मंगलवार, 21 मार्च 2017

झुकते-झुकते



हमने जल बिन मेघ घनेरे इधर-उधर देखे हैं फिरते ।
घिर कर चक्रव्यूह में सबने अभिमन्यु अनेकों देखे मरते ॥
संदेहों के मेघ विषैले लिये पोटली में सब फिरते ।
कुछ चमकीले लोग न जानें कितने दाग छिपाये फिरते ॥ 
पल-पल मरते वे जीते-जीते, हम जीते हैं मरते-मरते ।
बीत गया कलियों का जीवन ऋतुओं का ऋण भरते-भरते ॥
शीतल ऋतु में उष्ण हवायें, सच कहते हम डरते-डरते ।
कोई मिले ऐसा तो बताना, पोंछ सके जो आँसू झरते ॥
कब डूबा कोई खारे जल में, अश्रु बहा दो चाहे जितने ।
मधुर प्रेम में डूब गये हम, जीत लिया जग झुकते-झुकते ॥
किरण खोजने निकला हूँ मैं, रात बितायी चलते-चलते ।
दृढ़ संकल्प अगर कर लो तो, बात बनेगी बनते-बनते ॥

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

मार्क्स का नया अवतार – फ़्रेंकफ़र्त स्कूल



हम मानते हैं कि ‘सामाजिक समानता’ समाज की एक उच्च आदर्श स्थिति है । यद्यपि व्यावहारिक धरातल पर इस स्थिति को अपने पूर्ण आदर्श स्वरूप में प्राप्त कर सकना सम्भव तो नहीं तथापि सामाजिक समानता की अधिकतम स्थिति को प्राप्त करना सम्भव है और इसके लिये सत्ता एवं समाज को मिलकर आगे बढ़ना चाहिये । भारतीय सभ्यता के विभिन्न युगों में इस दिशा में प्रयास किये जाते रहे हैं और उनमें सफलतायें भी मिलती रही हैं जिसके स्पष्ट प्रमाण प्राचीन भारतीय समाज व सत्ता व्यवस्था के इतिहास से प्राप्त होते हैं ।    
ओट्टोमन साम्राज्य के अंतिम दिनों में योरोपीय देशों में वहाँ की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों के विरुद्ध क्रांतियों की एक श्रृंखला प्रारम्भ हुयी । तत्कालीन व्यवस्थाओं के विरुद्ध विभिन्न वैचारिक सिद्धांत अस्तित्व में आये । इसी श्रृंखला में ज़र्मन विचारकों ने अन्याय और शोषण विहीन समाज की संरचना पर नये सिरे से चिंतन करना प्रारम्भ किया ।
ईसवी सन 1818 में जन्मे कार्ल मार्क्स ने पूर्व दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों चार्ल्स फ़ोरियर, जॉर्ज़ विलहेम फ़्रेडरिक हेगल, और फ़्रेडरिक एंजेल आदि की वैचारिक पृष्ठभूमि को आगे बढ़ाते हुये एक वैश्विक समाज व्यवस्था की कल्पना की । बाद में मार्क्स की विचारधारा को और समृद्ध करते हुये कार्ल ल्यूकेक्स, कार्ल ग्रूनबर्ग, हेनरिक ग्रॉसमैन, फ़्रेडरिक पोलोक, मैक्स हॉरख़ेयमर, थियोडोर अडोर्नो और हर्बर्ट मार्क्यूज़ आदि चिंतकों ने कुछ अंतर्विरोधों के सा थ आगे बढ़ाया । वर्तमान में इस परम्परा के ज़ुर्गेन हॅबरमास नव-मार्क्सवाद के पुरोधा बनकर उभरे हैं ।
