शनिवार, 18 मई 2013

प्रकृति


पूछो-पूछो ...और पूछो ....
खीझ-खीझ कर पूछो ....
पूछ-पूछ कर खीझो ....
हम नहीं देंगे
आपके एक भी सवाल का ज़वाब
क्योंकि हम गुण्डे हैं
बदमाश हैं
कातिल हैं
लुच्चे हैं
लफंगे हैं
  बलात्कारी हैं  
घोटालेवाज हैं
 नरक के कीड़े हैं
मगर.......  
हमारी गलती क्या है यह तो बताओ?
वोट तो तुम्हीं ने दिया था हमें
और अब
जब हम अपनी प्रकृति के अनुरूप
भारत को तबाह करने में लगे हैं
अपने "स्व-धर्म" का पालन करने में लगे हैं
तुम्हें कोई हक़ नहीं होता
हमसे एक भी सवाल पूछने का।
 

रविवार, 12 मई 2013

माओवाद की पोषक व्यवस्थायें

    
      भारत में माओ त्से तुंग है,स्टालिन है, लेनिन है, ओसामा है, अरिस्टोटल है, फ़्रायड है .......। भारत विचारों को आयात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है। भारत में संविधान से लेकर बच्चों के खिलौनों, दीपावली के पटाखों और रक्षाबन्धन पर भाइयों की कलाइयों पर बांधने की राखियों तक के लिये विदेशी दीवानापन अद्भुत् है। यह स्वतंत्र देश आज भी विदेशों पर निर्भर है। क्यों ? ......क्या भारत चिंतकों और विचारकों से शून्य देश है? क्या भारत के लिये विदेशी चिंतन और विचार इतने अपरिहार्य हो चुके हैं? क्या कृष्ण,विदुर, विक्रमादित्य, चाणक्य, बुद्ध, महावीर आदि अप्रासंगिक हो चुके हैं?
      हम बस्तर की बात कर रहे हैं...और बस्तर ही क्यों .... भारत के उन सभी क्षेत्रों की भी कर रहे हैं जो विदेशी कूटनीतिक हिंसा के कारण आंतरिक गुरिल्ला युद्ध के शिकार होने के लिये विवश हैं....और सरकार असहाय है।
आज भारत की जनता यह जानना चाहती है कि तेलुगु मिश्रित टूटी-फूटी हिन्दी में छत्तीसगढ़ के वनाच्छादित दुर्गम अंचलों में शोषण के विरुद्ध किशोरवय बालकों-बालिकाओं की छापामार हिंसक सेना तैयार करने वाले चीन क्रीत भारतीय दासों के लिये उर्वरक भूमि तैयार करने वाले लोग कौन हैं?
भारत की केन्द्र सरकार प्रति वर्ष करोड़ों की धन राशि नक्सलवाद, जो कि शनैः-शनैः माओवाद में परिवर्तित हो चुका है, के उन्मूलन के लिये राज्य सरकारों को प्रदान करती है। इस राशि का कोई ऑडिट नहीं होता। जिस देश में प्रति मिनट देश को लूटने की साजिशें कर्णधारों द्वारा रची जाती हों वहाँ इस राशि का कितना सदुपयोग अपने निर्धारित उद्देश्य के लिये किया जाता होगा यह सहज अनुमान योग्य है। देश का मूल्यवान धन उस समस्या के लिये व्यय किया जा रहा है जो समाधान के स्थान पर निरंतर बढ़ती जा रही है। यह दशा और दिशा किस स्थिति की ओर इंगित करती है? देश को किस परिणाम की आशा दिलायी जा रही है?
