शनिवार, 5 मई 2012

रुग्णत्व का पोटेंशियल

    आज सुबह चिकित्सालय आते ही एक राजनीतिक दल के कुछ लोगों से भेंट हो गयी। पता चला कि उनके समाज(अनुसूचित जाति) का एक अधिकारी जो दो दिन पहले रिश्वत लेते गिरफ़्तार किया गया था, चिकित्सालय में भर्ती है। राजनीतिक दल के लोग जो कि अधिकारी के समाज के भी हैं ..अपने दोनो रिश्तों के पालनार्थ उसकी मुक्ति के लिये जुगाड़ लगाने आये हैं। उनके अनुसार सुविधाजनक बात यह है कि हमारे चिकित्सालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उन्हीं के "समाज " के हैं अतः उन्होंने यह तय कर लिया है कि काम तो होना ही है, वे आश्वस्त हैं।
    वास्तव में जो पीड़ित पक्ष है( जिससे रिश्वत की माँग की गयी थी) उसका कहीं अता-पता नहीं है( बेचारा कोस रहा होगा अपनी किस्मत को)।
    अधिकारी की गिरफ़्तारी होते ही समीकरण बदल गये, पीड़ित की परिभाषायें बदल गयीं। सहानुभूति के प्रवाह की धारा बदल गयी। नेताओं से लेकर "समाज" विशेष के लोग उसकी मुक्ति के लिये चिंतित हो उठे। अन्ना और बाबा रामदेव की चिंताओं की ऐसी कम तैसी होने लगी। यह वही समाज है जो बाबा और अन्ना के आन्दोलनों में उनका समर्थन करता है ...उनकी जय-जयकार करता है...भ्रष्टाचार के विरोध में ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के गला फाड़-फाड़ के नारे लगाता है और जब कोई उनका अपना ..उनके अपने "समाज" का कोई रिश्वतख़ोर पकड़ा जाता है तो उसकी मुक्ति और उसे निर्दोष प्रमाणित करने के लिये चिंता से व्याकुल हो उठता है। तब पूरा भारत उनका समाज नहीं होता .... वह खण्डित समाज उनका अपना होता है जिसके खण्डत्व को लेकर वे मनुवाद को जमकर गालियाँ देने में अपना सम्पूर्ण पुरुषार्थ न्योछावर कर देते हैं। ऐसे ही अनेक चेहरे वाले लोगों की भीड़ के कष्टों के निवारणार्थ ...उनकी ख़ुशहाली के लिये .....रामराज्य के आदर्शों को पुनर्स्थापित करने के लिये अन्ना, बाबा, सुब्रमण्यम स्वामी चिंतातुर हैं।  
   जब से होश सम्भाला है, रसूख़दार लोगों को गिरफ़्तार होते ही तुरंत बीमार होते पाया है ...उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कर देने से कम में उनके प्राणों की रक्षा सम्भव नहीं हो पाती। इससे यह प्रमाणित हो गया है कि हमारे देश में रुग्णत्व स्थाई भाव से रहता है। वह भ्रष्ट लोगों के शरीर और मन में अचानक ही प्रस्फ़ुटित हो जाता है। रसूख़दारों को रुग्ण होने से बचाना है ...उन्हें स्वस्थ्य बनाये रखना है तो रोग के कारण का निवारण अनिवार्य है। रोग का कारण है उनकी गिरफ़्तारी। यह एक ऐसा इटियोलॉजिकल फ़ैक्टर है जिसका निवारण होते ही रसूख़दार पापी एक झटके में ही स्वस्थ्य हो जाता है...बिना किसी औषधि के। औषधि की आवश्यकता तो ग़रीबों को पड़ती है ...निर्बलों और असहायों को पड़ती है ...उन्हें पड़ती है जो शोषित और पीड़ित हैं ....उन बेचारों का काम तो नकली दवाइयों से भी चल जाता है।
     इससे एक बात और भी प्रमाणित होती है कि भारत में राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध...आदि भी इन्हीं समस्यायों से जूझते रहे .....जूझते-जूझते परमात्मा में विलीन हो गये....समस्यायें और भी बढ़ती चली गयीं। यह विचारणीय है कि महान आत्माओं को भारत में ही अवतार क्यों लेना पड़ता है बारम्बार ? धर्म की ग्लानि भारत में ही क्यों होती हैकि उसके अभ्युत्थान के लिये महान आत्माओं को "...युगे-युगे" अवतार लेने विवश होना पड़ता है? धर्म को ग्लानि की अवस्था तक पहुँचाने वाले अधर्मियों पर अंकुश का और क्या उपाय हो सकता है कि भारत का सामाजिक जीवन थोड़ा सा तो पश्चिम जितना व्यवस्थित हो सके! मुझे लगता हैकि भारत में निरंकुश स्वतंत्रता ही सारी समस्यायों की जड़ है।     

23 टिप्‍पणियां:

  1. एक पाठक के नाते से कहती हूँ कि आपका लेखन सशक्त और विचारों में सार्थकता है....
    पूरा सिस्टम बीमार है यहाँ......आप एक रोगी का किस्सा क्या ले बैठे....

