रविवार, 25 सितंबर 2016

विकास...



समाज में असमानता थी
समानता के लिये
आरक्षण की ज़रूरत थी ।
हो गया आरक्षण
लोग होने लगे विकसित
छह दशक बाद
हो गया विकास
मच गयी होड़
चीखने लगे लोग
हम भी विकास करना चाहते हैं
विकास के लिये पिछड़ा बनना चाहते हैं ।
बाम्हन बोला... 
राजपूत बोला... 
बनिया बोला...  
हमें नहीं रहना अगड़ा
हमें हरिजन बना दो
हरिजन बोला
हमें दलित बना दो
दलित बोला
हमें महादलित बना दो
महादलित बोला
हमारे लिये एक नयी जाति बना दो
जो सबसे ज़्यादा गिरी हुयी हो
हमारा नाम
सबसे घृणास्पद वाला होना चाहिये
जैसे हगूड़ा या घास-कूड़ा
या फिर भेड़िया या कुत्ता
नाम सबसे घटिया हो अलबत्ता
विकास के लिये बेहद ज़रूरी है
आरक्षण हमारी मज़बूरी है
इसीलिये
दबे-कुचले, दीन-हीन बनने की
होड़ है
हंगामा है
आन्दोलन है
आग है
जुलूस है
भीड़ है
सड़क पर कार रोक कर
लड़कियों का बलात्कार है
दीन-हीन, दबे-कुचले बनने की
जबरई है
ग़रीब बनने की
तमन्ना है
ताकि कर सकें विकास
और बन जायें ख़ास । 