बस्तर के दुर्गम वनांचलों में आयातित माओवाद नें नक्सलवाद के जनक कनु सान्याल को आत्महत्या करने पर विवश करने के बाद अपनी जड़ें दृढ़ता के साथ विस्तारित कर ली हैं। नक्सलवाद मर चुका है,उसकी लाश पर पराश्रयी माओवाद ने अधिकार कर लिया है। पर मैं एक प्रश्न पूछता हूँ कि भारत की मिट्टी कैसी है जहाँ के लोगों को विदेशी व्यक्तियों, विदेशी विचारों,विदेशी शासकों, विदेशी भाषाओं, विदेशी औषधियों, विदेशी तंत्रों, विदेशी आयुधों,विदेशी संगीत, विदेशी परम्पराओं ....से इतना प्रेम है? भारतीयों को भारतीय चीजों से इतना वैराग्य क्यों है? क्या भारतीयों की अभारतीयता इन सबके लिये उत्तरदायी नहीं है?
निर्धन और अशिक्षित या अर्धशिक्षित वनवासियों के मन की रिक्त पड़ी भूमि में माओवाद के बीज बोने वाले लोग चीन से नहीं आये, वे चीन क्रीत चीन के भारतीय दास हैं जो भारत में चीन के लिए कार्य करते हैं। हाँ-हाँ ....भारतीय दास, दास प्रथा भारत से अभी तक समाप्त कहाँ हुयी है!
क्या यह बताने की आवश्यकता रह गयी है कि हमारी व्यवस्था के लिये उत्तरदायी लोग ही देशव्यापी अव्यवस्थाओं के जनक बन चुके हैं, शासन तंत्र की प्रत्येक कड़ी भ्रष्टाचार और शोषण का पोषण कर रही है और यह अराजक स्थिति ही माओवाद के लिये उर्वरक का काम करती है।
माओवाद के क्रीत भारतीय दास जब 12 वर्ष के वनवासी बालक-बालिकाओं को उनके आसपास की शोषणपूर्ण स्थितियों का समाधान बन्दूक की गोली से बरसाने का आश्वासन देते हैं तो उसके ऊपर अविश्वास करने का उनके पास कोई कारण नहीं होता। भारत की स्वतंत्रता के इतने दशकों के बाद भी भारत के कर्णधार भारतीयों को स्वतंत्र देश के नागरिक होने की अनुभूति करा पाने में असफल रहे हैं। स्वतंत्रता के साथ ही भारत के लोगों ने देश के टुकड़े होते देखे, धार्मिक उन्माद में रक्तपात होते देखा, कश्मीर को हड़पे जाते देखा, चीन के हाथों अपनी लज्जास्पद पराजय देखी, आर्थिक अपराधियों और हत्यारों से भरी संसद को देखा,भ्रष्टाचार को नित नयी ऊँचाइयाँ छूते देखा, धार्मिक दंगे देखे, घरों के भीतर भी स्त्रियों को असुरक्षित देखा, घर के बाहर खेलती बच्चियों के साथ बलात्कार होते देखा, अपराधियों को संरक्षण पाते देखा, ईमानदारों को बेइज्जत होते देखा, न्याय को बिकते देखा, जो वर्ज्य है देखने के लिये वह सब भी देखा ......और अब देखने की इस प्रक्रिया को परम्परा में बदलते हुये पूरी दुनिया देख रही है।
सर्वविदित है कि माओवादी प्रेत वनवासियों के पास बड़ी सुगमता से पहुँच जाते हैं, उन्हें अपना बना लेते हैं,उनसे अपनी इच्छा के अनुकूल कार्य करवा लेते हैं, उन्हें अपने ही वनवासी बन्धुओं का रक्त बड़ी निर्ममता के साथ बहा देने के लिये तैयार कर लेते हैं, उन्हें स्कूल की इमारतें ढहा देने और सड़कें खोद डालने के लिये मना लेते हैं। आश्चर्य है, वनवासियों तक पहुँचने की यह सुगमता भारत सरकार के कर्णधारों, नुमाइन्दों, मानवाधिकारवादियों और स्वयंसेवी संस्थाओं के समर्पित देशभक्तों के लिये दुर्गम क्यों है? विदेशियों के छक्के छुड़ा देने वाले वनवासी गुण्डाधुर और गेंद सिंह जैसे महानायकों के बस्तर में राष्ट्रवाद की अलख क्यों बुझ गयी?
