बुधवार, 6 अप्रैल 2011

छत्तीसगढ़ी भाषा के उन्नयन हेतु हमारे उत्तरदायित्व

        विक्रम संवत २०६८ के नव प्रभात से ठीक एक दिन पूर्व रायपुर में छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के तत्वावधान में १५ वाँ प्रान्त स्तरीय साहित्य सम्मलेन संपन्न हुआ. छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों की एक चिंता यह थी कि छत्तीसगढ़ी को आगे कैसे बढाया जाय ? उन्हें आशा थी कि नए राज्य के अस्तित्व में आने के बाद छत्तीसगढ़ी भी अपने अस्तित्व के साथ प्रकट हो जायेगी, पर ऐसा नहीं हो सका ...तो मंथन प्रारम्भ हुआ कि किया क्या जाय ?  भाषा / बोली के अस्तित्व के लिए चिंतित लोगों द्वारा किये गए इस मंथन (छत्तीसगढ़ी भाषा बढ़ाय बर हमर जवाबदारी) पर पुनर्मंथन की आशा से सम्मलेन में विद्वान वक्ताओं के वक्तव्यों के सारांश आपके समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक समझ रहा हूँ.

१- बुधराम यादव, बिलासपुर-  छत्तीसगढ़ी भाषा को व्याकरणनिष्ठ बनाया जाय. भाषा का मानकीकरण किया जाय. साहित्य की विभिन्न विधाओं में सशक्त सृजन की आवश्यकता पर बल दिया जाय. समयानुकूल साहित्य का सृजन हो.  छत्तीसगढ़ी बोली के व्यावहारिक स्वरूप को अपनाए जाने की आवश्यकता है. 
२- दादूलाल जोशी, फरहद-  छत्तीसगढ़ी भाषा में स्तरीय व मानक साहित्य के सृजन के अभाव को दूर किया जाना चाहिए. भाषा की शुद्धता बनाए रखने के लिए विदेशी भाषा के शब्दों का अपमिश्रण रोका जाना चाहिए. छत्तीसगढ़ी भाषा का एक पाठक मंच बनाने के लिए शासन के समक्ष प्रस्ताव रखा जाना चाहिए.  
३- डॉक्टर पी.सी.लाल यादव, गंडई-दुर्ग- संस्कारित भाषा के लिए घर-परिवार के परिवेश को सुधारा जाना चाहिए. 
४- श्रीमती शकुन्तला तरार, रायपुर- छत्तीसगढ़ी भाषाओं / बोलियों में नक्सलियों द्वारा विप्लवकारी गीत लिखे जा रहे हैं उसके प्रत्युत्तर में उन्हीं क्षेत्रीय बोलियों में रचनात्मक गीत लिखने और प्रचारित किये जाने की आवश्यकता है.
५- डॉक्टर चेतन भारती, रायपुर-  छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रकाशन के लिए शासन स्तर पर वित्त पोषण की एक योजना प्रारम्भ की जानी चाहिए. चिट्ठी लेखन की कला को लुप्त होने से बचाने के प्रयास किये जाने चाहिए. छत्तीसगढ़ी साहित्य की अलग पहचान के लिए मौलिक लेखन आवश्यक है.
६- रेणुधर राऊतिया, रायपुर- विधान सभा के क्रिया कलापों, न्यायालयीन कार्यों एवं विधायकों द्वारा आपसी वार्तालाप में भी छत्तीसगढ़ी बोलियों का ही व्यवहार किया जाय. प्रशासनिक एवं वैधानिक कार्यवाहियों में भी छत्तीसगढ़ी  का ही प्रयोग किया जाय.
७- डॉक्टर विजय सोनी, रायपुर- वैधानिक शब्दावली का निर्माण व प्रकाशन किया जाय. 
८- डॉक्टर मन्नूलाल यदु, रायपुर-  छत्तीसगढ़ी भारत की सबसे प्राचीन बोली है इसलिए इस प्रांत के सभी निवासियों को अपनी बोली में ही अपना अभिव्यक्तिकरण करना चाहिए.
९- पंडित दानेश्वर शर्मा जी, रायपुर-  छत्तीसगढ़ के सभी शासकीय अधिकारियों / कर्मचारियों को छत्तीसगढ़ी  में बोलना एवं कार्य करना अनिवार्य किया जाय और इसके लिए एक न्यूनतम अर्हता परीक्षा पास करना अनिवार्य किया जाय अन्यथा इसकी उपेक्षा करने पर उनकी एक-एक वेतन-वृद्धियां रोककर उन्हें दण्डित किया जाय. छत्तीसगढ़ी को राज-काज की भाषा बनाया जाय.
१०- लक्ष्मण मस्तूरिया, रायपुर-  छत्तीसगढ़ी बोली व साहित्य के प्रचार के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में  बाहरी लोगों द्वारा आकर लगाए गए उद्योगों के लायसेंस रद्द किये जाने चाहिए और अन्य प्रान्तों से आकर बसने वालों द्वारा भूमिक्रय करने  पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए. 


