बुधवार, 1 अप्रैल 2015

हक़ सपनों को जीने का

हक़ सपनों को जीने का

         अफ़गानिस्तान की ग़रीबी ने कुछ अफ़गानियों को ख़ूनी खेल का प्यादा बना दिया, वे अवैध नशे के कारोबार से जुड़ते गये, इस्लाम के नाम पर अपने ही भाइयों का ख़ून बहाते रहे ......और अपनी ही मासूम बच्चियों के ग़ुनहगार बनते गये .......ऐसे ग़ुनहगार जिसकी मिसाल भारतीय उपमहाद्वीप में इससे पहले कभी नहीं मिलती । 
         बच्चियों के यौनशोषण और उत्पीड़न के मामले में वे हैवानियत की सारी हदें पार करते चले गये । अपने से कई गुने उम्र के बुज़ुर्गों से शादी न करने की सज़ा उन्हें अपने नाक-कान गंवा कर देने के लिये मज़बूर होना पड़ता है । 
         इस्लाम के नाम पर आधी आबादी पर कहर टूटने की घटनायें कुछ  कम ज़रूर हुयी हैं किंतु पूरी तरह ख़त्म नहीं हुयीं । पड़ोस में कुछ लोग हैवानियत के शिकार होते रहें तो शेष दुनिया के लोगों को जगना ही होगा । 


काबुलीवाला तुम कहाँ हो ? 


रूस-पाकिस्तान और अमेरिका की तिकड़ी में फस गया काबुलीवाला अब कहीं नज़र नहीं आता, हो सकता है उसका भी घर किसी बम धमाके में धूल बनकर उड़ गया हो और अब उसका नाम-ओ-निशान भी न बचा हो । 


नीचे ओसामा ...ऊपर ख़ुदा ..........मगर मेरी कोई नहीं सुनता ......
कि मैं भी दुनिया की दीगर बच्चियों की तरह गुड़िया से खेलना चाहती हूँ ....


कोई बतायेगा .....मेरा ग़ुनाह ? क्यों अभिषप्त बना दिया है मुझे ? 
इस्लाम के नाम पर क्रूरता के कहर ढा कर किस ख़ुदा की इबादत करते हो तुम ? 


हक़ हमें भी है सपने देखने का .........
और उन्हें जीने का 



निकाह के नाम पर कामी बूढ़े की हबस की शिकार होने से ठीक पहले ......शून्य में खोयी दृष्टि ! मामा शकुनि का मुल्क कितना क्रूर हो गया है ..... 



क्रूर सैनिक कार्यवाही की दहशत अब नन्हें सपनों को ख़ौफ़ज़दा नहीं करती 




किसी देश की धरती पर विदेशी सैनिकों का होना अशुभ की घोषणा है । 


ज़ेहाद की कालिमा अगर हिफ़ाज़त में हो तो वहाँ कोई रोशनी कदम कैसे रख सकेगी !  


पढ़ायी के प्रति अफ़ग़ानी बच्चों का यह जज़्बा क़ाबिल-ए-तारीफ़ है,
हम उम्मीद की इस किरण को तहेदिल से सलाम करते हैं । 

सोमवार, 30 मार्च 2015

लड़की

लड़की - गान्धारी के मायके की 



लड़की ! 
तुम न होतीं 
तो हम भी न होते ।
किंतु तुम हो
और हम भी हैं ।

लड़की !
तुम धरती हो
तुम दुर्गा हो
तुम लक्ष्मी हो
तुम सरस्वती हो ।
तुम जीवन भर देती हो
सारे दुःख हरती हो
किंतु हम
कभी कृतज्ञ न हो सके
भरते रहे
तुम्हारे आँचल में
पीड़ा के पर्वत
और मानते रहे तुम्हें
एक वस्तु
जैसे कि कोई पका हुआ आम
या महुआ की शराब
या अपनी कमज़ोरियों को छिपाने का एक ठिकाना
या विनिमय का एक मूल्य .......
फिर भी
तुम मौन क्यों हो ?
क्यों नहीं देतीं
हमें श्राप
कि न रहें हम इस लायक
कि भोग सकें तुम्हें
                                               एक वस्तु मानकर ।


अफ़ग़ानी दर्द



         दर्द को क्या कोई नाम दिया जा सकता है ? क्या दर्द की कोई जाति और धर्म भी है ? जो समाज अपनी आधी दुनिया के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता हो क्या वह समाज कभी सुखी और शांत रह सकता है ?
        
