गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

यौनशिक्षा

 यौनशिक्षा में क्या?


यौनविज्ञान की शिक्षा या यौनसंबंधों की शिक्षा!

यौनविज्ञान चिकित्सा का विषय है, जबकि यौनसंबंधों की शिक्षा कामशास्त्र और यौनव्यापार से संबंधित विषय है। 

प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल मुक्त यौनसंबंधों के पक्ष में पहले भी वक्तव्य देती रही हैं, इस बार केवल इस अनुबंध के साथ कि मुक्तयौनसंबंधों के परिणामस्वरूप यदि कभी गर्भधारण हो जाए तो लड़की को छोड़ न दिया जाए।

भारतीय समाज जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि से यह विषय विचारणीय है। लड़की को न त्यागने का अनुबंध स्वागतेय है, किंतु हमारे सामाजिक मूल्य यह मानते रहे हैं कि ऐसा तो केवल विशेष स्थितियों में ही होना चाहिए। मुक्यतयौनसंबंध नित्य जीवन का अभ्यास नहीं होना चाहिए अन्यथा भ्रष्टाचार की तरह यह भी एक नया आदर्श बन जाएगा। प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल ने यह नहीं बताया कि इस अनुबंध का विस्तार विवाह तक होना चाहिए या केवल बच्चे के पालन-पोषण के दायित्व तक ही! जैसा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में होता है। 

गर्भधारणोपरांत लड़की का त्याग न करना एक सामाजिक दायित्व एवं सामाजिक चिकित्सा है, ... मुक्त यौनसंबंधजनित उस अवांछित मनोदैहिक स्थिति की चिकित्सा... जिसके मूलकारण को हमारे ऋषि-मुनि चारित्रिक विचलन बताकर निंदनीय कहते रहे हैं। इस Social treatment से पहले क्या हमें इस स्थिति के preventive measures पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए!

भारतीय ही नहीं, अन्य भी सुसंस्कृत समाजों में मुक्तयौन संबंधों को हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है, आज भी देखा जाता है। मुक्यतयौनसंबंधों वाले समाज कितने विकसित और सुसंस्कृत हो सके हैं, यह देखा जा सकता है। बात फिर पलट कर सामाजिक ताना-बाना, उसका शिल्प और उच्च जीवन मूल्यों पर आकर ठहर जाती है। योग दर्शन और अध्यात्मिक मूल्यों का ध्वज लेकर चलने वाले देश का आदर्श पश्चिमी समाज का भौतिक विचलन होना चाहिए या भारतीय सांस्कृतिक मूल्य! अच्छा हो यदि प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल इस विषय पर और प्रकाश डाल सकें। 

यौनशिक्षा की बात करते समय हमें शिक्षा प्रक्रिया और उसके परिणामों पर भी विचार करना चाहिए। 

सीखने की आदर्श प्रक्रिया में मान्य स्रोतों से गृहण की हुयी सूचना और उसके व्यावहारिक सदुपयोग का सुयोग होता है, जो गुरुकुल प्रणाली में ही संभव है। बिना सदुपयोग के हम सीखते कुछ नहीं, केवल सूचनाओं का निष्क्रिय संग्रहण भर करते हैं, जिसका सदुपयोग न्यूनतम किंतु दुरुपयोग ही अधिक देखा जाता रहा है। यही कारण है कि सचिव जैसे उच्चपद पर पहुँचे बहुत कम लोग ही भ्रष्टाचार से स्वयं को अछूता रख पाते हैं।

मुक्तयौन संबंध होंगे, तो गर्भनिरोधकों का भी प्रयोग होगा, कदाचित् असफल होने पर गर्भधारण होगा... और इस विवश एवं अवांछनीय स्थिति में लड़की को बेचारी न बनाया जाए, पुरुष उस पर अपने संरक्षण की कृपा बनाये रखे। क्या इससे स्त्री स्वाभिमानी हो पायेगी? 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

बदला

 राजा ने कहा 

अपनी प्रजा से - 

तुम अत्याचार करते रहे  

लाखों वर्षों तक

हमारे भाइयों पर 

तुम उन्हें जीने नहीं देते थे 

उत्पीड़ित करते थे 

अपमानित करते थे 

लाखों वर्षों तक ।  

अब बदला लेंगे हमारे भाई 

हमारी प्रजा से 

जो आकर बस गई थी 

हमारे देश में 

लाखों साल पहले । 

राजा ने विधान बनाया

 राजा के भाइयों ने संकेत समझा 

और फिर प्रारम्भ हुआ 

ऐसा उत्पीड़न 

जिसकी योजना बना ली गयी 

इस सभ्य युग में 

और प्रजा 

प्रतीक्षा कर रही है 

कहाँ छिपे मोरे श्याम ! 

आवो 

अब और सहा नहिं जाय । 

राजा अट्टहास कर रहा है 

सुनकर अपनी प्रजा का 

आर्तनाद । 


रविवार, 18 अक्टूबर 2026

सत्तापरिवर्तन की आग ही आग

क्या हम सचमुच सभ्य हैं?

इटली जल रहा है, फ़्रांस जल रहा है, और अब अन्य भी कई देशों को जलाने की धमकियाँ दी जा रही हैं । कौन हैं ये लोग? क्यों जला देना देना चाहते हैं सब कुछ?

यह वामपंथ और इस्लाम की युति है जो पूरे विश्व में इस्लाम का शासन चाहती है। वामपंथ और इस्लाम में धार्मिक तत्वों को लेकर कहीं कोई समानता नहीं फिर भी वे एक साथ हैं, क्योंकि दोनों के पथ अराजकता से होकर आगे बढ़ते हैं।

संपत्ति को आग लगाकर, दुकानों में तोड़फोड़ कर, सामान को लूटकर ये लोग हर्ष से कितने उन्मादित हो रहे हैं। इस समय इटली और फ़ांस में यही हो रहा है। क्या ये सभ्य लोग हैं? इन दोनों ही देशों के साथ भारत के सम्बंधों का इतिहास अच्छा नहीं रहा है पर यह प्रतिशोध का समय नहीं है, हमें सच को सच और झूठ को झूठ कहना होगा। हमें इटली और फ़्रांस के मूल नागरिकों के साथ खड़े होना होगा। यह मानवता की रक्षा का विषय है, और सबसे ज्वलंत विषय भी।

फ़्रांस और इटली के शासकीय भवनों, प्राचीन स्थापत्य कलाओं, दुकानों और पार्क में खड़ी कारों को तोड़कर और उनमें आग लगाकर नष्ट किया जा रहा है, भीड़ में उन्माद है क्योंकि वे निर्भीक हैं। वे निर्भीक हैं क्योंकि शासन तंत्र निर्बल है और उसमें किसी अच्छे संकल्प का अभाव है। यद्यपि जॉर्जिया मेलोनी पहले से ही जॉर्ज सोरोस की रक्तरंजित चालों का अनुमान लगाती रही हैं, फिर भी वे कुछ नहीं कर पा रही हैं। इधर भारत में मोदी भी कुछ नहीं कर पा रहे है।  

यह भीड़ धरती की सबसे क्रूर विचारधारा वाले असभ्य लोगों की भीड़ है। पहले ये आपस में झगड़ा करते हैं, फिर दयनीय बनकर दूसरे देशों में शरण माँगते हैं, फिर उसी देश, वहाँ के समाज, वहाँ की सभ्यता और संस्कृति पर आक्रमण करते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि देश के सत्ताधीश अच्छाई और बुराई, शत्रु और मित्र, न्याय और अन्याय में भेद नहीं कर पाते, उनमें दूरदर्शिता का अभाव होता है और वे अपने पूर्वजों के पापों का फल भोगने के ईश्वरी विधान से बँधे हुये होते हैं।

पश्चिमी सेक्युलरिज्म का यह सबसे काला पक्ष है। यद्यपि सनातन दर्शन में सहिष्णुता, समावेशिता और समानता के बीज हैं पर भारतीय उपमहाद्वीप के बाद अब भारत में भी इसी मानसिकता के साथ उपद्रव प्रारम्भ होने लगे हैं। 

 

अभी मैं यू-ट्यूब पर एक वीडियो देख चुकने के बाद लोगों की टिप्प्णियाँ देख रहा हूँ –

“इंशा-अल्लाह, शीघ्र ही हम ब्रूसेल्स में भी आ रहे हैं।“

“हम स्पेन में आ रहे हैं, यूके और नीदरलैंड में भी।“

“इंशा अल्लाह एक दिन यह धरती हमारी होगी।“

“जिस दिन हरी रोशनी हमारे पास होगी, तुम सब समाप्त हो जाओगे।“

“इस समस्या का समाधान फ़्रांस के विभाजन के बाद ही होगा, हमें फ़्रांस में हमारे लिए एक नया देश चाहिये”।

“क्या फ़्रांस में सरकार और सेना नहीं है?”

“”इन पर गोली क्यों क्यों नहीं चलाई जाती?”

2.

भारत में सत्तापरिवर्तन

सत्तापरिवर्तन एक गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है किंतु तुम तो सत्ता परिवर्तन चाहते ही नहीं, सत्ता को अनैतिक और अराजक तरीकों से छीनना चाहते हो, उपद्रव करके सत्ता लूटना चाहते हो। सत्ता परिवर्तन और सत्ता लूटने में नैतिकता और उद्देश्यों का अंतर है।  

दुर्बल सत्ताओं को रण छोड़ना पड़ता है, जैसा कि श्रीलंका, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश में हुआ । नेपाल में जो हुआ वह जन क्रांति थी, सत्ता की लूट नहीं। अफ़गानिस्तान में रणनीतिक तरीके से आक्रमण करके तालिबानियों ने अपना शासन स्थापित किया। यह कुछ सौ साल पुरानी परम्परा की पुनरावृत्ति थी।  

बांग्लादेश में विदेशी शक्तियों द्वारा सत्ता को छीना गया और वहाँ एक कठपुतली सरकार स्थापित की गयी । नेहा बोरा ने स्पष्ट  कर दिया है कि वह नेपाल से नहीं, बांग्लादेश से प्रभावित है। वह सत्तापरिवर्तन नहीं चाहती, ज़ॉर्ज़ सोरोस और अन्य विदेशी आसुरी शक्तियों से प्रभावित होकर सत्ता छीनना चाहती है जो भारत में अलोकप्रिय शासक के रहते हुये भी सम्भव नहीं है।

भारत की स्थिति इन सबसे बहुत भिन्न और विचित्र है वर्तमान सरकार ने अपने शत्रुओं और विरोधियों को उत्पन्न करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी। विपक्ष देश की जनता को कभी प्रभावित नहीं कर सका। भारत की जनता को प्रभावित करने या आकर्षित करने में तिलचट्टों सहित अन्य विपक्षी दल अभी तक असफल ही रहे हैं। आगे भी वे कुछ अच्छा कर सकेंगे, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि विकल्प के रूप में एक क्षीण सी प्रकाश की रेखा निकलती प्रतीत हो रही है तथापि साधु वेश में रावणों की भारत में कभी कमी नहीं रही।  

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

सवर्ण-अवर्ण

जब आप "सवर्ण" कहते हैं तो एक और विभाजनकारी समूह का अप्रत्यक्ष संकेत देते हैं। अर्थात कुछ सवर्ण हैं तो कुछ अवर्ण भी होंगे ही। यह ध्वनित है, जिसे धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र कहा जाना उचित होगा।

सवर्ण शब्द दिया ही क्यों, यह कहाँ से आया? चलिए, इस शब्द की बायोप्सी करते हैं। सवर्ण का अर्थ निकलता है वर्ण सहित। वर्ण चार हैं, अर्थात सवर्ण में चारो वर्ण हैं, तीन नहीं, जैसा कि  प्रचारित किया जा रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रादि चतुर्वर्ण के बाद सनातन परंपरा/human physiology /व्यावहारिक दृष्टि से पाँचवा कोई वर्ण नहीं होता, हो ही नहीं सकता जैसा कि भारतीय समाज के विभाजन (सामान्य या सवर्ण अर्थात ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्य), पिछडा़, एससी, एसटी, दलित, अतिदलित, महादलित) के उद्देश्य से अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक और कुत्सित  प्रयास किया गया है। किसने किया यह विभाजनकारी नया वर्गीकरण?

सनातन परंपरा में तो चारों वर्ण समाहित हैं इसलिये जब हम सवर्ण कहते हैं तो उसमें चारो वर्ण हैं। वास्तव में सवर्ण शब्द ही अवैज्ञानिक और विभाजनकारी है, अर्थात ये लोग सवर्ण के बाद अवर्ण का संकेत दे रहे हैं जिसमें शूद्रों का समावेश किया गया है, वह भी कई और विभाजनों के साथ। यह सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर कुछ लोगों का आसुरी आक्रमण है।

आश्चर्यजनक रूप से संत समाज भी इस विषय पर मौन है। क्या यह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के साथ आसुरी बलात्कार नहीं!

