाषणों और पाठ्यक्रमों से निकलकर जब तक बाहर आएँगे तब तक सब कुछ बदल चुका होगा। विद्यार्थी इस विषय के प्रति गम्भीर नहीं हो पाते, वे केवल परीक्षा उत्तीर्ण भर करना चाहते हैं।

कुलाँचे भरती कौतुकीसभ्यता और संसाधनों की छीना झपटी के लिए होने वाले युद्धों ने पारिस्थितिकी को सर्वाधिक क्षतिग्रस्त किया है। चीन और अमेरिका जैसे “सभ्य माने जाने वाले असभ्य देश” पर्यावरण को प्रदूषित करने वालों में सबसे आगे हैं। इस दौड़ में भारत भी पीछे नहीं है। सिक्किम को छोड़ दें तो भारत का कोई भी प्रांत स्वच्छता के प्रति न तो जागरूक हुआ है और न गम्भीर। उत्तर के हिमांचल, उत्तराखण्ड और पञ्जाब तथा पूर्व के बंगाल, असम और मेघालय जैसे प्राकृतिकदृष्टि से रमणीय प्रांतों में भी स्वच्छता के प्रति उदासीनता कष्टदायी है। वह बात अलग है कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक बनावट कचरे को छिपाने का भरपूर प्रयास करती है।

मैदानी क्षेत्र के नगरों और महानगरों में साफ-सफाई के भरपूर नारों और गीतों के बीच अट्टहास करते कचरों के ढेर आज भी दिखायी देते हैं। कचरे के ढेरों को ढँक देने या स्थानांतरित कर देने से कचरा समाप्त नहीं हो जाता। मेरा आशय कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और पुनर्नवीनीकरण से है। जो लोग कचरे को आज भी नदियों के किनारे फेक रहे हैं या जला रहे हैं वे सारी योजनाओं और आदेशों को धता बताते हुये अपना व्यापार या नौकरी भर कर रहे हैं जिसके तरीके और मानक स्वयं उनके द्वारा तैयार किए जाते हैं। कस्बों से लेकर नगरों तक मांसविक्रेता जैव अपशिष्ट को कैसे नष्ट करते हैं, इसकी वास्तविकता को देखा जा सकता है। चिकित्सालयों में भी रंग-बिरंगे कचरे के डिब्बों की तब तक कोई सार्थकता नहीं है जब तक कि जैव-चिकित्सा अपशिष्टों को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट नहीं किया जाता। यदि सारा अपशिष्ट अंततः कचरे की गाड़ी में ही डाल देना है तो कचरों के इस दिखावटी सेग्रीगेशन से कौन सा उद्देश्य पूरा होने वाला है!

सरकारी आदेशों के अनुसार चिकित्सालयों के लिए जैवचिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन अनिवार्य है। चिकित्सालयों द्वारा सरकार को जैव अपशिष्ट प्रबंधन की जानकारी दी जाती है, किंतु यह बिल्कुल आवश्यक नहीं है कि सारी जानकारी सही ही हो। जैव-अपशिष्ट प्रबंधन एक ऐसा उपक्रम है जिसके लिए ईमानदारी से रिपोर्टिंग करके कोई अपनी नौकरी से हाथ नहीं धोना चाहता। जब नौकरी का एकमात्र उद्देश्य वेतन लेना हो और सत्य जब संकट को आमंत्रित करने वाला हो जाय तो झूठ के साम्राज्य को कोई चुनौती नहीं दे सकता।

गुरुवार, 23 जून 2022

सांस्कृतिक पाखण्ड

         धर्मनिरपेक्षता के पाखण्ड के बाद से जिन दो शब्दों को धूर्ततापूर्ण तरीके से भारतीय जनमानस के सामने परोसा जाता रहा है वे हैं “विविधता” और “साझीसंस्कृति”। इन शब्दों का भारतीय सनातन संस्कृति पर आक्रमण के लिए धूर्ततापूर्वक प्रयोग किया जाता रहा और हम सब दुष्टतापूर्वक की जाती रही विकृत व्याख्याओं को सुन-सुन कर आत्ममुग्ध होते रहे।

