सोमवार, 24 अगस्त 2015

पड़ोसीनामा

      
      भारत-पाकिस्तान वार्ता विफल होने की चर्चा प्रारम्भ करने से पहले यह बताना ज़रूरी है कि गंगू तेली ने पेट काट-काट कर जुटाये पैसों से अच्छी नस्ल के बैलों की एक नयी जोड़ी ख़रीदने में क़ामयाबी हासिल करली है ।
अपने जन्म से ही गंगू का सपना रहा है कि वह एक दिन अपने बैलों की घानी से पेरे तेल की बदौलत टाटा कम्पनी को धूल चटा देगा । वह अपने बैलों को ईष्र्यालु पड़ोसियों की बुरी नज़र से बचाने के लिये कई टोने-‌टोटके भी करवाता रहता है । आये दिन गंगू तेली पूरे गाँव को यह बताने से नहीं चूकता कि वह अपनी घानी के पेरे हुये तेल से किसी भी दिन टाटा कम्पनी को धूल चटा देगा ।

भारत के साथ पाकिस्तान की वार्ता प्रारम्भ होने से पहले ही असफल हो गयी । बेशक ! पाकिस्तान ने अपनी बद्बूदार इज़्ज़त बुरी तरह मैली हो चुकी अपनी जीर्ण-शीर्ण चादर से ढकने की कोशिश में, छद्म ही सही, सफलता तो प्राप्त कर ही ली है, किंतु इस छद्मता को छिपाने के लिये वह युद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न करने के प्रयासों में तीव्रता से अपनी शक्ति झोंकने का प्रयास करेगा ।
पाकिस्तान गाहे-ब-गाहे यह याद दिलाने से नहीं चूकता कि उसके पास परमाणु बम है जिसका वह भारत के विरुद्ध प्रयोग कर सकता है, किंतु वह चाह कर भी ऐसा कर नहीं सकेगा उसे मालूम है कि परमाणु बम का भारत के विरुद्ध प्रयोग धमकाने तक तो ठीक है किंतु बॉम्बिंग के लिये बिल्कुल नहीं । पाकिस्तान के पश्चिमी सीमावर्ती प्रांत अरसे से सुलग रहे हैं जिन्हें बुझाना  पाकिस्तान की कभी प्राथमिकता सूची में नहीं रहा । पाकिस्तान यह भी जानता है कि भारत पर युद्ध थोपने के साथ ही बलूचिस्तान जैसे प्रांत भी मौके का फ़ायदा उठाते हुये जल उठेंगे । वह भारत के हाथों तबाह नहीं होना चाहता किंतु भारत को चैन से रहने भी नहीं देना चाहता इसलिये घुसपैठ, भाड़े के आतंक, फ़िदायीन हमले और सीज़फायर उल्लंघन जैसी दुष्ट कार्यवाहियों से भारत के विकास की गति को लगाम देने की घटनाओं को बढ़ाने से तो चूकेगा ही नहीं ।

दुनिया जानती है कि शैतान कभी चुप नहीं बैठते ...
………फिर भी, हम नहीं चाहते कि पाकिस्तान के साथ हमें कोई युद्ध करना पड़े । भारत की तरह ही पाकिस्तान में भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो बुद्धिजीवी भी हैं और अच्छे इंसान भी । दुनिया में अच्छे लोग ज़िंदा रहने ही चाहिये । परमाणु बम अच्छे और बुरे लोगों की पहचान नहीं किया करते । गोलियाँ सूफ़ी और शैतान में फ़र्क नहीं किया करतीं ... और बारूद का धुआँ बेग़ुनाह चिड़ियों पर भी रहम नहीं किया करता । जब तोपें गोले बरसाती हैं तो दरख़्तों के साथ-साथ बया के घोसले भी ख़ाक हो जाया करते हैं । परमाणु बम की धमकी देने वाले शैतान कभी बया के घोसले में पल रहे नन्हें चूजों के बारे सोच ही नहीं पाते । ..... किंतु हम भी न सोचें ..... यह सम्भव है क्या ?

