गुरुवार, 20 मार्च 2014

सरहदें



सारी हदें तोड़ कर खीचीं, मिलकर सबने ख़ूब सरहदें
हर सरहद को तोड़-तोड़ कर, फिर-फिर खीचीं नई सरहदें ॥
मिली तसल्ली न बाँटकर भी, लगे खीचने और सरहदें
जाति-धर्म, शहर-ओ-सूबे, दिल-दिमाग में नई सरहदें ॥ 
अभी छिपी हैं आड़ी-तिरछी, न जाने कितनी और सरहदें
अपने ही बनते गये लुटेरे, खीच रहे नित नई सरहदें ॥ 
पाक गया बंगाल गया, कश्मीर में मिट ना सकीं सरहदें
सरहद पर भी खिचती रहतीं, रोज़-रोज़ कुछ नई सरहदें ॥ 
छोटे दिल वालों का मक़सद रहो खीचते सदा सरहदें
प्यार में सरहद, काम में सरहद, घर-घर खीचो नई सरहदें ॥ 

बुधवार, 19 मार्च 2014

काहे रिसइलू


व्यस्तता ..व्यस्तता ...और व्यस्तता ..... इस बीच कौशलेन्द्र जैसे कहीं खो गया । चिट्ठों से दूर ...गोया वनवास का दण्ड मिला हो । इस बीच बहुत याद आती रही चिट्ठाजगत के स्वजनों की । चाह कर भी तनिक सा समय चुरा सकने में सफल नहीं हो सका । ...और एक तड़प  सी बढ़ती गयी । आज इस वक़्त जबकि रात का एक बज चुका है ...मैं चुपके से उठकर चला आया हूँ ...यहाँ अपने स्वजनों ...आत्मीयजनों से एक पक्षीय संवाद करने .....। 
अब प्रयास रहेगा कि इतना लम्बा अंतराल न हो । आप सबसे बहुत सारी बातें कहनी हैं ...आप सबकी बहुत सारी बातें सुननी हैं .....। 
फ़िलहाल ...
फागुनी बयार के साथ एक फागुनी गीत आप सबके लिए ...

काहे रिसइलू
झूठ-मूठ गोरिया,
लागल झुमे तोहरे
अंगना मं फगुवा ।
भगिह न दुरिया तू
आज मोर गोरिया,
रंग जइह जीभर
हमरे ही रंगवा ॥

तोहरे ही मन के
रन्ग लइ केअइलीं,
झांसा गोरी
अब न दिहा ।    
लाज से लाल,
परीत से पीयर,
रन्ग-रन्ग के
लेअइलीं रंगवा ॥  

धरि माथे मउरा
झुमे लागल अमवा,
कत्थक
करे ला फगुवा ।
टप-टप-टप-टप
रस बरसे लागल,
धरती के
अँचरा मं महुआ ॥

अल्हड़ सरसों
ओढ़ चुनरिया
लचकी जाय कमरिया,
अगिया बारे पूरवा ।  
धरती के छेड़े लागल
टेसू दहिजार,
पंखुरी पे
लिखि-लिखि पतिया ॥  

शनिवार, 2 नवंबर 2013

बल्बावली


है निशा यह सजी, बल्ब भी हैं जले

पर बिना नेह-बाती दिशा ना मिले ।

 

है दिशा को छला आज फिर बल्ब ने लो

हुयीं धूमिल दिशायें, काँपती दीप की लौ ।

कुछ इस तरह बल्ब उनके जले

कि हो गयीं आज ओझल सारी दिशायें ।

रक्त का एक दीपक रखा द्वार पर

और इधर ही चलीं आज सारी हवायें ।

रौशनी की तरफ़ जो उठायीं निगाहें

लगीं बदली-बदली सी सारी फ़िज़ायें ।

अमावस की ही निशा क्यों सजे

चाँदनी रूपसी क्यों सिसकती रहे ।

भटकती दिशायें, सूर्य खण्डित हुये

पग बढ़ाती अमावस बिहंसते हुये ।

रात काली सदा मान पाती रही

और पूनम को होली जलती रही ।

नेह-बाती बिना बल्ब इतने जले

ढक गयी है धरा बल्बों के तले ।

 

