गुरुवार, 11 जून 2026

भारतीय संविधान की मौलिकता

संविधान निर्माता का श्रेय किसे मिलना चाहिए, इस विवाद से पहले तो यह भी एक स्वाभाविक जिज्ञासा होनी चाहिए कि हमारा संविधान मौलिक है या संकलन, या संकलन में किंचित मौलिकता के साथ संशोधन!

किसी भी देश का संविधान उस भौगोलिक क्षेत्र के देश-काल-परिवेश-प्रकृति-संसाधन-सभ्यता-संस्कृति और वहाँ के नागरिकों के निर्बाध एवं समग्र कल्याण को केंद्रित कर सुयोजित किया जाना चाहिए। सुधीजन विचार करें, क्या हमारा संविधान इन सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम है? यदि सक्षम है तो देश और संविधान से पहले कुरआन को प्रमुखता देने वाले लोगों के लिए इस देश की नागरिकता बनाये रखने का क्या औचित्य, इसे समाप्त क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए?
जो संविधान - १. अपने निर्माण के समय से ही विवादित हो (यदि कभी संविधान को जलाने की बात आई तो उसे जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति होऊँगा -भीमराव अंबेडकर), २.एक बहुत बड़े समुदाय द्वारा उसे राष्ट्रीयव्यवस्था के लिए 
सर्वोपरि न मानते हुए शरीया को सर्वोपरि माना जाता हो, और ३.विदेशी संविधानों के संकलन पर आधारित हो ...उसके औचित्य पर गंभीर मंथन क्यों नहीं होना चाहिए!

ऐसा क्या हुआ, क्यों हुआ कि श्रेष्ठता ही नहीं, मिथ्या महानता की भी खरपतवार उगती रही, पल्लवित-पोषित होती रही और पूरा देश आत्ममुग्धता में डूबा रहा?

आठ दशकों के बाद अचानक पहली बार संविधान निर्माता का एक और नाम देश में प्रकट हुआ। यह नाम अभी तक क्यों छिपाया जाता रहा? कौन था जो सत्य को छिपाकर झूठ को परोसता रहा, और क्यों?
जब सत्य उद्घाटित हुआ तो एक टिप्पणी उछाल दी गई -
"संविधान के मूल निर्माता वी. एन. राव थे, बी.आर. अंबेडकर नहीं, उन्होंने तो केवल उसकी भाषा में कुछ परिवर्तन किये थे" -यह कहना बाबा साहब का अपमान है।

भीमराव का अपमान?
प्रचण्ड वामसेफियों और भीमवादियों के रहते ऐसा दुस्साहस कौन कर सकता है भला!   

तात्विक चिंतन का संकेत है कि सत्य को प्रकाशित करने से झूठ का अपमान होना स्वाभाविक है। प्रकाश के प्रकट होने से अंधकार और झूठ, दोनों स्वयं ही अपमानित होते हैं, अन्यथा फिर "तमसोमा ज्योतिर्गमय" की कामना ही
क्यों की जाती!

रविवार, 7 जून 2026

मूलनिवासी

मूलनिवासी हैं

हम भी
उतने ही
जितने कि तुम
और उतने ही विदेशी भी
जितने कि तुम।
नहीं पता, कब हुआ यह विवाह
हमारे जेनोम्स का
जाग्रोस के जेनोम्स से
और तुम्हारे जेनोम्स का
अफ्रीकी जेनोम्स से।
हम इतना ही जानते हैं
कि हम देते रहे हैं
अपना उत्कृष्ट
अपनी मातृभूमि को
जहाँ भी लेते रहे हम जन्म
क्योंकि
संपूर्ण धरती को ही
भोगते नहीं
पूजते रहे हैं हम
इसीलिए
हम करते रहे हैं सदा
सार्वभौमिक
और सर्वकल्याण की मंगलकामनाएँ।
तुम
हमें विदेशी कहने लगे
हम
"वसुधैव" को
कुटुंबकम्" मानते रहे।
मत भूलिए
देश से अधिक स्थायी होते हैं
मांगलिक विचार
और उसकी साधना।

कब तक

 तुमने हमें कहा

आदिवासी
हम हो गये आदिवासी
तुमने हमें कहा
वंचित
हम हो गये वंचित
तुमने हमें कहा अविकसित
हम हो गये अविकसित
तुमने हमें कहा "जो-जो"
हम होते गये "वो-वो"।
पता नहीं
अभी आप हमें कहेंगे
और "क्या-क्या"
और हम होते रहेंगे
न जाने "क्या-क्या"
कभी तो छोड़ो हमें
स्वतंत्र
कि हो सकें हम "वो"
हम हैं
सचमुच में "जो"
कब तक आप बनाते रहेंगे हमें
सत्ता की सीढ़ियाँ
रौंदते हुये हमें
अपने विचारों की पादुकाओं से!
कब तक?

