रविवार, 21 दिसंबर 2014

धर्मपरिवर्तन



मैं पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि धर्म के आदर्श स्वरूप की चर्चा सुखकारक होती है, क्लेशकारक नहीं । किंतु आज हम धर्म के उस लौकिक स्वरूप की चर्चा के लिये विवश हुये हैं जो क्लेश का कारण बन गया है ।
धर्मांतरण की घटनायें राजनैतिक आवश्यकता की चक्की से पिसकर एक वैचारिक अपराध के रूप में प्रकट हुयी हैं । धर्मांतरण की दुर्घटनायें पूरे विश्व में होती रही हैं किंतु भारत में इसकी तीव्रता प्रतिक्रियात्मक होती रही है । धर्म ने भारत को विभाजन की त्रासदी सहने के लिये विवश किया है इसलिये धर्मांतरण की प्रतिक्रिया तीव्र से तीव्र होती जा रही है । बहुसंख्य भारतीय समाज के दोहरे आचरण और राजनैतिक अवसरवादिता ने इस समस्या को निरंतर उलझाया है । किसी भी रूप में हो किंतु धर्म यदि समाज के लिये समस्या बन जाय तो यह चिंता का विषय है । दुर्भाग्य से भारत के हिंदू कभी विवशता तो कभी लालच के कारण सहस्राब्दियों से आयातित धर्मों का चोला ओढ़ते रहे हैं । एक आदर्श स्थिति में धर्मांतरण कभी धार्मिक समस्या नहीं रहा बल्कि राजनैतिक और सामाजिक समस्या रहा है जो अब अपने विकृतरूप में प्रकट हो रहा है ।
यूँ, स्वेच्छा से एक धर्म को छोड़ कर दूसरे धर्म का अनुकरण करना वैचारिक परिवर्तन का परिणाम है । यह एक वैचारिक विद्रोह है किंतु विगत सहस्रों वर्षों में जो परिदृष्य हमारे सामने उभर कर सामने आया है उससे किसी वैचारिक क्रांति ध्वनित नहीं होती । धर्मांतरित हुये लोगों को धर्म के मर्म से कोई अभिप्राय नहीं रहा । यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो ये वे लोग हैं जिन्हें धर्म के अनुशीलन से कोई अभिप्राय नहीं, वे कुछ रूढ़ियों और पाखण्डों को ओढ़कर केवल अपनी प्रतिबद्धतायें बदलते रहे हैं । निश्चित ही प्रतिबद्धताओं में परिवर्तन समाज और राष्ट्र के अस्तित्व के लिये एक विघटनकारी कारक है ।
एक सहज प्रश्न है - धर्मांतरण क्यों ?
जब कोई अपने पारम्परिक धर्म का परित्याग करता है तो वह नये अपनाये जाने वाले धर्म में विश्वास और श्रेष्टता के साथ ही अपने पूर्वजों के धर्म के प्रति अविश्वास और न्यूनता की प्रच्छन्न घोषणा करता है । दो धर्मों के बीच मतों और विश्वासों का यह भेद सामाजिक विघटन को ही जन्म दे सकता है । ऐसे धर्मांतरण से समाज किसी उच्च आदर्श को प्राप्त नहीं कर सकता । भारत से बाहर जिन लोगों ने अपने पारम्परिक धर्म का त्याग कर अहिंसा की संस्तुति करने वाले बौद्ध धर्म को अपनाया वे अहिंसा को अपने जीवन में नहीं अपना पाये । उन्होंने अपने धर्म  का त्याग किया किंतु मांसाहार का त्याग नहीं कर सके । यह कैसा धर्म परिवर्तन हुआ ? सच तो यह है कि धर्म बदलने की चीज है ही नहीं, वह तो मानवीय गुणों को संस्कारित करने की चीज है, मनुष्य को पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाने की चीज है, विघटन से संघटन की प्रक्रिया को अपनाने की चीज है, भेद से अभेद की ओर बढ़ने की चीज है । अपने पारम्परिक धर्म का त्याग कर किसी नये धर्म को अपनाने की अपेक्षा अपने अन्दर के अन्धकार का त्याग करना ही उचित है । यह नया चोला कुछ अच्छा नहीं कर सकेगा, कुछ अच्छा करने के लिये चोला बदलने की आवश्यकता ही नहीं है । धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं, शौचमिन्द्रिय निग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो ...इन लक्षणों को अपने अन्दर उत्पन्न करने के लिये क्या किसी भी धर्म में निषेध किया गया है ? 
        क्या कोई धर्म मनुष्यता विरोधी है ? क्या कोई धर्म प्रकाश से अंधकार की ओर जाने की प्रेरणा देता है ? क्या विभिन्न धर्मों में अंतरविरोध है ? क्या कोई धर्म हीन या श्रेष्ठ है ? यदि ऐसा कुछ है तो वह धर्म नहीं हो सकता, कुछ और ही होगा । क्या मनुष्य को इस “कुछ और” की आवश्यकता है ?

धर्म और संस्कृति का आपस में क्या रिश्ता है ?