इस बीच नवमार्क्सवाद को आगे बढ़ाने के लिए 1923 में कार्ल ल्यूकेक्स और फ़ेलिक्स वेल द्वारा फ़्रेंकफ़र्त में एक शोध संस्थान की स्थापना की गयी । कार्ल ल्यूकेक्स की विचारधारा ने सामाजिक समानता के अतिवाद को अपनाया जिसे नव साम्यवाद के नाम से जाना गया । यह विचारधारा मनुष्य और प्रकृति से जुड़े सभी विज्ञानों और सिद्धांतों का सामान्यीकरण करती है अर्थात् प्राकृतिकविज्ञानों (Natural sciences) के सार्वभौमिक सिद्धांतों की तरह ही समाजविज्ञान के सिद्धांतों को भी देश-काल-समाज-परम्परा आदि से निरपेक्ष सार्वभौमिक स्वीकारते हुये पूरे विश्व के सभी समाजों की एक समान व्याख्या करती है । जबकि फ़िज़िक्स के सिद्धांतों की तरह समाज के सिद्धांतों का सामान्यीकरण किया जाना एक अवैज्ञानिक चिंतन और अव्यावहारिक प्रयास है । यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि अभी तक हुये शोध कार्यों से यह ज्ञात हुआ है कि आधुनिक प्राकृतिक विज्ञानों की ब्रह्माण्डीय व्यापकता सिद्ध नहीं हो सकी है । ब्रह्माण्डीय घटनाओं में कुछ ऐसी भी घटनायें होती हैं जहाँ धरतीवासियों के फ़िज़िक्स के सिद्धांत उनकी व्याख्या कर पाने में असफल रहते हैं । धरती पर भी बारमूडा त्रिकोण के क्षेत्र में आधुनिक फ़िज़िक्स के सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में “मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना” वाले मनुष्य समूह में कोई व्यवस्था पूरी धरती के लिए लागू किया जा सकना कितना वैज्ञानिक हो सकता है ?   
समाज के सभी नियमों और परम्पराओं का सामान्यीकरण किया जाना मानव स्वभाव की विविधताओं को समाप्त कर देना है । मार्क्समूलक वैश्विक समाज की रचना भी मानव स्वभाव की इस विविधता को स्वीकार नहीं करती । उत्तरमार्क्स काल (post-Marx-period) में विविधता की अस्वीकार्यता इतनी प्रचण्ड हो उठी कि लिंगभेदमुक्त समाज के साथ-साथ लिंगमुक्त (Gender free) समाज की भी माँग़ उठने लगी । स्त्री-पुरुष के लैंगिक भेद को अभेद मानते हुये समलैंगिक यौनसम्बन्धों (Homosexuality) की प्रशस्ति की जाने लगी, समलैगिक सम्बन्धों को प्राकृतिक माना जाना लगा, यौन सम्बन्धों की वर्जनाओं को तोड़ते हुये स्वेच्छाचारिता एवं मुक्तयौन सम्बन्धों (Free sex) को प्रमुखता दी जाने लगी, विवाहपूर्व यौन सम्बन्धों (pre-marital sexual relations) को नैतिकता के बन्धन से मुक्त माना जाने लगा, अवैवाहिक साहचर्य (Live in relationship) एवं विवाहेतर साहचर्य (extra-marital relations) की वकालत की जाने लगी । अप्राकृतिक यौनाचारों से जुड़ी नैतिकता को कुंठा का कारण मानते हुये यौनाचारों के अप्राकृतिक होने की सम्भावनाओं को ही अमान्य कर दिया गया । एक ऐसे विश्व की रचना के प्रयास किये जाने लगे जहाँ मनुष्यों को भी पशुओं की तरह स्वैच्छिक यौन सम्बन्धों की स्वतंत्रता होती है ।   

