बुधवार, 28 जनवरी 2026

वोल्गा के पार

आया फिर नव विधान

अब क्या होगा...
पूछ रहे हैं लोग
बढ़ रहा असंतोष
होने लगा अनियंत्रित 
जन आक्रोश।
क्या मिला
बनाकर लोकघाती नवविधान!
हमने बताया
मिला तो है
कोई समझे तब तो!
कोई देख सके तब तो!
समाज में उबाल है,
जातियों में खाइयाँ
हो रही हैं गहरी
और भी गहरी,
तैयारी प्रचंड है
भगाने की हमें
क़ारून दरिया
या
वोल्गा के पार।
सत्ता के लिए
यही तो अनुकूलतम है
बाटम फ़िशिंग के लिए
फेकना होता है उलीच-उलीच
सरल तरल
दूर-दूर
इतनी दूर
कि आ न सके फिर कभी
पलट कर।
दुर्लभ होती है
राजयोग की ऐसी अद्भुत उर्वरता ।
चलो,
हम भगाये जाने से पहले ही
भाग चलें
कहीं और
धरती बहुत बड़ी है,
हम तो अपने तप से
जी लेंगे कहीं भी
जैसे जिये श्रीराम
सरयू के पार
जैसे जिये श्रीकृष्ण
मथुरा से दूर।
हमारी तो चिंता के विषय हैं
माइनस ४० अंक वाले
"डाॅक्टर शाब जी" से
अपनी चिकित्सा करवाने वाले
वे रोगी
जो होंगे
बंधु तुम्हारे ही
सब के सब आरक्षित
शतप्रतिशत ।
हम तो अभी तक
इसीलिए रुके हैं यहाँ
खाकर भी तुम्हारी गालियाँ
होकर भी तुमसे प्रताड़ित 
कि हम तो चले जायेंगे
वोल्गा के पार
या क़ारून के किनारे
या कहीं भी
किसी भी भाड़ में
पर तुम्हारा क्या होगा
हमारे जाने के बाद!

सोमवार, 26 जनवरी 2026

जातीय खाइयों का गहरीकरण

समावेशिता की आड़ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट रेगुलेशन/नए नियम एकपक्षीय होने से देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गहरी असमानता और भेदभाव उत्पन्न करने वाले प्रतीत हो रहे हैं जिसके कारण विशेष रूप से सवर्ण वर्ग के छात्रों का शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य बाधित होने की स्थितियाँ निर्मित हो रही हैं। यह नियम प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध भी है जिसके शिकार सवर्ण छात्र होंगे और देश भर में कुंठा एवं प्रतिभा पलायन की स्थितियाँ उत्पन्न होंगी। शिक्षानीति का उद्देश्य सभी वर्गों को साथ लेकर चलना होना चाहिए, न कि जातीय भेदभाव के आधार पर किसी एक वर्ग के अधिकारों का हनन कर दूसरे वर्ग के लिए अन्यायवर्द्धक उर्वरभूमि तैयार करना। न्याय के नाम पर एक के साथ अन्याय करके दूसरे को उसके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करना किसी भी दृष्टि से सभ्य समाज का प्रतीक नहीं हो सकता। न्याय के नाम पर कोई भी कानून यदि एकपक्षीय होगा तो उसका परिणाम दीर्घकालीन सामाजिक विभाजन के रूप में सामने आ सकता है। ऐसे कानूनों के कारण हर छात्र को आपसी वैमनस्य की स्थिति में धकेले जाने की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। भारत का संविधान समानता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित है। ऐसे में किसी भी निर्णय समिति का "संतुलित, बहुवर्गीय और समावेशी" होना अनिवार्य है। एक ही जाति वर्ग द्वारा लिए गए निर्णय सवर्ण छात्रों के अधिकारों और विश्वास को ही प्रभावित करते हैं।

उक्त कानून में यह भी देखा जा रहा है कि नीति निर्धारण और निर्णय समितियों में सामाजिक संतुलन और विविध प्रतिनिधित्व का अभाव है जिससे कानून की ड्राफ्टिंग पर निष्पक्षता को लेकर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।

अब विचार यह करना है कि—

UGC के इस एकपक्षीय एवं सवर्ण छात्रों के विरुद्ध प्रभाव डालने वाले काले कानून/ड्राफ्ट रेगुलेशन को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए या नहीं!

