रविवार, 19 अप्रैल 2026

संविधान संशोधन

वज्जीसंघ की अट्टकुलीय राजधानी वैशाली में राजपुत्रों के हठ पर एक विधान पारित हुआ- आठों राज्यों में जो भी होगी अनिंद्य सुंदरी कन्या वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे नगर की वधू होकर "नगरवधू" कहलाएगी। 

मातृहीना ब्राह्मण कन्या आम्रपाली को उसके पिता ने पूरे नगर की दृष्टि से छिपाने के यथासंभव प्रयास किए पर वह अनिंद्य सुंदरी थी, ख्याति प्रकाशित हुई और अंततः राजपुत्रों ने उसका अपहरण कर लिया।
मगध में राजकुल की कुदृष्टि ने एक ब्राह्मण कन्या को समारोहपूर्वक नगरवधू बना ही लिया।
फिर एक दिन आम्रपाली के देखते ही देखते वज्जीसंघ बिखर गया। 
औपनिवेशिक पराधीनता के बाद भारत में एक बार पुनः लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य स्थापित हुआ, आयु है लगभग आठ दशक मात्र। एक बार पुनः भारत के नये राजा ने ब्राह्मणों को जन्म लेते ही अपराधी घोषित कर दिया है। तब वज्जीसंघ का पराभव हुआ, अब इस राजा की बारी है।
नये सम्राट संविधान में परिवर्तन (संशोधन नहीं) करके
सदन में स्त्रियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे, पर वज्जीसंघ के आठ राजाओं के राजपुत्रों की तरह भाग्यशाली नहीं निकले, संविधान में अतार्किक और अव्यावहारिक परिवर्तन नहीं कर सके। सम्राट तो सदन में स्त्रियों की संख्या नहीं बढ़ा सकेगा, किंतु वैशाली की नगरवधू भारत को  पुनर्जन्म देने के लिए तैयार हो चुकी है।
अभी, जब स्त्री सांसद उनकी दृष्टि में पर्याप्त नहीं हैं तब भी तो सदन चल नहीं पाता, सदस्य संख्या बढ़ने से...
सांसदों में तलवारें अवश्य चलेंगी।
तलवारें चलेंगी तो वज्जीसंघ का उपसंहार हो जाएगा। फिर कोई राजपुत्र किसी ब्राह्मण की अनिंद्य सुंदरी कन्या को नगरवधू बनाने का बिल पारित करने का हठ नहीं करेगा। हम मगध के नये जन्म का स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

वंचितx१०टु द पाॅवर पाँच लाख

अठारहवीं शताब्दी के तीसरे दशक में

सिंधिया राजवंश के संस्थापक
राणोजीराव सिंधिया को
नहीं था पता
कि बीसवीं शताब्दी में
जब जातीय वर्गीकरण करेगा
कोई राजा
वह चिन्हित करेगा
सिंधिया के वंशजों को
पिछड़ा।
महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया
हो गये हैं अब
वंचित, पीड़ित शोषित
और पिछड़ा।
ना...ना...
भगवान ने नहीं
किसी ब्राह्मण ने नहीं
किसी पंडित ने नहीं,
एक अति पिछड़े सम्राट ने
जो कुछ वर्ष पहले ही बना था
पिछड़ा,
फिर एक दिन अचानक
बन गया अति पिछड़ा भी
उसी ने...
उसी सम्राट ने बना दिया
महाराजा राणोजीराव सिंधिया के
राजवंश को
पिछड़ा।

किसी को नहीं पता
कब कोई राजा बना देगा
किसी को भी दलित या अगड़ा
पिछड़ा या अति पिछड़ा
या कुछ और ...
यथा,
अति-अति पिछड़ा
या नितांत गड़बड़ा
या धरती का
"सर्वाधिक वंचित
इन टु टेन टु द पाॅवर पाँच लाख...
साल से प्यासा" ।

राजा घोषित करता है
पहले स्वयं को अछूत
फिर किसी को भी अछूत
और थोप देता है
अपने सारे अपराध
ब्राह्मणों पर
कोसते हुये उनके पूर्वजों को
और देते हुये दंड
उनके वंशजों को,
सदा से
यही तो होता आया है
अन्यथा आप ही बताइए
किस पंडित ने
कब बनाई थीं
जातियाँ
और उनके वर्गीकरण?

संकल्प

'गंगा-यमुना' भी मेरी

'कूभा' भी मेरी
रणजीत-दाहिर की
धरती भी मेरी।
टुकड़े-टुकड़े भी गिनने को
अब ना बचेंगे
सदी आठवीं से जो सहते रहे हैं।
'गंगा-जमुनी है तहज़ीब'
रटते रहे जो
वार छल से वही
हम पे करते रहे हैं।

नवासों के नवासों को भी शरण दी
अपने घर हम तभी से
गँवाते रहे हैं।
चाहते 'शांति' हम
'जंग' पर वो अड़े हैं।
'भाईचारे' के धोखे में
क्यों सब पड़े हैं!
"सर तन से जुदा" भी
वो कर रहे पर
गुणसूत्र उनमें
खोजते हम रहे हैं।
देश लुटता रहा
देखते सब रहे हैं
झूठे गीतों में हम सब
भरमते रहे हैं।
हम गुणसूत्र अपने
उधर खोजते हैं
वो गुणसूत्र अपने 
हमें दे रहे हैं।
उनकी तहज़ीब में
रेत की आँधियाँ
गंगा-यमुना पे आँखें
गड़ाये रहे हैं।
ये बेचते सदा
स्वाभिमान सबका
कलंकित धर्म-वेद करते रहे हैं।
अब ना हम रुकेंगे
ना कुछ सहेंगे
प्राण अर्पित भी करने पड़े तो करेंगे।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

यह रथ खड़ा क्यों है!

आरक्षण से समानता का हठ, किंवा कृष्णपक्ष की रात्रि में सूर्योदव का आश्वासन!

शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से लेकर शासकीय सेवाओं में पदोन्नति तक आरक्षण, चुनाव पात्रता में जाति के अनुसार जातीयआरक्षण और फिर लिङ्ग के आधार पर लैङ्गिकआरक्षण, पेट्रोल पंप आवंटन में आरक्षण...; और उनका सिद्धांत है कि आरक्षण से ही समाज में समानता ला पाना संभव है।

कोई अतिविद्वान आरक्षण शब्द का विश्लेषण नहीं करता, जो इसके लपेटे में हैं वे भी नहीं।
जैसे ही हमारे सामने सजा-धजा आरक्षण शब्द प्रस्तुत किया जाता है, सबसे पहले जो चित्र उभरता है वह है पात्रता के मानदण्डों में अनैतिक शिथिलता, दूसरा है इससे प्रभावित किसी सुपात्र की अन्यायपूर्ण उपेक्षा, तीसरा है परिणामों में गुणात्मक अपेक्षा का अभाव, चौथा है किसी सुपात्र की प्रतिभा से समाज और देश को वंचित करने का हठपूर्ण अपराध, और पाँचवा है किसी सुपात्र को कुंठा की कालकोठरी में एक अनपेक्षित जीवन जीने के लिए बाध्य कर देना।
'आरक्षण' की अवधारणा सामाजिक विषमता के सिद्धांत पर आरुढ़ होकर राजसिंहासन का पथ प्रशस्त करती है। यह एक से छीनकर दूसरे को उपकृत करने की अनैतिकता को समाज पर थोपने का षड्यंत्र है। यह लोकतंत्र का विधिसम्मत बना दिया गया परिहास है।  यह एक ऐसा विधान है जो अविधिक और अलोकतांत्रिक है। यह उठकर दौड़ सकने की संभावनाओं की निर्मम हत्या है। यह संभावनाओं को अपंग बनाने का षड्यंत्र है।
आरक्षण एक ऐसा चक्रविहीन रथ है जो कभी गति नहीं कर सका इसलिए पिछले लगभग आठ दशकों से एक ही स्थान पर खड़ा है, और अब तो तुम्हारी ही प्रेरणा से जिसने खड़े रहने को ही अपना मौलिक अधिकार मान लिया है।
किसी व्यक्ति में उसकी नैसर्गिक सक्रियता की संभावनाओं को निष्क्रियता में ढालने का यह हठ समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को अपंग बना रहा है। आठ दशकों से आरक्षण का रथ आज भी वहीं खड़ा है।
ब्रिटिश शासकों की तरह तुम भी कुटीर उद्योगों और शिल्पों के स्वैच्छिक चयन को जातीय कुप्रथा कहकर निंदा करते रहे और परंपरा से प्राप्त दक्षता-प्रवीणता को समाप्त करने के लिए जातीय ढाँचों का निर्माण करते रहे। तुम जातियों का विरोध करके भी जातियाँ बनाते रहे, जातियों के वर्ग और उपवर्ग बनाते रहे, फिर उन सबको भी कभी इधर कभी उधर करते रहे। यह सब न तो प्रकृति के संविधान के अनुरूप है और न किसी ब्राह्मण के धर्मपथ के अनुरूप। तुम्हें यह अच्छी तरह बोध है कि यह सब अनुचित है और इतिहास कभी तुम्हें क्षमा नहीं करेगा इसीलिए महान बनने की महत्वाकांक्षा में तुम षड्यंत्रपूर्वक अपने कुकर्मों के लिए ब्राह्मणों पर दोषारोपण की ब्रिटिश चाल चलते रहे।
ब्राह्मण तो सदा की तरह आज भी जातीय विषमता को स्वीकार नहीं करता। और तुम जातिप्रथा का विरोध करते-करते न केवल जातियाँ बनाते रहे अपितु उनमें घृणा के बीज भी बोते रहे। यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर विदेशी औपनिवेशिक शासकों की परंपरा को ही आगे बढ़ाते हुए तुम्हारा सुनियोजित आक्रमण है जिसके लिए इतिहास में तुम्हारा अभिलेखांकन किया जा चुका है।

जीवनशैली निषेध

"हिंदू प्रतीकों पर प्रतिबंध, बुर्का और गोल टोपी से कोई आपत्ति नहीं"।

लेंसकार्ट कंपनी के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल द्वारा अपने अधिकारियों/कर्मचारियों को तिलक, कलावा, शिखा, मंगलसूत्र, बिंदी और सिंदूर आदि हिंदू प्रतीकों के साथ कार्यस्थल पर आने और काम करने पर  प्रतिबंध लगा दिया गया। वहीं बंसल को मुस्लिम अधिकारियों/कर्मचारियों के सांप्रदायिक प्रतीकों से कोई आपत्ति नहीं है।
बात बाहर आई तो बंसल ने पत्रकारों के सामने स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि यह आदेश पुराना (फ़रवरी २०२६ का) है, और वर्तमान में अब यह प्रभावी नहीं है।
१९४७ में जब दुनिया के सबसे बड़े और क्रूर नरसंहार के साथ सांप्रदायिक और जीवनशैली के आधार पर देश का विभाजन हुआ था तब क्या किसी ने ऐसी कल्पना की होगी कि खंडित भारत में भी हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के पालन की स्वतंत्रता नहीं होगी!
ईसाई और मुस्लिम शिक्षण संस्थाओं और कभी-कभी तो शासकीय संस्थाओं में भी छात्र-छात्राओं के साथ, हिंदू प्रतीक मिटाने के लिए प्रताड़ना की घटनाएँ होती रहती हैं जिन पर सरकारों का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है।

No Lenskart
#पीयूषबंसल की कंपनी लेंसकार्ट के उत्पादों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। लेंसकार्ट स्टाॅक एक्सचेंज में भी शेयर्स के लिए सूचीबद्ध है। आप यदि शेयर बाजार में ट्रेड या निवेश करते हैं तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि लेंसकाॅर्ट के शेयर्स का सदा के लिए बहिष्कार करने पर गंभीरता से विचार करें।
जिस कंपनी ने हमारे पारंपरिक प्रतीकों का बहिष्कार कर दिया, उस कंपनी के शेयर्स का भी बहिष्कार किया जाना आवश्यक है। सारा संघर्ष सांप्रदायिक पहचान के वर्चस्व को लेकर ही तो है। हमें किसी के विचारों और जीवनमूल्यों से तब तक कोई प्रयोजन नहीं जब तक वह हमारे जीवनमूल्यों और अस्तित्व में अनधिकृत हस्तक्षेप नहीं करता।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

जयंती जो बन गई घृणा

जैसी कि भूमिकायें रची जा रही थीं, तदनुरुप ही भीमराव जयंती किसी उत्सव से अधिक घृणा, उत्तेजना और अपमानजनक गतिविधियों की प्रतीक बन कर रह गई।

स्वयं को हिंदू नहीं मानने की प्रतिज्ञा के प्रतीकस्वरूप मनुस्मृतिदहन, राममंदिर के परंपरागत ध्वज को निकालकर नीलेध्वज लगाने, जूते पहनकर परशुराम चौक की छतरी पर चढ़ने और ब्राह्मणविरोधी नारों के साथ अंबेडकरजयंती मनाई गई। क्या जयंती मनाने का यही स्वरूप होता है! इसमें आनंद नहीं उन्माद था, उत्सव नहीं घृणा का प्रदर्शन था, सामाजिक सौहार्द्य नहीं ब्राह्मणों को भारत छोड़ने की धमकी थी, किसी महान विचार का प्रचार नहीं आत्ममुग्धता का हठ था।
क्या ये सब मनोभाव किसी समाज को उत्थान की ओर ले जा सकते हैं! पूरे देश में हर्ष के स्थान पर आशंकाओं और भय का वातावरण निर्मित कर दिया गया। क्या इसमें भारतीय संस्कृति की लेश भी झलक मिल सकी किसी को?
भगवाध्वज के पतन और नीले ध्वज की विजय के उन्माद से यह कैसे भारत की कल्पना की जा रही है?
भारत ने ऐसे झंझावात न जाने कितनी बार झेले हैं, कहीं यह एक और झंझावात का प्रथम चरण तो नहीं?
विगत कुछ दशकों से हिंदूवादी चोले में छिपे असुरों की गतिविधियों और हुंकारों को देख-सुन कर भी उनके लक्ष्यों को
पहचानने में हमसे बहुत बड़ी भूल हुई है। इसका मूल्य चुकाने के लिए हमें तैयार रहना होगा।
भारतीय समाज आपसी टकराव और व्यापक हिंसा की ओर बढ़ चला है। अब तो दृढ़ संकल्प और लोककल्याणकारी भाव के साथ हमें संगठित होना ही पड़ेगा, इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। यही समय का आह्वान है और शास्त्र का आदेश भी।
अच्छी बात यह है कि दलित और पिछड़े वर्ग के ही कुछ संगठनों ने आयोजन के ऐसे विकृत स्वरूप का विरोध किया है। अस्तु विश्वास है कि भारत का विवेकशील समाज संगठित होकर इस झंझावात का भी सफलतापूर्वक सामना कर लेगा।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

राजपथ

जिसने किया प्रथम बार

दशमलव का व्यवहार
जिसने किया प्रकाशित
वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात
जिसने सुलभ कर दीं
ज्यामितीय रचनायें
और खगोल के रहस्य
जिसने सुयोजित किये सूत्र
त्रिकोणमिति और क्षेत्रमिति के...
ऐसे प्रकाण्ड विद्वान को
धकेल दिया जाता है
नेपथ्य के किसी कोने में
क्योंकि वह नहीं कर पाता
प्रभावित
मतदान और उसके परिणाम।
भारत में
नहीं होता किसी को गर्व
आर्यभट्ट पर
क्योंकि वह ब्राह्मण है
जिसने पीने नहीं दिया
नीर
पाँच सहस्र वर्षों तक
पता नहीं किन्हें?

उसी भारत में
पलकों पर बैठ गया
जिसने त्याग दिया
अपने पूर्वजों का धर्म
अपनी सांस्कृतिक परंपरायें
करते हुये निराधार आलोचनायें
ब्राह्मणों की,
करते हुये दासता
ब्रिटिश महारानी की,
वही होता है पूज्य
और प्रातःस्मरणीय
स्वाधीन भारत में
क्योंकि वह
संपन्न और शिक्षित होकर भी
रहता है दलित...
एक जाति
सत्तारचित
ताकि प्रतिभावान
यदि ब्राह्मण हो
तो दी जा सकें उसे गालियाँ
करने प्रशस्त
अपने-अपने राजपथ।

गणितज्ञशिरोमणि आर्यभट्ट!
तुमने जन्म ही क्यों लिया
कुसुमपुर में!
तुम्हें तो
स्मरण करता है पेरिस
प्रतिपल
जहाँ तुम गये नहीं
जीवन में कभी ।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

हिंदूधर्म

वह सत्ता पाने के लिए धर्म को पृथक  पहचान देता है। उसके नाम में स्वामी है, प्रसाद है और मोर है। तीनों शब्द उस धर्म के अनुयाइयों और संस्कृति में आदरणीय हैं जिसे भारत में "धर्म" की संज्ञा प्राप्त है।

वैदिकभारत के महर्षियों ने सामाजिक और व्यक्तिगत मूल्यों की ऊर्ध्वमुखी गति को प्रशस्त मानते हुये कुछ श्रेष्ठ आचरणों और मनोभावों को पहचान कर लोकहित में प्रकाशित किया, और इसे धर्म की संज्ञा दी। कदाचित् प्रारंभ में यह ब्राह्मणों द्वारा आचरणीय हुआ, इसलिए यह लोक में ब्राह्मणधर्म नाम से भी जाना गया। इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य तीनों वर्णों का धर्म से कोई विरोध था। सभी लोग धर्म के प्रति आदरभाव रखते थे और अपनी-अपनी क्षमतानुरूप उसके आचरण का प्रयास करते थे। शतप्रतिशत अंक लाने वाले को धार्मिक और दस अंक लाने वाले अधार्मिक कभी नहीं माना गया। अधार्मिक वही थे जो धर्मप्रतिकूल आचरण किया करते थे। इस तरह आचरण के आधार पर दो समूह के आचरण वाले समाज में सदा से देखे जाते रहे हैं, आज भी हैं- धार्मिक और अधार्मिक। अपनी पृथक पहचान के लिए ध्वज, नाम, संज्ञा आदि में बहुलता और विशिष्टता एकदेशज तो हो सकती है पर व्यापक नहीं। वैदिक धर्म को ही विभिन्न कालखंडों में ब्राह्मण धर्म, आर्य धर्म या हिंदू धर्म की संज्ञायें दी जाती रहीं, इन सबकी पहचान एक ही है, तात्विक अवधारणा भी एक ही है। इसलिये यह कहना कि हिंदू धर्म का कोई शास्त्रोक्त उल्लेख नहीं है, उतना ही सत्य है जितना यह कहना कि भारत और इंडिया दो पृथक देश हैं क्योंकि वेदों-पुराणों आदि में तो इंडिया कहीं लिखा ही नहीं है।
परवर्ती कालों में स्थानीय मान्यताओं, मूल्यों और सभ्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न मत और संप्रदाय भी अस्तित्व में आते रहे जिन्हें राजनैतिक कारणों से धर्म न होते हुये भी धर्म की संज्ञा दी जाती रही। इस सौरमंडल में धरती एक है, सूर्य एक है, धर्म भी एक है, ये अनेक नहीं हो सकते।
सभी धर्म ईश्वर का मार्ग बताते हैं, यह बड़ी धूर्तता से गढ़ा गया कुविचार है जैसे यह विचार कि ब्रह्माण्ड के सभी स्थूल पिंड एक समान होते हैं।
धर्म को लेकर नाम और पहचान का संकट राजनैतिक धूर्तता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हाँ! इसे कलियुग में पतन की प्रतिस्पर्धा अवश्य माना जा सकता है।
विविथता और अनेकता में एकता का उपदेश कितना तात्विक है!
सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, धूम्रकेतु, वामन तारा और कृष्णविवर आदि ब्रह्माण्डीय पिंडों के विभिन्न समूहों को एक ही कैसे मानना जा सकता है? यदि ये सब एक ही होते तो इनकी विविथता का कोई औचित्य ही नहीं था। सबका रक्त एक समान होता तो इनके चार समूह क्यों होते और क्यों उनमें इनकाम्पेटिबिलिटी होती?
सत्ता के लिए निर्मित चक्रव्यूहों का अस्तित्व उनके पूर्ण होने तक ही रहता है, उसके बाद नहीं। धर्म और अधर्म का ध्रुवीय अस्तित्व सदा रहता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

भगनील दर्शन

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा!

