सोमवार, 2 मार्च 2015

सम्प्रभुता


       जम्मू कश्मीर का एक पाकिस्तान परस्त आदमी भारत का गृहमंत्री बनता है । गृहमंत्री अपनी अपहृत बेटी को मुक्त कराने के लिये देश के दुश्मनों से समझौता करता है और भारत के ख़ूँख्वार दुश्मनों को जेलों से निकालकर उनके घर तक सुरक्षित पहुँचाने की व्यवस्था करता है । भारत फिर भी गर्व  करता है कि वह एक सम्प्रभुता सम्पन्न देश है । इसी सम्प्रभुता सम्पन्न देश का वही पूर्वगृहमंत्री 2015 में जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बनता है । प्रधानमंत्री बनते ही अपनी (चुनावी) सफलता का श्रेय पाकिस्तान की सेना और आतंकवादियों को देता है और ख़ुश होकर एक अलगाववादी आदमी को अपने मंत्रिमण्डल में भी शामिल करता है ।
       नये हालातों में जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री के ज़िम्मेदार लोग पाकिस्तान को तरज़ीह देने के लिये बेताब हो रहे हैं, वे उनसे ग़ुफ़्तगूँ करना चाहते हैं, वे भारत की संसद पर आक्रमण के एक षड्यंत्रकारी की निशानियों के ख़ैरख़्वाह होना चाहते हैं, शायद वे उसे कोई पीर या शहीद का दर्जा देने के लिये बेसब्र हुये जा रहे हैं । राष्ट्रद्रोही षड्यंत्रों के आगे भारत की सम्प्रभुता निश्चेष्ट होती जा रही है और राजनीति को ऑटो इम्यून डिसऑर्डर्स हो चुके हैं । इस धरती पर ऐसे उदाहरण पूरे विश्व में और कहीं भी नहीं मिलेंगे - यह दावे के साथ कहा जा सकता है । और यह सब हो रहा है ( होता रहा है) एक राष्ट्रवादी भारतीय राजनैतिक दल की साझेदारी में । यह सब यूँ ही होता रहेगा ......... सन 2021 तक यानी अगले पूरे छह साल तक ।  भारत का आमआदमी जानना चाहता है कि यह कैसी राष्ट्रवादिता है जो राष्ट्रद्रोहियों के आगे झुकने के लिये विवश है ? यह कैसा लोकतंत्र है जो बात-बात में गिरवीं रख दिया जाता है ? यह कैसा विकास है जिसमें आमआदमी बिना उत्कोच दिये किसी काम के होने की कल्पना भी नहीं कर सकता ? यह कैसा साथ है जो कभी राष्ट्रवाद के साथ नहीं हुआ करता ?
        हम यह नहीं कहेंगे कि भारत के लोग बेवकूफ़ और बुज़दिल हैं किंतु आत्मग्लानि के साथ यह स्वीकार करने में कोई उज्र नहीं करते कि भारत में आज भी पराधीन होने के समस्त गुण मौजूद हैं । 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

दो छोटी प्रतिक्रियाएं

दर्जी

राजा ने एक दर्जी को बुलाया
और
उसे
हॉस्पिटल में होने वाली सर्जरी के लिये
नियामक कानून बनाने को कहा ।
राजा को विश्वास था
कि कपड़े सिलने में दक्ष दर्जी के बनाये कानूनों से
अब सर्जरी के दौरान कोई मौत नहीं होगी ।
राजा का विश्वास सच हुआ
सर्जरी के दौरान
वाकई
अब किसी की मौत नहीं होती,
..........
..........
नियामक कानून लागू होने के
दूसरे दिन ही
सर्जरी दम तोड़ चुकी थी ।

कला
                     

                        वे बोनसाई में दक्ष हैं
                        अब
बढ़ते पौधों को
अपनी मर्जी से नहीं
आदमी की मर्ज़ी से बढ़ना होता है
तरबूज की शक्ल अब गोल नहीं होती
वे अण्डाकार होते हैं
या फिर चौकोर
वे
इसे कला कहते हैं ।
नयेपन के ज़ुनून से
पौधे पीड़ित हैं
और
तरबूजों ने
अब मुस्कराना छोड़ दिया है ।