मार्क्स बाबा यथास्थिति के विरोधी थे । उनका विचार था कि सारी समस्याओं का मूल यथास्थिति में ही है । बाबा के शिष्य “आलोचना एवं विरोध की संस्कृति” को लेकर सत्ता, समाज, धर्म, परिवार और विवाह तक पहुँच गये । उत्तरमार्क्सवाद व्यक्ति की जिस स्वतंत्रता की कल्पना करता है, न केवल उसका स्वरूप विकृत और वीभत्स है अपितु उसके परिणाम और भी विकृत एवं वीभत्स हैं । आप कल्पना कीजिये, जिस समूह में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के लिए बिना किसी मर्यादा के उपलब्ध होंगे क्या वहाँ एक अराजकता और अव्यवस्था उत्पन्न नहीं होगी ? मार्क्स व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए व्यक्तिगत प्रेम की हत्या कर देने के पक्षधर थे । उनका विचार था कि व्यक्तिगत प्रेम के कारण ही लोग भ्रष्टाचार की ओर बढ़ते हैं । जब माता-पिता-पुत्र-पुत्री जैसा कोई सम्बन्ध ही नहीं होगा तो भ्रष्टाचार का प्रश्न ही नहीं उठता । उत्तरमार्क्सयुग के विद्वानों द्वारा इसकी व्याख्या को एक नया आयाम दिया गया जिसके अनुसार यौन सम्बन्ध तो रखे जाने चाहिये किंतु स्त्री-पुरुष के बीच पति-पत्नी, माता-पिता या भाई-बहन जैसे कोई सम्बन्ध नहीं होने चाहिये ।
मार्क्स बाबा ने जिस मनुष्य समूह की कल्पना की है वह एक भयावह चित्र उपस्थित करता है, इस चित्र में अव्यवस्था है, अमर्यादा है, अराजकता है और संस्कृति की शून्यता है । यूँ, मार्क्स बाबा की दृष्टि में मनुष्य जीवन के लिए संस्कृति और धर्म की कोई आवश्यकता नहीं हुआ करती ।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

आलोचना का सिद्धांत (The theory of Criticism)...



