मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

दक्षिणपंथ, वामपंथ और कट्टरवाद

दक्षिणपंथ की तरह वामपंथ में भी परम्परायें होती हैं जिनका पालन किया जाता है । वामपंथ की तरह दक्षिणपंथ में भी क्रांति को एक आवश्यक घटना के रूप में स्वीकार किया जाता है। फिर अंतर क्या है इन दोनों में? यह अंतर है अपेक्षा और बाध्यता को लेकर। दक्षिणपंथ में कट्टरता का कोई स्थान नहीं होता जबकि वामपंथ कट्टरता को शांति और व्यवस्था के लिए आवश्यक मानता है। सोवियत रूस के विघटन के पीछे वामपंथ की इसी कट्टरता की भूमिका थी।   

दक्षिणपंथ में देश-काल-वातावरण के अनुसार व्यवस्थाओं और परम्पराओं के पालन की अपेक्षा की जाती है जबकि वामपंथ में देश-काल-वातावरण की उपेक्षा कर पश्चिमी व्यवस्थाओं और परम्पराओं के पालन की बाध्यता थोपी जाती है।

यह दुष्प्रचार है कि दक्षिणपंथ में क्रांति का कोई स्थान नहीं होता। विश्व के प्रथम गणतांत्रिक देश में राजा के विरुद्ध प्रजा को क्रांति का अधिकार था और उन्होंने यह किया भी। वज्जीसंघ के अट्टकुल राजाओं के पतन के विरुद्ध हुयी क्रांति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इस क्रांति की प्रच्छन्न नायिका थी आम्रपाली।  

भारतीय राजनीति के इतिहास में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिस तरह अमर्यादित भाषा और लांछनों के साथ अपमानजनक विरोध का सामना करना पड़ता है वह अपूर्व है। इस राजनीतिक आक्रमण में विभिन्न विचारधाराओं के लोग एकसाथ खड़े दिखाई देते हैं। यह सत्ता का संघर्ष है या फिर विचारधाराओं का!

दो बातें हैं, सत्ता के लिए विचारधारा, और विचारधारा के लिए सत्ता। हम सब आये दिन सत्ता के लिए विचारधाराओं को पल-पल बदलते देखते हैं । कभी भाजपा से सपा में तो कभी सपा से कांग्रेस में ...। जब वैचारिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन का अभाव होता है और सत्ता ही प्रमुख होती है तो दल-बदल जैसी घटनायें होती हैं। यह राजनीतिक पतन का संकेत है । विचारधाराओं में परिवर्तन का आधार यदि विश्लेषण एवं मूल्यांकन हो तो यह स्वाभाविक है और इसे होना चाहिए, इस आधार पर किया गया दलबदल उपयुक्त हो सकता है या फिर स्वार्थपूर्ण भी।

राम और विक्रमादित्य का राज्यारोहण विचाधारा के लिए सत्तारोहण का उदाहरण है। लालू-राबड़ी का राज्यारोहण सत्ता के लिए विचारधारा गढ़ने का उदाहरण है। विश्व भर में होने वाले सारे राज्यारोहण इन्हीं दो सिद्धांतों के आसपास घूमते दिखायी देते हैं।

*जीवन का व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामुदायिक और सामाजिक स्वरूप*

...ये क्रमशः बड़े होती इकाइयों के जटिल होते स्वरूप हैं जिनसे होते हुये किसी व्यक्ति को आगे बढ़ना होता है। इस यात्रा में त्याग, सहिष्णुता और उदारता की अपेक्षा होती है। हर छोटी इकाई को अपने से बड़ी इकाई के साथ सामंजस्य बनाते हुये आगे बढ़ना होता है। सुखी और समृद्ध समाज एवं राष्ट्र के लिए यह सब आवश्यक है।  