30 वर्ष का भीमा माओवादी है, वह नक्सलवाद और माओवाद को एक-दूसरे का पर्याय मानता है। उसने कभी माओ त्से तुंग का नाम नहीं सुना, उसे माओवाद के बारे में कुछ नहीं पता, दुनिया के नक्शे में चीन कहाँ है उसे नहीं पता,चीनियों के ख़ौफ़नाक मंसूबों के बारे में उसे नहीं पता, वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं वह उन्हें कहाँ ले जायेगा उन्हें नहीं पता। उन्हें कुछ नहीं पता ....सिवाय इसके कि माओवादी प्रेतों के इशारों पर उन्हें कितनों का रक्त बहाना है और भारत की कितनी सम्पत्ति नष्ट कर देनी है।
जिसे दुनिया जहान के बारे में कुछ नहीं पता वह ख़ूंख़ार अपराधी के रूप में जाना जाता है, पुलिस उसकी तलाश में रहती है, मुठभेड़ें होती हैं, विस्फोट होते हैं, हत्यायें होती हैं, घर-परिवार तबाह होते हैं। मौत दोनो के हिस्से में है माओवादी वनवासियों के भी और पुलिस या सेना के जवानों के भी। भारत में होने वाली नृशंस मौतों का पूरा हिसाब चीन के बही खातों में है। बस्तर के माओवादियों के पास से पाये गये आयुधों पर चीन की मोहर का होना भारत के भीतर चीन के युद्ध को प्रमाणित करता है। भारत के भीतर चीन का छापामार गुरिल्ला युद्ध जारी है ......भारतीय मर रहे हैं ....कभी अपराधी बनकर, कभी सेना या पुलिस के जवान बनकर, हर हाल में मौत भारतीय की हो रही है। भारत की यह कैसी सुरक्षा नीति है?
भारत के भीतर धधक रही माओवादी लपटों की ऊष्मा बीज़िंग तक पहुँचती है, भारत की असफलता से उत्साहित होकर ही चीन के साहस को लद्दाख और अरुणांचल प्रदेश में भारत की भूमि को हड़पने के रूप में पूरी दुनिया देख रही है। भारत अपने को एक सम्प्रभुता सम्पन्न और सबल राष्ट्र प्रमाणित कर पाने में असफल रहा है।
इस दुर्बल राष्ट्र का एक चित्र यह भी है, ध्यान से देखिये इस चित्र को -
वह जंगल में घूम रहा था...बिना पूरे कपड़े पहने .....बिना किसी चिंता के ...अपनी मस्ती में था। वह अकिंचन था, खाली था और कच्ची मिट्टी था। कच्ची मिट्टी को अकेला देख कर माओवादी प्रेत उसके पास पहुँचा, उसके सामने एक गिलास रखा और फिर उसे ज़हरीली शराब से भर कर उसके हाथ में थमा दिया। कच्ची मिट्टी के खाली हाथ में पहली बार किसी ने कुछ भरकर थमाया था,वह अभिभूत हो गया उसने झट से वह ज़हरीली शराब अपने जेहन में उतार ली। धीरे-धीरे वह उसका अभ्यस्त होता गया ....तब बहुत बाद में तथाकथित शरीफ़ों ने चिल्लाना शुरू किया- ये अपराधी हैं ...इन्हें पकड़ो ...इन्हें सजा दो .......।ये शरीफ़ लोग शराब से नफरत करते थे, वह बात अलग है कि ये शरीफ़ ज़िन्दा इंसानों का ख़ून पीने के शौकीन थे। शरीफ़ अभी भी चिल्ला रहे हैं कि उनके पास ज्ञानामृत से भरा हुआ पूरा एक कमण्डल है,ये दुष्ट वनवासी इसकी एक बून्द भी चख लें तो इनका उद्धार हो जाय पर ये नालायक इसे पीना ही नहीं चाहते इसलिये इन दरिन्दों को मौत की सजा दी जानी चाहिये।