हमने न कभी “विविधता में एकता” को समझने का प्रयास किया और न “साझीसंस्कृति” को, किंतु यह प्रयास यदि अभी भी न किया गया तो भारत अगले कुछ ही दशकों में ईरान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, तुर्की और स्पेन आदि देशों की श्रेणी में खड़ा दिखायी देगा।

जब हम विविधता में एकता की बात करते हैं तो उसमें भारतीय उपमहाद्वीप की जीवनशैलियों और सांस्कृतिक तत्वों का ही समावेश किया जा सकना सम्भव है। इस विविधता में विदेशी जीवनशैली और सांस्कृतिक तत्वों का समावेश पूरी तरह अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। हम भारत में अलास्का या कनाडा की जीवनशैली का घालमेल नहीं कर सकते, उनके सांस्कृतिक मूल्यों और लोकपरम्पराओं का घालमेल नहीं कर सकते। किसी भी देश की जीवनशैली, लोकरीतियों और सांस्कृतिक विकास का धरातल वहाँ की भौगोलिक स्थितियों और पारिस्थितिकी से प्रभावित होता है। भारत में अलास्का या अरब को थोप कर विविधता में एकता का राग अलापना नितांत अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। प्रकृति की आवश्यकता यदि एकता वाली होती तो विविधता होती ही क्यों!

परस्पर विपरीत आदर्शों एवं आचरणों वाली जीवनशैली का घालमेल कैसे किया जा सकता है? मनुष्य और राक्षस की, देवता और दैत्य की या सुर और असुर की संस्कृतियाँ साझा नहीं हो सकतीं। यदि इन संस्कृतियों का साझा विकास हुआ होता तो इनमें टकराव और भिन्नताएँ होती ही क्यों!

हर देश और समाज की अपनी सांस्कृतिक विशेषता होती है, उसका विकास स्वतंत्ररूप से अपने उपादानों और तरीकों से होता है। कोई भी संस्कृति साझा हो ही नहीं सकती। हाँ! हम कुछ चीजों को अपनाते हैं, जो हमारी नहीं होतीं, किंतु इस तरह का समावेश ठीक वैसा ही नहीं होता, हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उनमें कुछ न कुछ रूपांतरण करते हैं। पूरी धरती पर ऐसा ही होता है। सभी देशों के लोग एक ही तरह से रोटी नहीं पकाते, एक ही तरह से नृत्य नहीं करते, एक ही तरह की भाषा का उपयोग नहीं करते, एक ही तरह की वेश-भूषा धारण नहीं करते,,,। बहुत कुछ है जो “एक सा नहीं” होता, यह “एक सा न होना” ही उस देश की सांस्कृतिक विशेषता है। हम दूरदेशीय किन्हीं दो सांस्कृतिक विशेषताओं का घालमेल कर ही नहीं सकते, जो किया जाता है वह बलपूर्वक होता है और उसे स्थानापन्न किया जाना कहते हैं। एक संस्कृति की हत्या कर दूसरी संस्कृति को स्थापित किया जाता है, यही होता है। जब तक यह पूरी तरह नहीं हो जाता तब तक हिंसा और संघर्ष होते रहते हैं। पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के आंतरिक हिंसक संघर्ष हमारे सामने हैं।   

