सोमवार, 21 अप्रैल 2014

कौन है पिछड़ा ?


चुनाव के राजनीतिक मौसम में भारत के राजनीतिज्ञों, तथाकथित बुद्धिजीवियों और समाचार माध्यमों के बीच चर्चा का एक प्रिय (किंतु भ्रामक) विषय हुआ करता है - “पिछड़ापन” । एक सुनियोजित भ्रम को निरंतर तराशे जाने का षड्यंत्र स्थापित किया जा चुका है । स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् तथाकथित अल्पसंख्यक वर्गों को स्वप्न बेचे जाने का क्रम प्रारम्भ हुआ जो अभी तक चल रहा है । लोगों ने बड़ी ललक से अपना बहुमूल्य “मत” देकर सपनों को ख़रीदा, वर्षों तक उसे अपनी आँखों में रखकर सींचा .....किंतु सपनों से अंकुर नहीं निकले । वे ठगे जाते रहे, सपनों के बीज बाँझ थे वे कभी नहीं उगे ।
भुने हुए चने कभी नहीं उगते –भारत को अभी यह सीखना होगा ।
सपने बेचे जाने का यह व्यापार पिछले छह दशक से भी अधिक समय से चल रहा है । हम यह नहीं कहेंगे कि देश के साथ कोई वञ्चना की गयी, वञ्चना एक-दो बार होती है बारम्बार नहीं होती । ख़रीददार यदि सजग नहीं है तो उसके ठगे जाने की सम्भावनायें असीमित हो जाती हैं । तथापि सत्य यह भी है कि हमारी सजगता को कुन्द करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से हमारे चिंतन और विश्लेषण की धरती पर अम्ल छिड़का जाता रहा है । लोकतंत्र के चालाक व्यापारियों ने सपने बेचने के साथ-साथ हमारे मन-मस्तिष्क में “पिछड़ापन ” और “अल्पसंख्यक” जैसे अम्लीय शब्द भी ठूँस दिये । इन शब्दों ने हमारे मस्तिष्क की उर्वरता को नष्ट करना शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप इन भ्रामक शब्दों ने एक छद्मरूप ही धारण कर लिया है ।
हम जानना चाहते हैं कि स्वाधीन भारत के सातवें दशक में कौन है “पिछड़ा” ? कौन है “अल्पसंख्यक” ?
जब मैं कहता हूँ कि सूरजमुखी के फूल का रंग पीला है तो सबको यह विश्वास हो जाता है कि सूरजमुखी के फूल में पीला रंग है, उसकी पंखुड़ियों को प्रकृति के द्वारा पीले रंग से रंगा गया है । किसी को मेरे कथन की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं होता किंतु यही बात यदि किसी भौतिकशास्त्री से कही जाय तो सूरजमुखी के फूल का नाम सुनते ही जो चित्र उसके मन में निर्मित होगा उसमें छह रंग तो होंगे पर पीला रंग नहीं होगा । भौतिक शास्त्री एक तत्ववेत्ता है, उसे वास्तविकता पता है कि किसी फूल का रंग वह नहीं होता जो हमें दिखायी देता है बल्कि वह होता है जो वह पुष्प अवशोषित करता है । किसी पुष्प का जो रंग हमें दिखायी देता है वह तो उस पुष्प के द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया है, उसे वापस कर दिया गया है । हमारी आँख़ें जो रंग देख पाती हैं वह पुष्प के द्वारा वापस किया हुआ रंग है । जो पुष्प के द्वारा स्वीकार किया गया है वह तो समाहित हो गया पुष्प में, जो रंग पुष्प के अन्दर है वह किसी को दिखायी नहीं देता, उसे तो बस तत्वज्ञानी ही देख पाते हैं । कहने का आशय यह है कि किसी बात को कहने और उसे समझाने के तरीके में सोद्देश्य भिन्नता हो सकती है । आज की छद्मराजनीति का यही मूल है । जब हम ‘अल्पसंख्यक’ और ‘पिछड़ा’ जैसे शब्दों को उछालते हैं तो उसका उद्देश्य लोककल्याणकारी नहीं होता ।  