जब व्यक्ति समाज से जुड़ता है तो वह विराट होता है, जब विराट होता है तो उसे दूसरों के हितों के बारे में सोचने की आवश्यकता होती है, यही आवश्यकता हमें किसी संगठन, विधि और शासन की ओर ले जाती है। जब हम सोचना प्रारम्भ करते हैं तो आवश्यक नहीं कि हम सब एक जैसा सोचें ...और बस यहीं से प्रारम्भ होता है टकराव का दर्शन।

हमारी लोकयात्रा प्रारम्भ होती है चिंतन-मंथन के बाद निष्पन्न हुए किसी दर्शन के साथ... फिर गढ़े जाते हैं कुछ प्रतीक । लोग प्रतीकों की व्याख्या करते हैं ...अपनी-अपनी समझ और सीमाओं के विस्तार के साथ, जिसके बाद होते हैं टकराव। यह पूरी यात्रा फ़िल्म निर्माण की तरह होती है। लेखक, पटकथालेखक और फ़िल्म निर्देशक वे तीन प्रथम व्यक्ति होते हैं जो अपनी फ़िल्म को भौतिक स्वरूप में बनने से पहले ही देख चुके होते हैं। ये लोग फ़िल्मदृष्टा हैं ...मंत्रदृष्टा ऋषियों की तरह। मंत्रों पर विवाद होता है, फ़िल्म पर भी विवाद होता है, दोनों की व्याख्यायें अलग-अलग तरह से की जाती हैं। इस तरह के विवादों का समाधान कैसे हो!

समाधान के लिए हमें समाज को अन्य दृष्टियों से भी देखना होगा, एक समाज-राजनीतिक सोच विकसित करनी होगी। प्राचीन भारतीय परम्परा में जिस तरह की सोच विकसित की गयी उसमें कोई वाद नहीं था, उदारता और समावेषिता थी। पश्चिमी देशों ने व्यक्तिवाद, समाजवाद, समुदायवाद, उदारवाद ..आदि कई सोचों के साथ प्रयोग किए, संघर्ष हुए, क्रांतियाँ हुयीं और कभी न समाप्त होने वाली अशांति की ओर पूरी दुनिया बढ़ चली। भारतीय भी अपनी वीणा एक ओर रख कर खूब बजने वाले ढोल को बजाने लगे और आज विरोध एवं हिंसा की आग में देश को झोंक कर व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति में लग गये हैं।

*समुदायवाद का राजनीतिक-सामाजिक दर्शन*

समुदायवाद विभिन्न समुदायों को इकाइयों में बाँटकर उनके हितसंरक्षण की छद्मराजनीति का मार्ग निर्मित करता है जिसमें प्रतिभाओं की बलि दे दी जाती है और विकास के पथों को अवरुद्ध कर दिया जाता है। जिन्हें राज्यारोहण के लिए दुर्बल और लचर समाज चाहिए वे समुदायवाद के पोषक होते हैं। जो समाज को सशक्त और जागरूक देखना चाहते हैं वे समुदाय की तो बात करते हैं किंतु उनकी कार्यसूची में समुदायवाद का कोई स्थान नहीं होता। हमें समुदाय की विराटता और समुदायवाद की संकुचित उठा-पटक को समझना होगा।

*अतिबुद्धिवाद*

कोई नशा सेवन करके जो कुछ भी बका जाता है उससे बड़ा ज्ञान और कुछ नहीं होता। ऐसे ज्ञान के लिए किसी तात्विक विमर्श या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती । हमारा देश अतिबुद्धिवाद से ग्रस्त है। विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले अतिविद्वान प्रोफ़ेसर्स हों या किसी विषय में डाक्टरेट किये हुये डॉक्टर साहब, उनका ज्ञान अद्भुत होता है, तर्क अद्भुत होते हैं। जीवन के उद्देश्य विचित्र होते हैं, सब कुछ किसी परिग्रही जैसा लगता है। प्रस्तुत हैं कुछ उदाहरण –