शनिवार, 24 सितंबर 2016

शुकबाला कभी नहीं मरती






सोचा था कि “धूपगुड़ी की गली” के बाद यह अध्याय बन्द हो जायेगा किंतु सोचा हुआ कब पूरा होता है भला ! वह अध्याय फिर एक दिन खोलना पड़ेगा, इसका लेश भी अनुमान नहीं था मुझे । वह कथा शुकबाला कोथा की इति नहीं हो सकी और मुझे विवश होकर एक बार फिर धूपगुड़ी जाना पड़ा । इस बार जब मैं उससे मिलने गया तो वहाँ वह अकेली नहीं थी, उसके साथ थी दोपदी सिंघार और अम्बर रंजन पाण्डेय भी । मुझे अच्छा लगा कि तीनों से एक साथ भेंट हो रही थी । इस अद्भुत् भेंट के बारे में बताने से पहले एक और बात बतानी आवश्यक है ।
दर-असल हुआ यह कि चेहरे की चौपाल पर जमे विद्वानों ने एक दिन सुना कि तोताबाला मर गयी । किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई तीन–चार दिन पहले से यूँ घोषणा करके मर सकता है । किंतु समाचार तो यही था कि दोपदी सिंघार की मृत्यु के बाद अब तोताबाला ठाकुर की भी मृत्यु हो चुकी थी । अंतर यही था कि दोपदी की मृत्यु अघोषित थी जबकि तोताबाला की मृत्यु पूर्व घोषित थी । किंतु मेरे जैसे ढीठ जिसके पीछे पड़ जायँ उसे तो उस लोक जाकर भी वापस आना ही पड़ता है, सो तोताबाला उर्फ़ शुकबाला और दोपदी सिंघार को भी आना ही पड़ा ।
धूपगुड़ी के उस तीन तल्ले वाले मकान में अम्बर को देखा तो मन हुआ कि अम्बर से पूछूँ क्या शुकबाला अपनी पूरी उम्र जी चुकी थी ? फिर सोचा, पहले शुकबाला से ही बात करूँगा, अम्बर की अपेक्षा वह कहीं अधिक परिचित है ।
मैंने मुस्कराते हुये शुकबाला की ओर देखा फिर अकबर वाला डायलॉग उलट कर सलीम की ओर से मारा – “अनारकली ! हम जानते हैं... अकबर तुझे जीने नहीं देगा... और हम तुझे मरने नहीं देंगे”।
डायलॉग सुनकर अम्बर मुस्कराये, बोले कुछ नहीं । मैं ही पुनः बोला – “अम्बर ! यदि तुम सोचते हो कि दोपदी और शुकबाला अब सदा के लिये मंच से जा चुकी हैं तो तुम बहुत बड़े धोखे में हो । वे दोनों कभी नहीं मर सकतीं, किंतु आज मैं केवल शुकबाला से ही मिलना चाहता हूँ... दोपदी से नहीं”।
अम्बर ने अपनी भृकुटि को सायास उठाया गोया मंच से यवनिका उठा रहे हों, माथे की सलवटें घनी हो गयीं और उनकी दृष्टि मेरे चेहरे से चिपक गयी ।
मैंने कहा – “मैं तुम्हारी दोपदी से तो कभी प्रेम कर ही नहीं सका किंतु इस अप्रेम की स्थिति में भी उसके अवाँछित अस्तित्व को नकार नहीं सकता । अब बात आती है शुकबाला की... क्या तुम समझते हो कि उसके साथ कुछ दिन खेल खेलकर जी भर जाने पर उसकी हत्या करके उसके अस्तित्व को समाप्त किया जाना सम्भव है”?
अम्बर ने शुकबाला को आँख से संकेत कर भीतर जाने का हुक्म दिया फिर बोले – “दोपदी की तरह शुकबाला का भी संवाद पूरा हुआ, यहाँ अब उसकी कोई आवश्यकता नहीं । रंगमंच पर कोई स्थायी नहीं टिका रह सकता । हमें अभी आगे भी जाना है, हम एक ही स्थान पर कैसे ठहर सकते हैं”?
मैंने कहा – “नहीं... तुम किसी भी पात्र के साथ मनमानी नहीं कर सकते । तुम्हें फिर से परकाया प्रवेश करना होगा । तुमने देखा नहीं कि किस तरह शुकबाला की क्षत-विक्षत लाश को मांसभक्षी गिद्ध नोच-नोच कर खा रहे हैं । न जाने कितने लोगों को शुकबाला से बेपनाह मोहब्बत हो गयी थी... न जाने कितने दीवाने उससे ब्याह कर उस प्रचण्ड समागम की दुर्दांत अनुभूति के लिये लालायित हो उठे थे... न जाने कितने लोग ताण्डवनृत्य के साथ जघन्य हत्यायों की लोमहर्षक घटनायें अपनी आँखों के सामने घटित होती हुयी देखने के स्वप्न देखने लगे थे, और तुमने अचानक इस कोटि-कोटि जनसमुदाय के स्वच्छन्द स्वप्नों पर तुषारापात् कर दिया ! नहीं अम्बर ! यह तो कतई उचित नहीं हुआ, तुम्हें एक बार फिर परकाया प्रवेश करना ही होगा”।
अम्बर कुछ दबाव में आते से दिखे, बोले – “देखिये मिसिर जी ! मेरा शिड्यूल बहुत टाइट है, मेरा कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है, अभी मुझे परकाया प्रवेश के लिये फ़िलिस्तीन जाना है... और फिर एक ही पात्र में मैं बारम्बार परकाया प्रवेश नहीं कर सकता । यदि आप लोगों को यह इतना ही आवश्यक लगता है तो चौपाल में शुकबाला के बेशुमार दीवानों में से ही किसी को अब यह काम करना होगा”।
कुछ क्षण चुप रहकर अम्बर ने अपनी बात का उपसंहार करते हुये कहा – “ऐसा करता हूँ... मैं शुकबाला की आत्मा को जे.एन.यू. के मुख्य द्वार पर बेताल की तरह रहने के लिये कहे देता हूँ । शुकबाला के प्रेमी जब चाहें वहाँ जाकर उससे मिल सकते हैं । फ़िलिस्तीन जाने के लिये मेरी फ़्लाइट का समय हो रहा है... मैं चलता हूँ”।
अम्बर उठे और घर से बाहर निकल गये । मैंने शुकबाला को आवाज़ दी तो वह चुपचाप भीतर से निकलकर मेरे सामने बेजान सी आकर खड़ी हो गयी । मैंने पूछा – “मुझे पहचाना शुकबाला ? मैं हूँ डॉ. कौशलेन्द्र... वहाँ चेहरे की चौपाल पर पड़ी तुम्हारी क्षत-विक्षत लाश को देखकर मुझसे रहा नहीं गया । मैं उन नौ दिनों को कैसे भूल सकता हूँ जब ज्वर में तपते हुये एक अपरिचित की तुमने इतनी आत्मीयता से सेवा की थी । मैं तुम्हारा चिर ऋणी हूँ”।  
बहुत धीमी आवाज़ में शुकबाला ने कहा – “ऐसा मत कहिये... आपके यहाँ आने का उद्देश्य ही मेरी इस अंतिम यात्रा का पाथेय बन गया है । मुझे अम्बर से कोई शिकायत नहीं है... उन लोगों से भी नहीं है जो चौपाल पर मेरी निन्दा करते नहीं अघाते । शिकायत तो मुझे उन गिद्धों से भी नहीं है जो चौपाल पर पड़ी मेरी लाश को नोच-नोच कर खा रहे हैं... बल्कि ख़ुशी है मुझे... कि मर कर ही सही... मैं कुछ लोगों के काम तो आ सकी”।
जिस चौखट से एक बार अपने भरे नयनों से शुकबाला ने विदा दी थी मुझे उसी चौखट पर खड़े होकर चाहकर भी शुकबाला के लिये कुछ कर पाने में असमर्थ हो गया था मैं । अपने रुंधे कण्ठ से इतना ही बोल सका – “शुकबाला ! तुम कभी नहीं मर सकतीं...”