         अपने ही पिता और भाइयों से त्राण पाती हुयी लड़की के लिये न्याय की उम्मीद का कौन सा दरवाज़ा है ? जब 12 साल की बच्ची किसी सत्तर साल के बुज़ुर्ग से ब्याहने के लिये यातनायें भोगने को विवश हो तो कौन सा समाज उसके दर्द को छू सकेगा ? जहाँ काबुलीवाला तो हो किंतु छोटे-छोट बच्चे मेवों की तो छोड़िये एक-एक रोटी के लिये तरसते हों वहाँ के विकास की यात्रा अभी कितनी लम्बी होगी इसका हिसाब लगाने की फ़ुरसत भी किसी को नहीं है । 


अपने से तीन गुने बड़े आदमी से शादी से इंकार का नतीज़ा ! नाक और कान काट लेने जैसी पुरानी बर्बर सजायें अफगानिस्तान की आज भी पहचान हैं । इन बेगुनाह बेटियों के दुश्मन कई बार इनके पिता और भाई भी होते हैं । इस किशोरी के दर्द का धर्म कोई बता सकता है ? 

पुरुष के अत्याचार की सहज शिकार लड़की । दुनिया में आख़िर कब तक चलता रहेगा यह सब ? स्त्रियों को सम्मान क्यों नहीं ? उन्हें इंसान होने का दर्ज़ा क्यों नहीं ? 


सत्रह साल की एक किशोरी द्वारा ख़ुद को आग लगाकर जान देने की असफल कोशिश । कारण है ज़बरन किये जाने वाले निकाह से बचने का एक मात्र उपाय ।  


कटी हुयी नाक और कान वाली लड़कियाँ के लिये हिज़ाब उनकी मज़बूरी है । निकाह न करने की सज़ा के बाद प्लास्टिक सर्ज़री करवाने वाली लड़कियों की कमी नहीं है अफ़गानिस्तान में ।


किंतु ज़रूरी नहीं कि हर लड़की ख़ुशकिस्मत हो, अगर वो ग़रीब है तो उसके लिये हिज़ाब के सिवाय और क्या बचता है आख़िर ! 


रिश्ता ............नाक-कान के न होने का ........हिज़ाब के होने से ।
हम केवल दुआ कर सकते हैं कि हर लड़की अपने सम्पूर्ण अंगों के साथ सुरक्षित हो ......सुखी हो ....शांत हो !




अपनी बेटी को अपने हाथों हेरोइन के नशे में झोंकती हुयी 
एक अभागिन अफ़गानी माँ ! जब स्त्री ही स्त्री की दुश्मन बन जाय तो स्त्री के दुर्भाग्य को कौन रोक सकता है ! हे ईश्वर ! ऐसी माताओं को सद्बुद्धि दे ! 









शनिवार, 28 मार्च 2015

चीन से लाये, पत्तियाँ बटोरीं और कमा लिये 240 मिलियन डॉलर



सच कहूँ तो म्लेच्छ(अति शीत के कारण मलिन रहने वाले) ही जान पाये हैं लक्ष्मी जी की असली पूजा का रहस्य । 
अब यही देखिये, अमेरिका-योरोप के लोग चीन गये ........ 


वहाँ उन्होंने एक सुनहरा वृक्ष देखा ………..


नीचे धरती पर बिछी उसकी सुनहरी पत्तियों का गद्दा देखा....



गद्दे पर पड़े कुछ सुनहरे फल देखे, फल को चखा तो गद्गद हो गये …….