फूलों के खिलने पर ....
ख़ुश्बू के फैलने पर  ....
झरनों के झरने पर .....
हवा के बहने पर .....
थोपे गये नियमों से
बेहद ख़फ़ा है
कला ।
मैंने सुना है
कि रावण ने बाँधकर रखा था
काल को

अपने पलंग की पाटी से । 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

बस्तर कला को सहेजते लोक कलाकार

बस्तर के मानव विज्ञान संग्रहालय में इन दिनों चल रही है एक कार्यशाला जिसमें बस्तर की जनजातीय चित्रकला परम्परा को सहेज रहे हैं स्थानीय लोक कलाकार 


ये हैं कुमारी सुरभि वर्मा, बी.एससी. एग्रीकल्चर द्वितीय वर्ष की छात्रा 
  चित्रकला के प्रति एक जुनून है इन्हें । ट्राइबल आर्ट के साथ-साथ मॉडर्न आर्ट के मिश्रण का एक प्रयोग कर रही हैं सुरभि । 


एक अन्य कलाकार द्वारा बनायी गयी, बस्तर की जीवनशैली को दर्शाती यह पेण्टिंग जिसमें उपयोग में लाये गये हैं साधारण जलरंग 

ग्राम पुसपाल निवासी अमित नाग ने क्राइस्ट चर्च कॉलेज से माइक्रोबायलॉजी में बी.एससी. किया है । यह पूछने पर कि वे अब आगे क्या करना चाहते हैं, उनका उत्तर था - फ़ाइन आर्ट में ग्रेजुएशन 
बस्तरके जनजीवन में बलात घुस आये माओवाद से पीड़ित एक माओवादी युवती की मनः स्थिति को दर्शाया है मिख़ाइल विलियम ने जो लोकपरम्परा के एक प्रोफ़ेशनल चित्रकार हैं । 

बस्तर में धान की पकी फसल झूमती है तो झूमता है आदिवासी तन-मन । मांदर की थाप पर थिरक उठते हैं पाँव ....मन हो उठता है उल्लसित और प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा को ज्ञापित करने मनाया जाता है दियारी तिहार ।इस चित्र में इन्हीं भावों को उकेर रहे हैं लोकचित्रकार विलियम ।  


बस्तर टेराकोटा 
मृत्तिकाकला को सहेजते लोक कलाकार 


बस्तर की काष्ठकला को सहेजते स्थानीय लोक कलाकार 


सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

समाधान




कामदेव के प्रासाद में उनके भक्तों की भीड़ लगी रहती । लोग अपनी कामसमस्याओं के साथ आते और संतुष्ट होकर जाते । कोई कामकला के ज्ञान की पिपासा लिये आता तो कोई कामवर्धक औषधि के लिये । कामदेव की व्यस्तता का कोई अंत नहीं ।

लोगों की भीड़ तो रति के चारो ओर भी लगी रहती तथापि आराधकों को लेकर उनके मन में सदा एक परिवाद बना ही रहता । रति के पास स्त्री आराधकों का अभाव था । वे सोचतीं – क्या पुरुषों की तरह स्त्रियों की कामविषयक कोई समस्यायें नहीं होतीं ?   

कामदेव अपने आराधकों की समस्याओं का समाधान करते तो रति को उनके सहयोग के लिये उपस्थित रहना होता । रति को सन्देह होता कि इस समस्त अनुष्ठान में उनकी भूमिका क्या मात्र एक उपकरण भर की ही है ? अर्धनारीश्वर के अस्तित्व में स्त्री भी उतनी ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं है जितना कि कोई पुरुष ?