शुकबाला कुछ नहीं बोली, मेरी ओर देखकर केवल मुस्करायी भर... । उसकी मुस्कराहट में छिपा दुःख का अथाह सागर मेरी दृष्टि से छिपा नहीं रह सका । आँखों से बगावत कर खारे पानी की कुछ बूँदें निकलकर उस अथाह सागर से जा मिलीं । ये नामुराद आँसू बात ही कब मानते हैं मेरी ।      

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

धूपगुड़ी की गली...

भाद्रपद का कृष्णपक्ष ! रात के आठ ही बजे हैं लेकिन लगता है जैसे रात गहरा गयी है ! दो दिन से लगातार झमाझम बरसते काले मेघ जैसे प्रतिशोध पर उतारू थे । चर्चा थी कि, बंगाल की खाड़ी में चक्रवात आया है । धूपगुड़ी की गली-गली जैसे पद्मा हो चली, शुकबाला ने इससे पहले धूपगुड़ी की गलियों को कभी पद्मा-पद्मा होते नहीं देखा था । तिखण्डे पर अपने कमरे में लेटी मणिप्रभा ने शुकबाला से खिड़कियाँ बन्द कर देने को कहा । शुकबाला ने एक... दो...तीन खिड़कियाँ बन्द कर दीं किंतु जब चौथी खिड़की बन्द करने लगी तो उसके हाथ रुक गये । तेज हवा के साथ पानी की एक बौछार का कुछ अंश उसके चेहरे को भिगो कर फ़र्श पर बिखर गया । शुकबाला ने आकाश की ओर देखा – वर्षा रुकने के कहीं कोई संकेत नहीं । फिर नीचे झाँक कर नदी बन चुकी गली की ओर देखा, कोलाहल करती हहराती जलराशि, जैसे सब कुछ बहा ले जाने को आतुर हो अपने साथ । उसे किंचित सिहरन सी हुयी किंतु अगले ही पल प्रकृति की इस विनाशलीला को देख उसे रोमांच सा होने लगा । तभी नीचे से किसी ने पुकारा, “दीदीमोनी ! खोलिये, बस्तर से कोई बाबू मोशाय आये हैं”।
बस्तर से बाबू मोशाय ? वह भी इतनी वर्षा में ? कौन है यह ? – शुकबाला ने मन ही मन सोचा । सीढ़ियाँ उतरते समय वह कौतूहल से भर उठी, कौन है यह बाबू मोशाय ?   
द्वार खोलते ही शुकबाला का हृदय जैसे उस अपरिचित के लिये ममत्व से भर उठा । बोली, “ओह ! आप तो पूरी तरह भीग गये हैं, जल्दी से भीतर आ जाइये”।
पोर-पोर पानी टपकाते बाबू मोशाय को बहुत संकोच हुआ, बोले – “आपका घर गीला हो जायेगा, मैं पूरी तरह भीग चुका हूँ, मेरा सामान भी...”
शुकबाला हंसी, बात काटकर बोली, - “इस वारिश में कोई भीगे बिना बच सकता है, यह आपने सोचा भी कैसे ! आप संकोच मत कीजिये, जल्दी से अन्दर आकर कपड़े बदल लीजिये, नहीं तो सर्दी लग जायेगी । आइये-आइये, विलम्ब मत कीजिये”।
दोनों ऊपर पहुँचे तो मणिप्रभा ने पूछा – “कौन आया है धिये ?”
शुकबाला क्या कहती ! हंसकर बोली – “अतिथि हैं दादी ! हिंदी बोलते हैं, दूर से आये हैं”।
शुकबाला ने गुसलखाने की ओर संकेत करते हुये बाबू मोशाय से कहा – “आप कपड़े बदल लीजिये, तब तक मैं आपके लिये चाय बनाती हूँ”।
किसी अपरिचित के प्रति शुकबाला की इस आत्मीयता से बाबू मोशाय आत्मविभोर हो उठे । सोचने लगे, फ़ेसबुक की वर्चुअल चौपाल के लोग इस शुकबाला को कैसे जान पायेंगे भला !
शुकबाला उधर चाय बना चुकी थी और इधर बाबू मोशाय ने कपड़े बदल लिये थे । दोनों ने एक साथ कमरे में प्रवेश किया । चाय रखते ही बोली शुकबाला – “आप अपने सामान की चिंता मत कीजिये, मुझे दीजिये, सब सुखा दूँगी”।