स्थानीय लोगों ने बताया कि ये वृक्ष दुनिया के प्राचीनतम जीवितफ़ॉसिल्स के रूप में जाने जाते हैं । एक चीनी किसान ने हँसते हुये बताया कि भारत में पीपल और चीन में ज़िंक्गो-बाइलोबा पवित्र वृक्ष माने जाते हैं । इसीलिये बौद्धमन्दिरों एवं अन्य पवित्रस्थानों के पास ये वृक्ष अधिक पाये जाते हैं ।


चीनियों ने बातों-बातों में उन्हें यह भी बता दिया कि ये फल
शक्तिदायक हैं और इसकी पत्तियाँ स्मरणशक्तिवर्द्धक । बस, वे उसे अपने-अपने देश ले गये, सड़क के दोनो किनारों पर लगा दिया और
वसंत के आने की प्रतीक्षा करने लगे


और जब वसंत आया तो वृक्षों ने अपनी पीली-सुनहरी पत्तियाँ बिछाकर अमेरिका और योरोपवासियों का मुस्कराते हुये स्वागत किया
                                          

समय बीतता गया और अमेरिका एवं योरोप के लोगों ने ज़िंक्गो-बाइलोबा की पत्तियों का कई तरीकों से उपयोग करना सीख लिया । वे पत्तियों को बटोरते, उनका सार बनाते और लाखों डॉलर की कमाई करते । 1997 में अमेरिका का यह व्यापार 240 मिलियन डॉलर तक पहुँच गया था । इसके बाद जब टैमीफ़्लू के निर्माण में खपत होने वाले इल्लिसियम वेरम(चाइनीज़ स्टार एनिस) की माँग़ ने आम आदमी की रसोई से स्टार एनिस को ग़ायब कर दिया तो जापानियों ने इसके विकल्प के रूप में जिसे खोजा वह यही था यानी ज़िंक्गो-बाइलोबा, उनका अपना Japanese Silver apricot । स्वाइनफ़्लू की औषधि टैमीफ़्लू के मुख्य घटक Shikimic acid के नये स्रोत के आविष्कार से जापानी फ़ूले नहीं समाये । आज इसकी पत्तियों का सार जापानियों, चीनियों और म्लेच्छों के लिये बिलियन्स डॉलर्स की कमायी का स्रोत बना हुआ है ।


चीनी मूल के इस मनोहारी वृक्ष का चीनी नाम है येन झिंग Yen xing, बाद में अमेरिकन्स ने इसे कई नाम दिये, यथा - फ़ॉसिल ट्री Fossil tree/ ज़िंक्गो बाइलोबा Ginkgo biloba/ जापानी सिल्वर एप्रीकोट Japanese Silver apricot और अंत में वनस्पतिविज्ञानियों ने इसे वैश्विक नाम दिया  सैलिस्बूरिया एडियण्टीफ़ोलिया salisburia adiantifolia


सोमवार, 23 मार्च 2015

राक्षस


3D image of influenza virus 

हम राक्षसों से घिरे हुये हैं
.....................................

       और हमने उनसे निपटने की पुरातन परम्पराओं को विस्मृत कर दिया है जबकि नये उपाय अभी प्रयोग के स्तर पर हैं और वे परम्परा बन पाने की स्थिति में कभी हो भी नहीं पायेंगे ।

     भारतीय वाङ्गमय के अनुसार रूप परिवर्तन में दक्षता, छलिया स्वभाव, अन्धकारप्रियता, रक्त और मांसभोजित्व, दूसरों के धर्म को नष्ट करने की प्रवृत्ति आदि गुण राक्षसों के कहे गये हैं । राक्षसत्व एक स्वभाव है, यह स्वभाव जिस भी किसी जीव में होगा वह राक्षसीवृत्ति का ही होगा । ध्यान से विचार कीजिये तो आप पायेंगे कि ठीक यही गुण विषाणुओं (वायरस) और कुछ जीवाणुओं में भी पाये जाते हैं ।