आलोचना (Criticism) एक सामान्य एवं स्वाभाविक बौद्धिक प्रतिक्रिया (Cognitive reaction) है जो बौद्धिक एवं आचरणजन्य विकारों से मुक्ति (emancipation from the intellectual morbidity and moral deviation) की दिशा में परिमार्जन (Ablution) का प्रथम चरण होती है । यह वह प्रक्रिया है जो समाज को गतिशील बनाये रखती है । संकीर्ण अर्थों में की गयी आलोचना नकारात्मक एवं उदार अर्थों में की गयी सकारात्मक होती है, दोनों का अंतर आलोचक की दृष्टि और उद्देश्यों पर निर्भर करता है । भारतीय परम्परा में सम्भाषा परिषदों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श को प्रशस्त माना जाता रहा है । भारत में आलोचना की नहीं, समालोचना की परम्परा रही है जो गुण-दोष के आधार पर एक संतुलन की स्थिति की माँग करती है । संतुलन का अभाव आलोचना को अतिवाद की ओर ले जाता है । 
इतिहास बताता है कि उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था भी कभी स्थायी नहीं हो पाती, उसमें विकार आना स्वाभाविक है । भारत में इन विकारों की रोकथाम (Prevention of morbidity and deviation) एवं आचरण (personal as well as social conducts) में निरंतर परिमार्जन के लिये एक मान्य एवं व्यावहारिक सनातन व्यवस्था (eternal laws of the nature in the perspective of human nature) सुस्थापित की गयी जिसे सनातनधर्म के नाम से लोक प्रसिद्धि प्राप्त हुयी । कालांतर में उसके अनुयायियों में भी विकार आते चले गये और उस व्यवस्था के सिद्धांत मात्र उपदेश भर बनकर रह गये । किसी सिद्धांत की उपादेयता तभी तक है जब तक वह व्यावहारिक और प्रामाणिक है । पश्चिम भी जब कई प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, औद्योगिक आदि विकारों से ग्रस्त हुआ तो उन विकारों के विरुद्ध स्वर उठने प्रारम्भ हुये । कार्ल-मार्क्स ने शोषणमुक्त (Free of exploitation) समाज व्यवस्था की कल्पना की और नये सिद्धांत गढ़ने प्रारम्भ किये । वे एक विराट वैश्विक समाज (Global society) की सुदृढ़ संरचना (supper structure) के बारे में स्वप्न देख रहे थे । मार्क्स का स्वप्न यथास्थिति के विरुद्ध था जिसने वर्जनाओं के विरुद्ध जनमानस, विशेषकर युवा शक्ति को आकर्षित ही नहीं किया बल्कि उन्हें आक्रामक भी बना दिया । प्रचण्ड आलोचना को सैद्धांतिक मान्यता देने के सफल प्रयास किये गये और मार्क्स का स्वप्न आलोचना के बौद्धिक धरातल पर आकार लेने लगा जिससे पहले पश्चिम में एवं उसके पश्चात् पूरे विश्व में एक बौद्धिक क्रांति का सूत्रपात हुआ जिसने शीघ्र ही अतिवाद को धारण कर लिया । भारत के नव-आलोचकों ने इसे बौद्धिक एवं वैचारिक क्रांति (Cognitive and Conceptual revolution) के रूप में स्वीकार किया । 
मार्क्स ने तत्कालीन संस्थाओं, यथा – समाज, परिवार, विवाह, धर्म आदि को स्वतंत्रता के लिए बाधक तत्व मानते हुये मनुष्य के लिए अनावश्यक बताया । वे समाज, परिवार, विवाह, परम्परा, धर्म, सत्तातंत्र, औद्योगिक पूँजीवाद जन्य शोषण, असमानता और लिंगभेद आदि के विरुद्ध उठ खड़े हुये । उत्तरमार्क्स युग में स्त्रीमुक्ति एवं लिंगभेदमुक्ति (Gender discrimination free society) के साथ-साथ हर प्रकार के बन्धनों (Socio-ethical regulations and moral limitations) से मुक्ति के लिये अतिवादी सिद्धांतों का विकास होने लगा । राज्य और संस्था के विरुद्ध मार्क्सवाद का अतिवादी स्वरूप उसी प्रकार था जैसे किसी रोग से मुक्ति पाने के लिए रोगी को ही समाप्त कर दिया जाय । मार्क्स के शिष्यों ने इसी सिद्धांत को निरंतर आगे बढ़ाया और 1923 में ज़र्मनी के फ़्रेंकफ़र्त में सामाजिक-वैचारिक क्रांति (Socio-Conceptual revolution) के लिए एक संस्था की स्थापना की जिसे पूरी दुनिया में फ़्रेंकफर्त स्कूल के नाम से जाना गया ।   
फ़्रेंकफ़र्त स्कूल की विचारधारा आलोचना का सिद्धांत(Theory of criticism) का उद्देश्य एक ऐसा सामाजिक परिवर्तन करना है जिसमें तर्क और वैचारिक क्रांति के माध्यम से सामाजिक बन्धनों एवं विकारों से मुक्ति पायी जा सके एवं आधुनिक पूंजीवाद का विरोध किया जा सके । वास्तव में यह संस्था अतिवाद के एक अनंत भटकाव की वैश्विक नींव के रूप में स्थापित हुयी । फ़्रेंकफ़र्त स्कूल ने 22 अप्रैल 1969 को भारत में एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय रखा गया । “आलोचना का सिद्धांत” एवं “बन्धनों-मर्यादाओं से मुक्ति” की आकर्षक एवं चुम्बकीय शक्ति के साथ सभी सामाजिक मर्यादाओं और नैतिक वर्जनाओं को ध्वस्त करते हुये राष्ट्र के स्थान पर सत्ताविहीन वैश्विक समाज की स्थापना के लिये इस विश्वविद्यालय के विद्वान निरंतर सक्रिय बने हुये हैं, यह जानते हुये भी कि अपनी सैद्धांतिक अवधारणा के अनुरूप आज तक कोई भी कम्युनिस्ट देश न तो पूर्ण शोषणमुक्त हो सका, न सीमाविहीन हो सका और न संस्थामुक्त ।   