जिसमें मिला दो, लागे उस जैसा ।।

संघ और भाजपा का अध्यात्म दर्शन इसी महान गीत से ऊर्जित है। संघ और भाजपा के अभी तक के चरित्र और कार्यों से स्पष्ट हो चुका है कि उनका अपना कोई रंग नहीं, अपना कोई सिद्धांत नहीं, अपना कोई चिंतन और विचार नहीं। उनका एकमात्र लक्ष्य और धर्म राजसिंहासन है जिसे प्राप्त करने के लिए वे जिसमें "मिलते" हैं उसका ही रूप-रंग-सिद्धांत-आदर्श ...सब कुछ "ग्रहण" कर लेते हैं। आप इसे चार्वाक दर्शन का परिवर्द्धित रूप मान सकते हैं।
इसका वर्तमान उदाहरण विचारणीय है, जिसमें भाजपाइयों का रंग भगवा से नील हो गया है, यही है भगनील दर्शन। वास्तव में यह तो 'हमारा' मूल्यांकन था कि संघ और भाजपा सनातन संस्कृति के लिए समर्पित संगठन हैं। हमारा यह मूल्यांकन त्रुटिपूर्ण था, सत्य यह है कि ये लोग न कभी भगवा थे, न आज नीले हैं, न कभी हरे होंगे। ये लोग अपने लक्ष्य के लिए भगवा, नीला, हरा... या किसी भी अन्य रंग में अपनी सुविधानुसार मिल कर वैसा ही रंग-रूप-ग़ुण-सभ्यता-संस्कृति... आदि ग्रहण कर लेने की "अनुकूलन क्षमता" से संपन्न हैं। ये प्रवचनप्रिय लोग सतोगुण से द्वेष रखते हुये रजोगुण और तमोगुण प्रधान हैं तभी तो इतने घनघोर भौतिकवादी हैं। रजोगुण की एक विशेषता होती है- Association and Dissociation, अर्थात इन्हें स्थायित्व अच्छा नहीं लगता। इसको अपनाया, उसको त्यागा, भगवा त्यागा, नीला अपनाया, कल को नीला त्यागकर हरा अपना लेंगे, फिर कुछ समय पश्चात हरा त्यागकर काला अपना लेंगे। इससे एसोसिएशन, उससे डिसोसिएशन... किसी भी तरह चिड़िया की आँख का बेधन होना चाहिए। यही सच्चा ईश्वर है, यही सच्चा धर्म है, यही सच्चा मार्ग है, ....और जीवन का सारतत्व भी यही है। जब पूरा देश "हिंदुत्वा" के चक्रव्यूह में उलझा हुआ था तब संघ और भाजपा अपने अगले रंग का चयन करने में व्यस्त थे। नील तो आ गया, अब हरित रंग की प्रतीक्षा है।
अब यह अष्टकुलीय वज्जीसंघ की प्रजा को निर्णय करना होगा कि मगध के राजसिंहासन का रंग क्या होना चाहिए!

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

नया भगवान

हठ कर बैठ गया

आमरण अनशन पर
सोचकर
कि कल तक
पंक्तिबद्ध खड़े होंगे
कई मंत्री
लेकर संतरे का रस।
मैं नहीं पिऊँगा रस
करूँगा हठ
"मैं तो चंद्र खिलौना लै हों"।
फिर
जब मनुहार करेगा विश्व
तो पी लूँगा रस
गटागट
फिर मैं करूँगा
विजयनृत्य
जय जयकार होगी मेरी
मिल जाएगा मुझे
धरती का सबसे बड़ा पुरस्कार
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।

पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

धूम्रकेतु

संविधान है तो क्या हुआ
दिन-प्रतिदिन बढ़ते अत्याचारी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
वेद हैं तो क्या हुआ
अज्ञानी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
राम-कृष्ण की गाथायें हैं तो क्या हुआ
गाथाओं के उपहासक भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।

विक्रय हेतु उपलब्ध हैं
मंडी में मूर्तियाँ
निराकार की
होने के लिए व्याख्यायित
हमसे, तुमसे
और उनसे भी
जिन्हें नहीं होता कोई लेना-देना
किसी भी मूर्ति से।

न्याय के मंदिर में
नहीं सुनाई देती पवित्र शंखध्वनि
सुनाई देती हैं व्याख्यायें
भिन्न-भिन्न
एक ही धारा की।
सच कभी 'झूठ' हो जाता है
तो झूठ भी हो जाता है 'सच'
झूठ नहीं हो पाता 'झूठ'
सच नहीं हो पाता 'सच'
मौन रहती हैं सूर्य रश्मियाँ
नतशिर
कंपित
देखकर सूर्य को
जाते हुए अस्ताचल।

चर्चित होते हैं
कुछ पात्र
अपनी मृत्यु के पश्चात
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ।
राम, कृष्ण, बुद्ध और ईसा
गांधी, भीमराव और पेरियार
जीवित होते तो देखते
वे क्या थे, क्या हो गये
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ
जिनका नहीं है कोई संबंध
उनके होने से।

आने वाला है
लोकतंत्र का पंचवर्षीय पर्व
भगवा 'नीला' हो गया है
'नीला' भीम हो गया है।
कहा था वेदव्यास ने
आते ही अरुण के
नहीं रहता शून्य का नील
और नील जब होता है व्याप्त
कर देता है वध
अरुण का।
अरुण
अब नहीं है कहीं
धूम मची है
भीम की
पिछड़ा भीम, अगड़ा भीम
मेरा भीम, तेरा भीम
इसका भीम, उसका भीम
जितने लोग, उतने भीम।
भीम 'संविधान' हो रहा है
संविधान 'भीम' हो रहा है।
शक्ति 'सीता' बनकर
बैठी है शोकमग्न
अशोक वृक्ष के नीचे
श्रीराम की प्रतीक्षा में।
सीता के लिए
स्थायी है तमस
आने-जाने का काम तो
प्रकाश का है
जिसे
अब चाहता ही कौन है!

बहुत शक्तिशाली हैं
मायावी धूम्रकेतु
कोई वाशिंगटन में
कोई तेहरान मे
और भारत में तो
बड़ी भीड़ है इनकी।
क्या सचमुच
तैयार हो रहा है समय
लेकर करवट
सत्यमेव जयते के लिए!

रविवार, 5 अप्रैल 2026

शत्रुबोध की पैथोलाजिकल फिलासफी

आज का ज्वलंत विषय है नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा अर्थात अपसंस्कृति का कूटनीतिक चरित्र।

विश्व भर में नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा वर्तमान सभ्यता की सबसे बड़ी समस्यायें बन चुकी हैं। इनका मानवीकरण किया जाय तो ये वैचारिक और राजनीतिक हिंदूकुश की घटनायें हैं जो प्रतिपल घटित होती जा रही हैं।

दर्शन और भौतिक विज्ञान में सूक्ष्म की विराटशक्ति को स्वीकार किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से एक हिंदू संगठन को हम अपने सनातनी समाज का एक महत्वपूर्ण अंग मानते रहे, इतना अपना कि अपने शरीर की सूक्ष्मकोशिका और कभी-कभी कोशिकाअवयव के समान... यानी एक माइक्राॅन से भी सूक्ष्म, जिससे वह सनातनी समाज में विराटशक्ति के साथ स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण कर सके। किंतु हुआ क्या! संगठन ने हमारी सदाशयता का लाभ उठाकर नैनोप्लास्टिक की तरह मिमिक्री प्रारम्भ कर दी। एक विधर्मी द्रव्य को हम पहचान नहीं सके और उसे अपने ही पोषण के अंश से प्रोटीन-कोरोना बनाते रहे। 
(Cells often mistake nanoplastics for nutrients or foreign agents and actively pull them inside via processes like endocytosis or macropinocytosis. Once inside, they can accumulate in organelles like lysosomes. Upon entering biological fluids, nanoplastics interact with proteins, lipids, and carbohydrates, creating a "protein corona" around themselves. This coating makes them behave like biological particles, masking them from immediate immune clearance and allowing them to be transported throughout the body.)
संगठन के सूक्ष्म विचार जो कि वास्तव में संकुचित थे, ब्लड-ब्रेन-बैरियर को बड़ी सुगमता से पार कर तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचने लगे। संगठन की कार्यप्रणाली नैनोप्लास्टिकवत हमारी मस्तिष्क की तंत्रिकाओं की एपोप्लास्टी (कोशिका मृत्यु) की कारण बनती गई और हमें कुछ भी पता ही नहीं चला।
(Nanoplastics can trigger cell membrane damage, oxidative stress, and inflammatory responses,releasing cytokines, similar to the body's response to pathogens. They can impair energy metabolism, disrupt mitochondrial function, and cause cellular apoptosis i.e. cell death.) 
जहाँ संगठन नैनोप्लास्टिक की तरह हमारे चिंतन को प्रभावित कर एपोप्लास्टी का कारण बनता गया वहीं उसके राजनीतिक प्रकल्प हमारे विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध करते रहे और हम कुछ समझ ही नहीं सके। सनातनियों के प्रति उसकी कार्यप्रणाली कार्सिनोमा की तरह फलती-फूलती रही। कार्सिनोमा कोशिकायें हमारी सामान्य कौशिकाओं का रूप धारण कर हमें ही खाती रहीं और हमें अपने भीतर छिपे शत्रु की भनक तक नहीं लगी।

संघ, सिकलिंग और सवर्ण

यह गंभीर चिंता का विषय है कि डाॅक्टर होने के बाद भी मोहन भागवत अंतरजातीय रोटी-बेटी व्यवहार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। भागवत की गतिविधियाँ महर्षि परंपराओं के विरुद्ध म्लेच्छ परंपराओं की स्थापना के समर्थन में बढ़ती ही जा रही हैं। यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संहारक प्रहार है जिससे सतर्क होने की आवश्यकता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और इंद्रेश कुमार के बीच हुयी एक वार्ता के अनुसार संघ के प्रयासों से दस लाख हिंदू लड़कियों के निकाह मुस्लिम लड़कों से करवाये जा चुके हैं।
संघ के मोहन भागवत इस तरह की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करके सवर्ण समुदाय को भारत से पूरी तरह समाप्त कर देना चाहते हैं।
रोटी व्यवहार तो पूरे भारत में अंतरजातीय ही नहीं अंतरधार्मिक भी स्वीकार किया ही जा रहा है। किंतु अंतरजातीय बेटी व्यवहार स्वीकार करने से पहले चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से भी इसे समझना होगा। जिन्होंने सिकलसेल डिसीज के पीड़ितों की विभिन्न पीड़ादायक स्थितियों को देखा है वे इसकी गंभीरता को अच्छी तरह समझ सकते हैं।
यहाँ सवर्णेतर जातियों में होने वाली सिकलिंग और थैलेसीमिया जैसी आनुवंशिक और अचिकित्स्य व्याधियों के संदर्भ में मोहन भागवत के विचार को समझे जाने की आवश्यकता है।
सिकलिंग जैसी आनुवंशिक व्याधियों से सर्वाधिक प्रभावित लोगों में एसटी के बाद एससी और फिर पिछड़ी जातियाँ हैं, जबकि सवर्ण इस व्याधि से पूरी तरह मुक्त रहते हैं(इस अनुबंध के साथ किसी सवर्ण ने सिकलिंग प्रभावित के साथ अंतरजातीय विवाह न किया हो)
एक अध्ययन में पाया गया है कि सिकल सेल डिसीज एस.सी.डी., सिकल सेल ट्रेट (एस.सी.टी.) और एचबीएस-बीटा-थैलेसीमिया की व्यापकता क्रमशः 1.17% (95% सीआई: 0.79%–1.75%), 5.9% (95% सीआई: 3.8%–8.88%) और 0.37% (95% सीआई: 0.17%–0.83%) अनुमानित की गई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में एस.सी.डी. और एस.सी.टी. की व्यापकता अधिक है। भारत के आदिवासी समुदायों में इसका बोझ सर्वाधिक है।
सिकलिंग और थैलेसीमिया व्याधियों की कोई भी चिकित्सा अभी तक संभव नहीं है। भारत के 17 राज्यों अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और उत्तराखंड में SCD की प्रायिकता अधिक है। 
अन्य प्रभावितों में अफ्रीका की कुछ जनजातियाँ और अमेरिकी नीग्रो मुख्य हैं। इसकी उत्पत्ति और विशिष्ट जातीय समूहों में ही होने के कारण अज्ञात हैं। क्या मोहन भागवत प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

जंबूद्वीपे भरतखण्डे

घर से बाहर
जब भी धरे पाँव
लगा ही नहीं कभी
हमारा ही देश है यह!
घर से बाहर
घूमती थीं निर्भय
राजा की रची जातियाँ
खोदती हुई खाइयाँ,
निरंकुश दबंग
सताते हुये निर्बलों को,
स्वेच्छाचारी राजसेवक
लूटते हुये प्रजा को,
और राजपुरुष
रचते हुये चक्रव्यूह
षड्यंत्रों के
आर्यावर्त्त की जनता के विरुद्ध।
बचपन से अब तक
लगा ही नहीं कभी
कि यह देश
हमारा अपना है
हमारे पूर्वजों का है
मंत्रदृष्टा महर्षियों का है।
यहाँ तो हैं
आतंक के बवंडर
असुरक्षा की तेज आँधियाँ
कौन है प्रायोजक इनका, कौन...
बता दूँगा
तो कुपित हो जायेगा राजा
काट देगा जिह्वा।

प्रजा है
नूपुर
बँधी हुई
राजा के पाँवों में
पीपल की पात सी
थरथराती।
हम
परदेस हो चुके अपने ही देस में
परदेसी हैं
या फिर शरणार्थी
खोजते हुये
अपने ही जीवन के
खोए हुये टुकड़े
पल-पल धमकाती
मृत्यु के अट्टहास में।

प्रायोजित भीड़
भरती है हुंकार
ब्राह्मणो! भारत छोड़ो
छोड़कर अपनी बेटियाँ
और
अपनी चल-अचल संपत्तियाँ।
पूरा भारत
लाहौर हो गया है
कश्मीर हो गया है।
सुना है
हमारा भी राजा
डोनाल्ड ट्रंप हो गया है
करता है नृत्य
धधकती ज्वाला की लय पर।

पल्लवित पुष्पित पृथकतावाद

भारत में जितना पृथकतावाद स्वतंत्रतासंग्राम के उत्तरकाल में था उससे भी अधिक आज विभाजन के बाद भी है। हिंदुओं को मंथन करना होगा कि विभाजन से उन्हें क्या मिला? क्या उनकी हिंदू पहचान मिली, क्या हिंदू राष्ट्र मिला?

बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित भारत में हिंदुओं की हत्यायें, उनके स्वाभिमान को कुचलने के निरंतर प्रयास, उनकी मान्यताओं और जीवन पद्धति पर निरंतर प्रहार, उनकी भूमि और बेटियों का अपहरण, शरीया शासन के लिए उत्पात और अब हिंदुओं को भारत छोड़ने की धमकियाँ... ! यही सब तो मिलता रहा है। यहाँ हार-जीत का नहीं, प्रमुख विषय अस्तित्व रक्षा का है।
मुझे लगता है कि अस्तित्व के विषय में हिंदू सर्वाधिक विश्वासघाती समूह रहा है। अरबी मुसलमान शेष विश्व के लिए घातक नहीं हैं जबकि मतांतरित हुये मुसलमान पूरे विश्व में स्थानीय समुदायों के उन्मूलन को अपने जीवन का लक्ष्य मानते रहे हैं। पाकिस्तान का जनक मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू था, वहाँ के अधिसंख्य मुसलमान भारतीय मुसलमानों की ही तरह मतांतरित हैं। ईरान के मुसलमान भी मतांतरित हैं।
यह मतांतरण ऐसा क्या कर देता कि मनुष्य मनुष्य ही नहीं रहता! यद्यपि ईरान की स्थिति भारत से भिन्न है। इसलिए वहाँ के शासक कैसे भी हों पर आम जनता प्रायः ठीक ही है।
भारत में तो मतांतरित मुसलमानों से अधिक मुसलमान सेक्युलर हिंदू हैं जिनमें अब संघ और भाजपा जैसे हिंदूवादी संगठन बहुत आगे बढ़त बना चुके हैं।
तो क्या धरती से हिंदू समाप्त हो जाएंगे? समाप्त तो कोई भी नहीं होगा। हाँ!जनसंख्या समीकरण ऊपर-नीचे हो सकते हैं। आम हिंदुओं को भक्ति और समालोचना के अंतर और उनके परिणामों पर गंभीरता से विचार करते हुये अपने अस्तित्व के संघर्षपथ पर आगे बढ़ना होगा।
स्वातंत्रयोत्तर भारत में हिंदू शासकों ने ही हिंदुओं का सर्वाधिक अहित किया है, आज भी कर रहे हैं। यह सब इसलिए क्योंकि हमने हिंदूमूल्यों का परित्याग कर दिया है। हम वैचारिक आदर्शों को सम्मान देने के स्थान पर जातियों और समूहों को सम्मान देने लगे हैं। आम हिंदुओं को संघ और भाजपा की कलुषिता का पोस्टमार्टम करना ही होगा।

मूलनिवासी

भारत में ब्रिटिश शासन से पहले मूलनिवासी जैसी कोई अवधारणा कभी नहीं रही, कोई औचित्य ही नहीं था इसका। यह तो अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए प्रासंगिक है जहाँ दूसरे देश के लोगों ने स्थानीय लोगों को समाप्त कर अपनी पृथक पहचान बनाई और वहाँ अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। भारतीयों के संदर्भ में यह बात मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना और फिजी आदि के लिए सही है, वह भी इस संशोधन के साथ कि भारतीयों को वहाँ दास बनाकर या काम करवाने के लिए विदेशी शासकों द्वारा ले जाया गया, वे वहाँ स्वेच्छा से नहीं गये और न उन्होंने वहाँ के स्थानीय लोगों का नरसंहार किया। भारतीय जहाँ जाते हैं वहाँकी संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करते हैं।

भारत में सवर्णों के विदेशी होने की कहानी मुस्लिम शासकों द्वारा नहीं अपितु यूरोपीय शासकों द्वारा पहली बार गढ़ी गई। जिस तरह अपने अनैतिक और अन्यायपूर्ण कार्यों को नैतिक और न्यायसंगत बनाने के लिए यूरोपीय शासक उन्हें कानून के मनमाने बंधन में जकड़ने में पारंगत हुआ करते थे उसी तरह उन्होंने भारतीय समाज को तोड़ने के लिए सांस्कृतिक, धार्मिक और अध्यात्मिक मूल्यों पर निरंतर आक्रमण करने को उचित ठहराने के लिए अपनी गढ़ी कहानियों को वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से प्रभावी और प्रामाणिक बनाने के प्रयास किये। इसमें उन्हें कुछ सफलता भी मिली। इन्हीं प्रयासों में एक है "आर्यन इनवेज़न थ्योरी" जिसे प्रामाणिकता का चोला पहनने के लिए डीएनए थ्योरी गढ़ी गई। 

यह बात तो पूरे विश्व के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शोध और आविष्कार प्रायः राज्याश्रित या सत्ताश्रित हुआ करते हैं। यही कारण है कि यदि सत्ता दुष्टों के हाथ में हुयी तो शोध के विषय और उसके परिणाम सत्ताधीशों के स्वार्थ से प्रभावित होते हैं। कोविड-१९ और ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के विरुद्ध लाये गये वैक्सीन्स इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। शोधकार्यों के क्षेत्र में यह एक अवांछित, दुःखद और कटु सत्य है। 

देशी-विदेशी डीएनए को आधार बनाने से पहले कुछ अन्य व्यावहारिक तथ्यों पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। डीएनए प्राप्त करने के लिए जिन नरकंकालों के प्रादर्श लिए गये हैं उनकी राष्ट्रीयता का आधार क्या है? यह कैसे पता लगेगा कि वह कंकाल किसी विदेशी सैनिक, व्यापारी या पर्यटक का नहीं अपितु भारतीय का ही है, जबकि भारतीयों की सनातन परंपरा में शवदाह किया जाता रहा है। शव को भूमि में गाड़ने की विदेशी परंपरा रही है, भारत की नहीं। दूसरी बात यह कि भूमि से निकाले गये इस तरह के नरकंकालों की संख्या कितनी है, क्या ये व्यापकरूप से और बहुत अधिक संख्या में पाए जाते रहे हैं?