         वायरस अपना रूपपरिवर्तन करने में असाधारणरूप से दक्ष होते हैं यहाँ तक कि ये अपनी नयी बिरादरी तक पैदा कर सकने की क्षमता रखते हैं । इस अद्भुत क्षमता को ‘म्यूटेशन’ कहा जाता है । म्यूटेशन के माध्यम से ये अपने कई स्ट्रेन पैदा कर लेते हैं जिनकी राक्षसी क्षमतायें कुछ भिन्न प्रकार की किंतु पूर्वापेक्षा और भी घातक होती हैं । एण्टीवायरल दवाइयाँ इन नये स्ट्रेंस को पहचान पाने में असमर्थ होती हैं जिसके कारण इनका वध कर पाना चिकित्सकों की सेना के लिये असम्भव हो जाता है । जिस तरह देवगणों को राक्षसों से पराजित होकर नये अस्त्र-शस्त्र पाने के लिये शिव की तपस्या करनी पड़ती थी उसी तरह चिकित्सकों को वैज्ञानिकों की शरण में जाना पड़ता है । आविष्कार की एक लम्बी तपस्या के बाद वैज्ञानिक नये अस्त्र-शस्त्र के रूप में एक नया एण्टीवायरल प्रदान करते हैं और उसके प्रयोग की सम्यक विधि बताने के साथ-साथ उसके दुरुपयोग के प्रति सावधान भी करते हैं किंतु जैसा कि सदा से होता आया है देवतागण विजय पाने के बाद मद में चूर और सुविधाभोगी हो जाते हैं जिसका लाभ उठाते हुये कुछ काल के बाद छलिया और रूप बदलने में दक्ष राक्षस पुनः आक्रमण कर देते हैं । पुराणों की यह कहानी आज भी निरंतर घटित हो रही है ।

        मनुष्य को कष्ट देने वाले कई माइक्रोब्स निशाचरों की तरह रात में सक्रिय होते हैं । रक्त और मांसप्रेमी इन वायरस लोगों के भी दो धार्मिक समूह हैं । एक समूह “लिटिक धर्म” का तो दूसरा समूह “लिसिस धर्म” का अनुयायी होता है । इनके ये धर्म इनकी जीवनशैली और संतति पैदा करने के तरीकों से पृथक-पृथक परिलक्षित होते हैं । इनमें से एक ख़ूनख़राबे का शौकीन है तो दूसरा विस्तारवाद का ।  ये अपने वारिस पैदा करने के लिये अपने-अपने धर्म के अनुरूप दो अलग-अलग तरीके अपनाते हैं । एक तरीका है अपने मेज़बान का घर तबाह करके और दूसरा है मेज़बान का धर्मपरिवर्तन करके । पहली प्रक्रिया ‘लिटिक’ धर्म  और दूसरी ‘लिसिस’ धर्म के नाम से जानी जाती है ।
       
        लिटिकधर्म के वायरस लोग अपने जीवनयापन और संतति उत्पादन के लिये मेज़बान कोशिकाओं पर आक्रमण कर अपना अधिकार कर लेते हैं और अपने सारे उद्देश्य पूर्ण कर लेने के पश्चात् जब वहाँ से प्रस्थान करते हैं तो मेज़बान कोशिका को बिस्फ़ोट से उड़ा देते हैं । अहसानफ़रामोश इन वायरस लोगों द्वारा किये जाने वाले इस घातक काण्ड के कारण ही इस प्रक्रिया को वायरोलॉज़ी की भाषा में ‘लिटिक’ प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है । इस प्रकार के वायरस सैद्धांतिकरूप से कहीं अधिक कट्टर और ख़ूनख़राबे में विश्वास करने वाले होते हैं इसलिये ये अपनी मेज़बान कोशिकाओं का भरपूर उपयोग तो करते हैं किंतु उनके डी.एन.ए. से छेड़छाड़ नहीं करते । हिंसा के शिखर तक पहुँचने वाले ये वायरस विस्तारवादी नहीं होते इसलिये प्रायः जेनेटिक धर्मपरिवर्तन में यकीन नहीं रखते । यद्यपि पाया यह भी गया है कि इनकी सैद्धांतिक कट्टरता कभी-कभी शिथिल हो जाती है और ये ‘लिसिस’ धर्म के अनुयायी हो जाते हैं । इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि राक्षसों पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता । इन पर भरोसा करना स्वयं को संकट में डालना है ।  