इंडोनेशिया के मुसलमान भारतीय संस्कृति के अनुकरण में कुछ बुरायी नहीं देखते । उनके आदर्श चरित्रों में राम और हनुमान भी हैं । संस्कृति मनुष्य जीवन की परिष्कृत चर्या है ...इसे पाने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है ...तप करना पड़ता है ...निरंतर अभ्यास करना पड़ता है ...और आवश्यकता पड़ने पर अपने हितों का त्याग भी करना पड़ता है । संस्कृति एक जीवनशैली है जो निरंतर उत्कृष्ट और उदात्त मानवीय गुणों के अभ्यास की संस्तुति करती है । संस्कृति से हमें धर्म को समझने की वैचारिकभूमि उपलब्ध होती है जबकि धर्म हमें अपसंस्कृति से बचाता है । 

भारत में धर्म और संस्कृति के बीच एक धुंधली सी रेखा है जिसे देखने के लिये व्यापक दृष्टि की आवश्यकता है । भारतीयों का धर्म “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं, शौचमिन्द्रिय निग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्म लक्षणम्” से अनुशासित होता है । धर्म के ये दस लक्षण आदर्श व्यक्तित्व के लक्षण हैं जिनका अनुशीलन मानवमात्र के लिये अभिप्रेत है । ऐसा धर्म व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व की समृद्धि, सुख और शांति के लिये आवश्यक है । यही कारण है कि जैन, बुद्ध और सिख मत के लोग भी सनातन धर्म की इस मुख्य धारा का गुणगान करते हैं । क्या इन सिद्धांतों का किसी से कोई विरोध हो सकता है ? मुझे नहीं लगता कि अन्य मतों के लोग इससे सहमत नहीं होंगे । फिर समस्या कहाँ है ?

चरक संहिता में उपदिष्ट वाक्य - “संस्कारो हि गुणंतराधानमुच्यते स्पष्टरूप से गुणों के अंतराधान का मंत्र देता है । यह अंतराधान किस तरह होता है ? इसे सीखने के लिये कृषक के पास जाकर कृषि की प्रक्रिया देखनी होगी, कुम्भकार के पास जाकर मृत्तिका भांड बनाने की पूरी प्रक्रिया देखनी होगी, किसी शिल्पी के पास जाकर उसकी शिल्पसाधना को देखना होगा, किसी जुलाहे के पास जाकर वस्त्र बुनने की प्रक्रिया जाननी होगी ....। संस्कार व्यक्तिगत अर्जन और साधना का परिणाम है किंतु जब यही समूह में भी व्याप्त होकर प्रगट होता है तो उस समूह की संस्कृति बन जाता है । किसी कार्य या आचरण को निरंतर अच्छा और शुभ बनाने के लिये बारम्बार किये जाने वाले प्रयास संस्कार की प्रक्रिया का एक कार्मिक भाग है । 

शास्त्र उपदेश देते हैं – “संस्करणं सम्यक् करणं वा संस्कारः” । पुस्तकों के अगले संस्करण में सुधार या संशोधन की परम्परा से हम सभी परिचित हैं । भारतीय संस्कार निरंतर परिमार्जन करते हुये आगे बढ़ने की साधना है । यहाँ वैचारिक जड़ता का अभाव है । यहाँ किसी एक विचार या एक दिशा से प्रभावित होकर रूढ़ हो जाने का अभाव है । यहाँ मण्डन है ....और खण्डन भी । यहाँ एक सरोवर नहीं बल्कि महासागर की बात है, घटाकाश की नहीं अनंताकाश की बात है । 
        संस्कार तो त्रुटियों और चरित्र की शिथिलताओं की पुनरावृत्ति रोकने का अनुभूत योग है । ‘संस्कार’अपने आचार और विचार में निरंतर परिमार्जन की प्रक्रिया है । ‘संस्कार’ अपने जीवन में उत्कृष्ट गुणों का अभ्यास है । ‘संस्कार’ मानव जीवन को पवित्र, उत्कृष्ट और लोकहितकारी बनाने वाला आध्यात्मिक उपचार है । ‘संस्कार’ चेतना और संवेदना की वह सात्विक प्रक्रिया है जो मनुष्य के आचरण को सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन में ग्राह्य और अनुकरणीय बनाती है । ‘संस्कार’ सभ्यता का प्रथम सोपान है और संस्कृति का मूल आधार भी ।   
        भारत में धर्मांतरण रोकने के लिये एक निषेधात्मक कानून बनाने की चर्चा हो रही है । सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर यह एक क्रांतिकारी पहल है जिसका बुद्धिजीवियों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिये । भारतीय राजनीति और भारतीय समाज को अपनी प्राथमिकतायें तय करनी होंगी । हम अपने प्राचीन गौरव को खो चुके हैं इसलिये अभी तो हमें संस्कारित होने की आवश्यकता है, सामाजिक होने और मनुष्य होने की आवश्यकता है । प्रकृति और मातृशक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है । जघन्य और पैशाचिक यौन दुष्कर्मों से समाज को पूर्ण मुक्ति दिलाने के लिये कटिबद्ध होने की आवश्यकता है । धर्म नहीं आचरण बदलने की आवश्यकता है ।   

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

यह फफूंद बदनाम नहीं है

    


