रविवार, 21 जून 2026

भोजपुर माटी

 भारत भूषण तिवारी का खुला और साफ-सुथरा चरित्र एक शोध का विषय है।

पुलिस ने कई बार उन्हें सम्मानित किया, अपमानित भी किया, फिर एक दिन घेरकर हत्या कर दी। मुख्यमंत्री और मैथिली ठाकुर ने उन्हें अपराधी कहा, पुलिस ने पागल तो पिता ने विक्षिप्त भी कहा। भारत भूषण तिवारी जैसे लोगों को समझ पाना इतना सरल नहीं है  

वे कलियुग में जन्मे चंद सतजुगियों में से एक हैं। पुस्तकीय ज्ञान को जब जीवन का आदर्श बनाया जाता है तो पूरी दुनिया उसे ही शत्रु मानने लगती है, और सरकार आतंकवादी या राष्ट्रद्रोही मानकर हत्या कर देती है। चंद्रशेखरआजाद और भगत सिंह जैसे न जाने कितने आदर्शवादी युवक सत्ताओं की भेंट चढ़ गये, आगे भी चढ़ते रहेंगे। इन सबको पता है कि यथार्थ का धरातल बहुत ऊबड़-खाबड़ और पथरीला होता है फिर भी वे उसी पथ के दावेदार होते हैं। यह भी एक नशा है, सात्विकता का नशा, जिसके सामने  कालकूट का विष भी हल्का लगता है। भारत भूषण तिवारी कलयुग में सतयुगी बनकर आये, एक संदेश दिया और चलते बने। ऐसे चरित्रों को समझना हर किसी के लिए शक्य नहीं होता। मैं उस लड़के के लिए बहुत व्यथित हूँ.... और गौरवान्वित भी। 

बक्सर जिले के अधिवक्ताओं, जिनमें एक मुसलमान भी सम्मिलित हैं, को मेरा साधुवाद ! सोमवार को यह दल भारत भूषण  तिवारी के हत्यारों के विरुद्ध न्यायालय में वाद प्रस्तुत करने जा रहा है। बिहार की धरती को नमन! बिहार के लोगों को नमन!        

शनिवार, 20 जून 2026

रक्तरंजित

भोजपुर के युवा लोकक्रांतिकारी भारत भूषण तिवारी अब नहीं हैं। बिहार सरकार और उसकी पुलिस ने उनकी हत्या कर दी। पुलिस ने भीड़ के अनुरोध को ठुकराकर युवा क्रान्तिकारी की हत्या की, इसे पूरे देश ने देखा, सरकार ने नहीं। यह तो कुछ भी नहीं है, स्वतंत्र भारत की पुलिस ने बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंज देव को उनके राजमहल में घुस कर गोलियों से छलनी कर दिया था। महाराजा निहत्थे थे और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें केवल इसलिए मरवा दिया क्योंकि आदिवासी उन्हें अपना देवता मानते थे, और महाराजा उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकार को बनाये रखने के पक्ष में थे। शासन-प्रशासन ने महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को भी पागल और विक्षिप्त घोषित कर दिया था।अर्थात् जो पागल है, विक्षिप्त है उसे जीने का अधिकार नहीं है। जो चालाक और धूर्त है उसे सम्मान और प्रतिष्ठापूर्वक जीने का अधिकार है, ...यही लिखा है न संविधान में?

बिहार की जनता पुलिस से अनुरोध करती रही "गोली मत चलाइये"। पर पुलिस ने एक ऐसे युवक को मार डाला जिसे जनता ज़िंदा रहने देना चाहती थी। मदांध सत्ता ने भारत के लोकतंत्र को उस स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ लोक को अपनी भी चिंता करने का कोई आधिकार नहीं।

लोकनिर्माण के कार्यों में भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण और झूठे आश्वासनों के विरुद्ध सरकार को ललकारने वाले भारत भूषण तिवारी को क्या पागल कहा जा सकता है? जनता जिसे अपना भगवान मानने लगी थी वह युवक सरकार को विक्षिप्त लगता है! क्या इस युवक की लड़ाई किसी को आतंकित करने के लिए है या भ्रष्टतंत्र को सुधर जाने की चेतावनी! सरकार तो आज तक सुभाषचंद्र बोस और सरदार भगतसिंह जैसों को भी आतंकवादी ही मानती है। 

....नहीं, यह देश सरकार की इस निरंकुशता को स्वीकार नहीं करेगा। हम सब भारत भूषण के लोकसुधार अभियान के संघर्ष को आगे ले जाएँगे। बिहार में निर्माणाधीन सेतु कब तक गिरते रहेंगे? बाढ़ में कब तक लोग बेघर होते रहेंगे?                              

पुलिस इनकाउंटर की जाँच की माँग होने लगी है, उससे क्या होगा????

एक और सच्चा क्रांतिकारी चला गया। चंद्रशेखर, भगतसिंह, सुभाष....और भारत भूषण तिवारी रोज नहीं जन्म लेते। बिहार में जो बिजली कड़की और उजाला हुआ वह रुकना नहीं चाहिए। दिख भी रहा है... यह रुकेगा नहीं, रुकना चाहिए भी नहीं।

हमें ही नहीं, पूरे देश को भारत भूषण तिवारी पर गर्व है। बिहार के भोजपुर की धरती पर गर्व है जहाँ पहले भी कुँवर वीरसिंह जैसे क्रांतिकारी जन्म लेते रहे हैं। वास्तव में यह लड़का जाते-जाते अपने नाम को सार्थक कर गया। 

गुरुवार, 18 जून 2026

कुप्रथा

 माँग कर रहे हैं लोग

कि सरकार बनाये 

एक विधान ऐसा

कुछ जजिया कर जैसा

कि ब्राह्मणों को ब्याहनी होगी 

अपनी बेटी 

किसी दलित के साथ।

अंबेडकर ने भी तो ब्याही थी 

अपनी बेटी सावित्री

भीमराव सकपाल के साथ

बनाये बिना कोई विधान

और दिया अपना उपनाम

अंबेडकर भी।

कितनी निभी, पता नहीं!

क्या क्रांति हुयी, पता नहीं!

क्या शिक्षा मिली, पता नहीं!

बाध्यकारी विधान बनेगा 

तो कदाचित्

भारत विश्वगुरु बनेगा

और कार्यकारी होगा यह विधान

पूरे विश्व में।

बन गया विधान 

तब एक दिन

महेश मणि के घर आई

एक नन्हीं परी

घर-परिवार डूबा 

मनाने उत्सव

फिर उसी रात्रि 

गला दबा दिया महेश मणि ने

नन्हीं परी का। 

सब अचंभित!

ऐसा क्यों किया महेश मणि ने!

प्रश्नों का अंत नहीं।

न्यायालय में बताया

महेश मणि ने

अब मेरी कोई बेटी 

नहीं ब्याही जाएगी 

किसी दलित के साथ।

समय चलता रहा

फिर...

यह परंपरा बन गयी

एक नई कुप्रथा

तो दलितों ने कहा

ब्राह्मण होते हैं 

स्त्री विरोधी

जन्म से हत्यारे        

राक्षस

नरपिशाच...                            

इन्हें नहीं मिलना चाहिए               

जीने का अधिकार।

होना ही चाहिए इनका

"सर तन से जुदा"

जब मिलें 

तभी

जहाँ दिखाई दे जाएँ

वहीं। 


निर्बल का विवश समाधान

जब बनती है कुप्रथा

तब भी 

मौन रहते हैं

राजसिंहासन

उनसे नहीं पूछा जाना चाहिए

कोई प्रश्न।

बस

तुम बने रहो

विनम्र सेवक

राजसिंहासन के

कुचलकर अपनी आत्मा।



शनिवार, 13 जून 2026

युगपरिवर्तन

सतयुगी लोग सत्य के अधिक समीप हुआ करते थे इसलिए अधिक सुखी थे। कालांतर में जब धर्म का एक स्तंभ ध्वस्त हुआ तो सतयुग समाप्त हुआ। त्रेतायुग में धर्म का और भी क्षरण हुआ जिसने द्वापर को आमंत्रित किया। द्वापर में धर्म के तीन स्तंभों का पतन हुआ तो कलियुग को संसार की सत्ता प्राप्त हुयी। अब कलियुग धर्म के शेष रहे एकमात्र स्तंभ पर डोल रहा है। जिस दिन इस अंतिम स्तंभ का पतन होगा तब..., तब क्या होगा! यह भौतिक विज्ञान और तत्वदर्शन का विषय है, इस पर फिर कभी चर्चा होगी।

त्रेतायुग में टिश्यू कल्चर, आई.वी.एफ़, जेनेटिक स्टडी, कैटारेक्ट की शल्यक्रिया और प्लास्टिक सर्जरी जैसी अनेक उपलब्धियाँ अविश्वसनीय सी लगती हैं, पर सत्य हैं। वहीं त्रेतायुग और कलियुग में राक्षसों के उत्पात, वैज्ञानिकों की तप-साधना में विघ्न, नरमांस भक्षण, नारी अपहरण और यौनोत्पीड़न जैसी कुछ नकारात्मक घटनाओं को लेकर अद्भुत समानतायें पढ़ने को मिलती हैं।
आज हमें एपस्टीन फ़ाइल की पैशाचिक घटनायें और विश्वस्तरीय आभिजात्य वर्ग के लोगों की उसमें संलिप्तता व्यथित करती है।
ऐसी न्यूनाधिक घटनायें सभी कालखंडों में होती रही हैं। तब अंतर क्या है इन युगों में! यह एक विचारणीय विषय होना चाहिए।
अंतर है अन्याय का समर्थन और प्रतिकार करने वालों एवं संस्कार विरोधियों और अपसंस्कृति के शोधन के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के अनुपात में ह्रास या वृद्धि।
त्रेत्रायुग से लेकर इस युग तक उत्कृष्टता के क्षरण और निकृष्टता के उत्कर्ष में निरंतर वृद्धि देखी गयी है।
एक अंतर और भी है, कलियुग में प्रवंचकों की भीड़ है जिसमें आम जनता से लेकर राजनेताओं, अभिनेताओं, संतों और वैज्ञानिकों में आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा है।
विषाणु आयुधों के निर्माता कौन हैं! मिथ्या और भ्रामक शोधपत्र प्रकाशित करवाने वाले शोधकर्ता और वैज्ञानिक कौन हैं! खाद्य और पेय पदार्थों में मिलावट के व्यापार में सम्मिलित लोग कौन हैं! इतिहास और विज्ञान की कूटरचित व्याख्यायें करने वाले लोग कौन हैं! देश के टुकड़े-टुकड़े करने की प्रतिज्ञा करने वाले लोग कौन हैं!
कलियुग की सबसे बड़ी विशेषता है ऋत में अनृत और अनृत में ऋत की प्रतीति। यह प्रतीति तक ही सीमित नहीं, यह हठ की पराकाष्ठा को स्पर्श करने की उद्दंड घोषणा भी है जो सत्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

डीएनए की ऐसी तैसी

सुना है, मीलाॅर्ड ने हुक्म दिया है कि पेट में बच्चा किसी का भी हो, पर बच्चे का बाप वही माना जाएगा जो महिला का पति होगा।

मीलाॅर्ड जी को साष्टांग दंडवत! यही न्याय है और यही है असली वाला मानवाधिकार! पेट में बच्चे होंगे प्रेमी के, पालनकर्ता होगा जोरु का दासानुदास। अब पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं होगा, न्यायालयों से भीड़ कम हो जायेगी, डीएनए औचित्यहीन हो जाएगा


यह व्यवस्था शानदार, प्रगतिवादी और सर्वहारा के लिए कल्याणकारी है। हजारों जातियों के स्थान पर पूरा देश केवल दो जातियों में वर्गीकृत किया जाएगा - एक जाति कोयल, दूसरी जाति कागा। एक जन्म देने वाला, दूसरा पालने वाला। गंगाराम कोयल, रामबरन कागा।

विवाहगीत में बड़ी-बूढ़ियाँ गायेंगी - "एक डाल पर कोयल बैठा, उसी डाल पर कागा... दाना लाने कोई गया, कोई बीज डाल के भागा... बोलो है ना! है ना है  ना...

शुक्रवार, 12 जून 2026

ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c)

पिछले तीन महीनों में मधुमेही के रक्त में ग्लूकोज की औसत स्थिति जानने के लिए किये जाने वाले परीक्षण के मानदंड अब पहले वाले नहीं रहे। यह पहले से डेढ़ अंक बढ़त की छूट देता है, यानी साढ़े छह से साढ़े सात प्रतिशत तक अब कोई डायबिटीज नहीं। आयु के आधार पर इसमें और भी वैरिएशन्स हैं जो यूएसए के शोधकर्ताओं ने प्रकाशित किये हैं।

मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि-
"महाकलियुग की इस महाबेला में किसी भी देश में, किसी भी विषय पर किए गये शोध के निष्कर्ष विश्वसनीय नहीं माने जा सकते।"
राखी गढ़ी से लेकर दुनिया भर के स्थानीय लोकसमूहों के डीएनए जेनोम्स को ब्राह्मणों की देह में खोजने को लेकर किये जा रहे शोध भी विश्वसनीय हैं क्या! जब किसी सामान्य सीबीसी की जाँच ही विश्वसनीय नहीं हो पाती तो डीएनए जेनोम्स में किसी को कल्प्रिट मान कर की जाने वाली पूर्वाग्रही जाँच कितनी विश्वसनीय हो सकती है!

अमेरिकी शोधकर्ताओं के निष्कर्षों पर विभिन्न देशों के स्थानीय परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाना अपेक्षित है।

१. कोई भी शोध उद्योगपतियों और सरकार की मिलीभगत से आंशिक या पूरी तरह प्रभावित हो सकता है।
२. वैज्ञानिक अपने प्रायोजकों और सरकारों के दबाव में कार्य करते हैं, जिससे वही परिणाम निकाले जा सकते हैं जो उद्योग के लिए लाभकारी हों न कि आमजनता के लिए!
३. किसी भी महाद्वीप, देश और उसके विभिन्न विस्तारित क्षेत्रों की परिस्थितियाँ, वहाँ के निवासियों की एनाटाॅमिकल और फिजियोलाॅजिकल स्थितियों और उसमें होने वाली पैथोलाॅजिकल प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं जिसके परिणाम स्वरूप बहुत से वैरिएशन्स सामने आते हैं। इनका सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। दो सगे भाइयों में से एक सैनिक है तो उसके रक्तचाप में दूसरे भाई की अपेक्षा भिन्नता का स्तर अधिक होगा।
४. फ्रांस और उसके ठीक पड़ोसी जर्मनी की भोजनशैली में भिन्नता के कारण वहाँ के लोगों में हृदयरोग की प्रायिकतायें अचंभित करती हैं। उन लोगों में ही ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन का प्रतिशत एक समान संकेत और सूचनाएँ नहीं दे सकता।
५. WHO, CHINA और USA बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। कोरोना काल में दुनिया ने सीख लिया कि इन पर भरोसा करना अपने विनाश को आमंत्रित करना है।
६. बेचारा ह्यूमन पैपिलोमा वायरस सर्वाइकल कैंसर का एक बहुत छोटा सा घटक है जिसको इतना बड़ा कल्प्रिट बनाकर जनरलाइज कर दिया गया। सर्वाइकल कैंसर के लिए वही एक मात्र उत्तरदायी नहीं है जिसे टीका लगाकर इरेडीकेट कर दिया जाएगा, गोया राजा की छाती पर बैठी मक्खी को दंड देने के लिए तलवार का नहीं अपितु सीधे न्यूक्लियर बम का प्रहार।
७. तऽ रउवा लो ...चिंता झन करीं, मस्त रहीं, सुअस्थ रहीं, जब तक आपन देहिंया से कवनो एडभर्स संकेत नऽई खे मिलत तब तक कवनो टेस्ट-फेस्ट के झंझट मऽ मत परीं।

गुरुवार, 11 जून 2026

भारतीय संविधान की मौलिकता

संविधान निर्माता का श्रेय किसे मिलना चाहिए, इस विवाद से पहले तो यह भी एक स्वाभाविक जिज्ञासा होनी चाहिए कि हमारा संविधान मौलिक है या संकलन, या संकलन में किंचित मौलिकता के साथ संशोधन!

किसी भी देश का संविधान उस भौगोलिक क्षेत्र के देश-काल-परिवेश-प्रकृति-संसाधन-सभ्यता-संस्कृति और वहाँ के नागरिकों के निर्बाध एवं समग्र कल्याण को केंद्रित कर सुयोजित किया जाना चाहिए। सुधीजन विचार करें, क्या हमारा संविधान इन सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम है? यदि सक्षम है तो देश और संविधान से पहले कुरआन को प्रमुखता देने वाले लोगों के लिए इस देश की नागरिकता बनाये रखने का क्या औचित्य, इसे समाप्त क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए?
जो संविधान - १. अपने निर्माण के समय से ही विवादित हो (यदि कभी संविधान को जलाने की बात आई तो उसे जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति होऊँगा -भीमराव अंबेडकर), २.एक बहुत बड़े समुदाय द्वारा उसे राष्ट्रीयव्यवस्था के लिए 
सर्वोपरि न मानते हुए शरीया को सर्वोपरि माना जाता हो, और ३.विदेशी संविधानों के संकलन पर आधारित हो ...उसके औचित्य पर गंभीर मंथन क्यों नहीं होना चाहिए!

ऐसा क्या हुआ, क्यों हुआ कि श्रेष्ठता ही नहीं, मिथ्या महानता की भी खरपतवार उगती रही, पल्लवित-पोषित होती रही और पूरा देश आत्ममुग्धता में डूबा रहा?

आठ दशकों के बाद अचानक पहली बार संविधान निर्माता का एक और नाम देश में प्रकट हुआ। यह नाम अभी तक क्यों छिपाया जाता रहा? कौन था जो सत्य को छिपाकर झूठ को परोसता रहा, और क्यों?
जब सत्य उद्घाटित हुआ तो एक टिप्पणी उछाल दी गई -
"संविधान के मूल निर्माता वी. एन. राव थे, बी.आर. अंबेडकर नहीं, उन्होंने तो केवल उसकी भाषा में कुछ परिवर्तन किये थे" -यह कहना बाबा साहब का अपमान है।

भीमराव का अपमान?
प्रचण्ड वामसेफियों और भीमवादियों के रहते ऐसा दुस्साहस कौन कर सकता है भला!   

तात्विक चिंतन का संकेत है कि सत्य को प्रकाशित करने से झूठ का अपमान होना स्वाभाविक है। प्रकाश के प्रकट होने से अंधकार और झूठ, दोनों स्वयं ही अपमानित होते हैं, अन्यथा फिर "तमसोमा ज्योतिर्गमय" की कामना ही
क्यों की जाती!