हम इस लेख में मूलनिवासी और विदेशी विवाद के सत्य को डीएनए, भाषा, लिपि, शारीरिक गठन, परंपरा, विकास, पुरातात्त्विक प्रमाण, स्थापत्यकला और साहित्यादि दृष्टियों से हटकर कुछ अन्य बिंदुओं के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे। 

आवागमन, भ्रमण और बसाहट सदा से मनुष्य की स्वाभाविक गतिविधियाँ रही हैं। जलमार्गों की अपेक्षा थलमार्गों से यह सब अधिक सुगम होता है इसलिए सामान्य स्थितियों में आपसी संबंधों में तरलता का होना स्वाभाविक है। इसीलिए आवागमन और वैवाहिक संबंधों में प्रांतीय और राष्ट्रीय सीमायें अधिक बाधक नहीं हो पातीं। सीमावर्ती क्षेत्रों में यह सदा से रहा है, आज भी है।  उत्तराखंड, उप्र और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाल, तिब्बत और भूटान के निवासियों के बीच वैवाहिक संबंधों की तरलता देखी जाती है। यही तरलता न्यूनाधिक रूप में पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों में भी है, जो विभिन्न कालों में परिवर्तित होती रही है। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि बृहत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में हमारे वैवाहिक और व्यापारिक संबंध तत्कालीन देशों के क्षेत्रीय लोगों के साथ नहीं हुआ करते थे। यही कारण है कि उत्तर-पूर्वी भारतीयों में तिब्बती और मंगोल मुखाकृतियाँ आसानी से दिखाई दे जाती हैं तो पश्चिमी सीमावर्ती भारतीयों में गांधार, सिंध, ईरान और निकटवर्ती कज्जाक, उज़्बेक आदि लोगों से वैवाहिक संबंधों के कारण उत्पन्न संततियों के वंशज आज भी मिलते हैं। जो स्थिति भारतीयों की है वही स्थिति तिब्बतियों, नेपालियों और ईरानियों की भी है। उनके गुणसूत्रों में हमारे भी गुणसूत्र हैं। यही स्थिति पूरे विश्व की है। वास्तव में पशु-पक्षियों की तरह मनुष्यों में भी मिलने-जुलने और आपसी संबंधों के लिए एक स्वाभाविक तरलता होती है, अंतर केवल इतना है कि मनुष्य के प्रकरण में राजनीतिक कारणों से न्यूनाधिक प्रतिबंध इन संबंधों को बाधित करते हैं। 

क्या यह संभव है कि ईरानियों में पश्चिमी भारतीयों के या फ्रांसीसियों में डच लोगों के गुणसूत्र न हों! यह सब सदा से होता रहा है, सदा होता रहेगा। इस बात का कोई औचित्य नहीं कि अरब सागर और हिंदमहासागर का जल आपस में क्यों मिल गया, और मिलने के बाद उसमें से कितना जल मूलहिंदसागरीय है और कितना विदेशी। 

इसी भारत में भाभा, जमशेद जी टाटा और मानिकशाॅ भी रहे हैं और इसी देश में ख़ामेनेई की मृत्यु पर रोने-चीखने और ईरान के लिए चंदा भेजने वाले शिया भी हैं। कोई भारत में आकर भारतीय हो जाता है तो कोई भारत में शताब्दियों से रहकर भी भारतीय नही हो पाता।

मुझे भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में कई पीढ़ियों से रह रहे हाॅर्न आॅफ़ अफ्रीका (इरिट्रिया, इथियोपिया, सोमालिया और दिजिवूती) से आकर बसे लोगों से मिलने का अवसर मिला है। उनमें मूलनिवासी या विदेशी जैसी कोई भावना दिखाई नहीं देती। दूसरी ओर क्या मणिशंकर अय्यर, अखिलेश यादव और लालूप्रसाद जैसे लोगों को भारतीय माना जा सकता है!

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हिंदूराष्ट्र

नये संदर्भों में "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्घोष निरस्त कर दिया गया है। हिंदुत्व के अभी तक स्वयंभू सारथी रहे मोहन भागवत ने "हिंदू" शब्द के अस्तित्व को ही नकार दिया है। तो अब भारत के इतिहास को नये संदर्भ में समझना होगा... वैसा ही जैसा कि भारतीय समाज को हाँकने वाले स्वयंभू विद्वान समझाना चाहते हैं।

इस देश के बहुसंख्यक समाज के बौद्धिक मालिक अब हिंदूराष्ट्र के पक्ष में नहीं हैं। उनका आदेश है कि यह देश सबका है। अर्थात यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को विकसित करने वाले "सब" लोग हैं, यहाँ की प्राचीनता का ऐतिहासिक महत्व समाप्त हो गया है।
परमपूज्य मालिक जी! आपके ये "सब" कौन हैं?
क्या आपके ये "सब" भारत के नागरिक हैं। भारत के नागरिक कौन हैं? क्या वे "सब" भारतीय नागरिक हैं जो भारत में रहते हैं, जिनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र हैं। अर्थात रोहिंग्या, बांग्लादेशी, विभाजन से पूर्व पृथक देश बनाने के लिए मतदान करने वाले मुस्लिम जो विभाजन करवाने के बाद भी शेष भारत का गजवा-ए-हिंद करने के लिए यहाँ से कहीं नहीं गये, गजवा-ए-हिंद की हुंकार भरने वाले लोगों के समर्थक अतिविद्वान सेक्युलर्स आदि ...यही हैं आपके "सब"?
अभी तक जो लोग आपकी आज्ञा से स्वयं को हिंदू मानते रहे वे एक झटके में अब कहीं भी नहीं है, क्योंकि आपने तो निर्णय कर दिया है कि यह शब्द भारतीय है ही नहीं।
अभी तक "हिंदुओं" के मालिक रहे मोहन भागवत क्या अब सवर्णों को यूरेशियन्स घोषित कर रहे हैं? वे तो यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हिंदुत्व के ठेकेदार नहीं हैं इसलिए हिंदुत्व की राजनीति नहीं करेंगे, केवल राष्ट्रनिर्माण की बात करेंगे। अच्छी बात है, राष्ट्र निर्माण होना ही चाहिए। कैसे होगा? कौन करेगा? कैसे करेगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने का अधिकार यूरेशियन्स को नहीं है।
हिंदूराष्ट्र का नारा अब गजवा-ए-हिंद के नारे के सामने समाप्त हो गया है। संघ के इंद्रेश कुमार बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नाम से भारत का सांख्यिक विभाजन स्वीकार कर बहुत पहले ही अल्पसंख्यक घराने के मुखिया बन चुके हैं। सभी मालिक "अल्पसंख्यक" के उत्थान के लिए चिंतित और समर्पित हैं । बहुसंख्यक यूरेशियन्स के उत्थान का तो अब प्रश्न ही नहीं उठता। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि "यह बहुसंख्यकों के समूल उच्छेद की समाजमनोवैज्ञानिक भूमिका है" जिसके जनक हमारे मालिक लोग हैं जिनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे प्रकांड संत भी सम्मिलित हैं।
बृहस्पति आगम में हिंदू शब्द की निरुक्ति दी गई है पर मालिक लोग उसे आर्ष ग्रंथ नहीं मानते। तो क्या आर्ष ग्रंथों में जिसका उल्लेख नहीं है उसका भारत की धरती पर कोई अस्तित्व नहीं माना जाना चाहिए? तब तो संविधान, दलित, सवर्ण, इस्लाम, शाह, मोदी, बौद्ध, टमाटर, गोभी, सिगरेट, सर तन से जुदा ...आदि शब्दों का भी कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए।
मालिक लोग हिंदू शब्द की प्राचीनता को नकारकर क्या यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू शब्द शहंशाह साइरस के युग में ईरानी आक्रमणकारियों ने पहली बार प्रयुक्त किया जिसे बाद में बृहस्पति आगम में यथावत ले लिया गया?
मालिक लोग कल को यह भी कह सकते हैं कि इस देश का नाम भारत नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कम्युनल है, इस नाम में उनके "सब" का प्रतिनिधित्व नहीं होता इसलिए इस देश का नाम "अल्पसंख्यक", "दलित", "बहुसंख्यकमुक्त", या "सबका देश" होना चाहिए।
यदि आपके शब्दकोष में "हिंदू" शब्द नहीं है तो क्या ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जो जंबूद्वीप के इस भूभाग पर उन लोगों की प्राचीनता सिद्ध कर सके जिन्होंने इस देश की संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान एवं चौंसठ कलाओं आदि को स्थापित और विकसित करने में पीढ़ियों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
मालिक जी! हम तुम्हारे "सब का देश" अस्वीकार करते हैं, यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं है तो आपको संघ की प्रार्थना में से "हिंदभूमे", "हिंदुराष्ट्राङ्गभूता", "स्वराष्ट्रम्" और "धर्मस्य संरक्षणम्" आदि शब्दों को भी विलोपित करना होगा और यह भी बताना होगा कि अभी तक इन अस्तित्वहीन शब्दों का हमारे मुँह से गायन करवाकर आपने देश के साथ यह छल क्यों किया? आपका यह "स्वराष्ट्रम्" क्या है, उसकी भौगोलिक स्थिति कहाँ है? अभी तक आप जिस "धर्मस्य संरक्षणम्" का संकल्प करवाते रहे वह "धर्म" क्या है? उस धर्म की संज्ञा क्या है?
इस "सबका देश" के मालिक जी! यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं हो सकता तो क्या आर्यावर्त्त, वैदिकराष्ट्र, सनातन राष्ट्र, ब्रह्मराष्ट्र आदि में से भी कुछ नहीं हो सकता?

मंगलवार, 31 मार्च 2026

वि-चित्र

सत्य है सूर्य

सत्य हैं सूर्य के सप्ताश्व,
सप्तवल्गा का
नियंत्रक
उभय सबका
एक सारथी,
किंतु सबने चुनी
कोई एक वल्गा
किसी ने भगवा
किसी ने हरा
किसी ने नीला,
तुमने चुन लीं
तीन वल्गायें
देखकर अवसर
कभी भगवा
कभी नीला
तो कभी हरा।
प्रतीक बन गये रंग
सबकी पृथक पहचान के।
तुम चुनने लगे रंग
देखकर चाल
पृथक-पृथक पहचान के
क्योंकि विश्वास नहीं तुम्हें
तुम्हारे "स्व" में
इसलिए
तुम्हारे चित्र हैं वि-चित्र।

हमसे नहीं
तुम स्वयं से करते हो छल
पल-पल
बोलकर
मिथ्या वचन
कि सर्वश्रेष्ठ है तुम्हारा चयन
होकर भी
विकृत-चित्र।

सुनो मायावी!
जल गई होलिका
मारा गया मारीच
मारा गया रावण भी
मारे जायेंगे
एक-एक कर
सारे मायावी
और तुम
नहीं हो अरुण।

कृत्रिम वर्षा कितनी आवश्यक

चर्चा है कि जाॅर्ज सोरोस और बिल गेट्स जैसे लोग पूरी दुनिया पर अपने मनमाने नियंत्रण के लिए राजनीतिक और प्राकृतिक शक्तियों को अपनी उंगलियों पर नचाते रहे हैं। प्रकृति पर नियंत्रण के लिए बिल गेट्स ने Geoengineering technique को अपना माध्यम बनाया है।

"नियंत्रण" शब्द अधिकार के गर्व, इच्छानुसार संचालन, ईश्वर हो जाने की अनुभूति और विजय के अहंकार से भरा हुआ है। मनुष्य पर नियंत्रण कर पाना बहुत कठिन है, कभी होता भी है तो दबाव हटते ही पूर्ववत हो जाता है। तो चलो प्रकृति पर नियंत्रण करते हैं और लंकेश होकर ईश्वर बन जाते हैं।
आजकल विज्ञान के शब्दकोश में से दो शब्द उछल कर सोशल मीडिया में लोगों को आकृष्ट कर रहे हैं। एक है सोलर रैडिएशन मैनेजमेंट और दूसरा है क्लाउड सीडिंग जो जियोइंजीनियरिंग तकनीक के क्षेत्र से जुड़े हुये हैं।
जब ज्वालामुखी विस्फोट या मनुष्यकृत कारणों से धरती के किसी क्षेत्र में तापमान की बहुत वृद्धि हो जाती है तो उसे कम करने के लिए सौर विकिरण प्रबंधन(SRM) का प्रयोग किया जाता है। इसे Hygroscopic प्रक्रिया कहते हैं जिसके लिए उस क्षेत्र विशेष में सल्फ़र डाई आॅक्साइड का Stratospheric aerosol injection लगाकर ऊष्मा को अंतरिक्ष में फेकने का प्रयास किया जाता है।
एक और प्रक्रिया है - Glaciogenic जिसे कृत्रिमवर्षा और कृत्रिमहिमपात के लिए प्रयोग में लाया जाता है। सामान्यतः इसे क्लाउड सीडिंग कहते हैं जिसमें सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड या फ्रोज़ेन कार्बन डाई आॅक्साइड जैसे रासायनिक द्रव्यों का उस क्षेत्र के वायुमंडल में छिड़काव कर प्राकृतिक प्रक्रिया को उत्तेजित किया जाता है। यह उसी तरह है जैसे लौकी में हार्मोन का इंजेक्शन लगाकर रात भर में लौकी की लंबाई और भार बढ़ा देना।
सुना है रावण ने भी प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण कर लिया था। हम तो इतना ही जानते हैं कि ईश्वरीय व्यवस्था में मानवीय हस्तक्षेप कभी लोककल्याणकारी नहीं होता।

रविवार, 29 मार्च 2026

इंग्लैंड में ईसाईमूल्य विसर्जन

इंग्लैंड के मुस्लिम नागरिकों, जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप के शरणार्थी भी हैं, ने स्थानीय ईसाइयों को इंग्लैण्ड छोड़ने की माँग उठा दी है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, जो कभी-कभी हिंसक भी हो जाते हैं जिससे इंग्लैण्ड की स्थानीय संस्कृति पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। यह इंग्लैण्ड के लिए ही नहीं, यूरोप के अन्य देशों, भारत और अफ्रीकी देशों के लिए भी गंभीर संकट का विषय है। किसी भी समुदाय के सांस्कृतिक परिवर्तन और राष्ट्रांतरण के लिए किसी भी देश के पारंपरिक मूल्यों का क्षरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक होता है। 
इंग्लैंड ही नहीं, सभी ईसाई देशों में ईसाईमूल्यों का निरंतर विसर्जन वहाँ के चिंतकों और राजनीतिज्ञों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। भारत में भी हिंदू अपने पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अध्यात्मिक मूल्यों के क्रमिक विसर्जन की राह पर तीव्रता से बढ़ते जा रहे हैं। इससे हमने विदेशी मूल्यों को स्थान देने के लिए पर्याप्त रिक्तता उत्पन्न कर दी है। दुर्भाग्य से पतन के लिए विदेशी पराधीनता के युग से भी अधिक प्रेरक तत्व आज उठ कर खड़े हो गये हैं। ये क्षद्म लोग उपदेश देते नहीं थकते कि "यह देश केवल हिंदुओं का नहीं, सबका है। हमारे डीएनए समान हैं, सब धर्म हमारे हैं, यहाँ सबका समान अधिकार है, सबकी स्वीकार्यता है...।"
भारतीय संस्कृति और मूल्यों की हत्या के लिए मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार जैसे हिंदुत्व के उपदेशक भी जब इस्लामिक समारोहों में उनके प्रतीकों, परंपराओं और मूल्यों का अनुसरण करने में गर्व का अनुभव करने लगें तो हिंदुत्व को नेपथ्य में धकेलने और इस्लाम को आमंत्रित करने का स्पष्ट संदेश पूरे विश्व में, जहाँ भी कहीं हिंदू हैं उन्हें आहत और चिंतित करता है।
हम हर किसी को मित्र नहीं मान सकते, हर किसी की परंपराओं और मूल्यों का अपने जीवन में अनुसरण नहीं कर सकते, विष और अमृत में समानता का उपदेश नहीं दे सकते। ऐसा करके हम सनातन सिद्धांतों की अवहेलना तो करते ही हैं, मतांतरण और जीवनमूल्यों के विचारांतरण को भी प्रोत्साहित करते हैं। यह सब बहुत अकल्याणकारी और सनातनियों के लिए आत्मघाती है।
तो क्या करें?
करना यह है कि हमें तथाकथित महान चिंतकों, विचारकों, परमपूज्यों और राष्ट्रसमर्पितों के उपदेशों पर लेश भी ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। ये सब छद्म लोग हैं जो मारीच बनकर सीताहरण के पाप की योजना में सक्रिय भागीदार हैं। कलियुग के इस कालखंड में मानवदेहधारी कोई भी व्यक्ति हमारा मार्गदर्शक बनने के योग्य नहीं है, हमें प्राचीनशास्त्रों, जिनमें षड्दर्शन मुख्य हैं, को ही अपना गुरु और मार्गदर्शक स्वीकार करना चाहिए, साथ में अपनी समस्त इंद्रियों को भी सचेत रखने की आवश्यकता है।