        दूसरे प्रकार के वायरस ख़ुद को शरीफ़ प्रदर्शित करते हैं लेकिन वास्तव में होते बहुत ग़ुस्ताख़ हैं । यूँ तो ये ख़ुद को भाईचारे के सिद्धांत में विश्वास करने वाला प्रदर्शित करते हैं और अपने मेज़बान की कोशिका के साथ बड़ी मोहब्बत का प्रदर्शन करते हुये उनके डी.एन.ए. से शादी रचा लेते हैं । ये राक्षस अपने मेज़बान की कोशिकाओं को नष्ट नहीं करने के कारण ख़ुद को भाईचारे वाला और रचनात्मक होने का दावा करते हैं,  जिसके कारण इनके दावे की घोषणा को ‘लिसिस’ के नाम से जाना जाता है । लेकिन देखा जाय तो उनका यह भाईचारे का सिद्धांत वास्तव में छल से भरा हुआ है । डी.एन.ए. से शादी रचाते समय ये छलिया वायरस लोग मेज़बान कोशिका का धर्म परिवर्तन कर देते हैं । दुष्ट वायरस लोगों द्वारा अपने मेज़बान  कोशिकाओं का इस तरह छलपूर्वक धर्मपरिवर्तन किया जाना चिकित्साविज्ञान की दृष्टि से गम्भीर पैथोलॉजिकल षड्यंत्र को जन्म देता है । इस प्रक्रिया में वायरस अपने मेज़बान की कोशिका को विस्फ़ोट से नष्ट तो नहीं करते किंतु उसकी जैविक पहचान ज़रूर समात कर देते हैं । इन मेज़बान कोशिकाओं की नयी जैविक पहचान में वायरस की पहचान शामिल होती है, ये नयी कोशिकायें वायरस लोगों की भाषा बोलने लगती हैं और इनका नया धर्म पूरी तरह राक्षसीधर्म हो जाता है ।


          सुना है कि राक्षसों की संख्या सदा ही देवों की अपेक्षा बहुत अधिक रही है । याह आज भी सच है, वायरस हमारे चारो ओर हैं । हम वायरस लोगों से घिरे हुये हैं अर्थात हम राक्षसों के बीच जीने के लिये बाध्य हैं । हमें अपने अस्तित्व को बचाने के लिये निरापद उपाय खोजने हैं जो निश्चित ही एण्टीवायरल श्रेणी में नहीं आते । एण्टीवायरल तो शिव जी का देवताओं को प्रदत्त वह अस्त्र है जो केवल एक बार ही प्रयुक्त किया जा सकता । फ़िलहाल हमारे पास केवल दो ही उपाय हैं – एक तो यह कि हम राक्षसों के आक्रमण से स्वयं को यथासम्भव बचायें, और दूसरा यह कि हम स्वयं को अधिक क्षमतावान बनायें । पहला उपाय प्रीवेण्टिव एण्ड सोशल मेडिसिन का विषय है जिसके अंतर्गत हमें पर्सनल एण्ड कम्युनिटी हायज़िन की विधियों का सम्मान करना होगा जबकि दूसरे उपाय के अंतर्गत हमें अपने शरीर के आभ्यंतर परिवेश को अधिक रोगक्षमत्व से पूर्ण बनाने के लिये अपनी जीवनशैली में वैज्ञानिक दृष्ट्या महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे । और इन सबके लिये हमें पञ्चम वेद यानी आयुर्वेद की शरण में जाना होगा ।

रविवार, 15 मार्च 2015

अमानवीय स्वास्थ्य उद्योग के पाप का परिणाम है “स्वाइन फ़्लू”