शिवसेना के भगवान

             दिनांक 22 जून 2022, दिन बुधवार को एक टीवी चैनल के एंकर ने भारत को एक नया भगवान प्रदान किया, भारत की जनता धन्य हुयी। एंकर जी ने घोषणा करते हुये बताया कि “शिवसेना के भगवान मुख्यमंत्री निवास “वर्षा” से निकल कर प्रस्थान कर चुके हैं और अब कुछ ही देर में “मातोश्री” पहुँचने ही वाले हैं, मातोश्री जो कि शिवसेना का मंदिर है, वहाँ शिवसैनिकों की भीड़ पहले से ही उनके स्वागत के लिए एकत्र हो चुकी है। शिवसेना के भगवान अब मुख्यमंत्री निवास में नहीं बल्कि अपने मंदिर में रहेंगे”।  

            मैं अचम्भित हूँ, टीवी चैनल्स के एकंर्स दासत्व के ऐसे भाव और कलमतोड़ महिमामण्डन के शब्द कहाँ से लेकर आते हैं! मैं इसे धूर्तता और लोकतांत्रिक अराजकता कहना चाहता हूँ जो वंशवाद को स्थापित करने के लिए उर्वरक तत्व हैं।

भारतीय लोग भगवान के बिना अपने आपको पंगु क्यों पाते हैं! यह एक ऐसी रुग्णता है जो हमारे अंदर के दासत्व को प्रक्षेपित करती है। हम किसी को महिमामंडित करते समय सारी मर्यादाएँ लाँघ जाते हैं। पहले हमने सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बनाया और अब उद्धव ठाकरे को शिवसेना का भगवान बना दिया है।

विख्यात रंगनिर्देशक पद्मश्री बंसी कौल कहा करते थे कि “हमारे देश में व्यक्तियों को संस्थाओं की तुलना में बहुत महत्व दिया जाता है। इससे संस्थाओं के विकास का रास्ता अवरुद्ध हो गया है। व्यक्ति की आयु सीमित होती है किंतु संस्था अमर होती है”।

जब हम व्यक्ति को महत्व देना प्रारम्भ कर देते हैं तो संस्था नेपथ्य में धकेल दी जाती है जहाँ कालांतर में उसकी मृत्यु हो जाती है। व्यक्तिपूजा उन प्रतिभाओं की भी निर्मम हत्या कर देती है जो बौद्धिक पूँजी के रूप में कभी चिन्हित तक नहीं हो पाती और जिसके कारण समाज एवं देश को बौद्धिक सम्पदाओं से वंचित होना पड़ता है।  

विकासोन्मुखी देश के लिए आवश्यक राजनीति को रुग्ण करना हो और सभ्यता के लिए आवश्यक कला को निर्जीव करना हो तो दासत्वभाव के साथ व्यक्तिपूजा प्रारम्भ कर दीजिए। किसी समाज पर धूर्ततापूर्वक किए जाने वाले वैचारिक आक्रमण की इन चालों को समझना होगा।

हमने जिसे भी भगवान बनाया वे सब विवादास्पद हो गये, उनकी महानता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे। यदि हमने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और योगीराज श्रीकृष्ण को भगवान न बनाया होता तो आज वे विवादस्पद न बना दिए गये होते, लोग उन पर आधारहीन आरोप नहीं लगाते, उनके अस्तित्व को काल्पनिक नहीं मानते, उनके जन्मस्थानों पर मुकदमें नहीं हुए होते और आज उन्हें लेकर उनकी इतनी दुर्दशा न हुयी होती।

किसी भी व्यक्ति की महानता उसकी मृत्यु के बाद एक ब्लैंक चेक होती है जिसे भुनाने के लिए की जाने वाली छीना-झपटी उस महान व्यक्ति को केवल अपमानित ही करती है। सद्विचार अमर होते हैं, व्यक्ति नहीं। भारतीय महर्षि अपने नाम को नहीं, विचारों को प्रमुखता देते रहे, इसीलिए वेद अपौरुषेय हैं।  

बुधवार, 22 जून 2022

देवों का नाश हो

             चीन और अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों के देवों ने असुरों को वरदान में महाविध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्र दे दिये हैं। वे असुर तो थे ही अब दैत्य भी बन गये हैं। पात्रता का विचार किए बिना किसी को भी संहारक शक्तियाँ प्रदान करने वाले देवों का नाश हो!