शनिवार, 28 मार्च 2026

पूर्णता और पूरकता

वह भाजपाई है, ...नहीं-नहीं वह तो कम्युनिस्ट है। वह आस्तिक है, ...नहीं-नहीं वह तो पक्का नास्तिक है। 

राजनीति और दर्शन के संबंध में जब किसी के प्रति प्रेक्षकों द्वारा विभाजित और परस्पर विरोधी निर्णय किए जाने लगें तो समझ लेना चाहिये कि जिसके संबंध में चर्चा की जा रही है उसकी दृष्टि विहंगम दृश्य की पक्षधर है। वह पूर्णता की संधान यात्रा में पूरकता के छोटे-बड़े अंशों को स्वीकार करता हुआ चलने में विश्वास रखता है। यदि कोई दर्शन पूर्ण होता तो अन्य दर्शनों की आवश्यकता ही नहीं रहती, तब न चार्वाक दर्शन होता और न वैशेषिकादि षड्दर्शन।
राजनीतिक परिपक्वता के लिए सापेक्ष श्रेष्ठता का चयन परिवर्तनकारी होता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है। हिमाचल जैसे प्रांतों में सतत सत्तापरिवर्तन सापेक्ष श्रेष्ठता के चयन का प्रतीक है। वहाँ के मतदाता कांग्रेस या भाजपा से बँधकर नहीं रह पाते। ऐसा कोई भी बंधन राजनीतिक दलों में आने वाली निरंकुशता का आधार बन जाता है जो लोकतंत्र की एक अवांछित विकृति है जिससे बचा जाना चाहिए।

कट्टरहिंदू

मैं पहले भी कह चुका हूँ, पुनः स्पष्ट कर दूँ, मैं कट्टर हिन्दू नहीं, निष्ठावान हिंदू हूँ।
निष्ठा और कट्टरता के अर्थों को जाने बिना इन शब्दों के प्रयोग में सावधानी होनी चाहिए। कट्टरता एक अंधी वीथिका है, जिसका सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं। जो हिंदू है वह कट्टर नहीं हो सकता, जो कट्टर है वह हिंदू नहीं हो सकता।
यही बात भक्त और आलोचक के लिए भी है। भक्त आलोचना नहीं कर सकता, जो आलोचक है वह भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति केवल ईश्वर की हो सकती है, किसी देहधारी की नहीं।
राजनेताओं की आलोचना हो सकती है, भक्ति नहीं। हम लोगों ने भक्ति करके ही भाजपा और संघ को निरंतर विकृत होने देने का पाप किया है। हमने संघ और मोदी का अंधसमर्थन किया, कभी स्वस्थ आलोचना नहीं की। इन दोनों पर उठने वाली उंगलियों और कलंकों के लिए हम सभी अपराधी हैं जो सत्य से सदा भागते रहे और कभी इनके विचारों और कार्यों की आलोचना नहीं की। आलोचना उतनी ही आवश्यक है जितनी किसी रुग्ण की चिकित्सा, इसे पाप या विरोध नहीं समझा जाना चाहिए। मैं पुनः सावधान कर रहा हूँ, सतत परिमार्जन और स्वस्थ आलोचना का यदि इसी तरह बहिष्कार किया जाता रहेगा तो एक दिन संघ और भाजपा के अध्याय सदा के लिए बंद हो जाएँगे।
जब हम अच्छे समालोचक नहीं होते तो राजनीतिक क्षितिज पर लोकहितों की हत्या होते हुये देखते हैं।
ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी या मोहन भागवत को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता, ये सब हमारी दीर्घकालिक निष्क्रियता के परिणाम हैं जिन्हें भोगने के लिए हम सब विवश हैं।

अनार्य दर्शन

दैत्य नहीं, तो देव भी नहीं

दानव नहीं, तो मानव भी नहीं 

राक्षस नहीं, तो आर्य भी नहीं

यौनोत्पीड़क नहीं, तो नारीपूजक भी नहीं

अपराधी नहीं, तो संत भी नहीं

राष्ट्रद्रोही नहीं, तो राष्ट्रप्रेमी भी नहीं

शत्रु नहीं, तो मित्र भी नहीं 

अन्याय नहीं, तो न्याय भी नहीं

असत्य नहीं, तो सत्य भी नहीं

पाप नहीं, तो पुण्य भी नहीं।

सह अस्तित्व ही है रहस्य

राजसिंहासन का।

रहना होगा सबको 

एक साथ

मिलजुलकर

यह देश सबका है

किसी के बाप का नहीं,

उनका भी नहीं

जिन्होंने रचा, गढ़ा और सँवारा

अपने तप और पुरुषार्थ से।

हमारी दृष्टि में 

सब हैं समान

और सम्माननीय

सभी का लक्ष्य है

ईश्वर की प्राप्ति

हम चलते रहेंगे

ऐसे ही 

लेकर सबको साथ

करते रहेंगे सबका विकास

पाप का भी, पुण्य का भी

और बन जायेंगे

विश्वगुरु।

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

जैविकयुद्ध

अमेरिका और ईरान के अड़ियल व्यवहार के कारण अब गुरिल्ला युद्ध से भी अधिक गोपनीय और दबे पाँव होने वाले जैविक युद्ध की आशंकाएँ निरंतर बलवती होती जा रही हैं। सभी विकसित देशों के पास महासंहारक बायो-वीपन्स के भंडार उपलब्ध हैं।

कोरोना के नये-नये वैरिएंट्स आना कोई नयी बात नहीं रही, समाचार है कि अब प्राणघातक निपाह वायरस भी पूरी तैयारी के साथ आ चुका है।
इधर कैंसर की रोकथाम के लिए चौदह वर्ष के किशोरों/किशोरियों के लिए वैक्सीन आ गये हैं। यह मान लिया गया है कि यौन संबंधों से फैलने वाले पैपिलोमा वायरस से हमारे किशोर/किशोरियाँ संक्रमित हो सकते हैं इसलिए सभी लोगों को लगभग ३५९० रु. मूल्य वाले (मूल्य सरकार चुकाएगी) वैक्सीन के तीन डोज तो ले ही लेना चाहिए। यह वैक्सीन निर्भय होकर "यौनसंबंध बनाने का मार्ग" प्रशस्त करती है।
"HPV is highly infectious and predominantly spread through sexual contact, and HPV vaccines work best if they’re given before someone is exposed to the virus."
Gardasil 4/9 ; The cancer vaccine for girls, primarily known as the HPV vaccine (Human Papillomavirus), prevents infections that cause cervical and other cancers. It is highly effective and recommended for girls (and boys) aged 9–14, ideally *before sexual activity.* It is often given as a two-dose series, or three for older teens.
 
टीकाकरण की विश्वसनीयता मेरे लिए सदा से नकारात्मक रही है। वैज्ञानिकों का एक समुदाय टीकाकरण को नये वैरिएंट्स के जन्म का कारण मानता रहा है, विषाणुविज्ञान और इम्यूनोलाॅजी के तथ्य भी उसी के पक्ष में हैं। मैं यह नहीं समझ पाता कि जब इम्यूनिटी बनाये रखने के लिए हमारे पास बहुत से साधन उपलब्ध हैं तो सारा ध्यान वैक्सीनेशन पर ही क्यों केंद्रित रहता है? क्या यह स्वास्थ्य की नहीं अपितु केवल उद्योग की आवश्यकता है?
*सिकुड़ता वाय क्रोमोसोम*
एंटी कोविड-१९ वैक्सीन की न्यून कार्मिक अवधि हम सब देख चुके हैं। अब मुझे आशंका है कि एंटीबायोटिक्स और वैक्सीनेशन के अंधाधुंध प्रयोग के दुष्प्रभाव कहीं हमारे क्रोमोसोम पर भी तो नहीं पड़ रहे हैं! यह आशंका निर्मूल नहीं है। किसी वायरस को हमारे शरीर में प्रवेश करने के लिए किसी पासपोर्ट और वीसा की तो आवश्यकता नहीं होती न! यह वैक्सीनेशन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, तब इंड्यूस्ड इम्यूनाइजेशन का क्या औचित्य? प्रचार किया जाता है कि टीकों में एटेनुएटेड वायरस या एंटीजेन सीरम का प्रयोग किया जाता है। यही प्रक्रिया तो प्रकृति की भी है, तब इंड्यूस्ड क्यों?
यह पाया जाता रहा है कि निर्धन परिवारों के मिट्टी में खेलने वाले बच्चों की रोगप्रतिकारक क्षमता उन बच्चों से अधिक होती है जो हाइजीन का बहुत अधिक पालन करते हैं। यह निर्धन देशों के लिए प्रकृति की निःशुल्क व्यवस्था है।
चिंता का विषय यही है कि कैंसर रोकथाम के नाम पर कहीं यह बिल गेट्स प्रायोजित जैविक युद्ध तो नहीं?

गुरुवार, 26 मार्च 2026

देशप्रेम का प्रमाण और राष्ट्रनिर्माण

मुस्लिम नेता और विचारक प्रायः यह कहा करते हैं कि हमें किसी को अपने देशप्रेम का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन सांसद इकरा हसन ने सदन में अपने देशप्रेम का प्रमाण दे ही दिया, वह भी बिना किसी माँग या पृच्छा के ही। उन्होंने अयातुल्ला ख़ामेनेई की महानता की तुलना मोदी की ५६ इंच की छाती से करते हुये बता दिया कि ख़ामेनेई मोदी से श्रेष्ठ हैं। प्रकारांतर से इकरा हसन ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत के लिए मोदी नहीं, अयातुल्ला ख़ामेनेई उपयुक्त शासक है।

इधर मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि भारत में मुसलमानों के बिना हिंदुत्व नहीं, अर्थात् इस्लाम है तो हिंदुत्व है। क्या सचमुच हिंदुत्व के मूल में इस्लाम है? क्या सचमुच हिंदुत्व के सिद्धांतों को इस्लामिक दर्शन से ही पोषण प्राप्त हुआ है। क्या सचमुच पहले इस्लाम आया फिर सनातन आया अर्थात इस्लाम वैदिक काल से भी पहले अस्तित्व में आया! क्या अरब में इस्लाम के उदय के समय भारत में कोई धर्म या मानव सभ्यता नहीं थी! क्या ईसवी सन् ७१२ से पहले भारत में हिंदुत्व जैसा कुछ भी नहीं था! कुछ भी नहीं था तो क्या था! इस्लाम से पहले भारत में क्या कोई सभ्यता नहीं थी?
मैं भ्रमित हो गया हूँ, मोहन भागवत जैसा परमपूज्य जब कुछ कहता है तो विचार करना पड़ता है। हमने अभी तक जो सुना, जो पढ़ा और जो मंथन किया उसके अनुसार तो वैदिक सभ्यता और सनातन धर्म दुनिया के सबसे प्राचीन पदार्थ हैं,  ...क्या मैंने जो पढ़ा और सुना वह सब मिथ्या था!
मोहन भागवत यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता बल्कि राष्ट्रनिर्माण की बात करता है। परमपूज्य अवतारी पुरुष ने यह नहीं बताया कि राष्ट्रनिर्माण के लिए "आवश्यक" और "बाधक" तत्व क्या हैं।
हम पुनः इकरा हसन के भाषण पर आते हैं। मोहन भागवत जिस हिंदुत्व रहित राष्ट्रनिर्माण का उपदेश दे रहे हैं क्या उसके लिए भारत की सत्ता दिवंगत ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी को सौंप दी जानी चाहिए?

थोड़ा सा मुसलमान

कहानी संग्रह "थोड़ा सा मंटो" के बाद अब "थोड़ा सा मुसलमान" मेरी अगली पुस्तक का नाम हो सकता है।

जब आप भाजपा-कांग्रेस-सीपीएम के बंद कूपों से निष्ठापूर्वक बाहर निकलकर अपने स्व-भाव में प्रवेश करते हैं तो स्वयं को सर्वथा भिन्न पाते हैं। इस दृष्टि से मैं स्वयं को थोड़ा सा साम्यवादी, थोड़ा सा मुसलमान और बहुत सा सनातनी पाता हूँ। मुझे लगता है इस तरह हम सनातनी दर्शन के लौकिक स्वरूप का एक विहंगम परिदृश्य अपने सामने पाते हैं।
वर्षों पहले मैंने दुर्गा और सरस्वती पूजा के विकृत होते आयोजनों पर कुछ लेख लिखकर सांप्रदायिक टकरावों की आशंका को लेकर सचेत किया था। आज हम उन शंकाओं को सच होता देख रहे हैं। हमें अपने ही देश में अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों, उत्सवों और परंपराओं के लिए सरकारी सुरक्षा की आवश्यकता होने लगी है। जब देश में विभाजनकारी शक्तियाँ निर्भय हों, सांप्रदायिक आतंक के सामने सत्ता निर्बल हो, जनता सुषुप्तावस्था में हो तब ऐसे आनुष्ठानिक आयोजनों के लौकिकस्वरूप पर चिंतन करना आवश्यक हो जाता है।
आज मैं मूर्ति को लेकर उसके वैज्ञानिक महत्व के बाद भी इस्लामिक अवधारणा के साथ खड़े होने के लिए विवश हो रहा हूँ। विश्व भर में समय-समय पर मूर्तियों को जिस तरह तोड़ने और उन्हें अपमानित करने की घटनायें होती रही हैं, उन पर मंथन किया जाना आवश्यक है। देवी-देवताओं से लेकर राजनैतिक व्यक्तियों तक की मूर्तियों के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किये जा सकते। मूर्तियाँ बनवाकर युगों तक अमर रहने के लोभ से अमिताभ बच्चन और मायावती जैसे लोगों को भी मुक्त होना चाहिए। विगत कुछ वर्षों में मार्क्स, स्टालिन, मुजीबुर्रहमान, भीमराव और मोहनदास की मूर्तियाँ भी कट्टरपंथियों के लक्ष्य पर रही हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से मैं मोहनदास का विरोधी रहा हूँ, पर जिस तरह उनकी मूर्ति के साथ किशोरवय बच्चों द्वारा अश्लील और अपमानजनक व्यवहार प्रदर्शन किया गया है वह स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं मूर्तिनिषेध की इस्लामिक परम्परा के साथ स्वयं को बरबस ही खड़ा पाता हूँ। विरोध और घृणा प्रदर्शन के लिए मूर्तियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाना विचारों से बहुत आगे बढ़कर उनका भौतिक रूपांतरण है जो भीड़ को हिंसा के लिए उत्तेजित करता है। बस, यहीं पर मैं थोड़ा सा मुसलमान हो जाना चाहता हूँ। यदि हम मूर्तियों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो चौक-चौराहों पर उनकी स्थापना का क्या औचित्य!

बुधवार, 25 मार्च 2026

मणिपुर डायरी

सहृदयता का दण्ड

आदिवासियों का धर्मांतरण भारत की एक गंभीर समस्या रही है। यह सेवन सिस्टर्स की ही नहीं, असम, झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी ऐसी समस्या है जिसके सामने सरकारें तो नतमस्तक होती ही रही हैं, वे लोग भी नतमस्तक हुये हैं जो धर्मांतरण को अभी तक राष्ट्रांतरण मानते रहे हैं। विगत वर्षों में मणिपुर के आदिवासियों और धर्मांतरित हुये ईसाइयों के बीच हुए रक्तसंघर्ष ने देश-विदेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। 
धर्मांतरण की घटनाओं से व्यथित फ़िल्म निर्देशक सुजल मिश्र के मन में इस विषय को लेकर एक फ़िल्म बनाने का विचार तो पहले से ही था पर जब उन्होंने कुंभ मेले में माला बेचने वाली मोनालिसा को देखा तो उनके मन में स्लम डाॅग के पात्र झिलमिलाने लगे। बस, उन्होंने तय कर लिया कि उनकी नई फ़िल्म "डायरी आफ़ मणिपुर" की नायिका यही लड़की होगी। यह इतना सरल नहीं था, एक तो अशिक्षित ऊपर से भाषा और संवाद में कच्ची मोनालिसा को फ़िल्म के अनुरूप प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती थी। सुजल को लगा, वे एक अति साधारण लड़की को विशिष्ट बनाने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी उस बंजारा परिवार ने कभी नहीं की होगी। बस सुजल यहीं धोखा गये।
मोनालिसा की नई पारी फ़िल्म अभिनय ही नहीं बोली और भाषा जैसे प्रारंभिक बिंदुओं से भी प्रारंभ हुयी। सुजल को पल-पल चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
अंततः फ़िल्म पूरी हुयी तो सुजल उसका प्रमोशन उसी स्थान से करने के इच्छुक थे जहाँ से उन्होंने मोनालिसा को फ़िल्म के लिए लिया था। किंतु प्रयागराज प्रशासन ने निर्जन हो चुके संगम पर मात्र पंद्रह-बीस लोगों के एक दल को भी इसकी अनुमति नहीं दी। दूसरी ओर मोनालिसा भी बिना बताये ब्याह रचाने अपने प्रेमी के साथ केरल चली गयी। फ़िल्म का प्रमोशन नहीं हो सका। क्या योगी जी के भी राज में धर्मांतरण के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनायी गयी फ़िल्म का यही मूल्यांकन है!
सुजल पर वज्रपात तो तब हुआ जब धर्मांतरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म की नायिका स्वयं लव-जेहाद की शिकार हो गई। यह फ़िल्म के उद्देश्यों के विरुद्ध एक गहरा षड्यंत्र था। माओवादियों की समानान्तर जनतानासरकार की ही तरह एक अन्य समानांतर पटकथा एक ही मंच पर रची जाती रही। भीतर ही भीतर चल रही इस एक और अंतरकथा की लेश भी भनक सुजल को नहीं लग सकी। परिणामतः फ़िल्म प्रमोट होने से पहले ही अंतर्विवादों में फँस गयी।

केरल जाकर अपने प्रेमी से हाई प्रोफ़ाइल निकाह करके मोनालिसा ने ढोल बजाते हुये घोषित कर दिया है कि लव जेहाद एक अच्छी परंपरा है, यह भारतीय समाज में समानता, सांप्रदायिक स्वतंत्रता और भाईचारा स्थापित करने का उत्तम उपाय है इसलिए मणिपुर डायरी का कोई औचित्य नहीं।
मोनालिसा को इसी रूप में प्रोजेक्ट किया जाता रहेगा। यह लव जेहाद को प्रोत्साहित करने के लिए एक सुनियोजित और बहुत बड़ा षड्यंत्र है।
मोनालिसा! तुम एक साथ दो परस्पर  विपरीत भूमिकाओं को बड़ी कुशलता से निभाती रहीं। एक में अभिनय करती रहीं, और दूसरी में उसके ठीक विपरीत भूमिका को अपने जीवन के लिए जीती रहीं! मानना पड़ेगा, तुम्हें तो माताहारी होना चाहिए था।

शक्ति जब अनियंत्रित होकर विकृत होती है तो फिर वह किसी के लिए भी पूजनीय नहीं रह जाती, वह अपने परिवेश के साथ स्वयं को भी समाप्त कर लेती है।

इस बार बाबा भारती नहीं जीत सके, डाकू खड्ग सिंह जीत गया। बंजारिन लड़की के लिए सुजल के मन में उपजी सहृदयता का यही पारितोषिक है!
हमने मोतीहारी वाले मिसिर जी को पूरी कथा बताई तो कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने धनुषभंग की कथा सुनाते हुये इतना ही कहा - "जब परशुराम को श्रीराम के अवतारी होने का प्रमाण मिल गया और राम ने शरसंधान कर उसका लक्ष्य पूछा तो परशुराम ने उत्तर दिया था - हे प्रभु इस शर से मेरे पाप और पुण्य दोनों को लक्ष्य कर नष्ट कर दीजिए।"
सुजल को अपने कार्यों की श्रेष्ठता और उनके उद्देश्यों पर गर्व की अनुभूति थी। ईश्वर ने मोनालिसा के रुप में आकर सुजल को संदेश दे दिया कि अब परशुराम को पुनः अपने तप में लीन जाना चाहिए"।

सोमवार, 23 मार्च 2026

इनमें से कोई नहीं

जो विवेकी है 

वह करुणा से भरा है 

जो करुणा से भरा है 

वह उदार है

जो उदार है 

वह सहिष्णु है

जो सहिष्णु है 

वह शोषित है

जो शोषित है 

वह वंचित है

जो वंचित है 

वह सुदामा है।

ब्राह्मण

सौंप कर तुम्हें सत्ता

स्वयं सुदामा हो जाता है

जिस पर आरोप हैं 

कि उसने 

नहीं ढकने दिये तुम्हें स्तन

नहीं पीने दिया तुम्हें जल

नहीं लेने दिया तुम्हें ज्ञान

राज्याश्रित गुरुकुलों में।

ब्राह्मण 

अवाक है

भीग कर काँप रहा है 

आरोपों की वर्षा में,

भयभीत है

तुम्हारी धमकियों से।

राजा 

अट्टहास कर रहा है

देखकर दुर्दशा

सुदामा की।

हे राजाधिराज!

