बुधवार, 18 जून 2014

वैराग्य के वृक्ष में राग के पुष्प



देवभूमि ने मुझे सदा ही सम्मोहित किया है .....अपने आकर्षण में आबद्ध किया है । यहाँ जब भी आता हूँ, मन दैवीय ऊर्जा से भर उठता है । 

कालपा में दोपहर हो रही थी ।  शरीर पर पड़ती धूप को शीतल हवा ने दयनीय बना दिया था इसलिए आते-जाते स्थानीय लोग ऊनी कपड़ों में लिपटे दिखायी दे रहे थे । बाहर से आने वाले पर्यटक जहाँ-तहाँ होटलों के लॉन में कुर्सियाँ लगाये बैठे थे । उफ़्फ़ ! यहाँ भी होटल ! मुझे एकांत चाहिये था ......चंचल मन मौन प्रकृति से बातें करने को विकल हो रहा था । मैंने एक पगडण्डी पकड़ी और चल पड़ा .......   

सुना है, जिसे वैराग्य हो गया हो संसार से, उसके लिए देवभूमि हिमालय 
सर्वथा उपयुक्त स्थान है ........। 
तपस्या के लिए, कदाचित इसीलिए पूरे भारत के साधु-संत अपने विदेशी शिष्यों के साथ इसी हिमालय में शरण पाते हैं । 

छत्तीसगढ़ के दण्डकारण्य से जब प्रस्थान किया था हिमालय के लिए तो मन में संसार के प्रति वितृष्णा और वैराग्य के भाव थे । यह वही दण्डकारण्य क्षेत्र है जो त्रेतायुग में लंकाधिपति रावण का उपनिवेश था और जहाँ अवध कुमार श्रीराम को अपने प्रवास के अनंतर युद्ध के लिये सैन्य संगठन करना पड़ा था ।

उस दिन, मैं देवदारु के नीचे, सूख कर झड़ गयी पत्तियों के प्राकृतिक गद्दे पर बैठा था । दूर-दूर तक जैव विविधता के मनोहारी दृष्यों का सम्मोहन चुम्बक बन कर बिखर रहा था और उस शांत वातावरण में अद्भुत् हिमालयी राग छिड़ा हुआ था कि तभी मनोद्वन्द्व प्रारम्भ हो गया - क्या वास्तव में मुझे तात्कालिक वैराग्य हुआ था ? यदि हाँ, तो वैराग्य के वृक्ष में ये राग के पुष्प क्यों ? 

         वास्तव में, वैराग्य एक सापेक्ष शब्द है जो कभी भी अपने पूर्ण आदर्शरूप में घटित नहीं हो पाता । सांसारिक विकर्षणजन्य वैराग्य सदा ही अपने पूरक की खोज में बना रहता है । सांसारिक छलों से आहत मन एक पारदर्शी आश्रय की खोज में भटकता है ....जिसे हम वैराग्य कह देते हैं । वास्तव में यह पारदर्शी आश्रय ही मन में एक अद्भुत राग उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है । रंग-रंग के पुष्प, हरी-भरी घाटियाँ, हिमाच्छादित पर्वत शिखर, दूर-दूर तक अपना साम्राज्य फैलाये एकांत ...कौन साधक आकर्षित नहीं होता होगा !      

  
ऋणी हैं हम उस चितेरे के जिसने इस धरती को इतनी विविधता से चित्रित किया कि चित्र स्वयं वाद्ययंत्र बन झंकृत हो उठते हैं ।  


 शिमला का चीनी बंगला  
महाराजा पटियाला ने अपनी चीनी रानी के लिए बनवाया था । बंगले के उपवन में खड़ा है कत्थई रंग की पत्तियों वाला एक अमेरिकन फ़ाइकस जो धूप की तीव्रता के अनुसार रंग बदलता है । 