महाबदमाश बच्चे के बाप की भूमिका सही तरह से नहीं निभाता है अमेरिका

अमेरिका एक झोली वाला बाबा है जो ग़रीब बच्चों को उठाकर अपनी झोली में डाल लेता है .... बंधुआ भिखारी बनाने के लिये । वर्षों पहले उसने एक बदमाश बच्चे को भीख माँगते देखा, अमेरिका ने मुस्कराकर उसकी ओर कुछ डॉलर फेके । बच्चे ने लपक कर डॉलर उठा लिये । भूख से बेहाल बच्चे ने पहले तो एक गन ख़रीदी फिर थोड़ी सी हशीश ख़रीदी और वहीं बैठकर मज़े करने लगा । अमेरिका को यह बेवकूफ़ बच्चा बहुत अच्छा लगा । उसने न आव देखा न ताव बस गंदे, भूखे और नशे में डूबे महाबदमाश बच्चे को गोद ले लिया । अब वह अडॉप्टेड बच्चा जब-तब अमेरिका के दरवाज़े पर नशे में धुत्त होकर पहुँच जाता है, दरवाज़ा खटखटाता है और हाथ पसार देता है । अमेरिका मुस्कराकर उसे कुछ डॉलर देता है ... हर बार की तरह । फिर जैसे ही वह गंदा बच्चा घूम कर वापस चलने लगता है, अमेरिका उसे पीछे से एक लात मारकर अट्टहास करता है .... हर बार की तरह ।
नशे में धुत्त बच्चा ख़ुश होकर अमरीकी डॉलर अपने सीने से लगाये अमेरिका की एक दुकान पर पहुँचता है – कुछ अत्याधुनिक हथियार और हशीश ख़रीदने के लिये । उसे अपने पड़ोसी को परेशान करने में बड़ा सुक़ूं मिलता है । जब वह छोटा था .... मतलब बहुत छोटा ... नन्हा सा, तब उसे तालाब के किनारे आराम से बैठे मेढकों को पत्थर मारने में बड़ा मज़ा आता था । अब वह बच्चा बड़ा होता जा रहा है ... उसकी हरक़तें बढ़ती जा रही हैं ।
यह बात पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के हुक़्मरान ज़िद्दी, झूठे और बदमाश हैं जिन्होंने दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि एक बद्बूदार, फटीचर, ज़िद्दी, झूठे, झपट्टामार, भिखारी और शैतान बच्चे के रूप में पेश की है । जबकि हक़ीक़त यह है कि पाकिस्तान की ख़ूबसूरत ज़मीं पर भी हरियाली उगती है, ख़ुश्बूदार फूल खिलते हैं, धरती फल और मेवे उगलती है, हवायें गुनगुनाती हैं, झरने नृत्य करते हैं और दूर कहीं पहाड़ी पर कोई दाढ़ी वाला झूम-झूम कर सूफ़ी गीत गाता है ।

पाकिस्तानी घरों में भी बच्चियाँ हैं जिनके दुश्मन उनके आसपास ही मंडराते रहते हैं । बच्चियाँ फूलों को देखकर ख़ुश होती हैं, तितलियों के पीछे भागना चाहती हैं और अपने हिज़ाब फेककर स्कूल जाना चाहती हैं । बच्चियों की आँखों में सपने हैं .... ठीक ... जैसे भारत की बेटियों की आँखों में होते हैं । पाकिस्तान में भी अमन पसंद लोग हैं जिनका जीना मुश्किल कर रखा है कठमुल्लों ने । वहाँ भी बहुत से ऐसे युवक हैं जो अमेरिका जाकर पढ़ायी करना चाहते हैं और फिर वहीं बस जाना चाहते हैं  ..... फिर कभी पाकिस्तान वापस न आने के लिये ।

रविवार, 23 अगस्त 2015

आसपास ... अगस्त 2015

“एनी बडी कैन यूज़ मी......”

“एनी बडी कैन यूज़ मी जस्ट फ़ॉर वन थाउज़ेण्ड” - पुलिस के सामने निर्भीकता से दिया गया यह वक्तव्य है उस युवती का जो शिक्षित है, आधुनिक है, सभ्य समाज की हिस्सा है और पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर विकास के रास्ते तय करने की पक्षधर है । यह युवती फ़र्राटेदार अंग़्रेज़ी बोलती है जो कि आजकल उच्च शिक्षित होने का प्रमाण माना जाता है । यह य़ुवती जब अपने विशेष ग्राहक की ख़िदमत में जगदलपुर के पास बसे गीदम जैसे बहुत छोटे से कस्बे में पहुँचती है तो उसे रिसीव करने के लिये लक्ज़री गाड़ी बस स्टैण्ड पर हाज़िर रहती है जो इस बात का प्रमाण माना जाता है कि वह आधुनिक है । अब किसमें इतना दुस्साहस है जो इस युवती को सभ्य समाज का हिस्सा मानने से इंकार कर दे ।
प्रगति के लिये छटपटाती आधुनिक भारतीय नारी की स्वतंत्रता और उसके सशक्तीकरण का जो चित्र बस्तर के गाँवों और छोटे-छोटे कस्बों के सामने प्रकट हो पा रहा है उसका प्रभाव किशोरवय बालक-बालिकाओं पर पड़ना स्वाभाविक है ।
बस्तर में देहव्यापार निरोधक धारा का प्रावधान नहीं है इसलिये विगत कुछ वर्षॉं से इसका अनुचित लाभ उठाते हुये यहाँ देह व्यापार की घटनाओं में बड़ी तेजी से वृद्धि हुयी है । बस्तर देहव्यापारियों के लिये स्वर्ग बनता जा रहा है । कल यहाँ तीन युवतियाँ पकड़ी गयीं जिनमें से एक युवती किसी अधिकारी की पत्नी थी, दूसरी किसी ठेकेदार की पत्नी और तीसरी किसी शासकीय कर्मचारी की मंगेतर । दलाल थे शासकीय विद्यालयों में कार्यरत दो शिक्षक ।
बस्तर का देहव्यापार भी अब आधुनिक हो गया है । पहले आभिजात्य घरानों के धनाड्य शिक्षित पुरुष इस बाज़ार के ग्राहक हुआ करते थे, अब उन्हीं घरानों की शिक्षित लड़कियाँ स्वयं को बेचने के लिये बाज़ार में प्रस्तुत हो चुकी हैं । ज़िस्म की दलाली के लिये विद्यालयों के गुरुदेव भी कूद पड़े हैं । कुल मिलाकर सारा धन्धा आकर्षक हो गया है । देह व्यापार में सम्मानित परिवार की लड़कियों और स्त्रियों के प्रवेश के साथ-साथ ज्ञानदाता गुरुदेवों का दलालरूप में अवतरण समाज के साधारण परिवार के लोगों के लिये निश्चित ही चिंता का विषय है ।