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

केवल तभी

 कभी-कभी 

प्रकाश से अधिक

मुखर हो जाता है

अंधकार

किंतु केवल तभी

जब उसके पीछे हो

प्रकाश का 

प्रबल संबल

किंतु

अंधकार 

यह मानता ही कब है!


गजवा-ए-जहान

 स्पेन से आॅस्ट्रेलिया तक 

हर कहीं पहुँच चुके हैं

मोहम्मद-बिन-कासिम

फ्रांसीसी!

फ्रांस छोडो़,

ब्रिटिश! 

ब्रिटेन छोडो़!

अमेरिकन!

अमेरिका छोडो़!

स्पेनिश!

स्पेन छोडो़!

सारी धरती 

हमारी है

यही कहा है हमसे

हमारे अल्लाह ने

और आप कह रहे हैं कि 

उन्हें कुछ नहीं मिलेगा

जो करते जा रहे हैं 

गजवा-ए-हिंद

चरणबद्ध

दहाड़ते हुए।

कुछ भी तो नहीं है छिपा 

जो हो अदृष्टव्य

किसी की भी दृष्टि से!

विनाशाय च साधूनाम्

पर्वत से नीचे है 
पाँव पसारती 
अराजकता
यत्र-तत्र ही नहीं
सर्वत्र
पक्ष से विपक्ष तक
दास (ब्यूरोक्रेट्स) से आंदोलनकारी तक
और प्रजा 
भयाक्रांत है 
देख और भोग कर राजदण्ड
राजप्रासाद से गूँजती प्रतिध्वनि-
"परित्राणाय दुष्कृताम" 
"विनाशाय च साधूनाम्"
हो रहा तुमुल
राजा 
बजा रहा है तबला
और कबीलों के लोग
ध्वजा को शिखंडी बना 
कर रहे हैं
नित नव आक्रमण। 
निष्क्रिय सा प्रतीत होता राजा 
 निष्क्रिय नहीं 
बहुत व्यस्त है
असुरों के स्वागत में। 
हर कबीले का एक ही लक्ष्य है
"राजसिंहासन"
कैसे भी
छल-युद्ध करके
या विश्वासघात करके।
तिलचट्टे
सचमुच तिलचट्टे हैं
सर्वभक्षी
तीव्रगमन
छिपने में दक्ष
और 
प्रतिकूल स्थिति में भी 
अद्भुत जिजीविषा,
तुम खोजते रहो
न्यायालय में न्याय
जो वहाँ 
कभी नहीं मिलता,
तिलचट्टे कहाँ नहीं हैं!

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

तमस से आगे...

भारत और विश्व 

जैसे-जैसे विराट कृष्ण विवर में निस्तेज होते सौर्यमण्डल और धूमकेतु समाते जा रहे हैं वैसे-वैसे उसकी शक्ति प्रचण्ड होती जा रही है। यह वह सत्य है जिसे जान लेने के बाद ऋषियों ने तमस से बाहर निकलकर ज्योति की ओर गमन करने का सुझाव दिया था। इसमें दो क्रियायें हैं – एक तो है तमस को छोड़कर तमस से बाहर निकलना और दूसरी है प्रकाश की ओर गमन करना। अर्थात् हमें तमस को छोड़कर, उससे बाहर निकलकर, सही दिशा में गमन करना होगा। 

दुर्भाग्य से पूरा विश्व ही तमस को पहचान ही नहीं पा रहा है, तो उसे छोड़ने की प्रक्रिया कैसे प्रारम्भ हो सकेगी! जेलेंस्की को विश्वास है कि वह रूस को झुका देगा, एलन मस्क को विश्वास है कि वह भारत के उद्योग को अपनी मुट्ठी में दबोच लेगा, जॉर्ज सोरोस को विश्वास है कि वह विश्व भर की राजनीति को अपने धन-बल से नचा सकता है, रोटेशील्ड को विश्वास है कि वही हर देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, डोनाल्ड ट्रम्प को विश्वास है कि वह जिसे चाहे उसे मूर्ख बनाकर उस पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है, इज़्रेल को विश्वास है कि वह इस्लामिक आतंक को समाप्त कर देगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश को विश्वास है कि वे भारत को इस्लामिक देश बना लेंगे, मोदी को विश्वास है कि भारत पर एकछ्त्र राज्य करने के लिये भारतीय समाज के टुकड़-टुकड़े कर देना ही एकमात्र प्रशस्त मार्ग है, भारतीय जनता को विश्वास है कि कोई आएगा जो धरती को स्वर्ग बना देगा स्वयं उसे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, तथाकथित दलितों को विश्वास है कि बिना तप किए ही सिद्धियाँ छीन लेना उनका अधिकार है, भारतीय विपक्ष को विश्वास है कि वे हिंसा और उपद्रव से भारत में सत्ता-परिवर्तन कर देंगे, … लोग अपने-अपने स्थापित विश्वास से चिपके हुये हैं। इसी स्थापित विश्वास को छोड़कर बाहर निकलने की आवश्यकता है। क्या ऐसा हो सकेगा? हाँ! हो सकेगा पर पूरी तरह नहीं, आंशिकरूप में होगा। यह भी एक ब्रह्माण्डीय सत्य है कि कुछ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। असंतुलित हो गये सत्य और असत्य में, तमस और प्रकाश में, ज्ञान और अज्ञान में… आनुपातिक परिवर्तन भर होता है अन्यथा ऋणात्मक और धनात्मक आवेश तो सदा ही रहते हैं। हर युग में असुरों के विरुद्ध सुरों को ही युद्ध करना पड़ता है। 

आज की स्थिति में सुरों का लगभग अभाव सा है और असुर उन विषाणुओं की तरह शक्तिशाली हो चुके हैं जो किसी जीवित कोशिका में प्रविष्ट हो चुके होते हैं, उनके आकार को छोटा मान लेना बहुत बड़ी रणनीतिक भूल है। नेपाल को छोड़ दिया जाय तो ठीक यही स्थिति हम श्रीलंका और बांग्लादेश में देख चुके हैं। नेपाल में जो हुआ उसके परिणाम शल्यचिकित्सा के परिणाम की तरह दिखायी देने लगे हैं। भारत की जनता को तय करना है कि हम नेपाल बनने जा रहे हैं या बांग्लादेश?           

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

प्रतिशोध का प्रतिनिधित्व

नेपथ्य से...

उन्होंने झूठ गढ़े, झूठी कहानियाँ लिखीं, हमें अपना शत्रु प्रचारित किया और अब झूठी शत्रुता का प्रतिशोध लेने के लिए चारो ओर से आक्रमण प्रारंभ कर दिए हैं। यह संग्राम अब उनके वर्चस्व से बहुत आगे बढ़कर हमारे अस्तित्व की रक्षा पर आकर टिक गया है।      

दृश्य एक-

नानबायोलाॅजिकल भगवान जी उवाच- 

"अच्छाआआआऽ तुम हमें कुएँ से पानी नहीं भरने देते थे! अच्छाआआआऽ तुम हमारे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे! अच्छाआआआऽ तुम हमारी माँ-बहनों के साथ अत्याचार करते थे! बताओ, आज अगर उन्हें मौका मिल जाए तो कोई बदला लेगा कि नहीं! बताओ, लेगा कि नहीं लेगा!"          

दृश्य दो-                                      

नानबायोलाॅजिकल भगवान जी उवाच-   

"अगर वार करना है तो मुझ पर वार करो, मेरे दलित भाइयों पर मत करो...!"

नेपथ्य से आती एक ध्वनि -

दोनों दृश्य देश की उन स्थितियों को हाईलाइट करते हैं जो विशुद्ध काल्पनिक और तथ्यविहीन हैं।  

दृश्य तीन- 

जेन-जी की अनियंत्रित और निरंकुश भीड़। पोर्नगालियों के नारे और गीत। अमर्यादित वेश-भूषा में लड़की बने हुये लड़के.. कामुकनृत्य करते हुए। विश्वगुरु बने भारत में परिवर्तन की चाहत लिए आंदोलनकर्ताओं के मुँह से झरती हुयी गालियाँ और केवल गालियाँ।       

दृश्य चार-      

दृश्य तीन पर धार्मिक ठेकेदार की प्रतिक्रिया - "पिछली तीन पीढ़ियों में आज की जेन-जी पीढ़ी सबसे बुद्धिमान पीढ़ी है। उनके प्रश्नों के उत्तर देने होंगे।"      

नेपथ्य से उभरती एक ध्वनि - "गाली का उत्तर गाली में दे दें क्या? पर वह तो हमारा संस्कार नहीं है! आप दे सकते हैं, दे दीजिए।"       

दृश्य तीन पर पंतप्रधान की प्रतिक्रिया - 

"ये सब हमारे भटके हुए बच्चे हैं, मैंने उन्हें माफ़ कर दिया है। मैं इन पोर्नगालीबाज लड़कियों को अपने गले से लगाना चाहता हूँ।"      

नेपथ्य से आती एक ध्वनि - 

"जिन्हें लगाना चाहते थे गले, वे पड़ गये तुम्हारे गले। अब निपटो इनसे।"    

नेपथ्य से आती एक और ध्वनि- 

"तीन पीढ़ियों में सबसे बुद्धिमान पीढ़ी देश चलाने के लिए सत्ता परिवर्तन चाहती है, उनका स्वागत क्यों नहीं करते आप?"

नेपथ्य से आती एक और तुमुल ध्वनि -

जेजेजेजे जेऽऽऽऽऽऽ भीम!

अल्लाह-हू-अकबर...

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

भारत की भ्रूणहत्या

            भारत में रहकर भारत के विरुद्ध कुवैचारिक आंदोलन करना बहुत सरल हो जाता है यदि सत्ता भी भारत के विरुद्ध वातावरण तैयार करने की इच्छा से कूट क्रियाओं और षड्यंत्रों में लिप्त हो। मैं बात कर रहा हूँ स्वातंत्र्योत्तर भारत के अभारतीयकरण की, जिसमें पराधीनता युग की परम्पराओं, स्मृतियों, कुविचारों और दुष्प्रचारों को सुस्थापित किये जाने के सफल प्रयास किये जाते रहे।

जवाहरलाल ने प्रसादयुग की परिष्कृत हिंदी के स्थान पर फ़ारसी और अरबी मिश्रित हिंदी बोली को प्राथमिकता क्यों दी, यह विचारणीय विषय होना चाहिए। उन्होंने इस्लामिक पराधीनता वाले भारत की राजशाही बोली, जो कि तुर्क, फ़ारसी और मुगल शासकों द्वारा विकसित की गयी बोली “उर्दू” थी, को भारत पर थोपने के लिये जनता को प्रोत्साहित किया, जबकि अभिजात्य लोगों के बीच उन्हें अंग्रेजी बोलना पसंद था। समृद्ध द्रविड़ भाषाओं के कारण यह काम दक्षिण भारत में सम्भव नहीं था इसलिये उत्तर भारत पर ही उर्दू थोपी जाती रही। जवाहरलाल का वश होता तो तो वे हिंदी को देवनागरी के स्थान पर फ़ारसी लिपि में लिखने की भी अनुशंसा करते। स्वतंत्र भारत पर स्वतंत्र भारत के शासक के द्वारा यह प्रथम आक्रमण था जो भाषाहत्या के रूप में था। बाद में हिंदी और द्रविड़ भाषायी विवाद को लेकर भी हिंसा होने लगी और दर्पण की तरह भारत एक स्थान पर चटक गया।

साधारण जनमानस में स्वातंत्र्योत्तर भारत में भारत के भारतीयकरण की अपेक्षा की गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ। पराधीनता की पीड़ादायी स्मृतियों को सम्मानित करने के लिये भवनों, मार्गों, राजप्रासादों, दुर्गों और अन्य राष्ट्रीय महत्व के स्थानों के नाम क्रूर और अत्याचारी विदेशी शासकों के नाम पर ही जाने जाते रहे, जबकि इनमें से अधिकांश स्थान भारतीय शासकों द्वारा निर्मित किंतु विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अपने अधिकार में लिये हुये थे, उनके द्वारा निर्मित नहीं। भारत पर भारत की स्वतंत्र सत्ता द्वारा पूरी धूर्तता के साथ किया गया यह दूसरा आक्रमण था जिसने भारत की स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व की हत्या करने का प्रयास किया।

भारत पर स्वतंत्र भारत के शासकों द्वारा तीसरा आक्रमण शिक्षा के पश्चिमीकरण और सनातन मूल्यों की हत्या के लिये किये जाने वाले विविध आक्रमणों के रूप में था जिसमें रोमिला थापर जैसे लोगों द्वारा लिखी गई काल्पनिक कहानियों को इतिहास बताकर विद्यार्थियों को परोसा जाता रहा । परिणामस्वरूप आज भारत की कम से कम तीन पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क में भारत के प्रति घृणा और विद्रोह की भावना स्थायीरूप से घर कर चुकी है। इस घृणा की जड़ों ने भारत की अपनी भाषा, स्थानीय बोलियों, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और पूर्वजों के त्याग-बलिदान आदि में घुसकर उन्हें बुरी तरह जकड़ लिया है। आज की तिलचट्टा पार्टी इसका एक ताजा उदाहरण है।

दर्पण अब कई स्थानों से टूट चुका है, दर्पण को तोड़ने के प्रयास अनवरत चल रहे हैं। भारत ही नहीं, पूरे विश्व के लिये यह संक्रांतिकाल है जिसमें हम सबको अपनी-अपनी भूमिकायें सुनिश्चित करनी ही होंगी।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

तुम

 तुम 

हमें गालियाँ देते रहे

पीटते रहे

बलात उठा ले जाते रहे 

हमारी बहनों-बेटियों को

देते रहे धमकियाँ

देश से भगाने की

हमारी बेटियों से ही नहीं

हमारे इतिहास से भी 

करते रहे बलात्कार

लगाते रहे 

हम पर ही मिथ्या आरोप

और हमें ही 

ठूँसते रहे कारा में 

न्याय के नाम पर

करते रहे अत्याचार

ऐसी ही अराजक, 

अनियंत्रित 

और अमानवीय घटनाओं की बाढ़ में 

बहा होगा वह आर्यपथ 

जिससे होकर आया-जाया करते थे 

सभी वर्णों के लोग..