बुधवार, 3 जून 2026

चिकित्सा और मानव धर्म

वर्षों पहले यूरोप में एक सोशियोपोलिटिकल तूफान आया जिसने मानव व्यवहार के अन्य सभी क्षेत्रों से धर्म के हस्तक्षेप को समाप्त कर दिया। चर्चों से सारे अधिकार छीन कर उन्हें पंगु बना दिया गया। यह आँधी पूरे विश्व में एक फैशन बन गयी तो भारत भी अछूता कैसे रहता जबकि भारत में यूरोप जैसी कोई परिस्थिति थी ही नहीं। तत्कालीन यूरोप के चर्च अत्याचार और भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे ! इसलिये वहाँ एक धार्मिक परिवर्तन की आवश्यकता थी किंतु भारत में तो इस्लामिक और फिर ब्रिटिश शासन था, यहाँ सनातन धर्म जनता तक ही सीमित रहा। मनुस्मृति का स्वर्णिम युग तो छठी शताब्दी के अंत तक पूरी तरह समाप्त हो चुका था। पर यूरोप का अनुसरण करते हुये यहाँ भी धर्म का शिकार किया गया वह भी केवल सनातन धर्म का। परिणामस्वरूप भारत में भी धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित कर दिया गया। धर्म का राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग... आदि जीवन के सभी क्षेत्रों से अंकुश समाप्त कर दिया गया। धर्म का स्थान नेतावाणी ने ले लिया। भारतीयों के जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नेतावाणी का अंकुश और हस्तक्षेप नहीं है।

भारत के राजनेता सत्ता पाते ही तत्क्षण  न केवल राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ हो जाते हैं अपितु अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक, परमाणु विशेषज्ञ, गणितज्ञ, कलाकार, संगीतज्ञ अध्यात्मविशेषज्ञ, योगाचार्य आदि सब कुछ हो जाते हैं।
आज भारत का राजनेता बताता है कि हमें अपनी बच्चियों को एंटी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का टीका लगवाना चाहिए जिससे उन्हें गर्भाशय के कैंसर से बचाया जा सके।
मैं समझ नहीं पाता हूँ कि वायरोलाॅजी और इम्यूनोलाॅजी पढ़ने वाले डाक्टर भी वैक्सीनेशन का समर्थन करने के लिए अपनी चेतना की हत्या करने के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? मैं अपने सभी डाॅक्टर्स से निवेदन करूँगा कि वे इन दोनों विषयों का पुनः अध्ययन करें और माइक्रोब्स के वैरिएशन्स की प्रक्रिया में वैक्सीनेशन की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने का प्रयास करें। आप लोगों ने एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध दुरुपयोग करके लोगों को रजिस्टेंट कर दिया है, डायक्लोफीनेक का दुरुपयोग करके गिद्धों को समाप्त कर दिया है। सावधान!स्मरण रहे कि आप स्वास्थ्य रक्षक हैं, रोगवर्द्धक नहीं। अपने चिकित्सक धर्म की उपेक्षा से आप पूरी मनुष्य प्रजाति के अस्तित्व को संकट में डाल सकते हैं।

मंगलवार, 2 जून 2026

भाजपा, गाय और मुसलमान

गोमाता को लेकर रुदन करने वाली भाजपा ने गाय के नाम पर वोट तो खूब बटोरे पर अब जबकि मुसलमानों ने ही गोवध को प्रतिबंधित करने की माँग कर दी है तो भाजपा राम और लक्ष्मण से विवाह के लिए ठुकराए जाने से क्रुद्ध हुई सूर्पनखा की तरह अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गयी है।

इस मानसिक आघात से उभरते ही भाजपा नेताओं की आई प्रतिक्रियाओं ने पूरे सनातनी समाज को अचंभित और आक्रोशित कर दिया है।

