शनिवार, 14 मई 2016

वर्चस्व के संघर्ष


अपना और अपने समूह का वर्चस्व बनाये रखने के लिये अन्य लोगों और उनके समूहों के विरुद्ध षड्यंत्र, कूटरचनायें एवं हिंसात्मक संघर्ष करना शक्तिशाली लोगों का आदिम स्वभाव रहा है। जब हम पीड़ित और निर्बल होते हैं तो न्याय, समानता, प्रेम, करुणा और संगठन की बात करते हैं किंतु जैसे ही हम संगठित हो कर शक्तिशाली हो जाते हैं हमारी प्रवृत्तियाँ अपने वर्चस्व के लिये छटपटाने लगती हैं। मानव के इस विचित्र स्वभाव ने भारतीय मनीषा को चिंतित किया और तब विश्वबन्धुत्व की एक परिकल्पना सामने आयी।
युद्धों और पारस्परिक संघर्षों के प्रतिषेध एवं विश्वबन्धुत्व का भाव संचारित करने के उद्देश्य से वसुधैव कुटुम्बकम भारत का आदर्श रहा है। सहचारिता एवं सह अस्तित्व का यह एक उच्चतम आदर्श है किंतु इसके शुभ परिणामों के लिये वैश्विक स्तर पर इसके पालन की अपेक्षा की जाती रही है। यदि कोई देश या देश के भीतर का कोई समुदाय इस सिद्धांत की उपेक्षा करता है तो अन्य लोगों को अपनी सुरक्षा और अस्तित्व के लिये कुछ उपाय करना ही होगा। स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अहिंसा और विश्वबन्धुत्व का अतिवादी स्वरूप अपनाते समय दूरदृष्टि से भारतीय समाज को देख पाने में असमर्थ रहे जबकि यह वो  समय था जब अतिवादी संगठनों की निरंतर चुनौतियों, धार्मिक कट्टरता और राजनैतिक महत्वाकाक्षाओं ने देश विभाजन की क्रूर त्रासदी से पूरे भारत को पहले ही चेतावनी दे दी थी। दूरदृष्टि के इस अभाव ने भारत-चीन युद्ध और युद्ध में भारत की पराजय को सुनिश्चित् कर दिया था। इतना ही नहीं, कश्मीर को लेकर जो नीतियाँ बनायी गयीं उनमें की गयीं भयानक त्रुटियों ने देश को एक अनवरत हिंसा की आग में झोंक दिया। विदेशनीति और देश में गंगा-जमुनी तहज़ीब की स्थापना के सम्बन्ध में नेहरू की अदूरदर्शिता, दूरदर्शी राजनेताओं और चिंतकों की बात न मानने के हठ और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने के पूर्वाग्रह ने भारत को आज जिस सामाजिक संघर्ष, असमानता, नैतिक पतन और गृहयुद्ध जैसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है उसका दूर-दूर तक कहीं कोई समाधान दिखायी नहीं देता।    

आज भारत के भीतर और भारत के बाहर भी सनातनधर्मियों के अस्तित्व के विरुद्ध जिस तरह लोग संगठित हो षड्यंत्रों और कूटनीतियों की रचना कर रहे हैं वह चिंताजनक है। हमें अपनी रक्षा के लिये, अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिये संगठित होना होगा। इस संगठन का उद्देश्य अपने अस्तित्व की रक्षा के साथ-साथ वर्चस्व संघर्ष का निषेध करना भी है अन्यथा आर्यों की संस्कृति को समाप्त होने से कोई नहीं रोक सकेगा। सनातनधर्मियों से हम जिस संगठन की अपेक्षा करते हैं वह युद्ध के लिये नहीं बल्कि सांस्कृतिक एकता, वैचारिक दृढ़ता, राष्ट्रप्रेम और आचरण में आयी शिथिलताओं के परिमार्जन के लिये है। अन्य संगठनों की परम्पराओं के विपरीत यह संगठन किसी का विरोध नहीं करेगा, किसी को क्षति नहीं पहुँचायेगा, कोई हिंसा नहीं करेगा ...प्रत्युत अपने को इतना सबल और समर्थ बनायेगा कि अन्य लोग उसके अस्तित्व के लिये संकट बनने का विचार भी मन में न ला सकें। आइये, हम नये भारत का ...सबल और समर्थ भारत का निर्माण करें।       