और विवश होकर 

बना ली होगी दूरी 

ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों ने... 

राज्यपोषित 

एक अत्याचारी वर्ग से।

तुमने इसे छुआछूत कहा 

और हमें ही बना दिया 

अपयश का भागी। 

हर युग में रही है

"चित भी तेरी, पट भी तेरी।"

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

सुना तुमने

वह खड़ा था

अकड़ता हुआ 

अड़ा था

हर किसी की राह में

फिर एक दिन पसर गया

भरभराकर ढह गया

तुमने कहा

भूस्खलन हुआ

हमने कहा

अहंकार का अंत हुआ

सुना तुमने!

वर्जित है 

अति 

सर्वत्र ।

रविवार, 27 सितंबर 2026

सत्ता और सामाजिक समानता

समाज ने समाज का शोषण किया इसलिए समाज में असमानता है, -यह तुमने कहा, कहते ही रहे, जिससे कुछ पीढ़ियों के बाद समाज में तुम्हारा कथन ही स्थापित हो गया। 

यह पूरी तरह सच नहीं था, समाज का एक वर्ग अपराधबोध से भर गया, दूसरा वर्ग प्रतिशोध के लिए उग्र हो उठा। तुम यही चाहते थे -समाज में ध्रुवीकरण, जिसे तुमने उत्पन्न किया, प्रोत्साहित किया और संरक्षित भी किया। 

सामाजिक सत्य यह है कि सत्ता के तत्व अव्यवस्था की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होते हैं, यही स्वाभाविक है । जब अव्यवस्था होती है तभी  लोग किसी सुशासन की अपेक्षा करते हैं। महान सम्राट लोक की इसी अपेक्षा को पूरा करने के प्रयास करते रहे हैं। किंतु यह सत्ता और शासनतंत्र की आदिम स्थिति है। बाद में तो राजपुरुषों और समर्थों द्वारा भय और कुव्यवस्था को ही सत्ता का आधार बनाया जाने लगा। हाँ! सच यही है कि शोषण और अत्याचार का भय दिखाकर सत्ता प्राप्त किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सत्ता प्राप्त होते ही सत्ताधीश जो पहला काम करते हैं वह होता है शोषण और अत्याचार के नये-नये प्रतिमान स्थापित करना। सुशासन का स्वप्न देखने वाली भीड़ को मिलता है कुशासन। 

अपने पूर्ववर्तियों की तरह तुमने भी कभी पूरा न किये जाने वाला समानता का आश्वासन दिया और भीड़ को लूटने में तल्लीन हो गये। भारत ही नहीं, पूरे विश्व में शासन का यही पक्ष अब स्थापित हो चला है जिसका विराट और सर्वाधिक क्रूर स्वरूप है "नयी विश्वव्यवस्था"। 

तुम जिस समानता की बात करते हो वह शुद्ध छलावा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगले लाखों वर्षों में भी तुम्हारी परिभाषाजन्य "समानता" फलीभूत होने वाली नहीं। दुर्भाग्य से भीड़ को स्वप्न में डूबना अच्छा लगता है, उसकी यही दुर्बलता तुम्हारा पथ सरल करती है। 

तुम प्रतिवाद करोगे कि क्यों नहीं हो सकती समानता! तुम मुझे अराजकतत्व और उपद्रवी कहकर दण्डित करने के सारे उपाय करोगे। तुम ऐसा कर सकते हो, फिर भी सामाजिक समानता नहीं ला सकते, कम से कम वैज्ञानिक तो यही कहते हैं। 

हाँ! तुम वैज्ञानिक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद की बात करते हो न! किंतु सच यह है कि वैज्ञानिक भौतिकवाद भी समानता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि स्वयं प्रकृति ही इसे स्वीकार नहीं करती। तुमने भीड़ से भौतिकी का यह सच सदैव ऱछिपाया कि ब्रह्मांड में बाहर से जो समरूपता दिखायी देती है वह वस्तुतः आभासी है, उसके भीतर प्रतिकूलताजन्य अ-समरूपता ही होती है। सृष्टि के सारे विधान और सूत्र प्रतिकूलताजन्य उस अ-समरूपता के ही परिणाम होते हैं। अधिक दूर मत जाइये, अपने भौतिक शरीर की रचना और क्रियात्मकता को ही लीजिए, क्या वहाँ समरूपता (Symmetry) है! क्या एक ही माता-पिता के सभी बच्चों के व्यवहार और क्षमताओं में समरूपता होती है! 

यह जो तुम अपने चारो ओर विविधता देखते हो, क्या समानता होने पर वह संभव है! क्या आरोह-अवरोह के बिना किसी संगीत की कल्पना की जा सकती है! 

मुझे समानताविरोधी समझने की भूल मत कर बैठना। यह तो प्रकृति है जिसके तंत्र में कहीं भी समानता नहीं है। प्रकृति समानता नहीं, संतुलन की अपेक्षा करती है। संपूर्ण सृष्टि का आधार ही संतुलन पर अवलंबित है, समानता पर नहीं। 


संतुलन एक गतिशील व्यवस्था है, जो तुम करना ही नहीं चाहते। तुम तो भीड़ को सपनों में खो जाना सिखाते हो, ताकि उसके श्रम पर डाका डालते रहने में तुम्हें सुविधा हो। तुम्हारे विकास के सारे प्रादर्श छोटी रेखा को बढ़ाने में नहीं, प्रत्युत बड़ी रेखा को क्षतिग्रस्त कर छोटी करने के विनाशकारी सिद्धांत पर आधारित हैं। तुम दोनों रेखाओं के विनाश के कुचक्र कर रहे हो, छोटी को कुंठित कर, और बड़ी को लुंठित कर। यह उन शक्तियों के दुरूपयोग का बलात्कार है जो भीड़ ने तुम्हें प्रदान की हैं। सावधान! प्रकृति का धर्म है संतुलन, जो हो कर रहेगा, तुम्हारे अवसान के साथ। 

बुधवार, 23 सितंबर 2026

केवल उसके लिए

वह लिखता है
न्याय की 
कई परिभाषायें
अलग-अलग रंग के अक्षरों से
जिसकी जैसी जाति
उसके लिए वैसी परिभाषा।
ईश्वर का श्राप 
लगे तो लगे
कैसे भी करके
राजसिंहासन तो मिले।

अचंभित हैं जातियाँ
कोई हँसती हुयी
कोई रोती हुयी
अचंभित सभी हैं।   
उन्हें इस्तीफा चाहिए
क्योंकि एक ने 
नकल होने दी
उन्हें फिर इस्तीफा चाहिए
क्योंकि दूसरे ने 
नकल नहीं होने दी
उन्हें अधिकार है 
इस्तीफा माँगने का
क्योंकि यह अधिकार 
उन्हें दिया है
उनके बाबा ने 
और वे हैं
अपने बाबा के 
अपने नानबायोलाॅजिकल के
अपने परमपूज्य मोहन के
दुलारे
और नकचढ़े
तिलचट्टे।

कब तक

आई आई टी मुंबई है
एक खेत 
जिसमें बोता है बीज
एक समर्पित वैज्ञानिक
एक समर्पित शिक्षक
जिसे बाध्य कर देती है 
तुम्हारी कुव्यवस्था
तुम्हारी कुराजकता
पलायन के लिए
कहीं दूर।

दादी ने बताया था
राजहठ से
रूठ जाया करती है
खेत की मिट्टी
बीज
और मेघ भी।
ग्रहण लग जाता है
खेत की उर्वरता को
अब कोई बीज 
नहीं उगेगा वहाँ
पहले की तरह
यह सब जानकर भी 
हठ नहीं छोड़ना चाहते तुम!

खींचकर सारा सत्व
हर बायोलाॅजिकल से
शनैः शनैः बनाते जा रहे हो तुम 
सब कुछ 
नानबायोलाॅजिकल 
क्या करोगे
इतने बंजर खेतों का! 
अचंभित है विश्व
इतनी निर्लज्जता ओढ़कर
कैसे जी लेते हो तुम!
सूर्य को ओढ़ाकर 
बादलों के लबादे
कब तक बंदी रखोगे तुम!

शनिवार, 19 सितंबर 2026

खेला ही खेला

वे बनाते हैं

जातियाँ

कोई ऊँची, कोई नीची

कोई बहुत नीची, कोई सबसे नीची

फिर करते हैं प्रोत्साहित

कि बहे 

सुगंधित समीर 

"नीची" से "ऊँची" 

और "ऊँची" से "नीची" 

जातियों के बीच

करते हुये नृत्य

जैसे बलिया की 

लहरिया वाली नचनिया

या बनारस की 

बलखाती बाई जी । 

यह एक 

बहुत राजप्रिय खेल है 

जिसमें हैं

बादशाह, बेगम, गुलाम 

और एक भीड़

संख्याओं की 

एक से दस तक 

पर आवश्यक नहीं

कि सर्वशक्तिमान हो बादशाह, 

या बेगम ही

यह तो हो सकता है 

कोई गुलाम भी

या हुकुम की दुग्गी भी।

हम सब हैं

उपकरण

उनके हर खेला के

हम सब हैं

पक्षविहीन 

पंछी बस नाम के। 

इस बार तुरुप का पत्ता 

डाल कर उबाल दिया गया है

चाय की गंदी गंजी में 

और फिर 

हर पत्ता भी तो नहीं होता

चाय का पत्ता

फिर भी

पी तो रहे ही हैं

हम भी, तुम भी

और सरकार के सचिव भी । 


एक खेला और भी है

वे खोदते हैं 

खाइयाँ

गहरी, बहुत गहरी

कुछ इस तरह 

कि बन जाते हैं पर्वत 

ठीक खाई के पार्श्व मेंं

इतने ऊँचे

कि हो जाते हैं वे 

दुर्गम

और अलंघ्य

कोई नहीं जा सकता

इधर से उधर

और उधर से इधर, 

फिर प्रारंभ होती हैं 

योजनाएँ

स्वीकृत होती हैं धनराशियाँ

जिससे कि सुगम हो आवागमन

इधर से उधर

और उधर से इधर

किये बिना समतल

खाइयाँ और पर्वत

वे इसे ही कहते हैं

समानता, सामंजस्य, 

लोकहितकारी योजना,

विकास...

और भी बहुत कुछ।


और हाँ! 

भोजन में तेल कुछ कम कर देना 

जिससे बचा सको 

कुछ तेल

जलाने एक दिया

मेरे जन्मदिन पर।  

बुधवार, 16 सितंबर 2026

तो और कौन

अंधभक्ति में नीरक्षीर विवेक का कोई स्थान नहीं होता, एक धारणा होती है, जिसके लिए हठ होता है, और यह सब सर्वोपरि माना जाता है। 

वैचारिक परिमार्जन होता है पर हर किसी में हो, यह आवश्यक नहीं। यह संस्कारों और सत्यनिष्ठा पर निर्भर करता है। मैं संघसाहित्य से प्रभावित रहा इसीलिए संघियों की कई अक्षम्य दुर्बलताओं के बाद भी संघ से जुड़ा रहा पर अंततः एक घटना के कारण संघ को सदा के लिए नमस्कार कर लिया। यही स्थिति भाजपा के संबंध में भी रही। अब ग्लानि हो रही है कि जीवन के सत्तरवें दशक तक भाजपा का भक्त क्यों बना रहा! यदि आप स्वाभिमानी, और सच्चे सनातनी हैं तो सदा चिंतनशील रहेंगे और यही वह तत्व है जो आपको हर विकृत व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति के लिए प्रोत्साहित करेगा। आज संघ और भाजपा के वर्तमान स्वरूपों में इन दोनों ही तत्वों का अकाल पड़ गया है। 

कुछ एकांगी सोच के लोग उत्तेजित हो रहे हैं, मोदी नहीं तो और कौन? क्या राहुल को बना दें प्रधानमंत्री! देश को हजारों साल बाद मिला है कोहनूर, इसे खो दिया तो हिंदुत्व की पहचान तक मिट जाएगी। 

श्रीराम और श्रीकृष्ण के बाद भी भारत रहा, आज भी है, आगे भी रहेगा। मोदी भले ही नानबायोलाॅजिकल और विष्णु के अवतार हों पर वह अमर नहीं हैं। एक दिन सबकी तरह उन्हें भी मरना है, तब क्या भारत समाप्त हो जाएगा? 