ये इतने शरीफ़ हैं कि कभी किसी कच्ची मिट्टी के पास नहीं जाते अपने कमण्डल का ज्ञानामृत पिलाने किंतु जब कोई ज़हरीली शराब पीने लगता है तो धरती आसमान एक कर देते हैं। कच्ची मिट्टी को यदि किसी ने पहले-पहले दूध का गिलास पेश किया होता तो क्या आज उसे शराब की यह लत लगी होती?आज भी कोई शरीफ़ उन्हें दूध पिलाना नहीं चाहता, उन्हें शराब पीने के अपराध में सूली पर चढ़ा देना चाहता है। माओवादी समस्या का क्या यही एक मात्र समाधान है?
माओवादी समस्या ने बस्तर के जनजीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया है। बस्तर के लोगों को शोषण से मुक्ति का सपना दिखाने वाले माओवादियों ने बस्तर में अपने पैर जमा लेने के बाद अब बस्तर के लोगों का शोषण करना शुरू कर दिया है। वैचारिक, मानसिक और आर्थिक शोषण तो उन्होंने पहले ही शुरू कर दिया था अब दैहिक शोषण भी शुरू किया जा चुका है। मलहम लगाने का वादा किया था,घावों में बारूद भर कर चल दिये।
तब वह पूरी तरह किशोर भी नहीं हो पाया था जब उसके हाथों में कलम के स्थान पर बन्दूक थमा दी गयी थी ( मजे की बात यह भी है कि कलम थमाने वाले तब कहाँ सो रहे थे जब कोई उन्हें बन्दूक थमा रहा था?) अब वह जवान हो चुका है ..शरीर से भी और मन से भी। जब सीनियर्स उसे उठाकर लाये थे तब वह भी बच्ची ही थी। न जाने कितनी बार उनकी शारीरिक क्षुधा की तृप्ति का साधन बनती रही थी। पर अब, जब कि दोनो माओवादी जवान हो चुके हैं दोनो ने एक-दूसरे को अपना हृदय समर्पित कर दिया। मन सपनों के पंख लगाकर उड़ चला, किंतु जेल की सख़्त दीवारों से भी सख़्त माओवाद की खुली जेल की अदृष्य दीवालों को लांघ पाना उनके लिए असम्भव है। मृत्यु उनके सामने है। एक ही उपाय उनकी समझ में आता है, वे सामान्य धारा में लौटना चाहते हैं, किंतु यह भी निरापद नहीं है। मृत्यु और वादा ख़िलाफ़ी यहाँ भी है। यह जोड़ा चाहता है कि उनका पुनर्वास हो, सरकार और पुलिस के संरक्षण में हो, वे जीना चाहते हैं पर करोड़ों रुपये व्यय करने वाली सरकार के पास उनके पुनर्वास की कोई ठोस योजना नहीं है। यह कैसी व्यवस्था है?
देश के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्न है, क्या भारत के भीतर हो रहे इस चीनी कूटयुद्ध से भारतीयों की रक्षा नहीं की जानी चाहिये ? क्या बस्तर के नक्सलियों बनाम माओवादियों का ईमानदारी से पुनर्वास नहीं किया जाना चाहिये ? क्या इस हिंसा का कोई अहिंसक समाधान नहीं निकल सकता ?
माओवादी हिंसा में धधक रहे बस्तर को ....और भारत के ऐसे ही अन्य अतिसंवेदनशील क्षेत्रों को लालफीताशाही के भ्रष्टाचार से मुक्त करके ही माओवादियों को अब तक उपलब्ध करायी जाती रही प्राणशक्ति का पतन संभव है। पूरा भारत तो लुट ही रहा है, क्या इतने बड़े देश में जरा-जरा से इन जल रहे क्षेत्रों पर भी रहम नहीं की जा सकती ? हे महालुटेरो ! बस्तर को अब तो मुक्त करो।
 