किंबहुना, यदि कोई मौलाना माँग करेगा कि हर हिंदू को प्रतिदिन मंदिर जाना चाहिए, या उसे शिखा रखनी चाहिए, या भारत को हिंदूराष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए तब भी हम उनकी माँग नहीं मानेंगे, क्योंकि यह कांग्रेस की चाल है। हम मुसलमानों को हिंदुओं के अधिकार छीन कर मुसलमानों को हर तरह के लाभ तो देते रहेंगे पर उनकी हर बात का विरोध भी करते ही रहेंगे चाहे वह माँग लोककल्याणकारी ही क्यों न हो।
वाह जी वाह! क्या बात है! कितने उत्तम विचार हैं योगी आदित्यनाथ जी के! देश धन्य हुआ, गोमाता भी धन्य हुयी।
रावण होता तो भाजपा नेताओं के ऐसे उपदेश सुनने के बाद समुद्र में सेतु निर्माण के लिए राम का पुरोहित बन कर कभी नहीं जाता और न राम को मनोरथ पूर्ण होने का आशीर्वाद देता।

गुरुवार, 28 मई 2026

बस्तर से अल्मोड़ा

जल, जंगल, जमीन...

उन्होंने कहा जल, जंगल, जमीन हमारी है, इसके उपभोग का अधिकार हमें है, हम तुम्हें यह सब छीनने नहीं देंगे।
ढपली वाले आये, खूब गीत गाये... "किरांती" वाले गीत, प्रकृति के संरक्षण वाले गीत!
नारे लगते रहे, ढपलियाँ बजाई जाती रहीं...
इस बीच 'चार' (चिरौंजी) और 'आँवला' के वृक्ष लुप्त होते रहे, जल पहुँच से दूर होता गया, और जंगल की जमीन पर पहले कुछ झोपड़ियाँ और फिर पक्के मकान उगते रहे। आमचो बस्तर की ऐसी दुर्गति के लिए उत्तरदायी कौन है?

कल अल्मोड़ा वाले मार्ग पर पैदल चलते-चलते देखा- एक स्थान पर एक बूढ़ी नानी अपने नन्हें से नाती को लेकर एक गाछ के पास गयीं और हँसिये से उसकी डालियाँ काटने लगी। मुझे उत्सुकता हुयी, पास जा कर देखा, अरे! यह तो 'काफल' है।
बूढ़ी नानी के नाती को 'काफल' खाना है, इसलिए माई डालियाँ काट रही थीं। डालियों में कुछ पके, कुछ अधपके और कुछ कच्चे काफल व्यथित हो उठे, मानो कह रहे हों - "आप पके काफल चुन लीजिए, पर डालियों को मत काटिये!"

विज्ञानद्वय (भौतिकशास्त्र और वनस्पतिशास्त्र) के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने सिद्ध किया था कि प्राणियों की तरह वनस्पतियों में भी चेतना होती है और वे बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर अपनी प्रतिक्रियायें देती हैं।
बूढ़ी नानी का हँसिया जैसे ही पहली डाल पर पड़ा, काफल का गाछ पीड़ा से चीख पड़ा.... जिसे देवभूमि की बूढ़ी नानी सुन नहीं सकीं। बस्तर में भी तो भीमा राजू कहाँ कभी सुन पाया पीड़ित-शोषित चार और आमला का रुदन!
बस्तर में चार और आँवला दुर्लभ हो गये..., देवभूमि में काफल दुर्लभ होता जा रहा है। तभी तो एक दोना काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है।
मैं उदास हूँ, इसलिए नहीं कि चार वर्ष पहले तक पचास रुपये प्रति दोना मिलने वाला काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है, अपितु इसलिए कि कुछ समय बाद यही काफल एक हजार रुपये में भी नहीं मिलेगा।
राजा ने राजसेवकों से राजमार्ग के किनारे पड़े पत्थरों के वक्ष पर लिखवा दिया है -
"वन से जल, जल से जीवन"।

राजसेवकों ने राजाज्ञा का पालन किया पर इसी बीच शब्दों का उनके अर्थों से तलाक करवा दिया गया। यहाँ हलाला की कोई व्यवस्था नहीं है और प्रेरणादायक नारे भी अब गूँगे हो गये हैं। 

ब्राह्मण कितने विदेशी!

नृवंशों के पलायन और ईरानियन नियोलिथिक फार्मर, मिडिल एशियाई स्टेपी और जाग्रोस आदि कई प्रकार के जेनोम की बहुलता की कहानी में एक जिज्ञासा उभरती है, जब सभी मनुष्य किसी एक ही आदिम स्त्री-पुरुष की संतान हैं तो भौगोलिक आधार पर उनके जेनोम्स में इतनी बहुलतायें क्यों और कैसे उत्पन्न हुई होंगी, और क्या बहुलता की यह शृंखला आज भी बढ़ती ही जा रही है!