अंधभक्तों के कुतर्क नितांत मूर्खता के परिचायक हैं। यह न तो राष्ट्रभक्ति है और न सनातनभक्ति । इस सबके विरुद्ध स्वर तो उठने ही चाहिए।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

कालनेमि कभी नहीं मरता

प्रतिकूल स्थितियों में कालनेमि छिप जाते हैं, मरते नहीं। यही प्रवृत्ति माइक्रोब्स की भी होती है। हम सदा माइक्रोब्स से घिरे रहते हैं। इनकी सही पहचान या इन्हें पहचानने की भूल ही हमारा भविष्य तय करती है। 

भाजपा अपने जन्म से ही श्रापित है, जब सत्ता के लिए जनसंघ को नेपथ्य में धकेलकर कांग्रेसीकरण के सिद्धांत के साथ कुछ चालाक लोगों ने हिंदुओं पर मोहिनी डालने की कमान सँभाली थी। हिंदूराष्ट्र का सपना दिखाकर भाजपा ने हिंदुओं के साथ विश्वासघात का नया कीर्तिमान स्थापित करने में सफलता पाई है। देश के बुद्धिजीवी भी भाजपा के भँवरजाल में फँसते गये और अपने सर्वनाश को आमंत्रित करते रहे। पर अब भलीभाँति घायल होने के बाद हिंदुओं का नीरक्षीर विवेक जाग्रत हो गया है और भाजपा एवं कांग्रेस मुक्त भारत का रुझान स्पष्ट होने लगा है।

स्मरण कीजिए, आपातकाल के बाद चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध जो भी खड़ा हुआ वही जीत गया। तब सुपात्र और कुपात्र का भेद समाप्त हो गया था। माना कि वह विरोध और घृणा के चरम का परिणाम था पर उसका परिणाम भी ठीक अगले चुनाव में दिखाई पड़ गया। इंदिरा ने वापस सत्ता सँभाली। अब वैसा ही इतिहास किंचित और परिशोधन के साथ दोहराए जाने के लिए तैयार है। न कांग्रेस, न भाजपा, इस बार नया प्रयोग भारतीय मतदाता की परिपक्वता का परिचय देने की दिशा में प्रवृत्त हो चुका है जो नया विकल्प बनेगा। 

जय हिंदूराष्ट्र !

ब्राह्मण की बेटी गोया गेहूँ की लेवी

ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का विवाह दलितों से करने की बाध्यता का विधान। 

एक समय ऐसा भी था जब गेहूँ पर किसानों को लेवी देनी होती थी। लेवी यानी गेहूँ की कुल उपज का एक निश्चित भाग सरकार को सरकारी मूल्य पर बेचने की बाध्यता। बाजार मूल्य उससे कुछ अधिक होता था। अब ब्राह्मणों की बेटियों पर वैवाहिक लेवी की माँग उठ रही है। ब्राह्मण की बेटी न हुई, गेहूँ की उपज हो गई। 

जो ब्राह्मण इस माँग से व्यथित और अपमानित अनुभव कर रहे हैं उन्हें सोशल मीडिया पर गोलीबारी दी जा रही हैं और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमनियाँ भी दी जा रही हैं। यह कश्मीरी पंडितों वाला प्रारूप है। 

लोग मानते हैं कि देश में बढ़ते हर पाप के लिए वर्तमान सत्ता नहीं, बल्कि केवल विपक्ष ही दोषी है। विघ्नसंतोषी लोग नहीं चाहते कि मोदी को विष्णु के अवतार के रूप में भगवान मानकर सुस्थापित किया जाए। 

ब्राह्मणों और दलितों के बीच वैवाहिक संबंधों के विषय में मैं प्रायः वैज्ञानिक तथ्यों के साथ लिखता रहा हूँ। विचारणीय है कि अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह के लिए सरकारें क्यों प्रयासरत हैं? जबकि धर्मांतरण और जातीय व्यवस्था के पीछे सरकारों की ही चालें रहती हैं। कुछ-कुछ समयान्तराल पर नये वर्ग और नयी जातियों का सृजन करने वाली सरकारें सारा दोष ब्राह्मणों पर थोपकर जाति उन्मूलन का सपना दिखाने में भी सबसे आगे रहती हैं? यह शुद्ध डायलिमा है, यानी लोकतांत्रिक व्यभिचार।

पहली बात तो यह कि जातियाँ किसी ने नहीं बनाईं, न पंडितों ने, जैसा कि मोहन भागवत ने दुष्प्रचार किया है, और न ईश्वर ने, जैसी कि लोगों में धारणा है। जातियाँ राजा तय करते रहे हैं, और वे लोग भी जिन्हें व्यावसायिक वर्चस्व की इच्छा रही है, यथा केरल के कन्नाड़ी निर्माता, जिन्होंने व्यावसायिक वर्चस्व के लिए गोपनीयता बनाये रखी। व्यवसाय हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं। और जीवनशैली कुछ अन्य घटकों के साथ मिलकर जेनेटिक परिवर्तन के कारण बन जाते हैं, यही कारण है कि सवर्णेतर समुदाय की कई जातियों में हीमोग्लोबिनोपैथी विकसित हुई जो अचिकित्स्य है। वंश परंपरा से चलने वाली इन व्याधियों की विश्व में कहीं कोई सफल चिकित्सा नहीं है। सरकारों से प्रभावित मेडिकल साइंस ने इसका दीर्घकालीन उपाय बताया है "अंतर्जातीय विवाह", जो मेरी समझ में आज तक नहीं आया। यह वैसा ही जैसे किसी की दारू छुड़वाने के लिए ख़ुद भी उसके साथ बैठकर दारु पीने लगना। सवर्ण द्वेषी और सनातन (हिंदू) विरोधी सरकारें चाहती हैं कि सवर्ण भी इस व्याधि से पीड़ित हों जिससे कुछ नहीं तो समाज में व्याधिक समानता ही लाई जा सके। यानी, मूर्ख को विद्वान नहीं बना सकते तो विद्वान की भ्रूणहत्या तो कर ही सकते हैं जिससे सामाजिक श्रेष्ठता की सारी प्रायिकतायें और संभावनाएँ समाप्त की जा सकें।

अब जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से भारत और शेष विश्व में हीमोग्लोबिनोपैथी से प्रभावित होने वाली जातियों के बारे में पूछ सकते हैं। 

सारांश यह कि समाज में हर तरह की विषमताओं के लिए विभिन्न घटक उत्तरदायी होते हैं जिसमें परिस्थितिजन्य समझौते और जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सत्य है जिसे झुठलाने का कोई दुष्ट प्रयोजन ही हो सकता है। 

कुछ आरक्षित लोगों ने तो माँग कर दी है कि उन्हें ब्राह्मणों की बेटियों से विवाह में आरक्षण दिया जाय। यानी आरक्षित विधानसभा/लोकसभा सीट की तरह ब्राह्मणों को अपनी बेटी आरक्षित कोटे से ब्याहने की बाध्यता। यह भी एक तरह का जजिया कर है। "मोदी द ग्रेट विष्णु अवतारम्" उनकी यह माँग पूरी कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करके एक और महानता के आत्मबोध में डुबकियाँ लगाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। वे तो चाहते हैं कि भारत से सवर्णों का उन्मूलन होना ही चाहिए। 

रविवार, 13 सितंबर 2026

कृत्रिम बौद्धिकता और जातीय संघर्ष

कृत्रिम बौद्धिकता कितनी बौद्धिक?

एलन मस्क और सैम आल्टमैन ही नहीं, एआई शोधकर्ता जैकब काॅक्सन और एआई चीफ़ डारियो अमोदेई भी एआई की उल्लेखनीय सफलता के बढ़ते परिणामों के प्रति सशंकित हैं। अब यह शिक्षित युवकों के स्वावलम्बन को छीनने तक ही सीमित नहीं है, अपितु उससे कहीं बहुत आगे बढ़कर मानव सभ्यता के एक बार फिर प्रलयलीन हो जाने की आशंकाओं में परिवर्तित होता जा रहा है। 

हाँ! यह हो सकता है, जब महापंडित रावण अविवेकी हो सकता है तो एआई क्यों नहीं! एआई पर काम करते समय वैज्ञानिकों ने बौद्धिकता और विवेकशीलता में तालमेल का कोई प्रयास नहीं किया। वास्तव में कृत्रिम बौद्धिकता के आगे विवेकशीलता को कोई भाव ही नहीं दिया गया। अब यही चूक, या कहिये मदांधता भारी पड़ रही है। 

अब स्थिति यह है कि हम बड़ी द्रुति गति से मानव सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समाप्त करने की दिशा में बढ़ चुके हैं।

जातीय संघर्ष की भेंट चढ़ता भारत!

जातीय गालियाँ, घृणा और असहिष्णुता की पराकाष्ठा की भारत में बाढ़ आई हुई है। यही सब देखने के लिए उड़न खटोले पर आरुढ़ हवा में तैरता "मोगैम्बो ख़ुश ही नहीं, बहुत ख़ुश" हो रहा है।

नैतिकता और नैष्ठिकता के पराभव का लक्ष्य ही आसुरी स्वप्न है, और इसके लिए आवश्यक है अराजकता को हर तरह से प्रश्रय देना। वही हो रहा है। दूर-दूर तक कहीं कोई विश्वामित्र और संदीपन दिखाई नहीं देता, कोई राम और कृष्ण भी नहीं दिखाई देते, राक्षसी शक्तियाँ प्रचंड होती जा रही हैं, और मीलाॅर्ड मौन के दीर्घकालीन हाइबरनेशन में चले गये हैं। अब जो करना है वह गिलहरियों को ही करना होगा।

मित्र-शत्रु बोध

न मित्र, न शत्रु केवल अवसर की ताक।

कोई किसी का मित्र नहीं, कोई किसी का शत्रु नहीं, हर कोई हर किसी का मित्र है, हर कोई हर किसी का शत्रु है। महत्वपूर्ण है अवसर और उसके नेपथ्य में पल रही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा। यही धरातलीय सत्य है।

अमेरिका ही नहीं, कोई भी देश, न किसी का मित्र है, न शत्रु। हर कोई अपने वर्चस्व के लिए अवसर की ताक में घात लगाये बैठा है। हर कोई ओट्टोमन साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य की तरह वैश्विक साम्राज्य बनाना चाहता है। 

अरब चाहता है कि हूतियों पर अंकुश लगाने में अमेरिका सहयोग करे पर ट्रंप ऐसा नहीं चाहता।                    अमेरिका और इज्रेल के सपने बहुत बड़े हैं। इस्लाम विभिन्न देशों में घुस कर फैला हुआ अपने आप में एक "साम्राज्य" है। घात-प्रतिघात चल रहे हैं। कोई अस्तित्व छीन रहा है, कोई अस्तित्व बचा रहा है।   

इस सबमें भारत कहाँ है??? 