बृहस्पतिवार, 9 मई 2013

एक हद बनाइये

   
    आये हो क़रीब मेरे दिल में बैठिये।
      दिल में बैठकर मगर न ज़ुल्म ढाइये॥ 

    दिल खोल जाम आज फिर से टकराइये।
      महफ़िल में आये हो तो एक हद बनाइये॥

    कितना किया सफ़र न हमको यूँ बताइये।
      महंगा है ढोल पीटना, कुछ शर्म खाइये॥ 

    सेवक से बन गये कुबेर, कैसे बताइये।
      अब इनसे, देशवासियो हिसाब लीजिये॥

    काटे जो सिर शहीदों के, छीन लाइये।
      न कोई वार्ता, न कोई खेल खेलिये॥ 

    कर कत्ल टुकड़े लाश के न अब चुराइये।     
        दुश्मनी की भी तो एक हद बनाइये॥
 

रविवार, 5 मई 2013

बहुत हुआ, अब हम जीना चाहते हैं....


काष्ठ्लेख .....

कला की इस विधा को जिलाजेल कांकेर के बन्दीगृह में सीखते हैं विचाराधीन बन्दी

....कि मुक्त होने के बाद पुनर्वास में होगी सुविधा।

किंतु सपनों को यथार्थ में बदलना इतना  सरल है क्या?


 

तीन साल से भी अधिक समय तक जेल में विचाराधीन बन्दी के रूप में रहने के बाद निर्दोष मुक्त हुये किंतु नक्सली होने का प्रमाणपत्र लेकर निकले समारू  ने सोचा था कि वह अपने सिर पर लगे इस कलंक को अपनी कला साधना से धो डालेगा ....

 

अपने गाँव भैंसासुर वापस आकर बिना किसी  सहयोग के उसने अपने पुनर्वास के लिये स्वयं ही प्रयत्न करने शुरू कर दिये

 
 

.... किंतु किसी निरक्षर और निर्धन आदिवासी के सिर पर लगे नक्सली नामक कलंक से यूँ मुक्त होना सरल नहीं है । सीमा सुरक्षा बल के जवानों को जब भी किसी वारदात की तहकीकात की ज़रूरत होती है वे आदिवासी गाँवों से कुछ लोगों को उठा लाते हैं ...

और फिर शुरू होती है उनकी "तहकीकात" ।

कोई चीखता है कि उसे कुछ नहीं पता ...कोई गिड़गिड़ाता है कि अब वह सुधर गया है और इस बार उसने माओवादियों के कहने पर किसी वारदात में कोई सहभागिता नहीं की है .....

पर फोर्स के अपने तरीके होते हैं ...अपनी संहिता होती है।  समारू को छह दिन तक चौकी में रखा गया फिर छोड़ दिया गया। वह लंगड़ाते हुये चलकर वापस घर आ गया। लंगड़ी व्यवस्था में उसका लंगड़ाना कोई अनोखी बात नहीं है।  

 
 

उस दिन जब मैं अंतागढ़ से किसकोड़ो के लिये निकलने ही वाला था कि एक ग्रामीण ने आकर अनुरोध किया कि मैं उसकी वृद्धा माँ को एक बार देख लूँ ...वह चल फिर नहीं सकती ...और उसके गाँव में चिकित्सा सुविधायें नहीं हैं। उसका गाँव वहाँ से दूर था, मेरी अनिच्छा देख उसने फिर कहा कि उसके गाँव में कुछ और भी रुग्ण हैं। किंचित असमंजस के बाद मुझे उसके गांव के लिये रुख करना ही पड़ा। उसके गाँव भैंसासुर में जब मैं रोगियों को देखकर वापस जाने का उपक्रम करने लगा तभी एक युवक ने आगे बढ़कर कुछ सकुचाते हुये मुझसे ताकत की दवा लिख देने को कहा। गाँव के लोगों द्वारा ताकत की दवा माँगना सामान्य बात है। किंतु मैंने देखा वह किंचित लंगड़ा रहा था।  धीरे-धीरे पता लगा कि उसे सीमा सुरक्षा बल के द्वारा इण्टेरोगेशन के दौरान मारा पीटा गया था।