एक दिन रति से नहीं गया तो उन्होंने एक स्त्री से पूछ ही दिया – “क्या आप अपने पति की कामक्रीड़ा से संतुष्ट हैं ?”  
वह एक ग्रामीण स्त्री थी, उसने घबरा कर अपना घूँघट और लम्बा किया और लगभग दौड़ती हुयी सी घर के भीतर चली गयी ।
रति को आश्चर्य हुआ, उन्होंने सोचा - प्रश्न से इतनी घबरा क्यों गयी स्त्री ?
वे दूसरी स्त्री के पास गयीं, रति के प्रश्न से दूसरी स्त्री भी बिना कोई उत्तर दिये वहाँ से चली गयी ।
रति तीसरी, चौथी, पाँचवी ...........कई स्त्रियों के पास गयीं । किसी भी स्त्री ने उनके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया । कोई प्रश्न सुनकर घबरा जाती, कोई मुस्कराकर चलती बनती, कोई भृकुटि टेढ़ी कर कहती –निर्लज्ज कहीं की ! तो कोई प्रतिप्रश्न करती– यह भी भला कोई कहने-पूछने का विषय है ?

रति की समस्या और भी बढ़ गयी । उन्होंने सोचा – क्या सचमुच ही स्त्रियों की कोई कामसमस्या नहीं है ।
रति निराश हो उठी थीं कि तभी एक वृद्धा स्त्री ने मुस्कराते हुये उनसे कहा – “आप किसी नगरवधू से क्यों नहीं पूछ लेतीं ?”
रति को आशा की एक किरण दिखायी दी, वे नगरवधुओं के टोले में जा पहुँचीं । उन्होंने पूछा- “काम व्यापार में पुरुष की कामाग्नि शांत करते हुये आपकी अपनी काम स्थिति कैसी होती है ? क्या देह क्रय करने वाले कामीपुरुष आपकी भी कामाग्नि शांत कर पाते हैं ?”
चतुरा नगरवधू ने उत्तर दिया – “देवी ! इस व्यापार में दोनो ही पक्ष निष्ठापूर्वक अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं” ।
रति ने उत्साहपूर्वक पूछा –   “......अर्थात् पुरुष आपकी काम आवश्यकता पूरी कर पाते हैं, यही न !”  
नगरवधू बोली – “मैंने ऐसा तो नहीं कहा देवी ! हम पुरुष की वाँछना पूर्ण करती हैं जिसका वे हमें निर्धारित मूल्य देते हैं । हमारे व्यापार की सीमायें ग्राहक की संतुष्टि के साथ ही समाप्त हो जाती हैं । रही बात हमारी कामेच्छा पूर्ति की, तो उसके लिये ........”
नगरवधू ने वाक्य पूरा नहीं किया तो रति को पूछना पड़ा – “बताइये न ! ...उसके लिये ...?”
नगरवधू ने एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुये अधूरा वाक्य पूरा किया – “......उसके लिये तो हमें भी पुरुष की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है” ।  