भारत और भारत की सरकार जातीय और धार्मिक स्वयंभू ठेकेदारों के हाथों में खेल कर ही आत्ममुग्ध है। हम तो ठहरे व्यापारी, विश्वगुरु बनने के सपने बेचते रहे, 

...जबकि सचमुच ऐसा कोई सपना कभी था ही नहीं।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

लाठी

अँगुली उठा सकते हैं 

एक मीलाॅर्ड

दूसरे मीलाॅर्ड पर

पर इस अधिकार पर 

नहीं है कोई अधिकार 

जनता का ।

कटुतम आलोचना कर सकते हैं

एक माननीय

दूसरे माननीय की 

पर इस अधिकार पर भी 

नहीं है कोई अधिकार 

जनता का ।


पोर्न गालियों की बौछार से 

कर सकता है सराबोर

एक स्वेच्छाचारी

दूसरे स्वेच्छाचारी को

और इस अधिकार पर भी 

नहीं है कोई आधिकार

जनता का

क्योंकि जनता सब जानती है

और जो सब जानता है

वह बना रहता है 

आँख की किरकिरी

हर किसी की

लोकतंत्र का यही धरातलीय सत्य

अपराध होता है

जब-जब

बनता है सम्राट

कोई नितांत बायोलाॅजिकल

अचानक नानबायोलाॅजिकल। 

अधिकार

नहीं होते समान

होते हैं

तेरे-मेरे 

अलग-अलग

बस, लंबी होनी चाहिए

लाठी। 


 


बुधवार, 9 सितंबर 2026

छुआछूत

निर्धन सदा सामाजिक दुर्बल

ऐश्वर्यशाली सदा सबल

सबल में प्रभुता 

निर्बल में दीनता

यही है 

लोकव्यवहार का कठोर धरातल

जो किसी आदर्श से 

नहीं होता भयभीत

दिखाता है ठेंगा

हर युग के सुदामा को।


तुम 

होकर भी सबल

करते रहे ईर्ष्या

और खोदते रहे खाइयाँ

अपने और सुदामा के बीच।

सुदामा बचता रहा

दूर भागता रहा

तुम्हारे अत्याचारों से

तुम्हारी परछाई से

तुमसे 

तुमने इसे छुआछूत कहा 

जातीय घृणा कहा 

और फिर मढ़ दिया 

एक और आरोप।

क्या सचमुच जातीय आरोप

या तुम्हारे अत्याचारों से बचने का 

एकमात्र 

विवश उपाय भर !

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

राजहठ

आदेश है

कि लोग सोचें

केवल तुम्हारी तरह

रहें 

केवल तुम्हारी तरह

जियें भी

तो केवल तुम्हारी तरह

क्योंकि तुम बनाना चाहते हो 

विश्वगुरु

पता नहीं 

स्वयं को 

या पूरे देश को!

किंतु मैं

नहीं बनना चाहता विश्वगुरु

बनकर

तुम्हारा वैचारिक दास।

संभव ही नहीं है 

सच हो पाना 

तुम्हारा हठ।

तुम इसे ही कहते हो

लोकतंत्र

मैं इसे ही कहता हूँ

आॅब्सेसिव कंपल्सिव बिहैवियर

जिसके लिए जाना होगा तुम्हें

किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास

हाँ!

तुम रुग्ण हो

जान चुका है पूरा देश।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

निसर्ग में

निसर्ग में देखी है किसी ने 
कोई व्यवस्था
किसी आरक्षण की!
 
नहीं उगता धान
किसी मरुस्थल में
वह चिल्लाया-
हम पाँच करोड़ साल से प्यासे हैं
हमें देना ही होगा 
शस्य श्यामला का आरक्षण।
बबूल भी बोले-
इतने सुंदर सुरभित पुष्प
तरुणी को ही क्यों
हमें क्यों नहीं?
काँटों भरी तन्वंगी 
छुईमुई क्यों रहती पीछे
वह भी भुनभुनाई-
हमारे साथ भेदभाव होता है
हमें तो कोई छूता भी नहीं
हम दलित हैं
हमें सुकोमलता और सौंदर्य का
आरक्षण दो कमल सा।
मादा तिलचट्टी क्यों रहती पीछे
उसने माँग की- 
हमें तो शिव के नंदी से ब्याह करना है।
दादर रेलवे स्टेशन पर घूमते 
मोटे धूँस ने भाषण दिया-
जब तक नहीं होगा 
हमारा पाणिग्रहण
स्वर्ग की कामधेनु से
समानता नहीं आ सकती ब्रह्माण्ड में। 
सारी सुविधाएँ स्वर्ग में क्यों
नर्क में भी क्यों नहीं!
उधर दहाड़ा
अंतरिक्ष में विचरता
धूमकेतु आवारा-
हमें भी चाहिए आरक्षण
जैवविविधता का
सारी विविधता पर
धरती का ही आरक्षण क्यों?
पूरे ब्रह्माण्ड में 
होड़ लगी थी 
कुछ न कुछ माँगने की
कृष्णविवर ने भी माँग की
जिसकी जितनी शक्ति भारी
उसकी उतनी हिस्सेदारी 
हमारा गुरुत्वाकर्षण सर्वाधिक है
हमें भी मिलना चाहिए
सूर्य सा सम्मान
और सृष्टि का अधिकार।

ब्रह्मा जी बोले-
जिस दिन मिल जाएँगे सबको
सारे अनधिकृत अधिकार
ब्रह्माण्ड बन जायेगा
लोकतांत्रिक भारत के
सरकारी प्रकल्पों सा
और तब 
रौद्र नृत्य करना होगा
नटराज को, 
देखना चाहोगे !

रविवार, 6 सितंबर 2026

स्वर्णमूर्ति

आगे बढ़ना
हिमालय पर चढ़ना होता है
जिसके लिए उतारने होते हैं
एक-एक कर अपने सारे बोझ।
आगे की यात्रा 
शून्य की यात्रा है
संकुचित से विराट की यात्रा 
जहाँ सब कुछ 
छोड़ देना होता है एक-एक कर
और तुम 
मंदिर बनवा रहे हो
ताकि स्थापित हो सके 
तुम्हारी स्वर्णमूर्ति!
भगवान बनने का 
ऐसा ही अदम्य दुस्साहस
हिरण्यकश्यप ने भी किया
दशानन ने भी किया
और अब तुम भी कर रहे हो
उपेक्षा कर इस सत्य की भी
कि प्रतिपल बनते इतिहास में
लिखा जा रहा है सब कुछ।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

राजा सड़ा क्यों

यदा यदा हि धर्यस्य ग्लानिर्भवति भारत!

पढ़ा था 

गुना नहीं

रोटी जली क्यों...

घोड़ा अड़ा क्यों...

सुनी थी कहावतें

कभी गुनी नहीं

इसीलिए कभी सीखा नहीं

कि जो बात-बात पर अड़ता है 

वह कभी चलता नहीं

इसलिए फेरना आवश्यक है

रोटी, घोड़ा 

और राजा भी।  


हवायें ऐसी बहीं

कि बोझ बढ़ता गया 

सूचनाओं का

मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर

इतना... कि

वह नहीं रख सका संबंध

विवेक और हृदय से...

मन तो पहले ही उड़ा ले गई थीं

उष्ण

पछुआ हवायें।


तिवारी परिवार जी उठा है फिर

मरा नहीं कोई

नीलमणि तिवारी का बेटा

चाय बेचने लगा है

और बेटी

पकौड़े तलने लगी है

गर्व है योजनाकारों को 

कि देश की प्रति व्यक्ति आय 

बढ़ने लगी है।

अपराधी से सारथी बने लोग

देश के स्वामी बन गये हैं

और उनके नौनिहाल 

पढ़ने लगे हैं

सात समंदर पार

गोरों के देश में, 

लौट कर आएँगे जब

शिक्षा मंत्री बनेंगे भारत के 

और कहेंगे

बाबा साहब के दिए अधिकार से 

पढ़ सका बाहर जाकर

वरना तुमने तो पीने नहीं दिया पानी

पाँच हजार साल से।


बधाई हो!

नीलमणि तिवारी को भी 

मिल गई है नौकरी

दानापुर के सुलभ शौचालय में

सुदामा!

और कितनी प्रगति चाहिए तुम्हें!


बुधवार, 2 सितंबर 2026

विदाई

जो आया है सो जाएगा

तुम्हें भी जाना है

पर नहीं सोचा था

इस तरह जाना चाहते हो तुम 

अपनी दुर्गति के साथ

गालियों, तिरस्कार और अपमान के साथ।

तुम नहीं झुके

जहाँ झुकना था

तुम झुकते रहे

जहाँ कभी नहीं झुकना था।


तुमने 

सम्मान किया पोर्नगालियों का

तिरस्कार किया सम्मान का

भंजन किया भरोसे का

इसलिए 

हमारे लिए तो 

हर पल मरते रहे हो तुम।


थाली के बैंगन से

तुम लुढ़कते रहे 

इधर से उधर और उधर से इधर।

निष्प्रभावी रहे 

हमारे अनुनय, विनय, 

अनुरोध और प्रशंसा...

तुम 

स्वेच्छा से पिछड़ते गये

बड़े गर्व से गिरते गये 

सामान्य से अतिदलित तक,

और घिरते गये

अपने ही शब्दों से

अपनी ही परिभाषाओं से।

ओढ़ते रहे खोखली रजाइयाँ

होते रहे आत्ममुग्ध

अपनी ही बनी उपाधियों से। 


जन्मना हो तुम भी 

हमारी तरह

अजन्मा 

कैसे हो गये?

जाओ

हम विदा देते हैं तुम्हें

अब मत आना कभी

लौटकर

इस धरती पर।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

सत्ता और संविधान

व्यापारी ने व्यापारी से युद्ध किया

व्यापारिक, 

व्यापारी हारा, व्यापारी जीता

व्यापार की मृत्यु हुई।

व्यापारी ने दास बनाया

पूरे देश को

व्यापारी ने सत्ता संभाली 

पूरे देश की

नाम रखा "ब्रिटिश इंडिया"।

फिर क्रांति के लिए बजी

रणभेरी

हिंसा हुयी

कुछ मारे गये

कुछ ताक में थे

अवसर की,

नाटक किया स्वतंत्रता संग्राम का

लिख लिया अपना संविधान

करते हुये अनुकरण

विदेशी संविधानों का

जिसमें नहीं होता कुछ भी 

देशी।

सत्ता गई, सत्ता आई 

पर क्रांति नहीं हुई

सत्ता परिवर्तन हुआ। 

गोरों के चाबुक 

ले लिए कालों ने, 

पहले देश परतंत्र था

फिर प्रजा परतंत्र हुई। 

व्यापार आज भी रहता है

सत्ता के केंद्र में।

सारी नीतियाँ

सारे विधान

सारी व्यवस्था

रहती है

व्यापार केंद्रित।

तुमसे छीने गये 

तुम्हारे कुटीर उद्योग

छीना गया व्यापार

और थमा दिये गए

व्यापारिक दक्षता के नाम

बना कर जातियाँ

जो पिछड़ती गईं

खोती गईं अपना अस्तित्व

होते हुये रूपांतरित

वैश्य और शूद्र से

दलित

अतिदलित

और महादलित तक। 

व्यापार 

आज भी है

सत्ता के केंद्र में।

बड़े-बड़े प्रधानमंत्री

होते हैं नतमस्तक 

सम्राट 

रोटे शील्ड और 

व्यापारी

वास्को द गामा और  

शी जिन पिंग के समक्ष।

संविधान 

लिखे जाते हैं

इन्हीं के लिए।

राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ और हिंदू

 मोहन भागवत कहते नहीं थकते कि "हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवनशैली है"। 

बृहस्पति आगम के अनुसार "हिमालय से हिंदमहासागर तक का भूभाग हिंदु-स्थान है"। 

इस भूभाग के निवासी "हिंदुओं" की जीवनशैली, जीवनमूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं में मौलिक समानतायें होनी चाहिए। क्या सचमुच समानतायें हैं?

