गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

बाबा और सार्वजनिक क्षमा

दिव्य आयुर्वेद फ़ार्मेसी निर्मित आयुर्वेदिक औषधियों के अपने दावों से पीछे हटते हुये बाबा रामदेव सर्वोच्चन्यायालय के सामने असहाय हो गये हैं और अब वे देश की जनता से सार्वजनिक क्षमा माँगने के लिये तैयार हैं।

इस विषय में न्यायालय में जो कुछ हुआ और जो कुछ हो रहा है मैं उससे सहमत नहीं हूँ। बाबा को दी गयी सर्वोच्च न्यायालय की धमकी और उनकी क्षमायाचना को स्वीकार न करने का निर्णय पक्षपातपूर्ण है और न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।

इस विषय में बाबा समझौतावादी हो सकते हैं पर मेरे पास सर्वोच्च न्यायालय के लिये कुछ महत्वपूर्ण जिज्ञासायें हैं जिनके समाधान जानने का अधिकार हर विज्ञानवेत्ता और न्यायप्रिय नागरिक को है अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय दोषपूर्ण माना जायेगा। लोकतंत्र में कोई भी निकाय अंततः आमजनता के प्रति उत्तरदायी होता है, अतः न्याय की पारदर्शिता के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष निम्न पाँच जिज्ञासायें प्रस्तुत हैं –

1-    यह एक स्थापित तथ्य है कि अपनी रासायनिक जटिलता के कारण एलोपैथिक औषधियों का व्यवहार विषय-विशेषज्ञ के परामर्श के अभाव में किसी रोगी के द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, तब उनके सार्वजनिक विज्ञापन का उद्देश्य आम उपभोक्ता को प्रभावित करना और बिना चिकित्सक के परामर्श के उन्हें उपभोग के लिए प्रोत्साहित करना ही हो सकता है। क्या माननीय न्यायालय ने इसके विरुद्ध कभी कोई स्वसंज्ञान लिया?

2-    बाजार में स्वास्थ्य सम्बंधी ऐसे विज्ञापनों की भरमार है जो उपभोक्ता को सीधे-सीधे किसी उत्पाद के उपभोग या किसी फ़िज़िकल प्रक्रिया द्वारा स्वास्थ्यलाभ के लिये प्रोत्साहित और प्रभावित करते हैं जबकि ऐसे विज्ञापनों के सारे दावे झूठे और अवैज्ञानिक होते हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ऐसे विज्ञापनों के लिए चिंतित क्यों नहीं है?    

3-    इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज कन्याकुमारी के प्रोफ़ेसर जे.ए. जयलाल द्वारा सर्जरी के माध्यम से धर्मांतरण के अवसर का उल्लेख करने के विरुद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कभी कोई स्वसंज्ञान लिया?

4-    कोरोनासंक्रमण के समय किसी भी देश के पास कोविड की कोई भी स्पेसिफ़िक औषधि नहीं थी फिर भी न जाने कितनी तरह की एलोपैथिक औषधियों द्वारा रोगियों की चिकित्सा की जाती रही और चिकित्सा एड्वाइज़री जारी की जाती रही जो पूरी तरह अवैज्ञानिक थी, इतना ही नहीं बचाव के प्रति भी डॉक्टर्स द्वारा दिए जाने वाले परामर्शों में कई बार विरोधाभास देखा गया। क्या माननीय न्यायालय की दृष्टि में एलोपैथिक चिकित्सा की सभी गतिविधियाँ वैज्ञानिक और आयुर्वेद की कोई भी चिकित्सा गतिविधि अवैज्ञानिक मान ली गयी है? यदि ऐसा है तो ऐसा मानने का वैज्ञानिक आधार क्या है?

5-    माननीय न्यायालय की दृष्टि में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण के जो भी मानदण्ड हैं क्या वे वास्तव में पूरी तरह सार्वकालिक और सार्वदेशज हैं?

 

भारत का एक आम नागरिक

-       डॉ. के.के. मिश्र, kaushalblog@gmail.com

                                                              

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.