रविवार, 7 जून 2026

मूलनिवासी

मूलनिवासी हैं

हम भी
उतने ही
जितने कि तुम
और उतने ही विदेशी भी
जितने कि तुम।
नहीं पता, कब हुआ यह विवाह
हमारे जेनोम्स का
जाग्रोस के जेनोम्स से
और तुम्हारे जेनोम्स का
अफ्रीकी जेनोम्स से।
हम इतना ही जानते हैं
कि हम देते रहे हैं
अपना उत्कृष्ट
अपनी मातृभूमि को
जहाँ भी लेते रहे हम जन्म
क्योंकि
संपूर्ण धरती को ही
भोगते नहीं
पूजते रहे हैं हम
इसीलिए
हम करते रहे हैं सदा
सार्वभौमिक
और सर्वकल्याण की मंगलकामनाएँ।
तुम
हमें विदेशी कहने लगे
हम
"वसुधैव" को
कुटुंबकम्" मानते रहे।
मत भूलिए
देश से अधिक स्थायी होते हैं
मांगलिक विचार
और उसकी साधना।

कब तक

 तुमने हमें कहा

आदिवासी
हम हो गये आदिवासी
तुमने हमें कहा
वंचित
हम हो गये वंचित
तुमने हमें कहा अविकसित
हम हो गये अविकसित
तुमने हमें कहा "जो-जो"
हम होते गये "वो-वो"।
पता नहीं
अभी आप हमें कहेंगे
और "क्या-क्या"
और हम होते रहेंगे
न जाने "क्या-क्या"
कभी तो छोड़ो हमें
स्वतंत्र
कि हो सकें हम "वो"
हम हैं
सचमुच में "जो"
कब तक आप बनाते रहेंगे हमें
सत्ता की सीढ़ियाँ
रौंदते हुये हमें
अपने विचारों की पादुकाओं से!
कब तक?

बुधवार, 3 जून 2026

चिकित्सा और मानव धर्म

वर्षों पहले यूरोप में एक सोशियोपोलिटिकल तूफान आया जिसने मानव व्यवहार के अन्य सभी क्षेत्रों से धर्म के हस्तक्षेप को समाप्त कर दिया। चर्चों से सारे अधिकार छीन कर उन्हें पंगु बना दिया गया। यह आँधी पूरे विश्व में एक फैशन बन गयी तो भारत भी अछूता कैसे रहता जबकि भारत में यूरोप जैसी कोई परिस्थिति थी ही नहीं। तत्कालीन यूरोप के चर्च अत्याचार और भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे ! इसलिये वहाँ एक धार्मिक परिवर्तन की आवश्यकता थी किंतु भारत में तो इस्लामिक और फिर ब्रिटिश शासन था, यहाँ सनातन धर्म जनता तक ही सीमित रहा। मनुस्मृति का स्वर्णिम युग तो छठी शताब्दी के अंत तक पूरी तरह समाप्त हो चुका था। पर यूरोप का अनुसरण करते हुये यहाँ भी धर्म का शिकार किया गया वह भी केवल सनातन धर्म का। परिणामस्वरूप भारत में भी धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित कर दिया गया। धर्म का राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग... आदि जीवन के सभी क्षेत्रों से अंकुश समाप्त कर दिया गया। धर्म का स्थान नेतावाणी ने ले लिया। भारतीयों के जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नेतावाणी का अंकुश और हस्तक्षेप नहीं है।

भारत के राजनेता सत्ता पाते ही तत्क्षण  न केवल राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ हो जाते हैं अपितु अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक, परमाणु विशेषज्ञ, गणितज्ञ, कलाकार, संगीतज्ञ अध्यात्मविशेषज्ञ, योगाचार्य आदि सब कुछ हो जाते हैं।
आज भारत का राजनेता बताता है कि हमें अपनी बच्चियों को एंटी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का टीका लगवाना चाहिए जिससे उन्हें गर्भाशय के कैंसर से बचाया जा सके।
मैं समझ नहीं पाता हूँ कि वायरोलाॅजी और इम्यूनोलाॅजी पढ़ने वाले डाक्टर भी वैक्सीनेशन का समर्थन करने के लिए अपनी चेतना की हत्या करने के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? मैं अपने सभी डाॅक्टर्स से निवेदन करूँगा कि वे इन दोनों विषयों का पुनः अध्ययन करें और माइक्रोब्स के वैरिएशन्स की प्रक्रिया में वैक्सीनेशन की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने का प्रयास करें। आप लोगों ने एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध दुरुपयोग करके लोगों को रजिस्टेंट कर दिया है, डायक्लोफीनेक का दुरुपयोग करके गिद्धों को समाप्त कर दिया है। सावधान!स्मरण रहे कि आप स्वास्थ्य रक्षक हैं, रोगवर्द्धक नहीं। अपने चिकित्सक धर्म की उपेक्षा से आप पूरी मनुष्य प्रजाति के अस्तित्व को संकट में डाल सकते हैं।

मंगलवार, 2 जून 2026

भाजपा, गाय और मुसलमान

गोमाता को लेकर रुदन करने वाली भाजपा ने गाय के नाम पर वोट तो खूब बटोरे पर अब जबकि मुसलमानों ने ही गोवध को प्रतिबंधित करने की माँग कर दी है तो भाजपा राम और लक्ष्मण से विवाह के लिए ठुकराए जाने से क्रुद्ध हुई सूर्पनखा की तरह अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गयी है।

इस मानसिक आघात से उभरते ही भाजपा नेताओं की आई प्रतिक्रियाओं ने पूरे सनातनी समाज को अचंभित और आक्रोशित कर दिया है।

किंबहुना, यदि कोई मौलाना माँग करेगा कि हर हिंदू को प्रतिदिन मंदिर जाना चाहिए, या उसे शिखा रखनी चाहिए, या भारत को हिंदूराष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए तब भी हम उनकी माँग नहीं मानेंगे, क्योंकि यह कांग्रेस की चाल है। हम मुसलमानों को हिंदुओं के अधिकार छीन कर मुसलमानों को हर तरह के लाभ तो देते रहेंगे पर उनकी हर बात का विरोध भी करते ही रहेंगे चाहे वह माँग लोककल्याणकारी ही क्यों न हो।
वाह जी वाह! क्या बात है! कितने उत्तम विचार हैं योगी आदित्यनाथ जी के! देश धन्य हुआ, गोमाता भी धन्य हुयी।
रावण होता तो भाजपा नेताओं के ऐसे उपदेश सुनने के बाद समुद्र में सेतु निर्माण के लिए राम का पुरोहित बन कर कभी नहीं जाता और न राम को मनोरथ पूर्ण होने का आशीर्वाद देता।

गुरुवार, 28 मई 2026

बस्तर से अल्मोड़ा

जल, जंगल, जमीन...

उन्होंने कहा जल, जंगल, जमीन हमारी है, इसके उपभोग का अधिकार हमें है, हम तुम्हें यह सब छीनने नहीं देंगे।
ढपली वाले आये, खूब गीत गाये... "किरांती" वाले गीत, प्रकृति के संरक्षण वाले गीत!
नारे लगते रहे, ढपलियाँ बजाई जाती रहीं...
इस बीच 'चार' (चिरौंजी) और 'आँवला' के वृक्ष लुप्त होते रहे, जल पहुँच से दूर होता गया, और जंगल की जमीन पर पहले कुछ झोपड़ियाँ और फिर पक्के मकान उगते रहे। आमचो बस्तर की ऐसी दुर्गति के लिए उत्तरदायी कौन है?

कल अल्मोड़ा वाले मार्ग पर पैदल चलते-चलते देखा- एक स्थान पर एक बूढ़ी नानी अपने नन्हें से नाती को लेकर एक गाछ के पास गयीं और हँसिये से उसकी डालियाँ काटने लगी। मुझे उत्सुकता हुयी, पास जा कर देखा, अरे! यह तो 'काफल' है।
बूढ़ी नानी के नाती को 'काफल' खाना है, इसलिए माई डालियाँ काट रही थीं। डालियों में कुछ पके, कुछ अधपके और कुछ कच्चे काफल व्यथित हो उठे, मानो कह रहे हों - "आप पके काफल चुन लीजिए, पर डालियों को मत काटिये!"

विज्ञानद्वय (भौतिकशास्त्र और वनस्पतिशास्त्र) के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने सिद्ध किया था कि प्राणियों की तरह वनस्पतियों में भी चेतना होती है और वे बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर अपनी प्रतिक्रियायें देती हैं।
बूढ़ी नानी का हँसिया जैसे ही पहली डाल पर पड़ा, काफल का गाछ पीड़ा से चीख पड़ा.... जिसे देवभूमि की बूढ़ी नानी सुन नहीं सकीं। बस्तर में भी तो भीमा राजू कहाँ कभी सुन पाया पीड़ित-शोषित चार और आमला का रुदन!
बस्तर में चार और आँवला दुर्लभ हो गये..., देवभूमि में काफल दुर्लभ होता जा रहा है। तभी तो एक दोना काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है।
मैं उदास हूँ, इसलिए नहीं कि चार वर्ष पहले तक पचास रुपये प्रति दोना मिलने वाला काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है, अपितु इसलिए कि कुछ समय बाद यही काफल एक हजार रुपये में भी नहीं मिलेगा।
राजा ने राजसेवकों से राजमार्ग के किनारे पड़े पत्थरों के वक्ष पर लिखवा दिया है -
"वन से जल, जल से जीवन"।

राजसेवकों ने राजाज्ञा का पालन किया पर इसी बीच शब्दों का उनके अर्थों से तलाक करवा दिया गया। यहाँ हलाला की कोई व्यवस्था नहीं है और प्रेरणादायक नारे भी अब गूँगे हो गये हैं। 

ब्राह्मण कितने विदेशी!

नृवंशों के पलायन और ईरानियन नियोलिथिक फार्मर, मिडिल एशियाई स्टेपी और जाग्रोस आदि कई प्रकार के जेनोम की बहुलता की कहानी में एक जिज्ञासा उभरती है, जब सभी मनुष्य किसी एक ही आदिम स्त्री-पुरुष की संतान हैं तो भौगोलिक आधार पर उनके जेनोम्स में इतनी बहुलतायें क्यों और कैसे उत्पन्न हुई होंगी, और क्या बहुलता की यह शृंखला आज भी बढ़ती ही जा रही है!

यह एक रोचक जिज्ञासा है। यह सत्य है कि देश-काल-वातावरण के अनुसार लोगों को अपनी जीवनशैली में यथोचित परिवर्तन करने होते हैं जो जीवित रहने के लिए आवश्यक है। यह एक तरह का सूक्ष्म और अपेक्षाकृत स्थायी अनुकूलन है जो अंततः किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की शारीरिक-मानसिक संरचना पर दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। नृवंशों के पलायन और बसावट की यह एक अंतहीन स्थिति है जो सदा से होती आई है, सदा होती रहेगी।
हम सभी के पूर्वज घुमंतू से कबीलों, फिर गांवों, पुरों और नगरों से होते हुये राज्यों और देशों में बसते रहे हैं। यह उसी तरह है जैसे भारत के कुछ वनवासी क्षेत्रों में झूमकृषि परंपरा वाली सभ्यता।
जीवनशैली में दीर्घकालीन परिवर्तन अंततः शरीर और जेनोम्स की संरचना में एनाटाॅमिकल परिवर्तन करते हैं जो उनकी फिजियोलाॅजिकल स्थिति को भी किंचित परिवर्तित करते ही हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सिकलिंग के प्रभावितों में मलेरिया की प्रतिरोधी क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। सिकलिंग के रोगियों को मलेरिया नहीं होता। उनमें पाई जाने वाली हीमोग्लोबिनोपैथी का अस्तित्व ही मलेरियारोधी होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है।
अब हम ब्राह्मणों के विदेशी होने की सत्यता पर विचार करेंगे। जेनेटिक विश्लेषण बताते हैं कि वास्तव में हर देश का हर नागरिक विदेशी नृवंशों का मिश्रण होता है। जंबूद्वीप निवासी ब्राह्मणों में भी मिश्रित जेनोम्स पाये जाते हैं। एक समय जंबूद्वीपीय सभ्यता अपने किंचित स्थानीय अनुकूलनों के साथ एशिया के एक विस्तृत भूभाग पर कुछ साम्यताओं के साथ प्रचलित हुआ करती थी, जिसमें यव (जौं) एवं तंडुल प्रधान कृषि का बड़ा योगदान था। लैंडलाॅक क्षेत्र के निवासियों के विपरीत समुद्रतटीय क्षेत्रों के निवासियों की जीवन शैली में जलीय जीवजंतुओं और वानस्पतिक उपलब्धताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसी तरह की अन्य भिन्नताओं ने भी कई प्रकार के जेनोम्स को जन्म देकर कई नृवंशों को जन्म दिया। तो हम ब्राह्मणों के जेनोम्स का विकास जाग्रोस पर्वत (वर्तमान ईरान) से लेकर सिंधुघाटी तक के क्षेत्र एवं बहुत थोड़ी मात्रा में वर्तमान एशिया और वर्तमान यूरोप के एशियाई सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के मिश्रण से माना जाता है। जेनोम्स में परिवर्तन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम है।
एक समय तो भारत का सीमा विस्तार तिब्बत से लेकर पश्चिम में बैक्ट्रिया और जाग्रोस तक था ही। क्या तब के अफ़ग़ानिस्तान और जाग्रोस के आसपास बसे लोग भारतीय नहीं थे! क्या आज के पाकिस्तानियों को भारतीय नृवंशों का वंशज नहीं माना जायेगा!
जाग्रोस पर्वत शृंखला से निकलने वाली कारुन, करखेह और देज नदियों के उपजाऊ क्षेत्रों में बसे "जाग्रोस जेनोम युक्त" लोगों का सिंधु नदी घाटी के लोगों से मेल-मिलाप स्वाभाविक है, इसे तत्कालीन परिस्थितियों की दृष्टि से देखिये, कौन विदेशी है!
मैं हिंदी पट्टी की जनजातीय सहित सभी समुदायों और अफ्रीकी जनजातीय लोगों की जीवनशैली, परंपराओं, गीतशैली, और उच्चारण में अद्भुत समानता से सदा अचंभित होता रहा हूँ। हमारे उच्चारण और जीवनशैली में अफ्रीका हमारे बहुत समीप है जबकि यूरोप से हमारा कुछ भी साम्य नहीं मिलता।
मनुस्मृति की सुनी सुनाई एक-दो बातों को लेकर मनुस्मृति के प्रति घृणा और तिरस्कार की तरह ही जेनेटिक्स जैसे क्लिष्ट विषय का मात्र एक वाक्य पढ़कर और शेष संदर्भ को छिपाकर कोई नया सत्य नहीं गढ़ा जा सकता।

गुणांतरण

राजा

अपराधी मानता है
विद्यालय में
प्रवेश लेने के पहले से ही
हर उस विद्यार्थी को
जिसने लिया है जन्म
किसी ब्राह्मण
या क्षत्रिय
या वैश्य कुल में,
बस, इतना ही पर्याप्त है
चलाने के लिए उस पर
कई गंभीर अभियोग
कई काल्पनिक अपराधों के लिए।
दंड का भागी है वह विद्यार्थी
किसी भी काल्पनिक आरोप में,
यह न्यायालय का नहीं
राजा का निर्णय है
उन पूर्वाग्रहों पर आधारित
जिनका नहीं मिलता
कोई प्रमाण।
प्रजा ने याचना की
खीझकर
दुःखी होकर
निराश होकर
मिथ्यारोपों से व्यथित होकर
कि पद
और राजसेवायें तो कर ही दी हैं पृथक
अब
पृथक कर दो
हमारे विद्यालय भी
हमारे विश्वविद्यालय भी
हमारे चिकित्सालय भी
हमारे न्यायालय भी
और
हमारी पुलिस भी।
"स-वर्णों के लिए स-वर्ण
अ-वर्णों के लिए अ-वर्ण"।

यद्यपि
कोई सुदामा
न खड़ा, न लड़ा
तथापि
राजा रहा अड़ा
उसे चाहिए
केवल व्यवधान
समाधान नहीं
इसलिए उसने प्रारंभ करवा दिये हैं
देश भर में हिंदूकुश...
केवल हिंदूकुश,
क्योंकि वह स्वप्न देखता है
विश्वगुरु बनने के
दादा ईदी अमीन बनने के
रावण बनने के
और ईश्वर बनने के भी।
उसने पढ़ा था बचपन में
"सर्वाइवल आॅफ़ द फिटेस्ट" से ही
होता है स्थापित
पहले वर्चस्व
और फिर
विकास...
एक कोषीय से बहुकोषीय
अमीबा से वानर
फिर वानर से मानव।
राजा प्रगतिशील है
वह विकास करेगा
नीम को आम बनायेगा
बेर को केला
पैरों को मस्तिष्क
और
गुदाद्वार को मुँह
करके विच्छेद
मस्तिष्क और मुँह का,
समूल उच्छेदित कर
आम और केला।
राजा
नान-बायोलाॅजिकल है
देना चाहता है "अ-वर्णों" को
सारे अधिकार
छीनकर स-वर्णों से,
देना चाहता है नीम और बेर को
आम और केले के गुण।
यही है राजा का अभियान
"गुणांतरण"
ठीक
जैसे "धर्मांतरण"।

मंगलवार, 12 मई 2026

ग्लानिर्भवति भारत

हमने विश्वास किया 

उस पर

स्वयं से भी अधिक
और सम्मोहित हो
देखते रहे वही
उतना ही
जो 
और जितना
दिखाता रहा वह ।
हम नहीं देख सके वह सत्य
जो वह छिपाता रहा सबसे
यह चमत्कार ही था
काला जादू सा
कि हम देख पाते हैं
केवल वही
और केवल उतना ही
जो 
और जितना
दिखाना चाहता है वह
सामने खड़ी
सम्मोहित भीड़ को।
फिर एक दिन अनायास
एक तीव्र चक्रवात ने
रख दिया उधेड़ कर
और दिखा दिया वह भी
जो नहीं देख सके हम
अपनी खुली आँखों से कभी।
वह प्रवंचक
संत का वेश धर
पल-पल करता रहा सीताहरण
और अब
जबकि लुट चुकी हैं
सभी सीतायें
उसने उलट दी है
हमारी झोली
जिसे लेकर
इतने वर्षों से
वह दिखाता रहा था काला जादू
लूटता रहा था हम सबको
दिखा-दिखा कर कूट चमत्कार
लुटाता रहा था रेवड़ियाँ
शत्रुओं को हमारे
छीनकर हमसे ।
आज उसने फिर फेका है जाल
कि फिर बचायें हम 
बहुत सा धन
काटें
अपना पेट और तन
कि वह फिर लुटा सके रेवड़ियाँ
हमारे शत्रुओं को।

रविवार, 3 मई 2026

हो रहा शत्रुबोध

तुम "प्रतिभा" को

"सामान्य" कहते हो
क्या सचमुच
प्रतिभा "विशिष्ट" नहीं होती?
तुम जिन्हें विशिष्ट मानते हो
उन्हें आरक्षण देते हो
क्योंकि
तुम जानते हो
उनमें प्रतिभा होती
तो यह शिथिलता नहीं होती
तब
तुम उन्हें भी नष्ट करने के
षड्यंत्र करते।
तुम्हारा शत्रु
न अगड़ा है, न पिछड़ा
न दलित, न कोई और
केवल वह है
जिसमें प्रतिभा है
मैं इसे
संज्ञाओं से बलात्कार कहता हूँ
अर्थ को अनर्थ
और अनर्थ को अर्थ करने का
षड्यंत्र कहता हूँ।
तुम इसी तरह
सदा से नष्ट करते रहे हो प्रतिभायें
मूर्खों को दास बनाने
और प्रतिभाओं को
कुंठित करने के लिए,
तुम हत्यारे हो
प्रतिभाओं के ही नहीं
मानवता के भी।
तुम
कभी गोरे अंग्रेज होते हो
कभी काले अंग्रेज होते हो
वास्तव में
तुम मानवता के
सबसे बड़े शत्रु होते हो। ।

शनिवार, 2 मई 2026

ब्राह्मण की बेटी

दिन

मजदूर दिवस
वर्ष 
दो हजार छब्बीस।
पुणे का नसरापुर गाँव
गाँव का प्यासा भीमाजी कांबले
एक ब्राह्मण बच्ची
आयुषी कुलकर्णी
आई थी ननिहाल
एक दलित
एक ब्राह्मण
दलित ने देखे पैंसठ वसंत
बच्ची ने चार
बच्ची को नहीं पता वसंत
दलित को पता
वसंत में कैसे करते हैं पतझड़।
बच्ची के पूर्वज
आये थे यूरेशिया से
ऐसा लोग कहते हैं।
भीमाजी के पूर्वज
मूलनिवासी
ऐसा लोग मानते हैं।
सत्य
कितने लोग जानते हैं!