आप शक्तिशाली हैं

क्यों नहीं कर देते 

एक और हिंदूकुश

एक और उन्नीस नब्बे

एक और चितपावन नरसंहार

जी लेना फिर

जी भर 

ढककर स्तन

पीकर जल

और लूट कर सारा ज्ञान।

किंतु ध्यान रहे

ब्राह्मण मरता नहीं

क्षत्रिय हारता नहीं

वैश्य निरुपाय होता नहीं

और शूद्र अनुद्यमी होता नहीं।

तुम 

इनमें से कोई भी नहीं हो।

रविवार, 22 मार्च 2026

कब तक

युद्ध
कभी तो रुकेगा
पर कब?
बचाने महाविनाश
और अधिक होने से पहले
या उसके बाद?
महत्वपूर्ण है
व्यक्तिगत लाभ
और अहंकार से अधिक
तुरंत रोकना
इस महाविनाश को।
पहल जो भी करेगा
झुकने की
फलों से लदी डालियों की तरह
वही माना जाएगा महान।
भारत कहता है-
दृढ़ता तोड़ती है
मृदुता जोड़ती है
इसलिए प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए
कि कौन होगा पहले मृदु
और महान
इतिहास के पृष्ठों में ही नहीं
लोगों के हृदयों में भी।
अमेरिका तो नया है
पर बहुत पुरानी संस्कृतियाँ हैं
इज्रेल और ईरान की,
कोई नहीं चाहेगा
इन्हें खो देना
सदा के लिए
महाभारत युद्ध की तरह।

शनिवार, 21 मार्च 2026

अभियान घरवापसी

हिंदूराष्ट्र का सपना बेचने वाले डीएनए विशेषज्ञ मोहन भागवत मुसलमानों की घर वापसी की बात करते हैं। उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इंद्रेश कुमार ने दस लाख हिंदू कन्याओं को मुसलमानों से निकाह करने के लिए प्रेरित कर उन्हें मुस्लिम घरों में पहुँचा दिया। यह बात स्वयं इंद्रेश कुमार ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मार्च २०२६ में बताई। इंद्रेश का विचार है कि इस तरह हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम घरों में जाकर उन्हें बदल देंगी।

इंग्लैण्ड में शरणार्थी बनकर गये मुसलमानों ने अभी हाल ही में एक प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने नारा दिया- "अंग्रेजो इंग्लैंड छोड़ो"।
ईरान के कट्टरवादी सांप्रदायिक ख़लीफ़ा ख़ामेनेई की मृत्यु के बाद भारत के मुसलमानों ने स्वयं को भारतीय नहीं, ईरानी बताया और देश भर में रोते हुए प्रदर्शन किये। और यहाँ इंद्रेश को लगता है कि हिंदू लड़कियाँ मुसलमानों को बदल देंगी। इस बदलाव की प्रक्रिया और स्वरूप कैसा होगा यह इंद्रेश ने अविमुक्तेश्वरानंद को नहीं बताया।

सिकलिंग की घरवापसी
थैलेसीमिया की तरह सिकलिंग भी एक आनुवंशिक हीमोग्लोबिनोपैथी का परिणाम है जो अचिकित्स्य व्याधि है।
चिकित्सा विज्ञान मानता है कि गुणसूत्रीय क्रमिक न्यूनता के साथ इसे धरती से समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए सिकलिंग वालों को सामान्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) लोगों से विवाह करना चाहिए। सिकलिंग मेजर और माइनर (ट्रेट) के आधार पर ऐसे विवाहों की दो स्थितियाँ हो सकती हैं,अर्थात-
१. सिकलिंग मेजर + सामान्य = १००%सिकल सेल ट्रेट
२. सिकल सेल ट्रेट + सामान्य = ५०% ट्रेट और ५०% सामान्य।

यदि हर पीढ़ी के बच्चों के विवाह हर बार सामान्य व्यक्ति से होते रहें तो इस तरह कुछ पीढ़ियों के बाद सिकलिंग समाप्त हो जाएगा। यह एक गणितीय अनुमान है जिसमें ५०% बच्चे सामान्य और ५०% सिकलिंग ट्रेट के होंगे। किंतु एक्स-वाई के खेल इतने सीधे-सरल नहीं होते जितने वे गणितीय (सांख्यिकीय) विश्लेषण में दिखाई देते हैं। कोई नहीं जानता किसी जोड़े के कितने बच्चे होंगे और उनमें से कितने जीवित रहेंगे।
प्रांतीय सरकारें इस तरह के विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए धनराशि भी प्रदान करती हैं। यह लगभग वैसा ही है जैसा कि दो असमान रेखाओं को समान बनाने के लिए बड़ी रेखा को काट कर छोटी के बराबर कर देना। आम जनता के बीच सब कुछ उद्घाटित नहीं किया जा सकता अतः मैं यह नहीं बताऊँगा कि हीमोग्लोबिनोपैथी किन लोगों में होने की प्रायिकता होती है। जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से पृच्छा कर सकते हैं।
सिकलिंग रोगियों की घर वापसी का यह कार्यक्रम कितना सफल होगा, कोई नहीं जानता। यह भी सुनिश्चित नहीं है कि घरवापसी के बाद यह पुनः नहीं होगा। जिन परिस्थितियों में हीमोग्लोबिनोपैथी का जन्म हुआ था, यदि वैसी ही परिस्थितियाँ पुनः उत्पन्न हुईं तो क्या यह फिर नहीं होगा, इसका उत्तर वैज्ञानिकों के पास नहीं है।

इंद्रेश कुमार का मुसलमानों की घर वापसी का तरीका भी सिकलिंग की घर वापसी जैसा प्रतिलोम है, अनुलोम नहीं। हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारी लड़की मुस्लिम घर में जाकर घर वापसी कैसे कराएगी? यह गंगा के प्रवाह को बंगाल की खाड़ी से गोमुख तक वापस ले जाने की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक कल्पना है। वर्षों पहले जो लोग मतांतरित हुये उन्हें हमारे घर आना चाहिए या जो मतांतरित नहीं हुये उन्हें मतांतरित घरों में जाना चाहिए? संघ के चिंतक अपने घर का पता या तो भूल गये हैं या फिर उन्होंने घर ही बदल लिया है।
भारत के लोगों ने मोहनदास को समझने में भारी भूल की और अब उनकी मृत्यु के बाद उनका स्थान मोहन भागवत, इंद्रेश कुमार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ले लिया है। तब एक गांधी था, आज उसके बहुत से प्रतिरूप हमारे बीच में हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2026

विकल्प

समाज के विघटनकारी ध्रुवीकरण के लिए जितने उत्तरदायी मोदी, मोहन भागवत और अमित शाह हैं, स्वयं हिंदू समाज भी उनसे कम दोषी नहीं है। भ्रष्टाचार से समझौता कर चुके हिंदू समाज ने मुस्लिम आतंकवाद से मुक्ति की आशा में कांग्रेस के विकल्प स्वरूप भाजपा पर विश्वास किया और उसके भक्त हो गये। मोदी प्रारंभ में तो अवश्य हिंदू राष्ट्र की बात करते रहे पर इसके बाद उन्होंने न केवल सवर्णविरोधी विषाक्त वक्तव्य भी दिये अपितु सनातनियों के सामान्य नागरिक अधिकार छीनने के षड्यंत्र भी करते रहे हैं, जिसके परिणाम स्वरूप सवर्ण इस देश का सर्वाधिक असुरक्षित, पीड़ित और वंचित समूह होता चला गया। हिंदूराष्ट्र की आशा में हम सब मोदी के विषाक्त भाषणों की अनदेखी करते रहे, हमारी भक्ति अपने चरम की ओर बढ़ती रही और मोदी हमारे समूल उच्छेदन के बीज बोते रहे। मोदी के विषाक्त भाषणों के बाद भी लगातार तीन बार हमने मोदी को देश की बागडोर सौंपी, पर कभी विकल्प के बारे में सोचा भी नहीं।

आप अपनी गाड़ी में एक वैकल्पिक चक्का रखते हैं पर लोकतंत्र के रथ में कभी किसी ने वैकल्पिक चक्के की आवश्यकता नहीं समझी। सावधान! किसी एक पर अतिनिर्भरता शोषण के कई द्वार खोलती है। मोदी और उनके मंत्रियों ने केवल उन लोगों की चिंता की जो देश को आगे ले जाना तो दूर सदा बाधक और विनाशक ही बने रहे, वह भी उन लोगों के शोषण और उत्पीड़न के मूल्य पर जो देश के विकास और समृद्धि के सदा से महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। यह केवल विकासकारी तत्वों की उपेक्षा का ही विषय नहीं है, अपितु उनके साथ घृणित अत्याचार और शोषण की क्रूरता का भी विषय है।
हिंदू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में हमने भोगा है -
विद्यालयों में हिंदू बच्चों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न, सांस्कृतिक चिन्हों और प्रतीकों के अपमान की बढ़ती घटनायें, मतांतरण का दबाव, प्रेमजेहाद, भूमिजेहाद, चिकित्सा जेहाद, सांस्कृतिक जेहाद...। हम भोग रहे हैं सर तन से जुदा की क्रूर घटनायें, हिंदू पलायन, खाद्य-पेय पदार्थों में थूक-मूत्र मिलाने की निरंकुश घटनायें, सवर्णों को जूते मारकर यूरेशिया भगाने की धमकियाँ, ब्राह्मण कन्यायों के यौनोत्पीड़न की घटनायें, सवर्ण होने के कारण मारपीट और हत्यायें, आरक्षण के नाम पर सवर्णों को बिना किसी निरीक्षण-परीक्षण के अपराधी मानकर कारागार में डाल देने वाले विधान के प्रस्ताव को न्यायसंगत सिद्ध करने के विनाशकारी हठ, प्रतिभापलायन की स्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए विविध उपाय.... सवर्ण यही सब देखने और भोगने के लिए विवश होते रहे हैं। भाजपा ने अपने राजनीतिक चरित्र से बारंबार प्रमाणित किया है कि हिंदू समाज को तोड़ने में वे कांग्रेस और सपा से भी बहुत आगे निकल चुके हैं। तथापि, यूजीसी रेगुलेशन बिल लाने के लिए मोदी जी और उनकी "यूजीसीसमिति" के लोग धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने सारी नैतिकताओं की लक्ष्मण रेखायें पार कर हिंदुओं को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अभी भी समय है, राष्ट्रवादी नागरिकों को भाजपा, कांग्रेस और सपा के विकल्प गठन पर गंभीरता से विचार करना ही होगा। हम किसी भी वर्तमान राजनैतिक दल पर भरोसा कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। सभी दल अरविंद केजरीवालसंप्रदाय और कांग्रेस का अनुसरण करने की प्रतिस्पर्धा में दौड़े चले जा रहे हैं। जब सत्ता निरंकुश होती है तो जनता को अपने दायित्व निभाने के लिए आगे आना होता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

मूल्यविहीन शिक्षा

क्या शिक्षा सचमुच हमें नैतिक, संस्कारी और मानवीयगुणों से संपन्न करती है?

देश भर में धरमशाला जैसी न जाने कितनी क्रूर घटनायें तो यही प्रमाणित करती हैं कि शिक्षा का इन सबसे कोई संबंध नहीं होता। तब प्रश्न यह खड़ा होता है कि फिर शिक्षा की हमारे जीवन में उपादेयता क्या है?
अनुभव तो यही बताते हैं कि हम कितने भी शिक्षित क्यों न हो जाएँ, बर्बरता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
धरमशाला में बीएड की एक छात्रा को चार लड़कियों ने महीनों प्रताड़ित किया, प्रोफ़ेसर ने यौनोत्पीड़न किया, फिर चिकित्सा के अनंतर छात्रा की मृत्यु हो गई।

अनैतिक और कुपात्र लोग जब शिक्षक बनते हैं तो वे समाज को केवल पतन की ओर ही ले जाते हैं। स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था इतनी पापपूर्ण क्यों है और हम यह सब सहने एवं भोगने के लिए विवश क्यों हैं? हमने यह कैसा देश बनाया है!

जोड़-तोड़ करके संविधान लिख कर रख लेने भर से किसी देश की व्यवस्था आदर्श नहीं हो जाती। इतने वर्षों में हम तो उसे समझने-समझाने की क्षमता तक विकसित नहीं कर पाये, न संविधान का मूल संदेश आम जनता को दे सके, तब संविधान के अनुरूप देश का निर्माण करना तो बहुत दूर की बात है।
१९४७ से आज तक हम अपने समाज के लिए अपनी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं बना सके। सब कुछ पराधीनता वाले युग की बनी-बनाई लीकों पर चलता रहा और हम सब छद्म स्वाधीनता में आत्ममुग्ध बने रहे।
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सोमवार, 16 मार्च 2026

आत्मनिर्भर पराधीन भारत

इसमें कोई संदेह नहीं कि आईटी में निष्णात होने के बाद भी हम आत्मनिर्भर नहीं हैं इसलिए अमेरिका से पंगा नहीं ले सकते। चीन और रूस के पास उनकी अपनी-अपनी आईटी व्यवस्था है।

हमारे आईटी वैज्ञानिक अमेरिका में काम करके उसे आत्मनिर्भर बनाते हैं। कुछ पूर्णनिर्लज्ज माननीय जी यह भी कह सकते हैं कि भारतीय वैज्ञानिक लालची और देशद्रोही होते हैं इसलिए वे पलायन कर जाते हैं। स्वयंभू हिंदू ठेकेदार कह देंगे कि हिंदू वैज्ञानिकों में राष्ट्रप्रेम और संस्कारों का अभाव है। माँ-बाप को चाहिए कि अपने बच्चों में जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी का भाव जागृत करें और मुसलमानों में छिपे हुये अपने पूर्वजों के डीएनए पहचानें जिससे भारत की प्रतिभा पलायन को रोका जा सके।
मेरा मत इन सभी विद्वानों, तर्कशास्त्रियों और राष्ट्रप्रेमियों से पूरी तरह भिन्न है। यूजीसी प्रकरण के बाद की घटनाओं ने मुझे राष्ट्रप्रेमी से कम्युनिस्ट बना दिया है। यह मेरे लिए वांछनीय नहीं था, किंतु वैचारिक व्यभिचार की यंत्रणा से बिलबिलाकर मुझे कम्युनिज्म की कड़ाही में कूदने के लिए विवश होना पड़ा है। ...तो अब मुझे चीनी व्यवस्था भारतीय व्यवस्था की तुलना में कई गुना अच्छी लगने लगी है। हम पाखंडी और षड्यंत्रकारी हैं, चीन में जो भी है अच्छा-बुरा सब खुला हुआ है। कहीं कोई ढकोसला नहीं। भारत में टाटा है सुंदर पिचाई है, इसके बाद भी आईटी में हम पराधीन हैं और अमेरिका को आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
महाभारत टीवी धारावाहिक में हम वर्षों पहले क्लस्टर बाण वर्षा की अवधारणा को देख चुके हैं, ईरान ने क्लस्टर अग्निबाण बना भी लिए और हम आत्ममुग्धता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाये।
हम २०१४ से २०२५ तक लगातार ११ वर्षों तक राष्ट्रप्रेम में इतने डूबे रहे कि यह भी नहीं देख सके कि अगर अमेरिका ने अपनी आईटी के दरवाजे हमारे लिए बंद कर दिए तो पूरा भारत ठप्प हो जाएगा। इसरो, आर.एण्ड डी., बैंक, उद्योग, परिवहन, कार्यालयीन कार्य, साइबर प्रणालीऔ... सब में आपातकाल लग जाएगा।
तो क्या किया जाय?
कुछ न किया जाय। हिंदुत्व और राष्ट्रप्रेम में डूबे रहा जाय। यूरेशियन भारत छोड़ो को सुना जाय। तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार गीत का आनंद लिया जाय, और अपनी बेटियों का "शुद्धिकरण" करवाने के लिए, जो माँग रहे हैं उन्हें सौंप कर उनके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाय। तदुपरांत हिंदूसमाज में बोई जाती रही आरक्षण की विषबेल में मधुर और सुगंधित फल लगने प्रारंभ हो चुके हैं, उन्हें तोड़कर खाया जाय और चैन की नींद सोया जाय। जब नींद खुलेगी तब सामने खड़े पाषाणयुग को भी स्वीकार करके जी लेंगे। बाकी काम तो महामानव और ठेकेदार कर ही रहे हैं।