नेह किसने चुराया, कहाँ बाती छिपायी

कहाँ गंध सोंधी दियों की हिरायी ।

मेंहदी लगे हाथ से कोई परस दे

आके रूठे दिये को कोई तो मनाये ।

दे ओट आँचल की ममता उड़ेले

जब कोई रूठा दिया टिमटिमाये ।

मुझे माटी का ही दिया चाहिये

नेह-ममता भरा ही हिया चाहिये ।

दीप हो एक ही पर वो ऐसा जले

काँप जाये अँधेरा सदा को टले ।    

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

चुनाव का मौसम

लो चुनाव का मौसम आया नई-नई सौगातें लाया ।
हर वोटर का है अरमान रोटी, कपड़ा और मकान ।
द्वार पे देखो नेता आया भ्रष्टाचार का झोला लाया ।
बचे-खुचे आश्वासन ले लो वोट मगर बदले में दे दो ।
साइकल दे दी पुस्तक दे दी इसकी कौड़ी उसको दे दी ।
मूर्खतंत्र के भाग्य विधाता तेरी जेब से है क्या जाता ।
और बढ़ाकर बोली बोलो चावल भी फ़ोकेट में दे दो ।
इतना ही मन है देने का तो एक महल बनवा दोगे क्या ?
अपनी किस्मत जैसी ...
चोखी किस्मत भी लाकर दोगे क्या ?
नेता जी तुम क्या-क्या दोगे फोकेट में क्या जग दे दोगे ?
प्रतिभाओं का गला घोटकर आरक्षण ही बाँटा अब तक ।
संख्याओं से खेल खेलकर बाँट दिया है सारा जनमत ।
पाँच सितारा में तुम खाते नमक-भात हमको खिलवाते ।
इन्हें पढ़ाते शिक्षाकर्मी उनके बच्चे लंदन जाते ।
चाल तुम्हारी समझ गये हम बात तुम्हारी ताड़ गये हम ।
कुछ टुकड़े फोकट में देकर राजमहल तुम लूट रहे हो ।
डाल रहे हमको ये आदत फोकट खायें फोकट सोचें ।
नमक-भात से नेक भी आगे जीवन में बढ़ने ना पायें ।
फोकट के कुछ टुकड़े देकर देश अपाहिज क्यों करते हो ?
हमें बनाकर लंगड़ा-लूला अपनी जेबें क्यों भरते हो ?
ख़ैरात बाँटने की आदत से भीख माँगना मत सिखलाओ ।
कुत्तों जैसी पूँछ हिलाना इंसानों को मत सिखलाओ ।
रिश्वतखोरी बन्द करो और लूटे अवसर वापस कर दो ।
लूट-लूट कर हुये गुलाबी गालों की कुछ रंगत दे दो ।
रोज-रोज ये ख़ून ख़राबा रोक सको तो इसको रोको ।
दल में इतनी टूट-फूट है दल-दल का ये दंगल रोको

रविवार, 25 अगस्त 2013

यौन दुष्कर्म के लिये कुख्यात होता भारत

विधि से नहीं डरते बलात्कारी
 
...और अब मुम्बई में फ़ोटो ज़र्नलिस्ट के साथ क्रूरतापूर्वक सामूहिक यौन दुष्कर्म ।
क्रूर यौनदुष्कर्मी चाँदबाबू सत्तार शेख़ उर्फ़ मोहम्मद अब्दुल की दादी अपने पोते को बचाने उसके नाबालिग और मासूम होने का सर्टीफ़िकेट लेकर सामने आ गयी हैं। बलात्कार से पहले अपने पोते को उसकी उम्र और मासूमियत का हवाला देते हुये दादी ने यदि कभी कोई संस्कार दिये होते तो आज एक पापी की मासूमियत सिद्ध करने के लिये दादी को तकलीफ़ नहीं उठानी पड़ती।
यदि दादी की जगह मैं होता और मोहम्मद अब्दुल की जगह मेरा लड़का, तो मैं माँग करता कि इस किशोर को दुनिया की सबसे कड़ी सजा दी जाय और वह भी मेरी आँखों के सामने, वही सजा मुझे भी दी जाय अपनी औलाद को सही संस्कार न देने के अपराध के लिये।   
 
समानांतर सेना ...
 
आन्ध्र के भद्राचलम की सीमा से लगे दक्षिण बस्तर के नवनिर्मित बीजापुर जिले के गंगालूर दलम की एरिया कमाण्डर सौम्या मिनचा ने अपनी गिरफ़्तारी के बाद जानकारी दी है कि माओवादी अब गाँव की तेज़-तर्रार लड़कियों को माओवादी दलम में शामिल कर उन्हें उग्रवादी बना रहे हैं। मिनचा जैसी छह और महिला एरिया कमाण्डर ग्रामीण लड़कियों को जंगल में पहुँचा रही हैं। माओवादी बड़े पैमाने पर नारीशक्ति का दुरुपयोग करने के लिये एक महिला बटालियन तैयार कर रहे हैं। माओवादी घटनाओं में महिलाओं की सहभागिता अब एक सामान्य बात हो गयी है। शायद इसीलिये इस इलाके के लगभग 28 रेलवे स्टेशंस माओवादियों के निशाने पर हैं और सरकार उनके विस्फ़ोट से उड़ाये जाने की प्रतीक्षा में है। कल के दैनिक भास्कर के हवाले से पता चला है कि बिलासपुर डिवीजन के टेंगनमाड़ा, खोड़री, खोंगसरा, बोरीडांडा, उदलकछार, दर्रीटोला, नगर, जामगा एवं दगोरा ; रायपुर डिवीजन के बालोद, कुसुमकसा, दल्ली राजहरा ; तथा नागपुर डिवीजन के गोंदिया, दारेकसा, सालेकसा, बोरतलाब, पनियाजाब, डॉंगरगढ़, राजनान्दगाँव, बालाघाट, सामनापुर, चारेगाँव, लमता, देवालगाँव, अर्जुनी, वाडसा, नागभीर, एवं चांदाफ़ोर्ट रेलवे स्टेशन माओवादियों की सूची में हैं।