यह सर्वविदित है कि भारत की धरती पर विभिन्न जातियों और धर्मों के लोगों का शासन रहा है । भारत के लोग दीर्घ काल तक पराधीन बने रहे । पराधीनता के इस दीर्घ काल में भारतीयों का विकास सम्भव नहीं था ...विकास नहीं हुआ । पूरे भारत के लोग विकास की प्रतिस्पर्धा में शेष विश्व से पिछड़ते चले गये क्योंकि अवसरों की अनुपलब्धता सभी पराधीन भारतीयों के लिए एक समान थी । चन्द अवसरवादियों और देशद्रोहियों के अतिरिक्त आम भारतीय विकास नहीं कर सका । इसलिए यदि ‘पिछड़े’ लोगों को चिन्हित करना है तो सत्ताधीशों, व्यापारियों और उद्योगपतियों के अतिरिक्त पूरे भारत को चिन्हित करना होगा ।
मैं यह नहीं समझ पाया हूँ कि सामाजिक समानता और विकास की चिंता (?) के समय हमारे विद्वान राजनीतिज्ञों द्वारा अवसरों की अनुपलब्धता के आधार पर ‘वंचित’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया गया ? और यदि ‘पिछड़ा’ शब्द से इतना ही मोह था तो उसे वर्ग और जाति का चोला क्यों पहना दिया गया ? क्या भारत में कोई भी धर्मावलम्बी है ऐसा जो कह सके कि उसके धर्म को मानने वालों में एक भी व्यक्ति ‘वञ्चित’ नहीं है या विकास में पीछे नहीं है ? क्या भारत में कोई भी जाति ऐसी है जो कह सके कि उसकी जाति में एक भी व्यक्ति ‘वञ्चित’ नहीं है या विकास में पीछे नहीं है ? इन सारी चर्चाओं के समय सवर्णों की स्थिति के बारे चर्चा नहीं की जाती । बिना किसी संधान और प्रमाण के यह माना जाता रहा है कि सवर्ण विकसित हो चुके हैं और अब उन्हें आगे विकसित होने की कोई आवश्यकता नहीं है । यह पक्षपात पूर्ण कुविचार वर्गभेद और सामाजिक विषमता को कैसे समाप्त कर सकेगा यह मैं आज तक समझ नहीं सका हूँ । वर्गविशेष को योग्यता और पात्रता में शिथिलता के साथ प्रश्रय देना वर्गभेद का एक अंतहीन चक्र है जिसमें कभी एक ऊपर होगा तो कभी दूसरा ।    
स्वाधीनता के बाद विकास के विषय पर समग्र समाज की बात कभी क्यों नहीं की गयी, यह विचारणीय विषय है ।  बड़ी धूर्तता से खण्डित समाज की बात की जाती रही और समाज में खाइयाँ खोदी जाती रहीं । मुझे किसी ने बताया है कि भारत में एक मात्र बिल्हौर संसदीय क्षेत्र ही ब्राह्मणबहुल है, किंतु वहाँ के ब्राह्मण भी विकास में अन्य लोगों की तरह ही पीछे हैं । उनके लिए कभी नहीं सोचा गया कि उन्हें भी पिछड़ा घोषित किया जाय । क्यों, क्या कोई सवर्ण विकास में पीछे नहीं हो सकता ?  राजधर्म तो बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिये राजा को प्रतिबद्ध करता है ।  
यद्यपि आर्यावर्त में कभी वर्गआधारित राजसत्तायें नहीं रहीं, यह तो कुशल नेतृत्व की योग्यता के आधार पर तय होता था कि सत्तानायक कौन होगा । किंतु जब सत्तानायक की बात आती है तो प्रायः ब्राह्मण इस योग्यता में खरे नहीं उतर सके । सच तो यह है कि बहुत कम ब्राह्मण राजा बने हैं । भारत की ब्राह्मणेतर जातियों के लोग ही प्रायः राजा हुये हैं या राजसत्ता में मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं । अब एक स्वाभाविक सा प्रश्न यह उठता है कि जिनके हाथो में सत्ता रही उनके लोग भी विकास में पीछे क्यों रह गये ? एक दीर्घ अवधि तक भारत पर मुसलमानों का शासन रहा, फिर भी आज मुसलमान पिछड़े हुये क्यों हैं ? वे कौन लोग हैं जो मुसलमानों के सत्ता में होते हुये भी मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी हैं ? हम उस समुदाय को पिछड़ा कैसे कह सकते हैं जिसके लोग भारत के राष्ट्रपति रह चुके हों और जो पूरे भारत के लिए सम्मान के पात्र हों ? पिछड़ेपन की छद्म परिभाषा को ...अल्पसंख्यक की छद्म परिभाषा को निरस्त करना होगा । नयी परिभाषायें ही देश को नयी दिशा में ले जा सकेंगी जिसके लिए देश के नागरिक प्रतीक्षारत हैं ।
