रविवार, 25 मार्च 2012

बस्तर के जंगल से... - 1


ये छोटे-छोटे पीले फल तेन्दू के हैं! इसके पत्तों से बीड़ी बनायी जाती है। फल के गूदे में पर्याप्त रेशे और मिठास होती है, लोग इसे देशी चीकू कहते हैं। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसके मीठे फल पसन्द करते हैं या फेफड़े जलाने वाली इसके पत्तों से बनी बीड़ी। उपहार और दण्ड दोनो उपलब्ध हैं निर्णय आपका है।  
बाल धोने के लिये शीकाकाई के उपयोग से कौन अनभिज्ञ है भला?

राई जैसे नन्हें दानों वाले इस मोटे अनाज का नाम है रागी ..बोले तो बस्तर के आदिवासियों के प्रिय भोज्य 'पेय' का स्रोत मड़िया। ऋषियों ने सर्वे संतु निरामयाः की कामना की है किंतु यदि आप मधुमेह से पीड़ित हैं तो यह आपके लिये भोजन और औषधि दोनो का कार्य करेगी।
ये सुन्दर से फल हैं भल्लातक यानी भिलावा के। यह काजू का छोटा भाई है, छोटा इसलिये कि एक ही परिवार का होने के बाद भी इसके फल/ बीज औषधि के अतिरिक्त सूखे मेवे के रूप में व्यवहृत नहीं होते। इसका तेल दाहक है किंतु बीज की गिरी रसायन कर्म करती है। geriatic effects को नियंत्रित करने के लिये इससे निर्मित भल्लातक अवलेह नामक औषधि सर्व विदित है।

ज़रा और करीब से देखिये, चपटा काला भाग बीज है।


ग्रीष्म ने दस्तक दे दी है, पर परेशान क्यों हो रहे हैं आप? नारियल है न! आपकी तृषा शांत करने के लिये। डाभ का मीठा पानी O.R.S.से बेहतर है, क्योंकि इसमें मिनेरल्स पर्याप्त मात्रा में हैं। डिहाइड्रेशन से बचने के लिये प्रकृति ने कितना अनमोल उपहार दिया है हमें!

 ज़रा करीब से देखिये। क्या ? आपका जी नहीं ललचाया अभी भी? झूठ .... मैं मान ही नहीं सकता।


हमारे जंगल में पधारने के लिये धन्यवाद! ये तरुणी(गुलाब) पुष्प आपके लिये हैं...
फिर आइयेगा ....


उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़ !!!! परेशान हो गया,  दो बार चित्र डाले ...दोनो बार थोड़ी देर तक चित्र ठहरे फ़िर ख़फ़ा हो गये । पता नहीं कहाँ अंतर्ध्यान हो जाते थे। शिल्पा जी और रविकर जी की शिकायतें ....चित्र नहीं दिख रहे । तीसरी बार मुझे हठ योग करना पड़ा, पता नहीं यह हठ योग कितना सफल होगा! मुझे लगता  हैकि यह चेतावनी है ..किसी दिन सारी मशीनें रूठ जायेंगी और दुनिया ठप्प ! सारा सिस्टम पैरालाइज....उफ़्फ कल्पना से ही कैसा तो लगता है! कोई देशी उपाय करना पड़ेगा। शिल्पा जी! बताइये अब आपको लोहक रहा है कि नहीं?
एक्स्प्रेशन जी ने आते ही सल्फ़ी की माँग कर दी। अब वे इस ब्लॉग के नये मेहमान हैं, हम ना तो कर नहीं सकते। तो लीजिये एक्स्प्रेशन जी! बस्तर की सल्फी से स्वागत है आपका!
बाकी लोगों को बता देते हैं ...ये जो आसमान में सिर उठाये खड़ा है न! इसी का नाम है सल्फ़ी....विदेशियों को भी इसने खूब लुभाया है। इस पेड़ का महत्व इसी से समझ लीजिये कि यहाँ पर यह पेड़ लड़कियों को दहेज़ में भी देने का रिवाज़ है। ताड़ी की तरह इसका रस भी मादक होता है। यूँ, यह मेरे किसी काम का नहीं :((  





12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी मेहनत सफल हुई, चित्र भली-भांति दिख रहे हैं। तेन्दू और भल्लातक/भिलावा के फल पहली बार देखे, आभार! ऐसी जानकारी को ब्लॉग पर लाते रहिये। मैं तो खैर अपनी माटी से बहुत दूर हूँ, परंतु बहुत से अन्य भारतीयों के लिये भी यह चित्र इन फलों से पहला परिचय ही होंगे

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  2. ||गूगल बाबा क्या कहें, करनी करे विचित्र
    आप सफल हठयोग भी, सुंदर सजते चित्र||


    बहुत खूबसूरत चित्र और जांकारियाँ।
    सादर।

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  3. बहुत ही चित्रों के साथ ज्ञानवर्धक जानकारी। मैने भी तेन्दू और भिलावा के फल पहली बार देखे। और उनकी औषधीय जानकारी भी!!

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  4. तेंदू तो हमारे ननिहाल (रेनुकूट, जिला सोनभद्र) में बहुत दिखता था.. बाक़ी सब के दर्शन आपने करा दिए.. वनस्पतियों में देवताओं का निवास इसीलिए कहते हैं!! सुन्दर, नयनाभिराम पोस्ट, डॉक्टर सा'ब!!

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  5. तेंदू भी दिखा..शिकाकाई भी..रागी भी...और गुलाब भी...
    सल्फी भी दिखाते....
    ३-४ बरस बस्तर में गुज़ारे हैं...यादें ताज़ा हो गयीं....

    आभार.

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  6. vaah vaah - ab to saare hi dikh rahe hain :)

    raagi aur naariyal paani to yahaan karnataka me bhi khoob pasand kiya jaata hai .....

    aur haan - ji lalchaaya zaroor ab to :)

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  7. प्रस्तुति बड़ी लुभावनी, प्राकृत प्रेमी मित्र ।
    नई नई चीजें मिलीं, देखे-भाले चित्र ।।

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  8. ये ब्लॉग तो चमत्कारी दिखता है....हमारी फरमाइश पूरी की और टिप्पणी खा गया बदले में...
    सल्फी के बदले सौदा बुरा नहीं.....
    :-)

    शुक्रिया आपकी आत्मीयता का...
    बस्तर की और बातों के इन्तेज़ार में....
    नवरात्र में माँ दंतेश्वरी पर कुछ कहें...
    अनु

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  9. अच्छी और नई जानकारी देती सुंदर पोस्ट। जानकार पाठक मिलें तो लेखक के साथ-साथ हमारे जैसे पढ़ने वालों का भी कल्याण निश्चित हैं।

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  10. रागी का चित्र पहली बार देखा...और भल्लातक/भिलावा के चित्र पहले तो रंग-बिरंगे छोटे छोटे पत्थर से लगे. काजू के भाई को ध्यान से देखना पड़ा.

    सारे ही चित्र जी ललचा रहे हैं...कि आ जाओ हमारे बीच :)

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.