शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

मुफ़्तख़ोर


हम
प्रायः अनमने होकर
नेताओं को दिया जाने वाला  
झूठा सम्मान भी नहीं दे सकेंगे  
उस मुफ़्ती को
जो भारत की खाता है
पाकिस्तान की गाता है
वह मुफ़्तख़ोर
पूरी तरह
एक घृणित इंसान है ।
उसका चरित्र
उसका चिंतन
उसके क्रियाकलाप
इतने निन्दनीय हैं
कि हम
स्वयं को असमर्थ पाते हैं
उसकी निन्दा करने के लिये ।
हाँ ! उसे होना चाहिये
कठोर कारावास में
अपने अन्य देशद्रोही मित्रों के साथ ।

भारत की पूर्ण बहुमत सरकार
कश्मीर की वादियों में
इतनी विवश
इतनी अक्षम

और इतनी दयनीय क्यों है ? 

यह बूढ़ा कानून सेवानिवृत्त कब होगा ?


किसने बनाया
यह कानून
जो चिंतित है
उस अजन्मे के
मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिये  
जिसका बीज ही
अंकुरित हुआ है 
अनैतिकता और अपराध के खेतों में ।

बूढ़ा कानून
क्यों इतना मौन है  
क्यों इतना निर्मम है
क्यों इतना संवेदनहीन है  
उसके
मौलिक अधिकारों के प्रश्न पर
जो जन्म ले कर
बन चुकी है
किसी परिवार और समाज का हिस्सा
और होती जा रही है घायल
अन्याय के तीखे नेज़ों से ?
क्यों नहीं देख पाता
यह अन्धा और संवेदनहीन कानून   
पलपल बढ़ते जा रहे घावों से रिसते मवाद को ?

पहले
अपहरण
फिर यौनउत्पीड़न के दंश
अब
भ्रूण ढोने
और अपने रक्त से
उसका पोषण करने की विवशता,
प्रसव के बाद
घूरती दृष्टियों की प्रतीक्षा ।
और जब पापियों का बीज
होकर पल्लवित करेगा प्रश्न  –
“माँ ! कौन है मेरा पिता ?”
तब
पल-पल मरती माँ की लाश को देखकर
ठकाके लगायेंगे
पापी
जिनके अपराधों को
दण्ड देने में असफल रहा है
सदा चिंतित रहने वाला कानून ।

यह बूढ़ा कानून

सेवानिवृत्त कब होगा ? 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

म्हारो प्यारो ......नखरीलो ....हिन्दुस्तान


मूढ़ गर्भ के प्रसव की पीड़ा से
मुक्ति मिल गयी है मुझे
आज
चार कविताओं का
एक साथ जन्म हुआ है
और मैं
बहुत हलका महसूस कर रहा हूँ ।

1.   
भारत
भीड़-भाड़ वाला
किंतु
अल्पसंख्यकों से भरपूर लोगों वाला
एक रहस्यमय देश है ।
बहुत से समुदाय
जो भीड़-भाड़ का प्रतिनिधित्व करते हैं
और वास्तव में अल्पसंख्यक कतई नहीं हैं
वे ही सबसे अधिक अल्पसंख्यक हैं ।
संख्याओं का यह प्रस्तुतीकरण
लोकतंत्र का
काला जादू है ।
काला जादू
लोगों को हैरत में डालता है
दाँतों तले उँगली दबाने को मज़बूर करता है ।
इस काले जादू का गणितीय दर्शन
एक अद्भुत रहस्य है
जिस पर काले अंग़्रेज़ों का पूरा वर्चस्व है ।  
2.   
भारत
अद्भुत देश है ।
यहाँ ख़तरनाक सपेरे हैं
जिनके आगे ज़हरीली नागिनें 
नाचना नहीं चाहतीं
फिर भी नाचती हैं ।
क्योंकि सपेरे
उनसे भी अधिक ज़हरीले हैं ।

3.   
भारत
एक हंगामेदार मुल्क है
हंगामा इसकी फ़ितरत है
हंगामा इसका अर्थशास्त्र है
हंगामा इसका दर्शन है
हंगामा इसकी जान है ।
साधु पर हंगामा
दस्यु पर हंगामा
संत पर हंगामा
दुष्ट पर हंगामा
राष्ट्रवाद पर हंगामा
राष्ट्रद्रोह पर हंगामा
वोट पर हंगामा
नोट पर हंगामा
हार पर हंगामा
जीत पर हंगामा
कश्मीर पर हंगामा
तस्वीर पर हंगामा
पाकिस्तानी झण्डे पर हंगामा
शिवसेना के डण्डे पर हंगामा
बेइमान पर हंगामा  
बेइमान नहीं हैं तो और अधिक हंगामा
हंगामे पर हंगामा
हंगामा न हो तो और भी हंगामा
और ...
यह कोई कविता-अविता नहीं है
हंगामा है .........सिर्फ़ एक हंगामा
जिससे किसी की फ़ितरत नहीं बदलती
मुल्क की तस्वीर नहीं बदलती ।
कई हज़ार करोड़ के घोटाले पर
सिर्फ़ कुछ लाख का ज़ुर्माना !!!
सिर्फ़ यही तो एक मज़ाक है
जिस पर कोई हंगामा नहीं होता ।  