हमें इन सारी बातों पर पुनः विचार करना होगा । हमें वर्षों के रचे छद्म को तोड़ कर सत्य को अनावृत करना होगा । वास्तविकता यह है कि हर धर्म और हर जाति में कुछ लोग समृद्ध हैं, कुछ लोग विकास में पीछे हैं, कुछ लोग बहुत पीछे हैं । भारत में प्रचलित सभी प्रमुख धर्मों और सभी जातियों के लोग उच्च पदों तक पहुँच कर कार्यरत हुये हैं, उनके समुदायों के लोग संत के रूप में पूज्य होते रहे हैं, वैज्ञानिक बने हैं, प्रबन्धक बने हैं ....राजनीतिज्ञ बने हैं ।  बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर आरक्षण की बैसाखियों पर चल कर आगे नहीं बढ़े । यह वही भारत है जहाँ शाक्य मुनि गौतम, कबीर, ज्योति बा फुले आदि समाज में सभी के लिए पूज्य और सम्मानित हुये हैं ।
भारत के लोगों को यह समझना होगा कि किसी भी जाति विशेष का विकास आरक्षण के आधार पर किया जा सकना सम्भव नहीं । विश्व के किसी भी देश में आरक्षण जैसा कोई कुविचार विकसित नहीं  हुआ ।  आरक्षण एक अप्राकृतिक सामाजिक अव्यवस्था है जो समाज में विषमता और बौद्धिक शोषण का आधार बन कर उभरी है । यह दुःख और चिंता का विषय है कि लोग आरक्षण की पात्रता के लिए नये-नये समुदायों को सम्मिलित करने के लिए माँग और आन्दोलन करते हैं । नये-नये अल्पसंख्यक पैदा हो रहे हैं, जबकि अबतक तो इन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में सम्मिलित हो जाना चाहिये था । ‘अल्पसंख्यक’ का यह विषैला विचारवृक्ष कब तक पल्लवित होता रहेगा ?
जब हम सामाजिक समानता और समरसता की बात करते हैं तो हर नागरिक के लिए एक जैसी राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता होनी चाहिये न कि समाज के किसी खण्ड विशेष के लिए पृथक नीति की ? जब हम वैश्विक स्तर पर बौद्धिक प्रतिस्पर्धा में सामने आते हैं तो हमें अपनी बौद्धिक दक्षता के प्रदर्शन की आवश्यकता होनी चाहिये न कि किसी बौद्धिक शिथिलता की ? विकास में किसी प्रकार की  शिथिलता का कोई स्थान नहीं होता, यह प्रकृति का विधान है इसका उल्लंघन भारतीय समाज के लिए अभिश्राप का कारण बन गया है ।
हमारे राजनेताओं के व्यक्तिगतहित खण्डितसमाज के खण्डितहितों के भ्रमजाल में सुरक्षित हैं । आज मुस्लिम हितों, दलित हितों, अनुसूचित जाति हितों, अनुसूचित जनजाति हितों की खण्डित चर्चा की जाती है । खण्डितहितों के विरोध को बड़ी धूर्तता से साम्प्रदायिक घोषित कर दिया गया है । समग्र भारतीयसमाज के हितों का चिंतन करने वाले राष्ट्रवादी विचारकों का अभाव सा हो गया है । सामाजिक विषमता के गर्तों को पाटने के नाम पर गर्तों को और भी गहरा करने काम कब तक चलता रहेगा? यह भारत प्रतीक्षा कर रहा है उस शुभ दिन की जब खण्डितहितों और खण्डितसमाज की नहीं बल्कि समग्र समाज को एक साथ लेकर चलने की चर्चा की जायेगी । हर भारतीय के लिए एक जैसे कानून होंगे, एक जैसे अवसर होंगे और विकास की एक स्वस्थ  प्रतिस्पर्धा को सुस्थापित किया जा सकेगा ।  

