गुरुवार, 28 जुलाई 2011

वो क्या है जो


लो फिर छला है रात भर, मेरे चाँद ने हमें.    
नादां है दिल ये फिर भी, भूलता नहीं उन्हें.


सपनों में हम सदा ही, ढूंढा किये उन्हें.
वो भूल से ही सही, कभी दिखते तो हमें.

हम भी मगर तलाश में, चलते रहे यूँ ही.
छालों ने तो थी की खबर, थे बेखबर हमीं.

जलता रहा दिया ये, रात-रात भर यूँ ही.
वो मुस्कुरा के चल दिए, बोले - 'अभी नहीं'.

वो क्या है जो जला रहा, वो क्या है जो लुभा रहा.
वो क्या है जो चाहत बनी, वो क्या है जो बुझती नहीं.

वो प्यास है, हाँ ! प्यास ही, दिखती नहीं हमें .  
लो फिर छला है रात भर, मेरे चाँद ने हमें.