         और अंत में  छत्तीसगढ़ीसाहित्य समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु द्वारा एक त्रिसूत्री प्रस्ताव रखा गया जिसे  सर्व सम्मति से पारित किया गया. प्रस्ताव के बिंदु हैं -


१- राज्य में छत्तीसगढ़ी भाषा को एक विषय के रूप में प्राथमिक से लेकर १२     वीं तक के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.
२- विधायकों को छत्तीसगढ़ी में बोलने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.
३- विधानसभा की कार्यवाही छत्तीसगढ़ी में करना अनिवार्य किया जाय.  


इस विमर्श में किसी वक्ता द्वारा यह कहे जाने पर कि भाषा के मामले में हमारे नेताओं को राजठाकरे जैसा आचरण अपनाना चाहिए,विधान सभा सचिव देवेन्द्र वर्मा ने उनके वक्तव्य की स्पष्ट शब्दों में निंदा की. एक बात और भी देखने में आयी कि सम्मलेन के अनंतर मेरी आँखें राहुल जी, हबीब जी, पावला जी आदि को खोजती रहीं पर कोई भी ब्लॉग साहित्यकार वहाँ दिखाई नहीं दिया. "साहित्यिक कबीलाई सम्प्रदाय" की भरपूर झलक यहाँ भी दिखाई दी. फिर भी, उपस्थित विद्वान वक्ताओं के वक्तव्यों से कुछ बातें उभर कर सामने आयी हैं जिन पर पुनः मंथन किये जाने की आवश्यकता है 


१-  छत्तीसगढ़ के शिक्षित लोगों में छत्तीसगढ़ी बोली के प्रति जागरूकता नहीं है ( तो इसका कारण खोजा जाना चाहिए था जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया ).
२-  छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण अभी तक नहीं किया गया और इस बोली में व्याकरणीय निष्ठता का भी अभाव है.
३-  छत्तीसगढ़ी साहित्य कई दृष्टियों से स्तरीय नहीं बन पाया है (इसका उत्तरदायित्व किस पर है ?)
४- मौलिक लेखन की कमी, लोकव्यापी शब्दों का अभाव एवं शासन की उपेक्षा.
५- कुछ लोगों को लगता है कि मराठी की तरह छत्तीसगढ़ी को भी पूरे प्रान्त वासियों पर लाद देने से भाषा का विकास अवश्यम्भावी है. 
६- एक खतरनाक विचार यह भी है कि छत्तीसगढ़ के दरवाजे अन्य प्रान्त के लोगों के लिए बंद कर दिए जाने चाहिए...कदाचित भाषा के विकास में इसका भी कोई योगदान होता होगा.   