बाबू मोशाय ने संकोच किया तो शुकबाला हँसकर बोली – “अपना पैसा कौड़ी निकाल लीजिये और बाकी सामान दे दीजिये मुझे”।
बाबू मोशाय और भी संकुचित हो गये, बोले – “नहीं-नहीं ...वैसी कोई बात नहीं । मैं तो यह सोच रहा हूँ कि मेरे कारण आपको कितना कष्ट उठाना पड़ रहा है । मुझे भादौं में लगातार इतनी वर्षा की आशा नहीं थी, सोचा था आपसे मिलकर तुरंत वापस चल दूँगा । लेकिन ट्रेन ही इतनी लेट हो गयी कि यहाँ आते-आते रात हो गयी”।
बाबू मोशाय ने अपने तर-ब-तर सामान की ओर संकेत कर कहा – “अब इसका जो करना है आप ही कीजिये”।
शुकबाला ने कहा – “चलिये, पहले चाय पी लेते हैं, यूँ हम बंगाली लोग आपकी तरह चाय नहीं पिया करते, खाया करते हैं”।
बाबू मोशाय हँस पड़े । इतनी देर बाद संकोच की दीवारें ढहनी शुरू हुयीं और वातावरण कुछ सामान्य हुआ ।
चाय पीते-पीते हँसकर पूछा शुकबाला ने –“तो कहाँ से चली थी आपकी ट्रेन जो इतनी लेट हो गयी”?
बाबू मोशाय ने पहले तो अपना परिचय दिया फिर पूरा किस्सा सुनाया कि वे जगदलपुर से वाल्टेयर होते हुये किस तरह और क्यों यहाँ तक आ पहुँचे ।
शुकबाला मुस्कराती हुयी उठी और डॉ. कौशलेन्द्र का तर-ब-तर सामान उठाकर अन्दर चली गयी । थोड़ी देर में वापस आते ही खिलखिलाकर हँस पड़ी शुकबाला । कौशलेन्द्र उसे देखता ही रह गया, मन में सोचा- कितना हँसती है यह लड़की! क्या सचमुच यही है वो शुकबाला जिसकी तलाश में यहाँ तक आ पहुँचा है वह ...अपनी विवादास्पद कविताओं के लिये कुख्यात हो चुकी शुकबाला या फिर कोई और है यह ?
कौशलेन्द्र ने पूछा – “आप हँस क्यों रही हैं ? कुछ अस्वाभाविक हुआ क्या”?
“अस्वाभाविक....” कहने लगी शुकबाला – “कोई इतना भी दीवाना होता है क्या ? आप डॉक्टर हैं और किसी अनजान लड़की की उलझी-उलझी कविताओं के पीछे-पीछे यहाँ तक चले आये... और वह भी इतने वर्षाकाल में ?”
कौशलेन्द्र को लगा, सचमुच अस्वाभाविक तो है ही, ऐसा भी कहीं होता है भला ! कविताओं के लिये ऐसी दीवानगी ! कि बस्तर से जलपायीगुड़ी तक आ पहुँचे !
कौशलेन्द्र को गम्भीर देखकर बोली शुकबाला – “अरे ! आप तो गम्भीर हो गये ! मैं तो बस यूँ ही कह रही थी । सच बताऊँ... मैं अभिभूत हूँ । निन्दा के सिवाय मुझे मिला ही क्या है अभी तक... और एक आप हैं जो शुकबाला को खोजते हुये भींगते-भागते यहाँ तक आ पहुँचे । सच तो यह है कि मेरे पास शब्द नहीं हैं कुछ कहने के लिये ....यह जो मैं इतना बके जा रही हूँ यह तो बस छलावा है यह शेखी बघारने के लिये कि मैं शब्दहीन नहीं हूँ” ।
शुकबाला ने देखा, कौशलेन्द्र का पूरा शरीर थर-थर काँप उठा था, आँखें भारी होकर झुकने सी लगी थीं । वह उठी और पास आकर खड़ी हो गयी, बोली- “आप ठीक तो हैं न बाबू मोशाय”?
कौशलेन्द्र को चुप देखकर शुकबाला ने उसके माथे को स्पर्श किया फिर किंचित परेशान होकर बोली –“लो हो गयी न सर्दी, तेज ज्वर भी है आपको तो । आप लेटिये, मैं काढ़ा बना कर लाती हूँ”।