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

ज़िद्दी क़ानून

भारत में तैयार हैं
किशोरवयस्क 
जो अपने समय से
बहुत पहले कर लेना चाहते हैं
वह सब कुछ
जो वे वयस्क होने पर कर सकेंगे ।
बड़े उल्हइते हैं ये किशोरवयस्क
जिनकी भावनाओं का सम्मान नहीं करता कोई,
न सरकार ... न कानून !
उफ़्फ़ ! कितनी नाइंसाफ़ी है ... कितनी बन्दिशें हैं !

उन्हें ज़ल्दी है, बलात्कार करने की
उन्हें ज़ल्दी है, हत्या करने की 
उन्हें ज़ल्दी है, ताक़तवर बनने की ....
आख़िर यह ज़िद्दी कानून
क्यों नहीं मानना चाहता उन्हें वयस्क
जबकि कर सकते हैं वे भी
वयस्कों वाले ही सारे कुकर्म ...
बड़ी ही कुशलतापूर्वक
बिना किसी त्रुटि के ..
ठीक वयस्कों की तरह
वयस्क हुये बिना ही !  
तब
वयस्क होना ही इतना अनिवार्य क्यों है ? 
आख़िर 
उनकी क्षमताओं का
कोई क्यों नहीं करता
सही-सही मूल्यांकन ? 
यह कैसी विचित्र ज़िद है
नयी पीढ़ी के अवमूल्यांकन की ! 
निश्चित् ही
यह एक साज़िश है
किशोरों के मौलिक अधिकारों के हनन की ।
वे दक्ष हैं ...अपने कृत्य के प्रति समर्पित हैं ..
और तुम्हारी ज़िद है
कि वे अभी किशोर हैं ...
नहीं हैं लायक ...यह सब कर सकने के लिये ।
किशोरवयस्क हैरान हैं ... परेशान हैं 
आख़िर
क्रूर बलात्कार और    
जघन्य हत्या करने की  
उनकी दक्षता के प्रति
इतना सशंकित क्यों है
         भारत का कानून ?   



रविवार, 17 अप्रैल 2016

निरापद शासन प्रणाली के समाज-मनोवैज्ञानिक तत्व


अभी तक मनुष्य समाज ने कई प्रकार की शासन प्रणालियाँ देखी हैं । सबके अपने-अपने स्वर्णिम और पराभव काल रहे हैं किंतु आज तक कोई भी प्रणाली कितनी भी अच्छी या बुरी होने के पश्चात् भी स्थायी नहीं रह सकी । सत्ताधीशों और उसके प्रशासनिक सहयोगियों की मानसिकता सदैव एक सी नहीं रह पाती । कालांतर में उनके चरित्र और विचारों में आयी शिथिलता से वे नैतिक पतन, लोभ, अकर्मण्यता आदि दुर्गुणों के शिकार होने लगते हैं । मनुष्य चरित्र की यह एक स्वाभाविक स्थिति है ।