हमारे लिये चिंता का एक विषय यह भी है कि गणमान्य रक्षित एवं अभयदान प्राप्त ये गुरुजन विद्या के मन्दिरों को आगे भी अपवित्र करते रहेंगे ...... अशिक्षित आदिवासियों के बच्चे इनसे ज्ञान प्राप्त करने स्कूल जाते रहेंगे । कोई देव ऐसा नहीं है जो उन्हें उनके पापों का दण्ड दे सके । 

पता नहीं हिरण्यकश्यप और दुःशासन जैसे लोग बार-बार पैदा ही क्यों होते हैं ?

चार-पाँच साल की दुधमुही बच्चियों से बलात्कार के बाद हत्या और किशोरी बालिकाओं के साथ माँ की आँखों के सामने सामूहिक बलात्कार के युग में प्रधानमंत्री के स्वप्नदृष्टा का यह वक्तव्य, कि “एक स्त्री से तीन-चार लोग बलात्कार कर सकें यह व्यावहारिकरूप से असम्भव है” हमें असुर युग की याद दिलाता है ।
उत्तरप्रदेश और बिहार का प्राचीन इतिहास असामाजिक तत्वों, दैत्यों, दानवों और लुटेरों की आतंकपूर्ण घटनाओं से भरपूर रहा है । त्रेतायुग में पहले तो राम को वनवास भेजा गया फिर वहाँ की जनता ने सीता की पवित्रता पर प्रश्न खड़े किये । तात्कालिक परिस्थितियों ने गर्भवती सीता को निष्काषित किया । कृष्ण को न जाने कितने खल-राजाओं से युद्ध करते-करते अंततः यूपी छोड़कर गुजरात के एक टापू में जाकर शरण लेने के लिये विवश होना पड़ा । गौतम बुद्ध को कई षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा ।
विदेशी आततायियों को आमंत्रित करने वाले देशद्रोही राजाओं में भी यूपी आगे रहा है । आज भी अपराधों और अराजकता के लिये यूपी-बिहार की जोड़ी पूरे भारत में जानी जाती है । जहाँ की पुलिस भैस और मुर्गियों को तो खोजने में तत्पर हो किंतु बेटियों की इज़्ज़त की सुरक्षा में परमहंस सी सांसारिक निर्लिप्तता प्रदर्शित करती हो वहाँ अब राम, कृष्ण, महावीर, और बुद्ध आ भी जायं तो क्या कर सकेंगे ?
किन्तु ध्यान रहे कि अमानवीय अत्याचारों और अन्याय के विरुद्ध यूपी-बिहार के आम लोग ही हर बार क्रांतियों का सूत्रपात भी करते रहे हैं । यूपी-बिहार के लोगो ! जागो !!  इस धरती पर बढ़ते असुरों और दैत्यों के भार को कम करने तुम्हें ही उठ कर खड़े होना होगा ।  

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

ई हय बनारस हौ बाबू !


ज्योतिर्मय को बनारस आये हुये अभी कुछ ही दिन हुये हैं इसलिये यहाँ के रास्तों और गलियों से उसका परिचय लगभग शून्य है । कहीं जाने-आने के लिये उसे जी.पी.एस. का उपयोग करना पड़ता है ।  उस दिन हमें सम्पूर्णानद विश्वविद्यालय से सारनाथ जाना था । टूटे-फ़ूटे और धूल भरे रास्तों से होते हुये हम किसी तरह सारनाथ पहुँचे । हमारे फेसबुकिया मित्र देवेन्द्र पाण्डेय घर के दरवाज़े पर हमारी प्रतीक्षा करते हुये मिले । फेसबुकियानी मित्रता के साक्षात होने का रोमांच कुछ और ही होता है । हम प्रथम बार मिले किंतु सुपरिचितों की तरह ।
घर के प्रांगण में एक सेवानिवृत्त गुरुजी लिट्टी-चोखा के उपक्रम में गोइंठा सुलगा रहे थे । कभी फेसबुक पर परिहास में पाण्डेय जी से लिट्टी-चोखा की बात, लार बहाते हुये हुयी थी । इतनी पुरानी बात उन्हें स्मरण थी । यानी प्रांगण से ही पाण्डेय जी ने हमें मोहित करना शुरू कर दिया था ।