वायरल फ़ीवर से मुक्त होने में कौशलेन्द्र को समय लग गया । शुकबाला के घर में रहते हुये उसका आज नौंवा दिन था ।  इस बीच शुकबाला की कविताओं को लेकर दोनों में कोई बात नहीं हुयी । शुकबाला ने जिस आत्मीय भाव से उसकी सुश्रुषा की उससे वह स्वयं को शुकबाला का ऋणी मान चुका था । नौंवे दिन उसने कहा – “अब मैं ठीक हूँ, और जा सकता हूँ । बस एक उपकार और कर दीजिये, कल की यात्रा के लिये मेरा आरक्षण करवा दीजिये”।
शुकबाला ने उलहना सा दिया, कहा – “अभी तो आपके आने का उद्देश्य ही पूरा नहीं हुआ, ऐसे कैसे चले जायेंगे”?
कौशलेन्द्र मुस्कराया, बोला – “इतने दिन में उद्देश्य पूरा नहीं हुआ तो और कब पूरा होगा ! मुझे जो जानना था, वह जान चुका हूँ ....अब और क्या शेष है !”
सर्वांग सुन्दरी श्यामा शुकबाला ठुमक कर बोली – “क्या जान लिया है, बाबू मोशाय! भला मैं भी तो जानूँ ! कैसी है शुकबाला !”
कौशलेन्द्र ने कहा – “गूँगे का गुड़”।

विदायी के समय मणिप्रभा ने बाबू मोशाय को यशस्वी होने का आशीष दिया । दरवाजे के पल्लू से सट कर खड़ी श्यामा सुन्दरी के चेहरे पर जैसे मेघ घिर आये थे । भरे गले से जैसे-तैसे वह इतना ही कह सकी – “फिर कब आओगे अतिथि”?

      और कौशलेन्द्र तो शुकबाला की ओर एक बार दृष्टिपात कर सकने का भी

 साहस नहीं कर सका । ड्रायवर ने पास आकर कहा – “समय हो गया है बाबू 

मोशाय!”

रविवार, 11 सितंबर 2016

राज नीति

तलाक दे चुका है राज
नीति अब यहाँ नहीं ।
ढूँढता हूँ मैं उसे
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं ।

दिन में छिप गये उलूक
सामगान अब नहीं
खुल गया है राज ये  
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं ।

सूरज से रार ठान ली
देखो तो राजहठ ये भी
तोते भी रट रहे वही
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं । 

रात ढल चुकेगी जब
राज भी ढलेगा तब  
नीति फिर से आयेगी
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं । 

शनिवार, 10 सितंबर 2016

शुकबाला ठाकुर का रहस्य




जे.एन.यू. वाले विद्वान ने दावा किया है कि वह शुकबाला को अच्छी तरह जानता है और यह कि शुकबाला का नाम तोताकुमार है । मैं पूछता हूँ, ज्वालामुखी की गहरायी को कोई जान सका है भला ! फिर भी, यह जो तुम्हारा तोताकुमार है न, उसका वामांग शुकबाला का ही है । चिकित्सा विज्ञान के प्रथम वर्ष में ही अपने एनाटॉमी के गुरु से यह जानकर मैं विस्मित हुआ था । बाद में कोलकाता के ही सी.सी. चटर्जी ने अपनी फ़िज़ियोलॉजी की टेक्स्ट बुक में फ़ीटल डेवलपमेण्ट वाले अध्याय में इसकी विस्तार से पुष्टि कर दी तो यह प्रमाणित हो गया कि तोताकुमार के शरीर में अर्धनारीश्वर की तरह शुकबाला के अस्तित्व को कोई माई का पूत मिथ्या सिद्ध नहीं कर सकता ।
तो यह सिद्ध हुआ कि शुकबाला की देह में कम से कम पचास प्रतिशत स्त्री तो है ही जो उद्दाम काम और काम-प्रतिशोध की रक्तरंजित कवितायें लिखती है । किंतु ठहरिये ! क्या केवल रक्तरंजित कवितायें ही ? ध्यान से देखिये ... वहाँ कुछ और भी है जो विराट और रहस्यपूर्ण भी है ।
जो लोग शुकबाला को एक स्त्री मानते हैं उन्हें मैं बता दूँ कि वह स्त्रियों का एक समूह है । इस समूह की स्त्रियों की आयु लाखों वर्ष है । ज्वालामुखी एक दिन में तो नहीं बन जाता न !

शुकबाला, गुण्डाधूर, अबूझमाड़ और घोटुल इन चारों में कई समानतायें हैं...