जीत-हार

एशिया जल रहा है

यूरोप झुलस रहा है
अमेरिका पंगु हो रहा है।
इस महायुद्ध में
न कोई हारेगा
न कोई जीतेगा
दोनों कहेंगे -
ना तुम जीते
ना हम हारे।
व्याख्याकार
रंग भरेंगे
अपनी-अपनी सुविधा से
देखेंगे सुनेंगे लोग
रंगीन व्याख्यायें
अपनी-अपनी सुविधा से।
ट्रंप फिर फैलाएगा थैला
सर्वोच्च पुरस्कार के लिए
या दे देगा कोई पुरस्कार
स्वयं को ही, बनाकर एक समिति।
बस, कुछ लोग
वापस नहीं आयेंगे कभी
जिनका दोष है इतना सा
कि जन्मे हैं वे
उस देश में
जिनके राजा
भरे हुये हैं
परमाणु बम रखने की
आत्ममुग्धता से।
हमें गर्व है
कि आर्यावर्त्त
कल भी उडुपी था
आज भी उडुपी है
जो भी हैं युद्धरत
देता है भोजन औषधि
दोनों पक्षों को
रहकर निष्पक्ष
कौरव हों या पांडव
इज्रेल हो या ईरान
रूस हो या यूक्रेन
सर्वे भवंतु सुखिनः
सर्वे संतु निरामयाः।।

रविवार, 15 मार्च 2026

प्रतिस्पर्धा

भारत के अय्यर ब्राह्मण आदिशंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत समर्थित षण्मत (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश और स्कंद) के उपासक माने जाते हैं। आदिशंकराचार्य ने तत्कालीन षण्मत मतभेंदों को समाप्त करने के लिए जिस अद्वैत मत को प्रतिपादित किया, मणि शंकर अय्यर उसी स्मार्त (स्मृति) परंपरा के वाहक हैं। आदिशंकराचार्य शाकाहारी थे पर मणि शंकर अय्यर ने "कबाब प्रतिस्पर्धा" के आयोजन का आह्वान किया है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित है।

मणिशंकर अय्यर के सम्मान में प्रस्तुत है यह रचना -

असहिष्णुता से बोली
सहिष्णुता,
हिंसा से बोली
अहिंसा
आओ वार्ता करें
कुछ प्रतिस्पर्धा करें
"यद्यपि अच्छे हो सकते हैं
तुम्हारे कबाब,
पर अच्छे हैं हमारे कबाब भी
तुम्हारे कबाबों से"।

समान है
हमारी भाषा, मानसिकता और संस्कृति
समान है उर्दू और संस्कृत
समान है रक्त और दुग्ध
समान है पैगंबरवाद और बहुदेववाद
समान है घृणा और प्रेम
समान है मृत्यु और जन्म
आओ हम एक हो जाएँ
मृत्यु में समाहित हो जाएँ
षण्मत को परे हटायें
एक थाली के कबाब हो जाएँ
गाय खाएँ, वाराह भगाएँ
भारत को विभाजन से बचाएँ।

युग नया है
आदिशंकराचार्य विगत हुये
पैगंबर सामयिक हुये
स्मृति लुप्त हुई
हदीस गीता हुई
आओ, हम हदीस गाएँ
देश को विभाजन से बचाएँ।

एकेश्वरवाद की कट्टरता
सहिष्णुता लाती है,
स्मृति
हमें असहिष्णु बनाती है
देश को हिंदूराष्ट्र बनाती है
हिंदूराष्ट्र एक वैश्विक संकट है
जिससे अवश्यंभावी है होना
देश के तेंतालीस टुकड़े।
आओ, हम देश बचाएँ
भारत को पाकिस्तान में मिलाएँ।

उसने फेक दी
उठाकर शिव की मणि
हिंदमहासागर में नहीं
अरबसागर में
चबाते हुए कबाब
होकर चिंतित
कि होने ही वाले हैं
देश के तेंतालीस टुकड़े
आओ, हम देश को बचाएँ
भारत को पाकिस्तान में मिलाएँ।

घृणामूलक श्रेष्ठता का भविष्य

आसुरीवृत्ति प्रकृति के सिद्धांतों और नैसर्गिक संसाधनों पर अपने वर्चस्व की विकृतकामनाओं को जन्म देती है। आज दुनिया भर में चल रहे विनाशकारी युद्ध चिंता के विषय हैं। लोग चिंतित हैं कि घृणा और सांप्रदायिक हिंसा के विचारों का भविष्य (Prognosis of hate and thought of communal violence.) क्या होगा!

घृणा और सांप्रदायिक हिंसा मनुष्य की मनोवृत्तियाँ है। न्यायालय में ऐसी किसी "मनोवृत्ति" को "मनोविकृति" बताकर अपराधियों को मुक्त कराने के प्रयास अतिबुद्धजीवियों का अतिप्रिय विषय है।  हिंसक मनोवृत्ति अपने आप में अपराध का एक बीज है। किंबहुना, यहाँ सांप्रदायिक घृणा पर आधारित समाजों और राष्ट्रों के भविष्य पर चिंतन अपेक्षित है। हमास, हिजबुल्लाह, आइसिस आदि दुनिया भर में हिंसा क्यों करते हैं? यह हिंसा कब तक होती रहेगी? और पाकिस्तान, जिसका जन्म ही सांप्रदायिक घृणा और हिंसा के गर्भ से हुआ है, कब तक हिंसा करता रहेगा?
यद्यपि बहुत से शक्तिशाली असुर "साधु" और "बुद्धिजीवी" बनकर मानवता की आड़ में इन आपराधिक समूहों के समर्थन में खड़े होते रहे हैं, करुणा के नाम पर उन्हें संरक्षण देते रहे हैं, और सद्भावना के नाम पर उनके पापकृत्यों को प्रोत्साहित करते रहे हैं तथापि सभी आतंकवादी संगठनों का अंत होना निश्चित है। पाकिस्तान का खंडित होकर भौगोलिक और सांप्रदायिक रूपांतरण भी अवश्यंभावी है। ईरान एक बार पुनः अपने अतीत के गौरव को प्राप्त करेगा। इज्रेल भी पश्चिमी जगत के लिए सर्वमान्य धार्मिक देश के रूप में उभर कर सामने आने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।
क्या यह ज्योतिषीय घटनाओं या किसी अंतःज्ञान पर आधारित भविष्यवाणी है! नहीं, इनमें से कुछ भी नहीं, यह तो "समाज-मनोवैज्ञानिक चिकित्सा" के दार्शनिक तत्वों पर आधारित अनिवार्य परिणमन का सत्य है। 'अहिंसा' और 'शांति' प्रकृति के घटक हैं, 'हिंसा' और 'अशांति' विकृति के घटक हैं। विकृति की दो ही गतियाँ हैं, ...उसका अंत या फिर प्रतिगमन होकर प्रकृति में रूपांतरण। यह वृक्ष से बीज बनने की प्रक्रिया है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

मृत्युदंड

उन्होंने कहा

'सदा सच बोलो'
मानकर हमने उनका आदेश
जब बोल दिया एक दिन
सब कुछ सच-सच
तो वे हो गये कुपित
और डाल दिया हमें
बंदीगृह में।

एक दिन उन्होंने दिया
एक उपदेश 
'तमसोमा ज्योतिर्गमय'
मानकर हमने उनका आदेश
जब प्रज्वलित कर दिया
गहन तिमिर में एक दिया
तो वे कुपित हो गये
और डाल दिया हमें
अँधेरे बंदीगृह में।

उन्होंने कहा
'नीर-क्षीर विवेकी बनो'
मानकर हमने उनका आदेश
जब कह दिया एक दिन
नीर को नीर
और क्षीर को क्षीर
तो वे फिर कुपित हो गये
और दे दिया हमें
मृत्युदंड।

हम मर गये
मर कर मुक्त हुये
पांचभौतिक प्रपंच से
छोड़कर अंतिम संदेश
कि उपजाऊ क्षेत्र होता है
वैदिक ऋषियों का ज्ञान
प्रपंचियों के लिए
मठाधीशों के लिए
जहाँ बना दी जाती हैं
जीवित समाधियाँ
ऋषिपुत्रों की।

साध्वी का श्राप

साध्वी के श्राप पर चर्चा से पहले कृष्ण-गांधारी संवाद को स्मरण कर लेना प्रासंगिक होगा। 

"माधव! मैं तुम्हें और तुम्हारे वंश को सर्वनाश का श्राप देती हूँ।"
"माता गांधारी! आपका दुःख स्वाभाविक है। किंतु दुर्योधन की जंघा का तोड़ा जाना और दुःशासन के वक्ष का चीरा जाना आवश्यक था अन्यथा एक स्त्री के साथ राजवंश के लोगों द्वारा किया गया निंदनीय कृत्य आम लोगों के लिए आदर्श और आचरणीय हो जाता। आपने अपने पुत्रों को खोया पर इस खोने से ही आर्यावर्त की संस्कृति बच गयी, क्या यह उपलब्धि नहीं है!"
पुनः साध्वी के श्राप पर आते हैं। घर की बात घर में सुलझाई तो तब जाय जब घर के मुखिया समस्या को मानने और सुलझाने के लिए तैयार हों। एक ओर निरंतर प्रहार पर प्रहार, दूसरी ओर केवल याचना पर याचना!
घर का विवाद था तो साध्वी जी ने ही क्यों नहीं सुलझा लिया! वे तो मोदी जी से सहज संवाद कर सकती थीं।
साध्वी जी समस्या की गंभीरता को समझने में या तो असफल रही हैं या फिर समझना ही नहीं चाहतीं। यह जरा सी फुंसी की समस्या नहीं है, मेटास्टेसाइज्ड मैलिग्नेंट कैंसर की समस्या है जिसकी प्राॅग्नोसिस केवल हिंदू उन्मूलन है। जब सनातनी ही नहीं बचेंगे तो केवल मंदिरों से धर्म संस्थापना कैसे संभव है?
निरंतर आक्रमण सहते हुये भी यदि हम सत्ता की अंधभक्ति में लीन रहते हैं तो यह हमारी मूर्खता का परिचायक है।
प्रबुद्ध जनता सत्ता की विरोधी नहीं, उसकी विघटनकारी कुनीतियों की विरोधी है।
सुना है, संघ अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में उतर चुका है। यदि यह सच है तो जनता में जो संदेश जायेगा उससे भाजपा की समस्यायें कम नहीं होंगी। पहले सनातन के संत ही न्याय और अन्याय को सुनिश्चित कर लें। जनता तो सुनिश्चित कर चुकी है।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

सर्वनाश

नृत्यरत

सत्ता-नेतृत्व,
निरंकुश
षड्यंत्ररत
कालनेमि गुट
हुंकारित...

"करेगा संशय जो
नेतृत्व की निष्ठा पर
सत्ता की स्वेच्छा पर
होगा सर्वनाश
विरोध के स्वरों का।"

सुनकर हुईं हतप्रभ
देवी सरस्वती जी।
कौन है यह, किसने दिया श्राप!
किसने बना लिया बंदी
चिंतन, मंथन
और वैचारिक प्रक्रिया की
सहज अभिव्यक्ति को!
राजसत्ता
हो गई
सर्वोपरि
सर्वशक्तिमान
और इतनी असहिष्णु!
इतनी निरंकुश!
किसकी है हुंकार
कौन यह होलिका
कौन यह सूर्पनखा
चीख-चीख कर रही
लांछित सत्य को
वांछित असत्य को!

सुनो ऐ कृष्णविवर!
सुनो ऐ भस्मासुर!
शक्तिशाली हो तुम
किंतु नहीं
हो अमर
लिख लिया तुमने
अपनी ही लेखनी से
अपना मृत्युपत्र
सावधान!
अंत
कृष्ण विवरणों का
आ गया है निकट।

मंगलवार, 10 मार्च 2026

आठ मार्च का सूर्यग्रहण

तुम देने लगते हो हमें

भद्दी-भद्दी गालियाँ
जब तुम बंद कर देते हो
भींच कर मेरा मुँह
जब तुम ठूँस देते हो हमें
घसीट कर कारा में
तब समझ जाते हैं लोग
कि तुम्हारे पास
अब नहीं बचे हैं कुतर्क भी
कि सिद्ध कर सको हमें अपराधी।
तुम इसे राष्ट्रवाद कहते हो
लोग इसे असुरवाद कहते हैं।

बहुत बोझिल होता है
अहंकार
ईश्वरत्व और श्रेष्ठता का
उद्धारक और महानता का।
हमने देखा है
अहंकार को
दब कर कुचलते हुये
अपने ही बोझ से,
हम तो फिनिक्स हैं
जल कर भी जी उठेंगे फिर
पर नहीं मिलता अवसर
अहंकारी को पुनः।

मालायें
कितनी भी धारण कर ले रावण
वह साधु नहीं हो जाता
झूठ
कितना भी क्यों न कर ले सिंगार
वह सच नहीं हो पाता
सावधान!
निकट आ गया है
बहुरूपियों का अंत।
यह अघोषित आपातकाल
बहुत भारी पड़ने वाला है तुम्हें।

जिन्हें समझा था दीपस्तंभ
वे चित्र निकले
जिन्हें समझा था स्वर
वे मूक निकले
पर सदा मौन रहने वाला मैं
आज बोल सकता हूँ
भूल गये हो तो बता दूँ
अँधेरों को भी
छँटना ही पड़ता है एक दिन।
रावण!
तुम्हें मरना ही होगा!

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

परिभाषायें

ऋषि कामना करते रहे

सर्वे भवंतु सुखिनः
पर व्याधियाँ होती रहीं, होती रहेंगी,
ऋषि कामना करते रहे
विश्व का कल्याण हो
पर युद्ध होते रहे, होते रहेंगे।
सब कुछ होता रहेगा
ऋषि भी कामना करते रहेंगे
परिभाषायें
कभी सीधी, कभी उलटी
कभी सजाई, कभी छिछियाई
गढ़ी जाती रहेंगी।

परिभाषायें
नये चोले में करती हैं उत्पात
धूर्तता का नया नाम आस्था
उत्पीड़क का नया नाम उत्पीड़ित
शोषक का नया नाम शोषित।

"अपराधी"
हो प्रशंसित, हो सम्मानित
"निष्ठावान"
हो भयभीत, हो अपमानित
कर रहे निर्माण
एक नये युग का।
एक दिन
उठा ले गये कुछ लोग
ऋषिपुत्री होलिका
बनाकर चमार।
होली
अब नहीं मनेगी,
मनाये जाएँगे
केवल भीमपर्व
गायी जायेगी भीमचालीसा
भारत बनेगा भीमलैण्ड
रहेंगे मूलनिवासी
कदाचित् कोई नयी प्रजाति!

बनेगा विधान
कि ब्याही जाएगी
ब्राह्मण दुहिता
मूलनिवासी को
फिर करना होगा पलायन
यूरेशिया में कहीं।

मारे जाने लगे पुजारी
पता नहीं क्यों
पीटे जाने लगे ब्राह्मण
पता नहीं क्यों
जलायी जाने लगी मनुस्ममृति
पता नहीं क्यों!
जाने बिना पुजारी
समझे बिना ब्राह्मण
पढ़े बिना मनुस्ममृति
लिख दिया 'अपराधी'
कहते हुये "न्याय"।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

अधिकार

बन दुर्बल

वह बार-बार
भर हुंकार
छीनता अधिकार।

अधिकार,
तमस में सुषुप्त हो
दीर्घकाल जीने का!
अधिकार,
अनंतकाल आरक्षित हो
शिथिलता में शक्ति का!
विद्रोह किया तुमने
है करना अब तुम्हें ही
संधान भी उत्तर का।

ऋषिवाणी मौन है
आरक्षण के उबाल पर
पता है ऋषियों को
तपाये बिना स्वर्ण
जब प्रमाणित होगा 'शुद्ध'
अबुद्ध घोषित होंगे 'बुद्ध'
होने लगेगा प्रकाश भी अवरुद्ध
कुपथ पर चलेंगे सब
होगा फिर धर्मयुद्ध।

हठ से
तमस
नहीं होता उजास,
रात
नहीं होती भोर,
पक्षीवृंद
नहीं करते कलरव,
कलियाँ
नहीं होतीं कुसुमित,
कुक्कुट भी
बाँग नहीं देते,
शिथिलता
दृढ़ता नहीं होती,
अयोग्यता
योग्यता नहीं होती,
केवल
मिलते हैं अवसर
छीन लेने के
दूसरों के अवसर
होने के सिंहासनारूढ़
प्रवंचना और धूर्तता के।

बौद्ध
जब हठ करता है
बुद्ध
तब मौन रहता है
जानकर भी सब कुछ
कि मान बैठे जिसे तुम
अपना अधिकार
वह तो तमस है।
और तुम
भरे तमस
किये हठ
उलीच रहे कृष्ण मेघ
सूरज के मंडल पर।
भृकुटि तान सूर्य को
घूर रहे कुपित मेघ
मैं दलित, तू दूर हट!
रे! विदेशी दूर हट!

तमस के भय से
आ न रहा पास
कोई उजास
और तुमने मढ़ दिया
फिर एक कलंक
कि अहंकारी है उजास
करता है भेदभाव
मानता है दलितों को
नीच, खल और अछूत।

रविवार, 1 मार्च 2026

"समझ" और "विश्वयुद्ध"

संघ और भागवत को समझने के लिए ऐसा कुछ भी कठिन नहीं है जैसा कि वे कहते हैं। हाँ, मोदी को समझना अवश्य सरल नहीं, कम से कम मेरे लिए तो नहीं। हिंदू अहित के मूल्य पर मोहनदास की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के समर्थक रहे मोदी ने कल कहा कि वे ईरान का समर्थन नहीं करते। "कट्टरवाद को आर्थिक सहायता देने वाले किसी भी देश को समर्थन देने का प्रश्न ही नहीं उठता।"


मोतीहारी वाले मिसिर जी कहते हैं -
"मोदी बीच-बीच में एक ऐसी चमक छोड़ दिया करते हैं जिससे उनके विरोधी भी चमत्कृत हो जाया करते हैं।"

मोदी आगे बढ़ते हैं फिर पीछे हटते हैं, विवाद उत्पन्न करते हैं फिर उसका  समाधान करते दिखाई देते हैं, जातिवाद की आलोचना करते हैं फिर अपने कट्टर समर्थक सवर्णों पर निर्मम आक्रमण भी करते हैं, राष्ट्रीय एकता की बात करते-करते विभाजन और विघटन के बीज बो देते हैं, 'न खायेंगे न खाने देंगे' की शपथ लेते हैं फिर अपने कट्टर विरोधियों को उनके अपराधों और भ्रष्टाचार के लिए बढ़ावा भी देते हैं, राजनीतिक शुचिता की बात करते हैं फिर अपनी ही पार्टी के अच्छे और समर्पित नेताओं को उठाकर नेपथ्य में फेक देते हैं, विपक्ष के ठुकराये हुये नेताओं का स्वागत करते हैं और दुनिया भर के देशों से सर्वोच्च पुरस्कार बटोर लाते हैं, प्रत्यक्षतः ईरान के साथ नहीं हैं पर संकट के समय ईरान को चावल और दवाइयाँ भेज देते हैं।

एक साथ नौ देशों पर सीधा आक्रमण करने वाले ईरान का धार्मिक नेता ख़ामेनेई मारा जा चुका है। युद्ध को लेकर ब्रिटेन तो अपने विरोधी अमेरिका के साथ आ गया पर फ्रांस ने स्वयं को इस युद्ध से अलग रहने का वक्तव्य दे दिया है। लखनऊ और श्रीनगर में शिया संप्रदाय के लोग ईरान के समर्थन में प्रदर्शन पर उतर आये हैं जबकि पाकिस्तान के लोगों ने कराची और इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी है। उधर पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों के देश जाॅर्डन पर भी ईरान ने आक्रमण कर दिया है। क्या सचमुच इस्लामिक विश्व की अवधारणा को ग्रहण लग चुका है!