भाषा है केवल अभिव्यक्ति का माध्यम .....क्षुद्र राजनीति का हथियार नहीं. किसी भाषा के विकास एवं लोकव्यापीकरण के लिए आवश्यक तत्वों पर जो भाषा वैज्ञानिक विमर्श अपेक्षित था कदाचित छत्तीसगढ़के लोगों को अभी उसके लिए और प्रतीक्षा करनी होगी. तथापि सुधीजनों से मैं उनका अभिमत व्यक्त करने का सादर अनुरोध करता हूँ. 


  

2 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा ...आपके बात बहुत सार्थक हे...हमे अपनी बोली..भाषा का सम्मान करना चैये..उसको आदर देना चाहिए.............पर बाबा ..इस चक्कर में हमारी मात्रभाषा का क्या..मुंबई वाले .....मराठी...में लिखेंगे बोलेंगे...गुजराती वाले गुजराती में......पंजाबी वाले पंजाबी में......तो हिंदी कोण बोलेगा,...सिर्फ ..दसवीं कक्षा तक मात्र हिंदी विषय का मास्टर .........हम सब को पुरज़ोर कोशिश करनी चाहिए के हम हिंदी को प्रथम स्थान दे ...मैं पिछले साल गुजरात गयी...वहाँ दुकाओं पर या तो गुजराती में लिखा था या इंग्लिश में....हिंदी थी ही नही...यही हाल पंजाब ..मराठी...और बाकी जगहा का हे ... कोई भी क्षत्र ...व्यक्ति ...बोली ...जाती...देश से बड़ी नही होनी चाहिए

    हाँ..हमे अपनी माँ बोलियों को ज़िंदा ज़रूर रखना चाहियी..उनका आदर लर्न चाहिए..बोलना चाहिए..पर अपनी मात्रभाषा की कीमत पर नही.

    और हाँ............ये मेरे अपने विचार हैं...हर व्यक्तिविशेष के अपने अपने विचार होना स्वाभाविक हे....मेरे उद्देश्य किसी के विचारों को गलत ठहराना ..या कहना..या भावों को ठेस पहुँचाना नही हे

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  2. भारत का इतिहास ही ऐसा रहा है कि आज हम एक आरंभ में सीधे-साधे धागे समान समय के जाल में उलझ के रह गए प्रतीत होते हैं, चारों दिशा से बंधे हुए, हर क्षेत्र मैं सदियों से व्याप्त विविधता के कारण, भले ही वो धर्म हो अथवा भाषा, अन्यथा कुछ और जैसे "इसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से अधिक सफ़ेद कैसे!"...

    उलझे धागे को जिसने सुलझाया हो कभी वो ही कह सकता है कि इस में कितना धैर्य और समय आवश्यक होता है,,,गलत खींचो तो उलटे, सुलझने की जगह, गांठें पड़ जाती हैं ,,,किन्तु आज किसी के पास समय ही नहीं है,,,हम चाहते हैं कि यदि अमेरिका में कुछ 'झुनझुना' है, (जो उन्होंने सदियों की तपस्या के बाद पाया हो), तो वो भारत में भी जादू का डंडा घुमाने समान तुरंत अभी क्यूँ नहीं??

    यह विश्वास करना ही कठिन है कि इसी देश कि मिटटी में कभी तपस्वी, योगी, ऋषि, सिद्ध पुरुष, आदि रहे होंगे जो पानी में चलते होंगे, हवा में उड़ सकते होंगे (हनुमान समान), अथवा एक जगह से गायब हो किसी दूसरी जगह,,, बिना मोटर कार, हवाई जहाज आदि के जो फिर भी समय लेते हैं,,, पलक झपकाते ही पहुँच सकते होंगे! यदि यह संभव है मानव के लिए तो आज हम क्यूँ मकड़ी के जाले में फंसे किसी पतंगे समान हाथ पैर मार उसमें और फंसते चले जाते हैं???
    प्राचीन हिन्दू इसे केवल दृष्टि का दोष (माया) बता गए...इसे उन्होंने ऐसा ही जाना जैसे हम किसी फिल्म की रील को बिना आरंभिक स्तिथि में लाये अंत से आरंभ की ओर देखना शुरू करदें!

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.