नगरवधू के उत्तर से निराश अनमनी रति समुद्र के किनारे विचरण कर रही थीं कि तभी उन्हें कुछ कोलाहल सा सुनायी दिया । कहीं दूर किसी स्त्री-पुरुष के आपसी वाक्युद्ध का सा आभास होते ही स्त्री सुलभ उत्सुकता में रति कोलाहल की दिशा में चल पड़ीं ।
समुद्र के किनारे बनी, उच्चमूल्य पर उपलब्ध एक आधुनिक हट में एक स्त्री चीख रही थी, उसका क्लांत सा प्रतीत होने वाला पति एक कोने में रखे आसन पर बैठा बीच-बीच में कुछ प्रतिवाद करता तो स्त्री की चीख और भी बढ़ जाती । शीघ्र ही रति को समझ में आ गया कि विवाद का कारण स्त्री की यौन असंतुष्टि है ।
वे एक सम्पन्न दम्पति थे और अपने नगर से दूर समुद्रतट पर विचरण हेतु आये हुये थे । पुरुष स्त्री की कामेच्छा पूरी कर सकने में असमर्थ था जिसके समाधानस्वरूप स्त्री ने जिगोलो की सेवायें लेनी प्रारम्भ कर दी थीं । पति नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी किसी जिगोलो की सेवायें प्राप्त करे ।
निढाल से हुये पुरुष ने कहा – “यह अनैतिक है और समाज इसकी स्वीकृति नहीं देता । तुम्हें समझना होगा, यह भारत है और यहाँ का समाज स्त्री को यह सब करने की स्वतंत्रता नहीं देता ।“
स्त्री चीखी – “हाँ..हाँ, स्वीकृति-अस्वीकृति के सारे अधिकार पुरुष ने हथिया जो लिये हैं । स्त्री को स्वीकृति कौन देगा ? क्या नगरवधू के यहाँ जाने से पहले पुरुष अपनी स्त्री से स्वीकृति प्राप्त करता है ? पुरुष और स्त्री के लिये ये पृथक मापदण्ड बनाने वाला कौन है ? कौन निर्धारक है इस सबका ? यदि केवल पुरुष ही ........ तो मैं उसके एकाधिकार को स्वीकार नहीं करती । हमारी एक समान आवश्यकतायें हैं ...हमारे एक समान अधिकार भी होने चाहिये । नैतिकता और अनैतिकता के मापदण्डों में स्त्री-पुरुष के मध्य यह पक्षपात अनैतिक है । समाज में प्रच्छन्न ही सही किंतु यदि नगरवधू स्वीकार्य है तो जिगोलो क्यों नही हो सकते ?”
पुरुष ने शांत होते हुये कहा – “काम की सीमायें अनन्त हो सकती हैं किंतु दाम्पत्य जीवन की सीमायें निर्धारित हैं । सभ्य समाज इन सीमाओं के सम्मान की अपेक्षा करता है । यह अपेक्षा जब पूर्ण नहीं हो पाती तो दाम्पत्य जीवन को टूटना और बिखरना होता है ।“   
स्त्री ने गम्भीर होते हुये कहा – “आप हमें धमकी दे रहे हैं ? .....बिना यह विचार किये हुये कि पुरुष की तरह ही स्त्री की भी आवश्यकतायें हैं । पुरुष अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नीति,नियम और व्यवस्थायें गढ़ सकता है तो स्त्री को ही उससे वंचित क्यों रखना चाहता है ? क्या यह स्त्री के प्रति अत्याचार नहीं है .......?”
विवाद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था तो रति से रहा नहीं गया, वे उनके समक्ष साक्षात हुयीं, बोलीं – “निश्चित ही ....किसी भी स्त्री को वही सारे अधिकार प्राप्त हैं जो किसी पुरुष को । विधाता ने किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है ।“
स्त्री ने आश्चर्य से रति की ओर देखकर पूछा – “आप कौन ?”
“रति ....मैं रति हूँ ।“ – रति ने उत्तर दिया ।
स्त्री ने पुरुष की ओर विजयी मुस्कान से देखा फिर बोली – “सुना ? सुना आपने ? रति क्या कह रही हैं ?”
पुरुष चुप रहा, उत्तर रति ने दिया – “नगरवधू पुरुष समाज की अहंकारिक व्यवस्था का भाग है तो जिगोलो स्त्री समाज की”।
पुरुष ने हर्ष मिश्रित आश्चर्य से रति की ओर देखा । स्त्री जैसे आकाश से धरती पर आ गिरी हो, उसने प्रतिवाद किया – “किंतु सभ्य समाज की स्थापना के समय से ही पुरुषों ने अपने लिये वैकल्पिक व्यवस्थायें बना रखी हैं । उन पर अंगुली भले ही उठती रही हो किंतु कामव्यापार को रोका भी तो नहीं जा सका कभी । क्या यह पक्षपात नहीं है ?”  
रति ने बड़े ही धैर्य से उत्तर दिया- “किंतु कोई विकल्प कभी समाधान का स्थान नहीं ले पाता । आपको समाधान के बारे में विचार करना चाहिये न कि विकल्प के बारे में !”
स्त्री को आश्चर्य हुआ – “समाधान ! क्या है हमारी समस्या का समाधान ? आप ही बताइये भला !”
रति ने कहा – “हमारी काम समस्यायों का समाधान स्वयं हमारे पास ही होता है कहीं अन्यत्र नहीं । स्त्री-पुरुष मिलकर समाधान खोजें तो इसकी प्राप्ति सहज है किंतु किसी एक पक्ष के लिये दुरूह । स्त्रियों को अपने पति के समक्ष मुखरित हो समस्या को सावधानी से चिन्हित कर आगे बढ़ना चाहिये, समाधान हो जायेगा । कामक्रीड़ा के क्षणों में स्वार्थी हो जाना ही दूसरे के आनन्दातिरेक का बाधक तत्व है । दोनो पक्ष यदि अपने लिये नहीं बल्कि दूसरे के लिये काम करें तो आनन्दातिरेक की प्राप्ति से कोई स्त्री कभी वंचित नहीं हो सकती ।  ध्यान रखिये काम एक कला भी है और एक विज्ञान भी । इसमें पारंगत होने की अपेक्षा है” ।
इतना कहकर रति अदृश्य हो गयीं ।
स्त्री कुछ देर शांत बैठी रही फिर उठकर पति का हाथ पकड़कर बोली – “वर्षा होने वाली है .....हम तट पर चलें ....”