यह एक रोचक जिज्ञासा है। यह सत्य है कि देश-काल-वातावरण के अनुसार लोगों को अपनी जीवनशैली में यथोचित परिवर्तन करने होते हैं जो जीवित रहने के लिए आवश्यक है। यह एक तरह का सूक्ष्म और अपेक्षाकृत स्थायी अनुकूलन है जो अंततः किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की शारीरिक-मानसिक संरचना पर दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। नृवंशों के पलायन और बसावट की यह एक अंतहीन स्थिति है जो सदा से होती आई है, सदा होती रहेगी।
हम सभी के पूर्वज घुमंतू से कबीलों, फिर गांवों, पुरों और नगरों से होते हुये राज्यों और देशों में बसते रहे हैं। यह उसी तरह है जैसे भारत के कुछ वनवासी क्षेत्रों में झूमकृषि परंपरा वाली सभ्यता।
जीवनशैली में दीर्घकालीन परिवर्तन अंततः शरीर और जेनोम्स की संरचना में एनाटाॅमिकल परिवर्तन करते हैं जो उनकी फिजियोलाॅजिकल स्थिति को भी किंचित परिवर्तित करते ही हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सिकलिंग के प्रभावितों में मलेरिया की प्रतिरोधी क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। सिकलिंग के रोगियों को मलेरिया नहीं होता। उनमें पाई जाने वाली हीमोग्लोबिनोपैथी का अस्तित्व ही मलेरियारोधी होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है।
अब हम ब्राह्मणों के विदेशी होने की सत्यता पर विचार करेंगे। जेनेटिक विश्लेषण बताते हैं कि वास्तव में हर देश का हर नागरिक विदेशी नृवंशों का मिश्रण होता है। जंबूद्वीप निवासी ब्राह्मणों में भी मिश्रित जेनोम्स पाये जाते हैं। एक समय जंबूद्वीपीय सभ्यता अपने किंचित स्थानीय अनुकूलनों के साथ एशिया के एक विस्तृत भूभाग पर कुछ साम्यताओं के साथ प्रचलित हुआ करती थी, जिसमें यव (जौं) एवं तंडुल प्रधान कृषि का बड़ा योगदान था। लैंडलाॅक क्षेत्र के निवासियों के विपरीत समुद्रतटीय क्षेत्रों के निवासियों की जीवन शैली में जलीय जीवजंतुओं और वानस्पतिक उपलब्धताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसी तरह की अन्य भिन्नताओं ने भी कई प्रकार के जेनोम्स को जन्म देकर कई नृवंशों को जन्म दिया। तो हम ब्राह्मणों के जेनोम्स का विकास जाग्रोस पर्वत (वर्तमान ईरान) से लेकर सिंधुघाटी तक के क्षेत्र एवं बहुत थोड़ी मात्रा में वर्तमान एशिया और वर्तमान यूरोप के एशियाई सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के मिश्रण से माना जाता है। जेनोम्स में परिवर्तन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम है।
एक समय तो भारत का सीमा विस्तार तिब्बत से लेकर पश्चिम में बैक्ट्रिया और जाग्रोस तक था ही। क्या तब के अफ़ग़ानिस्तान और जाग्रोस के आसपास बसे लोग भारतीय नहीं थे! क्या आज के पाकिस्तानियों को भारतीय नृवंशों का वंशज नहीं माना जायेगा!
जाग्रोस पर्वत शृंखला से निकलने वाली कारुन, करखेह और देज नदियों के उपजाऊ क्षेत्रों में बसे "जाग्रोस जेनोम युक्त" लोगों का सिंधु नदी घाटी के लोगों से मेल-मिलाप स्वाभाविक है, इसे तत्कालीन परिस्थितियों की दृष्टि से देखिये, कौन विदेशी है!
मैं हिंदी पट्टी की जनजातीय सहित सभी समुदायों और अफ्रीकी जनजातीय लोगों की जीवनशैली, परंपराओं, गीतशैली, और उच्चारण में अद्भुत समानता से सदा अचंभित होता रहा हूँ। हमारे उच्चारण और जीवनशैली में अफ्रीका हमारे बहुत समीप है जबकि यूरोप से हमारा कुछ भी साम्य नहीं मिलता।
मनुस्मृति की सुनी सुनाई एक-दो बातों को लेकर मनुस्मृति के प्रति घृणा और तिरस्कार की तरह ही जेनेटिक्स जैसे क्लिष्ट विषय का मात्र एक वाक्य पढ़कर और शेष संदर्भ को छिपाकर कोई नया सत्य नहीं गढ़ा जा सकता।