रविवार, 24 अप्रैल 2011

आस्था का संकट


     वाणी ईश्वर का अनमोल वरदान है. इसकी वैज्ञानिकता जटिल और अद्भुत है, इसीलिये इसके रचयिता के प्रति नत मस्तक होना पडा था महाकवि कालिदास को -

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये. 
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ .  

      पुस्तक वाचन की प्रक्रिया में अक्षर (लिपि) से वाणी और वाणी से अर्थ तक की यात्रा मस्तिष्क की जटिल प्रक्रियाओं में से एक है और अद्भुत भी. 
     अक्षर को 'ब्रह्म' कहा है ज्ञानियों ने, यह ऊर्जा का स्थितिज (potential ) रूप है .....वाणी इसका गत्यात्मक (kinetic) रूप है, मन्त्र की शक्ति का यही रहस्य है. मन्त्र सिद्धि की प्रक्रिया स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में रूपांतरित करने की प्रक्रिया है ....किन्तु इस विषय पर फिर कभी. अभी तो वाणी पर ही चर्चा अभीष्ट है.
      कभी ध्यान दिया है आपने, भाषण देते या वार्ता करते समय जब शब्द या विचार कहीं खो से जाते हैं तो 'अs' या 'ऊँ s s s ' के सम पर अटक कर कुछ खोजते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं हम सब ......यह एक सहज मानवीय अभ्यास है . किन्तु प्रश्न यह है कि 'अ' या 'ऊँ' ही क्यों ? कोई अन्य अक्षर क्यों नहीं ? 
     मानवीय वाणी की शरीरक्रिया (physiology of the speech), मानव की सर्व प्राणियों में श्रेष्ठता, स्वर और भाषा की वैज्ञानिकता तथा ईश्वर की रचना-क्रिया के मध्य एक निश्चित सम्बन्ध है. इस सम्बन्ध के चिंतन......विश्लेषण में जब डूबते हैं तो आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहा जाता. 
     जो संस्कृत एवं आर्य भाषाओं में 'अ' है वही रोमन भाषाओं में 'A ' के रूप में है. मध्य एशिया की भाषाओं में वही 'अलिफ़' है तो ग्रीक भाषा में वही 'अल्फा' बन कर प्रकट होता है. 
     'अ' आदि है - भाषा का ....स्वर का ....सृष्टि का. 'अ' के अतिरिक्त शेष सभी अक्षर अपूर्ण हैं. 'अ' के मिलने से ही पूर्ण होते हैं सब. 
    'अ' आदि है और अंत भी; 'अ' जीवन है और मोक्ष भी; 'अ' स्वीकार है और निषेध भी; 'अ' पूर्ण है और पूरक भी. 'अ' अन्धकार में प्रकाश है. अटकने-भटकने पर यही 'अ' मार्ग देता है ....आगे बढ़ने का सेतु बनकर.
    'अ' से प्रारम्भ होकर 'अ' में ही विलीन हो जाती है सृष्टि. ब्रह्म है यह, ॐ भी, अल्लाह और आमीन भी. कभी यह आश्चर्यचकित करता है हमें ...और कभी रहस्य प्रकट करके समाधान भी करता है.
    देश, जाति, धर्म, रीति......नीति सबसे अप्रभावित 'अ' अखंड है ...अनंत है. चाहकर भी कोई त्याग नहीं सकता इसे.       
      सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गति देने वाला 'अ' सभी को एक सूत्र में पिरोकर बाँधता है. आश्चर्य है,   फिर क्यों बँट गए लोग ...देश के नाम पर ...भाषा के नाम पर ....जाति के नाम पर .....?  
      'अ' की ऊर्जा के अभाव में किस पूर्णता को पाया जा सकेगा ? 
....नहीं ...ब्रह्म के टुकड़े नहीं हो सकते, अखंड को खंडित नहीं कर सकते आप ....जन्म से मृत्यु के मध्य ....कभी नहीं. तब .......? क्यों झगड़ते हैं लोग ..........? क्यों होता है रक्तपात .........? क्यों होते हैं युद्ध ..........? क्यों होती है अनास्था ..........? क्यों उगते हैं वाणी में कंटक .........? प्रेम क्यों नहीं झरता वाणी से ...? वह भी तो हमारे ही हाथ में है न ! 
    हाँ ! यह अहम् है ...निज का अहम्............खंड का अहम् ........अखंड की सत्ता को स्वीकार न करने का अहम्. इसी अहम् की रक्षा के लिए बनते और टूटते हैं देश, बँटते हैं लोग ...और बिगड़ते हैं सम्प्रदाय. आज,  भूमंडलीकरण के इस युग में यदि 'अ' की आस्था से डिग गए हम .....तो हमारा अंत अधिक दूर नहीं रह जाएगा. ............और इस बार जब प्रलय होगी तो व्यापक होगी वह. 
    आस्था के संकट से उबर कर बाहर आना होगा सबको-  जीवन की रक्षा के लिए .....जीवन की सुन्दरता के लिए .......ईश्वर की सृष्टि के लिए. और इसके लिए सहज-सरल उपाय है वाणी की मधुरता.