      रसोई के भोजन को ख़राब कर देने के लिये बदनाम फफूंद के विपरीत तिब्बत के पठारों पर तीन हज़ार से पाँच हज़ार मीटर की ऊँचाई पर थिटारोड्स प्रजाति के एक पतंगे के लारवा को संक्रमित कर उसके शरीर में वृद्धि करने वाली फफूंद की एक प्रजाति ने लोगों को अपना दीवाना बना दिया है । यह दीवानगी जहाँ स्थानीय लोगों को चोरी, लूट, धोखा, मारपीट और हत्या तक के लिए विवश कर देती है वहीं तिब्बत की अर्थव्यवस्था में इसके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुये स्थानीय प्रशासन द्वारा वसंत ऋतु के आते ही लगभग चालीस दिन के लिए स्कूलों में अवकाश घोषित कर दिया जाता है जिससे विद्यार्थी इस बेशकीमती “सॉफ़्ट गोल्ड” के संग्रहण द्वारा परिवार की आय में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर सकें ।
        ओफ़ियोकार्डीसेप्स साइनेन्सिस नामक इस फफूंद को सामान्य बोली में कैटरपिलर फंगस भी कहते हैं । तिब्बती भाषा में यार्त्सा गुनबू, चीनी भाषा में डांग छांग झिया चाओ और नेपाली भाषा में यारसा गुम्बा के नाम से पुकारे जाने वाले इस सॉफ़्ट गोल्ड की वर्तमान कीमत सोने से भी अधिक है यानी एक पौण्ड कैटरपिलर फंगस के लिये आपको पचास हज़ार डॉलर तक चुकाने पड़ सकते हैं । कीमत में यह उछाल 1993 के बाद से आयी है जब पश्चिमी देशों ने चीनी खिलाड़ियों के माध्यम से इसके औषधीय गुणों के बारे में जाना । तिब्बत, नेपाल, सिक्किम और चीन के लोग पारम्परिक चिकित्सा में सहस्रों वर्षों से इसका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार और कामशक्ति वर्धक औषधि के रूप में करते आ रहे हैं ।   
        चीन में धनाड्यों की डिनर पार्टीज़ में यर्त्सा का सेवन समृद्धि का प्रतीक माना जाता है । इस कैटरपिलर फंगस ने तिब्बत, नेपाल, सिक्किम और चीन के उन ग्रामीणों की किस्मत बदल दी है जहाँ यह पाया जाता है । इसे लेकर संघर्ष भी होते रहे हैं और हत्यायें भी यहाँ तक कि इसके संग्रहण को लेकर होने वाले हिंसक विवादों को सुलझाने के लिये एक बार तो दलाई लामा को भी आकर हस्तक्षेप करना पड़ा । दिनोदिन इसकी कीमत बढ़ती ही जा रही है । पश्चिमी देशों में भी, जहाँ हर चीज का रासायनिक विश्लेषण कर कई प्रयोगों के बाद ही उसे प्रामाणिक माने जाने की परम्परा है, इसके प्रति आकर्षण बढ़ा है ।
         इस फफूंद के व्यापार का मुख्य केन्द्र तिब्बत के किंघाई राज्य का गोलोग एनक्लेव है जहाँ के नागरिकों की आय का मुख्य स्रोत फंगस संग्रहण है । तिब्बत में मई के शुरुआती दिनों से जून के अंत तक का समय वसंत ऋतु का होता है ।  इस समय बर्फ पिघलने लगती है और ठण्डी-कठोर धरती तापमान के बढ़ने और स्थानीय घास के अंकुरण के कारण कुछ-कुछ स्पंजी होने लगती है । यह थिटारॉड्स पतंगे के संक्रमित कैटरपिलर से फंगस के अंकुरित होने का समय होता है । धरती के नीचे मात्र आधा इंच की गहरायी में रहने वाले इस कैटरपिलर के सिर की ओर से अंकुरित होने वाली इस फफूंद के संग्रहण का यह समय लगभग 40 दिनों का होता है । संग्रहण के लिये अनुभव की आवश्यकता होती है । संग्रहण उचित समय पर ही किया जाना होता है जब फंगस लारवा को मारकर ऊपर उभर कर दृष्टिगोचर होने लगता है । गीली धरती की सतह पर उगी घास के अंकुरों के बीच माचिस की तीली के बराबर के यर्त्सा को पहचानना सरल नहीं है । कई बार संग्राहकों को गीली धरती की सतह पर घुटनों और कोहनियों के बल पर रेंगते हुये पैनी निगाहों से फफूंद के अंकुरों को तलाशना होता है । जैसे ही कोई अंकुर उन्हें दिखायी देता है वे ख़ुशी से चीखने लगते हैं और बड़ी सावधानी से लोहे के ट्रोवेल से कैटरपिलर सहित अंकुर को खाँद लेते हैं ।  
       आप सोचेंगे कि आख़िर ऐसा क्या है इस फंफूद में जिसने इसे सोने से भी अधिक मूल्यवान बना दिया है । उत्तर में हम तो कहेंगे कि दीवानगी के लिये महज़ दिल का मेहरबान होना ज़रूरी है । यूँ चीनियों का दावा है कि इस फफूंद से बनने वाली औषधि थकावट को दूर करने वाली, कामशक्ति को बढाने वाली, पाचनशक्ति और मेटाबोलिज़्म को सुधारने वाली तो है ही अन्य कई बीमारियों को भी दूर  करने में समर्थ है । 1993 के बाद पश्चिमी देशों ने इन दावों की पुष्टि के लिये शोधकार्य प्रारम्भ किये । देखिये एक रिपोर्ट -      
      New study published in the journal RNA finds that cordycepin, a chemical derived from the caterpillar fungus, has anti-inflammatory properties. Inflammation is normally a beneficial response to a wound or infection, but in diseases like asthma it happens too fast and to too high of an extent," said study co-author Cornelia H. de Moor of the University of Nottingham. "When cordycepin is present, it inhibits that response strongly."
       And it does so in a way not previously seen: at the mRNA stage, where it inhibits polyadenylation. That means it stops swelling at the genetic cellular level—a novel anti-inflammatory approach that could lead to new drugs for cancer, asthma, diabetes, rheumatoid arthritis, and cardiovascular-disease patients who don't respond well to current medications.