माना कि रिलीजन "धर्म" का पर्याय नहीं, और "हिंदू धर्म" जैसी कोई अवधारणा वेदों में नहीं है। पर "वैदिक धर्म" तो है न! कालांतर में यही वैदिक धर्म "सनातन धर्म" और "हिंदू धर्म" के नाम से लोकव्यवहार में जाना जाता रहा है। संघ धर्म को लेकर इतना हठी और अविवेकी क्यों है? हिंदू को यदि आप भौगोलिक परिचय मानते हैं तो स्पष्ट है कि भारत में केवल हिंदू समुदाय ही रहता है जिनमें से कई लोग वैदिक धर्म को नहीं मानते। तब वे क्या मानते हैं? वे "जो" मानते हैं उसे तात्विक दृष्टिकोण से धर्म नहीं, रिलीजन कहा जाता है। रिलीजन और धर्म के इस अंतर से स्पष्ट है कि विश्व में केवल दो ही समुदाय हो सकते हैं, एक धर्मपरायण और दूसरा रिलीजनपरायण। इन दोनों में कई असमानतायें हैं जिसके कारण उपद्रव दिखाई देते हैं। क्या  हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध आदि जीवनशैलियाँ भारत में व्यवहृत नहीं हैं? तब "हिंदू" भौगोलिक परिचय और "हिंदू जीवनशैली" में समानता होनी चाहिए जो कि नहीं है। अर्थात भारत के कुछ लोग धार्मिक हैं और कुछ लोग धार्मिक न होकर रिलीजियस हैं, और इनमें परस्पर विद्वेष एवं प्रतिकूलताएँ भी हैं जिनके हिंसक परिणाम हम सब देखते और भोगते रहते हैं। 

संघ और भाजपा के पास  समावेशिता और समानता जैसे कुछ शब्द हैं जो एक नया बखेड़ा खड़ा करते हैं और हम अंततः समाज को असमाधान की स्थिति में ही पाते हैं। 

संघ और भाजपा सत्य से भागकर एक स्वैच्छिक कल्पना को सत्य बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसने समाज में असमानता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन्हें स्वीकार करना होगा कि असमानता पूरे विश्व का सत्य है जिसे समाप्त नहीं, नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

पुराकथा भवितव्यता

पुराकथा यह है कि जब-जब धर्म की हानि (धर्म के अनुयायियों की संख्यात्मक और गुणात्मक न्यूनता) होती है तब-तब समाज में क्रूरता, अत्याचार और अपराधों की वृद्धि होती है। छोटे अत्याचारी भी बड़े अत्याचारियों से त्रस्त होने लगते हैं। हर कोई अभिमानी और स्वयं को ईश्वर मानने लगता है, ठीक हिरण्यकश्यप की तरह, नानबायोलाॅजिकल सा। यह वैचारिक और सामाजिक असंतुलन की पराकाष्ठा है जिसका अंत सुनिश्चत है। जगत के संचालन का यही कालक्रम (क्रोनोलाॅजिकल आॅर्डर) है, द सो काल्ड न्यू वर्ल्ड आॅर्डर। भारत सहित विश्व भर में व्याप्त इन सभी व्याधियों की यही प्रोग्नोसिस है।

रावण तो अपने काल का प्रकाण्ड विद्वान था, कई विषयों में पंडित, आविष्कारक और शोधकर्ता भी। किंतु उसके अहंकार ने उसे धर्मच्युत किया और फिर उसका अंत भी किया। रावण, दुर्योधन, ओट्टोमन साम्राज्य के सुल्तान आदि से लेकर ओसामा बिन लादेन तक हर अधर्मी का अंत होता रहा और हर युग का कुशासन अपने उत्तरकालीन सुशासन से स्थानापन्न किया जाता रहा। इस बार भी यही पुरानी कहानी अपनी पुनरावृत्ति के लिए नेपथ्य के गहन अंधकार में तैयार हो रही है। धर्म, जाति, वर्ग,भाषा आदि के आधार पर समाज को बाँटने और सत्ता हथियाने वालों का भी अंत होना ही है। परमशक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्थाई और अंतिम नहीं होता। तुम्हारा संविधान तो कदापि नहीं। 

बड़े गर्व से तुम जो संविधान रचते हो, उसका उल्लंघन भी तुम्हीं करते हो, फिर छल करके उसमें संशोधन भी करते हो। जो सच्चे लोग तुम्हारे रचे संविधान के अनुरूप चलते हैं वे कष्ट भोगते हैं, जो तुम्हारे संविधान की प्रतिपल धज्जियाँ उड़ाते हैं वे ऐश्वर्य भोगते हैं। किंतु प्रकृति रचित अलिखित संविधान में कोई संशोधन नहीं होता, वह निर्दुष्ट है इसलिए अपरिवर्तनीय है। उसे हर किसी को मानना ही होगा। 

प्रकृति और समाज का अपना पृथक धर्म होता है, जिसका पालन अनिवार्य है। कालक्रम से इसमें शिथिलता आती है पर वह स्थाई नहीं होती। जो प्रतिलोम हो जाता है उसे अनुलोम होना ही होता है। यह तुम्हारा रचित संविधान नहीं, प्रकृति का निर्दुष्ट और अक्षुण्ण संविधान है जो वैश्विक है, सनातन है, हर किसी के लिए सर्वोपरि है।

जिन्होंने हर तरह के पाप और क्रूरता को ईश्वर का आदेश प्रचारित कर निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता को ही धर्म कहना प्रारंभ कर दिया है, वे सब भी अपने अंत की ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति भी संतुलन साधने में लगी हुई है। 

...तो क्या अनुकूल काल की प्रतीक्षा करें! नहीं, यह भी नहीं, कर्म करना भी प्राकृतिक धर्म का अपरिहार्य अंग है। हम गहन तिमिर में छटपटा रहे हैं, भोर होने तक प्रतीक्षा करनी होगी। तमस से ज्योति की ओर... ! यजन तो करना ही होगा न!

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

जातीय समीकरण और सत्ता

 -जातिवाद मुर्दाबाद! जातीय जनगणना जिंदाबाद

-जिसकी जितनी संख्या भारी (अंकसूची छोड़कर), उतनी उसकी भागीदारी (सत्ता और शासकीय सेवाओं में)!

-तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते मारने के लिए उनकी पहचान और संख्या का पता होना आवश्यक है, इसलिए जातीय जनगणना आवश्यक है। 

-सत्ता और शासकीय सेवाओं में भागीदारी के लिए, गुणवत्ता नहीं संख्याबल चाहिए इसलिए जातिवाद का स्थायी होना आवश्यक है। 

-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की बेटियों का शुद्धिकरण (यौनप्रक्षालन) करने और उनसे विवाह करने के लिए जातिवाद का होना आवश्यक है।

-तिलक-तराजू-तलवार को गालियाँ देने, उन्हें मारने-पीटने, उनकी हत्या करने और उन पर एस.सी. एस.टी. अपमान का आरोप लगाकर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि लेने और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमकी देने के लिए जातिवाद की खाइयाँ और भी गहरी करना आवश्यक है।

-ये सब समाज की नहीं, दूषित और भ्रष्ट सत्ता की आवश्यकतायें हैं। इसीलिए क्षतिपूर्ति राशि के आकर्षण को इस तरह परोसा जाने लगा कि एस.सी.एस.टी. एक्ट भारतीय जनता के लिए अफीम बन गया। उसकी पिन्नक सिर चढ़ कर ध्वजारोहण करती है। आरक्षित वर्ग के अपमान को तौलकर उसका मूल्य तय किया जाने लगा, ताकि धन से उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।

-अपमान की क्षतिपूर्ति! यह एक नयी अवधारणा है, नैतिकमूल्यों का मूल्यांकन धनराशि की संख्या पर आकर ठहर जाता है। उसकी इतनी ही गति है।

-सिंहासन तक पहुँचने और फिर उसे दृढ़ता से पकड़े रहने के लिए जातीय समीकरण का गणित लगाते रहना कूटनीतिज्ञों के लिए सरलतम मार्ग होता है।

-कूट/छल नीति का राजनीति से नहीं, अराजकता से संबंध होता है। यह बात उनकी समझ में अच्छी तरह आती है जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और श्रीराम के आदर्शों को सत्ता और समाज दोनों से निरंतर दूर रखा। 

गालीप्रेमी भजनद्वेषी

जेन-जी लड़कियों ने मोदी और उनकी माँ को पोर्नगालियाँ दीं तो सरकार प्रसन्न होकर उनके सामने नतमस्तक हो गई, स्वयं प्रधानमंत्री ने गालीबाजों को गले से लगाने की इच्छा प्रकट की। इसके कुछ ही दिन बाद हनुमान चालीसा का भजन करती युवाओं की भीड़ से रामभक्त होने का पाखंड करने वाली सरकार इतनी कुपित हुई कि गृहमंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस को हिंसा के लिए आदेशित कर दिया गया। 

देश ही नहीं विश्व भर में विश्वगुरु के इस संदेश ने लोगों को हतप्रभ कर दिया। आपातकाल की घोषणा किये बिना दिल्ली में आपातकाल लगा दिया गया। इस अघोषित आपातकाल के लिए भाजपा और मोदी को इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। 

जातिगतआरक्षण, अत्याचारमूलक यूजीसी बिल और जातीय उत्पीड़न को समाप्त करने की याचना के साथ पूरे देश से उमड़ी भीड़ स्वतंत्र भारत का सच्चा मुक्तिआंदोलन है जिसके दमन के लिए संघ के वैचारिक आक्रमणों और भाजपा के हिंसक दमन ने देश भर को हतप्रभ कर दिया है। 

जंतर-मंतर पर युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हनुमान चालीसा का भजन करती भीड़ पर पुलिस की लाठियों के प्रहार ने घोषित कर दिया है कि राममंदिर और हिंदुत्व की बातें भाजपा और संघ के अलतकिया से अधिक और कुछ नहीं था। 

सत्य और नैसर्गिक न्याय की याचना करते भूलुंठित युवाओं पर मोदी सरकार की पुलिस के क्रूर प्रहारों, प्रदर्शनकारी पंडित पंकज धावरिया को बंदी बनाने के बाद चलती गाड़ी से नीचे फेंककर जातिसूचक गालियाँ देते हुये दिल्ली पुलिस की यातनाओं से भयभीत हो गये भय ने धीरे से फुसफुसाकर बता दिया कि भारत में संघ और भाजपा के फासीवाद की घोषणा हो चुकी है जो मोदी के प्रिय "न्यू वर्ल्ड  आॅर्डर" का एक अंश भर है। 

रविवार, 23 अगस्त 2026

आरक्षण का अधिकार

हर किसी को अपने पतन या उत्थान का अधिकार प्राप्त है । यह अधिकार सदा से आरक्षित रहा है, संविधान निर्माण के पहले से ही। 

आज मेरी बात आपको प्रतिकूल दिशा में जाती सी प्रतीत होगी। मैं सदा आरक्षण के विरोध में लिखता रहा हूँ। आज मैं इसके दूसरे स्वरूप को देख पा रहा हूँ। 

आज, अभी थोड़ी देर पहले तक मैं लिखता रहा कि आरक्षण नैसर्गिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, अन्याय है, अमानवीय है और अप्राकृतिक है। अब मैं समझ पा रहा हूँ कि आरक्षण पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा, क्योंकि आरक्षण प्रकृति की व्यवस्था है। 

अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले तनिक ठहरकर, बहुत अधिक नहीं, मात्र शरीर रचना विज्ञान, परमाणु संरचना, सृष्टि की प्रक्रिया, ब्रह्मांडीय विन्यास और गणित के कुछ व्यावहारिक अनुबंधों पर दृष्टि अवश्य डाल लीजिए। 

इन सभी में एक सैद्धांतिक समानता है, अ-समानता और विरुद्धता की समानता। दाहिने और बायें अंगों की संरचनाओं एवं कार्यों में अ-समानता, परमाणु की संरचना में परस्पर विरोधी गुणों की अनिवार्यता, सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अ-समान गुण-कर्मों की अनिवार्यता, ब्रह्मांड की अवस्थिति में तो अ-समानता और विरुद्धता की भरमार है, और गणित में मूल संख्याओं का योग भी अ-समान ही होता है।  

अ-समानता प्राकृतिक है, समानता का हठ अप्राकृतिक है। परिवार और समाज में अ-समानता देखी जाती है, उसका होना अपरिहार्य है। उसकी संरचना और अवस्थिति का आधार भी अ-समान है, और यही अ-समानता का गुण प्रकृति का आरक्षण है। इस आरक्षण को समाप्त कौन कर सकता है! इसीलिए फ़िजिक्स के विद्वान ने दहाड़ते हुए कहा- "किसी माई के लाल ने अपनी माँ का दूध नहीं पिया जो इस आरक्षण को समाप्त कर दे"। (वैसे जिस भी बच्चे की माँ जन्म देते ही मर नहीं गयी, उसने अपने बच्चों को दूध तो पिलाया ही है। बहुत कम दुर्भाग्यशाली बच्चे होते हैं जो माँ के दूध से वंचित रहते हैं)

...तो सिद्ध हुआ कि अ-समानता प्रकृति का अपरिहार्य गुण-कर्म है, और इस संदर्भ में प्रकृति ने अपनी व्यवस्था में शतप्रतिशत आरक्षण बना कर रखा है। 

...तो यह भी सिद्ध हुआ कि सामाजिक समानता की कल्पना और उसकी माँग एक अव्यावहारिक हठ है। प्रकृति की व्यवस्था में अ-समानता का आरक्षण है, समानता का नहीं।

वैक्सीन, वायरस और व्यापार

आग पर रोटी पकती है तो क्या सूरज पर पका लें! माइक्रोब्स रोग उत्पन्न करते हैं और इम्युनिटी भी, तो क्या उनका स्वागत करें और उन्हें अपने शरीर में निर्बाध प्रवेश करने दें? 

माइक्रोब्स और शरीर के बीच में आती है हाइजीन की अवधारणा और म्यूटेशन एवं वैरिएन्ट्स के रहस्य। 

मैं अपने छात्र जीवन से ही वैक्सीनेशन के विरोध में खड़ा होता रहा, लोग उपहास करते रहे, शिक्षक भी और सहपाठी भी, पर मैं खड़ा रहा। और अब जबकि anti HIV वैक्सीन की चर्चा हो रही है तो एंटी कोरोना वैक्सीन का भूत भी एक बार पुनः झाँकने लगा है। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए जाॅर्ज सोरोस से लेकर मोदी तक पुष्पमाला लेकर खड़े हैं। उद्योगपति हर्षित हैं... बकरे स्वयं आगे आ रहे हैं कटने के लिए। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए और क्या चाहिए!

