मंगलवार, 11 अगस्त 2015

ई हय बनारस हौ बाबू !


ज्योतिर्मय को बनारस आये हुये अभी कुछ ही दिन हुये हैं इसलिये यहाँ के रास्तों और गलियों से उसका परिचय लगभग शून्य है । कहीं जाने-आने के लिये उसे जी.पी.एस. का उपयोग करना पड़ता है ।  उस दिन हमें सम्पूर्णानद विश्वविद्यालय से सारनाथ जाना था । टूटे-फ़ूटे और धूल भरे रास्तों से होते हुये हम किसी तरह सारनाथ पहुँचे । हमारे फेसबुकिया मित्र देवेन्द्र पाण्डेय घर के दरवाज़े पर हमारी प्रतीक्षा करते हुये मिले । फेसबुकियानी मित्रता के साक्षात होने का रोमांच कुछ और ही होता है । हम प्रथम बार मिले किंतु सुपरिचितों की तरह ।
घर के प्रांगण में एक सेवानिवृत्त गुरुजी लिट्टी-चोखा के उपक्रम में गोइंठा सुलगा रहे थे । कभी फेसबुक पर परिहास में पाण्डेय जी से लिट्टी-चोखा की बात, लार बहाते हुये हुयी थी । इतनी पुरानी बात उन्हें स्मरण थी । यानी प्रांगण से ही पाण्डेय जी ने हमें मोहित करना शुरू कर दिया था ।

लिट्टी-चोखा परिपाक का पूर्वकर्म - गोइंठा-दहन  

हम घर के अन्दर पहुँचे, जल-पान के पश्चात् पाण्डेय जी ने अपनी दोनो बेटियों से परिचय कराया । उनकी एक बेटी पाश्चात्य दर्शन में पीएच.डी. कर रही है । विषय को लेकर चर्चा शुरू हुयी (चर्चा के विषयों को लेकर ब्राह्मण लाचार है, वह या तो पढ़ायी-लिखायी की बात करेगा या फिर भोजन की) । मैंने पाश्चात्य और भारतीय दर्शन के तुलनात्मक अध्ययन की चर्चा छेड़ दी । चर्चा में ज्योतिर्मय भी सम्मिलित हुआ, दर्शन में उसकी रुचि देखकर पाण्डेय जी ही नहीं मैं भी प्रभावित हुआ । उसने अभी-अभी इलाहाबाद से इण्टरमीडियेट किया था ।

बनारस के बारे में चर्चा हुयी तो ज्योतिर्मय ने कह दिया कि वह जल्दी से जल्दी बनारस छोड़कर इलाहाबाद जाना पसन्द करेगा । बातों ही बातों में बिना किसी लाग-लपेट के ज्योतिर्मय ने यह भी कह दिया कि बनारस उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा, यहाँ है ही क्या सिवाय टूटी-फूटी सड़्कों, धूल और गन्दगी के । उसकी बात से मुझे थोड़ा संकोच हुआ लेकिन पाण्डेय जी सहज ही नहीं बने रहे बल्कि बीच-बीच में हंसते भी रहे ।  

जो कभी लिट्टी-चोखा का स्वाद ले चुके हैं उनके लिये यह एक विशिष्ट भोजन है जिसके प्रति उनकी दीवानगी देखने लायक होती है । लिट्टी-चोखा की उपलब्धि के लिये बड़े धैर्य और श्रम की आवश्यकता होती है । मुझे यह आध्यात्मिक साधना से पूर्व की प्रारम्भिकसाधना से कम नहीं लगती ।
बातों-बातों में समय का पता ही नहीं चला । टेबल पर भोजन लगाया जा चुका था । लिट्टी-चोखा, दाल-चावल और खीर के अतिरिक्त एक कटोरे में पृथिवी की एक दुर्लभ चीज भी थी – “शुद्ध देशी घी” ।
बनारस की लिट्टी-चोखा 