भारत में हिन्दूधर्म की स्थापना अठारहवीं शताब्दी में हुयी। आर्य भेंड़ चराते थे और मांसाहारी थे, ब्राह्मण भी मांसाहारी थे। एशिया माइनर और सोवियत रूस के मूलनिवासी आर्यों को भारत आते ही संस्कृत का ज्ञान हो गया और उन्होंने वेद लिख डाले। कुछ लोगों के अनुसार आर्यों ने भारत के मूलनिवसियों के वेद चुरा लिये। कुरआन और हिब्रू बाइबल विश्व के प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ हैं। वेद, महाभारत और रामायण में चरित्रहीन लोगों की कहानियाँ भरी पड़ी हैं।

ऐसा अद्भुत ज्ञान उच्च शिक्षित अतिबुद्धिमानों द्वारा बघारा जाता है और हम सब उनके ज्ञान को स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं।

क्या हमें अपने बच्चों को विश्वविद्यालयीन शिक्षा के लिए भेजना चाहिये या शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन के लिए एक जुट होकर आंदोलन करना चाहिये?  

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

आंदोलन या सत्ता का युद्ध

सत्ता के लिए युद्ध आज भी होते हैं, पर तलवारों से नहीं, स्वयं राजा भी अब युद्ध में प्रत्यक्षतः कहाँ दिखाई देते हैं! सत्तालोभियों के क्रीतदास पत्थरों, लाठियों, लोहे की छड़ों, तमंचों और पेट्रोल बम से घात लगाकर युद्ध करते हैं । निहत्थी निरीह प्रजा मारी जाती है, घायल होती है और उनकी सम्पत्तियाँ जलाकर भस्म कर दी जाती हैं । इन युद्धों को भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में धरना, विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन कहा जाता है । युद्ध का नाम और तरीका बदल गया है । इस युद्ध में लड़ने वाला दूसरा पक्ष नहीं होता, उसके स्थान पर निहत्थे आमनागरिक होते हैं । युद्ध एकपक्षीय होता है जिसे रोकने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बल डिफ़ेंसिव युद्ध करते हैं ।  

दिल्ली कूच पर निकले ट्रैक्टर-सवार किसान वास्तव में खेतों में पसीना बहाने वाले किसान हैं ही नहीं, उनके चमचमाते हुए नये और मूल्यवान ट्रैक्टर्स उनके किसान होने की घोषणा करते हैं पर साधारण किसान को इतनी फ़ुरसत ही कब मिलती है कि महीनों तक अपने खेतों से दूर रहकर प्रदर्शन करें और वातानुकूलित मूल्यवान टेंट्स में कबाब-बिरियानी के व्यय का बोझ उठा सकें! फिर कौन हैं ये लोग?

कनाडा से गुरमीत सिंह पन्नू ने विरोध-प्रदर्शनकारियों से हिंसक होने, अराजकता फैलाने और प्रधानमंत्री की हत्या करने का आह्वान किया है । किसानों का यह कैसा विरोध-प्रदर्शन है?   

आंदोलन के नाम पर पञ्जाब में रेल यातायात को बाधित कर दिया गया है, पिछली बार महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे ने सारी व्यवस्थाओं को अस्तव्यस्त करते हुये सिंधुसीमा पर क्या कुछ् नहीं किया! क्या विरोध और प्रदर्शन के नाम पर किसी को यह अधिकार है कि वह सामान्य जनजीवन की गतिविधियों को बाधित कर दे!

किसान-आंदोलन के नाम पर पिछली बार टिकैत ने जाटों और सिखों को लेकर जिस तरह का आंदोलन किया उसमें करोड़ों रुपये ख़र्च किये गये थे । ग़रीब किसान के पास इतने रुपये कहाँ से आते हैं ?

*मोदी की कुंडली में कालसर्प योग*

क्या आने वाले चुनाव में नरेंद्र मोदी की हार कांग्रेस की प्रियंका नेहरू गांढी बढेरा के हाथों होना तय है? कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के अनुसार नरेंद्र मोदी की जन्मकुंडली में कालसर्प दोष है इसलिए उनकी पराजय प्रियंका के हाथॉं होगी । कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, फिर कालसर्पयोग का और क्या परिणाम हो सकता है!