भारतीयों के मस्तिष्क में पश्चिमी जगत के बारे में स्थापित हो चुके विचार एक ऐसे स्वप्न जगत की आभासी रचना करते हैं जहाँ उच्च मानवीय आदर्श हैं, वैज्ञानिक उपलब्धियों के पब्लिक एप्लीकेशंस हैं, वैज्ञानिकविकास है, सुखी जीवन है, सुसंस्कृत और सुसभ्य समाज है । किंतु यह उतना ही सच है जितना किसी भारतीय फ़िल्म स्टूडियो का बनावटीपन और उसके बाहर फैली सड़ाँध भरी गन्दगी जिसे फ़िल्म के दर्शक कभी नहीं जान पाते ।
पश्चिमी जगत औद्योगिक विकास का दीवाना है । इस दीवानेपन ने उसे मानवीयता की सारी सीमायें तोड़ फेकने के लिये उत्साहित और प्रेरित किया है । पैसे की दीवानगी से प्रेरित पश्चिमी उद्योगपतियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी निर्मम और क्रूर उद्योग की अपसंस्कृति स्थापित करने के पाप का दुस्साहस किया है । इसका ताज़ा उदाहरण है स्वाइन फ़्लू । आप स्मरण कीजिये, लगभग सारी नयी-नयी बीमारियाँ पश्चिमी देशों से ही शेष विश्व में फैलती हैं फिर मामला एंथ्रेक्स का हो, सार्स का हो, ईबोला का हो या बर्डफ़्लू का । आप जानते हैं कि AIDS के मामले में भी कारण ‘हैती’ नहीं योरोपीय देश ही रहे हैं । कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में न्यूक्लियर बम नहीं बल्कि “क्रूर स्वास्थ्य उद्योग” ही वर्तमान सभ्यता के विनाश का कारण बने ।  
        दुर्भाग्य से स्वास्थ्य के क्षेत्र में होने वाले आविष्कारों के व्यावहारिक उपयोगों की निरापदता सिद्ध करने केलिये “थर्ड पार्टी साइंस रिसर्च” का अभी तक उतना प्रचलन नहीं हो सका है जितना होना चाहिये । यद्यपि कुछ आदर्श वैज्ञानिकों ने सैद्धांतिक क्रांति करते हुये “थर्ड पार्टी साइंस रिसर्च” का बीड़ा उठाया हुआ है किंतु अनैतिक प्रोपेगैण्डा के इस युग में उनकी रिसर्च के परिणाम आम जनता तक बहुत कम पहुँच पाते हैं ।  
जनवरी 1976 में Fort Dix NJ के एक सैनिक की ऑटोप्सी से ओरिजिनल स्वाइन फ़्लू का पहला केस उद्घाटित हुआ था तथापि उसकी मृत्यु के कारणों में स्वाइन फ़्लू की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी । इसके पश्चात् 2009 के वसंत तक स्वाइन फ़्लू का कोई भी केस सामने नहीं आया । इसके कुछ ही महीनों बाद स्वास्थ्य के बाज़ार में एक वैक्सीन ने पदार्पण किया जिसकी सुरक्षाविश्वसनीयता के लिये किसी क्लीनिकल ट्रायल की कोई आवश्यकता तक नहीं समझी गयी । इस बीच फ़िलाडेल्फ़िया के एक होटल में 34 लोगों की मृत्यु Legionnair’s disease से हो गयी जिसे NIH (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ) ने स्वाइन फ़्लू से होना प्रचारित किया । अमेरिकी मीडिया और सरकारी अधिकारियों ने स्वाइन फ़्लू का हउवा खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
सामान्यतः किसी वैक्सीन को निर्माण के पश्चात ट्रायल आदि की प्रक्रिया से गुज़रने में एक वर्ष का समय लगता है किंतु “1976 स्वाइन फ़्लू वैक्सीन” मात्र कुछ ही हफ़्तों में आविष्कृत होकर बाज़ार में आ गयी । पैसा कमाने के शॉर्टकट तरीके को अपनाते हुये यू.एस.पब्लिक हेल्थ सर्विसेज के वैज्ञानिकों द्वारा वैक्सीन बनाने के लिये स्वाइनफ़्लू के वाइल्ड स्ट्रेन में एक ऐसे स्वाइन फ़्लू वायरस के जीन्स का मिश्रण किया गया जो मैनमेड था और अपेक्षाकृत अधिक घातक था । दस सप्ताह में यह वैक्सीन अमेरिका के 50 मिलियन लोगों को लगाया गया जिसमें से 25 की मृत्यु हो गयी और 565 लोग Guillain Barre Syndrome के शिकार हो गये । सरकार की योजना शतप्रतिशत जनता के वैक्सीनेशन की थी किंतु वैक्सीन के कॉम्प्लीकेशंस से मचे हड़कम्प के कारण यूएस सरकार को अपना वैक्सीन प्रोग्राम दस सप्ताह बाद ही बन्द करना पड़ा ।
इंफ़्ल्युन्जा के लिये Orthomyxovirus समूह के इंफ़्ल्युंजा –ए नामक उपसमूह में से एक वायरस है H1N1. जिसके सात सौ से भी अधिक स्ट्रेन्स का पता लगाया जा चुका है । फ़्लू वायरस के इतने सारे स्ट्रेन्स और फिर उनमें सहज म्यूटेशन की अधिकता स्वाइन फ़्लू वैक्सीन की उपयोगिता को अवैज्ञानिक सिद्ध करने के लिये पर्याप्त हैं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्यों के साथ वैक्सीन निर्माताओं और फ़ार्मास्युटिकल्स के आर्थिक सम्बन्ध विचारणीय हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करते हैं । वैक्सीन किस तरह एक निर्मम भयादोहक उद्योग बन गया है इसे जानने के लिये टिम ओ’शी का लेख -  “गुडबाय स्वाइन फ़्लू : बुटीक पैंडेमिक” पढ़ा जा सकता है ।  
          इस पूरे क्रूर और अवैज्ञानिक खेल में WHO की विश्वसनीयता इसलिये और भी संदेह के घेरे में आती है कि आख़िर उसे मई 2010 में Pandemic की परिभाषा अचानक क्यों बदलनी पड़ी ? नयी परिभाषा के अनुसार पैण्डेमिक के लिये अब किसी बीमारी का गम्भीर और मारक होना तथा कई देशों में फैलना आवश्यक नहीं रह गया है । निश्चित ही इस परिभाषा के पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य न होकर एक क्रूर अर्थशास्त्र झाँक रहा है ।   

