सोमवार, 21 अगस्त 2017

गोमाता जय जय माता



रथ के पहिये
आगे की ओर चलते हैं...  
आगे वाले,
पीछे की ओर चलते हैं...
पीछे वाले ।
पहिये चल रहे हैं
तेजी से बढ़ रहे हैं
रथ
वहीं खड़ा है
यथावत् ।
निरीह प्रजा
रथ को निहारती है
गोया
सृजन गोशाला की गायें
निहारती हों
ऊँची-ऊँची
सूनी दीवारों के पार
कल्पना के हरे-भरे खेत
और मीठे जल के सरोवर 
मर जाती हों फिर
तड़प-तड़प कर ।
चलो !
हम गोमाता का अंतिम संस्कार कर आयें
अपने महान आदर्शों का प्रदर्शन कर आयें

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन उस्ताद बिस्मिला खां और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. प्रजा निरीह है, यही तो सबसे बड़ी त्रासदी है, जनता को खुद भी तो कुछ करना होगा..अब राजा तो रहे नहीं जो प्रजा के लिए सब कुछ करेंगे, अब तो जनता का राज है..हमें ही मिलकर अपना भाग्य संवारना है

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    1. कुछ नहीं ...सब कुछ जनता को ही करना है किंतु जनता यदि इतनी ही जागरूक होती तो अब तक शासनमुक्त समाज की स्थापना हो गयी होती । लोकतंत्र सभ्य समाज का सबसे बड़ा छल प्रमाणित हुआ है ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.