गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

नगरवधू के लिए



       
                                                                                          
दैनिक आवश्यकताओं की चाहत और संकलन के स्वार्थ ने जैसे ही हमारे आचरण में अपना स्थान बनाया हमारी संवेदना न्यून होने लगी । संवेदना के न्यून होते ही सहज प्रेम समाप्त हो गया । प्रेम को अब प्रतिदानों और शर्तों में बांधा जाने लगा । लोगों को व्यवस्था का आभास होने लगा कि तभी व्यापार के विन्यास ने अट्टहास के साथ प्रेम को अपने कठोर अंक में भर लिया, प्रेम छटपटाता रहा और हम सब स्वेच्छाचारी होते चले गये । स्वेच्छाचारिता दूसरों के सहज अधिकारों का हनन करती है और एक विषम स्थिति का जन्म होता है । कलह से प्रारम्भ होकर युद्ध और हत्या तक के कृत्य इसी विषम स्थिति के परिणाम हैं ।
भीड़ जब समाज का आकार ले रही थी तब समाज को एक अनुशासन की आवश्यकता हुयी थी जिसके लिये कुछ शक्तिशाली और चतुर लोग आगे आये और एक नियंत्रण प्रणाली का जन्म हुआ । समाज में राजनीतिक सत्ताओं के जन्म की यही क्रमिक प्रक्रिया है । प्रारम्भ में तो सत्ता को अनुशासन के लिए अधिकार दिए गए किंतु शीघ्र ही यह शोषण का एक संगठित स्वरूप बन गया । मोहल्ले के गुण्डे का परिष्कृत स्वरूप राजा के रूप में सामने आया । स्वरूप बदलते गये किंतु अनुशासन के आश्वासन पर शासन करने का खेल चलता रहा । शीघ्र ही धूर्त लोगों को यह समझ में आ चुका था कि शक्ति और ऐश्वर्य से भरपूर यह खेल स्थायी होना चाहिए जिसके लिए समस्याओं के निराकरण की नहीं प्रत्युत उनके स्थायीकरण की आवश्यकता है । राजसत्ताओं ने अब सत्ता के स्थायीकरण के लिये मिथ्या आश्वासनों का सहारा लिया । शासित वर्ग अब झूठे आश्वासनों में अपनी आशाओं को तलाशने की मृगमरीचिका में खो गया... और इस तरह अनुशासन के उद्देश्य से बनायी गयीं राजसत्तायें असामाजिकता और अव्यवस्थाओं के उत्पादन के लिए उद्योग घरानों में रूपांतरित होती चली गयीं ।
जीवन की सुरक्षा और अधिकारों की सुनिश्चितता किसी भी व्यक्ति की मौलिक आवश्यकताएं हैं  जिनका सत्ताओं द्वारा मछली के चारे की तरह दुरुपयोग किया जाने लगा । इस बीच सभ्य समाज एक बहुत बड़े छल को सुस्थापित करने में सफल रहा है कि सुव्यवस्था के लिए सत्ता का होना अपरिहार्य है । जबकि सत्य यह है कि न्याय और सुव्यवस्था की स्थापना सत्ता की आवश्यकता को न्यून करती है । हम छलावे में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं । नकली घी खाते-खाते हम सब असली घी का स्वाद ही भूल चुके हैं । अब असली घी हमें विकल कर देता है और उसके सेवन से हमें वमन होने लगता है ।
हमारे कृत्रिम आचरण ने सामाजिक-सभ्यता का और सुसंगठित अपराधों ने राजनीतिक-सभ्यता का चोला ओढ़ लिया है । सत्ता के ऐश्वर्य ने राजनेताओं को भ्रष्ट होने और अपराधियों को राजनेता बनने के लिये आकर्षित किया । सत्ता तो बहुत पहले ही शक्तिशालियों की नगरवधू बन चुकी थी । अब नगरवधू को पाने के लिये असामाजिक तत्वों के आपसी संघर्षों ने बची-खुची मनुष्यता को भी तिलाञ्जलि दे दी है ।