अब तक सहज हो चुके पुरुष ने आत्मविश्वास से भरकर मुस्कराते हुये स्त्री की केशराशि को सहलाया, फिर कहा – “चलो !”    

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

इतने ज़रूरी क्यों


बदलते ही मज़हब
बदल जाते हैं
तौर-तरीके
आचार-विचार
भाषा और वेश-भूषा 
मूल्य और संस्कृति
मान्यतायें और आदर्श ।  
जुड़ जाती है निष्ठा
एक दूर देश की धरती से
उस धरती के आदर्शों से
उस धरती के लोगों से
......................
और हो जाती है मौत
अपने पूर्वजों के इतिहास की ।
निराकार की अक्षय ऊर्जा का क्षरण करते  
ये मज़हब


इतने ज़रूरी क्यों है हमारे लिये ? 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

मौन को स्वर देने की चिंता में मुखरित होते मण्डीहाउस में “वे तीन दिन”

10 फ़रवरी 2015 ; तृतीय दिवस       .... उजले-उजले ये अंधियारे


उजालों को तलाशते दीपों की मौन यात्रा  

आज दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीज़े आने वाले थे इसलिये सुबह से ही गहमा गहमी थी और दिल्ली की ज़िद्दी ठंड तनिक सहमी-सहमी सी थी । आनन्द ज़ल्दी ही तैयार होकर उड़नदस्ते की गाड़ी में बैठकर उड़न छू हो गये, उन्हें दिल्ली की सड़कों पर इधर-उधर आवारागर्दी करते हुये चुनाव नतीज़ों से निकलने वाली राजनीतिक ग़र्मी पर सरकारी नज़र रखनी थी । उधर इण्डियन एक्सप्रेस से अजय शंकर ने सूचना दी कि वे चुनाव नतीज़ों पर नज़र रखने की वज़ह से हमसे मिलने नहीं आ सकेंगे । एक दिन पहले ही संघ द्वारा बीजेपी की सम्भावित हार की स्वीकारोक्ति के समाचार टीवी चैनल्स प्रसारित कर चुके थे जिसके कारण आज कमल के परागकण परिपक्व होकर मधुमक्खियाँ को रिझाने से मना करते रहे । इधर मधुमक्खियों को निराश होना पड़ा तो उधर मुझे भी अकेले ही मण्डीहाउस के लिये प्रस्थान करना पड़ा ।


न्यूयार्क के थियेटर निर्देशक क्रिस्टोफ़र के साथ रंगकर्मी  
            अंतर्मुख में आज भीड़ अधिक थी । हमें बताया गया कि मिस्टर क्रिस्टोफ़र एयरपोर्ट से आते-आते दिल्ली के राजमार्ग पर निरंकुश ‘जाम’ के शिकार हो चुके हैं इसलिये कुछ देर और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी । अंततः मिस्टर क्रिस्टोफ़र तशरीफ़ लाये, कार्यक्रम शुरू हुआ । उन्होंने अपने निर्देशिकी अनुभव बाँटे और लड़कियों ने उनसे ढेरों सवाल पूछे ।  
 