रविवार, 14 दिसंबर 2014

धार्मिक स्वतंत्रता के अर्थ


       भोजन, आवास, और सुरक्षा जीवन की मूलभूत अत्यावश्यकतायें हैं जिनके लिये संघर्ष होते रहे हैं । इन आवश्यकताओं की सुनिश्चितता के लिये कुछ शक्तिशाली लोग कभी राजतंत्र तो कभी लोकतंत्र के सपने दिखाकर स्वेच्छा से ठेके लेते रहे हैं । सभ्यता के विकास के साथ-साथ अवसरवादी लोगों ने भी धर्म के ठेके लेने शुरू कर दिये । भोजन, आवास और सुरक्षा की उपलब्धि के लिये एक सात्विक मार्ग के रूप में “धर्म” का वैचारिक अंकुश तैयार किया गया था किंतु अब मौलिक आवश्यकताओं की सुनिश्चितता के अन्य उपाय खोज लिये गये हैं और धर्म एक ऐसी भौतिक उपलब्धि बन गया है जिसकी प्राप्ति के लिये अधर्म और अनीति के रास्ते प्रशस्त हो चुके हैं । धर्म अब रत्नजड़ित मुकुट हो गया है जिसे पाने के लिये हर अधार्मिक व्यक्ति लालायित है । अधर्म ने धर्म का मुकुट पहनकर अपनी सत्ता को व्यापक कर लिया है । धर्म के नाम पर किये जाने वाले सारे निर्णय अब अधर्म द्वारा किये जाते हैं ।

     धर्म के नाम पर भारत को खण्डित किया गया । पाकिस्तान बना, बांग्लादेश बना और अब मौलिस्तान और कश्मीर बनाने की तैयारी चल रही है । पूरे विश्व में धर्म के नाम पर हिंसा होती रही है ...लोग बटते रहे हैं ...समाज खण्डित होता रहा है .....स्त्रियों के साथ यौनाचार होता रहा है । धर्म के नाम पर वह सब कुछ होता रहा है जो अधार्मिक है । यह धर्म है जिसने लोगों को अपनी मातृभूमि छोड़ने के लिए विवश किया । यह धर्म है जिसने लोगों को अपने ही घर में शरणार्थी बनने पर विवश किया । ब्रितानिया पराधीनता से मुक्ति के बाद भी कश्मीरी पण्डितों को 1990 में अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा । धर्म यदि ऐसा विघटनकारी तत्व है जो हिंसा की पीड़ा का मुख्य कारक बन सकता है तो ऐसे धर्म की आवश्यकता पर विचार किए जाने की आवश्यकता है ।

      भारत के संविधान में धर्म की स्वतंत्रता के साथ-साथ धर्म के प्रचार की भी स्वतंत्रता प्रदान की गयी है । इस प्रचार की स्वतंत्रता ने ही धर्म को एक वस्तु बना दिया है । धर्म अब आयात किया जाता है, धर्म के नाम पर अरबों रुपये ख़र्च किये जाते हैं । धर्म ने अपने मूल अर्थ को खो दिया है और अब वह व्यापार बन चुका है ।
      मैं यह बात कभी समझ नहीं सका कि जिस धार्मिक स्वतंत्रा के कारण देश और समाज का अस्तित्व संकटपूर्ण हो गया हो उसे संविधान में बनाये रखने की क्या विवशता है ? क्या धार्मिक स्वतंत्रा को पुनः परिभाषित किये जाने की आवश्यकता नहीं है ? क्या धार्मिक स्वतंत्रता की सीमायें तय किये जाने की आवश्यकता नहीं है ? हम यह मानते हैं कि जो विचार या जो कार्य समाज और देश के लिये अहितकारी हो उसे प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिये । मनुष्यता और राष्ट्र से बढ़कर और कुछ भी नहीं हो सकता । परस्पर विरोधी सिद्धांतों और विचारों को अस्तित्व में बनाये रखने की स्वतंत्रता का सामाजिक और वैज्ञानिक कारण कुछ भी नहीं हो सकता । ऐसी स्वतंत्रता केवल राजनीतिक शिथिलता और असमर्थता का ही परिणाम हो सकती है ।

     बहुत से बुद्धिजीवी सभी धर्मों के प्रति एक तुष्टिकरण का भाव रखते हैं यह उनकी सदाशयता हो सकती है और छल भी । हम उन सभी बुद्धिजीवियों से यह जानना चाहते हैं कि यदि सभी धर्म मनुष्यता का कल्याण करने वाले हैं तो फिर उन्हें लेकर यह अंतरविरोध क्यों है? सारे धर्म एक साथ मिलकर मानव का कल्याण क्यों नहीं करते ? धर्म को लेकर ये अलग-अलग खेमे क्यों हैं ? ये एक ही लक्ष्य के लिये पृथक-पृथक मार्गों की संस्तुति क्यों करते हैं ?  कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत एक प्रकार के लक्ष्य के लिये विभिन्न मार्गों की संस्तुति नहीं करता तब धर्म के साथ ऐसा क्यों है ?


     आप कह सकते हैं कि धर्म और विज्ञान दो पृथक-पृथक विषय हैं, उन्हें एक साथ रखकर किसी सिद्धांत की व्याख्या नहीं की जा सकती । मेरी सहज बुद्धि यह स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है । विज्ञान से परे कुछ भी नहीं है, धर्म और विज्ञान को पृथक नहीं किया जा सकता । पृथक करने से जो उत्पन्न होगा वह अधर्म ही होगा । 

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

कोहरे में लिपटे सोनपुर की एक सुबह ...


       पटना के महेन्द्रूघाट से पहलेजाघाट के लिये सुबह-सुबह छूटने वाले जहाज की यात्रा की स्मृतियाँ अब इतिहास की धरोहर बन चुकी हैं । यात्रा के बीच में होने वाले सूर्योदय के दर्शन के लोभ में पहले जहाज को पकड़ना मेरी विवशता हुआ करती थी । डेक पर खड़े होकर गंगाजी की धारा में उगते सूर्य के किरणों की अठखेलियों को कई बार निहारा है ...पर कभी तृप्त नहीं हो पाया ।
        सुबह-सुबह, कोहरे में लिपटा सोनपुर जब जगने की तैयारी में था ठीक तभी कोहरे को चीरती हुयी हमारी ट्रेन सोनपुर पहुँची । बाहर आकर हमने पहलेजा के लिये ऑटो रिक्शा लिया और चल पड़े ।
       पहलेजा पहुँचकर लगा किसी नये स्थान पर आ गये हैं । पहलेजाघाट रेलवे स्टेशन के स्थान पर अब एक बस्ती थी । सामने श्री गंगाजी के दर्शन न हुये होते तो विश्वास नहीं हो पाता कि हम पहलेजा में हैं ।