लिट्टी-चोखा परिपाक का पूर्वकर्म - गोइंठा-दहन  

हम घर के अन्दर पहुँचे, जल-पान के पश्चात् पाण्डेय जी ने अपनी दोनो बेटियों से परिचय कराया । उनकी एक बेटी पाश्चात्य दर्शन में पीएच.डी. कर रही है । विषय को लेकर चर्चा शुरू हुयी (चर्चा के विषयों को लेकर ब्राह्मण लाचार है, वह या तो पढ़ायी-लिखायी की बात करेगा या फिर भोजन की) । मैंने पाश्चात्य और भारतीय दर्शन के तुलनात्मक अध्ययन की चर्चा छेड़ दी । चर्चा में ज्योतिर्मय भी सम्मिलित हुआ, दर्शन में उसकी रुचि देखकर पाण्डेय जी ही नहीं मैं भी प्रभावित हुआ । उसने अभी-अभी इलाहाबाद से इण्टरमीडियेट किया था ।

बनारस के बारे में चर्चा हुयी तो ज्योतिर्मय ने कह दिया कि वह जल्दी से जल्दी बनारस छोड़कर इलाहाबाद जाना पसन्द करेगा । बातों ही बातों में बिना किसी लाग-लपेट के ज्योतिर्मय ने यह भी कह दिया कि बनारस उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा, यहाँ है ही क्या सिवाय टूटी-फूटी सड़्कों, धूल और गन्दगी के । उसकी बात से मुझे थोड़ा संकोच हुआ लेकिन पाण्डेय जी सहज ही नहीं बने रहे बल्कि बीच-बीच में हंसते भी रहे ।  

जो कभी लिट्टी-चोखा का स्वाद ले चुके हैं उनके लिये यह एक विशिष्ट भोजन है जिसके प्रति उनकी दीवानगी देखने लायक होती है । लिट्टी-चोखा की उपलब्धि के लिये बड़े धैर्य और श्रम की आवश्यकता होती है । मुझे यह आध्यात्मिक साधना से पूर्व की प्रारम्भिकसाधना से कम नहीं लगती ।
बातों-बातों में समय का पता ही नहीं चला । टेबल पर भोजन लगाया जा चुका था । लिट्टी-चोखा, दाल-चावल और खीर के अतिरिक्त एक कटोरे में पृथिवी की एक दुर्लभ चीज भी थी – “शुद्ध देशी घी” ।
बनारस की लिट्टी-चोखा 

स्वादिष्ट भोजन के पश्चात् हमारा कार्यक्रम कुछ देर विश्राम करके बौद्धनगरी के भ्रमण का था । धूप तेज थी और पाण्डेय जी प्रतिश्याय से पीड़ित थे फिर भी बड़ी रुचि एवं आत्मीयता से उन्होंने हमें सभी स्थानों का भ्रमण करवाया ।
बौद्धस्तूप, हिरण उद्यान एवं उसके पास बौद्ध चैत्य के अवशेष देखकर ज्योतिर्मय को अच्छा लगा । इतना अच्छा लगा कि उसने माँ को भी वहाँ लाकर घुमाने की इच्छा प्रकट की । पाण्डेय जी को प्रवेश का एक मार्ग दिखायी दिया गोया किसी एक्सप्रेस ट्रेन की भीड़-भाड़ वाली जनरल बोगी में एक पैर टिकाने की जगह मिल गयी हो । उन्होंने ज्योतिर्मय से चर्चा करनी शुरू की -  “बनारस अद्भुत् नगर है । यहाँ माया है और माया से मुक्ति का मार्ग भी है । यहाँ ठग हैं और सत्यनिष्ठावान भी हैं । यहाँ अज्ञानी हैं और महाज्ञानी संत भी हैं । ज्ञान, भक्ति, विद्या, तंत्र, मंत्र, नृत्य, संगीत .... सब कुछ है इस भोले बाबा की नगरी में । प्रश्न यह है कि लोगों की वांछना क्या है ? यहाँ विरोधाभास मिलेंगे, साधना के मार्ग में अवरोध मिलेंगे, “वाटर” जैसी फ़िल्मों की कथावस्तु मिलेगी और कीचड़ मिलेगा ....किसी साधक की प्रतीक्षा में, जो आकर उसमें कमल उगा सके । किसी को कीचड़ देखकर घृणा हो सकती है, उसी कीचड़ को देखकर किसी का मन प्रसन्न हो सकता है कि उसे कमल उगाने के लिये उपयुक्त स्थान मिल गया है ।”
ज्योतिर्मय को गणित और पैरालल वर्ल्ड से लेकर बायोटेक्नोलॉजी, दर्शन और नाट्य कला तक में रुचि है । उसे स्टीफ़ेन हॉकिंस पसन्द हैं तो कणाद और पाणिनि भी पसन्द हैं । पाण्डेय जी की बातें ज्योतिर्मय के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करती जा रही थीं और वह मंत्रमुग्ध होकर उनकी एक-एक बात को बड़े ध्यान से सुनता जा रहा था ।
अंत में पाण्डेय जी ने बनारस के एक चौराहे के बारे में ज्योतिर्मय को परिचय दिया – “इस चौराहे की एक सड़क मणिकर्णिका घाट जाती है, दूसरी व्यापारियों से भरे बाजार की ओर, तीसरी बाबाविश्वनाथ मन्दिर की ओर और चौथी सड़क वारांगनाओं के मोहल्ले की ओर । पूरे विश्व में बनारस के अतिरिक्त ऐसा अद्भुत् चौराहा और कहीं नहीं मिलेगा । पथिक को चुनना है कि उसे किस मार्ग पर चलना है ।”
ज्योतिर्मय द्विवेदी को बनारस के इस अद्भुत् चौराहे की गुरुता के बारे में जानकर विस्मय हुआ । बनारस में इससे अद्वितीय और क्या हो सकता है भला ! अंततः ज्योतिर्मय को कहना ही पड़ा – “बनारस के बारे में मेरी धारणा को आपने पूरी तरह बदल दिया है । आज के बाद मैं यह कभी नहीं कहूँगा कि बनारस में कुछ नहीं है । अब मैं बनारस में और भी घूमना चाहूँगा ।”
समय हो गया था, हमें वापस संपूर्णानन्द विश्वविद्यालय जाना था । विदायी के समय ज्योतिर्मय ने पूरी श्रद्धा के साथ पाण्डेय जी के चरण स्पर्श किये । बड़ी आत्मीयता से आशीर्वाद देते हुये पाण्डेय जी बोले - “ई हय बनारस हौ, ई हय वाराणसी हौ .... सरल भी ई हय हौ, क्लिष्ट भी ई हय हौ । जा बाबू ! फेर अइहा बनारस घूमै, मामा जी से हमार नम्बरवा ले लिहा ।”