    सादर.

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  2. नीत्शे ने कहा है कि संसार में जितने भी परिवर्तन होने हैं वो हो चुके हैं.. और जो अब तक नहीं हुआ, वह अब कभी नहीं होगा.. राम-कृष्ण, बुद्ध-महावीर, जीसस-मुहम्मद... सबों की सीख अगर कारगर होती तो आज तक दुनिया बदल गयी होती... समाज के अंदर समाज नहीं होता.. और नहीं होते वो रोग जिनसे आपके चिकित्सालय में लाये गए महापुरुष पीड़ित थे... दरअसल "साहिब, बीवी और गुलाम" में बताए गए हवेली की बहुओं के खेल - गहने तोड़वाओ, गहने बनवाओ.. या "शतरंज के खिलाडी" के मीर-मिर्ज़ा का खेल, या ओसामा-ओबामा के खूनी खेल... वैसे ही भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुजाकार प्रदेश का यह भी एक खेल है.. कुछ खिलाडी होकर आनंद उठा रहे हैं, कुछ अम्पायर बनकर नियम सिखा रहे हैं.. हम दर्शक की तरह देखने को बाध्य हैं, प्रतिक्रया की अनुमति नहीं!! क्योंकि खेल के नियम खेल के बीच ही सुविधानुसार बदल दिए जाते हैं!!

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    1. आपकी सशक्त टिप्पणी से ये ब्लॉगर ख़ुश हुआ...। फ़िजिक्स और कैमिस्ट्री के प्रेक्टिकल में सिद्धांत के अनुरूप कभी भी ठीक-ठीक परिणाम नहीं आते...यदि आ गये तो यह स्वयं सिद्ध हो जाता है कि छात्र ने नकल की है।परिणाम ठीक के आसपास आना चाहिये...यही उसकी कसौटी है। ठीक और आसपास के बीच का यह कभी न भरने वाला अंतराल जिसे हम "इरर" कहते हैं...वही तो सबसे बड़ा सत्य है। यह वो सत्य है जो आदर्श को कभी भी व्यावहारिक बनने नहीं देता। सारी दुनियादारी का सत्य इसी अद्भुत और अनट्रीटेबल "इरर" में समाया हुआ है। राम-कृष्ण के प्रयास भी इस इरर का समाधान नहीं खोज पाये। और इससे भी बड़ा सत्य यह हैकि हम सब इसका समाधान खोजते रहे हैं ...खोजते रहेंगे....इस धरती के कृष्णविवर में समाने के दिन तक।
      आपकी टिप्पणी से इस परिस्थितिजन्य विस्फोटित लेख को बल मिला है ..पर धन्यवाद नहीं दूँगा(हम अपनों को धन्यवाद नहीं देते...दिल के एक कोने में उसके नाम का एक और दीपक जला लिया करते हैं)

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  3. हमारे देश के सिस्टम में हमेशा रसूकदार लोग बच जाते है,
    .
    आप में सशक्त लेखन प्रतिभा और विचारों में सार्थकता है,
    आपका लेख पसंद आया, कौशलेन्द्र जी,...बधाई, शुभकामनाए,

    MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

    MY RECENT POST .....फुहार....: प्रिया तुम चली आना.....

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  4. धन-दौलत हर दिन बढे, गुना चार सौ बीस ।
    शिकायतें बढती गईं, साहब जाते रीस |

    जब हुआ नहीं बर्दाश्त |
    तब एक्शन लेते फास्ट |

    सेवा से निवृत किया, कम्पलसरी खबीस ।।

    (2)
    रविकर रूपये पाँच का, चूरन जाता खाय |
    सच्चे दस्तावेज को, आगे देत बढ़ाय |

    गया चिरौरी करने |
    साहब लगे अकड़ने |

    डिसमिस झट से कर दिया, चार्ज-सीट पकडाय ||

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    1. ज़नाब फ़ैज़ाबादी जी! चारसौबीस का अंक बड़ा लोक प्रिय होता जा रहा है,कभी-कभी यह चारसौबीसी इतनी बढ़ जाती है कि बाबुओं को सच्चे दस्तावेज़ में आग लगा देनी पड़ती है ...सबूत मिटाने के लिये । इसलिये आप ऐसे भी कह सकते हैं - "सच्चे दस्तावेज़ में आगी देत लगाय"
      डिसमिस कम ही होते हैं, सस्पेण्ड अधिक होते हैं....जो कि एक स्टेटस सिम्बल बनता जा रहा है।

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    2. काव्य-टिप्पणी करने का सबसे अधिक महत्व यही है कि चर्चा से उत्पन्न होने वाला तनाव कुछ कम हो जाता है...

      फैजाबादी रविकर जी इस ब्लॉगजगत में अपने 'नारायण-नारायण' के सुखकर अमुखर निनाद से अत्यंत लोकप्रिय हो गये हैं.