दो-

सरकार कहती है
नेता कहते हैं
इस देश के संसाधनों पर
पहला अधिकार
दलितों का
अर्थात
उपभोग के लिए
धरती उनकी, विधान उनका
देश उनका, न्याय उनका
सरकार उनकी
और
नन्हीं सी बच्ची भी उनकी
इसलिए
मूलनिवासी ने किया
यूरेशियन बच्ची से यौनदुष्कर्म
फिर पीटा, पत्थर से कुचला
फिर गाड़ दिया
गोबर के ढेर में।

तीन-

सम्राट ने
अदला-बदली कर दी है
संज्ञाओं की
एक अच्छे समाधान के लिए
अब
कुकर्म को पुण्य कहना
हत्या को मोक्ष कहना
अपराध को न्याय कहना
पीड़ित को उत्पीड़क कहना
सच्चा समाधान है
दलित हितकारी है।
इस नव्य न्याय के अनुसार
पीड़ित वह बच्ची नहीं
वह दलित वृद्ध है
और उत्पीड़क वह वृद्ध नहीं
वह बच्ची है
अतः
गोबर के ढेर में से
निकालकर बच्ची का शव
कड़े से कड़ा दंड दो
दलित को
भारतरत्न दो
और लिपिबद्ध करो
इतिहास की नन्हीं सी
एक बूँद यह भी
कि दलित प्यासे हैं
पिछले पाँच हजार सालों से।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

भगवान

वह सृजित करता है 

जातियाँ ही नहीं, 

पाप

पुण्य 

और भगवान भी। 

वह 

समुच्चय है 

सभी शक्तिमानों की शक्तियों का

अवतारी है

स्वयं भी

बात करता है ईश्वर से

बात के निपात से 

सबको अचंभित करता है। 

उसके राज्य में 

जो भी सच बोलता है

वह 

उसे मार कर खा जाता है। 

वह चढ़ता है

सीढ़ियों पर रखकर अपने चरण

कुचलकर दमन करते हुए 

हर उपभोग की जा चुकी सीढ़ी का।

वह पिछड़े से दलित हो गया 

बनते-बनते विश्वगुरु 

नहीं बन सका विश्वगुरु 

पर बन गया

अवतारी भगवान

भगवान की जय हो!

जो नहीं बोलेगा जय 

वह मारा जाएगा

साक्षात काल के हाथों

इसलिए

भगवान की बार-बार जय हो!

रविवार, 19 अप्रैल 2026

संविधान संशोधन

वज्जीसंघ की अट्टकुलीय राजधानी वैशाली में राजपुत्रों के हठ पर एक विधान पारित हुआ- आठों राज्यों में जो भी होगी अनिंद्य सुंदरी कन्या वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे नगर की वधू होकर "नगरवधू" कहलाएगी। 

मातृहीना ब्राह्मण कन्या आम्रपाली को उसके पिता ने पूरे नगर की दृष्टि से छिपाने के यथासंभव प्रयास किए पर वह अनिंद्य सुंदरी थी, ख्याति प्रकाशित हुई और अंततः राजपुत्रों ने उसका अपहरण कर लिया।
मगध में राजकुल की कुदृष्टि ने एक ब्राह्मण कन्या को समारोहपूर्वक नगरवधू बना ही लिया।
फिर एक दिन आम्रपाली के देखते ही देखते वज्जीसंघ बिखर गया। 
औपनिवेशिक पराधीनता के बाद भारत में एक बार पुनः लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य स्थापित हुआ, आयु है लगभग आठ दशक मात्र। एक बार पुनः भारत के नये राजा ने ब्राह्मणों को जन्म लेते ही अपराधी घोषित कर दिया है। तब वज्जीसंघ का पराभव हुआ, अब इस राजा की बारी है।
नये सम्राट संविधान में परिवर्तन (संशोधन नहीं) करके
सदन में स्त्रियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे, पर वज्जीसंघ के आठ राजाओं के राजपुत्रों की तरह भाग्यशाली नहीं निकले, संविधान में अतार्किक और अव्यावहारिक परिवर्तन नहीं कर सके। सम्राट तो सदन में स्त्रियों की संख्या नहीं बढ़ा सकेगा, किंतु वैशाली की नगरवधू भारत को  पुनर्जन्म देने के लिए तैयार हो चुकी है।
अभी, जब स्त्री सांसद उनकी दृष्टि में पर्याप्त नहीं हैं तब भी तो सदन चल नहीं पाता, सदस्य संख्या बढ़ने से...
सांसदों में तलवारें अवश्य चलेंगी।
तलवारें चलेंगी तो वज्जीसंघ का उपसंहार हो जाएगा। फिर कोई राजपुत्र किसी ब्राह्मण की अनिंद्य सुंदरी कन्या को नगरवधू बनाने का बिल पारित करने का हठ नहीं करेगा। हम मगध के नये जन्म का स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

वंचितx१०टु द पाॅवर पाँच लाख

अठारहवीं शताब्दी के तीसरे दशक में

सिंधिया राजवंश के संस्थापक
राणोजीराव सिंधिया को
नहीं था पता
कि बीसवीं शताब्दी में
जब जातीय वर्गीकरण करेगा
कोई राजा
वह चिन्हित करेगा
सिंधिया के वंशजों को
पिछड़ा।
महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया
हो गये हैं अब
वंचित, पीड़ित शोषित
और पिछड़ा।
ना...ना...
भगवान ने नहीं
किसी ब्राह्मण ने नहीं
किसी पंडित ने नहीं,
एक अति पिछड़े सम्राट ने
जो कुछ वर्ष पहले ही बना था
पिछड़ा,
फिर एक दिन अचानक
बन गया अति पिछड़ा भी
उसी ने...
उसी सम्राट ने बना दिया
महाराजा राणोजीराव सिंधिया के
राजवंश को
पिछड़ा।

किसी को नहीं पता
कब कोई राजा बना देगा
किसी को भी दलित या अगड़ा
पिछड़ा या अति पिछड़ा
या कुछ और ...
यथा,
अति-अति पिछड़ा
या नितांत गड़बड़ा
या धरती का
"सर्वाधिक वंचित
इन टु टेन टु द पाॅवर पाँच लाख...
साल से प्यासा" ।

राजा घोषित करता है
पहले स्वयं को अछूत
फिर किसी को भी अछूत
और थोप देता है
अपने सारे अपराध
ब्राह्मणों पर
कोसते हुये उनके पूर्वजों को
और देते हुये दंड
उनके वंशजों को,
सदा से
यही तो होता आया है
अन्यथा आप ही बताइए
किस पंडित ने
कब बनाई थीं
जातियाँ
और उनके वर्गीकरण?

संकल्प

'गंगा-यमुना' भी मेरी

'कूभा' भी मेरी
रणजीत-दाहिर की
धरती भी मेरी।
टुकड़े-टुकड़े भी गिनने को
अब ना बचेंगे
सदी आठवीं से जो सहते रहे हैं।
'गंगा-जमुनी है तहज़ीब'
रटते रहे जो
वार छल से वही
हम पे करते रहे हैं।

नवासों के नवासों को भी शरण दी
अपने घर हम तभी से
गँवाते रहे हैं।
चाहते 'शांति' हम
'जंग' पर वो अड़े हैं।
'भाईचारे' के धोखे में
क्यों सब पड़े हैं!
"सर तन से जुदा" भी
वो कर रहे पर
गुणसूत्र उनमें
खोजते हम रहे हैं।
देश लुटता रहा
देखते सब रहे हैं
झूठे गीतों में हम सब
भरमते रहे हैं।
हम गुणसूत्र अपने
उधर खोजते हैं
वो गुणसूत्र अपने 
हमें दे रहे हैं।
उनकी तहज़ीब में
रेत की आँधियाँ
गंगा-यमुना पे आँखें
गड़ाये रहे हैं।
ये बेचते सदा
स्वाभिमान सबका
कलंकित धर्म-वेद करते रहे हैं।
अब ना हम रुकेंगे
ना कुछ सहेंगे
प्राण अर्पित भी करने पड़े तो करेंगे।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

यह रथ खड़ा क्यों है!

आरक्षण से समानता का हठ, किंवा कृष्णपक्ष की रात्रि में सूर्योदव का आश्वासन!

शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से लेकर शासकीय सेवाओं में पदोन्नति तक आरक्षण, चुनाव पात्रता में जाति के अनुसार जातीयआरक्षण और फिर लिङ्ग के आधार पर लैङ्गिकआरक्षण, पेट्रोल पंप आवंटन में आरक्षण...; और उनका सिद्धांत है कि आरक्षण से ही समाज में समानता ला पाना संभव है।

कोई अतिविद्वान आरक्षण शब्द का विश्लेषण नहीं करता, जो इसके लपेटे में हैं वे भी नहीं।
जैसे ही हमारे सामने सजा-धजा आरक्षण शब्द प्रस्तुत किया जाता है, सबसे पहले जो चित्र उभरता है वह है पात्रता के मानदण्डों में अनैतिक शिथिलता, दूसरा है इससे प्रभावित किसी सुपात्र की अन्यायपूर्ण उपेक्षा, तीसरा है परिणामों में गुणात्मक अपेक्षा का अभाव, चौथा है किसी सुपात्र की प्रतिभा से समाज और देश को वंचित करने का हठपूर्ण अपराध, और पाँचवा है किसी सुपात्र को कुंठा की कालकोठरी में एक अनपेक्षित जीवन जीने के लिए बाध्य कर देना।
'आरक्षण' की अवधारणा सामाजिक विषमता के सिद्धांत पर आरुढ़ होकर राजसिंहासन का पथ प्रशस्त करती है। यह एक से छीनकर दूसरे को उपकृत करने की अनैतिकता को समाज पर थोपने का षड्यंत्र है। यह लोकतंत्र का विधिसम्मत बना दिया गया परिहास है।  यह एक ऐसा विधान है जो अविधिक और अलोकतांत्रिक है। यह उठकर दौड़ सकने की संभावनाओं की निर्मम हत्या है। यह संभावनाओं को अपंग बनाने का षड्यंत्र है।
आरक्षण एक ऐसा चक्रविहीन रथ है जो कभी गति नहीं कर सका इसलिए पिछले लगभग आठ दशकों से एक ही स्थान पर खड़ा है, और अब तो तुम्हारी ही प्रेरणा से जिसने खड़े रहने को ही अपना मौलिक अधिकार मान लिया है।
किसी व्यक्ति में उसकी नैसर्गिक सक्रियता की संभावनाओं को निष्क्रियता में ढालने का यह हठ समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को अपंग बना रहा है। आठ दशकों से आरक्षण का रथ आज भी वहीं खड़ा है।
ब्रिटिश शासकों की तरह तुम भी कुटीर उद्योगों और शिल्पों के स्वैच्छिक चयन को जातीय कुप्रथा कहकर निंदा करते रहे और परंपरा से प्राप्त दक्षता-प्रवीणता को समाप्त करने के लिए जातीय ढाँचों का निर्माण करते रहे। तुम जातियों का विरोध करके भी जातियाँ बनाते रहे, जातियों के वर्ग और उपवर्ग बनाते रहे, फिर उन सबको भी कभी इधर कभी उधर करते रहे। यह सब न तो प्रकृति के संविधान के अनुरूप है और न किसी ब्राह्मण के धर्मपथ के अनुरूप। तुम्हें यह अच्छी तरह बोध है कि यह सब अनुचित है और इतिहास कभी तुम्हें क्षमा नहीं करेगा इसीलिए महान बनने की महत्वाकांक्षा में तुम षड्यंत्रपूर्वक अपने कुकर्मों के लिए ब्राह्मणों पर दोषारोपण की ब्रिटिश चाल चलते रहे।
ब्राह्मण तो सदा की तरह आज भी जातीय विषमता को स्वीकार नहीं करता। और तुम जातिप्रथा का विरोध करते-करते न केवल जातियाँ बनाते रहे अपितु उनमें घृणा के बीज भी बोते रहे। यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर विदेशी औपनिवेशिक शासकों की परंपरा को ही आगे बढ़ाते हुए तुम्हारा सुनियोजित आक्रमण है जिसके लिए इतिहास में तुम्हारा अभिलेखांकन किया जा चुका है।

जीवनशैली निषेध

"हिंदू प्रतीकों पर प्रतिबंध, बुर्का और गोल टोपी से कोई आपत्ति नहीं"।

लेंसकार्ट कंपनी के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल द्वारा अपने अधिकारियों/कर्मचारियों को तिलक, कलावा, शिखा, मंगलसूत्र, बिंदी और सिंदूर आदि हिंदू प्रतीकों के साथ कार्यस्थल पर आने और काम करने पर  प्रतिबंध लगा दिया गया। वहीं बंसल को मुस्लिम अधिकारियों/कर्मचारियों के सांप्रदायिक प्रतीकों से कोई आपत्ति नहीं है।
बात बाहर आई तो बंसल ने पत्रकारों के सामने स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि यह आदेश पुराना (फ़रवरी २०२६ का) है, और वर्तमान में अब यह प्रभावी नहीं है।
१९४७ में जब दुनिया के सबसे बड़े और क्रूर नरसंहार के साथ सांप्रदायिक और जीवनशैली के आधार पर देश का विभाजन हुआ था तब क्या किसी ने ऐसी कल्पना की होगी कि खंडित भारत में भी हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के पालन की स्वतंत्रता नहीं होगी!
ईसाई और मुस्लिम शिक्षण संस्थाओं और कभी-कभी तो शासकीय संस्थाओं में भी छात्र-छात्राओं के साथ, हिंदू प्रतीक मिटाने के लिए प्रताड़ना की घटनाएँ होती रहती हैं जिन पर सरकारों का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है।

No Lenskart
#पीयूषबंसल की कंपनी लेंसकार्ट के उत्पादों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। लेंसकार्ट स्टाॅक एक्सचेंज में भी शेयर्स के लिए सूचीबद्ध है। आप यदि शेयर बाजार में ट्रेड या निवेश करते हैं तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि लेंसकाॅर्ट के शेयर्स का सदा के लिए बहिष्कार करने पर गंभीरता से विचार करें।
जिस कंपनी ने हमारे पारंपरिक प्रतीकों का बहिष्कार कर दिया, उस कंपनी के शेयर्स का भी बहिष्कार किया जाना आवश्यक है। सारा संघर्ष सांप्रदायिक पहचान के वर्चस्व को लेकर ही तो है। हमें किसी के विचारों और जीवनमूल्यों से तब तक कोई प्रयोजन नहीं जब तक वह हमारे जीवनमूल्यों और अस्तित्व में अनधिकृत हस्तक्षेप नहीं करता।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

जयंती जो बन गई घृणा

जैसी कि भूमिकायें रची जा रही थीं, तदनुरुप ही भीमराव जयंती किसी उत्सव से अधिक घृणा, उत्तेजना और अपमानजनक गतिविधियों की प्रतीक बन कर रह गई।

स्वयं को हिंदू नहीं मानने की प्रतिज्ञा के प्रतीकस्वरूप मनुस्मृतिदहन, राममंदिर के परंपरागत ध्वज को निकालकर नीलेध्वज लगाने, जूते पहनकर परशुराम चौक की छतरी पर चढ़ने और ब्राह्मणविरोधी नारों के साथ अंबेडकरजयंती मनाई गई। क्या जयंती मनाने का यही स्वरूप होता है! इसमें आनंद नहीं उन्माद था, उत्सव नहीं घृणा का प्रदर्शन था, सामाजिक सौहार्द्य नहीं ब्राह्मणों को भारत छोड़ने की धमकी थी, किसी महान विचार का प्रचार नहीं आत्ममुग्धता का हठ था।
क्या ये सब मनोभाव किसी समाज को उत्थान की ओर ले जा सकते हैं! पूरे देश में हर्ष के स्थान पर आशंकाओं और भय का वातावरण निर्मित कर दिया गया। क्या इसमें भारतीय संस्कृति की लेश भी झलक मिल सकी किसी को?
भगवाध्वज के पतन और नीले ध्वज की विजय के उन्माद से यह कैसे भारत की कल्पना की जा रही है?
भारत ने ऐसे झंझावात न जाने कितनी बार झेले हैं, कहीं यह एक और झंझावात का प्रथम चरण तो नहीं?
विगत कुछ दशकों से हिंदूवादी चोले में छिपे असुरों की गतिविधियों और हुंकारों को देख-सुन कर भी उनके लक्ष्यों को
पहचानने में हमसे बहुत बड़ी भूल हुई है। इसका मूल्य चुकाने के लिए हमें तैयार रहना होगा।
भारतीय समाज आपसी टकराव और व्यापक हिंसा की ओर बढ़ चला है। अब तो दृढ़ संकल्प और लोककल्याणकारी भाव के साथ हमें संगठित होना ही पड़ेगा, इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। यही समय का आह्वान है और शास्त्र का आदेश भी।
अच्छी बात यह है कि दलित और पिछड़े वर्ग के ही कुछ संगठनों ने आयोजन के ऐसे विकृत स्वरूप का विरोध किया है। अस्तु विश्वास है कि भारत का विवेकशील समाज संगठित होकर इस झंझावात का भी सफलतापूर्वक सामना कर लेगा।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

राजपथ

जिसने किया प्रथम बार

दशमलव का व्यवहार
जिसने किया प्रकाशित
वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात
जिसने सुलभ कर दीं
ज्यामितीय रचनायें
और खगोल के रहस्य
जिसने सुयोजित किये सूत्र
त्रिकोणमिति और क्षेत्रमिति के...
ऐसे प्रकाण्ड विद्वान को
धकेल दिया जाता है
नेपथ्य के किसी कोने में
क्योंकि वह नहीं कर पाता
प्रभावित
मतदान और उसके परिणाम।
भारत में
नहीं होता किसी को गर्व
आर्यभट्ट पर
क्योंकि वह ब्राह्मण है
जिसने पीने नहीं दिया
नीर
पाँच सहस्र वर्षों तक
पता नहीं किन्हें?