प्राचीन काल में इस शिथिलता को रोकने के लिये राजनीति पर धर्म का अंकुश आवश्यक माना जाता था । यह एक प्रभावकारी उपाय था किंतु पश्चिम में एक समय ऐसा भी आया जब धर्म स्वयं अधर्म के प्रतीक बनने लगे । धर्म जब भी अपने प्रतीकों में जीने लगता है तो वह पाखण्ड बन जाता है । पश्चिम में यही हुआ, तब तत्कालीन सामाजिक क्रांतियों ने राजनीति पर धर्म के नैतिक अंकुश को समाप्त कर दिया । इसके साथ ही राजनीति से नैतिकता ही समाप्त होने लगी । सत्तायें निरंकुश और अवसरवादी होने लगीं । एन-केन-प्रकारेण धन-संग्रह करना ही सत्ताधीशों का लक्ष्य बनता गया । भारतीय राजतांत्रिक व्यवस्थायें और संघीय लोकतांत्रिक राजतंत्र भी इससे अछूते नहीं रह सके और ये व्यवस्थायें भी नैतिक पतन का शिकार होती रहीं । फिर एक ऐसा समय भी आया जब भारतीय उपमहादीप को अपनी सांस्कृतिक समृद्धता के पश्चात् भी पराधीन होना पड़ा । सत्ताधीशों और उनकी प्रजा के मध्य असंतुलन, अविश्वास और धार्मिक पाखण्ड की बहुलता की स्थिति ही वे प्रमुख कारण घटक थे जिनके कारण भारत को एक दीर्घ काल तक विदेशियों के अधीन रहना पड़ा ।

पश्चिमी पराधीनता के समय में भारत की शासन प्रणाली पश्चिमी राजनैतिक विचारों से अनुप्राणित होती रही । पश्चिम में राजनीति ने स्वयं को धर्म से स्वतंत्र कर लिया और वह चारित्रिक एवं नैतिक दृष्टि से निरंकुश होती चली गयी । इस बीच आधुनिक औद्योगीकरण और सत्ता पर पूँजी के नियंत्रण ने राजनीति को प्रभावित किया । राजनीति एक नये कलेवर में प्रकट हुयी जिसे पश्चिमी लोकतंत्र के रूप में जाना गया । किंतु औद्योगीकरणजन्य श्रमशोषण की एक नवीन स्थिति ने एक और क्रांति का सूत्रपात किया । मार्क्स, लेनिन और स्टालिन इसके सूत्रधार हुये । किंतु सैद्धांतिक अतिवाद का शिकार होने के कारण इनकी सुझायी साम्यवादी व्यवस्था भी शोषणमुक्त समाज की स्थापना कर पाने में अंततः विफल ही सिद्ध हुयी ।

यहाँ एक स्वाभाविक जिज्ञासा यह उत्पन्न होती है कि निरापद शासन प्रणाली के समाज-मनोवैज्ञानिक तत्व क्या होने चाहिये जो उस व्यवस्था को स्थायित्व दे सकें । वास्तव में कोई भी समाज-व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकती । उसकी दीर्घजीविता इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज के चिंतन की दिशा और दशा कैसी है ? उस समाज ने धर्म को किस रूप में समझा और उसका अनुशीलन किया है ? धर्म के तत्वों की सामाजिक व्यावहारिक उपादेयता क्या और कितनी हो सकी है ? कोई भी शासन व्यवस्था सैद्धांतिक दृष्टि से कितनी भी अच्छी क्यों न हो व्यावहारिक धरातल पर जब तक उसके संचालकों, व्यवस्थापकों और जनता में उन सिद्धांतों के प्रति निष्ठा और व्यक्तिगत नैतिकता का अभाव बना रहेगा वह व्यवस्था लोककल्याणकारी नहीं हो सकती । कोई भी व्यवस्था जो लोककल्याणकारी नहीं है वह अधिक समय तक टिक नहीं सकती, एक दिन उसे मरना ही होगा । 

परहितदमन, धन संग्रह की लालसा, ईर्ष्या, कर्मविमुखता, अधिकार भावना आदि ऐसे वैकारिक तत्व हैं जो मनुष्य को अपनी दासता में जकड़ने के लिये सदा प्रयत्नशील रहते हैं । सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग के अंत का कारण मनुष्य के भीतर छिपे यही वैकारिक तत्व रहे हैं । उन-उन युगों की समाज और शासन व्यवस्थायें भी इन्हीं विकारों के कारण समाप्त हो गयीं ।