बेचैन आत्मा के साथ ज्योतिर्मय द्विवेदी 

सारनाथ स्थित बौद्ध चैत्य के अवशेष 

चैत्य में स्वच्छन्द विचरते हिरण 

देवेन्द्र पाण्डेय के साथ यायावर 


मंगलवार, 4 अगस्त 2015

पोर्न के समर्थन में हैं देश के बुद्धिजीवी


प्रसिद्ध लेखक चेतनभगत और फ़िल्मनिर्देशक रामगोपाल वर्मा के साथ-साथ एक न्यायाधीश भी पोर्न के समर्थन में कूद पड़े हैं । पोर्न के समर्थन का सीधा सा अर्थ समाज के लिये उसकी आवश्यकता को रेखांकित करता है । बुद्धिजीवियों द्वारा पोर्न का समर्थन किये जाने से अब यह एक बड़ी बहस का विषय हो गया है । इस बहस में एक ओर हैं देश के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और दूसरी ओर हैं हमारे जैसे सामान्य नागरिक । ये वो बुद्धिजीवी हैं जो आधुनिक चिंतन के फ़ैशन को अपनाकर विकास की नयी-नयी परिभाषायें गढ़ने में कुशल हैं । भारतीय जीवनमूल्य, सनातनधर्म, वैदिक सभ्यता, भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति, भारतीय लेखन, भारतीय चिंतन ..... और वह सब कुछ जो भारत की विशिष्ट पहचान का प्रतीक है, इन बुद्धिजीवियों के भेदकलक्ष्य हैं    

         हम पोर्न का समर्थन नहीं करते, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर भी नहीं । यह एक कुतर्क है कि सामाजिक क्षति पहुँचाये बिना बन्द कमरे में पोर्न के आनन्द से किसी को वंचित करना किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अपहरण करना है । हम यह नहीं मानते कि बन्द कमरे में पोर्न का उपयोग समाज को क्षति नहीं पहुँचाता । अनैतिक यौन सम्बन्धों और यौनापराधों के लिये कारणभूत तत्वों में पोर्न आचरण भी उत्तरदायी है । पोर्न आचरण केवल बन्द कमरे में देखने तक ही सीमित नहीं रह सकता उसके पश्चातवर्ती प्रभावों की एक लम्बी श्रृंखला मनोवैकारिक और मनोदैहिक विकृतियों को जन्म दे सकती है । चेतन भगत का सुझाव है कि स्त्रियों को स्पर्श करना और घूरना प्रतिबन्धित होना चाहिये, पोर्न देखना नहीं । तथाकथित नयी चेतना के आदर्श चेतनभगत का सुझाव और चिंतन मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के विरुद्ध है । जो पोर्न देखकर कमरे से बाहर निकलेगा वह सामने पड़ने वाली हर स्त्री के सामने यौनचिंतनमुक्त नहीं हो सकता, ऐसे व्यक्ति के लिये स्त्री को घूरना और स्पर्श करना ही नहीं बल्कि यौनव्यवहार की किसी भी सीमा का उल्लंघन करना पोर्नदर्शन के पश्चातवर्ती प्रभाव का ही परिणाम होगा । ऐसे व्यक्ति पोर्नप्रेरित अपनी यौनकल्पना को व्यावहारिक प्रत्यक्ष में परिवर्तित करने का कोई अवसर हाथ से जाने देंगे, ऐसा सोचना जड़ता का परिचायक है ।
        विकृतसमाज की सोच वैश्यावृत्ति को भी समाज की आवश्यकता मानकर उसका समर्थन करती है । हम इसे भी स्त्री-पुरुष यौनसम्बन्धों का सर्वाधिक घृणित और वीभत्स रूप मानते हैं किंतु वैश्यावृत्ति की अपेक्षा पोर्नआचरण कहीं अधिक विकृत और गम्भीर दुष्परिणाम देने वाला है ।