उसी भारत में
पलकों पर बैठ गया
जिसने त्याग दिया
अपने पूर्वजों का धर्म
अपनी सांस्कृतिक परंपरायें
करते हुये निराधार आलोचनायें
ब्राह्मणों की,
करते हुये दासता
ब्रिटिश महारानी की,
वही होता है पूज्य
और प्रातःस्मरणीय
स्वाधीन भारत में
क्योंकि वह
संपन्न और शिक्षित होकर भी
रहता है दलित...
एक जाति
सत्तारचित
ताकि प्रतिभावान
यदि ब्राह्मण हो
तो दी जा सकें उसे गालियाँ
करने प्रशस्त
अपने-अपने राजपथ।

गणितज्ञशिरोमणि आर्यभट्ट!
तुमने जन्म ही क्यों लिया
कुसुमपुर में!
तुम्हें तो
स्मरण करता है पेरिस
प्रतिपल
जहाँ तुम गये नहीं
जीवन में कभी ।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

हिंदूधर्म

वह सत्ता पाने के लिए धर्म को पृथक  पहचान देता है। उसके नाम में स्वामी है, प्रसाद है और मोर है। तीनों शब्द उस धर्म के अनुयाइयों और संस्कृति में आदरणीय हैं जिसे भारत में "धर्म" की संज्ञा प्राप्त है।

वैदिकभारत के महर्षियों ने सामाजिक और व्यक्तिगत मूल्यों की ऊर्ध्वमुखी गति को प्रशस्त मानते हुये कुछ श्रेष्ठ आचरणों और मनोभावों को पहचान कर लोकहित में प्रकाशित किया, और इसे धर्म की संज्ञा दी। कदाचित् प्रारंभ में यह ब्राह्मणों द्वारा आचरणीय हुआ, इसलिए यह लोक में ब्राह्मणधर्म नाम से भी जाना गया। इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य तीनों वर्णों का धर्म से कोई विरोध था। सभी लोग धर्म के प्रति आदरभाव रखते थे और अपनी-अपनी क्षमतानुरूप उसके आचरण का प्रयास करते थे। शतप्रतिशत अंक लाने वाले को धार्मिक और दस अंक लाने वाले अधार्मिक कभी नहीं माना गया। अधार्मिक वही थे जो धर्मप्रतिकूल आचरण किया करते थे। इस तरह आचरण के आधार पर दो समूह के आचरण वाले समाज में सदा से देखे जाते रहे हैं, आज भी हैं- धार्मिक और अधार्मिक। अपनी पृथक पहचान के लिए ध्वज, नाम, संज्ञा आदि में बहुलता और विशिष्टता एकदेशज तो हो सकती है पर व्यापक नहीं। वैदिक धर्म को ही विभिन्न कालखंडों में ब्राह्मण धर्म, आर्य धर्म या हिंदू धर्म की संज्ञायें दी जाती रहीं, इन सबकी पहचान एक ही है, तात्विक अवधारणा भी एक ही है। इसलिये यह कहना कि हिंदू धर्म का कोई शास्त्रोक्त उल्लेख नहीं है, उतना ही सत्य है जितना यह कहना कि भारत और इंडिया दो पृथक देश हैं क्योंकि वेदों-पुराणों आदि में तो इंडिया कहीं लिखा ही नहीं है।
परवर्ती कालों में स्थानीय मान्यताओं, मूल्यों और सभ्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न मत और संप्रदाय भी अस्तित्व में आते रहे जिन्हें राजनैतिक कारणों से धर्म न होते हुये भी धर्म की संज्ञा दी जाती रही। इस सौरमंडल में धरती एक है, सूर्य एक है, धर्म भी एक है, ये अनेक नहीं हो सकते।
सभी धर्म ईश्वर का मार्ग बताते हैं, यह बड़ी धूर्तता से गढ़ा गया कुविचार है जैसे यह विचार कि ब्रह्माण्ड के सभी स्थूल पिंड एक समान होते हैं।
धर्म को लेकर नाम और पहचान का संकट राजनैतिक धूर्तता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हाँ! इसे कलियुग में पतन की प्रतिस्पर्धा अवश्य माना जा सकता है।
विविथता और अनेकता में एकता का उपदेश कितना तात्विक है!
सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, धूम्रकेतु, वामन तारा और कृष्णविवर आदि ब्रह्माण्डीय पिंडों के विभिन्न समूहों को एक ही कैसे मानना जा सकता है? यदि ये सब एक ही होते तो इनकी विविथता का कोई औचित्य ही नहीं था। सबका रक्त एक समान होता तो इनके चार समूह क्यों होते और क्यों उनमें इनकाम्पेटिबिलिटी होती?
सत्ता के लिए निर्मित चक्रव्यूहों का अस्तित्व उनके पूर्ण होने तक ही रहता है, उसके बाद नहीं। धर्म और अधर्म का ध्रुवीय अस्तित्व सदा रहता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

भगनील दर्शन

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा!

जिसमें मिला दो, लागे उस जैसा ।।

संघ और भाजपा का अध्यात्म दर्शन इसी महान गीत से ऊर्जित है। संघ और भाजपा के अभी तक के चरित्र और कार्यों से स्पष्ट हो चुका है कि उनका अपना कोई रंग नहीं, अपना कोई सिद्धांत नहीं, अपना कोई चिंतन और विचार नहीं। उनका एकमात्र लक्ष्य और धर्म राजसिंहासन है जिसे प्राप्त करने के लिए वे जिसमें "मिलते" हैं उसका ही रूप-रंग-सिद्धांत-आदर्श ...सब कुछ "ग्रहण" कर लेते हैं। आप इसे चार्वाक दर्शन का परिवर्द्धित रूप मान सकते हैं।
इसका वर्तमान उदाहरण विचारणीय है, जिसमें भाजपाइयों का रंग भगवा से नील हो गया है, यही है भगनील दर्शन। वास्तव में यह तो 'हमारा' मूल्यांकन था कि संघ और भाजपा सनातन संस्कृति के लिए समर्पित संगठन हैं। हमारा यह मूल्यांकन त्रुटिपूर्ण था, सत्य यह है कि ये लोग न कभी भगवा थे, न आज नीले हैं, न कभी हरे होंगे। ये लोग अपने लक्ष्य के लिए भगवा, नीला, हरा... या किसी भी अन्य रंग में अपनी सुविधानुसार मिल कर वैसा ही रंग-रूप-ग़ुण-सभ्यता-संस्कृति... आदि ग्रहण कर लेने की "अनुकूलन क्षमता" से संपन्न हैं। ये प्रवचनप्रिय लोग सतोगुण से द्वेष रखते हुये रजोगुण और तमोगुण प्रधान हैं तभी तो इतने घनघोर भौतिकवादी हैं। रजोगुण की एक विशेषता होती है- Association and Dissociation, अर्थात इन्हें स्थायित्व अच्छा नहीं लगता। इसको अपनाया, उसको त्यागा, भगवा त्यागा, नीला अपनाया, कल को नीला त्यागकर हरा अपना लेंगे, फिर कुछ समय पश्चात हरा त्यागकर काला अपना लेंगे। इससे एसोसिएशन, उससे डिसोसिएशन... किसी भी तरह चिड़िया की आँख का बेधन होना चाहिए। यही सच्चा ईश्वर है, यही सच्चा धर्म है, यही सच्चा मार्ग है, ....और जीवन का सारतत्व भी यही है। जब पूरा देश "हिंदुत्वा" के चक्रव्यूह में उलझा हुआ था तब संघ और भाजपा अपने अगले रंग का चयन करने में व्यस्त थे। नील तो आ गया, अब हरित रंग की प्रतीक्षा है।
अब यह अष्टकुलीय वज्जीसंघ की प्रजा को निर्णय करना होगा कि मगध के राजसिंहासन का रंग क्या होना चाहिए!

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

नया भगवान

हठ कर बैठ गया

आमरण अनशन पर
सोचकर
कि कल तक
पंक्तिबद्ध खड़े होंगे
कई मंत्री
लेकर संतरे का रस।
मैं नहीं पिऊँगा रस
करूँगा हठ
"मैं तो चंद्र खिलौना लै हों"।
फिर
जब मनुहार करेगा विश्व
तो पी लूँगा रस
गटागट
फिर मैं करूँगा
विजयनृत्य
जय जयकार होगी मेरी
मिल जाएगा मुझे
धरती का सबसे बड़ा पुरस्कार
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।

पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

धूम्रकेतु

संविधान है तो क्या हुआ
दिन-प्रतिदिन बढ़ते अत्याचारी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
वेद हैं तो क्या हुआ
अज्ञानी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
राम-कृष्ण की गाथायें हैं तो क्या हुआ
गाथाओं के उपहासक भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।

विक्रय हेतु उपलब्ध हैं
मंडी में मूर्तियाँ
निराकार की
होने के लिए व्याख्यायित
हमसे, तुमसे
और उनसे भी
जिन्हें नहीं होता कोई लेना-देना
किसी भी मूर्ति से।

न्याय के मंदिर में
नहीं सुनाई देती पवित्र शंखध्वनि
सुनाई देती हैं व्याख्यायें
भिन्न-भिन्न
एक ही धारा की।
सच कभी 'झूठ' हो जाता है
तो झूठ भी हो जाता है 'सच'
झूठ नहीं हो पाता 'झूठ'
सच नहीं हो पाता 'सच'
मौन रहती हैं सूर्य रश्मियाँ
नतशिर
कंपित
देखकर सूर्य को
जाते हुए अस्ताचल।

चर्चित होते हैं
कुछ पात्र
अपनी मृत्यु के पश्चात
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ।
राम, कृष्ण, बुद्ध और ईसा
गांधी, भीमराव और पेरियार
जीवित होते तो देखते
वे क्या थे, क्या हो गये
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ
जिनका नहीं है कोई संबंध
उनके होने से।

आने वाला है
लोकतंत्र का पंचवर्षीय पर्व
भगवा 'नीला' हो गया है
'नीला' भीम हो गया है।
कहा था वेदव्यास ने
आते ही अरुण के
नहीं रहता शून्य का नील
और नील जब होता है व्याप्त
कर देता है वध
अरुण का।
अरुण
अब नहीं है कहीं
धूम मची है
भीम की
पिछड़ा भीम, अगड़ा भीम
मेरा भीम, तेरा भीम
इसका भीम, उसका भीम
जितने लोग, उतने भीम।
भीम 'संविधान' हो रहा है
संविधान 'भीम' हो रहा है।
शक्ति 'सीता' बनकर
बैठी है शोकमग्न
अशोक वृक्ष के नीचे
श्रीराम की प्रतीक्षा में।
सीता के लिए
स्थायी है तमस
आने-जाने का काम तो
प्रकाश का है
जिसे
अब चाहता ही कौन है!

बहुत शक्तिशाली हैं
मायावी धूम्रकेतु
कोई वाशिंगटन में
कोई तेहरान मे
और भारत में तो
बड़ी भीड़ है इनकी।
क्या सचमुच
तैयार हो रहा है समय
लेकर करवट
सत्यमेव जयते के लिए!

रविवार, 5 अप्रैल 2026

शत्रुबोध की पैथोलाजिकल फिलासफी

आज का ज्वलंत विषय है नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा अर्थात अपसंस्कृति का कूटनीतिक चरित्र।

विश्व भर में नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा वर्तमान सभ्यता की सबसे बड़ी समस्यायें बन चुकी हैं। इनका मानवीकरण किया जाय तो ये वैचारिक और राजनीतिक हिंदूकुश की घटनायें हैं जो प्रतिपल घटित होती जा रही हैं।

दर्शन और भौतिक विज्ञान में सूक्ष्म की विराटशक्ति को स्वीकार किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से एक हिंदू संगठन को हम अपने सनातनी समाज का एक महत्वपूर्ण अंग मानते रहे, इतना अपना कि अपने शरीर की सूक्ष्मकोशिका और कभी-कभी कोशिकाअवयव के समान... यानी एक माइक्राॅन से भी सूक्ष्म, जिससे वह सनातनी समाज में विराटशक्ति के साथ स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण कर सके। किंतु हुआ क्या! संगठन ने हमारी सदाशयता का लाभ उठाकर नैनोप्लास्टिक की तरह मिमिक्री प्रारम्भ कर दी। एक विधर्मी द्रव्य को हम पहचान नहीं सके और उसे अपने ही पोषण के अंश से प्रोटीन-कोरोना बनाते रहे। 
(Cells often mistake nanoplastics for nutrients or foreign agents and actively pull them inside via processes like endocytosis or macropinocytosis. Once inside, they can accumulate in organelles like lysosomes. Upon entering biological fluids, nanoplastics interact with proteins, lipids, and carbohydrates, creating a "protein corona" around themselves. This coating makes them behave like biological particles, masking them from immediate immune clearance and allowing them to be transported throughout the body.)
संगठन के सूक्ष्म विचार जो कि वास्तव में संकुचित थे, ब्लड-ब्रेन-बैरियर को बड़ी सुगमता से पार कर तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचने लगे। संगठन की कार्यप्रणाली नैनोप्लास्टिकवत हमारी मस्तिष्क की तंत्रिकाओं की एपोप्लास्टी (कोशिका मृत्यु) की कारण बनती गई और हमें कुछ भी पता ही नहीं चला।
(Nanoplastics can trigger cell membrane damage, oxidative stress, and inflammatory responses,releasing cytokines, similar to the body's response to pathogens. They can impair energy metabolism, disrupt mitochondrial function, and cause cellular apoptosis i.e. cell death.) 
जहाँ संगठन नैनोप्लास्टिक की तरह हमारे चिंतन को प्रभावित कर एपोप्लास्टी का कारण बनता गया वहीं उसके राजनीतिक प्रकल्प हमारे विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध करते रहे और हम कुछ समझ ही नहीं सके। सनातनियों के प्रति उसकी कार्यप्रणाली कार्सिनोमा की तरह फलती-फूलती रही। कार्सिनोमा कोशिकायें हमारी सामान्य कौशिकाओं का रूप धारण कर हमें ही खाती रहीं और हमें अपने भीतर छिपे शत्रु की भनक तक नहीं लगी।

संघ, सिकलिंग और सवर्ण

यह गंभीर चिंता का विषय है कि डाॅक्टर होने के बाद भी मोहन भागवत अंतरजातीय रोटी-बेटी व्यवहार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। भागवत की गतिविधियाँ महर्षि परंपराओं के विरुद्ध म्लेच्छ परंपराओं की स्थापना के समर्थन में बढ़ती ही जा रही हैं। यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संहारक प्रहार है जिससे सतर्क होने की आवश्यकता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और इंद्रेश कुमार के बीच हुयी एक वार्ता के अनुसार संघ के प्रयासों से दस लाख हिंदू लड़कियों के निकाह मुस्लिम लड़कों से करवाये जा चुके हैं।
संघ के मोहन भागवत इस तरह की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करके सवर्ण समुदाय को भारत से पूरी तरह समाप्त कर देना चाहते हैं।
रोटी व्यवहार तो पूरे भारत में अंतरजातीय ही नहीं अंतरधार्मिक भी स्वीकार किया ही जा रहा है। किंतु अंतरजातीय बेटी व्यवहार स्वीकार करने से पहले चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से भी इसे समझना होगा। जिन्होंने सिकलसेल डिसीज के पीड़ितों की विभिन्न पीड़ादायक स्थितियों को देखा है वे इसकी गंभीरता को अच्छी तरह समझ सकते हैं।
यहाँ सवर्णेतर जातियों में होने वाली सिकलिंग और थैलेसीमिया जैसी आनुवंशिक और अचिकित्स्य व्याधियों के संदर्भ में मोहन भागवत के विचार को समझे जाने की आवश्यकता है।
सिकलिंग जैसी आनुवंशिक व्याधियों से सर्वाधिक प्रभावित लोगों में एसटी के बाद एससी और फिर पिछड़ी जातियाँ हैं, जबकि सवर्ण इस व्याधि से पूरी तरह मुक्त रहते हैं(इस अनुबंध के साथ किसी सवर्ण ने सिकलिंग प्रभावित के साथ अंतरजातीय विवाह न किया हो)
एक अध्ययन में पाया गया है कि सिकल सेल डिसीज एस.सी.डी., सिकल सेल ट्रेट (एस.सी.टी.) और एचबीएस-बीटा-थैलेसीमिया की व्यापकता क्रमशः 1.17% (95% सीआई: 0.79%–1.75%), 5.9% (95% सीआई: 3.8%–8.88%) और 0.37% (95% सीआई: 0.17%–0.83%) अनुमानित की गई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में एस.सी.डी. और एस.सी.टी. की व्यापकता अधिक है। भारत के आदिवासी समुदायों में इसका बोझ सर्वाधिक है।
सिकलिंग और थैलेसीमिया व्याधियों की कोई भी चिकित्सा अभी तक संभव नहीं है। भारत के 17 राज्यों अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और उत्तराखंड में SCD की प्रायिकता अधिक है। 
अन्य प्रभावितों में अफ्रीका की कुछ जनजातियाँ और अमेरिकी नीग्रो मुख्य हैं। इसकी उत्पत्ति और विशिष्ट जातीय समूहों में ही होने के कारण अज्ञात हैं। क्या मोहन भागवत प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

जंबूद्वीपे भरतखण्डे

घर से बाहर
जब भी धरे पाँव
लगा ही नहीं कभी
हमारा ही देश है यह!
घर से बाहर
घूमती थीं निर्भय
राजा की रची जातियाँ
खोदती हुई खाइयाँ,
निरंकुश दबंग
सताते हुये निर्बलों को,
स्वेच्छाचारी राजसेवक
लूटते हुये प्रजा को,
और राजपुरुष
रचते हुये चक्रव्यूह
षड्यंत्रों के
आर्यावर्त्त की जनता के विरुद्ध।
बचपन से अब तक
लगा ही नहीं कभी
कि यह देश
हमारा अपना है
हमारे पूर्वजों का है
मंत्रदृष्टा महर्षियों का है।
यहाँ तो हैं
आतंक के बवंडर
असुरक्षा की तेज आँधियाँ
कौन है प्रायोजक इनका, कौन...
बता दूँगा
तो कुपित हो जायेगा राजा
काट देगा जिह्वा।

प्रजा है
नूपुर
बँधी हुई
राजा के पाँवों में
पीपल की पात सी
थरथराती।
हम
परदेस हो चुके अपने ही देस में
परदेसी हैं
या फिर शरणार्थी
खोजते हुये
अपने ही जीवन के
खोए हुये टुकड़े
पल-पल धमकाती
मृत्यु के अट्टहास में।

प्रायोजित भीड़
भरती है हुंकार
ब्राह्मणो! भारत छोड़ो
छोड़कर अपनी बेटियाँ
और
अपनी चल-अचल संपत्तियाँ।
पूरा भारत
लाहौर हो गया है
कश्मीर हो गया है।
सुना है
हमारा भी राजा
डोनाल्ड ट्रंप हो गया है
करता है नृत्य
धधकती ज्वाला की लय पर।

पल्लवित पुष्पित पृथकतावाद

भारत में जितना पृथकतावाद स्वतंत्रतासंग्राम के उत्तरकाल में था उससे भी अधिक आज विभाजन के बाद भी है। हिंदुओं को मंथन करना होगा कि विभाजन से उन्हें क्या मिला? क्या उनकी हिंदू पहचान मिली, क्या हिंदू राष्ट्र मिला?

बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित भारत में हिंदुओं की हत्यायें, उनके स्वाभिमान को कुचलने के निरंतर प्रयास, उनकी मान्यताओं और जीवन पद्धति पर निरंतर प्रहार, उनकी भूमि और बेटियों का अपहरण, शरीया शासन के लिए उत्पात और अब हिंदुओं को भारत छोड़ने की धमकियाँ... ! यही सब तो मिलता रहा है। यहाँ हार-जीत का नहीं, प्रमुख विषय अस्तित्व रक्षा का है।
मुझे लगता है कि अस्तित्व के विषय में हिंदू सर्वाधिक विश्वासघाती समूह रहा है। अरबी मुसलमान शेष विश्व के लिए घातक नहीं हैं जबकि मतांतरित हुये मुसलमान पूरे विश्व में स्थानीय समुदायों के उन्मूलन को अपने जीवन का लक्ष्य मानते रहे हैं। पाकिस्तान का जनक मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू था, वहाँ के अधिसंख्य मुसलमान भारतीय मुसलमानों की ही तरह मतांतरित हैं। ईरान के मुसलमान भी मतांतरित हैं।
यह मतांतरण ऐसा क्या कर देता कि मनुष्य मनुष्य ही नहीं रहता! यद्यपि ईरान की स्थिति भारत से भिन्न है। इसलिए वहाँ के शासक कैसे भी हों पर आम जनता प्रायः ठीक ही है।
भारत में तो मतांतरित मुसलमानों से अधिक मुसलमान सेक्युलर हिंदू हैं जिनमें अब संघ और भाजपा जैसे हिंदूवादी संगठन बहुत आगे बढ़त बना चुके हैं।
तो क्या धरती से हिंदू समाप्त हो जाएंगे? समाप्त तो कोई भी नहीं होगा। हाँ!जनसंख्या समीकरण ऊपर-नीचे हो सकते हैं। आम हिंदुओं को भक्ति और समालोचना के अंतर और उनके परिणामों पर गंभीरता से विचार करते हुये अपने अस्तित्व के संघर्षपथ पर आगे बढ़ना होगा।
स्वातंत्रयोत्तर भारत में हिंदू शासकों ने ही हिंदुओं का सर्वाधिक अहित किया है, आज भी कर रहे हैं। यह सब इसलिए क्योंकि हमने हिंदूमूल्यों का परित्याग कर दिया है। हम वैचारिक आदर्शों को सम्मान देने के स्थान पर जातियों और समूहों को सम्मान देने लगे हैं। आम हिंदुओं को संघ और भाजपा की कलुषिता का पोस्टमार्टम करना ही होगा।

मूलनिवासी

भारत में ब्रिटिश शासन से पहले मूलनिवासी जैसी कोई अवधारणा कभी नहीं रही, कोई औचित्य ही नहीं था इसका। यह तो अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए प्रासंगिक है जहाँ दूसरे देश के लोगों ने स्थानीय लोगों को समाप्त कर अपनी पृथक पहचान बनाई और वहाँ अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। भारतीयों के संदर्भ में यह बात मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना और फिजी आदि के लिए सही है, वह भी इस संशोधन के साथ कि भारतीयों को वहाँ दास बनाकर या काम करवाने के लिए विदेशी शासकों द्वारा ले जाया गया, वे वहाँ स्वेच्छा से नहीं गये और न उन्होंने वहाँ के स्थानीय लोगों का नरसंहार किया। भारतीय जहाँ जाते हैं वहाँकी संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करते हैं।

भारत में सवर्णों के विदेशी होने की कहानी मुस्लिम शासकों द्वारा नहीं अपितु यूरोपीय शासकों द्वारा पहली बार गढ़ी गई। जिस तरह अपने अनैतिक और अन्यायपूर्ण कार्यों को नैतिक और न्यायसंगत बनाने के लिए यूरोपीय शासक उन्हें कानून के मनमाने बंधन में जकड़ने में पारंगत हुआ करते थे उसी तरह उन्होंने भारतीय समाज को तोड़ने के लिए सांस्कृतिक, धार्मिक और अध्यात्मिक मूल्यों पर निरंतर आक्रमण करने को उचित ठहराने के लिए अपनी गढ़ी कहानियों को वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से प्रभावी और प्रामाणिक बनाने के प्रयास किये। इसमें उन्हें कुछ सफलता भी मिली। इन्हीं प्रयासों में एक है "आर्यन इनवेज़न थ्योरी" जिसे प्रामाणिकता का चोला पहनने के लिए डीएनए थ्योरी गढ़ी गई। 

यह बात तो पूरे विश्व के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शोध और आविष्कार प्रायः राज्याश्रित या सत्ताश्रित हुआ करते हैं। यही कारण है कि यदि सत्ता दुष्टों के हाथ में हुयी तो शोध के विषय और उसके परिणाम सत्ताधीशों के स्वार्थ से प्रभावित होते हैं। कोविड-१९ और ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के विरुद्ध लाये गये वैक्सीन्स इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। शोधकार्यों के क्षेत्र में यह एक अवांछित, दुःखद और कटु सत्य है। 

देशी-विदेशी डीएनए को आधार बनाने से पहले कुछ अन्य व्यावहारिक तथ्यों पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। डीएनए प्राप्त करने के लिए जिन नरकंकालों के प्रादर्श लिए गये हैं उनकी राष्ट्रीयता का आधार क्या है? यह कैसे पता लगेगा कि वह कंकाल किसी विदेशी सैनिक, व्यापारी या पर्यटक का नहीं अपितु भारतीय का ही है, जबकि भारतीयों की सनातन परंपरा में शवदाह किया जाता रहा है। शव को भूमि में गाड़ने की विदेशी परंपरा रही है, भारत की नहीं। दूसरी बात यह कि भूमि से निकाले गये इस तरह के नरकंकालों की संख्या कितनी है, क्या ये व्यापकरूप से और बहुत अधिक संख्या में पाए जाते रहे हैं?

हम इस लेख में मूलनिवासी और विदेशी विवाद के सत्य को डीएनए, भाषा, लिपि, शारीरिक गठन, परंपरा, विकास, पुरातात्त्विक प्रमाण, स्थापत्यकला और साहित्यादि दृष्टियों से हटकर कुछ अन्य बिंदुओं के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे। 

आवागमन, भ्रमण और बसाहट सदा से मनुष्य की स्वाभाविक गतिविधियाँ रही हैं। जलमार्गों की अपेक्षा थलमार्गों से यह सब अधिक सुगम होता है इसलिए सामान्य स्थितियों में आपसी संबंधों में तरलता का होना स्वाभाविक है। इसीलिए आवागमन और वैवाहिक संबंधों में प्रांतीय और राष्ट्रीय सीमायें अधिक बाधक नहीं हो पातीं। सीमावर्ती क्षेत्रों में यह सदा से रहा है, आज भी है।  उत्तराखंड, उप्र और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाल, तिब्बत और भूटान के निवासियों के बीच वैवाहिक संबंधों की तरलता देखी जाती है। यही तरलता न्यूनाधिक रूप में पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों में भी है, जो विभिन्न कालों में परिवर्तित होती रही है। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि बृहत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में हमारे वैवाहिक और व्यापारिक संबंध तत्कालीन देशों के क्षेत्रीय लोगों के साथ नहीं हुआ करते थे। यही कारण है कि उत्तर-पूर्वी भारतीयों में तिब्बती और मंगोल मुखाकृतियाँ आसानी से दिखाई दे जाती हैं तो पश्चिमी सीमावर्ती भारतीयों में गांधार, सिंध, ईरान और निकटवर्ती कज्जाक, उज़्बेक आदि लोगों से वैवाहिक संबंधों के कारण उत्पन्न संततियों के वंशज आज भी मिलते हैं। जो स्थिति भारतीयों की है वही स्थिति तिब्बतियों, नेपालियों और ईरानियों की भी है। उनके गुणसूत्रों में हमारे भी गुणसूत्र हैं। यही स्थिति पूरे विश्व की है। वास्तव में पशु-पक्षियों की तरह मनुष्यों में भी मिलने-जुलने और आपसी संबंधों के लिए एक स्वाभाविक तरलता होती है, अंतर केवल इतना है कि मनुष्य के प्रकरण में राजनीतिक कारणों से न्यूनाधिक प्रतिबंध इन संबंधों को बाधित करते हैं। 

क्या यह संभव है कि ईरानियों में पश्चिमी भारतीयों के या फ्रांसीसियों में डच लोगों के गुणसूत्र न हों! यह सब सदा से होता रहा है, सदा होता रहेगा। इस बात का कोई औचित्य नहीं कि अरब सागर और हिंदमहासागर का जल आपस में क्यों मिल गया, और मिलने के बाद उसमें से कितना जल मूलहिंदसागरीय है और कितना विदेशी। 

इसी भारत में भाभा, जमशेद जी टाटा और मानिकशाॅ भी रहे हैं और इसी देश में ख़ामेनेई की मृत्यु पर रोने-चीखने और ईरान के लिए चंदा भेजने वाले शिया भी हैं। कोई भारत में आकर भारतीय हो जाता है तो कोई भारत में शताब्दियों से रहकर भी भारतीय नही हो पाता।

मुझे भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में कई पीढ़ियों से रह रहे हाॅर्न आॅफ़ अफ्रीका (इरिट्रिया, इथियोपिया, सोमालिया और दिजिवूती) से आकर बसे लोगों से मिलने का अवसर मिला है। उनमें मूलनिवासी या विदेशी जैसी कोई भावना दिखाई नहीं देती। दूसरी ओर क्या मणिशंकर अय्यर, अखिलेश यादव और लालूप्रसाद जैसे लोगों को भारतीय माना जा सकता है!

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हिंदूराष्ट्र

नये संदर्भों में "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्घोष निरस्त कर दिया गया है। हिंदुत्व के अभी तक स्वयंभू सारथी रहे मोहन भागवत ने "हिंदू" शब्द के अस्तित्व को ही नकार दिया है। तो अब भारत के इतिहास को नये संदर्भ में समझना होगा... वैसा ही जैसा कि भारतीय समाज को हाँकने वाले स्वयंभू विद्वान समझाना चाहते हैं।

इस देश के बहुसंख्यक समाज के बौद्धिक मालिक अब हिंदूराष्ट्र के पक्ष में नहीं हैं। उनका आदेश है कि यह देश सबका है। अर्थात यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को विकसित करने वाले "सब" लोग हैं, यहाँ की प्राचीनता का ऐतिहासिक महत्व समाप्त हो गया है।
परमपूज्य मालिक जी! आपके ये "सब" कौन हैं?
क्या आपके ये "सब" भारत के नागरिक हैं। भारत के नागरिक कौन हैं? क्या वे "सब" भारतीय नागरिक हैं जो भारत में रहते हैं, जिनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र हैं। अर्थात रोहिंग्या, बांग्लादेशी, विभाजन से पूर्व पृथक देश बनाने के लिए मतदान करने वाले मुस्लिम जो विभाजन करवाने के बाद भी शेष भारत का गजवा-ए-हिंद करने के लिए यहाँ से कहीं नहीं गये, गजवा-ए-हिंद की हुंकार भरने वाले लोगों के समर्थक अतिविद्वान सेक्युलर्स आदि ...यही हैं आपके "सब"?
अभी तक जो लोग आपकी आज्ञा से स्वयं को हिंदू मानते रहे वे एक झटके में अब कहीं भी नहीं है, क्योंकि आपने तो निर्णय कर दिया है कि यह शब्द भारतीय है ही नहीं।
अभी तक "हिंदुओं" के मालिक रहे मोहन भागवत क्या अब सवर्णों को यूरेशियन्स घोषित कर रहे हैं? वे तो यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हिंदुत्व के ठेकेदार नहीं हैं इसलिए हिंदुत्व की राजनीति नहीं करेंगे, केवल राष्ट्रनिर्माण की बात करेंगे। अच्छी बात है, राष्ट्र निर्माण होना ही चाहिए। कैसे होगा? कौन करेगा? कैसे करेगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने का अधिकार यूरेशियन्स को नहीं है।
हिंदूराष्ट्र का नारा अब गजवा-ए-हिंद के नारे के सामने समाप्त हो गया है। संघ के इंद्रेश कुमार बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नाम से भारत का सांख्यिक विभाजन स्वीकार कर बहुत पहले ही अल्पसंख्यक घराने के मुखिया बन चुके हैं। सभी मालिक "अल्पसंख्यक" के उत्थान के लिए चिंतित और समर्पित हैं । बहुसंख्यक यूरेशियन्स के उत्थान का तो अब प्रश्न ही नहीं उठता। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि "यह बहुसंख्यकों के समूल उच्छेद की समाजमनोवैज्ञानिक भूमिका है" जिसके जनक हमारे मालिक लोग हैं जिनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे प्रकांड संत भी सम्मिलित हैं।
बृहस्पति आगम में हिंदू शब्द की निरुक्ति दी गई है पर मालिक लोग उसे आर्ष ग्रंथ नहीं मानते। तो क्या आर्ष ग्रंथों में जिसका उल्लेख नहीं है उसका भारत की धरती पर कोई अस्तित्व नहीं माना जाना चाहिए? तब तो संविधान, दलित, सवर्ण, इस्लाम, शाह, मोदी, बौद्ध, टमाटर, गोभी, सिगरेट, सर तन से जुदा ...आदि शब्दों का भी कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए।
मालिक लोग हिंदू शब्द की प्राचीनता को नकारकर क्या यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू शब्द शहंशाह साइरस के युग में ईरानी आक्रमणकारियों ने पहली बार प्रयुक्त किया जिसे बाद में बृहस्पति आगम में यथावत ले लिया गया?
मालिक लोग कल को यह भी कह सकते हैं कि इस देश का नाम भारत नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कम्युनल है, इस नाम में उनके "सब" का प्रतिनिधित्व नहीं होता इसलिए इस देश का नाम "अल्पसंख्यक", "दलित", "बहुसंख्यकमुक्त", या "सबका देश" होना चाहिए।
यदि आपके शब्दकोष में "हिंदू" शब्द नहीं है तो क्या ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जो जंबूद्वीप के इस भूभाग पर उन लोगों की प्राचीनता सिद्ध कर सके जिन्होंने इस देश की संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान एवं चौंसठ कलाओं आदि को स्थापित और विकसित करने में पीढ़ियों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
मालिक जी! हम तुम्हारे "सब का देश" अस्वीकार करते हैं, यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं है तो आपको संघ की प्रार्थना में से "हिंदभूमे", "हिंदुराष्ट्राङ्गभूता", "स्वराष्ट्रम्" और "धर्मस्य संरक्षणम्" आदि शब्दों को भी विलोपित करना होगा और यह भी बताना होगा कि अभी तक इन अस्तित्वहीन शब्दों का हमारे मुँह से गायन करवाकर आपने देश के साथ यह छल क्यों किया? आपका यह "स्वराष्ट्रम्" क्या है, उसकी भौगोलिक स्थिति कहाँ है? अभी तक आप जिस "धर्मस्य संरक्षणम्" का संकल्प करवाते रहे वह "धर्म" क्या है? उस धर्म की संज्ञा क्या है?
इस "सबका देश" के मालिक जी! यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं हो सकता तो क्या आर्यावर्त्त, वैदिकराष्ट्र, सनातन राष्ट्र, ब्रह्मराष्ट्र आदि में से भी कुछ नहीं हो सकता?