सोमवार, 13 मार्च 2017

पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने



“मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा”

किसी सैनिक की मृत्यु का कारण क्या है, देश या युद्ध ? जब गुरमेहर ने ‘देश’ को नहीं ‘युद्ध’ को सैनिक की मृत्यु का कारण बताया तो हलचल मच गयी । हर वह बच्चा गुरमेहर हो सकता है जिसके पिता युद्ध में मारे गये हैं । यदि पूरी दुनिया के बच्चे युद्ध को ही किसी सैनिक की मृत्यु का कारण मानते हैं तो गुरमेहर का प्रतिनिधि वाक्य इस तरह होगा – “मेरे सैनिक पिता को पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, इस्लामिक स्टेट ....ने नहीं, युद्ध ने मारा है”।      
फ़रवरी दो हजार सत्रह में रामजस कॉलेज में हुये विवाद के समय जब वर्ष भर पुरानी यह बात सामने लायी गयी तो तात्कालिक परिस्थितियों के प्रभाव से आवेशित लोग गुरमेहर कौर के प्रति आक्रामक हो उठे । आवेश के वे क्षण व्यतीत हो चुके हैं और हमें गुरमेहर की बात पर एक बार पुनः चिंतन करना चाहिये ।

ठहरिये ! कुछ समय के लिए गुरमेहर को नेपथ्य में भेज देते हैं । हाँ ! अब ठीक है ।

तो प्रश्न यह है कि मारा किसने, ‘देश’ ने या ‘युद्ध’ ने ? यदि ‘देश’ ने मारा तो पूरा देश दोषी है, किंतु यदि ‘युद्ध’ ने मारा तो युद्ध का निर्णय लेने वाले लोग दोषी हैं ।
हम ‘देश’ से प्रारम्भ करते हैं । पाकिस्तान में बलूच भी हैं, कश्मीरी भी हैं, कुछ हिंदू भी हैं, कुछ अफ़गान शरणार्थी भी हैं, कुछ सूफ़ी भी हैं और हैं कुछ वे लोग भी हैं जो युद्ध को मानवता के लिए अभिषाप मानते हैं । जब पाकिस्तान भारत पर छद्म आक्रमण करता है तो क्या पाकिस्तान में रहने वाले ये नागरिक भी उसके लिए दोषी माने जायेंगे ?
युद्ध का निर्णय ‘राजा’ लेते हैं, युद्ध के तात्कालिक परिणाम ‘सेना’ और दूरगामी परिणाम ‘प्रजा’ भोगती है । पहले राजा भी प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लेते थे, अब कोई राजा प्रत्यक्ष युद्ध में भाग नहीं लेता । राजा पूर्वापेक्षा अधिक सुरक्षित हो गये हैं, सेना पूर्वापेक्षा अधिक असुरक्षित हो गयी है । राजा तो होते ही हैं सुख भोगने के लिए । ‘राजा’ के अहं से प्रारम्भ होने वाले सभी युद्ध ‘प्रजा’ की आहुति के साथ समाप्त होते हैं ।
अब हम ‘युद्ध’ की बात करेंगे । क्या युद्ध इतने अनिवार्य होते हैं कि उनके बिना विवाद का समाधान नहीं हो सकता ? क्या युद्ध अभी तक किसी समस्या का समाधान कर सके हैं ?
नये युग में युद्ध से अब कोई सत्ताधीश नहीं मरता, सैनिक मरते हैं । युद्ध की तकनीक और रणनीति सत्ताधीश के अहं के कारणों को समाप्त कर देती है, वे कारण जो उन्हें शक्ति देते हैं, वह शक्ति जो उनके अहं का कारण बनती है ।
अहं को समाप्त करने के लिये युद्ध आवश्यक है क्या ?
युद्ध यदि समाधानकारक होते तो बारबार युद्ध नहीं होते । तब वह क्या है जो समाधानकारक हो सकता है ? क्या गुरमेहर ऐसे ही किसी समाधान की तलाश में है ?