क्या इस तरह सवर्ण, SC/ST/OBC सहित सभी वर्गों के छात्रों के लिए समान अवसर, मेरिट और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सकेगी!

नीति निर्धारण समितियों में सभी सामाजिक वर्गों का संतुलित और पारदर्शी प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए या नहीं!

क्या इस संबंध में छात्रों, शिक्षकों, शिक्षाविदों एवं राज्य सरकारों से व्यापक संवाद नहीं किया जाना चाहिए!

निर्णय समितियों में सामाजिक विविधता का अभाव क्या किसी नवविधान या नीति को एकपक्षीय,पक्षपातपूर्ण और अविश्वसनीय नहीं बनाता है!

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

पुनः आदिमतंत्र

आदिमतंत्र से
राजतंत्र
अधिनायकतंत्र
और लोकतंत्र से होते हुए
निरंकुशतंत्र तक की यात्रा में
उभय है शक्ति
कभी मर्यादित
कभी अमर्यादित ।

आवश्यक है शक्ति
अनुशासित शासन के लिए
पर संरक्षण की धौंस में पनपी
तुम्हारी निरंकुशता
नहीं है स्वीकार।
भूल गये हो तुम
शक्ति
अमर्यादित हो
तो पलटता है चक्र
शासनतंत्र का।

इस बार
समाप्त हो जाओगे तुम
दुर्लभ भूगर्भीय खनिजों
और तेल के पीछे-पीछे
भागते हुए
कभी इधर
कभी उधर।
बालहठ से भी बड़ा तुम्हारा हठ
कि खेलने दो मुझे
तुम्हारे स्वाभिमान
और सबकी स्वतंत्रता से
अन्यथा
जीने नहीं दूँगा किसी को।
तुम्हारा हठ
कि छीन लूँगा
धरती, नभ और पाताल
सभी लोक और सभी दिशायें
क्योंकि "महान हूँ मैं"।
सबको पता है
तुम्हारा यह सच
जो नहीं पता है तुम्हें
कि इतना बड़ा भी नहीं है
तुम्हारा विषबुझा उत्तरीय
कि ढक सको
पूरी धरती।
हठ
समेट लेने का पूरी धरती
कभी हो सका है पूरा
किसी भी बलशाली का!
सावधान!
समीप ही है
तंत्र का संक्रांति काल।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

धर्म

सतत

पदाघातों से

वाहनों के आघातों से 

कट कर 

हो जाते हैं अ-पथ

वे सुपथ

बढ़ जाता है जिनपर

आवागमन 

पर ...

नहीं होता

सर्वेक्षण 

और जीर्णोद्धार

सतत।

 

निर्जन होना होता है

एक दिन

ऐसे हर पथ को

जहाँ नहीं होता 

सर्वेक्षण 

और जीर्णोद्धार

सतत।


मूल्यविहीन हो जाते हैं 

वे मूल्य

वे विचार

वे सिद्धांत

और वे कर्म

जिनका नहीं होता

समय-समय पर परिमार्जन

और पुनर्मूल्यांकन।


भाग्यवान हैं वे सब

जो रहते हैं सजग

करते हैं स्वागत

आलोचनाओं का

ताकि कर सकें

आत्मावलोकन

और फिर परिमार्जन

देते हुये गति को सम्मान

जड़ता के विरुद्ध।


...तभी तो धर्म है

सनातन...

सार्वकालिक...

और सार्वदेशिक।


गतिमान है ब्रह्माण्ड

गतिमान है जग, 

इस जगत में 

जो ठहर जायेगा 

उसे समाप्त होना होगा

एक दिन

यह सुनिश्चित है।

शांति का मूल्य

बिकते थे पद

यूरोप में खुले आम

फिर हुयी एक क्रांति

और धर्म को जकड़ दिया गया 

बेड़ियों में

काट डाले गये 

पंख

निर्वासित कर दिया गया

समाज की सभी गतिविधियों से

उस धर्म को

जो वास्तव में था ही नहीं 

कोई धर्म।


अब पश्चिम 

एक बार फिर

गढ़ रहा है नयी परिभाषायें

बुन रहा है नयी चादरें

ढकने के लिए 

बनने वाले नये कबीलों को ।

शांति 

बहुत मूल्यवान हो गयी है

नया भाव है

एक करोड़ डाॅलर

प्रति दो वर्ष!