पुरुष की कामाग्नि में भस्म होती स्त्री देह की मुक्ति पर विमर्श
 अगले सत्र के लिये हमें बहुमुख जाना पड़ा । विषय गम्भीर था और स्त्री-पुरुष वर्चस्व के युद्ध में आदिकाल से उलझा हुआ भी । स्त्रियों के कामसंबन्धों, कामस्थितियों और कामविकृतियों जैसे उपेक्षित विषय पर चिंता प्रकट करते हुये एन.एस.डी. के मंच पर स्त्री चिंतकों की पहल ने आधी दुनिया की वैचारिक करवट और अभिव्यक्ति के उपयोग को मुक्त भाव से प्रमाणित किया । प्रॉस्टीट्यूशन, लिस्बियनिज़्म, होमोसेक्सुअलिटी, लिव इन रिलेशनशिप के साथ-साथ जिगोलोज़ पर भी खुल कर चर्चा हुयी ।
चकलाघर जैसी अस्वीकृत संस्थाओं द्वारा पुरुषों को सहज उपलब्ध एक्स्ट्रामैरिटल सेक्स सुविधाओं की मौन सामाजिक स्वीकृति के समानांतर जिगोलो की सेवाओं पर भी चर्चा हुयी । इस सबके बीच विमर्श के दौरान यह बात भी उभर कर सामने आयी कि आम घरेलू महिलाओं के सेक्सुअल ऑर्गेज़्म का संवेदनशील विषय पुरुषों की उपेक्षापूर्ण सोच और स्त्रियों की स्वाभाविक झिझक के बीच दब कर रह गया है जिसके दुष्परिणाम भोगने के लिये स्त्रियाँ ही बाध्य होती हैं ।
अंतिम सत्र में ऊषा गांगुली ने नौटंकी जैसी लुप्त होती लोककलाओं पर चिंता व्यक्त की । अजय मण्डावी ने माओवाद के शिकार हुये लोगों की स्थिति पर चर्चा करते हुये कला के योगदान का पक्ष प्रस्तुत किया । अंतिम कार्यक्रम मेरा था –“उजले-उजले ये अँधियारे” जिसमें पॉवर प्रज़ेण्टेशन के माध्यम से “अपलिफ़्टमेण्ट ऑफ़ ट्राइब्स थ्रू आर्ट, लिटेरेचर एण्ड थियेटर” विषय पर मैंने अपने विचार प्रस्तुत किये ।        


बस्तर में माओवादी हिंसा से बहते ख़ून की लालिमा से जूझती
कला की अपनी शांतिपूर्ण जंग के अनुभव बताते हुये कांकेर गौरव अजय मण्डावी 


एन.एस.डी. के भव्य परिसर में एक इतिहासकार एक कलाकार  


छत्तीसगढ़ के पर्यटन को प्रमोट करने के विषय पर निर्देशक डॉ. योगेन्द्र चौबे से
विचार-विमर्श करते महाराजा आदित्य प्रताप देव   


मौन को स्वर देने की चिंता में मुखरित होते मण्डीहाउस में “वे तीन दिन” का दूसरा भाग

9 फ़रवरी 2015 ; द्वितीय दिवस     ... अबे चल हट् झूठे कहीं के

 नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के परिसर का एक भाग
सुबह-सुबह अंतर्मुख में निर्देशकों और विद्यार्थियों की भीड़ थी । मैंने अपना स्थान ग्रहण किया । शीघ्र ही कल की तरह बिना किसी औपचारिकता के एक निर्देशक ने सम्बोधित करना शुरू किया । यह एक तरह की क्लास जैसी थी जिसमें कल इण्टरनेशनल थियेटर फ़ेस्टिवल ऑफ़ इण्डिया में देखे गये नाटकों की समीक्षा की जानी थी । कल आनन्द और अजय के साथ श्रीराम सेण्टर में तारिक हमीद निर्देशित प्ले “द वेव” देखने गया था । आनन्द की टिप्पणी थी कि यदि स्कूल के दृश्य भारतीय परिवेश को दर्शाने वाले होते तो ज़्यादा अच्छा होता । इस पर निर्देशक ने लम्बी चर्चा की और बताया कि यह विदेशी धरती पर घटित एक ऐतिहासिक घटना का प्ले था और इतिहास से छेड़छाड़ किया जाना उचित नहीं होता । 


