बुधवार, 4 अगस्त 2010

वसुधैव कुटुम्बकम्


इस घुटे-घुटे से मौसम में
यूँ जी पाओगे कब तक !
जब मनुज स्वयं विस्फोटक बनकर
रक्त बहाए नगर-नगर
तुम राज-धर्म की आस लगाये
यूँ बाट निहारोगे कब तक ?
नहीं बदलता हृदय किसी भी
राजदंड की धारा से
यह तो केवल परिवर्तित होगा
निष्कपट प्रेम की गंगा से
चलो,
'मितान' बना लें सबको
'गैर' न कोई कहलाये
बस, बहे प्रेम की धार, घृणा का
ठौर न कोई रह जाये।
महाप्रसाद के इस अवसर को तुम
कहीं भूल से भुला न देना
पलक-पांवड़े बिछा रखूँगा
तुम कैसे भी कर के आ जाना