स्वादिष्ट भोजन के पश्चात् हमारा कार्यक्रम कुछ देर विश्राम करके बौद्धनगरी के भ्रमण का था । धूप तेज थी और पाण्डेय जी प्रतिश्याय से पीड़ित थे फिर भी बड़ी रुचि एवं आत्मीयता से उन्होंने हमें सभी स्थानों का भ्रमण करवाया ।
बौद्धस्तूप, हिरण उद्यान एवं उसके पास बौद्ध चैत्य के अवशेष देखकर ज्योतिर्मय को अच्छा लगा । इतना अच्छा लगा कि उसने माँ को भी वहाँ लाकर घुमाने की इच्छा प्रकट की । पाण्डेय जी को प्रवेश का एक मार्ग दिखायी दिया गोया किसी एक्सप्रेस ट्रेन की भीड़-भाड़ वाली जनरल बोगी में एक पैर टिकाने की जगह मिल गयी हो । उन्होंने ज्योतिर्मय से चर्चा करनी शुरू की -  “बनारस अद्भुत् नगर है । यहाँ माया है और माया से मुक्ति का मार्ग भी है । यहाँ ठग हैं और सत्यनिष्ठावान भी हैं । यहाँ अज्ञानी हैं और महाज्ञानी संत भी हैं । ज्ञान, भक्ति, विद्या, तंत्र, मंत्र, नृत्य, संगीत .... सब कुछ है इस भोले बाबा की नगरी में । प्रश्न यह है कि लोगों की वांछना क्या है ? यहाँ विरोधाभास मिलेंगे, साधना के मार्ग में अवरोध मिलेंगे, “वाटर” जैसी फ़िल्मों की कथावस्तु मिलेगी और कीचड़ मिलेगा ....किसी साधक की प्रतीक्षा में, जो आकर उसमें कमल उगा सके । किसी को कीचड़ देखकर घृणा हो सकती है, उसी कीचड़ को देखकर किसी का मन प्रसन्न हो सकता है कि उसे कमल उगाने के लिये उपयुक्त स्थान मिल गया है ।”
ज्योतिर्मय को गणित और पैरालल वर्ल्ड से लेकर बायोटेक्नोलॉजी, दर्शन और नाट्य कला तक में रुचि है । उसे स्टीफ़ेन हॉकिंस पसन्द हैं तो कणाद और पाणिनि भी पसन्द हैं । पाण्डेय जी की बातें ज्योतिर्मय के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करती जा रही थीं और वह मंत्रमुग्ध होकर उनकी एक-एक बात को बड़े ध्यान से सुनता जा रहा था ।
अंत में पाण्डेय जी ने बनारस के एक चौराहे के बारे में ज्योतिर्मय को परिचय दिया – “इस चौराहे की एक सड़क मणिकर्णिका घाट जाती है, दूसरी व्यापारियों से भरे बाजार की ओर, तीसरी बाबाविश्वनाथ मन्दिर की ओर और चौथी सड़क वारांगनाओं के मोहल्ले की ओर । पूरे विश्व में बनारस के अतिरिक्त ऐसा अद्भुत् चौराहा और कहीं नहीं मिलेगा । पथिक को चुनना है कि उसे किस मार्ग पर चलना है ।”
ज्योतिर्मय द्विवेदी को बनारस के इस अद्भुत् चौराहे की गुरुता के बारे में जानकर विस्मय हुआ । बनारस में इससे अद्वितीय और क्या हो सकता है भला ! अंततः ज्योतिर्मय को कहना ही पड़ा – “बनारस के बारे में मेरी धारणा को आपने पूरी तरह बदल दिया है । आज के बाद मैं यह कभी नहीं कहूँगा कि बनारस में कुछ नहीं है । अब मैं बनारस में और भी घूमना चाहूँगा ।”
समय हो गया था, हमें वापस संपूर्णानन्द विश्वविद्यालय जाना था । विदायी के समय ज्योतिर्मय ने पूरी श्रद्धा के साथ पाण्डेय जी के चरण स्पर्श किये । बड़ी आत्मीयता से आशीर्वाद देते हुये पाण्डेय जी बोले - “ई हय बनारस हौ, ई हय वाराणसी हौ .... सरल भी ई हय हौ, क्लिष्ट भी ई हय हौ । जा बाबू ! फेर अइहा बनारस घूमै, मामा जी से हमार नम्बरवा ले लिहा ।”



बेचैन आत्मा के साथ ज्योतिर्मय द्विवेदी 

सारनाथ स्थित बौद्ध चैत्य के अवशेष 

चैत्य में स्वच्छन्द विचरते हिरण 

देवेन्द्र पाण्डेय के साथ यायावर 


5 टिप्‍पणियां:

  1. “ई हय बनारस हौ, ई हय वाराणसी हौ .... सरल भी ई हय हौ, क्लिष्ट भी ई हय हौ । जा बाबू ! फेर अइहा बनारस घूमै, मामा जी से हमार नम्बरवा ले लिहा ।”
    आत्मीय बोल
    बहुत सुन्दर

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    1. बनारसी बोली और आत्मीयता वनारस की विशेषता है ।

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  2. चौराहे के वर्णन से बनारस के आध्यात्मिकता महत्व का वर्णन

    बड़ी सहजता और सरलता से किया है। लेख पढ़कर मन आनंदित हुआ।

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    1. पाण्डेय जी ने बनारस के आध्यात्मिक महत्व का वर्णन "गागर में सागर" की तरह किया है । कई बार बनारस गया हूँ लेकिन कभी किसी ने इस चौराहे के बारे में नहीं बताया मुझे ।

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  3. wow baba......kinne cute lg rhe ho aap.............naanubaba ghumii ghummi..........hmm....bahut hi rochak lekh....bde din baad..aane huyaa in galiiyon me....:)
    hmmmmm...

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.