रंगकर्मियों की पाठशाला
अभी समीक्षा चल ही रही थी कि किसी ने अनुपम खेर के आने का समाचार दिया । सभी लोग अंतर्मुख से निकलकर बहुमुख की ओर चल पड़े ।
पूरा कक्ष खचाखच भर गया यहाँ तक कि कुछ लोगों को ज़मीन पर भी बैठना पड़ा । मैंने अनुपम खेर को कक्ष में प्रवेश करते देखा, उनकी चाल कुछ इस तरह थी जैसे परीक्षा कक्ष में इन्विजिलेशन कर रहे हों । वे मुस्कराते हुये मंच की ओर गये और एक कुर्सी पर अभी बैठे ही थे कि तीन और निर्देशकों ने कक्ष में प्रवेश किया । तालियाँ बजीं और बिना किसी औपचारिकता के अनुपम खेर ने अपना लेक्चर शुरू किया । आज वे एक शिक्षक की भूमिका में थे ।
        अभिनय कला पर अनुपम खेर का व्याख्यान रुचिकर था, उन्होंने बहुत सी बातें बतायीं जिनमें से तीन बातों को मैंने नोट किया – 1- अभिनय सीखने के लिये कोई पाठ्यक्रम नहीं होता, 2- अभिनय सीखने की कोई उम्र नहीं होती, 3- अपने आप को कभी स्ट्रग्लर आर्टिस्ट मत कहो, यदि आपके पास काम नहीं है तो अपने आप को आर्टिस्ट विदाउट वर्क कहो ।
        मैं उनकी तीसरी बात से सहमत नहीं हुआ । ‘स्ट्रग्लर आर्टिस्ट’ कहना प्रयास और पोटेंशियल का प्रतीक है जबकि ‘आर्टिस्ट विदाउट वर्क’ एक निगेटिव स्थिति को दर्शाता है । बेहतर होगा यदि ऐसे लोग स्वयं को ‘आर्टिस्ट सीकिंग द जॉब’ कहें, यह एक गतिमान स्थिति को दर्शाता है ।
        मुझे अनुपम का शिक्षकपन अच्छा लगा, इतनी भीड़ में उनकी दृष्टि हर किसी पर थी । व्याख्यान के बीच में अचानक वे एक लड़की ओर मुख़ातिब होकर बोले – “पानी पी लो ......पानी दूँ ? ......यह आपकी इक्कीसवें जम्हाई है” । एक और युवक से वे अनायास ही बोल पड़े, जैसे कुछ याद आ गया हो – “क्यों तुम वही हो न जो कल प्रश्न पर प्रश्न पूछे जा रहे थे” ? युवक ने मना किया – “नहीं सर मैं नहीं था” । अनुपम बोले – “तुम्हीं तो थे यार, कल तुमने रंगबिरंगी शर्ट पहनी थी, आज शर्ट बदल कर आये हो” । युवक ने फिर मना किया तो अनुपम बड़े अपनत्व से डाँटते हुये बोले – “अबे चल हट् ...झूठे कहीं के” ।
        व्याख्यान समाप्त हुआ तो लोग अनुपम पर टूट जैसे पड़े .....क्या युवक क्या युवतियाँ .....सेल्फ़ी की होड़ मच गयी । लोग भद्रता और शिष्टाचार की सीमायें तोड़- मरोड़कर फेक चुके थे और अनुपम सबको बर्दाश्त किये जा रहे थे । दूरदर्शन वालों ने अवसर देखा और अनुपम खेर को गपच लिया । वे बहुमुख से बाहर निकले तो दूरदर्शन का इंटरव्यू शुरू हो गया । इंटरव्यू लगभग दस मिनट तक चला इस बीच सेल्फ़ी लेने वाले पूरी तरह निर्लज्ज हो चुके थे । मैं अभिनय के करीकुलम पर उनसे चर्चा करना चाह रहा था किंतु भीड़ उन्हें छोड़ ही नहीं रही थी । मैं दूर खड़ा होकर भीड़ से उनकी मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहा था कि तभी छींका टूटा और वे ठीक मेरे सामने थे । मैंने खाँटी देशी अन्दाज़ में उन्हें प्रणाम किया और अभिनय के करीकुलम पर चर्चा शुरू की । वे हमारी बात से सहमत नहीं हुये । फिर बोले – “छोड़ो ये सब ....आप तो केवल एक्टिंग सीख लो ...उसी पर ध्यान दो” । शायद वे बात को टालना चाहते थे ....शायद उन्हें लगा कि मैं भी एक रंगकर्मी हूँ ।  
         भोजन का समय हो गया था और आज हम भोजन के लिये एपीडी साहब के यहाँ आमंत्रित थे ; एपीडी यानी कांकेर के महाराजा आदित्य प्रताप देव जी । इस बीच जॉली बाबा और एपीडी के कई कॉल आ चुके थे । हम मण्डी हाउस से मेट्रो पकड़कर दिल्ली यूनीवर्सिटी पहुँचे और फिर वहाँ से सेण्ट स्टीफ़ेंस कॉलेज़ ।
अजय ने कालबेल दबायी तो दरवाज़ा स्वयं महाराजा साहब ने खोला ... उनका चेहरा उनकी बेशुमार ख़ुशी को उलीच-उलीच कर बयान कर रहा था । थोड़ी गपशप के बाद जब हम भोजन की मेज पर पहुँचे तो वे बोले – “आज अगर जॉली बाबा होते यहाँ तो बहुत ख़ुश होते”। 