      कलह कराने वाले 'नारद' की रूढ़ छवि को तोड़ने का काम कर रहे हैं रविकर जी. :)

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    3. बीच-बीच में भजन की व्यवस्था हो पाती तो और अच्छा होता प्रतुल भाई! राधे-राधे...

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    4. भजन-संध्या करने की सोच रहा हूँ...जिसमें कुछ अछूता न हो.

      राधे-राधे.

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  5. आपकी चिंता और शिक्षा, सलिल जी और नीत्शे की टिप्पणी सभी जायज़ हैं। भारत, अवतार, धर्म की ग्लानि और समाज सुधार के बारे में कोई टिप्पणी नहीं।

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  6. टिप्पणी अपेक्षित और प्रतीक्षित है...

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    1. क्षमाप्रार्थी हूँ, अभी उसका मुहूर्त नहीं है।

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  7. यह विचारणीय है कि महान आत्माओं को भारत में ही अवतार क्यों लेना पड़ता है बारम्बार ?.. प्रश्न विचार करने वाला है ... आखिर क्यूँ ... पर काफी हद तक जवाब आपने अपने आलेख में दे दिया है ... :)

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    1. एक कारण और भी है क्षितिज़ा जी! हम...यानी एक आम आदमी से लेकर साधु-संतों तक बहुसंख्य लोग ज्ञानाजीर्ण के रोगी हैं।

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  8. संदर्भों के साथ बदलती व्‍याख्‍या.

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  9. गम्भीर मनन का विषय प्रकाशित किया है भाई साहब!!
    मैं तो चिन्तन मग्न ही रह गया, साकारात्मकता, सार्थकता और नैतिकता उक्साना भी अब तो संदेहास्पद माना जाता है। दुर्बोध तत्व पतन मार्ग को गति देने के हिमायती है। सद्गुण इन तत्वों के मार्ग के कांटे बने हुए है। सुधिजन के सहयोग को दूर से ही दुत्कारा जा रहा है। जीवन अनुशासन की बात करना भी लोगों के अकाल क्रोध का भाजन बनता है। आक्रोश आवेश का साम्राज्य है। आश्चर्य यह कि दुख निर्माण के कारकों को ही सहज सुख समझा जा रहा है।

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    1. हौं तओ जा चिर लम्बित बिबाद से "रनछोंड़" ह्वै गयो जी। कछू बोलबें के लायक नाय रह्यो सो अब कछू ना कहौंगो। जय राम जी की!

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  10. विषयांतर हो जाने के कारण इस लेख की विषय वस्तु पर यथेष्ट चर्चा नहीं हो सकी अतः इस लेख के सभी सुधीपाठकों और टिप्पणीकारों से क्षमायाचना करता हूँ। कदाचित ब्लॉग लेखन से मुझे कुछ समय तक विश्राम करने का सन्देश जगन्नियंता की ओर से दिया जा रहा है।
    जो हरि इच्छा!

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    1. विषयांतर होना विषयी होने से लाख अच्छा है.

      हरि इच्छा यही है कि बस्तर का स्तर बरकरार रहे और झरना बदस्तूर प्रवाह में बहे.

      शुद्ध जल पीने वालों के लिये झरने का बहना जरूरी है.

      जिन भी लोगों के कारण आप अशांत हुए हैं सभी भावुक प्रवृत्ति के जीव हैं.

      हम लोग साक्षात होकर मसलों को नहीं सुलझा पाते, इसलिये बहुत से विवादों में उलझ जाते हैं.

      — कई बार हम जरूरत से ज़्यादा समझ जाते हैं.

      — कई बार अर्थ का अनर्थ लगा बैठते हैं.

      — कई बार हम अपनी विद्वता प्रदर्शन 'व्यंग्य बाणों' को चला कर करते हैं.

      — कई बार हम अपने से श्रेष्ठ किसी को देखना पसंद नहीं करते और उसके लिये योजनाबद्ध तरीके से अभियान चलाते हैं.

      — कई बार हम किसी पोस्ट के निहितार्थ को ना समझ, बस औपचारिक टिप्पणी करके स्वयं को गुटबाजी में फँसा महसूस करते हैं और पछताते हैं.

      ----- मुझे इस समय एक पोस्ट का शीर्षक याद आ रहा है "बड़का ब्लोगर, छुटका ब्लोगर' उसे याद करते हुए कहना चाहूँगा 'बड़े अपने बड़प्पन को बरकरार रखें और छोटे अपनी शालीनता' तो स्वस्थ विमर्श की भूमि तैयार रहेगी.

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    2. @ जिन भी लोगों के कारण आप अशांत हुए हैं सभी भावुक प्रवृत्ति के जीव हैं... हम लोग साक्षात होकर मसलों को नहीं सुलझा पाते, इसलिये बहुत से विवादों में उलझ जाते हैं.

      सहमत हूँ | सर से माफ़ी भी मांग रही हूँ , परन्तु अभी तक सर रूठे ही हुए हैं :)मेरी भी प्रार्थना है कि झरना बदस्तूर प्रवाह में बहे.

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. आभार सर | :)
    आपकी अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा - और आपके क्षमा करने का भी :)

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.