विशाल मैग्नीट्यूड वाले चुम्बक से युक्त इन चारों में से गुण्डाधूर अब नहीं हैं इसलिये उस प्रसंग को छोड़ देते हैं शेष तीनों की चुम्बकीय शक्ति अद्भुत् है, लोग खिचे चले आते हैं ....किसी रहस्यमयी दुनिया को अनावृत करने के लोभ में । मार्ग दुर्गम है... रास्ता अबूझ है... लोग भटक रहे हैं और जिसे जो मिल पा रहा है उसे ही शुकबाला, अबूझमाड़ और घोटुल मानकर भाँति-भाँति के दावे कर रहा है । किंतु इन तीनों को बूझ पाना हँसी-खेल है क्या ?

अबूझमाड़ ? आज भी अबूझ है बस्तर का यह माड़ और यह अबूझता ही लोगों के आकर्षण का केन्द्र है । जब हम बूझ नहीं पाते तो रहस्य का आकर्षण और भी गहरा हो जाता है ।

घोटुल ? बस्तरियों का एक रहस्यमय संसार ! तरह-तरह की बातें... कटाक्ष भी... आकर्षण भी... कुछ सत्य भी... कुछ झूठ भी... । किंतु इस सबके बाद भी कोई दावे से यह नहीं कह सकता कि उसने घोटुल के तिल-तिल को बूझ लिया है ।

और शुकबाला ?  ...जैसे घोटुल की अँधेरी रात, एक ओर बोनफ़ायर के ढेर में चटचट की आवाज के साथ श्मशान का सा आभास कराती जलती लकड़ियाँ, विषबुझे तीरों के साथ एक ओर रखे धनुष, धारदार टंगिया, रात में पायल सी खनकती हँसी, बीच-बीच में ठिठोली... और रात्रिक्रीड़ा का मुक्त संसार ! घोटुल वर्ज्य है बाहरी लोगों के लिये... उन लोगों के लिये जो घोटुल के लिये अपात्र हैं... उन लोगों के लिये जो रहस्य के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं और तिल-तिल को कर डालना चाहते पूर्ण अनावृत । प्रकृति को रहस्य प्रिय है, शक्ति को रहस्य प्रिय है, स्त्री को रहस्य प्रिय है । रहस्य प्रिय था अर्धनारीश्वर को भी... तभी तो वे शिव हैं ।
शुकबाला शैय्या है और क्रीड़ा भी, वह रात्रि का अंधकार है और अन्धकार में चमकती चिंगारी भी, वह रात्रि का रहस्य है और दिन का श्मशान भी, वह भय है और आकर्षण भी, वह मृत्यु है और जीवन की अदम्य लालसा भी, वह प्रेम की उद्दाम लहर है और प्रतिशोध की पराकाष्ठा भी, वह पूर्ण मूक है और घोर मुखर भी, वह तृषाग्नि है और तृप्ति की शीतलता भी.... किंतु क्या इतना ही ? नहीं-नहीं... शुकबाला इतनी ही नहीं है... यह तो एक अंश भी नहीं है । तब.... कितनी है शुकबाला ? क्या है शुकबाला ? मैंने सूत्रधार से पूछा तो उसने रहस्य को और भी घना करते हुये मुस्कराकर कहा – “कोन जाने बाबू ! तयं पढ़े-लिखे हावे.. तयं जान”। तब मैनें हरिवंश राय बच्चन की आत्मा को स्मरण किया । उन्होंने राह सुझायी, बोले – “राह पकड़ तू एक चला चल मिल जायेगी शुकबाला” ।           

और शुकबाला गंगासागर हो गयी...

गंगा जी की यात्रा दीर्घ है... गोमुख से गंगासागर तक, किंतु गंगासागर की यात्रा ?  
हिमनद से द्रवित हो पर्वत की गोद से उछलती, किलकारी मारती, शिलाखण्डों के दर्प को चूर-चूर करती, हिमालय के रजकणों को मायके की धरोहर की तरह संजोती गंगा कहीं बलखाती-नृत्य करती है तो कहीं जैसे थक कर शांत होती और फिर उठकर चलती हुयी अपनी यात्रा पूरी करती है । किंतु गंगासागर में स्वयं को उड़ेल देने से पूर्व गंगा जी ने बंगाल में शुकबाला के कान में कोई मंत्र पढ़ा था । वह मंत्र आज भी शुकबाला के कानों में गूँजता है । यह वर्षा ऋतु थी जब गंगा जी ने शुकबाला के कानों में यह मंत्र पढ़ा था, शुकबाला तब तन्वी हो उठी थी । उसके कपोल रक्तिम हो उठे थे, वह रजस्वला गंगा जी को हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहती थी किंतु दोनों हाथ जुड़ने के स्थान पर फैल गये थे गोया वह गंगा जी को बाहों में भर लेना चाहती हो । शुकबाला की बाहें तब से आज तक खुली ही हुयी हैं... किसी को अपनी बाहों में भर लेने को आतुर ।