कोहरा अभी भी था । सूरज आज अंगड़ाई तक लेने के मूड में नहीं लग रहा था । हो सकता है कि बस्ती के लोगों को हाज़त रफ़ा करने के लिये गंगाजी के किनारे लोटा लेकर जाते हुये देखने से बचने के लिये सूरज ने कोहरे की चादर ओढ़ रखी हो ।  

          अंततः सूरज को बाहर आना ही पड़ा, अलसाये से सूरज ने मुझे देखा तो बोल पड़ा –"अरे ! कहाँ रहे अब तक ?" 
उत्तर में मैं केवल मुस्कराया भर । 


शीत कितनी भी हो, गंगास्नान करने वाले ब्राह्ममुहूर्त में ही पहुँच जाते हैं ।  

कोहरे से भीगी ठंडी रेत और गंगाजी के भक्त ....

मुखारी करने सूरज भी पहुँच ही गया ....  


मुखारी के बाद गंगाजी के जलदर्पण में अपना मुखड़ा देखता सूरज 

गंगास्नान के बाद भी मेरी आँखें रेल की पटरियों और प्लेटफ़ॉर्म को खोजती रहीं । लेकिन बस्ती उसे न जाने कब का निगल चुकी थी ।


       मेरे सामने गीली रेत और कीचड़ भरे रास्ते थे, किंतु आँखों को बन्द करके भी मैं रेल की उन पटरियों को देख पा रहा था जिनका अब वहाँ नाम-ओ-निशान तक नहीं था ।


अंततः एक झोपड़ी के पीछे मिल ही गया रेलवे स्टेशन का एक भरापूरा प्रमाण ....पानी की टंकी   

और ये रहा वह प्लेटफ़ॉर्म ...जहाँ अब सड़क है । 

गाँव ने शहर के कपड़े पहन लिये हैं ...लेकिन गाँव की ख़ुश्बू अभी भी बाकी है 

ठण्ड में अपने-अपने स्वीटर पहने सुबह का पहला नाश्ता करते गाय-गोरू 

और लीजिये .....हम आ गये मेले में ...

मेले की एक दीवार पर चित्रकारी 

कभी यह मेला पशुओं के लिये प्रसिद्ध था, आज काम करने वाले पशुओं का स्थान मशीनों ने ले लिया है और दूध का स्थान नकली दूध ने ...इसलिये मेले में भरमार है मनुष्य नामक प्राणी की जो आजकल अक्सर बद से बदतर हो जाया करता है ।  

मेला स्थल के पास ही गज-ग्राह की कथा को चित्रित करता यह शिल्प । इस कथा के कारण ही इस स्थान का नाम पड़ा हरिहर क्षेत्र । 

मेले में मिठाइयाँ और पिज्जा ही नहीं सत्तू भी है और लिट्टी-चोखा भी । बिहार आज भी कई प्रकार के सत्तुओं के लिये प्रसिद्ध है । भई हमारा तो मानना है कि बिहार में जब तक सत्तू और लिट्टी-चोखा है तब तक बिहार की ख़ुश्बू बरकरार है । यूँ भी डायबिटीज़ के रोगियों के लिये सत्तू से उत्तम आहार और क्या है ! 

हरिहर क्षेत्र में गंगा जी का तट 


 गंगा जी का जल निर्मल है यहाँ ..


मेले के बाहर रस्सी पर चलती नन्हीं सी जान 


सोनपुर मेले के डांस थिएटर अक्सर सुर्खियों में रहते हैं ।


मेले में पशुविभाग की एक प्रदर्शिनी । सामने मंच पर पॉवर प्रज़ेंटेशन की तैयारी में व्यस्त हैं डॉ. महेश जी 



मेले में मिल गये पंतनगर से ग्रेज़ुएट पशुचिकित्सक डॉ. महेश जी 


..और हाँ, तीसरी कसम की याद दिलाती ये लाठियाँ आज भी हैं । 

घूम लिया मेला ...चलो अब चलें घर ...


तोता सचमुच चिंतित है मनुष्य के भविष्य को लेकर ..

सोमवार, 24 नवंबर 2014

ईश्वर-मनुष्य-ईश्वर



जब जीवन का आधार ही जीवन के अंत का कारण बन जाय तो आश्चर्य और भय होना स्वाभाविक है ।

मनुष्य जीवन के प्राणाधार वायु, जल और आग जब-जब विकराल रूप धारण कर उसके अस्तित्व के लिये संकट बने तब-तब आदिम मनुष्य को अपनी क्षुद्रता और असहायता का भान होता रहा ।
मनुष्य की शक्तियाँ प्रकृति की इन महाशक्तियों के सामने कभी ठहर नहीं सकीं, अंततः उसे प्रकृति की इन अजेय शक्तियों के आगे नतमस्तक होना पड़ा । अब वायु उसके लिए पवनदेव थे, जल वरुणदेव और आग अग्निदेव । धीरे-धीरे प्रकृति की सभी शक्तियाँ देवरूप में स्वीकार कर ली गयीं और इन शक्तियों का नियंता निराकार ईश्वर के रूप में । मनुष्य सभ्यता के इतिहास में इससे बड़ी खोज आज तक नहीं हुयी ।
प्रकृति के निरंतर साहचर्य, अनुभवों और असहायता ने मनुष्य के चिंतन की धारा को दृष्ट-तत्व से अदृष्ट-तत्व की ओर मोड़ दिया । अब तक सूक्ष्म में विराट तत्व के दर्शन ने मनुष्य को अचम्भित और अभिभूत कर दिया था । वह भीड़ से पृथक एक विशिष्ट चिंतक बन गया ।