मुझे लगा कि मुझे उससे और गाँव वालों से बात करनी चाहिये। थोड़ी बहुत ना-नुकुर के बाद उसने बताना शुरू किया कि आदिवासी लोग माओवादियों और पुलिस के बीच पिसने के लिये विवश हैं। वह चाहता है कि उसका पुनर्वास किया जाय, भले ही पुलिस की निगरानी में ही हो जिससे वह रोज-रोज की मार-पीट से बच सके। किंतु माओवादियों के इन विवश अनुयायियों के पुनर्वास के लिये किसी के पास कोई योजना नहीं है।

सरकारें आतंकवाद का ख़ात्मा चाहती हैं .....किंतु बिना किसी वैकल्पिक और रचनात्मक योजना के। स्वभाव से शांत आदिवासी अब अशांत हो उठा है। वह माओवादियों से मुक्त होना चाहता है ...और पुलिस एवं सीमा सुरक्षा बलों से भी। उसे माओ त्से तुंग के बारे में कुछ नहीं पता, दुनिया के नक्शे में चीन कहाँ है उसे नहीं पता, चीन की विस्तारवादी नीतियों के बारे में उसे नहीं पता। उसे तो कुछ लोग हुक्म देते हैं जिसकी अवहेलना की शक्ति उसमें नहीं होती।

मैंने पूछा - क्या तुम्हें अपने लिये अस्पताल और अपने बच्चों के लिये स्कूल नहीं चाहिये? आवागमन के लिये सुविधाजनक सड़कें नहीं चाहिये ? सबका समवेत स्वर में एक ही उत्तर था कि उन्हें वह सब कुछ चाहिये जो दूसरे गाँवों में है।   

प्रश्न उठता है कि तब वे कौन लोग हैं जो विध्वंसात्मक कार्यवाहियों और बम विस्फोट की दुर्दांत वारदातों में शामिल होते हैं?

 निश्चित ही, इनमें से कोई भी चीन का वाशिन्दा नहीं है। नासमझ भारतीय ही चीनी षड्यंत्रों में शमिल होकर चीनी उद्देश्यों की पूर्ति के साधन बन रहे हैं। माओवादी क्रूरता की जिन सारी हदों को पार कर नृशंस हत्यायें करते हैं उसके आगे पुलिस की प्रताड़ना तो कुछ भी नहीं है। किंतु इस तुलनात्मक तथ्य से किसी भी उत्पीड़न को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। 

उधर बीजिंग ख़ुश है कि भारत के लोग आपस में ही एक-दूसरे को काट-मार रहे हैं और वह अपनी धूर्त चालों में सफल हो रहा है।  

 
 

आदिवासी महत्वाकांक्षी नहीं होते ..प्रकृति ने उन्हें जितना ...जो कुछ दिया है वे उतने में ही संतुष्ट हैं, किंतु माओवाद के प्रेत ने उनका सुख-चैन हर लिया है।

 
 

जंगल-ज़मीन और नदियों के गीत गाने वाला आदिवासी ...प्रकृति की पूजा करने वाला आदिवासी  

आज अपना सबकुछ खोता जा रहा है। जंगल ख़त्म हो रहे हैं ...नदियाँ सूख रही हैं .....और आदिवासी भयानक विस्फोटों के षड्यंत्रों में फंसा ख़ुद को असहाय महसूस कर रहा है।

 
 

इस त्रासदी को एक भिन्न दृष्टि से देखने और उसका समाधान तलाशने की आवश्यकता है।

इस त्रासदी से जंगल कितने ग़मज़दा हैं और पहाड़ कितने उदास !!!