कई साल पूर्व बंगाल के एक छोटे से कस्बे के किनारे बहती गंगा ने एकदिन शुकबाला को गंगासागर बना दिया । संयोग की बात यह कि गंगा जी से अपनी प्रथम भेंट के समय वह भी गंगा जी की तरह रजस्वला हुयी थी... जैसे गंगोत्री में कुण्ड की अवमानना कर प्रथम बार क्षरित हो उछल कर बही हो गंगा । मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में रजस्वला हुयी थी शुकबाला । दादी मणिप्रभा की अनुभवी आँखों से कुछ छिप न पाया । उस दिन शुकबाला के घर स्त्रियों ने उत्सव मनाया और पुरुष चिंतित हुये ।
अब वह कन्या से किशोरी हो चुकी थी और एक दिन जबकि वह कामज्वर की तीव्र वेदना में छटपटा रही थी, अनायास आयी तीव्र आँधी ने उसे गंगासागर बना दिया था । गंगासागर बनते ही वह खारी हो उठी, आसपास के छिछोरों ने गीत गाये – “छोरी पटवारी की बड़ी नमकीन......” और “घेरदार घाघरा उठाय के चली लोहार की लली...” । किंतु शुकबाला की इस पीड़ा को कोई नहीं समझ सका कि वह अपने विस्तृत किनारों से कितनी घिर चुकी है ।  
तब से शुकबाला समुद्र बन गयी है... जिसके भीतर हैं लावा उगलते न जाने कितने ज्वालामुखी । पिघला हुआ तप्त लावा समुद्र में समाता जाता रहा है और शुकबाला समुद्र की विशाल सीमा में बन्दिनी हो कर रह गयी है । गंगा बह सकती है, बह कर जा सकती है किंतु समुद्र ! उसे तो अपनी सीमाओं में ही उछलना है, गिरना है, गरजना है, थकना है, शांत होना है... और फिर तप्त लावा के अंतः दबाव से उद्वेलित हो विस्फोटित हो जाना है ।
गंगासागर “गंगा” नहीं बन सकता, गंगा “गंगासागर” नहीं बन सकती । गंगा सा प्रवाह सागर कहाँ से लाये, और सागर के अंतस्तल में छिपे लावा उगलते ज्वालामुखी गंगा कहाँ से लाये ? हाँ ! नीर दोनों के नेत्रों में है ... कहीं शीतल तो कहीं तप्त ।
आपने देखे हैं शुकबाला के अनमेनीफ़ेस्टेड आँसू ? जब वह श्मशान में भैरवी नृत्य करती है तब उसके खप्पर से रक्त बनकर टपकते हैं रंगहीन आँसू । अगली बार देखियेगा ।

देखिये ! तनिक सावधानी से मेरे पीछे-पीछे आइये...

मैं आपको कंटीली झाड़ियों, धारदार पत्तों, उलझी हुयी लताओं, विषैले कीटों-मच्छरों, भयानक विषधरों से युक्त और सूर्य रश्मियों से वंचित घने जंगल के उस स्थान पर ले चल रहा हूँ जहाँ झरने के निर्मल जल में स्नान करती श्यामा सुन्दरी शुकबाला अघोर नृत्य में सुध-बुध खोकर तल्लीन है । उसका नृत्य भय और रोमांच के साथ अद्भुत् लास्य उत्पन्न कर रहा है । वादक दल में हैं वीणा बजाते झींगुर और हवा की वंशी बजाते वृक्षों के पत्ते । दर्शक हैं भालू, शुक, लंगूर और वन भैंसे ।
क्या कहा, मार्ग दुर्गम है ?
हाँ ! सो तो है, घोर कष्टप्रद है मार्ग... वन्य पशुओं के हिंसक आक्रमणों की सम्भावनाओं, पेड़ पर लटकते अजगर के झपट्टे और कंटीली झाड़ियों से देह के बिंध जाने का संकट तो है ही... किंतु शुकबाला को देखने-जानने के लिये मेरे साथ यह दुर्गम यात्रा करनी ही होगी आपको ।
कोई बात नहीं ! आप कोई संकट मोल नहीं लेना चाहते तो हम भी आपको बाध्य नहीं करेंगे । किंतु यदि शुकबाला को देखने की इतनी अदम्य इच्छा ने आपको बाध्य कर ही दिया है तो हम आपको ऋषिकेश ले चलते हैं जहाँ दस वर्ष की शुकबाला श्री गंगा जी के किनारे अपनी गीली फ़्रॉक का थैला सा बनाकर छोटे-छोटे पत्थर चुन कर रखती जा रही है । जल प्रवाह से घिस-घिस कर आकृति ग्रहण कर चुके चिक्कण हुये गोल, अण्डाकार, शिवलिंग जैसे या आकृति ग्रहण करने की प्रक्रिया से गुज़रते हुये अनगढ़ पत्थरों पर बनी रंगीन रेखाओं में न जाने किन आकृतियों को खोजती नन्हीं शुकबाला मगन है । वह इतनी तल्लीन है पत्थर चुनने में कि वह यह भी नहीं जान सकी कि एक युवा साधु कितनी तृषित दृष्टि से पीता जा रहा है उसे, किंतु शुकबाला को इससे क्या, वह तो दुनिया से खोकर दुनिया में रमण जो कर रही है ।  