यूँ, मोदी जैसे लोगों की कुण्डली में कालसर्प योग होना ही चाहिए । एक ओर कतर में मोदी को वहाँ के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया, दूसरी ओर कनाडा से पन्नू ने मोदी को मार डालने का संकल्प किया, यह है कालसर्पदोष । जिस मोदी को पिछली बार जाट और सिख महिलाओं ने “हाय-हाय मोदी मर जा तू” गा-गाकर छातियाँ पीटी थीं उसी मोदी का नाम इस बार नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया है, यह है कालसर्पदोष । मोदी ने अबू धाबी में हिन्दूमंदिर का उद्घाटन किया फिर कतर जाकर नौसैनिकों को मुक्त करवा लिया इधर रौल विंची ने मोदी को अमर्यादित शब्दों के साथ जमकर कोसा, यह है कालसर्पदोष । कालसर्पदोष में मुकाबला फूल और काँटों का नहीं, फूल और भालों का है, वह भी जहर बुझे । ऐसा ही कालसर्पदोष दो-चार और नेताओं की कुण्डली में होता तो भारत का भविष्य उज्ज्वल हो जाता ।

*मज़हब के ख़िलाफ़*

हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी सहयोग से संयुक्त-अरब-अमीरात के अबूधाबी में हिन्दू मंदिर का निर्माण हुआ तो भारत सहित पाकिस्तान के कई मुल्लों-मौलवियों ने विरोध किया, कहा- “यह हमारे मज़हब के ख़िलाफ़ है, किसी मुस्लिम देश में हिन्दूमंदिर नहीं बनना चाहिए” ।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ तो भारत सहित पाकिस्तान के कई नेताओं ने इसका विरोध तो किया ही, यह भी कह दिया कि –“इंशा अल्लाह एक दिन जब हमारी हुकूमत होगी तब हम इस मंदिर को गिरा देंगे और बाबरी मस्ज़िद को फिर से बना देंगे”।

भारत के बहुत से लोग समान नागरिक अधिकार का विरोध कर रहे हैं, वे भारत में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग नियम और अधिकार चाहते हैं । ऐसी विचारधारा स्वतंत्र कबीलों की तो हो सकती है पर किसी सम्प्रभु देश की नहीं । यह अराजकता, निरंकुश स्वेच्छाचारिता और अ-राष्ट्रवाद का स्पष्ट संकेत है । क्या मज़हबी उसूलों के नाम पर एक बार फिर भारतविभाजन की तैयारी हो रही है? कब तक होता रहेगा भारत विभाजन, और क्यों?   

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

राम जी व्यस्त हैं

*राम जी व्यस्त हैं*

 मंदिर तो बन गया, प्राणप्रतिष्ठा भी हो गयी और इसके साथ ही राम जी की व्यस्तता भी बढ़ गयी है । आजकल वे रूठे राजनेताओं को निमंत्रणपत्र देने के लिये निकले हुये हैं ।

रूठे राजनेताओं ने राम जी को धमकी दे दी है कि यदि उन्हें अपना अस्तित्व बचाना है और माननीय नेताओं से अपने दर्शन करवाने हैं तो उनके राजमहल आकर या सपने में आकर निमंत्रण दें अन्यथा उनके दर्शन नहीं किये जायेंगे ।

..और बनवाओ अपना मंदिर! बैठे-ठाले काम बढ़ गया न! अब जाओ घर-घर माननीयों को न्योता देने ।

*अविश्वसनीय होते विधायक*

राजनीतिक दलों के मालिक अपने-अपने विधायकों को समय-समय पर दृष्टिबंध करते रहते हैं, कभी अपने महल में तो कभी अन्य प्रांत के किसी पंचसितारा होटल में । दृष्टिबंधन में होने वाले व्यय की चिंता किसी को नहीं होती, न मालिक को और न उस जनता को जिनका पैसा इस तरह उड़ाया जाता है ।