 वास्तव में देखा जाय तो साम्यवाद एक तीव्र सामाजिक प्रतिक्रिया का परिणाम है जो शोषण और असमान सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के गहरे कूपों से उबलकर उफनते हुये चीन, रूस, पोलैण्ड आदि देशों में सामने आया । लाओ त्से, टालस्टाय, फ़्रेडरिक एंगेल्स और कार्ल मार्क्स ने अपने-अपने तरीकों से सामाजिक असमानता और शोषण को समझने और उनके निराकरण के चिंतन का प्रयास किया । माओ-त्से और ब्लादीमीर लेनिन ने साम्यवाद की अवधारणा को अपने-अपने तरीकों से स्थापित और संचालित करने का प्रयास किया । निश्चित् ही कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति सामाजिक असमानता और शोषण का समर्थन नहीं कर सकता । अतः साम्यवाद एक न्यायिक व्यवस्था की आदर्श कल्पना है । फिर टकराव कहाँ है ?

पूँजीवादी व्यवस्था साम्राज्यवाद का ही एक आधुनिक स्वरूप है । इसे हम औद्योगिक साम्राज्यवाद भी कह सकते हैं । यह व्यवस्था श्रम और लाभ के असंतुलित वितरण पर आधारित है और समाज में वर्गभेद की शातिर समर्थक है । आज पूरे विश्व में जितने भी शासन तंत्र अस्तित्व में हैं उनमें से कोई भी वर्गहीन एवं शोषणमुक्त समाज का दावा नहीं कर सकता । साम्यवादी प्रयोग भी स्थायी राहत नहीं दे सके । हिंसा से समानता लाने का प्रयोग असफल हो चुका है । समाज में आज भी विषमता और शोषण की छटपटाहट है किंतु सिद्धांतों के अतिवाद ने मनुष्य को और भी उलझाकर रख दिया है ।

हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत में इस समस्या का हल खोजना होगा । मैं सबको सावधान कर देना चाहता हूँ ... साम्यवाद ने सर्वाधिक क्षति अपने-अपने देशों की मूल संस्कृतियों की की है । चीन में माओत्से तुंग ने साम्यवाद लाने के लिये संस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया था जिसमें चीनी संस्कृति को हर तरह से विनष्ट करने का प्रयास किया गया ।

आख़िर क्यों साम्यवाद का चुम्बकीय आकर्षण इतनी ज़ल्दी क्षीण होने लगता है ? साम्यवादी तंत्र धरातल पर आते ही उसी राह पर क्यों चल पड़ता है जिसका वह सदा विरोध करता रहा है और जिसके लिये उसने न जाने कितना रक्तपात किया है ? यह हमारे लिये चिंतन का विषय होना चाहिये ।

रक्तपात से पायी गयी सत्ता अपने संचालकों को निरंकुश बना देती है । यह निरंकुशता सत्ता की नीतियों के विरोध, विमर्श और विकल्पों के प्रति असहिष्णु होती है जो साम्यवादीतंत्र को अंततः अधिनायकतंत्र की ओर ढकेल देती है । अब साम्यवादी देशों की जनता की मानसिकता का भी तनिक विश्लेषण कर लिया जाय । साम्यवाद व्यक्तिगत सम्पत्ति की एक सीमा निर्धारित करता है, उस सीमा के बाद सारी सम्पत्ति राष्ट्र की होती है जिसकी रक्षा और अभिवृद्धि का दायित्व जनता और सरकार दोनो का होता है । दायित्व को निष्ठा की अपेक्षा होती है जो मानवीय स्वभाव के कारण क्रमशः क्षीणता की ओर अग्रसर होती जाती है । आम आदमी धीरे-धीरे उस सम्पत्ति की उपेक्षा करने लगता है जो उसकी व्यक्तिगत नहीं है बल्कि सरकार की है । यह वैकारिक मानसिकता राष्ट्रीयभावना को दुर्बल और राष्ट्रीयदायित्वों को शिथिल करती है । बस यही कारण है कि साम्यवादी तंत्र ढहना प्रारम्भ हो जाता है । सामूहिक दायित्वों के निर्वहन के लिये साम्यवादी सरकारें कठोर कानून बनाती हैं जिससे आमजनता दबाव में आ जाती है और एक समय के पश्चात् यह दबाव जनविद्रोह के रूप में फूट पड़ता है । साम्यवादी तंत्र स्वयं भी भ्रष्टाचार की ग़िरफ़्त से स्वयं को बचा नहीं पाता, और वह मानव सुलभ विकृतियों का शिकार हो जाता है । रूस, चीन, पोलैंड आदि इसके उदाहरण हैं जबकि भारत में पश्चिम बंगाल और केरल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । साम्यवाद की सबसे बड़ी शक्ति और दुर्बलता उसकी असहिष्णुता है । और कोई भी समाज अधिक समय तक किसी असहिष्णुता को झेल नहीं पाता ।