एक दिन किसी ने पूछा, क्या कर रहे हो ? उसने उत्तर दिया - सूक्ष्म की साधना ।

भीड़ को यह उत्तर अनोखा लगा, उसने तुरंत निर्णय कर लिया कि वह व्यक्ति कुछ विशिष्ट है । लोगों ने उसे चारो ओर से घेर लिया और सूक्ष्म की साधना की व्याख्या करने का अनुरोध किया ।
विशिष्ट व्यक्ति ने ब्रह्माण्ड की सृष्टि और प्रलय की तात्विक व्याख्या की । उसने बताया कि किस तरह अदृष्ट शक्ति ब्रह्माण्ड के रूप में प्रकट होती है और फिर वही स्थूल ब्रह्माण्ड पुनः उस महाशक्ति में लीन हो कर अदृष्य हो जाता है ।
संवाद और अभिव्यक्ति की सरलता के लिए उस शक्ति को नाम दिया गया – “ईश्वर” ।
भीड़ को उस विशिष्ट व्यक्ति की बातें बड़ी रहस्यमयी लगीं । यह रहस्य बोधगम्य न होते हुये भी अचम्भित करने वाला था । उसकी बातों में दिव्यता थी, सम्मोहन था ।
भीड़ ने अनुरोध किया कि वे ब्रह्माण्ड के उस अद्भुत रचयिता और नियंता के दर्शन करना चाहते हैं । विशिष्ट व्यक्ति के बारम्बार यह कहने पर भी, कि ईश्वर निराकार, निर्गुण, अखण्ड, अजन्मा और अमर है इसलिए अदृष्टव्य है, भीड़ हठ करती ही रही । तब विशिष्ट व्यक्ति ने भीड़ से तत्व साधना में प्रवृत्त होने को कहा ।
भीड़ ने निराकार शक्ति के चिंतन का प्रयास किया किंतु सफल नहीं हो सकी । उसकी कल्पना में शून्य निराकार नहीं हो सका । भीड़ को देखने में रुचि थी, प्रमाण में रुचि थी । उसने निराकार को साकार करने का हठ किया और कुछ प्रतीक बना डाले । भीड़ ने अजन्मा को जन्म दे दिया, निराकार को साकार कर डाला । भीड़ की कल्पना में ईश्वर कुछ उसके जैसा और कुछ विशिष्ट था ।
निराकार को भीड़ ने साकार कर दिया, नाम रखा ब्रह्म ।
सर्वशक्तिमान निराकार ईश्वर की साकार रचना करके भीड़ अपनी उपलब्धि पर आत्ममुग्ध तो थी किंतु संतुष्ट नहीं । उसने निराकार को फिर एक रूप दिया, नाम रखा विष्णु । भीड़ अभी भी संतुष्ट नहीं थी । उसने निराकार को एक रूप और दिया, नाम रखा शिव ।
रहस्य के प्रति भीड़ की भूख बढ़ती जा रही थी । उसने निराकार को कई रूप दे दिये । मनभावन ईश्वर की रचना करते समय भीड़ ने अपनी कल्पना को सुन्दर रंगों से सजाने में कोई संकोच नहीं किया । सुन्दर रूप, सुन्दर वस्त्र, सुन्दर भोजन, सुन्दर आवास .....सब कुछ सुन्दर ही सुन्दर । सौन्दर्य में कृपणता कैसी ! भीड़ का ईश्वर एक अलौकिक मानवाकृति के रूप में प्रकट हुआ और अपने जन्मदाता को भाँति-भाँति से लुभाने लगा ।  

आकार और विकार के समवाय सम्बन्ध को भीड़ ने नकार दिया था इसलिये साकार ईश्वर शनैः शनैः विकारग्रस्त होने लगा ।
अब भीड़ के लिए उसके द्वारा रचित ईश्वर भी भीड़ जैसा ही हो गया था । जो विशिष्ट था वह सामान्य हो गया ...ठीक मनुष्य के जैसा ही ।
ईश्वर को मनुष्य बनाने के खेल में भीड़ आनन्दित हो उठी ...फिर एक दिन आनन्दातिरेक में उसने अपने बीच के एक व्यक्ति को ही ईश्वर बना दिया । भीड़ का एक व्यक्ति ईश्वर बन कर रोमांचित हो उठा ।

विक्रम संवत 2071 तक भारत की भीड़ ने कई व्यक्तियों को ईश्वर बना दिया । भीड़ रचित ईश्वर एक से अनेक हो गये हैं और भारत की लोकतांत्रिक सत्ता को चुनौती देने लगे हैं ।
भीड़ अपने ईश्वर से पीड़ित होने लगी है । उसका आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण होने लगा है । भीड़ अब कई वर्गों में विभक्त हो गयी है । एक वर्ग पीड़ित है इसलिए न्याय की माँग करता है, एक वर्ग इस विकृत खेल से रोमांचित है इसलिए इस खेल को प्रोत्साहित करता है, एक वर्ग मूक दर्शक है इसलिए वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करता ।
एक वर्ग ऐसा भी है जो इस खेल से चिंतित है, वह प्रतिक्रिया भी करता है किंतु उसकी प्रतिक्रिया ध्वनित नहीं हो पाती । इस खेल को प्रोत्साहित करने वाले वर्ग को प्रतिक्रियायें अच्छी नहीं लगतीं इसलिए वह हर प्रतिक्रिया की हत्या कर देता है ।  