ढोल पीट-पीट कर यह सत्य प्रकाशित किया जा रहा है कि माननीय विधायकगण अपने मालिकों की दृष्टि में अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं

लोकतंत्र की रक्षा के ठेकेदारों के सामने “दृष्टिबंधन” जैसे अलोकतांत्रिक उपायों के अतिरिक्त अब कुछ बचा ही नहीं है । प्रजा बहुत भोली है जिसे अभी भी यह विश्वास है कि विधायकगण जनता के कार्यों के लिये बहुत विश्वसनीय हैं और इस बार उनका भला अवश्य करेंगे । प्रजा मतदान करती रहेगी ...उन्हीं के पक्ष में ...सदा की तरह ।

*आग है कि बुझती ही नहीं*

“अब एक साथ रहना सम्भव नहीं, हमें अपने लिए एक अलग देश चाहिए” –कहकर भारत विभाजन करने वाले लोग आज भी भारत में क्यों हैं? अब वही लोग फिर कह रहे हैं कि उन्हें भारत की नीतियों-रीतियों और न्यायालय के निर्णयों का पालन स्वीकार नहीं । यदि उन पर यह सब थोपा गया तो वे इसे “बर्दाश्त नहीं करेंगे”। स्पष्ट है कि गजवा-ए-हिंद के लिये अब उन्हें पूरा भारत चाहिये ।

शांत रहने वाले उतराखण्ड में आग यूँ ही नहीं लगी । भारत को मध्य एशिया बना देने की चाहत रखने वाले लोग पूरे देश को जला देने के लिए उतावले हैं । हमें यह स्वीकार करना होगा कि हिन्दूराष्ट्र की सहिष्णु और समावेशी अवधारणा विभाजनकारी लोगों के असैद्धांतिक विचारों और उद्देश्यों के विरुद्ध है । वे जिस भी देश में जाते हैं वहाँ की मूल अवधारणाओं को समाप्त कर अपनी अवधारणायें थोप देने के लिए हिंसा करते हैं । मौलिकता का विरोध, असहिष्णुता, हिंसा और लूटपाट ही उनका जीवन है, यही उनके जीवन का लक्ष्य है । उदारवादी माने जाने वाले यूरोप ने समझ लिया है, भारत को भी समझ लेना चाहिए । सनातन परम्परा तुम्हारा विरोध नहीं करती किंतु तुम हमारा विरोध करो यह हमें स्वीकार नहीं ।

भारत की तरह अब यूरोप भी जलने लगा है, अफ़्रीका के कुछ देश तो पहले से जल ही रहे थे । अब और क्या समझना शेष है? हम जानते हैं कि कुछ समुदाय सदा से हिंसक रहे हैं, हर युग में रहे हैं और हर युग में उनके विरुद्ध रचनात्मक शक्तियों को उठकर खड़े होना पड़ा है । असुर-दानव-राक्षस आदि विचारों का संहार किसी को तो करना ही होगा, जो उठकर आगे बढ़ेगा वह मनुष्य से ऊपर उठकर देव हो जायेगा । हममें से कितने लोग देव होने के लिये प्रस्तुत हैं ...और कितने लोग किसी देवशक्ति का साथ देने के लिये संकल्पित हैं ? …इसका उत्तर हमें बताता है कि यह आग अभी बुझने वाली नहीं है । हमारे बीच अभी कई दशानन हैं जो अपने ब्राह्मणधर्म को छोड़कर राक्षसधर्म अपना चुके हैं । ये राक्षस ही हमारे शांति और समृद्धता के सबसे बड़े बाधक हैं जो भारत में लूटमार के लिए आयातित साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ खड़े दिखायी देते हैं ।       