ख़ूबसूरत फूलों वाला ज़ैकेरेण्डा । 


हिमालय की एक चोटी पर पल-पल रूप बदलते बादलों का एक परिवार । उस दिन समय हमारे पास पर्याप्त  था 
इसलिए इनसे जी भर कर बातें करना अच्छा लगा । 


नैचुरली ग्रोन अनार । 
शिमला के मार्ग में घाटी में यत्र-तत्र उगे अनार के पेड़ों ने हिमालय की घाटियों को और भी ख़ूबसूरत बना दिया है ।  


      गहरे संतरी रंग की पुष्पमञ्जरी वाले इस वृक्ष से मैं परिचित नहीं हूँ ...लेकिन इससे क्या .......हमें तो इसकी मनोहारी पुष्पमञ्जरी से हालचाल पूछना है । 


प्रिय आत्मन ! 
इस सुन्दर वृक्ष का वानस्पतिक नाम आपको पता हो तो मुझे भी बताइयेगा ।लाल पुष्प से लदे इस वृक्ष की सुन्दरता देखते ही बनती है । 


साँझ हुयी तो सूरज ने अवसर देख अपने गालों से चीड़ और देवदारु की पत्तियों को हौले से छू भर दिया ।  चिर कुमार क्षितिज ने देखा तो लाज से लाल हो गया । 


 मैंने पूछा इस बैरागी से - तप के लिए चीवर उतारना इतना आवश्यक था क्या ? बैरागी चुप रहा ........मैं उत्तर पाने के लिए प्रतीक्षा करता रहा कि तभी साँझ घिर आयी .................और मुझे उत्तर मिल गया । 


यह प्रतिदिन का नियम है ...कि अदने से चीड़ की छोटी-छोटी पत्तियों के गुच्छे भोर होते ही पूरे गर्व से अपना सिर उठा कर हिमालय से हालचाल पूछने लगते हैं ....
"कहिए ! मिस्टर ग्रेट हिमालय, कल की रात कैसी कटी ? अधिक ठंड तो नहीं लगी ?" 
अपनी बिखरी जटाओं को कुछ और बिखेरते हुये हिमालय सिर्फ़ मुस्कराता भर है ....और हिमनद बह निकलते हैं । 


हिमालय की वादियों में बसपा नदी की गोद में बसे एक गाँव में 
पुष्पित सेव का बगीचा । 
मन हुआ कि बस से उतर कर एक-दो दिन के लिए यहीं रुक जाऊँ । समय के बन्धन ने रुकने से मना किया तो उतर नहीं सका इसलिए मुझे अपनी स्मृति के एक कोने में लिखना पड़ा -  "अगली बार यहाँ आकर ठहरना है ।" 


  
ख़ूबसूरत मेपल । 
काश ! मार्ग के दोनो ओर मेपल की कतारें होतीं .....

                 
        इस पुष्प के चित्र के लिए मुझे एक ख़तरनाक ऊँचाई पर चढ़ना पड़ा ।


पुष्प से अपने हिस्से का पराग माँगने आयी मधुमक्खी ! 

              पुष्प ने भी इठलाते हुये बड़ी उदारता से कहा - 
                       "ले लो न ! जितना चाहिये हो ।" 

नन्हीं कलियों ने इस सम्वाद को सुना और अपने पारिवारिक संस्कार को                                        गाँठ बाँधकर रख लिया ।  


हिमालय में भ्रमण करते समय, पत्थरों के बीच-बीच में उगे इस पादप की पत्तियों से सावधान ! इसके दंश के कारण स्थानीय लोग इसे बिच्छूबूटी कहते हैं । आप तनिक भी असावधान हुये नहीं कि इसकी पत्तियाँ आपको दंश देने में विलम्ब नहीं करेंगी  


 पशुओं का स्वदिष्ट भोजन । मैंने भी चखकर देखा ....
सचमुच ! पत्तियाँ  स्वादिष्ट हैं । 


एक फ़ोडर यह भी ..... 