पोर्न एक विकृत उद्योग की तरह स्थापित हो चुका है । इस उद्योग में कच्चेमाल की तरह प्रयुक्त लड़कियों और स्त्रियों की मनोदैहिक, व्यक्तिगत-सामाजिक पीड़ाओं और अमानवीय शोषण की स्थितियों के प्रति रामगोपाल वर्मा, न्यायाधीश जी और चेतनभगत की चेतना शून्य है ।
जे.एन.यू. में व्याप्त अपसंस्कृति के संवाहक इन बुद्धिजीवियों ने भारतीय जीवनमूल्यों के विरुद्ध अपसंस्कृति का बिगुल फूंकने की सारी नैतिक और सामाजिक सीमाओं की धज्जियाँ उड़ाने को ही अपने विकासशील होने का मानदण्ड बना लिया है । चेतनभगत जैसे बुद्धिजीवियों से देश के युवावर्ग को सावधान रहने की आवश्यकता है ।    

.....चलते-चलते ..... एक समाचार यह भी मिला है कि राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों में अब “महान संत आसाराम” को भी स्थान दिया गया है । पाठ के लेखक, पाठ्यपुस्तक में पाठ को सम्मिलित करने वाले अधिकारी और वह पूरी श्रृंखला जो इस कार्य में संलिप्त है, धर्मोपदेश के बहाने अनैतिक यौनव्यापार और स्त्री उपभोग के समर्थक और पोषक हैं ।  
***
सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है वयस्कों को पोर्नआचरण का अधिकार – सेवा निवृत्त न्यायाधीश शिवकुमार शर्मा ।

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम- 2008 के सेक्शन 79(3) (बी) तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद19(2) के अंतर्गत तत्काल चुनिन्दा 857 वेबसाइट्स को प्रतिबन्धित करने के लिये इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को निर्देश ज्ञापित किये हैं । सेवानिवृत्त न्यायाधीश शिवकुमार शर्मा ने सरकार द्वारा पोर्न की 857 वेबसाइट्स को प्रतिबन्धित किये जाने के विषय पर सरकार को उपदेश देते हुये कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने वयस्क व्यक्ति को पोर्न आचरण का अधिकार प्रदान किया है । सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्डिक्ट को ठीक से समझे बिना ही प्रतिबन्धात्मक आदेश ज्ञापित कर दिये हैं जो कि न्यायालय के वर्डिक्ट की अक्षरशः अनुपालना नहीं है । साइबर प्रकरणों के अधिवक्ता पवन दुग्गल के अनुसार सरकार ने सीधे-सीधे सर्विस प्रोवाइडर्स को सेक्शन 79 के आधार पर आदेश ज्ञापित कर दिये हैं जबकि ऐसे आदेश सार्वजनिक करते हुये टेलीकम्युनिकेशन विभाग द्वारा ज्ञापित किये जाने चाहिये थे । दुग्गल के अनुसार ऐसे आदेश आई.टी.एक्ट के सेक्शन 69 के आधार पर ज्ञापित न करके सेक्शन 79 आधार पर ज्ञापित किये गये हैं जो एक रहस्य है ।
भारत के तथाकथित सभ्यबुद्धिजीवी पोर्नआचरण बच्चों के लिये वर्ज़्य मानते हैं, वयस्कों के लिये नहीं । बहरहाल, “पोर्न हाँ” “पोर्न ना” युद्ध ज़ारी है ।  