शांति के लिए 

अशांति की धौंस!

निःशस्त्रीकरण के लिए

परमाणु बम की धमकी!

कुछ लोगों ने बाध्य कर दिया है

प्रवेश करने के लिए 

हर किसी को  

एक असभ्य और क्रूर युग में ।

जो मैं देख पा रहा हूँ

क्या आप भी देख पा रहे हैं वही?

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

वाराणसी

टेढ़े-मेढ़े 

या सीधे-सादे

हो सकते हैं पथ

पृथक

तुम्हारे या हमारे।

सुरत्व या अ-सुरत्व 

प्रवृत्ति है 

तुम्हारी या हमारी।

कोई बनिया कोई ब्राह्मण

वृत्ति है

तुम्हारी या हमारी।

...पर उभय है

"आहार निद्रा भय मैथुनं च..."

हर किसी के लिए

विशिष्ट है तो मात्र...

"धर्मो ही तेषामधिको विशेषः..."

...और यह धर्म है 

मनोदैहिक आचरण का।


जन्म

प्रथम् सत्य है 

हमारे जीवन का 

और अंतिम है 

मृत्यु

जिसके मध्य में बिखरे हैं 

बहुत से अर्धसत्य

बहुत से असत्य

कुछ हमारे, कुछ तुम्हारे।

...और यहाँ देखो

जहाँ मिलते हैं चार पथ

एक-दूसरे से विपरीत

चार दिशाओं में जाते हुये

या

चार दिशाओं से आकर मिलते हुये

जैसा भी समझना चाहो

पर 

यह मात्र चौराहा नहीं 

सहज उपलब्ध संहिता भी है

जीवन के व्यवहारशास्त्र की।


चौराहे से...

इस पथ पर जाने से पहुँचेंगे

बाबाविश्वनाथ मंदिर

जिसके समीप ही बहती है

मात्र नदी नहीं

बल्कि *श्री गंगा जी*,

...और यह पथ ले जायेगा 

मणिकर्णिका घाट

उस पथ जाने से मिलेगी 

नश्वरदेह की दालमंडी

और उधर के पथ पर मिलेगी 

दैहिक श्रृंगार की आभूषणमंडी।

चौराहे पर

पथिकों की भीड़ बड़ी

पर निर्णय सबके पृथक-पृथक।

"धर्मो ही तेषामधिको विशेषः..."।

और...

संसार का सार तो यह है 

कि असुर भी सुरत्व के 

वेश्या भी सुलक्षणा के 

और दुराचारी भी सदाचार के

प्रमाणपत्रों के आकांक्षी रहते हैं

यही तो तत्व है

धर्म के सनातनत्व का।

शक्तिमान

मैं

छोटे-छोटे देश चबाता हूँ

बड़े-बड़े ऊर्जास्रोत निगलता हूँ

निर्लज्जता पीता हूँ

दुनिया भर को धमकाता हूँ

मित्रों पर धौंस जमाता हूँ

राष्ट्रपति को सपत्नीक उठा कर

अपनी माँद में ले आता हूँ

क्योंकि...

मैं एक असभ्य राष्ट्रपति हूँ।

मैं

अराजकता से 

अपना श्रृंगार करता हूँ

विद्रूप मुखमुद्रायें बनाता हूँ

जो नहीं बोलना चाहिए

वह अवश्य बोलता हूँ।

सावधान!

अब कुछ भी नहीं होगा पहले जैसा 

मुझसे पूछकर उगना होगा 

पौधों को

मुझसे पूछकर खिलना होगा 

फूलों को 

मुझसे पूछकर साँस लेना होगा

धरती के हर मनुष्य को,

कोई किससे बात करेगा

क्या बात करेगा

क्या व्यापार करेगा

सब कुछ मैं ही तय करूँगा।

भोजन भी पहले मैं ही करूँगा

बचा-खुचा खायेगी दुनिया

क्योंकि मैं...

धरती का सबसे बड़ा असुर हूँ

और...

मुझे चाहिये

शांति, पवित्रता और नैतिकता का

सबसे बड़ा विश्व पुरस्कार।