सोमवार, 9 मार्च 2015

न करियो होरी पे ऐसी रार

ऐसे में कैसे कहें ......कि लला फिर अइयो खेलन होरी !

होरी में फंस गयी नार .......कन्हाई तुम हौ कहाँ ? 

सात समन्दर पार तें आये खेलन होरी रे !  


 नन्दी बाबा भी ना बचे जा होरी में 
कोई चिंतित है स्वाइन फ़्ल्यू से तो कोई है कैमरे पर पड़ने वाली रंग की बौछार से 

  जा विदेशी को तौ ना भूलैगी कभऊँ जा पतलून फार होरी ! 
 रंग रंगीलो फागुन आयो ...मस्ती की होरी । वृन्दावन में खेलन आयीं लाज-लजीली छोरी ॥ 

जापानी महिला के साथ फ़ोटो खिचाने को आतुर एक स्थानीय भक्त 


       गुड़गाँव में बेटी वेणु के यहाँ से वापस आते समय मथुरा जाने का निश्चय था। अगले दिन होली थी तो सोचा क्यों न कुछ घण्टे वृन्दावन में भी बिताये जायं। वृन्दावन पहुँचते-पहुँचते साढ़े नौ बज चुके थे और होरियारों की टोलियाँ बाँके बिहारी मन्दिर की ओर अरारोट बेस में बने रंग-अबीर बरसाती हुयी प्रस्थान कर रही थीं। बिना विलम्ब किये मैं भी भीड़ का एक हिस्सा बन गया। लोगों ने बताया कि इस बार विदेशियों की संख्या कुछ अधिक ही थी। अपने कैमरों को पॉलीथिन से अच्छी तरह ढक कर सुरक्षित किए विदेशी लोग भी होली के रंग और मस्ती में पूरी तरह डूबे हुये थे । इन विदेशी पर्यटकों में इज़्रेली और ब्रिटिशर्स के अतिरिक्त इस बार जापानी भी अच्छी संख्या में थे।