गुरुवार, 20 मार्च 2014

सरहदें



सारी हदें तोड़ कर खीचीं, मिलकर सबने ख़ूब सरहदें
हर सरहद को तोड़-तोड़ कर, फिर-फिर खीचीं नई सरहदें ॥
मिली तसल्ली न बाँटकर भी, लगे खीचने और सरहदें
जाति-धर्म, शहर-ओ-सूबे, दिल-दिमाग में नई सरहदें ॥ 
अभी छिपी हैं आड़ी-तिरछी, न जाने कितनी और सरहदें
अपने ही बनते गये लुटेरे, खीच रहे नित नई सरहदें ॥ 
पाक गया बंगाल गया, कश्मीर में मिट ना सकीं सरहदें
सरहद पर भी खिचती रहतीं, रोज़-रोज़ कुछ नई सरहदें ॥ 
छोटे दिल वालों का मक़सद रहो खीचते सदा सरहदें
प्यार में सरहद, काम में सरहद, घर-घर खीचो नई सरहदें ॥ 

बुधवार, 19 मार्च 2014

काहे रिसइलू


व्यस्तता ..व्यस्तता ...और व्यस्तता ..... इस बीच कौशलेन्द्र जैसे कहीं खो गया । चिट्ठों से दूर ...गोया वनवास का दण्ड मिला हो । इस बीच बहुत याद आती रही चिट्ठाजगत के स्वजनों की । चाह कर भी तनिक सा समय चुरा सकने में सफल नहीं हो सका । ...और एक तड़प  सी बढ़ती गयी । आज इस वक़्त जबकि रात का एक बज चुका है ...मैं चुपके से उठकर चला आया हूँ ...यहाँ अपने स्वजनों ...आत्मीयजनों से एक पक्षीय संवाद करने .....। 
अब प्रयास रहेगा कि इतना लम्बा अंतराल न हो । आप सबसे बहुत सारी बातें कहनी हैं ...आप सबकी बहुत सारी बातें सुननी हैं .....। 
फ़िलहाल ...
फागुनी बयार के साथ एक फागुनी गीत आप सबके लिए ...

काहे रिसइलू
झूठ-मूठ गोरिया,
लागल झुमे तोहरे
अंगना मं फगुवा ।
भगिह न दुरिया तू
आज मोर गोरिया,
रंग जइह जीभर
हमरे ही रंगवा ॥

तोहरे ही मन के
रन्ग लइ केअइलीं,
झांसा गोरी
अब न दिहा ।    
लाज से लाल,
परीत से पीयर,
रन्ग-रन्ग के
लेअइलीं रंगवा ॥  

धरि माथे मउरा
झुमे लागल अमवा,
कत्थक
करे ला फगुवा ।
टप-टप-टप-टप
रस बरसे लागल,
धरती के
अँचरा मं महुआ ॥

अल्हड़ सरसों
ओढ़ चुनरिया
लचकी जाय कमरिया,
अगिया बारे पूरवा ।  
धरती के छेड़े लागल
टेसू दहिजार,
पंखुरी पे
लिखि-लिखि पतिया ॥  

शनिवार, 2 नवंबर 2013

बल्बावली


है निशा यह सजी, बल्ब भी हैं जले

पर बिना नेह-बाती दिशा ना मिले ।

 

है दिशा को छला आज फिर बल्ब ने लो

हुयीं धूमिल दिशायें, काँपती दीप की लौ ।

कुछ इस तरह बल्ब उनके जले

कि हो गयीं आज ओझल सारी दिशायें ।

रक्त का एक दीपक रखा द्वार पर

और इधर ही चलीं आज सारी हवायें ।

रौशनी की तरफ़ जो उठायीं निगाहें

लगीं बदली-बदली सी सारी फ़िज़ायें ।

अमावस की ही निशा क्यों सजे

चाँदनी रूपसी क्यों सिसकती रहे ।

भटकती दिशायें, सूर्य खण्डित हुये

पग बढ़ाती अमावस बिहंसते हुये ।

रात काली सदा मान पाती रही

और पूनम को होली जलती रही ।

नेह-बाती बिना बल्ब इतने जले

ढक गयी है धरा बल्बों के तले ।

 