विगत कई सहस्राब्दियों से मनुष्यता ने सत्ता के न जाने कितने निर्मम नाटक देखे हैं । स्वातंत्र्योत्तर भारत में भी निर्ममता का यह नाटक अनवरत बना रहा । औद्योगिक क्रांति के लिये नीतिशून्य शिक्षा की आवश्यकता ने हम सबको और भी क्रूर बना दिया है । सत्ता के लिए लोग हिंस्र पशुओं की तरह लड़ते हैं । किसी योजना पर नहीं बल्कि मेरे-तेरे घोटालों पर चर्चा होती है, छिद्र खोजे नहीं जाते बल्कि बनाये जाते हैं, अपराध रोके नहीं जाते बल्कि प्रोत्साहित किए जाते हैं... । राजनेताओं के आचरण में धर्म और ईश्वर पर आस्था जैसे तत्वों का पूर्ण अभाव है । उनमें सुशासन की स्थापना के लिए नहीं बल्कि सत्ता-नगरवधू को पाने के लिये संघर्ष होते हैं । वे नास्तिक और क्रूर हैं, प्रजा उनके लिए चूल्हे में जलाने के लिए ईंधन की सामग्री भर है ।
सतयुग में तो समाज आत्मशासित होता होगा, शासन-सत्ता की आवश्यकता ही नहीं होती होगी किंतु त्रेता और द्वापर से लेकर कलियुग के इस वर्तमान कालखण्ड तक सत्ता और शोषण की न्यूनाधिक जुगलबन्दी बनी ही रही है । वर्तमान ज्ञात इतिहास के मध्ययुगीन कालखण्ड में सत्ता के लिए होने वाले झपट-युद्धों ने नरसंहार का एक अलग ही इतिहास रचा है । सुव्यवस्था के लिए रचे गये धर्मतंत्रों ने समाज को नए रूप में विभक्त किया और धर्म भी युद्ध का एक बहाना बन गया । क्रूर युद्ध पिपासुओं ने धर्म को माध्यम बनाकर जघन्य हत्याओं और यौनापराधों की एक नयी श्रंखला प्रारम्भ कर दी । धर्म मनुष्यता और न्याय का नहीं बल्कि क्रूरता और अन्याय का पर्याय बन कर अट्टहास कर रहा है, कुतर्कों के बाज़ार सजा दिए गए हैं और मनुष्यता की बोलियाँ लगती जा रही हैं । मानवता को इस नयी सभ्यता ने समाप्त कर दिया है और कलियुग अपने चरम की ओर बढ़ता जा रहा है ।
इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही भारत में हुए जघन्यतम निर्भयाकाण्ड को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आँखों से पूरे विश्व में देखा-सुना गया । आशा थी कि अब इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी किंतु ऐसा नहीं हुआ । अवयस्कों के लिए कानून की शिथिलता ने अवयस्कों को इस कुकर्म के लिये प्रेरित किया । एक के बाद एक कई निर्भयाकाण्ड होते रहे और कानून पंगु बना रहा । बहुपत्नीप्रथा और जनसंख्या नियंत्रण के लिए कॉमन सिविल रूल्स पर लोकतांत्रिक सहमति में धर्म आड़े आने लगा । धर्म ने सभी आदर्शों को धता बताते हुए एक अभेद्य दीवाल खड़ी कर दी और भारत के भीतर एक और अदृश्य देश की समानांतर आंतरिक व्यवस्था लागू हो गयी । मानव समाज निरंतर बिखराव की ओर है, स्वेच्छाचारिता और गुंडई ही सभ्यता की प्रतीक बन चुकी हैं । इधर भ्रष्ट सत्ताधीशों को झूठे सम्मान की आदत ने दुष्ट सत्ताधीशों की मौत पर झूठी तारीफ़ों की परम्परा को अनिवार्य कर दिया है तो उधर ब्रह्माण्ड में अन्य ग्रहों पर मानवसभ्यता की खोज में भटकने वाला धरती का मानव अपनी सभ्यता पर लगे असभ्यता के अमिट कलंकों को दूर कर पाने में पूरी तरह असफल रहा है । सोनागाछी और बहूबाज़ार केवल कोलकाता में ही नहीं होते हर शहर में होते हैं, यहाँ तक कि वे हमारे मस्तिष्क में भी बस चुके हैं । अब विद्यालयों से लेकर सड़क तक कहीं भी अपनी इच्छानुसार तात्कालिक सोनागाछी और बहूबाज़ार बना लिए जाते हैं । प्रश्न यह है कि यदि ब्रह्माण्ड में जीवन की सम्भावनाओं वाला कोई ग्रह मिल भी गया तो इस बात की क्या सुनिश्चितता कि वहाँ धरती के सात्विक लोग ही नयी सभ्यता का सूत्रपात करेंगे ?  

1 टिप्पणी:

  1. ये ज़िन्दगी अब चिर शर्तों पर जी जा रही है, जहां अधिकतर रिश्तों के बीच शर्तें हैं.. प्यार शायद ही बचा है...

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.