मंगलवार, 19 मई 2015

सभ्यता का क्रूर मुखौटा

यह पर्वत ऊँचा है
हिमालय से भी अधिक
जिस पर जमी हुयी है बर्फ़
बेशुमार दर्द की ।

सवाल उठते रहे हैं
कि क्यों नहीं पिघलती
यह बर्फ़
जो जमी है न जाने कब से ।

लोग ज़वाब चाहते रहे हैं
लेकिन
हमेशा की तरह रहकर ख़ामोश
क्रूरता से मुस्कराते भर रहते हैं
ज़वाब देने वाले ।
उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
इस बात से
कि एक बार फिर मर गयी है
एक माँ
एक और
नयी अरुणा शानबाग बनकर
पैदा होने के लिये ।

मैथिली शरण ने यूँ ही नहीं कहा था
“अबला जीवन
हाय तुम्हारी यही कहानी
आँचल में है दूध
और आँखों में पानी”।

आज
टिमटिमाकर बुझते-बुझते  
चली गयी है वह
सदियों पुराने सवाल छोड़कर
और मार कर एक तमाचा

सभ्यता के क्रूर मुखौटे पर ।  

4 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द क यह पर्वत कभी नहीं पिघलेगा कौशल जी.....संवेदनाएँ जो शून्य हो गईं हैं......वो ताप ही कहाँ है जो पिघला सके इसे....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-05-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1982 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. सवाल जस का तस खड़ा है -कौन हल करेगा ?
    आँचल में दूध के साथ आँखों से बहती कातरता नहीं ,प्रखर दृष्टि की चुनौती के दर्शन करने लगेगा जब कवि , स्थिति तब बदलेगी!

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.