गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

.............ताकि जान न पाए कोई


रात
गहरी ......
और गहरी होती जा रही है 
पर घड़ी के काँटे       
चूकते नहीं टोकने से 
कहते हैं ......... 
रात .....?
वह तो कब की गुज़र गयी 
अब तो शुरू हो चुका है ......
नया दिन .
रात बारह बजे के बाद से
बदल गयी है तारीख. 
रात में ही शुरू हो चुका है .......
नया दिन .
कमाल है ....
तारीख बदल गयी
बिना सूरज की इजाज़त के ही ?
तो क्या मैं समझूं ............
कि अँधेरे में ही 
शुरुआत हो जाती है
नए दिन की !  
मैं 
इस गणित को 
कभी समझ नहीं पाया 
कभी नहीं .....
क्या तारीखों के साथ  
बदल जाते हैं
दिन भी.......... 
आधी रात को ही ?
....ताकि जान न पाए कोई 
तारीखों ने क्या गुल खिला दिए हैं
रात के अँधेरे में, 
क्योंकि 
बेखबर रहती है दुनिया
उस समय 
बदलते हुए इतिहास से.