हम कुछ नहीं कहेंगे, जनसंख्या भी तो कम होनी चाहिए न! प्रकृति संतुलन करती है, यहाँ अतिज्ञानी लोग प्रकृति का अधिकार स्वयं ले चुके हैं। एपस्टीन एक बार पुनः चर्चा में है, ...कि कोविड पूर्वनियोजित था, WHO की भूमिका भी पूर्वनियोजित थी। सबका साथ था...स्वास्थ्य के विरुद्ध विष बाँट कर अपने विकास का। लाॅकडाउन हुआ, थाली बजी, वैक्सीन लगा, ...और अब हो रहा है हृदयाघात, आकालमृत्यु। योजना सफल हो रही है। जनसंख्या कम हो रही है, उद्योग विस्तारित हो रहे हैं। कल क्या होने वाला है? ....छोड़िये, बाद में सोचेंगे, अभी तो अपनी बच्चियों को एंटीकैंसर वैक्सीन (Anti HIV) लगवाना है... ताकि इस बार उनकी देह में कैंसर की फसल अच्छी हो।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

बीजिंग से अहमदाबाद

मुँह खुला ही रहता है 

चिर बुभुक्षित

ड्रैगन का

निगलने को कुछ भी

किसी भी दिशा में

मिल जाए जो भी

जहाँ भी।

चौकन्ने

मंथर गति से चलते

ड्रैगन की तीक्ष्ण दृष्टि से

बचेगा नहीं

असावधान रहेगा जो भी

और 

नहीं होगी दूरदृष्टि

जिसमें भी।


तुम तो गाते रहे 

हिंदी-चीनी भाई-भाई

और उधर बासठ हो गया।

तुमने कहा कुछ नहीं हुआ

डोकलाम में 

और उधर बनती रहीं 

सैन्य अधोसंरचनायें ताक्सिन में,

बनते रहे दो सैन्यमार्ग 

अरुणाचल में

साठ किलोमीटर भीतर तक।

तुम झूठ बोलते रहे  

पल-पल

आत्मविश्वासपूर्ण अभिनय के साथ।

कौन हो तुम?

चौकीदार तो नहीं हो सकते

नायक भी नहीं हो सकते

बंधु भी नहीं, सखा भी नहीं

ओह ! अब समझा 

तुम जो हो

वह बताएगा कौन!

सुनने के बाद

अपना सही परिचय 

मृत्युदंड निश्चित है

इसलिए सत्यवादी मौन है

गूँजता है तो केवल तुम्हारा ही 

अट्टहास दिग्दिगंत में

पर अब और नहीं

तैयार हो गये हैं कुछ लोग

करने अनावृत सारे रहस्य

भले ही मिले

क्यों न मृत्युदंड

और तुम!

तुम तो मरते ही रहते हो पल-पल

तुम्हें क्या पड़ता है 

कोई अंतर 

किसी के मरने से!

बेताल बेसुर

गाते रहे वर्षों से 

मन की बात

केवल अपनी

बिना सुने 

किसी और के मन की 

बेताल जो ठहरे!

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्रजा से संवाद

संवाद दृश्य-१. (सिर हिलाते और उंगली दिखाते हुये, धमकाने की भाव भंगिमा के साथ भीड़ को संबोधित करते हुये) - 

"...मुझे बताइये, ऐसे व्यक्ति को मौका मिल जाए... तो हिसाब चुकता करेगा या नहीं करेगा? तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम हमें मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमीशन देने से मना करते थे..."

कट..कट..कट..

खलनायक को ऐसा ही होना चाहिए, ऐसी ही भाषा, ऐसी ही भाव भंगिमा, इतना ही खल-कपटी और इतना ही मिथ्याभाषी। लोग इसे ८०० साल बाद हुआ विष्णु का अवतार मानते हैं, कोई कोहनूर तो कोई विश्वगुरु। 

अनुरागी कवि के शब्दों में-  "जा को चिमचा जितनो भारी, मनमानी छवि देखय न्यारी।।

कुछ और देखने के लिए चलिए, आगे चलते हैं...

हाथ में धनुष-बाण लिए एआई निर्मित नानबायोलाॅजिकल भगवान का चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। भगवान का स्वांग रचना महानता और ईश्वरीय अनुभूति उत्पन्न करने में सहायक होता है। हर कोई भगवान बन जाने के लिए लालायित रहता है। आप इसे ढिठाई, धृष्टता और निर्लज्जता कह कर दुःखी हो सकते हैं। पर निस्संदेह भारत में ऐसे लोगों की भरमार है जो अवतारी कहलाने और मान लिए जाने के लिए लालायित रहते हैं। पूजन-वंदन भला किसे नहीं सुहाता! 

कुछ लोगों को चित्र अच्छा नहीं लगता, वे इसे भगवान का अपमान मान कर कानाफूसी कर रहे हैं। हाँ! कानाफूसी ही, प्रत्यक्ष होकर कहने का साहस भी तो होना चाहिए!

कुछ लोगों को कृत्रिम बौद्धिकताजनित भगवान का यह चित्र बहुत प्रभावित भी करता है, वे चित्र देखकर धन्य हो रहे हैं। स्वयं भगवान प्रकट हुये हैं "राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा" का प्रचार करने। 

अति उत्साही और अत्यानुरागी भक्त यह भ्रम उत्पन्न करने में लगे हैं कि जैसे उनके नानबायोलाॅजिकल जी महान कलाकार हैं वैसे ही कौशलेश श्रीराम भी थे,...अर्थात् इतने ही सनातन विनाशक, कपटी और मिथ्याभाषी। 

यह हो क्या रहा है देश में! हम पतन की कितनी और खाइयों में... और कब तक कूदते रहेंगे?

भगवान जी ने अपने श्रुमुख से उवाचा -" मैं अतिपिछड़े वर्ग से आता हूँ। मैं दलित वर्ग से आता हूँ। मैं चाय बेचा करता था"।

ब्राह्मणों पर छुआछूत का आरोप लगाने वाले भगवान ने कभी नहीं बताया कि उनके हाथ की बनी चाय पीने वालों में से कितने लोगों ने भगवान जी से उनकी जाति पूछी? कितने लोगों ने उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया? कितने लोगों ने उनकी छुई चाय पीने से मना किया...?

अमर होने के लिए अमरत्व जैसे किसी गुण की क्या आवश्यकता! प्रचार और निर्लज्जता ही पर्याप्त है। वासुदेव और कौशलेश को प्रजा भगवान मान कर पूज सकती है तो मुझे क्यों नहीं! वे भी शासक थे, मैं भी शासक हूँ। मैं किसी से कम हूँ क्या!

चीनी अतिक्रमण

एक दूसरे को आरोपित कर स्वयं को राष्ट्रवादी और भारत प्रेमी बताने वाली सरकार भी झूठ बोलती रही और चीन भारत में आतिक्रमण करता रहा। अरुणांचली नागरिक दुःखी हैं, जितना अतिक्रमण से हैं उससे भी अधिक सरकार के उस झूठ से हैं जो प्रचार करता है कि वहाँ कोई चीनी अतिक्रमण नहीं हुआ है। सेवन सिस्टर्स वाले हमारी तरह मिथ्याभाषी नहीं होते। सीमावर्ती गांवों के लोग चीनी सैनिकों के सामने जाकर उनका विरोध कर रहे हैं, स्त्रियाँ उनके सामने जाकर चीख-चीख कर रो रही हैं कि सैनिक वापस चले जायें, वहाँ के नागरिक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, इस अनुरोध के साथ कि भारत चीनी अतिक्रमण के विरुद्ध कुछ करे। वे गूगल सेटेलाईट मैप से अतिक्रमित स्थानों के चित्र भेज रहे हैं और अनुरोध कर रहे हैं कि शेष भारत के लोग, अरूणाचल और भारत सरकार भी गूगल मैप देखे। 

मैकमोहन रेखा लाँघकर ताक्सिन और उसके आसपास के स्थानों पर चीनी सेना ने अपनी रणनीणिक अधोसंरचनाओं का निर्माण कर लिया है जिसमें टनल और लंबी सड़कें भी सम्मिलित हैं जिससे अब गाँव वाले उन चारागाहों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय आदिवासी अपने स्तर पर मुखर होते रहे जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। उन्हें लगने लगा है कि वे अधिक समय तक भारतवासी नहीं रह पायेंगे, अरुणाचल प्रदेश भी तिब्बत की तरह ड्रैगन के मुँह में जाने वाला है। वे चीनी नहीं बनना चाहते, भारतीय ही बने रहना चाहते हैं। अरुणाचली युवक उग्र नहीं होते, प्रकृति से वे सौम्य और शांत होते हैं। पर कब तक?

ढीठ सरकार नहीं सुनती तो अब वे स्वयं निकल रहे हैं...अपना भारत बचाने के लिए। "ताक्सिन चलो, भारत बचाओ अभियान" के स्वर गूँजने लगे हैं। पूरा भारत इस अभियान के समर्थन में है। सेवन सिस्टर्स के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। वहाँ हमारी ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरें हैं। 

देश रहे या भाड़ में जाय, सरकार में बैठे अपराधी पृष्ठभूमि के नेताओं का क्या बिगड़ेगा! उन्हें चिंता क्यों होगी, पर हमें तो है।

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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गोमाता

राम भी वह

माधव भी वह

पर 

किंचित भी राम नहीं

किंचित भी माधव नहीं

संघ के चिंतन ने

राम तो छीने ही

छीन लिए माधव भी


गोमाता और धर्म से 

पृथक करता जो

जीवनशैली को

पूछते हैं कौशलेश

पूछते हैं वासुदेव

धर्म से पृथक

अस्तित्व

जीवनशैली का

बताओ तो राम माधव!

ना-ना-ना

बुड़बक न बना पाओगे

उत्तर तो देना ही होगा

किसी न किसी को

आज

प्रत्याशी को

या कल

मतदाता को

सोच लो जी भर

कौन दे उत्तर!

पहचान

 वे मिटा रहे हैं

पहचान के चिन्ह

एक-एक कर, 

नाम

वेश-भूषा

परंपरा

भाषा

संस्कार 

और सभ्यता...

ताकि आसान हो सके

हत्या

एक देश की।

सभ्यतायें

इस तरह भी मार दी जाती हैं

भाषायें 

इस तरह भी मार दी जाती हैं

और जीत लिया जाता है 

एक युद्ध

बिना लड़े कोई युद्ध।


युद्ध लड़ने में

अनिश्चित है हार-जीत

पहचान समाप्त कर देने से 

निश्चित हो जाता है सब कुछ

पहले से ही।


तिब्बत को तो मार रहा है 

चीन

ब्रिटेन को मार रहा है 

इस्लाम

किंतु भारत को मार रहा है

भारत ही

सुना तुमने!

भारत को मार रहा है भारत ही। 


रविवार, 16 अगस्त 2026

गालीयुग मोहन मन भावय

जेन-जी ने अपने प्रथम आंदोलन का प्रारंभ पोर्नगालियों के साथ किया। संघस्वामी मोहन भागवत जेन-जी से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें सर्वाधिक विचारशील, प्रगतिशील और विचारवान पाया। 
कुछ लोगों को जेन-जी की पोर्नगालियों से आपत्ति हुई। वे उनकी प्रगतिशीलता को समझ नहीं सके। प्रधानमंत्री ने पोर्नगालीबाज नारीशक्तियों को क्षमा कर दिया और उन्हें गले लगाने की इच्छा व्यक्त की।  
किसी ने कहा स्त्री कैसी भी हो, किसी भी स्थिति में स्त्री के चरित्र पर लांछन नहीं लगाया जाना चाहिए। 
जेन-जी आंदोलन में पोर्नगालीबाज लड़कों से अधिक संख्या लड़कियों की रही। 
जब कोई गाली देता है तो वे गालियाँ ही स्त्रीप्रधान होती हैं, यथा माँ की गाली, बहन की गाली या स्त्री जननांगों के वीभत्स क्रियास्वरूपों की गाली...। गाली कभी पुरुष प्रधान नहीं होती। स्त्री मर्म है, सर्वाधिक चोट मर्मस्थल में ही लगती है। इसीलिए पुरुषवाचक गाली नहीं बनी। जेन जी लड़कियाँ भी स्त्रीसूचक गालियाँ ही देती हैं। गाली स्त्रीवाचक होती है पर यह अपमान की पराकाष्ठा है पुरुष के लिए। इसी अपमान में छिपा है स्त्री का महत्व और उसकी प्रतिष्ठा। अपमान तो वह पीड़ा है जो शब्दशर से बिंधकर उत्पन्न होती है। शर स्त्री को चुभता है, पीड़ा पुरुष को होती है। स्त्री-पुरुष संबंधों के इस अति संवेदनशील पक्ष को भारतीय ही समझ सकते हैं जहाँ पैराडाॅक्स की भरमार है। 
...तो स्त्रीसूचक गालियाँ स्त्री से अधिक पुरुष को घायल करती हैं। गाली देना पाप है परंतु यह पुरुष की अपेक्षा स्त्री महत्व और उसके सम्मान को ही अधिक इंगित करता है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

राजनीति

 अतिविद्वान ने कहा

मत करो राजनीति की बातें

वातावरण दूषित होता है

मछलियों की बातें करो

तुम मछुआरे हो,

घंटियों की बातें करो

तुम पुजारी हो,

दूध की बातें करो

तुम ग्वाले हो।

कैसे करूँ

इन सबकी बातें

समझ नहीं पाता मैं।

मछलियों के बीज डाले ही नहीं गये

गाँव के सरकारी पोखर में

जो पहले से थीं भी

उन्हें खा गये

मंत्री जी।

पीतल की घंटियाँ

चुरा ली हैं

मंदिर के

सरकारी सेवकों ने

दूध नकली बनता है

नेता जी की फैक्ट्री में

कोई कोना नहीं

जो मुक्त हो

सरकारी हस्तक्षेप से।

सरकार माने राजनीति

राजनीति माने नेता जी की भैंस

भैंस नेता जी की ही है

क्योंकि लाठी उनकी ही है।

भैंस लेने के लिए रुपयों की नहीं

लाठी की आवश्यकता है

वह लोकोक्ति तो सुनी है न!