शनिवार, 1 अगस्त 2015

देश में विदेशी ध्वज – नपुंसकता की द्योतक एक नयी परम्परा


-       वो बलात्कार करते हैं, हम बलात्कार सहते हैं ।
-    भ्रष्टाचार की तरह बलात्कार भी हमारी सभ्यता का एक अघोषित अंग बन कर स्थायी होता जा रहा है । आधुनिक बलात्कार केवल शरीर का ही नहीं बल्कि आत्मा, स्वाभिमान, स्वतंत्रता और निष्ठा का भी किया जा रहा है ।   
-       भारत के लोग अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ होते विदेशी बलात्कार को सहने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं । राष्ट्रीय सम्प्रभुता की घोषणा संविधान के पन्नों में लिख कर अल्मीरा में बन्द कर दी गयी है ।
-       भारत में पाकिस्तान और आई.एस.आई.एस. के लहराते ध्वज, पाकिस्तान ज़िन्दाबाद के उद्घोष, हिन्दुस्तान मुर्दाबाद के नारे और आये दिन आतंकवादी हिंसा की ज्वालायें अब राष्ट्रीय कर्णधारों और भारतीयों को व्यथित और आन्दोलित नहीं करतीं ।
-       जघन्य हत्यायें करने वाले राष्ट्रद्रोही की शवयात्रा में हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती है गोया समाज अपने नायक को अंतिम विदायी दे रहा हो । यह कौन सा समाज है जिसकी उन्मुक्त राष्ट्रद्रोही हरकत पर चारो ओर ख़ामोशी है और कोई इसके ख़िलाफ़ सामने आने का साहस नहीं कर पा रहा है । राष्ट्र के अन्दर यह कौन सा राष्ट्र जन्म ले रहा है जिसकी मान्यतायें, निष्ठा, मूल्य और संस्कार भारत के विरुद्ध हैं ?  
-       भारतीयों की राष्ट्रीय संवेदना कुन्द होती जा रही है, स्वाभिमान तिरोहित होता जा रहा है और मुस्लिम युवाओं का इस्लामिक स्टेट की स्थापना के लिये ज़िहाद के प्रति आकर्षण प्रारम्भ हो चुका है ।
-       माननीयगण आतंकियों के समर्थन में उठ खड़े हुये हैं, आधी रात के बाद देश की सर्वोच्च अदालत माननीयों के दबाव के आगे नतमस्तक होते हुये मृत्युदण्ड की क्षमायाचना पर सुनवायी करती है ...... एक जघन्य हत्यारे की प्राणरक्षा के अंतिम अवसर की तलाश में देश के सांसद और सुस्थापित बुद्धिजीवी नैतिकता की हत्या कर देते हैं जबकि दशकों पुराने केस सुनवायी का इंतज़ार करते-करते कॉमा की स्थिति में पहुँच चुके हैं ।
-       सांसद और न्यायाधीश न्यायिक त्वरिता की प्राथमिकता एवं पात्रता तय करने में असफल हो चुके हैं ।
-       सत्ता, शासन, अनुशासन, प्रशासन, लोकतंत्र, मौलिक अधिकार, सुरक्षा और देशभक्ति जैसे शब्द अपने अर्थ खो चुके हैं और कश्मीर अराजकता, अशासन, हिंसा, विद्रोह और राष्ट्रद्रोह के रास्ते पर तेजी से चल पड़ा है ।
-       किसी भी देश का राष्ट्रीयध्वज उस देश की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता की उद्घोषणा करता है । किसी भी देश का राष्ट्रीयध्वज उस देश के नागरिकों को उनकी सुरक्षा और मौलिक अधिकारों की सुनिश्चितता का आश्वासन देता है । किंतु जब भारत के कश्मीर में लहराते विदेशी ध्वज भारत की सम्प्रभुता को चुनौती दे रहे होते हैं तो भारत की संसद में मतभेद और गतिरोध जारी रहता है ।   
-       कश्मीर जल रहा है, देश का हर शहर असुरक्षित है, नागरिक अनाश्वस्त और सशंकित हैं । संविधान की शपथ लेने वाले लोग गहरी नींद में हैं और मैं समाज और देश के लिये शासन के औचित्य को खोजने में अपनी नींद हराम कर रहा हूँ ।  

*** और चलते-चलते .........

आज गुरुदास कामत ने स्मृति ईरानी की शिक्षा और मंत्रीपद के लिये योग्यता और पात्रता पर अशोभनीय ढंग से वक्तव्य दिया । गुरुदास कामत वह नहीं देख पा रहे हैं जिसे पूरा देश देख पा रहा है कि स्मृति ईरानी की सौम्यता, व्यक्तित्व, शालीनता, भाषा, वक्तृत्वशैली, चिंतन और दूरदृष्टि ने उन अनेक माननीयों को धूल चटा  दी है जिन्हें उच्चशिक्षित और अनुभवी होने का दम्भ है । 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

मृत्युदण्ड के औचित्य पर एक अनावश्यक चर्चा



वे नहीं चाहते कि किसी जघन्य अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जाय । उनका तर्क है कि जीवन अनमोल है जो ईश्वर की देन है, हम जीवन उत्पन्न नहीं कर सकते तो हमें किसी का जीवन लेने का अधिकार क्यों होना चाहिये ? ऐसा तर्क देने वालों में उन लोगों की संख्या अधिक है जो मांसाहारी हैं और जीवहत्या के समर्थक हैं ।  

समाज को अधोगामी होने से बचाने के लिये शासन के माध्यम से अंकुश की आवश्यकता दुर्बलचरित्र वाले मनुष्य के लिये एक अनिवार्य व्यवस्था है । न्याय व्यवस्था इसी समाज व्यवस्था का भाग है जिसके लिये न्यायाधीश अधिकृत किया जाता है कि वह न्याय की परिधि में अपने सम्पूर्ण विवेक का उपयोग करते हुये समाजव्यवस्था को निरंकुश हो जाने से बचाये रखने  के लिये उपयुक्त दण्ड सुनिश्चित करे ।