यह तय है कि आत्मशासित समाज की कल्पना एक ऐसा आदर्श है जो व्यावहारिक धरातल पर बिल्कुल भी सम्भव नहीं है । साम्यवाद जिस वैश्विकसमाज, वैश्विकभाषा, वैश्विकसंस्कृति और वैश्विकराष्ट्र की कल्पना करता है वह भी एक अव्यावहारिक आदर्श कल्पना है ।


यहाँ हमें “साम्यवादी वैश्विकसमाज” और भारतीय “वसुधैव कुटुम्बकम्” के अंतर को भी समझना होगा । साम्यवाद का वैश्विकसमाज विस्तारवाद का शिकार है जबकि भारत में वसुधैव कुटुम्बकम् की ऐषणा पारस्परिक सहिष्णुता की आदर्श कल्पना है जो विश्व को विनाशकारी युद्धों से बचाने की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।

धर्म का आदिम स्वरूप और साम्यवाद –

       
मनुष्य समाज सदैव ही एक सामान्य नियमानुशीलन की अपेक्षा करता रहा है । इसे सामाजिक जीवनशैली कहना अधिक उपयुक्त होगा । वास्तव में इस तरह की सामाजिक जीवनशैली का परिष्कृत स्वरूप ही धर्म है । सम्पत्ति, सम्पत्तिअर्जन का माध्यम, स्त्री और मनुष्योपयोगी प्राकृतिक संसाधनों को व्यवस्थित करने की सर्वमान्य आवश्यकता ने धर्मों को जन्म दिया । पहले यह कबीलायी परम्परा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण भाग हुआ करता था । इसे और भी सशक्त बनाने के लिये लौकिक आस्थाओं का सहारा लिया गया । और धरती पर मनुष्य के समाजधर्म का अस्तित्व सामने आया ।
पश्चिमी देशों में सम्पत्ति, स्त्री और संसाधनों के बारे में कभी सर्वमान्य और सार्वभौमिक व्यवस्था नहीं बन सकी । इसके कारण पश्चिम में कई धार्मिक और क्रांतिकारी युद्ध हुये और कुछ नये धर्म अस्तित्व में आये । पश्चिम में दासों और स्त्रियों को समान अधिकार नहीं थे और उन्हें प्रायः उपभोग सामग्री के रूप में देखा जाता था । कालांतर में हुये समाजसुधार आन्दोलनों से दासप्रथा का अंत हुआ और स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये गये । आज दासप्रथा नहीं हैं उसका स्थान बंधुआ श्रमिकों ने ले लिया है । श्रमशोषण के नये-नये तरीके अस्तित्व में आ गये हैं और स्त्रियाँ का सम्मान आज भी छींके पर टंगी मक्खन की हांडी बना हुआ है । इन अव्यवस्थाओं ने साम्यवाद की अवधारणा को जन्म दिया और श्रमिकों एवं स्त्रियों के अधिकारों के लिये नये सिरे से चिंतन किया जाना लगा । कुछ क्रांतियों के बाद यह चिंतन रंग लाया, कुछ देशों में साम्यवादी व्यवस्था अस्तित्व में आयी किंतु कई देशों में यह व्यवस्था ज़ल्दी ही धराशायी भी हो गयी । कभी धर्म को अफीम मानने वाला साम्यवाद आज भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को