मंगलवार, 31 मार्च 2026

वि-चित्र

सत्य है सूर्य

सत्य हैं सूर्य के सप्ताश्व,
सप्तवल्गा का
नियंत्रक
उभय सबका
एक सारथी,
किंतु सबने चुनी
कोई एक वल्गा
किसी ने भगवा
किसी ने हरा
किसी ने नीला,
तुमने चुन लीं
तीन वल्गायें
देखकर अवसर
कभी भगवा
कभी नीला
तो कभी हरा।
प्रतीक बन गये रंग
सबकी पृथक पहचान के।
तुम चुनने लगे रंग
देखकर चाल
पृथक-पृथक पहचान के
क्योंकि विश्वास नहीं तुम्हें
तुम्हारे "स्व" में
इसलिए
तुम्हारे चित्र हैं वि-चित्र।

हमसे नहीं
तुम स्वयं से करते हो छल
पल-पल
बोलकर
मिथ्या वचन
कि सर्वश्रेष्ठ है तुम्हारा चयन
होकर भी
विकृत-चित्र।

सुनो मायावी!
जल गई होलिका
मारा गया मारीच
मारा गया रावण भी
मारे जायेंगे
एक-एक कर
सारे मायावी
और तुम
नहीं हो अरुण।

कृत्रिम वर्षा कितनी आवश्यक

चर्चा है कि जाॅर्ज सोरोस और बिल गेट्स जैसे लोग पूरी दुनिया पर अपने मनमाने नियंत्रण के लिए राजनीतिक और प्राकृतिक शक्तियों को अपनी उंगलियों पर नचाते रहे हैं। प्रकृति पर नियंत्रण के लिए बिल गेट्स ने Geoengineering technique को अपना माध्यम बनाया है।

"नियंत्रण" शब्द अधिकार के गर्व, इच्छानुसार संचालन, ईश्वर हो जाने की अनुभूति और विजय के अहंकार से भरा हुआ है। मनुष्य पर नियंत्रण कर पाना बहुत कठिन है, कभी होता भी है तो दबाव हटते ही पूर्ववत हो जाता है। तो चलो प्रकृति पर नियंत्रण करते हैं और लंकेश होकर ईश्वर बन जाते हैं।
आजकल विज्ञान के शब्दकोश में से दो शब्द उछल कर सोशल मीडिया में लोगों को आकृष्ट कर रहे हैं। एक है सोलर रैडिएशन मैनेजमेंट और दूसरा है क्लाउड सीडिंग जो जियोइंजीनियरिंग तकनीक के क्षेत्र से जुड़े हुये हैं।
जब ज्वालामुखी विस्फोट या मनुष्यकृत कारणों से धरती के किसी क्षेत्र में तापमान की बहुत वृद्धि हो जाती है तो उसे कम करने के लिए सौर विकिरण प्रबंधन(SRM) का प्रयोग किया जाता है। इसे Hygroscopic प्रक्रिया कहते हैं जिसके लिए उस क्षेत्र विशेष में सल्फ़र डाई आॅक्साइड का Stratospheric aerosol injection लगाकर ऊष्मा को अंतरिक्ष में फेकने का प्रयास किया जाता है।
एक और प्रक्रिया है - Glaciogenic जिसे कृत्रिमवर्षा और कृत्रिमहिमपात के लिए प्रयोग में लाया जाता है। सामान्यतः इसे क्लाउड सीडिंग कहते हैं जिसमें सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड या फ्रोज़ेन कार्बन डाई आॅक्साइड जैसे रासायनिक द्रव्यों का उस क्षेत्र के वायुमंडल में छिड़काव कर प्राकृतिक प्रक्रिया को उत्तेजित किया जाता है। यह उसी तरह है जैसे लौकी में हार्मोन का इंजेक्शन लगाकर रात भर में लौकी की लंबाई और भार बढ़ा देना।
सुना है रावण ने भी प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण कर लिया था। हम तो इतना ही जानते हैं कि ईश्वरीय व्यवस्था में मानवीय हस्तक्षेप कभी लोककल्याणकारी नहीं होता।

रविवार, 29 मार्च 2026

इंग्लैंड में ईसाईमूल्य विसर्जन

इंग्लैंड के मुस्लिम नागरिकों, जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप के शरणार्थी भी हैं, ने स्थानीय ईसाइयों को इंग्लैण्ड छोड़ने की माँग उठा दी है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, जो कभी-कभी हिंसक भी हो जाते हैं जिससे इंग्लैण्ड की स्थानीय संस्कृति पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। यह इंग्लैण्ड के लिए ही नहीं, यूरोप के अन्य देशों, भारत और अफ्रीकी देशों के लिए भी गंभीर संकट का विषय है। किसी भी समुदाय के सांस्कृतिक परिवर्तन और राष्ट्रांतरण के लिए किसी भी देश के पारंपरिक मूल्यों का क्षरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक होता है। 
इंग्लैंड ही नहीं, सभी ईसाई देशों में ईसाईमूल्यों का निरंतर विसर्जन वहाँ के चिंतकों और राजनीतिज्ञों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। भारत में भी हिंदू अपने पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अध्यात्मिक मूल्यों के क्रमिक विसर्जन की राह पर तीव्रता से बढ़ते जा रहे हैं। इससे हमने विदेशी मूल्यों को स्थान देने के लिए पर्याप्त रिक्तता उत्पन्न कर दी है। दुर्भाग्य से पतन के लिए विदेशी पराधीनता के युग से भी अधिक प्रेरक तत्व आज उठ कर खड़े हो गये हैं। ये क्षद्म लोग उपदेश देते नहीं थकते कि "यह देश केवल हिंदुओं का नहीं, सबका है। हमारे डीएनए समान हैं, सब धर्म हमारे हैं, यहाँ सबका समान अधिकार है, सबकी स्वीकार्यता है...।"
भारतीय संस्कृति और मूल्यों की हत्या के लिए मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार जैसे हिंदुत्व के उपदेशक भी जब इस्लामिक समारोहों में उनके प्रतीकों, परंपराओं और मूल्यों का अनुसरण करने में गर्व का अनुभव करने लगें तो हिंदुत्व को नेपथ्य में धकेलने और इस्लाम को आमंत्रित करने का स्पष्ट संदेश पूरे विश्व में, जहाँ भी कहीं हिंदू हैं उन्हें आहत और चिंतित करता है।
हम हर किसी को मित्र नहीं मान सकते, हर किसी की परंपराओं और मूल्यों का अपने जीवन में अनुसरण नहीं कर सकते, विष और अमृत में समानता का उपदेश नहीं दे सकते। ऐसा करके हम सनातन सिद्धांतों की अवहेलना तो करते ही हैं, मतांतरण और जीवनमूल्यों के विचारांतरण को भी प्रोत्साहित करते हैं। यह सब बहुत अकल्याणकारी और सनातनियों के लिए आत्मघाती है।
तो क्या करें?
करना यह है कि हमें तथाकथित महान चिंतकों, विचारकों, परमपूज्यों और राष्ट्रसमर्पितों के उपदेशों पर लेश भी ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। ये सब छद्म लोग हैं जो मारीच बनकर सीताहरण के पाप की योजना में सक्रिय भागीदार हैं। कलियुग के इस कालखंड में मानवदेहधारी कोई भी व्यक्ति हमारा मार्गदर्शक बनने के योग्य नहीं है, हमें प्राचीनशास्त्रों, जिनमें षड्दर्शन मुख्य हैं, को ही अपना गुरु और मार्गदर्शक स्वीकार करना चाहिए, साथ में अपनी समस्त इंद्रियों को भी सचेत रखने की आवश्यकता है।

शनिवार, 28 मार्च 2026

पूर्णता और पूरकता

वह भाजपाई है, ...नहीं-नहीं वह तो कम्युनिस्ट है। वह आस्तिक है, ...नहीं-नहीं वह तो पक्का नास्तिक है। 

राजनीति और दर्शन के संबंध में जब किसी के प्रति प्रेक्षकों द्वारा विभाजित और परस्पर विरोधी निर्णय किए जाने लगें तो समझ लेना चाहिये कि जिसके संबंध में चर्चा की जा रही है उसकी दृष्टि विहंगम दृश्य की पक्षधर है। वह पूर्णता की संधान यात्रा में पूरकता के छोटे-बड़े अंशों को स्वीकार करता हुआ चलने में विश्वास रखता है। यदि कोई दर्शन पूर्ण होता तो अन्य दर्शनों की आवश्यकता ही नहीं रहती, तब न चार्वाक दर्शन होता और न वैशेषिकादि षड्दर्शन।
राजनीतिक परिपक्वता के लिए सापेक्ष श्रेष्ठता का चयन परिवर्तनकारी होता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है। हिमाचल जैसे प्रांतों में सतत सत्तापरिवर्तन सापेक्ष श्रेष्ठता के चयन का प्रतीक है। वहाँ के मतदाता कांग्रेस या भाजपा से बँधकर नहीं रह पाते। ऐसा कोई भी बंधन राजनीतिक दलों में आने वाली निरंकुशता का आधार बन जाता है जो लोकतंत्र की एक अवांछित विकृति है जिससे बचा जाना चाहिए।

कट्टरहिंदू

मैं पहले भी कह चुका हूँ, पुनः स्पष्ट कर दूँ, मैं कट्टर हिन्दू नहीं, निष्ठावान हिंदू हूँ।
निष्ठा और कट्टरता के अर्थों को जाने बिना इन शब्दों के प्रयोग में सावधानी होनी चाहिए। कट्टरता एक अंधी वीथिका है, जिसका सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं। जो हिंदू है वह कट्टर नहीं हो सकता, जो कट्टर है वह हिंदू नहीं हो सकता।
यही बात भक्त और आलोचक के लिए भी है। भक्त आलोचना नहीं कर सकता, जो आलोचक है वह भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति केवल ईश्वर की हो सकती है, किसी देहधारी की नहीं।
राजनेताओं की आलोचना हो सकती है, भक्ति नहीं। हम लोगों ने भक्ति करके ही भाजपा और संघ को निरंतर विकृत होने देने का पाप किया है। हमने संघ और मोदी का अंधसमर्थन किया, कभी स्वस्थ आलोचना नहीं की। इन दोनों पर उठने वाली उंगलियों और कलंकों के लिए हम सभी अपराधी हैं जो सत्य से सदा भागते रहे और कभी इनके विचारों और कार्यों की आलोचना नहीं की। आलोचना उतनी ही आवश्यक है जितनी किसी रुग्ण की चिकित्सा, इसे पाप या विरोध नहीं समझा जाना चाहिए। मैं पुनः सावधान कर रहा हूँ, सतत परिमार्जन और स्वस्थ आलोचना का यदि इसी तरह बहिष्कार किया जाता रहेगा तो एक दिन संघ और भाजपा के अध्याय सदा के लिए बंद हो जाएँगे।
जब हम अच्छे समालोचक नहीं होते तो राजनीतिक क्षितिज पर लोकहितों की हत्या होते हुये देखते हैं।
ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी या मोहन भागवत को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता, ये सब हमारी दीर्घकालिक निष्क्रियता के परिणाम हैं जिन्हें भोगने के लिए हम सब विवश हैं।

अनार्य दर्शन

दैत्य नहीं, तो देव भी नहीं

दानव नहीं, तो मानव भी नहीं 

राक्षस नहीं, तो आर्य भी नहीं

यौनोत्पीड़क नहीं, तो नारीपूजक भी नहीं

अपराधी नहीं, तो संत भी नहीं

राष्ट्रद्रोही नहीं, तो राष्ट्रप्रेमी भी नहीं

शत्रु नहीं, तो मित्र भी नहीं 

अन्याय नहीं, तो न्याय भी नहीं

असत्य नहीं, तो सत्य भी नहीं

पाप नहीं, तो पुण्य भी नहीं।

सह अस्तित्व ही है रहस्य

राजसिंहासन का।

रहना होगा सबको 

एक साथ

मिलजुलकर

यह देश सबका है

किसी के बाप का नहीं,

उनका भी नहीं

जिन्होंने रचा, गढ़ा और सँवारा

अपने तप और पुरुषार्थ से।

हमारी दृष्टि में 

सब हैं समान

और सम्माननीय

सभी का लक्ष्य है

ईश्वर की प्राप्ति

हम चलते रहेंगे

ऐसे ही 

लेकर सबको साथ

करते रहेंगे सबका विकास

पाप का भी, पुण्य का भी

और बन जायेंगे

विश्वगुरु।

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

जैविकयुद्ध

अमेरिका और ईरान के अड़ियल व्यवहार के कारण अब गुरिल्ला युद्ध से भी अधिक गोपनीय और दबे पाँव होने वाले जैविक युद्ध की आशंकाएँ निरंतर बलवती होती जा रही हैं। सभी विकसित देशों के पास महासंहारक बायो-वीपन्स के भंडार उपलब्ध हैं।

कोरोना के नये-नये वैरिएंट्स आना कोई नयी बात नहीं रही, समाचार है कि अब प्राणघातक निपाह वायरस भी पूरी तैयारी के साथ आ चुका है।
इधर कैंसर की रोकथाम के लिए चौदह वर्ष के किशोरों/किशोरियों के लिए वैक्सीन आ गये हैं। यह मान लिया गया है कि यौन संबंधों से फैलने वाले पैपिलोमा वायरस से हमारे किशोर/किशोरियाँ संक्रमित हो सकते हैं इसलिए सभी लोगों को लगभग ३५९० रु. मूल्य वाले (मूल्य सरकार चुकाएगी) वैक्सीन के तीन डोज तो ले ही लेना चाहिए। यह वैक्सीन निर्भय होकर "यौनसंबंध बनाने का मार्ग" प्रशस्त करती है।
"HPV is highly infectious and predominantly spread through sexual contact, and HPV vaccines work best if they’re given before someone is exposed to the virus."
Gardasil 4/9 ; The cancer vaccine for girls, primarily known as the HPV vaccine (Human Papillomavirus), prevents infections that cause cervical and other cancers. It is highly effective and recommended for girls (and boys) aged 9–14, ideally *before sexual activity.* It is often given as a two-dose series, or three for older teens.
 
टीकाकरण की विश्वसनीयता मेरे लिए सदा से नकारात्मक रही है। वैज्ञानिकों का एक समुदाय टीकाकरण को नये वैरिएंट्स के जन्म का कारण मानता रहा है, विषाणुविज्ञान और इम्यूनोलाॅजी के तथ्य भी उसी के पक्ष में हैं। मैं यह नहीं समझ पाता कि जब इम्यूनिटी बनाये रखने के लिए हमारे पास बहुत से साधन उपलब्ध हैं तो सारा ध्यान वैक्सीनेशन पर ही क्यों केंद्रित रहता है? क्या यह स्वास्थ्य की नहीं अपितु केवल उद्योग की आवश्यकता है?
*सिकुड़ता वाय क्रोमोसोम*
एंटी कोविड-१९ वैक्सीन की न्यून कार्मिक अवधि हम सब देख चुके हैं। अब मुझे आशंका है कि एंटीबायोटिक्स और वैक्सीनेशन के अंधाधुंध प्रयोग के दुष्प्रभाव कहीं हमारे क्रोमोसोम पर भी तो नहीं पड़ रहे हैं! यह आशंका निर्मूल नहीं है। किसी वायरस को हमारे शरीर में प्रवेश करने के लिए किसी पासपोर्ट और वीसा की तो आवश्यकता नहीं होती न! यह वैक्सीनेशन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, तब इंड्यूस्ड इम्यूनाइजेशन का क्या औचित्य? प्रचार किया जाता है कि टीकों में एटेनुएटेड वायरस या एंटीजेन सीरम का प्रयोग किया जाता है। यही प्रक्रिया तो प्रकृति की भी है, तब इंड्यूस्ड क्यों?
यह पाया जाता रहा है कि निर्धन परिवारों के मिट्टी में खेलने वाले बच्चों की रोगप्रतिकारक क्षमता उन बच्चों से अधिक होती है जो हाइजीन का बहुत अधिक पालन करते हैं। यह निर्धन देशों के लिए प्रकृति की निःशुल्क व्यवस्था है।
चिंता का विषय यही है कि कैंसर रोकथाम के नाम पर कहीं यह बिल गेट्स प्रायोजित जैविक युद्ध तो नहीं?

गुरुवार, 26 मार्च 2026

देशप्रेम का प्रमाण और राष्ट्रनिर्माण

मुस्लिम नेता और विचारक प्रायः यह कहा करते हैं कि हमें किसी को अपने देशप्रेम का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन सांसद इकरा हसन ने सदन में अपने देशप्रेम का प्रमाण दे ही दिया, वह भी बिना किसी माँग या पृच्छा के ही। उन्होंने अयातुल्ला ख़ामेनेई की महानता की तुलना मोदी की ५६ इंच की छाती से करते हुये बता दिया कि ख़ामेनेई मोदी से श्रेष्ठ हैं। प्रकारांतर से इकरा हसन ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत के लिए मोदी नहीं, अयातुल्ला ख़ामेनेई उपयुक्त शासक है।

इधर मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि भारत में मुसलमानों के बिना हिंदुत्व नहीं, अर्थात् इस्लाम है तो हिंदुत्व है। क्या सचमुच हिंदुत्व के मूल में इस्लाम है? क्या सचमुच हिंदुत्व के सिद्धांतों को इस्लामिक दर्शन से ही पोषण प्राप्त हुआ है। क्या सचमुच पहले इस्लाम आया फिर सनातन आया अर्थात इस्लाम वैदिक काल से भी पहले अस्तित्व में आया! क्या अरब में इस्लाम के उदय के समय भारत में कोई धर्म या मानव सभ्यता नहीं थी! क्या ईसवी सन् ७१२ से पहले भारत में हिंदुत्व जैसा कुछ भी नहीं था! कुछ भी नहीं था तो क्या था! इस्लाम से पहले भारत में क्या कोई सभ्यता नहीं थी?
मैं भ्रमित हो गया हूँ, मोहन भागवत जैसा परमपूज्य जब कुछ कहता है तो विचार करना पड़ता है। हमने अभी तक जो सुना, जो पढ़ा और जो मंथन किया उसके अनुसार तो वैदिक सभ्यता और सनातन धर्म दुनिया के सबसे प्राचीन पदार्थ हैं,  ...क्या मैंने जो पढ़ा और सुना वह सब मिथ्या था!
मोहन भागवत यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता बल्कि राष्ट्रनिर्माण की बात करता है। परमपूज्य अवतारी पुरुष ने यह नहीं बताया कि राष्ट्रनिर्माण के लिए "आवश्यक" और "बाधक" तत्व क्या हैं।
हम पुनः इकरा हसन के भाषण पर आते हैं। मोहन भागवत जिस हिंदुत्व रहित राष्ट्रनिर्माण का उपदेश दे रहे हैं क्या उसके लिए भारत की सत्ता दिवंगत ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी को सौंप दी जानी चाहिए?

थोड़ा सा मुसलमान

कहानी संग्रह "थोड़ा सा मंटो" के बाद अब "थोड़ा सा मुसलमान" मेरी अगली पुस्तक का नाम हो सकता है।

जब आप भाजपा-कांग्रेस-सीपीएम के बंद कूपों से निष्ठापूर्वक बाहर निकलकर अपने स्व-भाव में प्रवेश करते हैं तो स्वयं को सर्वथा भिन्न पाते हैं। इस दृष्टि से मैं स्वयं को थोड़ा सा साम्यवादी, थोड़ा सा मुसलमान और बहुत सा सनातनी पाता हूँ। मुझे लगता है इस तरह हम सनातनी दर्शन के लौकिक स्वरूप का एक विहंगम परिदृश्य अपने सामने पाते हैं।
वर्षों पहले मैंने दुर्गा और सरस्वती पूजा के विकृत होते आयोजनों पर कुछ लेख लिखकर सांप्रदायिक टकरावों की आशंका को लेकर सचेत किया था। आज हम उन शंकाओं को सच होता देख रहे हैं। हमें अपने ही देश में अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों, उत्सवों और परंपराओं के लिए सरकारी सुरक्षा की आवश्यकता होने लगी है। जब देश में विभाजनकारी शक्तियाँ निर्भय हों, सांप्रदायिक आतंक के सामने सत्ता निर्बल हो, जनता सुषुप्तावस्था में हो तब ऐसे आनुष्ठानिक आयोजनों के लौकिकस्वरूप पर चिंतन करना आवश्यक हो जाता है।
आज मैं मूर्ति को लेकर उसके वैज्ञानिक महत्व के बाद भी इस्लामिक अवधारणा के साथ खड़े होने के लिए विवश हो रहा हूँ। विश्व भर में समय-समय पर मूर्तियों को जिस तरह तोड़ने और उन्हें अपमानित करने की घटनायें होती रही हैं, उन पर मंथन किया जाना आवश्यक है। देवी-देवताओं से लेकर राजनैतिक व्यक्तियों तक की मूर्तियों के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किये जा सकते। मूर्तियाँ बनवाकर युगों तक अमर रहने के लोभ से अमिताभ बच्चन और मायावती जैसे लोगों को भी मुक्त होना चाहिए। विगत कुछ वर्षों में मार्क्स, स्टालिन, मुजीबुर्रहमान, भीमराव और मोहनदास की मूर्तियाँ भी कट्टरपंथियों के लक्ष्य पर रही हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से मैं मोहनदास का विरोधी रहा हूँ, पर जिस तरह उनकी मूर्ति के साथ किशोरवय बच्चों द्वारा अश्लील और अपमानजनक व्यवहार प्रदर्शन किया गया है वह स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं मूर्तिनिषेध की इस्लामिक परम्परा के साथ स्वयं को बरबस ही खड़ा पाता हूँ। विरोध और घृणा प्रदर्शन के लिए मूर्तियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाना विचारों से बहुत आगे बढ़कर उनका भौतिक रूपांतरण है जो भीड़ को हिंसा के लिए उत्तेजित करता है। बस, यहीं पर मैं थोड़ा सा मुसलमान हो जाना चाहता हूँ। यदि हम मूर्तियों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो चौक-चौराहों पर उनकी स्थापना का क्या औचित्य!