नेह किसने चुराया, कहाँ बाती छिपायी

कहाँ गंध सोंधी दियों की हिरायी ।

मेंहदी लगे हाथ से कोई परस दे

आके रूठे दिये को कोई तो मनाये ।

दे ओट आँचल की ममता उड़ेले

जब कोई रूठा दिया टिमटिमाये ।

मुझे माटी का ही दिया चाहिये

नेह-ममता भरा ही हिया चाहिये ।

दीप हो एक ही पर वो ऐसा जले

काँप जाये अँधेरा सदा को टले ।    

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

चुनाव का मौसम

लो चुनाव का मौसम आया नई-नई सौगातें लाया ।
हर वोटर का है अरमान रोटी, कपड़ा और मकान ।
द्वार पे देखो नेता आया भ्रष्टाचार का झोला लाया ।
बचे-खुचे आश्वासन ले लो वोट मगर बदले में दे दो ।
साइकल दे दी पुस्तक दे दी इसकी कौड़ी उसको दे दी ।
मूर्खतंत्र के भाग्य विधाता तेरी जेब से है क्या जाता ।
और बढ़ाकर बोली बोलो चावल भी फ़ोकेट में दे दो ।
इतना ही मन है देने का तो एक महल बनवा दोगे क्या ?
अपनी किस्मत जैसी ...
चोखी किस्मत भी लाकर दोगे क्या ?
नेता जी तुम क्या-क्या दोगे फोकेट में क्या जग दे दोगे ?
प्रतिभाओं का गला घोटकर आरक्षण ही बाँटा अब तक ।
संख्याओं से खेल खेलकर बाँट दिया है सारा जनमत ।
पाँच सितारा में तुम खाते नमक-भात हमको खिलवाते ।
इन्हें पढ़ाते शिक्षाकर्मी उनके बच्चे लंदन जाते ।
चाल तुम्हारी समझ गये हम बात तुम्हारी ताड़ गये हम ।
कुछ टुकड़े फोकट में देकर राजमहल तुम लूट रहे हो ।
डाल रहे हमको ये आदत फोकट खायें फोकट सोचें ।
नमक-भात से नेक भी आगे जीवन में बढ़ने ना पायें ।
फोकट के कुछ टुकड़े देकर देश अपाहिज क्यों करते हो ?
हमें बनाकर लंगड़ा-लूला अपनी जेबें क्यों भरते हो ?
ख़ैरात बाँटने की आदत से भीख माँगना मत सिखलाओ ।
कुत्तों जैसी पूँछ हिलाना इंसानों को मत सिखलाओ ।
रिश्वतखोरी बन्द करो और लूटे अवसर वापस कर दो ।
लूट-लूट कर हुये गुलाबी गालों की कुछ रंगत दे दो ।
रोज-रोज ये ख़ून ख़राबा रोक सको तो इसको रोको ।
दल में इतनी टूट-फूट है दल-दल का ये दंगल रोको

रविवार, 25 अगस्त 2013

यौन दुष्कर्म के लिये कुख्यात होता भारत

विधि से नहीं डरते बलात्कारी
 
...और अब मुम्बई में फ़ोटो ज़र्नलिस्ट के साथ क्रूरतापूर्वक सामूहिक यौन दुष्कर्म ।
क्रूर यौनदुष्कर्मी चाँदबाबू सत्तार शेख़ उर्फ़ मोहम्मद अब्दुल की दादी अपने पोते को बचाने उसके नाबालिग और मासूम होने का सर्टीफ़िकेट लेकर सामने आ गयी हैं। बलात्कार से पहले अपने पोते को उसकी उम्र और मासूमियत का हवाला देते हुये दादी ने यदि कभी कोई संस्कार दिये होते तो आज एक पापी की मासूमियत सिद्ध करने के लिये दादी को तकलीफ़ नहीं उठानी पड़ती।
यदि दादी की जगह मैं होता और मोहम्मद अब्दुल की जगह मेरा लड़का, तो मैं माँग करता कि इस किशोर को दुनिया की सबसे कड़ी सजा दी जाय और वह भी मेरी आँखों के सामने, वही सजा मुझे भी दी जाय अपनी औलाद को सही संस्कार न देने के अपराध के लिये।   
 
समानांतर सेना ...
 