4.   
भारत
सहिष्णु देश है
यहाँ बकरी और शेर
एक ही घाट पर टहलने आते हैं  
यहाँ जंगल का अलिखित संविधान है
जिसमें हर किसी के लिये जीने-मरने का प्रावधान है
यहाँ ग़ैरकानूनी कानून पूरी ईमानदारी से लागू किये जाते है ।
यहाँ
शेर ने वादा किया है
कि वह
बकरी और उसके बच्चों ...बच्चों के बच्चों ...और उनके भी बच्चों की
हिफ़ाजत करेगा
और टैक्स में
ज़्यादा नहीं
सिर्फ़ थोड़ा सा ग़र्म ख़ून और ज़रा सा मुलायम गोश्त लेगा ।
बकरियाँ ख़ुश हैं ....बेहद ख़ुश हैं
कि उनकी जान बख़्श दी गयी है
वे रोज
शेर को थोड़ा-थोड़ा ख़ून और थोड़ा-थोड़ा गोश्त देती हैं
यह ग़ज़ब की लोकतांत्रिक व्यवस्था
युगों-युगों तक चलती रहेगी
इसकी जड़ें बड़ी पुख़्ता हैं ।
रोज की तरह आज भी
खोमचे वाले ने दस रुपये
मोची ने बीस रुपये
और भिखारी ने पचास रुपये
दे दिये हैं
उस मुच्छाड़िये को
जो ख़ुद को लोकल गवर्नमेण्ट कहता है ।  

रविवार, 12 अप्रैल 2015

छद्मन्याय के लिये लड़े जा रहे हैं छद्मयुद्ध !


     अन्याय के विरुद्ध माओवादियों के हिंसक युद्ध का दर्शन अन्याय के ही पोषण पर आधारित है जिसका उद्देश्य बस्तर के आमआदमी की हत्या के साथ-साथ राष्ट्रीय और निजी सम्पत्तियों को क्षति पहुँचाना है ।  

     शनिवार की सुबह लगभग दस बजे करंज के पेड़ों से भरा पिड़मेल का ख़ूबसूरत जंगल मशीनगनों की कर्कश आवाज से काँप रहा था और धरती जवानों के रक्त से नहा रही थी । माओवादियों ने मुख्यमंत्री की आगामी यात्रा के दो दिन पूर्व एस.टी.एफ़. के जवानों को मौत का तोहफा दे दिया । कहने को इनकी लड़ाई सरकारी नीतियों से है लेकिन हर बार मौत के शिकार होते हैं जवान । वे जवान जो देश के निम्न या निम्न-मध्य आयवर्ग वाले परिवारों के सदस्य होते हैं । निम्न और निम्न-मध्य आयवर्ग के लोगों को न्याय दिलाने के लिये छेड़े गये माओवादी हिंसक आक्रमण से न्याय मिल किसे पा रहा है ...माओवादियों को यह समीक्षा करनी चाहिये । किंतु वे इस तरह की कोई समीक्षा नहीं करेंगे ..... नहीं करेंगे कोई समीक्षा ....क्योंकि समीक्षा का उद्देश्य सही दिशा का निर्धारण और विचलन को रोकना हुआ करता है जो माओवादियों के सिद्धांत में कहीं है ही नहीं ।

     आज कांकेर में कई वाहनों को जला कर ख़ाक कर दिया गया और कल बस्तर के सुकमा जिले में पोलमपल्ली से रवाना होकर सर्चिंग के बाद कांकेरलंका की ओर वापस आ रही एस.टी.एफ़. की सर्चिंगपार्टी पर पिड़मेल के जंगलों में घात लगाकर किये गये माओवादी छापामार युद्ध में सात जवानों की हत्या कर दी गयी और लगभग दस जवान घायल हो गये । पचास जवानों की सर्चिंग पार्टी पर पाँच सौ से अधिक माओवादियों का आक्रमण एक बहुत बड़ी रणनीति का परिणाम थी । आये दिन जवानों पर घात लगाकर किये गये हमलों में अब तक सैकड़ों निर्दोष जवान अपनी जान गँवा चुके हैं । वनवासियों के हितों की लड़ाई का दावा करब्ने वाले माओवादियों के इस छद्मयुद्ध में अभी तक सर्वाधिक क्षति वनवासियों को ही हुयी है ।

       युद्ध कोई भी हो उसकी पीड़ा सदैव वंचितों के हिस्से में आती है और लाभ आभिजात्यों के हिस्से में । दूसरी ओर् सच यह भी है कि जंगल और ज़मीन की बलि चढ़ाकर विकास के लिये लालायित औद्योगिक घरानों के साथ सरकारी विकासयात्राओं की रहस्यमयी कथायें पूरे देश के लिये न जाने कब से अबूझमाड़ बनी हुयी हैं । 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

दुनिया को ठगती ये परिभाषायें !