तकनीकी दृष्टि से मध्य एशिया में विश्वयुद्ध प्रारंभ हो चुका है। धन-बल की  अनियंत्रित हुयी शक्ति में हो रहा विस्फोट सब कुछ शांत करने की दिशा में बढ़ता जा रहा है। जो हो रहा है वह अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। शक्तियों का संतुलन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इस युद्ध में बदलते वैश्विक समीकरणों का लाभ भारत को भी मिलने जा रहा है, जबकि पाकिस्तान की स्थिति "न घर के न घाट के" वाली होने जा रही है।

सेक्युलर बाम्हन विरुद्ध ब्राह्मण

ब्राह्मण कोई जाति नहीं, एक अर्जित स्थिति है जिसे बनाये रखने के लिए निरंतर कर्मयोग की आवश्यकता होती है, अन्यथा "अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा" नियमों की तरह अनिवार्यअनुबंध का उल्लंघन होते ही कारण बताओ पत्र से लेकर सेवामुक्ति तक कुछ भी हो सकता है। कर्मयोग की निरंतरता एक अट (अनुबंध) है जिसका क्षरण होते ही पदच्युति अनिवार्य है। इस दृष्टि से कोई व्यक्ति सदा ब्राह्मण नहीं रह सकता। दुर्भाग्य से ब्राह्मणोचित आचरण में निरंतर परिमार्जन के अभाव में हर ब्राह्मण उपाधिधारी व्यक्ति ब्राह्मण हो ही नहीं सकता।

राजनीतिक क्षेत्र में तीव्रता से परिवर्तित हो रही स्थितियों में "ब्राह्मण" की तरह ही "नेता" को भी नये सिरे से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।
जाति और धर्म से परे "नेता" ने मनुष्य कुल की एक स्वतंत्र प्रजाति के रूप में स्वयं को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। यह पारंपरिक पहचान से पृथक है जिसकी निष्ठा न तो समाज के प्रति होती है और न देश, मानवीय मूल्य, नैसर्गिक सिद्धांत, न्याय या किसी भी शास्त्रसम्मत विधि-विधान के प्रति। यह एक ऐसी प्रजाति है जिससे भयभीत रहने वाले विद्वानों और वैज्ञानिकों को तो छोड़िये, ऋषि, महर्षि, देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि सभी प्राणी "नेता" के प्रत्यक्ष होते ही उसे झुककर "पायलागन" करते हैं पर उसके जाते ही गालियों की ऐसी वर्षा करते हैं मानो मुनसियारी में बादल फट गया हो।

यूजीसी रेगुलेशन के साथ सवर्ण विरोधी विभिन्न हुंकारों और नये आदेश के संदर्भ में एक जिज्ञासा...
पहले आदेश पढ़ लें -
"हर संस्था श्रेष्ठता को अपना संस्कार बनाये।" -मोदी

...और अब जिज्ञासा -
"श्रेष्ठता का अवमूल्यन और निकृष्टता का मूल्यांकन ही जब जातीय अधिकार का विधान बना दिया जाय तब "संस्कार" जैसे तत्व की आवश्यकता और प्रासंगिकता को किस दृष्टि से समझा जाना चाहिए ?"

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ए.आई. और आई.टी.

कृत्रिम बौद्धिकता ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात कर दिया है। कुछ लोग भयभीत हैं कि कृत्रिम बौद्धिकता हमारी स्वाभाविक नैतिक चेतना को कुंठित कर मस्तिष्क की प्राकृतिक बौद्धिकता को निष्क्रिय कर सकती है। हम यांत्रिकीय नियंत्रण के दास बनकर रह जायेंगे जो अंततः इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा। जबकि कुछ लोग इसे समय की आवश्यकता मान कर इसलिए भी उत्साहित हैं क्योंकि एआई के हस्तक्षेप से सूचना प्रौद्योगिकी और भी सरल एवं तीव्र हो जायेगी, यांत्रिककार्य सुगम और लगभग त्रुटिहीन होंगे, युद्ध में लक्ष्यसंधान और प्रहार सटीक होने लगेंगे, शेयरमंडी  में व्यापार के अनुमान सटीक होंगे... । यह सब तो होगा, पर क्या इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा न्यूनतम और सत्ता विस्तार की भूख अनियंत्रित और घातक नहीं हो जायेगी! युद्ध में जय-पराजय की क्षीण संभावनाओं के साथ दोनों ही पक्षों के महाविनाश की आशंकायें प्रबल नहीं हो जायेंगी! शेयरमंडी की गति में एकरूपता नहीं हो जाएगी! खेल प्रतिस्पर्धाओं में रोमांच को पलीता नहीं लग जाएगा! ...!!!

तकनीक जब सर्वसुलभ होती है तो वह विशेषज्ञों के नियंत्रण से निकलकर जनसामान्य के हाथों में पहुँच जाती है, तब मनुष्य और यंत्र के मध्य बनने वाले संबंध प्रायः स्वेच्छाचारिता से परिपूर्ण होते हैं। यंत्र के काम करने की अपनी सुनिश्चित पद्धति होती है जबकि उसके उपयोगकर्ता द्वारा यंत्रों-उपकरणों के परिचालन की अनिश्चित।
कंप्यूटर के साथ हमारे विकृत व्यवहार ने तो एर्गोनाॅमिक्स जैसे एक नये ही विषय को जन्म दे दिया है, पर उसे भी कितने लोग जानते हैं, और जो जानते भी हैं उनमें से कितने उसका पालन कर पाते हैं!
आज हम ऐसे विभिन्न उपकरणों से घिरे हुये हैं जिनके अभाव में जीवन की गति थमती हुयी सी लगने लगती है।
अब हमें एआई के मूड को समझना होगा अन्यथा अच्छे और शुभ परिणाम नहीं मिलेंगे। वहाँ विवेक नहीं होता,  सांख्यिकीय गणनायें होती हैं। गणित वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होता है जबकि सांख्यिकी संभावित परिणामों के साथ चलती है।
आशंका है कि मनुष्य मस्तिष्क की स्वाभाविक गतिविधियाँ भी गंभीररूप से प्रभावित होंगी और तंत्रिकीय शिथिलता अंत में निष्क्रियता की स्थिति को प्राप्त हो सकती है।
एआई के आगमन से कयी उद्योगों में उथल-पुथल की आशंकायें निर्मूल नहीं हैं। जब चलचित्र महीनों के स्थान पर मिनटों में बनने लगेंगे तब क्या रेडियो और टेलिग्राम की तरह चलचित्र का संसार भी सिमट नहीं जायेगा!
चमत्कारी कृत्रिम बौद्धिकता का मूल "कार्यनिष्पादनक्रम समूह का यांत्रिकीय निर्देशन" (अल्गोरिदम) है। आशंका है कि यह तकनीकी सक्रियता का वह चरम है जो सभ्यता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होने वाली है।

डीएनए प्रेम की बायोप्सी

अथ सजातीय-विजातीय वास कथा।

महर्षि पुनर्वसु आत्रेय उवाच-
"लोकोऽयं पुरुष संमितः"
शरीर में प्रविष्ट किसी भी विजातीय द्रव्य (Foreign body) को शरीर में तब तक रहने का अधिकार नहीं होता जब तक कि वह पूरी तरह सजातीय (Assimilate) न हो जाय। ग्रहण किए अन्न-जल को शरीरकोशिकाओं का कोई न कोई घटक बनना ही होता है। यह शरीर का अपरिहार्य प्रकृतिधर्म है। विजातीय से सजातीय में रूपांतरित होने की इस प्रक्रिया को आप पाचन के नाम से जानते हैं। जो पच गया वह शरीर का घटक बन कर तुल्य रूप-गुण-धर्म वाला (Assimilated) हो गया, जो नहीं पच सका वह तुल्य रूप-गुण-धर्म वाला न होने के कारण अपशिष्ट के रूप में शरीर द्वारा बाहर फेक दिया जाता है। शरीर का कोई भी अपवर्ज्य द्रव्य अपनी उसी पहचान के साथ वहाँ रहने का हठ नहीं कर सकता और न इसके लिए किसी न्यायालय में जा सकता है, यह नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है। किंतु इसके विपरीत अवैध घुसपैठिये रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों को देश से बाहर निकालने के स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय भारत में उनके रहने के अधिकार को विचारणीय मानता है।
शारीरक्रिया की यही वैज्ञानिक पद्धति
Social-physiology के रूप में समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रयुक्त होती है, जिसे नये संदर्भों में इन्हीं नैसर्गिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से समझना होगा। भारतीय वांग्मय में "पुरुषोऽयं लोकसंमितः" की अवधारणा और "लोकोऽयं पुरुष संमितः" में सैद्धांतिक रूप से कोई अंतर नहीं। यावन्तो हि लोके (मूर्तिमन्तो) भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके। जब पुरुष लोक की तरह होता है तो लोक भी पुरुष की ही तरह होता है। जब आप परमाणु संरचना और मात्राभौतिकी (Quantum physics) के परिप्रेक्ष्य में शारीरक्रिया (Bio-Physiology) की घटनाओं को देखेंगे तो "पुरुषोऽयं लोक संमितः" और "लोकोऽयं पुरुष संमितः" का वैज्ञानिक सत्य समझ में आने लगेगा। हमारा
शरीर किसी भी विजातीय द्रव्य (Foreign body) को स्वीकार नहीं करता और उसे शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया प्रारंभ कर देता है।
विदेशों में रहने वाले सनातनी प्रवासियों और भारत में रहने वाले पारसियों की सफलता का यही रहस्य है। वे जिस भी देश में जाते हैं उसके अनुसार स्वयं को बना लेते हैं, ये उस देश की परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का न केवल वाचिक सम्मान करते हैं अपितु उनका व्यावहारिक आचरण भी अपना लेते हैं।
रोग तभी उत्पन्न होते हैं जब खाया हुआ भोजन पचने के स्थान पर अपनी पृथक सत्ता और पहचान के साथ शरीर में रहने का हठ करता है। विवाद और सामाजिक व्याधियाँ तभी उत्पन्न होती हैं जब कोई प्रवासी अपनी मान्यताओं, जीवनशैली और सांप्रदायिक अवधारणाओं को विदेशी धरती पर जाकर वहाँ के स्थानीय नागरिकों पर थोपने ही नहीं लगता अपितु उन्हें इसके लिए हिंसक क्रियाओं से बाध्य भी करता है। आमाशय में पहुँचा दाल-भात उसी रूप और अपनी उसी पहचान के साथ वहाँ नहीं रह सकता, उसे रूपांतरित होना ही होगा। दाल-भात का जो अंश रूपांतरित नहीं हो सकेगा उसे बाहर जाना ही होगा। यही प्रकृति (Physiological phenomenon) है, इसके प्रतिकूल जो भी घटनायें और स्थितियाँ होती हैं वे सब विकृतियाँ (Pathological states) है जो अंततः व्याधिकारक होती हैं और उपचार न होने पर अनियंत्रित होकर मृत्यु का कारण बनती हैं।
भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर के देशों में फैली विकृतियाँ अपनी पहचान और अस्तित्व को थोपने में लगी हुयी हैं जिनका उपचार हर देश को करना ही होगा। अन्यथा रुग्ण कोशिकाओं का अनियंत्रित विस्तार और बढ़ती संख्या अर्बुद (Carcinomatic growth) बनकर पूरे देश में व्याप्त (metastasize) हो जाएगी और अंत में उसे समाप्त कर देगी। शरीर के निष्प्राण होते ही व्याधि का भी अस्तित्व नहीं रहता।
जिन्हें अपनी विशिष्टपहचान के साथ विश्व पर शासन करने की अदम्य चाहत है उन्हें समझना होगा कि विजातीय बनकर रहने का हठ किसी के लिए भी शुभ नहीं होता। शरीरांत के साथ ही सभी व्याधियों के भी अंत होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
सारांश यह कि भारत में यदि रहना है तो भारत जैसा बनना होगा। भारतीय मूल्यों का सम्मान न कर सको तो कम से कम उनका अपमान तो न ही करो।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

यूजीसी रेगुलेशन :- बम या बुलबुला

संघ और भाजपा के जाल में फँसे मध्य और उत्तर भारतीय दलितों की अपमानजनक, विघटनकारी और हिंसक हुंकार की प्रतिक्रिया ने देश के सभी वर्गों को जहाँ झकझोर कर रख दिया है वहीं सांप्रदायिक शक्तियों को भी अपनी रोटियाँ पकाने का सुअवसर उपलब्ध करवा दिया है। कुछ लोग इसे सवर्णविरोधी षड्यंत्र मान रहे हैं तो कुछ लोग मात्र एक चुनावी चाल भर। यदि यह एक चुनावी रणनीति भर है तो भी लोकतांत्रिक मूल्यों पर क्रूर प्रहार होने के कारण संकटजनक है। समूह विशिष्ट के विरुद्ध ऐसी उन्मूलनकारी कूटनीति संभवतः अन्यत्र किसी देश में नहीं होती होगी। कई तटस्थ विचारक इसे जातीय ध्रुवीकरण का एक धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र मान रहे हैं। ऐसे विचारकों में संघ और भाजपा के समर्थक ही नहीं प्रत्युत दलित वर्ग के भी विवेकशील लोग सम्मिलित हैं जो समावेशी समाज के लिए एक शुभ संकेत है। इस पूरे प्रकरण में रविशंकर प्रसाद, संविद पात्रा, बाँसुरी स्वराज और सुधांशु त्रिवेदी जैसे लोगों का रहस्यमय मौन कई और प्रश्नचिन्ह खड़े करता है।

यूजीसी रेगुलेशन वरदान नहीं अभिश्राप

भारत में आरक्षण का स्वरूप पूरी तरह समाजमनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुये सामाजिक विघटन के नये-नये आयाम स्थापित करने वाला रहा है। यह पूरी तरह विघटनकारी और नैसर्गिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।
दस वर्ष के लिए प्रावधानित आरक्षण का स्वरूप विकृत कर "थोड़ा देकर सब कुछ छीन लेने" के सिद्धांत पर पुनर्गढ़ित कर परोसा जाने लगा है। आरक्षण पाने वाले वर्तमान की क्षुद्र उपलब्धि को ही संपूर्ण निधि समझ बैठे हैं जबकि वास्तव में वे अपने भविष्य का अपना सबकुछ खो रहे हैं। आरक्षण का वर्तमान स्वरुप वह अफीम है जिसे अगले दो सौ सालों तक आप एक वर्ग को खिलाकर समाज को अपंग बनाने का कुचक्र रच रहे हैं।
मोहन भागवत! आप देश को आग में झोंकने का दुस्साहस कर भारत के एक और मोहनदास बन गये हैं । सवर्णों और भारतीय इतिहास पर आपके मनगढ़ंत आरोप ऐतिहासिक तथ्यों से परे और निराधार ही नहीं धूर्ततापूर्ण भी हैं कि-
१. जातियाँ पंडितों ने बनाईं,
२. सवर्ण पिछले दो हजार वर्षों से दलितों  का शोषण और उत्पीड़न करते आ रहे हैं।
इसीलिए आवश्यक होने पर उन्हें अगले दो सौ वर्षों तक आरक्षण दिया जाना चाहिए। यह विचार निंदनीय ही नहीं कुत्सित और वीभत्स भी है।
इस तरह के वैचारिक षड्यंत्र ने भारतीय इतिहास का एक और कलंकित अध्याय लिखना प्रारंभ कर दिया है।
कलियुग में सत्य, धर्म, करुणा और प्रेम जैसी संज्ञायें केवल प्रवचन और छल के लिए ही प्रयुक्त होने लगी हैं, वास्तविकता से इनका कोई संबंध नहीं होता। हिंदुत्व की काल्पनिक बयार से सम्मोहित हम सब उसे पूजनीय मानते रहे जो जोड़ने का छल करके समाज को तोड़ने में लगा रहा है।
जिसे २०० साल तक आरक्षित रखे जाने का प्रस्ताव किया गया है उसे आरक्षण के दो सौ वर्ष और देकर उसे कुछ देने की इच्छा है या उसके पास जो है उसे भी छीन लेने का षड्यंत्र है? प्रकृति का सिद्धांत है, शरीर के जिस भाग का व्यवहार और अभ्यास नहीं किया जाता वह निष्क्रिय हो जाता है। ये कौन चिंतक, विचारक और हिंदुत्व के स्वयंभू मठाधीश हैं जो समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग का बौद्धिक विकास कुंठित करने का षड्यंत्र कर रहे हैं!
सावधान! अजीत भारती जैसे हजारों युवकों की आँखों में धूल नहीं झोंक जा सकती।
विवेक पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। जिस तरह कुछ ब्राह्मण इस कुचक्र के समर्थन में खड़े दिखाई देने लगे हैं उसी तरह कुछ दलित भी इस कुचक्र के विरोध में खड़े होने लगे हैं। सनातन संस्कृति को इस तरह विनष्ट नहीं होने दिया जायेगा। राष्ट्रप्रथम के लिए समर्पित सभी भारतीय एक हैं, उन्हें बाँटने के षड्यंत्र सफल नहीं होने दिये जाएँगे।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

उड़ान

सुदामा

केवल मुट्ठी भर
बैठे
नब्बे प्रतिशत पद पर
निश्चित ही ...अपराधी हैं सब
गाली दो, जूते मारो
कारा में डालो
छूट न पाये कोई सुदामा
मारो काटो देश निकाला दो
यह देश बुद्ध का
बाबा के बंदों का
अब नहीं सहेंगे
सारे पद हम लेंगे
सत्ता भी लेंगे
सारी धरती
सभी कुयें और सारा पानी
हम सब ले लेंगे
छीन के लेंगे
सत्ता के सारे गलियारे
मंदिर से इसरो तक
विप्रों को ना कुछ भी देंगे
सेमीकंडक्टर
एआई
रोबोट
सभी कुछ छीन के लेंगे
लेंगे बेटी भी उनकी
सौगंध भीम की
हम छीन के लेंगे आज़ादी भी।

कुछ कालनेमि भी हुंकारे
भयभीत सुदामा थर-थर काँपे
हे भीमभक्त!
जिस संविधान पर इतना फूले
कुछ पढ़ तो लेते
नेत्र खोल कुछ देख तो लेते
सत्ता में सब भीम के बंदे
ढूँढ सुदामा पटके मारे
भीम रहे फिर भी बेचारे?