बुधवार, 25 मार्च 2026

मणिपुर डायरी

सहृदयता का दण्ड

आदिवासियों का धर्मांतरण भारत की एक गंभीर समस्या रही है। यह सेवन सिस्टर्स की ही नहीं, असम, झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी ऐसी समस्या है जिसके सामने सरकारें तो नतमस्तक होती ही रही हैं, वे लोग भी नतमस्तक हुये हैं जो धर्मांतरण को अभी तक राष्ट्रांतरण मानते रहे हैं। विगत वर्षों में मणिपुर के आदिवासियों और धर्मांतरित हुये ईसाइयों के बीच हुए रक्तसंघर्ष ने देश-विदेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। 
धर्मांतरण की घटनाओं से व्यथित फ़िल्म निर्देशक सुजल मिश्र के मन में इस विषय को लेकर एक फ़िल्म बनाने का विचार तो पहले से ही था पर जब उन्होंने कुंभ मेले में माला बेचने वाली मोनालिसा को देखा तो उनके मन में स्लम डाॅग के पात्र झिलमिलाने लगे। बस, उन्होंने तय कर लिया कि उनकी नई फ़िल्म "डायरी आफ़ मणिपुर" की नायिका यही लड़की होगी। यह इतना सरल नहीं था, एक तो अशिक्षित ऊपर से भाषा और संवाद में कच्ची मोनालिसा को फ़िल्म के अनुरूप प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती थी। सुजल को लगा, वे एक अति साधारण लड़की को विशिष्ट बनाने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी उस बंजारा परिवार ने कभी नहीं की होगी। बस सुजल यहीं धोखा गये।
मोनालिसा की नई पारी फ़िल्म अभिनय ही नहीं बोली और भाषा जैसे प्रारंभिक बिंदुओं से भी प्रारंभ हुयी। सुजल को पल-पल चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
अंततः फ़िल्म पूरी हुयी तो सुजल उसका प्रमोशन उसी स्थान से करने के इच्छुक थे जहाँ से उन्होंने मोनालिसा को फ़िल्म के लिए लिया था। किंतु प्रयागराज प्रशासन ने निर्जन हो चुके संगम पर मात्र पंद्रह-बीस लोगों के एक दल को भी इसकी अनुमति नहीं दी। दूसरी ओर मोनालिसा भी बिना बताये ब्याह रचाने अपने प्रेमी के साथ केरल चली गयी। फ़िल्म का प्रमोशन नहीं हो सका। क्या योगी जी के भी राज में धर्मांतरण के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनायी गयी फ़िल्म का यही मूल्यांकन है!
सुजल पर वज्रपात तो तब हुआ जब धर्मांतरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म की नायिका स्वयं लव-जेहाद की शिकार हो गई। यह फ़िल्म के उद्देश्यों के विरुद्ध एक गहरा षड्यंत्र था। माओवादियों की समानान्तर जनतानासरकार की ही तरह एक अन्य समानांतर पटकथा एक ही मंच पर रची जाती रही। भीतर ही भीतर चल रही इस एक और अंतरकथा की लेश भी भनक सुजल को नहीं लग सकी। परिणामतः फ़िल्म प्रमोट होने से पहले ही अंतर्विवादों में फँस गयी।

केरल जाकर अपने प्रेमी से हाई प्रोफ़ाइल निकाह करके मोनालिसा ने ढोल बजाते हुये घोषित कर दिया है कि लव जेहाद एक अच्छी परंपरा है, यह भारतीय समाज में समानता, सांप्रदायिक स्वतंत्रता और भाईचारा स्थापित करने का उत्तम उपाय है इसलिए मणिपुर डायरी का कोई औचित्य नहीं।
मोनालिसा को इसी रूप में प्रोजेक्ट किया जाता रहेगा। यह लव जेहाद को प्रोत्साहित करने के लिए एक सुनियोजित और बहुत बड़ा षड्यंत्र है।
मोनालिसा! तुम एक साथ दो परस्पर  विपरीत भूमिकाओं को बड़ी कुशलता से निभाती रहीं। एक में अभिनय करती रहीं, और दूसरी में उसके ठीक विपरीत भूमिका को अपने जीवन के लिए जीती रहीं! मानना पड़ेगा, तुम्हें तो माताहारी होना चाहिए था।

शक्ति जब अनियंत्रित होकर विकृत होती है तो फिर वह किसी के लिए भी पूजनीय नहीं रह जाती, वह अपने परिवेश के साथ स्वयं को भी समाप्त कर लेती है।

इस बार बाबा भारती नहीं जीत सके, डाकू खड्ग सिंह जीत गया। बंजारिन लड़की के लिए सुजल के मन में उपजी सहृदयता का यही पारितोषिक है!
हमने मोतीहारी वाले मिसिर जी को पूरी कथा बताई तो कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने धनुषभंग की कथा सुनाते हुये इतना ही कहा - "जब परशुराम को श्रीराम के अवतारी होने का प्रमाण मिल गया और राम ने शरसंधान कर उसका लक्ष्य पूछा तो परशुराम ने उत्तर दिया था - हे प्रभु इस शर से मेरे पाप और पुण्य दोनों को लक्ष्य कर नष्ट कर दीजिए।"
सुजल को अपने कार्यों की श्रेष्ठता और उनके उद्देश्यों पर गर्व की अनुभूति थी। ईश्वर ने मोनालिसा के रुप में आकर सुजल को संदेश दे दिया कि अब परशुराम को पुनः अपने तप में लीन जाना चाहिए"।

सोमवार, 23 मार्च 2026

इनमें से कोई नहीं

जो विवेकी है 

वह करुणा से भरा है 

जो करुणा से भरा है 

वह उदार है

जो उदार है 

वह सहिष्णु है

जो सहिष्णु है 

वह शोषित है

जो शोषित है 

वह वंचित है

जो वंचित है 

वह सुदामा है।

ब्राह्मण

सौंप कर तुम्हें सत्ता

स्वयं सुदामा हो जाता है

जिस पर आरोप हैं 

कि उसने 

नहीं ढकने दिये तुम्हें स्तन

नहीं पीने दिया तुम्हें जल

नहीं लेने दिया तुम्हें ज्ञान

राज्याश्रित गुरुकुलों में।

ब्राह्मण 

अवाक है

भीग कर काँप रहा है 

आरोपों की वर्षा में,

भयभीत है

तुम्हारी धमकियों से।

राजा 

अट्टहास कर रहा है

देखकर दुर्दशा

सुदामा की।

हे राजाधिराज!

आप शक्तिशाली हैं

क्यों नहीं कर देते 

एक और हिंदूकुश

एक और उन्नीस नब्बे

एक और चितपावन नरसंहार

जी लेना फिर

जी भर 

ढककर स्तन

पीकर जल

और लूट कर सारा ज्ञान।

किंतु ध्यान रहे

ब्राह्मण मरता नहीं

क्षत्रिय हारता नहीं

वैश्य निरुपाय होता नहीं

और शूद्र अनुद्यमी होता नहीं।

तुम 

इनमें से कोई भी नहीं हो।

रविवार, 22 मार्च 2026

कब तक

युद्ध
कभी तो रुकेगा
पर कब?
बचाने महाविनाश
और अधिक होने से पहले
या उसके बाद?
महत्वपूर्ण है
व्यक्तिगत लाभ
और अहंकार से अधिक
तुरंत रोकना
इस महाविनाश को।
पहल जो भी करेगा
झुकने की
फलों से लदी डालियों की तरह
वही माना जाएगा महान।
भारत कहता है-
दृढ़ता तोड़ती है
मृदुता जोड़ती है
इसलिए प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए
कि कौन होगा पहले मृदु
और महान
इतिहास के पृष्ठों में ही नहीं
लोगों के हृदयों में भी।
अमेरिका तो नया है
पर बहुत पुरानी संस्कृतियाँ हैं
इज्रेल और ईरान की,
कोई नहीं चाहेगा
इन्हें खो देना
सदा के लिए
महाभारत युद्ध की तरह।

शनिवार, 21 मार्च 2026

अभियान घरवापसी

हिंदूराष्ट्र का सपना बेचने वाले डीएनए विशेषज्ञ मोहन भागवत मुसलमानों की घर वापसी की बात करते हैं। उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इंद्रेश कुमार ने दस लाख हिंदू कन्याओं को मुसलमानों से निकाह करने के लिए प्रेरित कर उन्हें मुस्लिम घरों में पहुँचा दिया। यह बात स्वयं इंद्रेश कुमार ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मार्च २०२६ में बताई। इंद्रेश का विचार है कि इस तरह हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम घरों में जाकर उन्हें बदल देंगी।

इंग्लैण्ड में शरणार्थी बनकर गये मुसलमानों ने अभी हाल ही में एक प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने नारा दिया- "अंग्रेजो इंग्लैंड छोड़ो"।
ईरान के कट्टरवादी सांप्रदायिक ख़लीफ़ा ख़ामेनेई की मृत्यु के बाद भारत के मुसलमानों ने स्वयं को भारतीय नहीं, ईरानी बताया और देश भर में रोते हुए प्रदर्शन किये। और यहाँ इंद्रेश को लगता है कि हिंदू लड़कियाँ मुसलमानों को बदल देंगी। इस बदलाव की प्रक्रिया और स्वरूप कैसा होगा यह इंद्रेश ने अविमुक्तेश्वरानंद को नहीं बताया।

सिकलिंग की घरवापसी
थैलेसीमिया की तरह सिकलिंग भी एक आनुवंशिक हीमोग्लोबिनोपैथी का परिणाम है जो अचिकित्स्य व्याधि है।
चिकित्सा विज्ञान मानता है कि गुणसूत्रीय क्रमिक न्यूनता के साथ इसे धरती से समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए सिकलिंग वालों को सामान्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) लोगों से विवाह करना चाहिए। सिकलिंग मेजर और माइनर (ट्रेट) के आधार पर ऐसे विवाहों की दो स्थितियाँ हो सकती हैं,अर्थात-
१. सिकलिंग मेजर + सामान्य = १००%सिकल सेल ट्रेट
२. सिकल सेल ट्रेट + सामान्य = ५०% ट्रेट और ५०% सामान्य।

यदि हर पीढ़ी के बच्चों के विवाह हर बार सामान्य व्यक्ति से होते रहें तो इस तरह कुछ पीढ़ियों के बाद सिकलिंग समाप्त हो जाएगा। यह एक गणितीय अनुमान है जिसमें ५०% बच्चे सामान्य और ५०% सिकलिंग ट्रेट के होंगे। किंतु एक्स-वाई के खेल इतने सीधे-सरल नहीं होते जितने वे गणितीय (सांख्यिकीय) विश्लेषण में दिखाई देते हैं। कोई नहीं जानता किसी जोड़े के कितने बच्चे होंगे और उनमें से कितने जीवित रहेंगे।
प्रांतीय सरकारें इस तरह के विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए धनराशि भी प्रदान करती हैं। यह लगभग वैसा ही है जैसा कि दो असमान रेखाओं को समान बनाने के लिए बड़ी रेखा को काट कर छोटी के बराबर कर देना। आम जनता के बीच सब कुछ उद्घाटित नहीं किया जा सकता अतः मैं यह नहीं बताऊँगा कि हीमोग्लोबिनोपैथी किन लोगों में होने की प्रायिकता होती है। जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से पृच्छा कर सकते हैं।
सिकलिंग रोगियों की घर वापसी का यह कार्यक्रम कितना सफल होगा, कोई नहीं जानता। यह भी सुनिश्चित नहीं है कि घरवापसी के बाद यह पुनः नहीं होगा। जिन परिस्थितियों में हीमोग्लोबिनोपैथी का जन्म हुआ था, यदि वैसी ही परिस्थितियाँ पुनः उत्पन्न हुईं तो क्या यह फिर नहीं होगा, इसका उत्तर वैज्ञानिकों के पास नहीं है।

इंद्रेश कुमार का मुसलमानों की घर वापसी का तरीका भी सिकलिंग की घर वापसी जैसा प्रतिलोम है, अनुलोम नहीं। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारी लड़की मुस्लिम घर में जाकर घर वापसी कैसे कराएगी? यह गंगा के प्रवाह को बंगाल की खाड़ी से गोमुख तक वापस ले जाने की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक कल्पना है। वर्षों पहले जो लोग मतांतरित हुये उन्हें हमारे घर आना चाहिए या जो मतांतरित नहीं हुये उन्हें मतांतरित घरों में जाना चाहिए? संघ के चिंतक अपने घर का पता या तो भूल गये हैं या फिर उन्होंने घर ही बदल लिया है।
भारत के लोगों ने मोहनदास को समझने में भारी भूल की और अब उनकी मृत्यु के बाद उनका स्थान मोहन भागवत, इंद्रेश कुमार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ले लिया है। तब एक गांधी था, आज उसके बहुत से प्रतिरूप हमारे बीच में हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2026

विकल्प

समाज के विघटनकारी ध्रुवीकरण के लिए जितने उत्तरदायी मोदी, मोहन भागवत और अमित शाह हैं, स्वयं हिंदू समाज भी उनसे कम दोषी नहीं है। भ्रष्टाचार से समझौता कर चुके हिंदू समाज ने मुस्लिम आतंकवाद से मुक्ति की आशा में कांग्रेस के विकल्प स्वरूप भाजपा पर विश्वास किया और उसके भक्त हो गये। मोदी प्रारंभ में तो अवश्य हिंदू राष्ट्र की बात करते रहे पर इसके बाद उन्होंने न केवल सवर्णविरोधी विषाक्त वक्तव्य भी दिये अपितु सनातनियों के सामान्य नागरिक अधिकार छीनने के षड्यंत्र भी करते रहे हैं, जिसके परिणाम स्वरूप सवर्ण इस देश का सर्वाधिक असुरक्षित, पीड़ित और वंचित समूह होता चला गया। हिंदूराष्ट्र की आशा में हम सब मोदी के विषाक्त भाषणों की अनदेखी करते रहे, हमारी भक्ति अपने चरम की ओर बढ़ती रही और मोदी हमारे समूल उच्छेदन के बीज बोते रहे। मोदी के विषाक्त भाषणों के बाद भी लगातार तीन बार हमने मोदी को देश की बागडोर सौंपी, पर कभी विकल्प के बारे में सोचा भी नहीं।

आप अपनी गाड़ी में एक वैकल्पिक चक्का रखते हैं पर लोकतंत्र के रथ में कभी किसी ने वैकल्पिक चक्के की आवश्यकता नहीं समझी। सावधान! किसी एक पर अतिनिर्भरता शोषण के कई द्वार खोलती है। मोदी और उनके मंत्रियों ने केवल उन लोगों की चिंता की जो देश को आगे ले जाना तो दूर सदा बाधक और विनाशक ही बने रहे, वह भी उन लोगों के शोषण और उत्पीड़न के मूल्य पर जो देश के विकास और समृद्धि के सदा से महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। यह केवल विकासकारी तत्वों की उपेक्षा का ही विषय नहीं है, अपितु उनके साथ घृणित अत्याचार और शोषण की क्रूरता का भी विषय है।
हिंदू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में हमने भोगा है -
विद्यालयों में हिंदू बच्चों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न, सांस्कृतिक चिन्हों और प्रतीकों के अपमान की बढ़ती घटनायें, मतांतरण का दबाव, प्रेमजेहाद, भूमिजेहाद, चिकित्सा जेहाद, सांस्कृतिक जेहाद...। हम भोग रहे हैं सर तन से जुदा की क्रूर घटनायें, हिंदू पलायन, खाद्य-पेय पदार्थों में थूक-मूत्र मिलाने की निरंकुश घटनायें, सवर्णों को जूते मारकर यूरेशिया भगाने की धमकियाँ, ब्राह्मण कन्यायों के यौनोत्पीड़न की घटनायें, सवर्ण होने के कारण मारपीट और हत्यायें, आरक्षण के नाम पर सवर्णों को बिना किसी निरीक्षण-परीक्षण के अपराधी मानकर कारागार में डाल देने वाले विधान के प्रस्ताव को न्यायसंगत सिद्ध करने के विनाशकारी हठ, प्रतिभापलायन की स्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए विविध उपाय.... सवर्ण यही सब देखने और भोगने के लिए विवश होते रहे हैं। भाजपा ने अपने राजनीतिक चरित्र से बारंबार प्रमाणित किया है कि हिंदू समाज को तोड़ने में वे कांग्रेस और सपा से भी बहुत आगे निकल चुके हैं। तथापि, यूजीसी रेगुलेशन बिल लाने के लिए मोदी जी और उनकी "यूजीसीसमिति" के लोग धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने सारी नैतिकताओं की लक्ष्मण रेखायें पार कर हिंदुओं को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अभी भी समय है, राष्ट्रवादी नागरिकों को भाजपा, कांग्रेस और सपा के विकल्प गठन पर गंभीरता से विचार करना ही होगा। हम किसी भी वर्तमान राजनैतिक दल पर भरोसा कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। सभी दल अरविंद केजरीवालसंप्रदाय और कांग्रेस का अनुसरण करने की प्रतिस्पर्धा में दौड़े चले जा रहे हैं। जब सत्ता निरंकुश होती है तो जनता को अपने दायित्व निभाने के लिए आगे आना होता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

मूल्यविहीन शिक्षा

क्या शिक्षा सचमुच हमें नैतिक, संस्कारी और मानवीयगुणों से संपन्न करती है?