स्वच्छन्दता और निरंकुशता का पर्याय मानने लगा है और वैश्विक समाज, वैश्विक संस्कृति एवं वैश्विक शासन के सपनों में आत्ममुग्ध रहने लगा है । धर्म को पाखण्ड और अनावश्यक मानने के कारण साम्यवादी कामरेड स्त्रियों ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की नये सिरे से व्याख्या करनी शुरू की और लैंगिक मर्यादाओं को तोड़ते हुये काम सम्बन्धी गुह्यक्षणों के सार्वजनिक प्रदर्शनों में अपनी आस्था को दृढ़ किया । स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की नयी परिभाषा ने भारतीय समाज में कामोच्छ्रंखलता को जन्म दिया । भारत में उग्रसाम्यवाद का यह सांस्कृतिक आक्रमण है जो हर प्रकार की  वर्जनाओं को तोड़ने में विश्वास रखता है ।
जे.एन.यू. की ज्ञानपरम्परा में अध्यापक और छात्र स्थापित सत्य का विरोध करना शिक्षणशैली का अत्यावश्यक अंग मानने लगे हैं । वे ज्ञातसत्य का खण्डन कर अज्ञात सत्य को पाने के लिये अपनी विशिष्ट शिक्षणशैली को आवश्यक मानते हैं । बौद्धिकता का यह उग्र और विद्रोही स्वरूप है जो वर्जनाओं को तोड़ने में विश्वास रखता है और अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये छल, अपमानजनक कटाक्षों, मिथ्या दुष्प्रचारों और क्रूरहिंसा का सहारा लेने में लेश भी संकोच नहीं करता । यह वह वर्ग है जो अपनी फटी झोली का प्रदर्शन कर पूरे विश्व की सहानुभूति अर्जित करता है ताकि अपनी झोली में सोने के पैबन्द लगा सके । अभी तक जो देखा गया है उसके अनुसार इस वर्ग का भी अंतिम लक्ष्य सत्ता और ऐश्वर्योपभोग ही रहा है । भारतीय साम्यवादी नेताओं की जीवनशैली इसका साक्षात प्रमाण है ।

भारतीय उपमहाद्वीप में राजनैतिक संक्रांतिकाल चल रहा है । पूँजीवादी शक्तियों और साम्यवादी पूँजीवाद के मध्य अप्रिय टकराव की स्थितियाँ निर्मित हो रही हैं । जनता को तटस्थ रहने के स्थान पर अपनी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित् करने की आवश्यकता है ताकि एक अपेक्षाकृत निरापद शासनप्रणाली को अस्तित्व में लाया जा सके ।  

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

आज की दो महान कवितायें


कविता नम्बर 1

भूले-बिसरे भीम चढ़े हैं सबकी बोली में
आजा बाबा भीम आज मेरी ही झोली में ॥
सीरत में क्या धरा जो बाबा है तेरी सूरत में
गणित सभी को दिखता बाबा तेरी मूरत में ॥
आदर्शों की छोड़ो बातें, है सबकुछ तेरे नाम में
काम-काज सब छोड़ मैं आया बाबा तेरे धाम में ॥
मैं हूँ सच्चा वारिस जाना मत उनकी टोली में
आजा बाबा भीम आज मेरी ही झोली में ॥