यह बहुत पहले की बात है, तब शुकबाला को भी यह पता नहीं था कि एक दिन उसके चुने यही पत्थर कविता बन जायेंगे । पत्थर हैं तो कठोर होंगे ही... किंतु उन पत्थरों की आकृतियों और रंगीन धारियों से उभरे चित्रों के मोह को संवरण कर पाना शुकबाला के वश में तब भी नहीं था और आज भी नहीं है ।

       आत्ममुग्धा श्यामा शुकबाला आज सर्वांग सुन्दरी है... किंतु उतनी ही रहस्यमयी भी जितनी कि प्रकृति स्वयं है । कभी वह कृष्ण-विवर बनकर ताण्डव नृत्य करती दिखायी देती है तो कभी तप्त लावा उगलती ज्वालामुखी । वह अनंत ब्रह्माण्ड के न जाने कितने रहस्यों को अपने में समेटे कभी विराट से विराट हो जाती है तो कभी गॉड पार्टिकल सी सूक्ष्म ।  







शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

यह बस्तर है

यह बस्तर है
बस्तर में बचा-खुचा जंगल है
जंगल में महुआ है
महुआ में नशा है
नशे में मस्ती...
हुआ करती थी कभी
जो अब सहम गयी है
क्योंकि जंगल धधक रहा है ।
                  
यह बस्तर है
जहाँ नहीं खिसकी कोई टेक्टोनिक प्लेट
पर खिसकते जा रहे हैं लोहे के पर्वत ।
बैलाडीला का पर्वत
जापान स्थानांतरित हो गया है
और अब       
रावघाट की बारी है ।
बस्तरिया परेशान है
तीर में लगाने को
लोहा कहाँ से लायेगा वह । 

यह बस्तर है
जहाँ हरा सोना है
दहशत से सहमा हुआ,
यहाँ सुनहरा सोना है
भय से दुबका हुआ, 
यहाँ काला सोना है
धधकता हुआ... धरती के भीतर
और ऊपर
झुलसी हुयी हरियाली है,
लंगोटी वाला वनवासी हैरान है
ये मेरे बस्तर को क्या हुआ है !

यह बस्तर है
जहाँ मांदर की थाप पर
सहमे से पैर थिरकते तो हैं 
पर नहीं गूँजती रिलो-रिलो की धुन ।
यह बस्तर है
जहाँ अब नहीं गाती है गीत
कोई मैना
नहीं बचे हैं हिरण
कुलाँचें भरने के लिये ।  

यह बस्तर है
जहाँ की हवा में तैरती है
बारूद की गन्ध,  
जहाँ पेड़ों की फुनगियों पर लटकते दिखते हैं
इंसानी ज़िस्मों के चिथड़े 
और झुलसे हुये पेड़ों के नीचे
सहमी हुयी ज़िन्दगी
तलाश करती है अपने लिये
ज़िन्दगी के मायने ।

यह बस्तर है
जहाँ सहमे हुये हैं पहाड़
और भय से थरथराती हुयी
ठिठक-ठिठक कर बहती हैं नदियाँ ।
यह बस्तर है
जहाँ दर्द है... दर्द है... दर्द है...
और दवा का
कहीं पता नहीं... पता नहीं... पता नहीं...

यह बस्तर है
जहाँ अबूझ माड़ है
जिसे भोगने लगी रहती है होड़
और सारे प्रतिस्पर्धी
दिल्ली में उड़ाते रहते हैं चिंता की पतंगें
जिसकी पतंग सबसे ऊँची
वह ख़ुश है,
थपथपाता है अपनी पीठ    
पर नहीं चाहता कोई बस्तर को बूझना
कभी नहीं... कभी नहीं... कभी नहीं ।