देश भर में धरमशाला जैसी न जाने कितनी क्रूर घटनायें तो यही प्रमाणित करती हैं कि शिक्षा का इन सबसे कोई संबंध नहीं होता। तब प्रश्न यह खड़ा होता है कि फिर शिक्षा की हमारे जीवन में उपादेयता क्या है?
अनुभव तो यही बताते हैं कि हम कितने भी शिक्षित क्यों न हो जाएँ, बर्बरता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
धरमशाला में बीएड की एक छात्रा को चार लड़कियों ने महीनों प्रताड़ित किया, प्रोफ़ेसर ने यौनोत्पीड़न किया, फिर चिकित्सा के अनंतर छात्रा की मृत्यु हो गई।

अनैतिक और कुपात्र लोग जब शिक्षक बनते हैं तो वे समाज को केवल पतन की ओर ही ले जाते हैं। स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था इतनी पापपूर्ण क्यों है और हम यह सब सहने एवं भोगने के लिए विवश क्यों हैं? हमने यह कैसा देश बनाया है!

जोड़-तोड़ करके संविधान लिख कर रख लेने भर से किसी देश की व्यवस्था आदर्श नहीं हो जाती। इतने वर्षों में हम तो उसे समझने-समझाने की क्षमता तक विकसित नहीं कर पाये, न संविधान का मूल संदेश आम जनता को दे सके, तब संविधान के अनुरूप देश का निर्माण करना तो बहुत दूर की बात है।
१९४७ से आज तक हम अपने समाज के लिए अपनी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं बना सके। सब कुछ पराधीनता वाले युग की बनी-बनाई लीकों पर चलता रहा और हम सब छद्म स्वाधीनता में आत्ममुग्ध बने रहे।
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सोमवार, 16 मार्च 2026

आत्मनिर्भर पराधीन भारत

इसमें कोई संदेह नहीं कि आईटी में निष्णात होने के बाद भी हम आत्मनिर्भर नहीं हैं इसलिए अमेरिका से पंगा नहीं ले सकते। चीन और रूस के पास उनकी अपनी-अपनी आईटी व्यवस्था है।

हमारे आईटी वैज्ञानिक अमेरिका में काम करके उसे आत्मनिर्भर बनाते हैं। कुछ पूर्णनिर्लज्ज माननीय जी यह भी कह सकते हैं कि भारतीय वैज्ञानिक लालची और देशद्रोही होते हैं इसलिए वे पलायन कर जाते हैं। स्वयंभू हिंदू ठेकेदार कह देंगे कि हिंदू वैज्ञानिकों में राष्ट्रप्रेम और संस्कारों का अभाव है। माँ-बाप को चाहिए कि अपने बच्चों में जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी का भाव जागृत करें और मुसलमानों में छिपे हुये अपने पूर्वजों के डीएनए पहचानें जिससे भारत की प्रतिभा पलायन को रोका जा सके।
मेरा मत इन सभी विद्वानों, तर्कशास्त्रियों और राष्ट्रप्रेमियों से पूरी तरह भिन्न है। यूजीसी प्रकरण के बाद की घटनाओं ने मुझे राष्ट्रप्रेमी से कम्युनिस्ट बना दिया है। यह मेरे लिए वांछनीय नहीं था, किंतु वैचारिक व्यभिचार की यंत्रणा से बिलबिलाकर मुझे कम्युनिज्म की कड़ाही में कूदने के लिए विवश होना पड़ा है। ...तो अब मुझे चीनी व्यवस्था भारतीय व्यवस्था की तुलना में कई गुना अच्छी लगने लगी है। हम पाखंडी और षड्यंत्रकारी हैं, चीन में जो भी है अच्छा-बुरा सब खुला हुआ है। कहीं कोई ढकोसला नहीं। भारत में टाटा है सुंदर पिचाई है, इसके बाद भी आईटी में हम पराधीन हैं और अमेरिका को आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
महाभारत टीवी धारावाहिक में हम वर्षों पहले क्लस्टर बाण वर्षा की अवधारणा को देख चुके हैं, ईरान ने क्लस्टर अग्निबाण बना भी लिए और हम आत्ममुग्धता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाये।
हम २०१४ से २०२५ तक लगातार ११ वर्षों तक राष्ट्रप्रेम में इतने डूबे रहे कि यह भी नहीं देख सके कि अगर अमेरिका ने अपनी आईटी के दरवाजे हमारे लिए बंद कर दिए तो पूरा भारत ठप्प हो जाएगा। इसरो, आर.एण्ड डी., बैंक, उद्योग, परिवहन, कार्यालयीन कार्य, साइबर प्रणालीऔ... सब में आपातकाल लग जाएगा।
तो क्या किया जाय?
कुछ न किया जाय। हिंदुत्व और राष्ट्रप्रेम में डूबे रहा जाय। यूरेशियन भारत छोड़ो को सुना जाय। तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार गीत का आनंद लिया जाय, और अपनी बेटियों का "शुद्धिकरण" करवाने के लिए, जो माँग रहे हैं उन्हें सौंप कर उनके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाय। तदुपरांत हिंदूसमाज में बोई जाती रही आरक्षण की विषबेल में मधुर और सुगंधित फल लगने प्रारंभ हो चुके हैं, उन्हें तोड़कर खाया जाय और चैन की नींद सोया जाय। जब नींद खुलेगी तब सामने खड़े पाषाणयुग को भी स्वीकार करके जी लेंगे। बाकी काम तो महामानव और ठेकेदार कर ही रहे हैं।

जीत-हार

एशिया जल रहा है

यूरोप झुलस रहा है
अमेरिका पंगु हो रहा है।
इस महायुद्ध में
न कोई हारेगा
न कोई जीतेगा
दोनों कहेंगे -
ना तुम जीते
ना हम हारे।
व्याख्याकार
रंग भरेंगे
अपनी-अपनी सुविधा से
देखेंगे सुनेंगे लोग
रंगीन व्याख्यायें
अपनी-अपनी सुविधा से।
ट्रंप फिर फैलाएगा थैला
सर्वोच्च पुरस्कार के लिए
या दे देगा कोई पुरस्कार
स्वयं को ही, बनाकर एक समिति।
बस, कुछ लोग
वापस नहीं आयेंगे कभी
जिनका दोष है इतना सा
कि जन्मे हैं वे
उस देश में
जिनके राजा
भरे हुये हैं
परमाणु बम रखने की
आत्ममुग्धता से।
हमें गर्व है
कि आर्यावर्त्त
कल भी उडुपी था
आज भी उडुपी है
जो भी हैं युद्धरत
देता है भोजन औषधि
दोनों पक्षों को
रहकर निष्पक्ष
कौरव हों या पांडव
इज्रेल हो या ईरान
रूस हो या यूक्रेन
सर्वे भवंतु सुखिनः
सर्वे संतु निरामयाः।।

रविवार, 15 मार्च 2026

प्रतिस्पर्धा

भारत के अय्यर ब्राह्मण आदिशंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत समर्थित षण्मत (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश और स्कंद) के उपासक माने जाते हैं। आदिशंकराचार्य ने तत्कालीन षण्मत मतभेंदों को समाप्त करने के लिए जिस अद्वैत मत को प्रतिपादित किया, मणि शंकर अय्यर उसी स्मार्त (स्मृति) परंपरा के वाहक हैं। आदिशंकराचार्य शाकाहारी थे पर मणि शंकर अय्यर ने "कबाब प्रतिस्पर्धा" के आयोजन का आह्वान किया है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित है।

मणिशंकर अय्यर के सम्मान में प्रस्तुत है यह रचना -

असहिष्णुता से बोली
सहिष्णुता,
हिंसा से बोली
अहिंसा
आओ वार्ता करें
कुछ प्रतिस्पर्धा करें
"यद्यपि अच्छे हो सकते हैं
तुम्हारे कबाब,
पर अच्छे हैं हमारे कबाब भी
तुम्हारे कबाबों से"।

समान है
हमारी भाषा, मानसिकता और संस्कृति
समान है उर्दू और संस्कृत
समान है रक्त और दुग्ध
समान है पैगंबरवाद और बहुदेववाद
समान है घृणा और प्रेम
समान है मृत्यु और जन्म
आओ हम एक हो जाएँ
मृत्यु में समाहित हो जाएँ
षण्मत को परे हटायें
एक थाली के कबाब हो जाएँ
गाय खाएँ, वाराह भगाएँ
भारत को विभाजन से बचाएँ।

युग नया है
आदिशंकराचार्य विगत हुये
पैगंबर सामयिक हुये
स्मृति लुप्त हुई
हदीस गीता हुई
आओ, हम हदीस गाएँ
देश को विभाजन से बचाएँ।

एकेश्वरवाद की कट्टरता
सहिष्णुता लाती है,
स्मृति
हमें असहिष्णु बनाती है
देश को हिंदूराष्ट्र बनाती है
हिंदूराष्ट्र एक वैश्विक संकट है
जिससे अवश्यंभावी है होना
देश के तेंतालीस टुकड़े।
आओ, हम देश बचाएँ
भारत को पाकिस्तान में मिलाएँ।

उसने फेक दी
उठाकर शिव की मणि
हिंदमहासागर में नहीं
अरबसागर में
चबाते हुए कबाब
होकर चिंतित
कि होने ही वाले हैं
देश के तेंतालीस टुकड़े
आओ, हम देश को बचाएँ
भारत को पाकिस्तान में मिलाएँ।

घृणामूलक श्रेष्ठता का भविष्य

आसुरीवृत्ति प्रकृति के सिद्धांतों और नैसर्गिक संसाधनों पर अपने वर्चस्व की विकृतकामनाओं को जन्म देती है। आज दुनिया भर में चल रहे विनाशकारी युद्ध चिंता के विषय हैं। लोग चिंतित हैं कि घृणा और सांप्रदायिक हिंसा के विचारों का भविष्य (Prognosis of hate and thought of communal violence.) क्या होगा!

घृणा और सांप्रदायिक हिंसा मनुष्य की मनोवृत्तियाँ है। न्यायालय में ऐसी किसी "मनोवृत्ति" को "मनोविकृति" बताकर अपराधियों को मुक्त कराने के प्रयास अतिबुद्धजीवियों का अतिप्रिय विषय है।  हिंसक मनोवृत्ति अपने आप में अपराध का एक बीज है। किंबहुना, यहाँ सांप्रदायिक घृणा पर आधारित समाजों और राष्ट्रों के भविष्य पर चिंतन अपेक्षित है। हमास, हिजबुल्लाह, आइसिस आदि दुनिया भर में हिंसा क्यों करते हैं? यह हिंसा कब तक होती रहेगी? और पाकिस्तान, जिसका जन्म ही सांप्रदायिक घृणा और हिंसा के गर्भ से हुआ है, कब तक हिंसा करता रहेगा?
यद्यपि बहुत से शक्तिशाली असुर "साधु" और "बुद्धिजीवी" बनकर मानवता की आड़ में इन आपराधिक समूहों के समर्थन में खड़े होते रहे हैं, करुणा के नाम पर उन्हें संरक्षण देते रहे हैं, और सद्भावना के नाम पर उनके पापकृत्यों को प्रोत्साहित करते रहे हैं तथापि सभी आतंकवादी संगठनों का अंत होना निश्चित है। पाकिस्तान का खंडित होकर भौगोलिक और सांप्रदायिक रूपांतरण भी अवश्यंभावी है। ईरान एक बार पुनः अपने अतीत के गौरव को प्राप्त करेगा। इज्रेल भी पश्चिमी जगत के लिए सर्वमान्य धार्मिक देश के रूप में उभर कर सामने आने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।
क्या यह ज्योतिषीय घटनाओं या किसी अंतःज्ञान पर आधारित भविष्यवाणी है! नहीं, इनमें से कुछ भी नहीं, यह तो "समाज-मनोवैज्ञानिक चिकित्सा" के दार्शनिक तत्वों पर आधारित अनिवार्य परिणमन का सत्य है। 'अहिंसा' और 'शांति' प्रकृति के घटक हैं, 'हिंसा' और 'अशांति' विकृति के घटक हैं। विकृति की दो ही गतियाँ हैं, ...उसका अंत या फिर प्रतिगमन होकर प्रकृति में रूपांतरण। यह वृक्ष से बीज बनने की प्रक्रिया है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

मृत्युदंड

उन्होंने कहा

'सदा सच बोलो'
मानकर हमने उनका आदेश
जब बोल दिया एक दिन
सब कुछ सच-सच
तो वे हो गये कुपित
और डाल दिया हमें
बंदीगृह में।

एक दिन उन्होंने दिया
एक उपदेश 
'तमसोमा ज्योतिर्गमय'
मानकर हमने उनका आदेश
जब प्रज्वलित कर दिया
गहन तिमिर में एक दिया
तो वे कुपित हो गये
और डाल दिया हमें
अँधेरे बंदीगृह में।

उन्होंने कहा
'नीर-क्षीर विवेकी बनो'
मानकर हमने उनका आदेश
जब कह दिया एक दिन
नीर को नीर
और क्षीर को क्षीर
तो वे फिर कुपित हो गये
और दे दिया हमें
मृत्युदंड।

हम मर गये
मर कर मुक्त हुये
पांचभौतिक प्रपंच से
छोड़कर अंतिम संदेश
कि उपजाऊ क्षेत्र होता है
वैदिक ऋषियों का ज्ञान
प्रपंचियों के लिए
मठाधीशों के लिए
जहाँ बना दी जाती हैं
जीवित समाधियाँ
ऋषिपुत्रों की।

साध्वी का श्राप

साध्वी के श्राप पर चर्चा से पहले कृष्ण-गांधारी संवाद को स्मरण कर लेना प्रासंगिक होगा। 

"माधव! मैं तुम्हें और तुम्हारे वंश को सर्वनाश का श्राप देती हूँ।"
"माता गांधारी! आपका दुःख स्वाभाविक है। किंतु दुर्योधन की जंघा का तोड़ा जाना और दुःशासन के वक्ष का चीरा जाना आवश्यक था अन्यथा एक स्त्री के साथ राजवंश के लोगों द्वारा किया गया निंदनीय कृत्य आम लोगों के लिए आदर्श और आचरणीय हो जाता। आपने अपने पुत्रों को खोया पर इस खोने से ही आर्यावर्त की संस्कृति बच गयी, क्या यह उपलब्धि नहीं है!"
पुनः साध्वी के श्राप पर आते हैं। घर की बात घर में सुलझाई तो तब जाय जब घर के मुखिया समस्या को मानने और सुलझाने के लिए तैयार हों। एक ओर निरंतर प्रहार पर प्रहार, दूसरी ओर केवल याचना पर याचना!
घर का विवाद था तो साध्वी जी ने ही क्यों नहीं सुलझा लिया! वे तो मोदी जी से सहज संवाद कर सकती थीं।
साध्वी जी समस्या की गंभीरता को समझने में या तो असफल रही हैं या फिर समझना ही नहीं चाहतीं। यह जरा सी फुंसी की समस्या नहीं है, मेटास्टेसाइज्ड मैलिग्नेंट कैंसर की समस्या है जिसकी प्राॅग्नोसिस केवल हिंदू उन्मूलन है। जब सनातनी ही नहीं बचेंगे तो केवल मंदिरों से धर्म संस्थापना कैसे संभव है?
निरंतर आक्रमण सहते हुये भी यदि हम सत्ता की अंधभक्ति में लीन रहते हैं तो यह हमारी मूर्खता का परिचायक है।
प्रबुद्ध जनता सत्ता की विरोधी नहीं, उसकी विघटनकारी कुनीतियों की विरोधी है।
सुना है, संघ अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में उतर चुका है। यदि यह सच है तो जनता में जो संदेश जायेगा उससे भाजपा की समस्यायें कम नहीं होंगी। पहले सनातन के संत ही न्याय और अन्याय को सुनिश्चित कर लें। जनता तो सुनिश्चित कर चुकी है।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

सर्वनाश

नृत्यरत

सत्ता-नेतृत्व,
निरंकुश
षड्यंत्ररत
कालनेमि गुट
हुंकारित...

"करेगा संशय जो
नेतृत्व की निष्ठा पर
सत्ता की स्वेच्छा पर
होगा सर्वनाश
विरोध के स्वरों का।"

सुनकर हुईं हतप्रभ
देवी सरस्वती जी।
कौन है यह, किसने दिया श्राप!
किसने बना लिया बंदी
चिंतन, मंथन
और वैचारिक प्रक्रिया की
सहज अभिव्यक्ति को!
राजसत्ता
हो गई
सर्वोपरि
सर्वशक्तिमान
और इतनी असहिष्णु!
इतनी निरंकुश!
किसकी है हुंकार
कौन यह होलिका
कौन यह सूर्पनखा
चीख-चीख कर रही
लांछित सत्य को
वांछित असत्य को!

सुनो ऐ कृष्णविवर!
सुनो ऐ भस्मासुर!
शक्तिशाली हो तुम
किंतु नहीं
हो अमर
लिख लिया तुमने
अपनी ही लेखनी से
अपना मृत्युपत्र
सावधान!
अंत
कृष्ण विवरणों का
आ गया है निकट।

मंगलवार, 10 मार्च 2026

आठ मार्च का सूर्यग्रहण

तुम देने लगते हो हमें

भद्दी-भद्दी गालियाँ
जब तुम बंद कर देते हो
भींच कर मेरा मुँह
जब तुम ठूँस देते हो हमें
घसीट कर कारा में
तब समझ जाते हैं लोग
कि तुम्हारे पास
अब नहीं बचे हैं कुतर्क भी
कि सिद्ध कर सको हमें अपराधी।
तुम इसे राष्ट्रवाद कहते हो
लोग इसे असुरवाद कहते हैं।

बहुत बोझिल होता है
अहंकार
ईश्वरत्व और श्रेष्ठता का
उद्धारक और महानता का।
हमने देखा है
अहंकार को
दब कर कुचलते हुये
अपने ही बोझ से,
हम तो फिनिक्स हैं
जल कर भी जी उठेंगे फिर
पर नहीं मिलता अवसर
अहंकारी को पुनः।

मालायें
कितनी भी धारण कर ले रावण
वह साधु नहीं हो जाता
झूठ
कितना भी क्यों न कर ले सिंगार
वह सच नहीं हो पाता
सावधान!
निकट आ गया है
बहुरूपियों का अंत।
यह अघोषित आपातकाल
बहुत भारी पड़ने वाला है तुम्हें।

जिन्हें समझा था दीपस्तंभ
वे चित्र निकले
जिन्हें समझा था स्वर
वे मूक निकले
पर सदा मौन रहने वाला मैं
आज बोल सकता हूँ
भूल गये हो तो बता दूँ
अँधेरों को भी
छँटना ही पड़ता है एक दिन।
रावण!
तुम्हें मरना ही होगा!