आन्ध्र के भद्राचलम की सीमा से लगे दक्षिण बस्तर के नवनिर्मित बीजापुर जिले के गंगालूर दलम की एरिया कमाण्डर सौम्या मिनचा ने अपनी गिरफ़्तारी के बाद जानकारी दी है कि माओवादी अब गाँव की तेज़-तर्रार लड़कियों को माओवादी दलम में शामिल कर उन्हें उग्रवादी बना रहे हैं। मिनचा जैसी छह और महिला एरिया कमाण्डर ग्रामीण लड़कियों को जंगल में पहुँचा रही हैं। माओवादी बड़े पैमाने पर नारीशक्ति का दुरुपयोग करने के लिये एक महिला बटालियन तैयार कर रहे हैं। माओवादी घटनाओं में महिलाओं की सहभागिता अब एक सामान्य बात हो गयी है। शायद इसीलिये इस इलाके के लगभग 28 रेलवे स्टेशंस माओवादियों के निशाने पर हैं और सरकार उनके विस्फ़ोट से उड़ाये जाने की प्रतीक्षा में है। कल के दैनिक भास्कर के हवाले से पता चला है कि बिलासपुर डिवीजन के टेंगनमाड़ा, खोड़री, खोंगसरा, बोरीडांडा, उदलकछार, दर्रीटोला, नगर, जामगा एवं दगोरा ; रायपुर डिवीजन के बालोद, कुसुमकसा, दल्ली राजहरा ; तथा नागपुर डिवीजन के गोंदिया, दारेकसा, सालेकसा, बोरतलाब, पनियाजाब, डॉंगरगढ़, राजनान्दगाँव, बालाघाट, सामनापुर, चारेगाँव, लमता, देवालगाँव, अर्जुनी, वाडसा, नागभीर, एवं चांदाफ़ोर्ट रेलवे स्टेशन माओवादियों की सूची में हैं।

इस बीच माओवादियों के लिये ख़ुराक की तरह एक और ख़बर छपी है कि पिछले साल नवम्बर में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 13 करोड़ की लागत से जिस सड़क का उद्घाटन किया था वह गुरुवार की रात शिवनाथ नदी के प्रवाह में सिसक-सिसक कर रोती हुयी बह गयी । शिवनाथ नदी पर बने पुल और धराशायी हुयी सड़क के बीच 25 फ़ीट का फ़ासला हमारी नैतिक प्रगति को चिढ़ाने से बाज़ नहीं आ रहा है। नैतिक प्रगति का एक और शानदार नमूना धनवाद के आयकर विभाग के कचरेखाने में भी दिखायी पड़ा। सबूत है लालू-राबड़ी की फ़ाइलें जो आयकर विभाग के कबड़ख़ाने से बरामद हुयीं।       

चलते-चलते एक ख़बर और ...

दादागीरी से अब पुरुषों का वर्चस्व समाप्त। संविदा में कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने उसके स्थान पर पदस्थ नियमित महिला कर्मचारी को धमकी दी है कि यदि उसने ज्वाइन करने की हिमाकत की तो उसका पति उसे गोली से उड़ा देगा। 

हमें उत्तर भी चाहिये और समाधान भी ....


यदि किसी अल्पायु बालक को उसकी बौद्धिक प्रखरता के कारण विश्वविद्यालय में किसी वयस्क की तरह प्रवेश दिया जाना न्यायसंगत है तब किसी किशोर को उसकी पाशविक क्रूरता के लिये वयस्क की तरह दण्ड देना न्यायसंगत क्यों नहीं है?
कोई किशोर यदि अपने से उम्र में बड़ी लड़की के साथ यौन दुष्कर्म में शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम है तो क्यों नहीं उसे पीड़िता लड़की से उम्र में बड़ा मान लिया जाना चाहिये ?
किशोर मन यदि कोमल न हो कर क्रूर हो तो क्या वह तब भी वयस्क  न माना जायेगा ?
अपराध करने के लिये सोच उत्तरदायी है या शरीर की प्रौढ़ता ? सोच के लिये संस्कार उत्तरदायी हैं या शरीर ?
क्रूर किशोर द्वारा दी गयी निर्मम पीड़ा और किसी वयस्क द्वारा दी गयी निर्मम पीड़ा की कोटि में पीड़िता किस तरह अंतर कर सकेगी ?
समान अपराध और समान क्रूरता के लिये दण्ड भी समान क्यों नहीं होना चाहिये ?
क्या मांसभक्षण मनुष्य को क्रूर बना देता है ?
क्या इस्लाम में क्रूर यौनदुष्कर्मियों के लिये कोई दण्ड विधान नहीं है ?
क्या किसी इस्लाम गुरु के पास इन क्रूर पापियों के लिये कोई फ़तवा नहीं है ?
क्या स्त्री को शक्ति मानकर पूजने वाले हिन्दुओं की  वर्तमान पीढ़ी के कुछ लोग इतने पापी और अधम हो गये हैं कि वे आर्यों की सनातन संस्कृति में आग लगाकर ही चैन लेंगे ?
देश किस ज़हन्नुम में जा रहा है और इसके लिये ज़िम्मेदार लोग कहाँ हैं?