कविता नम्बर 2

राधे-राधे छोड़ दे प्यारे अल्ला-अल्ला बोल
चपटी है जब अक्ल मेरी तो धरती कैसे गोल ॥
गोल नहीं है चपटी धरती अल्ला ने बोला है
इतने वर्षॉं बाद राज अल्ला ने खोला है ॥
जो बात नहीं मानेगा उसको गोली मारूँगा
जितने भी हैं काफ़िर सबको दोजख़ भेजूँगा ॥
पश्चिम की तालीम बुरी, हैं अल्ला के ये बोल
असलाह ग़ज़ब बस उनके, कर दूँ धरती डाँवाडोल  
मैं अल्ला का अल्ला मेरा बाकी है सब झोल ॥
चपटी है जब अक्ल मेरी तो धरती कैसे गोल ॥


मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

लोग
लोग
ख़ुश होते हैं
स्वर्ग की कल्पना करके
फिर भी
नहीं होना चाहते स्वर्गवासी
तब
धरती को क्यों बनायें स्वर्ग ?
नर्क
इतना बुरा भी तो नहीं लगता न !
आख़िर
सदियों से यहीं तो रहते आये हैं लोग ।

भीड़
भीड़ आग लगाती है
भीड़ हत्या करती है
भीड़ बलात्कार करती है
भीड़ धरती को नर्क बनाती है
वास्तव में
भीड़ में मनुष्य नहीं रहे अब
इसीलिये
धरती पर स्वर्ग नहीं है कहीं ।
यह भीड़ दुर्बल है
दुर्बल असंगठित है
असंगठित अभिषप्त है
अभिषप्त अपने शोषण का अभ्यस्त है ।
शोषण एक खेल है
खेल एक परम्परा है
परम्परा से राजा बनते हैं
परम्परा से प्रजा बनती है
राजा और प्रजा देश बनाते हैं
देश में भीड़ होती है
भीड़ दुःखी और पीड़ित होती है
दुःखी और पीड़ित लोग भगवानों की रचना करते हैं
भगवान अपने भक्तों के दास होते हैं
भगवान अपने भक्तों को जीने की प्रेरणा देते हैं
किंतु
धरती को स्वर्ग बनाने के लिये
भगवान की नहीं
मनुष्यों की आवश्यकता होती है ।
मनुष्य नहीं रहे अब
इसलिये धरती पर स्वर्ग नहीं है ।

जानवर
जानवर
पढ़ायी नहीं करते
नौकरी नहीं करते
खेती नहीं करते
उद्योग-धन्धे नहीं करते
अधिकारी नहीं बनते
चुनाव नहीं लड़ते
फिर भी
कितने ख़ुश रहते हैं ! 

और हम
पढ़ायी करते हैं  
नौकरी करते हैं   
खेती करते हैं
उद्योग-धन्धे करते हैं
अधिकारी बनते हैं
चुनाव लड़ते हैं
फिर भी
कितने दुःखी रहते हैं !

हम
मनुष्य नहीं बन पाये, 
चलो
जानवर ही बन जाएं ।
बनते ही जानवर
ख़ुश हो जायेंगे
जंगल के सारे जानवर
और फिर
कभी नहीं होंगे
परमाणु युद्ध
यह
मेरा आश्वासन नहीं
बल्कि दावा है ।

मरीन ड्राइव
हवाओं ने पूछा ...
दिशाओं ने पूछा ...
कीट-पतंगों ने पूछा ...
पशु-पक्षियों ने पूछा ...
मनुष्यों के बच्चे पढ़ायी क्यों करते हैं ?
पढ़ायी करते हैं तो फिर लड़ायी क्यों करते हैं ?
लड़ायी करते हैं तो फिर हार-जीत क्यों नहीं होती ?
हार-जीत नहीं होती तो फिर इतना गर्व क्यों करते हैं ?
प्रश्न सुनकर
भगवान भौंचक रह गये
उनका मुंह
खुला का खुला रह गया 
वे आज तक चुप हैं
और खोज रहे हैं
इन प्रश्नों के उत्तर ।
उधर
मनुष्य ने
समन्दर में फेक दी है
बाँधकर पत्थर
उत्तरों की पोटली
और करता रहता है निगरानी । 
भगवान इस धोखे में हैं
कि लोग तो बस
घूमने आते हैं
मरीन ड्राइव पर ।