जहाँ तक न्यायव्यवस्था द्वारा अपराधी को दी गयी मृत्यु का प्रश्न है तो हम जानना चाहते हैं कि सीमा पर सैनिक हत्यायें क्यों करते हैं ? हर सैनिक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये लड़ता है ....वह किसी भी पक्ष का क्यों न हो उसे भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना कि एक सामान्य नागरिक को । दो देशों के सैनिक आपस में व्यक्तिगतरूप से शत्रु नहीं होते, वे अपराधी भी नहीं होते, वे धरती पर बोझ भी नहीं होते .... बल्कि वे अपने देश के लोगों के लिये उत्कृष्ट नायक होते हैं ..... फिर भी वे एक-दूसरे की हत्या कर देते हैं, जो बच जाता है उसे हम सम्मानित करते हैं । एक युद्ध ....एक मृत्युदण्ड, दो व्यवस्थायें ... दोनो में मनुष्य द्वारा मनुष्य की हत्या । एक प्रशंसनीय, दूसरी विवादास्पद । युद्ध के लिये सहमति, मृत्युदण्ड के लिये असहमति । यह कैसा मानवीय चिंतन है ? यह कैसी व्यवस्था है ?
जघन्य अपराधी का जीवन समाज, देश और मानवीयता के लिये कलंक है .....  बोझ है । वह समाज को दुःखी और पीड़ित करता है फिर भी सहानुभूति का पात्र ?
एक सैनिक की शहादत स्वागतेय है किंतु जघन्य अपराधी को दिया गया मृत्युदण्ड अमानवीय ! यह कैसा विद्रूप चिंतन है ?
समाज अनुशासन से चलता है और अनुशासन के लिये कठोरता आवश्यक है । जघन्य अपराधी को मृत्युदण्ड मिलना ही चाहिये । युद्ध राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के अतिवाद और राजनीतिज्ञों के अहंकार के परिणाम हैं ... इन्हें रोका जाना चाहिये । जो लोग मृत्युदण्ड के विरोधी हैं उन्हें मानवीय आधार पर सैन्ययुद्धों के विरोध में विश्वजनमत के लिये अपनी शक्ति का उपयोग करना चाहिये ।


हम मृत्युदण्ड को एक अनुशासित और अपराधरहित समाज के लिये अनिवार्य आवश्यकता स्वीकार करते हैं ।        

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

शुक्लपक्ष- कृष्णपक्ष



आज दो नश्वर शरीरों को धरती ने अपनी गोद में चिरनिद्रा के लिये स्थान दिया । एक चर्चित संत था और दूसरा जघन्य अपराधी । एक जीवन भर देश का बोझ उठाता रहा, दूसरा जीवन भर मानवीयता के लिये बोझ बना रहा ।

दोनो की आत्माओं ने अपनी-अपनी कर्मगति के अनुरूप दुनिया को अलविदा कहा ।
एक की अंतिम यात्रा को परमगति कह गया, दूसरे की यात्रा को मृत्युदण्ड ।
दोनो की पूरे देश में चर्चा होती रही- एक की प्रशंसा के लिये, दूसरे की निन्दा के लिये ।

संत ए.पी.जे. अब्दुल क़लाम को विद्यादान करते समय विद्या की देवी सरस्वती ने चिर अवकाश के लिये अपने पास बुला लिया । जबकि मुम्बई बम धमाकों के जघन्य अपराधी याक़ूब मेमन को नागपुर के केन्द्रीय कारावास में फांसी से लटकाया गया ।

अपने भौतिक जीवन के अंतिम क्षणों में संत कलाम शिलॉंग में छात्रों के बीच थे जबकि मुम्बई बम धमाकों का जघन्य अपराधी याक़ूब मेमन कारावास में अपराधियों के बीच ।

एक के अवसान पर पूरा देश रोया, दूसरे की मृत्यु पर पूरे देश ने चैन की सांस ली । एक ने अपनी यात्रा शांति और प्रसन्नता के साथ पूरी की, दूसरे ने अपनी यात्रा विवाद और दुःख के साथ पूरी की ।

अपराधी के मृत्यु दण्ड पर सियासत ग़र्म हुयी ...... विवाद हुआ ........ कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अपराधी की ज़िन्दगी के प्रति मोहासक्त हुये .....और उसे एक राष्ट्रीय विवाद बनाने की निकृष्ट कुचेष्टा में अपने जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ करते रहे ।
संत के देहावसान पर सियासत ख़ामोश थी ......और लोग पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित करते रहे । अपराधी की फांसी पर सियासत ग़र्म होती रही ....ख़ूब ग़र्म होती रही और कई सफेदपोश अपराधी एक कालेपोश अपराधी की ज़िन्दगी बचाने की ज़द्दो-ज़हद में अपनी ज़िन्दगी को बुरी तरह कलंकित करते रहे ।

इस बीच सूत्रधार अपने कार्य में व्यस्त था, उसने नट-नटी से कोई चर्चा नहीं की । वे दोनो उदास बैठे थे । तभी नटी ने नट से जिज्ञासावश पूछा – “क्या कलियुग अपने शीर्ष पर है”। उदास नट ने एक गहरी साँस लेते हुये उत्तर दिया – “अभी नहीं ..... अभी तो भारत को और भी दुर्दिन देखने शेष हैं”। नटी ने व्यथित होकर कहा – “शुभ-शुभ बोलो न ! मुझे भयभीत क्यों कर रहे हैं”। शून्य में अपनी आँखें गड़ाये नट ने कहा – “जब राष्ट्र के कर्णधारों में अपराधी मानसिकता का बाहुल्य हो तो शुभ की कल्पना भी कैसे की जा सकती है नटी !”


रंगमंच पर आज लोगों ने यवनिका गिरने ही नहीं दी । कहा गया कि बहस अभी ज़ारी रहेगी .... यह कि दण्ड में मृत्यु का प्रावधान होना चाहिये या नहीं ....