शनिवार, 23 अप्रैल 2011

पतझड़ के बाद



उन्हें 
अच्छी तरह पता है 
कि झूठी तारीफ़ की है उन्होंने 
एक दूसरे की..............
फिर भी 
दोनों खुश हैं 
अपनी-अपनी तारीफों से.
दर असल .............
तारीफ़ के लायक 
कुछ है ही नहीं उनके पास 
अगर कुछ है भी 
तो वह है एक भूख ....
प्यार की सनातन भूख 
जिसके बिना ज़िंदगी 
कितनी मुश्किल होती है
यह समझना 
कतई मुश्किल नहीं है .
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औरों की तरह 
उनकी भी चाहत थी ..........
आकाश में उड़ने की 
वे जिस पेड़ पर रहते थे 
उस पर ...असमय ही 
पिछले पतझड़ के बाद 
फिर कभी नहीं उगे 
नए पत्ते. 
जो पुराने थे 
टूट कर गिर चुके हैं 
गिर कर बिखर चुके हैं 
उन्हें समेट कर 
कोई कैसे चिपका ले 
अपनी शाखों से ?
अब तो 
वसंत की कल्पना ही करनी होगी 
प्रति वर्ष  
वसंत का उत्सव भी मनाना होगा 
बिना ..............
वसंत के आगमन के ही. 
जीने के लिए 
हर्ज़ नहीं है
झूठे उत्सव मनाने में  
इतने असत्य से 
पाप नहीं लगेगा,
आपको 
मेरा इतना विश्वास करना ही होगा
क्योंकि पतझड़ के बाद भी 
ख़त्म नहीं हो जाता जीवन.