इस बीच माओवादियों के लिये ख़ुराक की तरह एक और ख़बर छपी है कि पिछले साल नवम्बर में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 13 करोड़ की लागत से जिस सड़क का उद्घाटन किया था वह गुरुवार की रात शिवनाथ नदी के प्रवाह में सिसक-सिसक कर रोती हुयी बह गयी । शिवनाथ नदी पर बने पुल और धराशायी हुयी सड़क के बीच 25 फ़ीट का फ़ासला हमारी नैतिक प्रगति को चिढ़ाने से बाज़ नहीं आ रहा है। नैतिक प्रगति का एक और शानदार नमूना धनवाद के आयकर विभाग के कचरेखाने में भी दिखायी पड़ा। सबूत है लालू-राबड़ी की फ़ाइलें जो आयकर विभाग के कबड़ख़ाने से बरामद हुयीं।       

चलते-चलते एक ख़बर और ...

दादागीरी से अब पुरुषों का वर्चस्व समाप्त। संविदा में कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने उसके स्थान पर पदस्थ नियमित महिला कर्मचारी को धमकी दी है कि यदि उसने ज्वाइन करने की हिमाकत की तो उसका पति उसे गोली से उड़ा देगा। 

हमें उत्तर भी चाहिये और समाधान भी ....


यदि किसी अल्पायु बालक को उसकी बौद्धिक प्रखरता के कारण विश्वविद्यालय में किसी वयस्क की तरह प्रवेश दिया जाना न्यायसंगत है तब किसी किशोर को उसकी पाशविक क्रूरता के लिये वयस्क की तरह दण्ड देना न्यायसंगत क्यों नहीं है?
कोई किशोर यदि अपने से उम्र में बड़ी लड़की के साथ यौन दुष्कर्म में शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम है तो क्यों नहीं उसे पीड़िता लड़की से उम्र में बड़ा मान लिया जाना चाहिये ?
किशोर मन यदि कोमल न हो कर क्रूर हो तो क्या वह तब भी वयस्क  न माना जायेगा ?
अपराध करने के लिये सोच उत्तरदायी है या शरीर की प्रौढ़ता ? सोच के लिये संस्कार उत्तरदायी हैं या शरीर ?
क्रूर किशोर द्वारा दी गयी निर्मम पीड़ा और किसी वयस्क द्वारा दी गयी निर्मम पीड़ा की कोटि में पीड़िता किस तरह अंतर कर सकेगी ?
समान अपराध और समान क्रूरता के लिये दण्ड भी समान क्यों नहीं होना चाहिये ?
क्या मांसभक्षण मनुष्य को क्रूर बना देता है ?
क्या इस्लाम में क्रूर यौनदुष्कर्मियों के लिये कोई दण्ड विधान नहीं है ?
क्या किसी इस्लाम गुरु के पास इन क्रूर पापियों के लिये कोई फ़तवा नहीं है ?
क्या स्त्री को शक्ति मानकर पूजने वाले हिन्दुओं की  वर्तमान पीढ़ी के कुछ लोग इतने पापी और अधम हो गये हैं कि वे आर्यों की सनातन संस्कृति में आग लगाकर ही चैन लेंगे ?
देश किस ज़हन्नुम में जा रहा है और इसके लिये ज़िम्मेदार लोग कहाँ हैं?  

 

 

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

बातें


बातें ना हुयीं उनकी गोया कपड़े हुये
देखो पल-पल वो बातें बदल देते हैं ॥  

उनकी चालों की ख़ूबी पे मरते हैं सब
देखो पल-पल वो राहें बदल देते हैं ॥  

गिरगिटों ने भी उनसे ही तालीम ली
फ़ैसले शाम के सुबह वो बदल देते हैं ॥

उनके नुस्ख़े भी होते हैं बड़े लाज़वाब
हरदम वो देकर दवा दर्द बदल देते हैं ॥

लेने बदले बदलते हैं वो शातिर पैंतरे
अब उपनाम अपने हम बदल देते हैं ॥

बदलते हैं वो सबकुछ सिर्फ़ दिल छोड़के
सबसे लगाके दिल वो पते बदल देते हैं ॥