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2024

कैंसर से बचाव के लिए टीका

वित्तमंत्री जी की घोषणा के अनुसार 9 से 14 वर्ष की बच्चियों को सर्वाइकल कैन्सर से बचाने के लिये एण्टी एच.पी.वी. टीका लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा येगा । निजी चिकित्सालयों में इस टीके की एक मात्रा के लिये चार हजार रुपये देने होते हैं । बच्ची को छह महीने के बाद एक मात्रा और लेनी होगी, यानी पूर्ण टीकाकरण के लिये आठ हजार रुपये । सरकार इस टीके को इम्म्यूनाइजेशन कार्यक्रम में सम्मिलित करेगी ।

टीकाकरण राजकाज का एक अंश है । यदि जीवन के सभी पक्षों से धर्म को अलग न किया गया होता तो आज इस राजकर्म की आवश्यकता नहीं पड़ती । गाँव में आग लगने पर उसे बुझाने का काम शासन करता है, “गाँव में आग न लगेऐसी व्यवस्था करने का काम धर्म करता है ।

एण्टी एच.पी.वी. टीका पश्चिमी समाज के लिये आवश्यक है जहाँ जीवनशैली और शिक्षा पर धर्म का कोई अंकुश नहीं होता ।

हम पश्चिमी देशों का अनुकरण करते हैं इसलिये इन टीकों की आवश्यकता हमें भी होने लगी है । वास्तव में जो लोग ह्यूमन पैपिलोमा वायरस से संक्रमित हो जाते हैं उन्हें बाद में सर्वाइकल कैंसर होने की आशंकायें होती हैं । ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का संक्रमण यौनसम्पर्कों से एक-दूसरे में होता है । यदि हमारी जीवनशैली पर पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर सनातनधर्म का प्रभाव होता तो न तो हम ह्यूमन पैपिलोमा वायरस से संक्रमित होते और न उसके कारण सर्वाइकल कैंसर होता । यह भी वैज्ञानिक सत्य है कि संक्रमण से होने वाले रोगों को धर्मप्रेरित मर्यादापूर्ण जीवनशैली से सीमित किया जा सकना सम्भव है ...और यही निरापद है ।

धार्मिक परम्परायें हमें मर्यादापूर्ण जीवनशैली के लिये प्रेरित करती हैं जबकि धर्म-विरत राजकर्म हमें दोषपूर्ण जीवनशैली के लिये शिथिलता का एक अवसर उपलब्ध करवाते हैं । नौ साल की बच्चियों को नवरात्रि में दुर्गा का स्वरूप मानकर उनकी पूजा किये जाने वाले देश में हमारे विकृत-यौन सम्बंधों के कारण अब उन्हें एण्टी-ह्यूमन-पैपिलोमा वायरस के दो टीके लगवाने होंगे ।

क्या वैचारिक और अध्यात्मिक दृष्टि से हम इतने विपन्न हो गये हैं कि अब अपनी जीवनशैली को भी विकृत-भोग से बचा नहीं पा रहे हैं! यदि यह हमारा अध्यात्मिक और सामाजिक पतन है तो क्या इसे रोकने के लिये हमारे पास टीकाकरण के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है? यह टीका हमारी बच्चियों को अधिकतम दस वर्ष तक ही सुरक्षाकवच उपलब्ध करवा सकता है, फिर इसके बाद?

टीका तो वह जुगाड़ है जो आपतकाल में समाधान के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, समस्या का स्थायी समाधान तो स्वयं हमें ही करना होगा । सिगरेट पीने के बाद लौंग-इलायची मुँह में रख लेने से प्राप्त सुविधा हमें बारम्बार सिगरेट पीने के लिये अवसर उपलब्ध करवाती है, सिगरेट से मुक्ति का उपाय नहीं । ह्यूमन-पैपिलोमा-वायरस का टीका भी हमें स्वच्छंद यौनसम्बंधों के लिये बार-बार अवसर उपलब्ध करवाता है, उससे मुक्ति का अवसर नहीं ।