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

क्रांति -प्रकृति का आह्वान

"भूत" अंधविश्वास है, "वर्तमान" सत्य है, आने वाला कल मेरा ही बनाया हुआ "भविष्य" होगा।

जहाँ मैं खड़ा हूँ धरती वहीं से प्रारंभ होती है। "इस्लाम से पहले कुछ नहीं था", फिर "बुद्ध से पहले कुछ नहीं था", अब "मूलनिवासी से पहले कुछ नहीं था"। ऊँच-नीच और बलपूर्वक वर्चस्व की यह मौलिक प्रवृत्ति है जो सदा रही है, सदा रहेगी, भले ही अधिक संतुलन के साथ रहे। समाज और सत्ता को इस प्रवृत्ति के अधीन रहने की बाध्यता होती है।

सत्ता और समाज में विभिन्न स्तरों पर बढ़ता असंतुलन आत्मावलोकन की आवश्यकता का संकेत है। हम सब सभी स्तरों पर सब कुछ असंतुलित करने में लगे रहते हैं, प्रकृति उसे संतुलित करने का प्रयास करती रहती है। संतुलन और असंतुलन की यह एक सतत प्रक्रिया है likewise wearing and tearing then again wearing phenomenon in all the living tissues.
जो स्वयं को हिंदू नहीं. प्रकृति पूजक मानते हैं वे भी प्रकृति को कहीं न कहीं असंतुलित ही कर रहे हैं, यह सब पहले भी होता रहा है पर अब यह असंतुलन  कैंसर में रूपांतरित होने लगा है। मूलनिवासी और विदेशी जैसे निराधार विवाद अब विघटन से विभाजन की दिशा में बढ़ चले हैं। जातीय नरसंहार किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, यदि आप सबल हैं तो निर्बल को धरती का एक टुकड़ा दे दीजिए, पहले भी ऐसा हो चुका है। यद्यपि इन विभाजनों के परिणाम कितने सफल रहे हैं यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार की वर्तमान स्थितियों से स्पष्ट है।
यदि अभी भी इस बढ़ते असंतुलन की चिकित्सा न की गयी तो हम सिंधुघाटी सभ्यता के अवसान की पुनरावृत्ति करेंगे।
सत्तायें कभी भी दीर्घकाल तक लोककल्याणकारी नहीं रह पाती अन्यथा न कभी रामराज्य का अंत होता और न विक्रमादित्य की न्यायव्यवस्था का।
जब राजा अपने धर्म और कर्तव्य से विमुख होता है तब प्रजा के दायित्व प्रधान और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। दुर्भाग्य से शताब्दियों की पराधीनता के बाद भी प्रजा अपने दायित्वों को समझ नहीं पा रही है। तब की पराधीनता और आज की स्वतंत्रता में केवल नाम में अंतर है, सत्ताव्यवस्था में सैद्धांतिक समानता वही है। प्रजा यदि अभी भी अपने दायित्वों को स्वीकार करने और निभाने में सक्षम नहीं होती तो प्रकृति ऐसे समाज का अंत कर नवनिर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

वर्ण - एक वैज्ञानिक अवधारणा

भारतीय मानते हैं कि वरण करने से वर्ण की उपलब्धि होती है। 

वरण, अर्थात् चयन और अनुकूलन की प्रक्रिया। 'वर्ण' एक वर्गीकृत स्थिति की उपलब्धि है जिसे व्यक्तिगत प्रयासों से प्राप्त किया जा सकता है। यह वंशानुगत गुणों के विकास और विशिष्ट स्थिति को प्राप्त करने के लिए अनुकूलन की एक जटिल प्रक्रिया है जिसे समझने की दृष्टि से चतुर्वर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। देश-काल से निस्पृह, संपूर्ण मानव समाज जैविक रूप से (शारीरिक-मनोवैज्ञानिक रूप से) इन विशिष्ट स्थितिगत समूहों में विभाजित है। यह एक नैसर्गिक व्यवस्था है, मनुस्ममृति की नहीं। प्रकृति हमें बनाती है, हम प्रकृति को नहीं बनाते।

दुर्भाग्य से शूद्र संज्ञा को विवादास्पद और विघटन का कारण बना दिया गया, पर शूद्रों में न केवल किसान और शारीरिक श्रमिक सम्मिलित हैं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और उद्योगों में तकनीकी कौशल और विशेषज्ञता रखने वाले तकनीकी व्यक्ति भी सम्मिलित हैं। संपूर्ण मानवीय गतिविधियाँ या तो 1. बौद्धिक गतिविधियों, 2. शारीरिक-मनोवैज्ञानिक गतिविधियों, 3. उद्योग और व्यवसाय से संबंधित गतिविधियों, या 4. कृषि और विभिन्न प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियों के आसपास घूमती हैं। संपूर्ण विश्व इन्हीं गतिविधियों के समूह के अनुसार संचालित होता है। इसलिए वैश्विक समाज भी इसी के अनुरूप व्यवहार करता है, भले ही अन्य सभ्यताओं में इसे इस तरह वर्गीकृत न किया गया हो। ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं के आधार पर मनुष्यों का पूर्ण वर्गीकरण भारतीय मनीषियों की विशिष्ट उपलब्धि है।

अस्सी (गतांक से आगे)

पश्चिम की खिड़की

स्वतंत्रता सभी प्राणियों का नैसर्गिक अधिकार है किंतु स्वतंत्रता में यदि आत्मानुशासन न हो तो वह स्वच्छंदता हो जाती है जो अंततः अव्यवस्था और कालांतर में परतंत्रता का कारण बनती है।
पश्चिमी समाज की पारिवारिक संरचना के संबंधों में आत्मानुशासन की जो शिथिलता है उसके परिणाम अब वहाँ के लोगों को त्रस्त करने लगे हैं। अब उन्हें पूरब की खिड़की से आने वाली प्रत्यग्र वायु आकर्षित करने लगी है।
भारत में कौमार्यत्व की पवित्रता को पुरुष वर्चस्व और उसकी दासता का उपकरण मानने वाली स्त्रियों के वैचारिक आंदोलन किशोरियों को आकर्षित करते हैं। इसे क्रांति की प्रचंड लहर माना जाने लगा है। परिणामतः नूतन बयार की उत्कट लालसा उन्हें अविवाहित संबंधों की ओर ले कर उड़ चली है। पश्चिम में असमय मातृत्व का बोझ किशोरियों को ही झेलना पड़ रहा है, किशोरों को नहीं। नारीमुक्ति आंदोलनकारियों के पास इस समस्या का कोई स्पष्ट समाधान दिखाई नहीं देता।
नारीमुक्ति आंदोलन स्त्री-पुरुष साहचर्यता की नैसर्गिक व्यवस्था को विवाहमुक्त संबंधों में तो परिवर्तित कर सकते हैं पर उसकी आवश्यकता को नकार नहीं सकते।
पश्चिम में गृहविहीन किशोरों-किशोरियों की स्थिति सरकारी सहयोगों के बाद भी सुधर नहीं पा रही है। उन्मुक्त सहवास के अवांछित परिणामों और अनिश्चित भविष्य ने उन्हें घातक द्रव्यों के सेवन की ओर धकेल दिया है।
नारीमुक्ति आंदोलन वाली स्त्रियों के एक वर्ग ने तो पुरुष से प्रतिशोध लेने की ठान ली है। अच्छे पदों पर कार्यरत ये उच्चशिक्षित नारियाँ पुरुषों के प्रति अभद्र शब्दों, वाचिकहिंसा और अपमानजनक टिप्पणियों को स्त्रीशौर्य का आवश्यक उपकरण मानती हैं। उनकी तीक्ष्ण गालियों के स्तर नें समकक्ष शिक्षित पुरुषों को तो छोड़िये अशिक्षित और अपराधीवृत्ति के पुरुषों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आश्चर्यजनक तो यह है कि उनकी गालियों में यौनक्रिया के विद्रूप शब्दचित्र तो होते ही हैं, पुरुष की माँ-बहन को भी नहीं छोड़ा जाता। यह कैसी नारीमुक्ति है जिसके प्रतिशोध के लक्ष्य से नारी भी मुक्त नहीं!
नयी बयार के लिए उमड़ती भीड़ में हेरोइन और कोकीन जैसे द्रव्यों से भी अधिक घातक मदकारी द्रव्यों का प्रचलन  अमेरिका के लिए तो चुनौती है ही, अब भारत के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। अमेरिका का यह शोधपत्र सभी देशों के लिए गंभीर चेतावनी है -
For years, students in middle and high schools across the country were urged to “just say no” to drugs and alcohol. But it’s no secret that the Drug Abuse Resistance Education (D.A.R.E.) program, which was typically delivered by police officers who urged total abstinence, didn’t work. A meta-analysis found the program largely ineffective and one study even showed that kids who completed D.A.R.E. were more likely than their peers to take drugs (Ennett, S. T., et al., American Journal of Public Health, Vol. 84, No. 9, 1994Rosenbaum, D. P., & Hanson, G. S., Journal of Research in Crime and Delinquency, Vol. 35, No. 4, 1998)


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

अस्सी

देश में यौनोत्पीड़न की कम से कम अस्सी विदित घटनायें प्रतिदिन हो रही हैं, अविदित घटनाएँ तो इतनी अधिक हैं कि उनका अनुमान भी लगा सकना आसान नहीं है। अस्सी की पटकथा में छह वर्ष की बच्चियाँ और दस वर्ष के बालक भी सम्मिलित हैं जो तापसी पन्नू को व्यथित करते हैं। आज से देश भर में "अस्सी" का प्रदर्शन हो रहा है। तापसी चाहती हैं कि दर्शक इसे न्यायाधीश की तरह देखें।

"अस्सी" की व्यथा से भिन्न इसी युग की स्त्री की एक और व्यथा है जो स्त्रीमुक्ति की छटपटाहट से परिपूर्ण है। दोनों व्यथाओं में दो तत्व उभय हैं -यौनोत्पीड़न और पुरुष वर्चस्व।

आधुनिक समय में पुरुषवर्चस्व के विरुद्ध नारी-मुक्ति, नारी-सशक्तिकरण और नारी-उत्थान जैसे तत्व स्त्रीविमर्श के प्रमुख विषय रहे हैं जिन पर चर्चाओं-परिर्चाओं से लेकर शोध और साहित्यसृजन तक की यात्रायें होती रही हैं। 

आज की उच्चशिक्षित स्त्रियों के एक वर्ग ने प्रत्यग्र वायु के लिए पूरब की खिड़की बंद कर पश्चिम की खिड़की खोल ली है। 

वे मानती हैं कि स्त्री की स्वतंत्रता और उत्थान में बाधक 'कौमार्य सुरक्षाकेंद्रित' एक ऐसा तंत्र है जिसे पुरुष ने स्त्री को अपनी यौनदासी बनाये रखने के लिए स्थापित किया है।

कुछ परिवारिकेंद्रित अपवादों को छोड़ दिया जाय तो भारत में नारी शिक्षा कभी प्रतिबंधित नहीं रही, प्राचीन भारत में तो कदापि नहीं। जिन परिवारों में प्रतिबंध रहा भी है तो उसका कारण कौमार्यत्वमूलक पवित्रता को ही मानने के उदाहरण विरले ही रहे होंगे।

नारी उत्थान के लिए पुरूष वर्चस्व से स्त्री की स्वतंत्रता की पक्षधर स्त्रियों में से एक वर्ग की विचारनेत्रियों को अपने कौमार्यत्व विषयक क्रांतिकारी विचारों के लिए जाना जाता है। क्रांतिकारी इसलिए कि उन्हें पूर्व के गवाक्ष की अपेक्षा पश्चिम के गवाक्ष से आने वाली हवा में नारी शक्ति की ऊर्जा का प्रवाह अधिक दिखाई देता है। 

आज एक लेखिका के विचार पढ़ने को मिले। उनके लेखन का सार यह है कि स्त्री गुह्यांग की अक्षुणता को नैतिक या धार्मिक मूल्यों से जोड़कर देखना स्त्री को व्यक्तिविशेष की यौनदासी बनाने का कुचक्र है जिससे स्त्री के उत्थान में बाधायें आती हैं। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- A part of the human body can not be considered as a matter of moral values.

लेखिका के उच्चशिक्षित होने के कारण उनके विचारों की पूरी तरह उपेक्षा भी नहीं की जा सकती, ऐसा करना समाज के लिए घातक हो सकता है। भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री और पुरुष के संबंध पूरकता और समानता के साथ अन्योन्याश्रित माने जाते रहे हैं ।

स्त्रीकौमार्यत्व को लेकर दो शब्द प्रक्षेपित किये जाते रहे हैं, एक है पवित्रता और दूसरा है सुरक्षा। दोनों के अंतर को भी समझा जाना चाहिए। पवित्रता के लिए सुरक्षा या सुरक्षा के लिए पवित्रता? 

कौमार्यत्व की स्वतंत्रता के परिणाम नौ माह तक सतत प्रतिफलित होने वाली दैहिक परतंत्रता को आमंत्रित करते हैं। यह स्त्रीदेह की अनिवार्य परिणति है। इससे बचने के लिए उपलब्ध आधुनिक सहज निरोधक उपाय अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। दूसरा उपाय गर्भपात हो सकता है जिसकी पीड़ा भी स्त्री को ही भोगनी होती है।

स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति और उत्थान के मार्ग में कौमार्यत्व कहाँ बाधक है? कौमार्यत्व की शिथिलता स्त्री उत्थान के लिए इतनी महत्वपूर्ण और निर्णायक कैसे हो सकती है? वैदिक और वैदिकोत्तरकाल में भी बेटियों की शिक्षा या आत्मोत्थान के लिए कौमार्यत्व की स्वच्छंदता को आधार नहीं बनाया गया, आज भी नहीं है।

सतत नूतनता की चाह लिए स्त्री की दृष्टि में पश्चिम से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता का प्रतिशत कोई अर्थ नहीं रखता। पूरब से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता के साथ उगते सूर्य के प्रकाश का एक तत्व और भी है जो पश्चिम से आने वाली वायु में नहीं होता, जो प्रकाश है भी वह अस्ताचलगामी सूर्य का है, जिसके बाद अंधकार अनिवार्य होता है।

क्रमशः... 

विरोध की अंतरधाराएँ-४

भीमाकोरेगाँव दोहराने की धमकियाँ

*महारों को गर्व है कि उन्होंने सन् १८१८ में ०१ जनवरी को अपने ब्राह्मणराजा के विरुद्ध हुये युद्ध में एक विदेशी ब्रिटिश व्यापारिक कंपनी का साथ दिया और पेशवा को पूना छोड़कर बिठूर भागने के लिए विवश कर दिया था।*

पेशवा की सेना में मराठवाड़ा के हिंदू सैनिकों के साथ-साथ अरब सैनिक भी थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग लिया किंतु महार इसे ब्राह्मण विरुद्ध दलित युद्ध के रूप में देखते रहे हैं जबकि १८१८ में 'दलित' जैसा कोई शब्द किसी के लिए भी प्रयुक्त ही नहीं होता था। राजाओं की सेना में महार योद्धाओं का होना और बाद में यूरोपियन्स द्वारा 'महार रेजिमेंट' का निर्माण उनके युद्धकौशल, दक्षता और उनके क्षत्रियत्व गुणों के मूल्यांकन का ही तो परिणाम था। महार रेजिमेंट आज भी है जिसमें अन्य जाति के लोग भी सम्मिलित हैं। क्या यह सब उनके साथ जातीय भेदभाव का परिणाम था? सनातन परंपरा में तो योद्धाओं को क्षत्रिय माना जाता रहा है।

छत्रपति शिवाजी की सेना में भी महार योद्धा हुआ करते थे। उनके साथ भेदभाव कब हुआ, किसने किया?

भीमाकोरेगाँव युद्ध में ब्रिटिशर्स का साथ देने वाले महारों के उत्तराधिकारी अब एक बार फिर ब्राह्मणों के विरुद्ध ताल ठोंकने लगे हैं, कारण तब भी अज्ञात था, आज भी अज्ञात है।

आपने भीमाकोरेगाँव में अंग्रेजों के साथ मिलकर अपने ही राजा के अरब और हिन्दू सैनिकों (जिनमें से कुछ आपके गाँव के पड़ोसी पूर्वज भी रहे होंगे) का नरसंहार किया जो महारों के लिए कितना गर्व का विषय है, यह तो आप ही तय कर सकेंगे। एक ओर तो आप वैसा ही नरसंहार पुनः दोहराने की धमकी दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर आपका यह भी आरोप है कि ब्राह्मणों ने मंदिरों में पूजा करने और शिक्षा से आपको हजारों-लाखों वर्षों तक वंचित रखा ...और इसीलिए अब आप ब्राह्मणों से उनका सब कुछ छीन लेने की आभासी संचार माध्यमों पर और जनसभाएँ कर धमकियाँ देने लगे हैं। आप ब्राह्मणों से छीन लेना चाहते हैं उनके प्रतीक, उनके मौलिक अधिकार, उनकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उनकी बेटियाँ भी... फिर भी आप स्वयं को ही वंचित, शोषित और पीड़ित कहते हैं! इतना बड़ा झूठ बोलने का दुस्साहस कहाँ से लाते हैं आप लोग!

आप तो यह भी कहते हैं कि भारत कभी मंदिरों का देश नहीं रहा, यहाँ जो हैं वे सब बौद्ध मठ हैं। हम पुरातात्त्विक तथ्यों में गये बिना आपसे पूछते हैं कि मंदिर थे नहीं फिर भी हजारों सालों तक ब्राह्मणों ने आपको मंदिरों में जाने से रोका? आपको शिक्षा से वंचित रखा किंतु आश्चर्य यह कि फिर भी आप सैन्यप्रशिक्षण प्राप्त करते रहे! 

विरोधाभासों और मनगढंत आरोप गढ़ने की सारी सीमायें तोड़कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

इतिहास यह है कि भीमाकोरेगाँव युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य भीमा नदी के किनारे १ जनवरी १८१८ में लड़ा गया। कंपनी सेना की ओर से महार रेजिमेंट के ८३४ सैनिकों और पेशवा की ओर से २८००० सैनिकों ने युद्ध लड़ा था जो अनिर्णीत रहा किंतु उसके बाद पेशवा को अंग्रेजों से कुछ पेंशन लेकर संधि करनी पड़ी और पुणे से बिठूर जाना पड़ा। 

ब्रिटिशकंपनी ने इस संधि के उपलक्ष्य में कोरेगाँव में एक विजय स्तंभ बनवाया और प्रतिवर्ष ०१ जनवरी को वहाँ शौर्यदिवस मनाया जाने लगा। 

यद्यपि यह युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य हुआ पर महारों ने १९४७ के बाद इसे ब्राह्मणों पर महारों की विजय के रूप में मनाना प्रारंभ किया। महार आज भी इसे इसी रूप में मना कर भी जातिवाद का आरोप ब्राह्मणों पर लगाते नहीं थकते।  

भीमाकोरेगाँव इतिहास के संदर्भ में आपकी पूर्व एवं वर्तमान भूमिकाओं को किस तरह देशभक्ति और तथाकथित मनुवाद एवं ब्राह्मणवाद का प्रमाण माना सकता है, यह विचार भी आप ही कर सकते हैंं। 

क्रमशः...