नैतिक पतन के इस युग में शब्द और परिभाषायें हमें दिग्भ्रमित करती हैं । भारतीय समाज में यह खेल बड़ी निर्लज्जतापूर्वक खेला जा रहा है । “दलित” की परिभाषा के अनुसार मायावती किसी भी दृष्टि से दलित की श्रेणी में नहीं आ सकतीं । हाँ ! मैं अवश्य “अतिदलित” की परिभाषा के कहीं अधिक समीप हूँ । 

तब मैं छोटा था जब लोगों को यह नारा लगाते हुये सुना करता था – “तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” नारा लगाने वालों में जुलूस के आगे लोग क्रोध और उत्तेजनामें हुआ करते थे जबकि पीछे के लोग ख़ुश-ख़ुश नज़र आते थे । तब मैं इसका अर्थ नहीं जानता था । एक दिन कुछ लोगों को आपस में बात करते हुये सुना तब पता चला कि तिलक का सम्बन्ध ब्राह्मण से, तराजू का वैश्य से और तलवार का क्षत्रिय से था । फिर जब मैं कक्षा नौ में आया तो एक दिन एक जाति विशेष के सहपाठियों ने मुझे बहुत अपमानित और प्रताड़ित किया । वे मुझे पंडित-पंडित कह कर अश्लील गालियाँ दे रहे थे और बार-बार पीटने के लिये उद्यत हो रहे थे । एक दिन मैं उनके मोहल्ले से निकला तो एक लड़के ने मुझे मारा और मेरे ऊपर पेशाब कर दी । यह सब मुझे भयभीत करने वाला था । मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे साथ यह सब क्यों हो रहा है ?

धीरे-धीरे मैं सब समझता गया, किसी भी किशोर के मन में भावनात्मक ध्रुवीकरण के लिये यह पर्याप्त था । अच्छी बात यह थी कि मैं कभी प्रतिहिंसक नहीं हुआ, शायद मैं बहुत अधिक डर गया था । युवा होने पर सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर होने वाली इन घटनाओं का विश्लेषण करना मेरे लिये आवश्यक हो गया था । लोग कहते थे कि कभी ब्राह्मण भी उन लोगों के साथ इससे भी बुरा व्यवहार किया करते थे । उस समय छुटभैये नेता और कुछ बुल्ली लोग सवर्णों से अपने पूर्वजों के प्रति किये गये दुर्व्यवहारों का प्रतिशोध लेने के लिये उतारू हो रहे थे । संयोग से ज़ल्दी ही यह सब नेपथ्य में जाकर ओझल हो गया । क्यों और कैसे .....पता नहीं । वास्तव में समाप्त कुछ भी नहीं हुआ था केवल प्रतिशोध के तरीके बदल गये थे ।

जिस वर्गभेद को समाप्त करने का स्वप्न देखा गया था वह धूमिल हो गया । वर्गभेद समाप्त करने का तरीका अव्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के विरुद्ध होता चला गया । यद्यपि भारतीय समाज से शारीरिक अस्पृष्यता समाप्त हो चुकी है किंतु आंतरिक अस्पृष्यता समाप्त होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है ।


अब तक मैं मायावती के बुल्ली स्वभाव के कई किस्से पढ़ और सुन चुका था । फिर एक दिन खुलासा हुआ कि उनके पास हीरों के गहनों का अम्बार है । इस बीच सवर्ण प्रतिभाओं के आरक्षण की भेंट चढ़ते रहने की व्यवस्था ने वर्गभेद को कम करने के स्थान पर और भी बढ़ाने का काम किया । आज भी सामाजिक समरसता के लिये कोई निर्दुष्ट नीति नहीं बनायी जा सकी है । ये सब भारतीय समाज में आंतरिक अस्पृष्यता बढ़ाने वाले कारण हैं ।  कोई भी कानून इस प्रकार की अस्पृष्यता को समाप्त नहीं कर सकता । इसके लिये तो समाज के लोगों को ही मिलजुल कर एक सामंजस्यपूर्ण स्थिति का निर्माण करना होगा ।