अफ़्रीकी काष्ठकलाकृति जो महाराजा साहब को उनके एक मित्र ने भेंट की थी 

भारत के अन्य शहरों की अपेक्षा दिल्ली का विस्तार बहुत ज़्यादा हुआ है । आज यह विस्तार दिल्ली की सीमायें तोड़कर उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की ओर निर्ममतापूर्वक बढ़ता जा रहा है । मुझे पता चला कि एक सेठ ने निजी विश्वविद्यालय खोलने के लिये हरियाणा की सीमा में एक सौ एकड़ कृषिभूमि ख़रीदी है । मुझे उस सेठ की निर्मम और स्वार्थी सोच पर निराशा हुयी ....और दुःख भी । ये सेठ लोग कंक्रीट का जंगल किसी बंजर ज़मीन में नहीं बना सकते क्या ?
सेमिनार के दूसरे सत्र में हम सम्मिलित नहीं हो सके । शाम साढ़े छह बजे नसीरुद्दीन शाह का प्ले “कम्बख़्त बिकुल औरत” देखने का बहुत मन था किंतु सारी टिकटें पहले ही बिक चुकी थीं, हमें यहाँ भी निराश होना पड़ा ।
एन.एस.डी. के बुक स्टोर में “परिंदे” का जून-जुलाई 2014 का अंक देखा । पत्रिका का आवरण चित्र जगदलपुर के सुभाष पांडेय का था । दिल्ली में बस्तर की कला हलचल देखकर दिल बाग-बाग हो गया । कला और साहित्य से सम्बन्धित आज ढेर सारी पुस्तकें ख़रीदीं और चाँदनी चौक से कला फ़िल्मों के कई एक सीडीज़ भी । कल से आज तक मेरी मनःस्थिति थियेटर-थियेटर हो चुकी थी । मैं थियेटर में था, थियेटर मेरे अन्दर था, थियेटर मेरे बाहर था ..... । 


कल का रंगकर्मीछात्र और आज का रंगकर्मीशिक्षक .... यानी अनुपम खेर 


शाम घिरते ही देश-विदेश से आये रंगकर्मियों और फ़िल्म निर्देशकों से

गुलजार होने लगा एन.एस.डी. का मंडपम