     वृन्दावन में होली का यह मेरा प्रथम अवसर था। प्रारम्भ के दो घण्टे तक होली बहुत ही शालीन रही, इसके बाद हुड़दंग और अश्लीलता शुरू हो गयी जो अंत में पूरी तरह बद्तमीज़ी और गुण्डागर्दी में बदल गयी। होली मनाने अन्य प्रांतों से कई लोग सपरिवार आये थे जो रंग से सराबोर हो चुकीं अपनी स्त्रियों और लड़कियों को मनचलों के उद्दण्ड हाथों की अश्लील हरकतों से बचाने में लगे रहे। युवकगण अपनी-अपनी प्रेमिकाओं के साथ थे और अपनी बाहों के घेरे में उन्हें लेकर ऐसे चल रहे थे जैसे कि वे बीमार हो गयी हों। भीगे कपड़ों में लड़कियाँ अपने प्रेमियों से चिपकी हुयीं, अबीर से बचने के लिये आँखें बन्द कर सिर को नीचे किये धीरे-धीरे खिसकती हुयी भीड़ में आगे बढ़ रही थीं। कुछ लड़कियाँ इतने कम और झीने कपड़े पहनकर आयी थीं कि रंग में सराबोर होने के बाद उनकी बॉडी स्क्रिप्ट की फ़ोटो लेने के लिये फ़ोटोग्राफ़र्स में जहाँ होड़ लग जाती थी वहीं मनचलों को भी अंग स्पर्श का सहज सुख प्राप्त हो रहा था। वृन्दावन की इस होली की एक विशेषता यह भी थी कि कोई भी व्यक्ति न तो किसी क्रिया-प्रतिक्रिया का विरोध करता था और न उसका बुरा मानता था। यानी लड़कियाँ ख़ुश नज़र आ रही थीं, हो सकता है कि वे समानता के इस अधिकार से रोमांचित हो रही हों या फिर भाँग की ठण्डायी के सुरूर में अपनी दबी-ढकी ऐषणाओं से नये निकले पंखों से आसमान छू लेने के सुखद अनुभव में डूब जाने का आनन्द ले रही हों। किंतु इस बीच एक विदेशी युवती ने एक किशोर वय होरियारे को पाँच-छह घूँसे जमा ही दिये। किशोर निर्लज्ज हँसी हँसता हुआ कहता रहा – “अतिथि देवो भव ! अतिथि देवो भव ! अतिथि देवो भव !” मैंने किशोर को शाबाशी दी – “भारत का नाम ख़ूब ऊँचा कर रहे हो, माँ-बाप ने अच्छी शिक्षा दी है।“ किशोर, जो कि किसी अच्छे परिवार की जली खुरचन सा प्रतीत हो रहा था, बराबर हँसता हुआ “अतिथि देवो भव” की ग़ुस्ताख़ रट लगाये रहा।
       होली जब अपने समापन की ओर थी तो स्थानीय लोगों ने, जिनमें मिठायी दुकानों में काम करने वाले नौकर, मज़दूर और दुकान मालिकों के किशोर वय पुत्र सम्मिलित थे, पहले तो बरतन धोया हुआ पानी लड़कियों पर फेकते रहे फिर जब वह समाप्त हो गया तो बाल्टी भर-भर नाली का पानी फेकने लगे। सुसभ्य से प्रतीत होने वाले स्थानीय लोग आनन्द में डूबे जा रहे थे किसी बुज़ुर्ग को भी यह सब कुकृत्य रोकने की आवश्यकता का लेश भी अनुभव नहीं हुआ। हाँ ! एक युवा पर्यटक से जब नहीं रहा गया तो दुःखी हो कर उसने नाली का पानी और सड़क का कीचड़ लोगों पर डालने वाले समूह से कहा – “ये विदेशी जब अपने देश जायेंगे तो वृन्दावन की बड़ी तारीफ़ करेंगे ...अरे कुछ तो शर्म करो ...क्यों वृन्दावन का नाम डुबाने पर तुले हुये हो।“
      समूह ने प्रतिक्रिया में उस युवक के ऊपर कुछ कीचड़ और एक बाल्टी नाली का पानी फेककर अपनी ख़ुशी का इज़हार किया। युवक ने चुपचाप आगे बढ़ लेने में ही भलायी समझी।
      
       मैं एक बात समझ नहीं सका, जहाँ देशी-विदेशी पर्यटकों का किसी उत्सव में सम्मिलित होना पहले से तय होता है वहाँ स्थानीय प्रशासन की ओर से शालीनता और भद्रता बनाये रखने के लिये कोई योजना क्यों नहीं बनायी जाती? यह कैसा सुशासन है और यह कैसा राष्ट्रप्रेम है? प्रशासन ही नहीं, स्थानीय नागरिकों का भी यह उत्तरदायित्व है कि वे ऐसे उत्सवों की मर्यादा को शालीन बनाये रखने के लिये सक्रिय होकर आगे आयें, हर बात के लिये प्रशासन का मुँह ताकना समाज की पंगुता का द्योतक है।


       वृन्दावन के लोग यदि इस पोस्ट को पढ़ कर अपनी सामाजिक और नैतिक चेतना को जाग्रत कर सकें तो हमारी खिन्नता कुछ कम होगी।