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

मृगमरीचिका


            मरीचिका अब राज्य में नहीं रहती । उसने अपना विस्तृत राज्य स्थापित कर लिया है । मरीचिका का विस्तार हो गया है, राज्य उसमें डूब चुका है ।
सबके देखते-देखते राजाओं ने मृग की नाभि से कस्तूरी का अपहरण कर लिया ।
मृगों का होना मृगों के लिये बहुत अर्थ नहीं रखता । उनका होना राजा के लिये बहुत अर्थवान होता है । राजा के ऐश्वर्य .....उसकी प्रभुता .....उसकी समृद्धि ...उसके अस्तित्व के लिये मृगों का होना अनिवार्य है । मृग ही तो राजा के अर्थशास्त्र और अस्तित्व की नींव होते हैं । तथापि .......  
तथापि इतिहास के किसी भी पृष्ठ पर यह कहीं नहीं लिखा जायेगा कि रेगिस्तान में प्यास से भटक रहे कस्तूरीविहीन मृग बारबार मरीचिका से छले जाते रहे हैं ।
तृषित मृग शोषित, पीड़ित, वंचित और दीन-हीन हैं । वे भीरु और असंगठित भी हैं । उनकी समस्यायें उस कृष्ण विवर की तरह हैं जिसमें जाकर सब कुछ समा जाता है ......समा जाती हैं उनकी याचनायें, उनकी प्रतीक्षायें, उनकी आशायें, उनकी प्रार्थनायें .......और उनके अस्तित्व भी ।  
तृषित मृग के असीम दुःख की विवशता समुद्र की उन उद्दाम लहरों की तरह है जो हाहाकार से भरी और तटीय सीमाओं से घिरी है, ये विवश लहरें उछलती हैं फिर पछाड़ खाकर सागर के किनारों और पत्थरों से टकराकर स्वयं को ही घायल कर लेती हैं ।
तृषित मृग भटकते हैं । आश्वासन उसे अपनी ओर खीचते हैं । वे आश्वासनों के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करते हैं । उनकी प्रतीक्षायें कभी समाप्त नहीं होतीं ।
वे प्रार्थना करते हैं, अनुनय-विनय करते हैं, गिड़गिड़ाते हैं .....और निराश होते हैं ।
वे कुव्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना चाहते हैं किंतु कोई उनके नेतृत्व के लिए आगे नहीं आता ।  
वे संगठित और सुनियोजित नहीं हो पाते इसलिए कुचल दिये जाते हैं ।
रेगिस्तान में कुछ धूर्त भेड़िये भी हैं । राजा ने सभी धूर्त भेड़ियों को संरक्षण दे दिया है ।
राजा अपंग और नपुंसक है इसलिए राज्य में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये भेड़ियों का आशीर्वाद पाना उसे आवश्यक लगता है ।
धूर्त भेड़िये कुछ गुप्त किंतु अघोषित और अलिखित समझौतों की नीव पर नपुंसक राजाओं को आशीर्वाद दे दिया करते हैं ......यह एक प्रच्छन्न राजनैतिक परम्परा है ।
तिलकधारी भेड़िये अब जंगलों में नहीं, किलों में रहते हैं । किलों में सेना होती है । सेना को अपना चारा लाने की स्वतंत्रता होती है ।
किसी अवतार की प्रतीक्षा में भटक रहे मृगों को, न जाने क्यों भेड़ियों के किले बहुत आकर्षित करते हैं ।
थके-हारे, निराश और दीन-हीन मृग भूख और प्यास से तड़प रहे हैं । राजा ने उनकी नाभि की कस्तूरी पहले ही निकाल कर तस्करों को बेच दी है । विवश और तृषित मृग भेड़ियों के जाल में फसते रहने के लिये अभिषप्त हैं ...अन्य विकल्पों को देखने और समझने की शक्ति भी उनसे छीन ली गयी है । उनके दुःखों की भारी गठरी हर बार और भी भारी ही होती रही है ।


और हाँ ! सावधान ! परिभाषाओं की सारी शुभता को बन्दी बना लेने वाले धूर्त भेड़ियों ने निष्प्राण हुये शब्दों का चीवर बना कर ओढ़ लिया है । 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

संत का स्वाङ्ग – राक्षस की विवशता


          सीता के अपहरण के लिये रावण को संत का स्वाङ्ग करने के लिये विवश होना पड़ा था । लंकाधिपति रावण ने अपनी इस असांस्कृतिक विरासत से लंका को तो मुक्त रखा किंतु भारत को यह विरासत दे गया । अपनी इस निकृष्ट विरासत के माध्यम से दशानन रावण राम के वंशजों से आज भी बदला ले रहा है । रावण की आत्मा यह सब देख-देख कर अट्टहास कर रही है, कलियुग में राम के वंशजों ने राम की मर्यादा को धता बताते हुये रावण की विरासत को स्वीकार कर लिया है ।

           अब भारत के आधुनिक इतिहास में लिखा जायेगा – “ .........धीरे-धीर यह परम्परा भारतीय समाज में लोकप्रिय होती गयी और इक्कीसवीं शताब्दी के द्वितीय दशक में तो भारत के कई राक्षसों ने संतों के स्वाङ्ग को बड़ी सहजता से अपना लिया था । भारत का लोकतंत्र इन राक्षसों के आगे नतमस्तक था । आपराधिक मानसिकता वाले लोगों के एक बड़े वर्ग में “बाबाओं” का स्थान ईश्वर से भी ऊपर स्वीकार कर लिया गया था” ।       

         नौकरी से टर्मिनेट किया जा चुका, लगभग 22 महीने जेल में रह चुका, एक संगठित गुण्डा संत का चोला ओढ़कर धर्म के नाम पर अपराध किये जा रहा है । सारी दुनिया इतने दिनों से तमाशा देख रही है । दूरदर्शन में दिखाये जा रहे विज़ुअल्स से सब कुछ स्पष्ट और प्रमाणित हो चुका है कि रामपाल नामक एक अपराधी धर्म और जनता को ढाल बनाकर सरकार पर अपना आतंक कायम रखने में कामयाब हुआ है । चाहे-अनचाहे शातिर अपराधियों को एक संदेश पहुँचा दिया गया है कि धर्म की ढाल उन्हें अभेद्य कवच उपलब्ध कराती है जिसके आगे लोकतंत्र भी गिड़गिड़ाने के लिये विवश हो जाता है ।
        