हमने उन्हें रोटी दी, उन्होंने उसका मूल्य हमें धमकी देकर चुका दिया। हमने उन्हें गुरुद्वारे में इबादत का आमंत्रण दिया, उन्हें बिरियानी खिलायी, बदले में उन्होंने हमारे गुरुद्वारे को ही बम से उड़ा दिया।

हमें उनकी ज़िंदगी की बहुत परवाह है, वदले में हम सब मरने के लिए तैयार हैं।

मृत लोगों का देश

मनुष्यों की बायोलॉजिकल या सेलुलर डेथ से पूर्व भी कई प्रकार की मृत्यु होती है जिनके बारे में प्रायः कोई चर्चा नहीं होती। कुछ लोग नैतिक और सामाजिक मृत्यु की बात करते हैं जिसे कोई सुनना भी नहीं चाहता। आज उन मौतों की चर्चा आवश्यक हो गयी है जिनसे भारत सहित दुनिया के कई देश प्रभावित हो चुके हैं।

छोटे-मोटे अपराध करने वाला व्यक्ति विपन्न और अल्पशिक्षित हो सकता है किंतु बहुत गम्भीर और बड़े-बड़े अपराध करने वाले लोगों को प्रायः उच्चशिक्षित और सम्पन्न पाया गया है। मनुष्यता की स्थापना में बड़ी-बड़ी शैक्षणिक उपाधियों और बड़े-बड़े पदों की भूमिका हो सकती है, किंतु है नहीं, क्योंकि वे जीवन भर मनुष्य नहीं हो पाते।

किसी देश की आम जनता जब बहुत बड़े-बड़े लोगों को वैचारिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मृत पाती है तो शनैः शनैः वह देश भी मृत होने लगता है। दुनिया के कई देश मृत लोगों के देश बन चुके हैं, जिनमें भारत सबसे आगे है।

भारत एक ऐसा देश बन चुका है जो भारत में भारत को खोज रहा है, …जो हर रोगी को स्टीरॉयड्स खिलाने के हठ पर अड़ा है, …जो हर पर्वत को नदी और हर नदी को पर्वत बना देने की कार्ययोजनाओं में व्यस्त है, …जो विकास के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को कलेक्टर बना देना चाहता है, …जो गंगा को जमुना और जमुना को गंगा बना देना चाहता है, …जो गुलाब को बेसरम का फूल और बेसरम के फूल को गुलाब का फूल बना देने के शोधकार्यों में लगा हुआ है।

            खारे और मीठे जल वाले सागरों को एक में नहीं मिलाया जा सकता। कुछ असभ्य, अतार्किक, अवैज्ञानिक, असामाजिक और हठी लोगों ने हठ करके केले के पास ही बबूल को भी रोप दिया है। तनिक सी हवा के चलते ही बबूल के काँटे केले के पत्तों को तार-तार कर देते हैं। हठीले लोगों ने भारत के विकास के लिए हिरणों के जंगल में ही भूखे शेरों को भी छोड़ दिया है, वे इसे शेरों का मौलिक अधिकार कहते हैं।

भारत में चारो ओर बबूल के जंगल बड़ी तीव्रता से बढ़ते जा रहे हैं और केले के पत्तों ने तार-तार होकर भी मौन रहना सीख लिया है।

सोमवार, 20 जून 2022

मानवता के लिए योग

         योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। 

योऽपा करोत्तम प्रवरं मुनीनाम् पतञ्जलिं प्राञ्जलिरान तोऽस्मि॥

 इस शताब्दी का आठवाँ विश्वयोगदिवस मनाया जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, चीन-ताइवान युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध की भूमिकाएँ रची जाने लगी हैं। सृजन से अधिक विनाश के उपकरणों का निर्माण किया जा रहा है। नित नये महाविध्वंसक आयुधों का निर्माण हो रहा है।