खरपतवार की तरह जहाँ-तहाँ उगी भाँग ।  


आगे बढ़ने से पहले खाते हैं कुछ ताजी चेरी और रसीली खुमानी 


मैदानों में घर बनाना जितना आसान है, पहाड़ों में उतना ही दुष्कर । पूरे पर्वत पर बिखरे हुये घरों वाले गाँव के लोगों की ज़िन्दगी भी उतनी ही दुष्कर होती है किंतु पहाड़ियों के परिश्रमी स्वभाव ने सब कुछ सुगम और सुखमय बना दिया है । 


         टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डियाँ .....और पुराना इण्डो-तिब्बत राजमार्ग । भारत और चीन के मध्य कभी घोड़ों और खच्चरों पर सामान लादे व्यापारियों के काफ़िले गुजरते थे यहाँ से । हो सकता है ह्वेनसांग भी इसी मार्ग से आये हों भारत, और सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री भी गये हों चीन ...इसी मार्ग से हो कर । 
  

         यह दुर्गम मार्ग न जाने कितनी घटनाओं का साक्षी रहा है । व्यापारियों और यात्रियों के चलते हुये क़ाफ़िले, थक कर सुस्ताते हुये क़ाफ़िले, क़ाफ़िलों को लूटते हुये लुटेरे क़ाफ़िले ......! 
         न जाने कितने रक्तपात ............और प्रणय सम्बन्धों का भी साक्षी रहा है यह पर्वतीय मार्ग । प्रेमी की वंशी की स्वर लहरियाँ जब तिरती होंगी इन वादियों में तो कौन प्रेमिका दौड़ी नहीं चली आती होगी सारी बाधायें पार करती हुयी !  


किन्नर कैलाश पर्वत की चोटियों को अपने आगोश में लेती एक चंचल बदली। शिव यहाँ के कण-कण में हैं ......  
मैंने देखा है हिमालय में सर्वत्र फैली शिव की जटाओं को, जिनके हिलते ही पिघल उठता है हिम और बह उठती हैं गंगा, यमुना, सतलुज, चिनाव, रावी, स्पीति ..जैसी और कई नदियाँ ।   


        मैंने इस टहनी से पूछा - " यहाँ शिव जी कहाँ मिलेंगे ?" 
टहनी झूमकर बोली - " शिव तो यहाँ के कण-कण में व्याप्त हैं ...पहले अन्दर के पट तो खोलो ।


       शिव की जटाओं से मुक्त हो कर हिमालय की गोद से उतरती बसपा नदी ! अभी इसे बहुत लम्बी यात्रा करनी है इसलिए परिपूर्ण है ऊर्जा से । किंतु सावधान ! नदियों की ऊर्जा चुराने के लिए पूरा एक तंत्र विकसित हो चुका है । शिव कुपित हैं ...और उनके भक्त निर्भय । शिव अपनी उपेक्षा कब तक सह सकेंगे ?   


हिमालय को बचाना है तो शिव को प्रसन्न करना ही होगा । 
शिव को प्रसन्न करना है तो वृक्षों को बचाना ही होगा । 
वृक्षों को बचाना है तो नदियों को बचाना ही होगा । 

तो चलिए ...क्यों न हम प्रकृति की उपासना प्रारम्भ करें ! 

4 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. जोशी जी! धन्यवाद .... इस वाह के लिए :)

      हटाएं
  2. सम्मोहित-सी छटाएं देखती शब्द-शब्द सँजोती पढ़ती चली गई . भरत-वाक्य वाला समापन भी अच्छा रहा !

    उत्तर देंहटाएं
  3. ...जब चित्र इतना सम्मोहित कर सकते हैं तो प्रत्यक्ष दर्शन कितना सम्मोहक होगा ! चित्रों के साथ आपकी इस यात्रा से आपको हुए आनन्द से मैं भी आनन्दित हुआ ।

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.