        वैचारिक प्रदूषण फैलाने वाले एक दुष्ट अपराधी को मीडिया अभी भी “संत” संबोधित कर रहा है जिसका मैं विरोध करता हूँ । हरियाणा के डी.जी.पी. ने साहस करके रामपाल को अभियुक्त संबोधित किया है जो प्रशंसनीय है । दूसरी ओर डी.जी.पी. ने कहा है कि वे नहीं चाहते कि निर्दोषों को किसी प्रकार की क्षति हो । वे एक गुण्डे के समर्थकों को निर्दोष मानते हैं, वे गुण्डे जो पुलिस पर पेट्रोल बम फेक रहे हैं और पुलिस वालों पर गोली चला रहे हैं । कदाचित, डी.जी.पी. के अनुसार पुलिस वाले निर्दोषों की श्रेणी में नहीं आते ।
        हरियाणा पुलिस एक अपराधी को सम्मन तामील नहीं करवा सकी । हरियाणा पुलिस अपराधी के सहयोगियों को लाठी लेकर मार्च करते हुये देखती रहती है । हरियाणा पुलिस के सामने अपराधी के अड्डे में लोगों की भीड़ एकत्र होती रहती है और अस्लाहों का एकत्रीकरण होता रहता है । हरियाणा पुलिस ख़ामोश रहकर तमाशा देखती रहती है किंतु इसी तमाशे को पूरी दुनिया को दिखाने के लिये जब “चौथा स्तम्भ” अपने धर्म का पालन करता है तो पुलिस बर्बरतापूर्वक उन पर टूट पड़ती है । वह पुलिस, जो इतने दिनों से एक अपराधी की माँद में नहीं घुस पा रही थी, अपराधी के सहयोगियों के सामने विवश थी, अचानक सक्रिय हो जाती है और निर्दोष लोगों पर टूट पड़ती है । उसी पुलिस के डी.जी.पी. महोदय अपराधी रामपाल के गुण्डों को निर्दोष मानते हैं और मीडियाकर्मियों को अपराधी, ...तभी तो चौथे स्तम्भ पर पुलिस ने आज हिंसक आक्रमण कर दिया या यूँ कहिये कि सैन्य कार्यवाही की है ।
यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ अपराधियों के आगे सारा तंत्र नाक रगड़ता सा प्रतीत होता है और उसका मूल्य चुकाने के लिये अपना नैतिक धर्म निभाने वालों को हिंसा का शिकार होना पड़ता है ?
किसी स्थान विशेष में अशांति फैलने की आशंका होने पर स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रतिबन्धात्मक कार्यवाही किये जाने का प्रावधान है । रामपाल के मामले में उसके सहयोगी ( मैं उन्हें अनुयायी कहने की धृष्टता नहीं कर सकता) एक स्थान पर एकत्र होते रहे, किलाबन्दी करते रहे और प्रशासन अपंग बना रहा । अर्थात् समस्या उत्पन्न होती रही, स्थिति अनियंत्रित होती रही, रामपाल के कमाण्डो लाठी लेकर मार्च करते रहे, गुण्डों की सेना पुलिस और प्रशासन के सामने अपना शक्ति प्रदर्शन करती रही और पूरा देश लोकतंत्र को असहाय होता देखता रहा ।
भारत में “धर्म” का छद्म आवरण गुण्डों की ढाल बनता जा रहा है । इक्कीसवीं शताब्दी की भारतीय जनता धर्म और धर्म के आवरण में अंतर कर पाने में असमर्थ है । हम भारतीय लोग धर्म, आध्यात्म, आदर्श, मर्यादा, विकास, उन्नति, समानता आदि शब्दों के साथ खिलवाड़ करने के अभ्यस्त हो चुके हैं । राक्षसवाद से ग्रस्त भारत की बौद्धिक प्रतिभाओं के पलायन को, भला कौन सी शक्ति रोक सकेगी ?

भारत की जनता यदि चिटफण्ड कम्पनियों के जाल में बारबार फसती रहती है, बाहुबलियों और अपराधी नेताओं के पक्ष में मतदान करती है, किसी अपराधी नेता को न्यायालय से होने वाली सजा का विरोध करने के लिये आत्मदाह और आन्दोलनों पर उतारू हो जाती है, बाबाओं को ईश्वर मानने लगती है, गुण्डा और संत में अंतर कर पाने में असमर्थ रहती है, अधार्मिक कृत्यों को धर्म मानती है, व्यक्ति विशेष को ईश्वर से श्रेष्ठ प्रतिपादित करती है, किसी अपराधी को बचाने के लिये ढाल बनकर सामने आ जाती है, आत्मा-परमात्मा की बातें करने वाली पाखण्डी भीड़ क्रूर हिंसा पर उतारू हो जाती है तो यह मान लेना चाहिये कि समाज का एक बड़ा वर्ग लोकतांत्रिक मर्यादाओं में विश्वास नहीं रखता । यह विशाल वर्ग एक असभ्य कबीला है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये चुनौती है । आसाराम, नारायण साई और रामपाल जैसे अपराधियों ने न केवल भारतीय समाज का बहुत बड़ा अहित किया है अपितु “सनातन धर्म” के नाम को भी कलंकित किया है । जब-जब ऐसे वञ्चकों और पापियों का प्रभाव बढ़ा है तब-तब धर्म “अफ़ीम” बनती रही है और समाज अधिक से अधिक विकृत और विचलित होता रहा है ।