भारत में निरंकुश हो चुकी अराजकता गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ निर्मित करने में लगी है। आये दिन हिंसा हो रही है। परिश्रम से अर्जित सम्पत्तियों को नष्ट किया जा रहा है। दशकों से बनायी जाती रही नस्लीय और साम्प्रदायिक विनाश की नींव अब हर किसी को स्पष्ट दिखायी देने लगी है। चारो ओर असंतोष, आक्रोश और विरोध की आग है, समाधान के प्रयास कहीं दिखायी नहीं देते, शायद किसी को उसकी आवश्यकता भी नहीं है।

मानवता की भी बात की जाती है जो कागजों और भाषणों में बंदी हो चुकी है। आये दिन होने वाली छुटपुट हिंसाओं और युद्ध में न जाने कितने लोगों की हत्याएँ हो रही हैं, इसी बीच विश्वयोगदिवस भी मनाया जा रहा है। शायद यूक्रेन में हो रहे युद्ध के बीच दोनों पक्षों के सैनिक भी सुबह-सुबह योग कर रहे होंगे। योग तो पाकिस्तान और चीन में भी किया जाने लगा है जहाँ मानवता को रौंदते हुये विस्तारवाद की ही पूजा की जाती है। हम सब ऐसे ही विरोधाभासों के बीच मुस्कराने के लिए बाध्य हैं।

कुछ लोग पूछते हैं योग तो रोज करता हूँ, लाभ क्यों नहीं हो रहा? यही प्रश्न महर्षि पतञ्जलि से पूछा जाता तो वे बताते कि हमने तो अष्टाङ्ग योग के लिए कहा था आप तो केवल योगासन और प्राणायाम ही कर रहे हैं वह भी बीच में छलाँग लगाकर, यम और नियम की सीढ़ियों पर चढ़े बिना सीधे आसन और प्राणायाम! बीज बोये बिना खेत में बजूका लगाकर अच्छी फसल की आशा कर रहे हैं! परिणामस्वरूप यह सभ्यता योगासन और प्राणायाम करते हुये भी प्रतिपल महाविनाश की ओर बढ़ती जा रही है।

अभी तक स्वस्थ्य तन और स्वस्थ्य मन के लिए योग की बातें की जाती रही हैं। मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, एंज़ाइटी और पार्किंसोनिज़्म जैसी व्याधियों की चिकित्सा के लिए औषधियों के साथ-साथ योगासन और प्राणायाम का भी उपयोग किया जाने लगा है। अर्थात चिकित्सा के स्थूल उपायों के साथ-साथ सूक्ष्म उपायों का भी उपयोग किया जाने लगा है। किंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है, समस्याएँ अभी भी हैं, जो विभिन्न रूपों में हमारे सामने आती जा रही हैं। जो सचमुच सुख और शांति चाहते हैं उन्हें एक बार फिर अष्टाङ्गयोग के विभिन्न अङ्गों के बारे में चिंतन-मनन की आवश्यकता है।

यदि समाज और प्रकृति अस्वस्थ है तो हम भी उसकी अस्वस्थता से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकते। मानवता और विश्वबंधुत्व हमारी आवश्यकता है, शांति और प्रसन्नता हमारी आवश्यकता है, इसीलिए अष्टाङ्गयोग भी हमारी आवश्यकता है।

हम डार्क-वेव के युग में प्रवेश कर चुके हैं, भौतिकता बढ़ रही है पर वह स्थूल से सूक्ष्मतर होती जा रही है। फ़्री-रेडिकल्स शरीर में ही नहीं, समाज में भी हैं और उनका सामना करने के लिए उपलब्ध एण्टीऑक्सीडेन्ट्स पर्याप्त नहीं हैं। मानवता के लिए हमें समाज में पनपते फ़्री-रेडिकल्स को यम-नियम के द्वारा संतुलित करना होगा।