"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

तो इस तरह सब कुछ

नेताओं का ही है

सरकार भी

राजनीति भी

देश भी

देश की सारी संपत्ति भी

और तुम कहते हो

अछूत है राजनीति

और राजनीति जो छू रही है सबको

उसका क्या!

केवल छू ही नहीं रही,

पकड़ कर मरोड़ दे रही है

कपड़े सा निचोड़ दे रही है

और तुम कहते हो

दूर रहो राजनीति से!

राजनीति को ही

दूर क्यों नहीं रखते

हम से

हमारे जीवन से

हमारे धर्म से

हमारे सुख-चैन से!

राजनीति

हर लेती है सब कुछ

हर किसी का

और हम

जाने दें उसे यूँ ही

बिना किये दंडित

बिना किये प्रक्षालित!

नहीं

हम निस्पृह नहीं रह सकते

तुम्हारी तरह अवसरवादी नहीं हो सकते।    

रविवार, 9 अगस्त 2026

धुंधज्ञान

          मठाधीश बनते ही काले अंग्रेज सर्वज्ञानी हो गये हैं । ज्ञान-विज्ञान-धर्म-अध्यात्म-नीति-विधान-न्याय-राजनीति-कला-पुरातत्व-इतिहास... सभी विषयों का एकछत्र मठाधीश हर काला अंग्रेज है । कोई भी विषय ऐसा नहीं जिसमें ये स्वयं को निष्णात न मानते हों । इनका ज्ञान अद्भुत है, धुंध से परिपूर्ण, स्पष्ट कुछ भी नहीं, आभासी भी नहीं, अदृश्य भी नहीं ।

काले अंग्रेजों का हठ है कि ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ सुचारु रूप से चलाने के लिये धूम्रकेतु को सूर्य और सूर्य को धूम्रकेतु का पद एवं दायित्व दिया जाना आवश्यक है । सूर्य! अब तुम्हें अपने दायित्व धूम्रकेतुओं को सौंप देने चाहिये । ताम्रपत्रों पर लिख दिया गया है – “धूम्रकेतु को उसके नाम से पुकारा जाना अपराध माना जायेगा, उन्हें कूड़ा-कचरा, सड़ा हुआ, दुर्गंधित, और निरीह जैसे अर्थों को ज्ञापित करने वाले संबोधनों से ही संबोधित किया सकेगा । यही न्याय है । 

ब्रह्माण्ड के सम्राट रहे धूम्रकेतु अनायास ही तीन या पाँच हजार वर्ष पूर्व शोषित, वंचित और पीड़ित हो गये, उनकी प्रजा में जो सूर्य थे उन्होंने अपने सम्राटों पर अमानवीय और अब्रह्माण्डीय अत्याचार किये इसलिये अब सभी धूम्रकेतुओं को सूर्य बना देना होगा, धरती पर हमारा अवतार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है । दबंग सूर्यों के लिये इस विधान का पालन करना ही प्रायश्चित है और यही दण्ड भी ...दोनों एक साथ ।

काले अंग्रेजों ने शब्दों के नये अर्थ गढ़े, नयी परिभाषायें लिखीं, नये विधान रचे ...और सिद्ध कर दिया कि वे सर्वशक्तिमान हैं, वे ही परमपिता परमेश्वर और इस ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं । काले अंग्रेजों का दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर एक काल्पनिक शब्द है जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता, जिसका अस्तित्व होता है वह वे स्वयं हैं इसलिये उनका बनाया विधान ही सनातन सत्य है । उन्होंने नई-नई जातियाँ बनाकर जातियाँ समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि जातियाँ सदा के लिये बनी रहें । उन्होंने खर-पतवार के बीज बो कर खर-पतवार समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि खर-पतवार सदा अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होते रहें । उन्होंने यह ज्ञान भी दिया कि सूर्य तो इस ब्रह्माण्ड के पिंड हैं ही नहीं, ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर धरती पर टपक पड़े इसीलिये इनका बहिष्कार करना फिर धीरे-धीरे इन सबका समूल उच्छेद कर देना ही एकमात्र उपाय है ।

उद्घोषणा की जा चुकी है, संकल्प लिया जा चुका है ...कि अब काले अंग्रेज रुकेंगे नहीं, धूम्रकेतुओं को सूर्य के दायित्व सौंपने के लिये ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर टपके सूर्यों का उन्मूलन हो जाने तक उनके विविध अभियान चलते ही रहेंगे ।

अत्याचारी सूर्यो! तुम वापस जाओ, जहाँ से आकर टपके थे वहीं ...अखिल ब्रह्माण्ड की सीमाओं से बाहर । यदि तुम ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं गये तो हमारे धूम्रकेतु और ब्रह्माण्ड के मूलपिण्ड एक साथ मिलकर तुम्हारी बेटियों को खींचते हुये ले जायेंगे... कहीं भी, अपने घर... या झाड़ियों में... या किसी खण्डहर में... फिर उनके साथ दुष्कर्म करेंगे और फिर उनकी हत्या कर देंगे । जो धूम्रकेतु किसी सूर्य की ओर उँगली से संकेत कर देगा उसे लाखों चंद्रमा उपहार स्वरूप दिये जायेंगे, वहीं सूर्य की आँखें फोड़ दी जायेंगी, हाथ-पाँव काट दिये जायेंगे और जीवन भर यूँ ही मरने के लिये छोड़ दिया जायेगा ।

 

          ...और काले अंग्रेजों को यह भी दृढ़ विश्वास है कि धरती पर छायी धुंध पूरे ब्रह्माण्ड की धुंध है, सूर्य इस धुंध से कभी मुक्त नहीं हो सकेगा । सूर्य का अंत निश्चित है । अब ब्रह्माण्ड में केवल धूम्रकेतुओं का ही साम्राज्य होगा।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

अलोकतंत्र की ओर बढ़ता भारत

जब जनता से लेकर  प्रधानमंत्री तक स्वार्थ में डूबे हुए हों, व्यक्तिगत और लोकजीवन से नैतिकता का तीव्रता से क्षरण हो जिसे रोकने के किसी भी स्तर पर कोई प्रयास ही न किए जाते हों और सत्ताधीशों में सत्ता पर अपनी स्थाई पकड़ बनाने के लिए समाज को विघटित किये जाने की उद्दाम इच्छा हो तब निश्चित ही लोकतंत्र के भीड़तंत्र में रूपांतरित होने की आशंकायें बलवती होती हैं। हम लोकतंत्र के स्वप्न के साथ छद्म लोकतंत्र को तांडव करते हुए देख रहे हैं।

हम चीन की कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें पर उसके सामने झुकने के लिए विवश होते रहे हैं, यही सच है। भाजपा ने लोकतंत्र को लोहे के संदूक में बंद कर दिया है, शासक वर्ग में निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता तो जनता में अराजकता और असहिष्णुता बढ़ती ही जा रही है। 

यदि भारत में जातिवाद का अंत हो सके, आरक्षण समाप्त हो सके, प्रतिभा को अवसर मिलना सुनिश्चित हो सके, वैज्ञानिक सुरक्षित और निर्भय हो सकें, निर्बल का शोषण थम सके और हम चीन से होड़ करने की स्थिति में आ  सकें.... तो हमें कम्युनिस्ट शासन भी स्वीकार है। 

लोकतंत्र आपने आप में एक छल है। सच तो यह है कि शासित और शासक एक सामाजिक बाध्यता है। हर व्यक्ति आत्मनियंत्रण और नैतिक नहीं हो सकता इसलिए उस पर नियंत्रण आवश्यक है जो लोकतंत्र से कभी संभव नहीं। हमें एक सभ्य कुलीन तंत्र की आवश्यकता है, ....या फिर चीन की तरह अलोकतंत्र ...जो नियंत्रण भी करता है, वैज्ञानिक उन्नति भी करता है, व्यापार भी करता है, और आवश्यक होने पर सबको आँख भी दिखाता है। 

रविवार, 2 अगस्त 2026

झमाझम वर्षा

अब की वारिश

झमाझम बरसीं

पोर्नगालियाँ

नरों के मुख से

उससे भी अधिक 

नारियों के मुख से

महामानव धन्य हुये

देश धन्य हुआ

सभ्यता धन्य हुयी

संस्कृति धन्य हुयी

भीगकर

गालियों की बरसात में। 

अन्याय भी धन्य हुआ

जानकर

कि क्षमा कर दिया है 

नानबायोलाॅजिकल भगवान ने 

सभी गालीबाजों को

और लग जाना चाहते हैं उन सबके गले

हँसते हुये

किंतु...

छोड़ देना चाहते हैं 

गोलियाँ खाने के लिए 

राष्ट्रप्रेम के सच्चे दीवानों को 

स्वतंत्र कर देना चाहते हैं

असुरों को 

मारने के लिए पत्थर

हर उस व्यक्ति को

जो करेगा देश की 

सच्ची सेवा 

और न्याय की माँग।

अब की वारिश

उमस 

ताप देने लगी है 

ज्वालामुखी के 

बहते लावे की तरह।




शनिवार, 1 अगस्त 2026

मोरक्को की स्पेन में बलात् घुसपैठ

यह स्पष्टरूप से एक अयुद्धक अतिक्रमण है जो मोरक्को द्वारा स्पेन में किया गया है । लगभग साठ हजार युवकों को मोरक्को की सीमा से स्पेन के सेउटा में बलात् प्रवेश के लिये भेजा गया । इनमें से अधिकांश अपराधी हैं जिन्हें मोरक्को सरकार ने स्पेन में घुसने के लिये जेल से मुक्त कर दिया । स्पेन इस षड्यंत्र का पता लगाने में असफल रहा, उसकी पुलिस और सेना भी कुछ विशेष नहीं कर सकी । लगभग छिहत्तर उपद्रवी मारे गये, कुछ घुसपैठियों को मोरक्को वापस जाने के लिए विवश कर दिया गया फिर भी कुछ तो स्पेन में छिपने में सफल हो ही जायेंगे । यही मोरक्को की रणनीति है । 

मोरक्को से स्पैन की दूरी 1335 किमी है । दोनों देशों की सीमाओं के बीच सनुद्र में मात्र तेरह किलोमीटर की दूरी है । मोरक्को के पिनडेक से स्पेन के सेउटा पहुँचने के लिए मात्र पाँच किलोमीटर तैरना पड़ता है । यही कारण है कि पंद्रहवी शताब्दी से उन्नीसवी शताब्दी तक पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस और मोरक्को के बीच युद्ध होते रहे हैं । मोरक्को के लोग आज भी स्पेन को यूरोप के प्रवेशद्वार के रूप में मानते हैं । कभी ईसाई बहुल रहा स्पेन मुस्लिम बहुल होता जा रहा है। कई कारणों से मोरक्को के मुस्लिम स्पेन में बसना चाहते हैं । यह इस्लामिक विस्तार की भी एक रणनीति है कि अपने नागरिकों के सामने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दो कि वे पलायन करके ईसाई, यहूदी, पारसी और हिन्न्दू देशों में घुसपैठ के लिये बाध्य हो जायँ । इंग्लैंड, फ़्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों  ने जिन मुसलमानों को शरण दी आज वे उनके ही अस्तित्व के लिये संकट बन चुके हैं । यह शक्ति, षड्यंत्र और सत्ता का खेल है जिसमें क्रूरता सर्वोपरि है । भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ।  

मोरक्को-स्पेन क्षीण सीमा रेखा