रविवार, 16 अक्तूबर 2011

महात्मा के ब्रह्मचर्य प्रयोग ..

 आज की पोस्ट वस्तुतः एक टिप्पणी है जो "प्रवक्ता" पर शंकर शरण के प्रकाशित एक आलेख - "महात्मा के ब्रह्मचर्य प्रयोग .." पर दी गयी है . टिप्पणी आप सबके वैचारिक मंथन हेतु प्रस्तुत है. इस 'टिप्पण्यात्मक पोस्ट' पर आपकी टिप्पणियों का स्वागत है .....न चाहते हुए भी विकल्प को आज खोलना पड़ रहा है. लोग अन्यथा न लें अगली पोस्ट में फिर बंद कर दूंगा.   

भारत एक धार्मिक-आध्यात्मिक देश रहा है, जहाँ किसी चमत्कारी या अवतारी शक्ति में जनमानस को संगठित करने की स्वाभाविक शक्ति निहित रही है. भारतीय जनमानस की इस दुर्बल मानसिकता का लाभ भारतीय अवसरवादियों ने सदा उठाया है. स्वतंत्रता आन्दोलन के समय भी दुर्बल होती कांग्रेस के भविष्य के प्रति स्वयं गांधी भी चिंतित थे ..अंततः उन्हें यह घोषणा करनी पडी कि आज़ादी के बाद कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए. किन्तु स्वतंतत्र भारत के अवसरवादी नेताओं को ऐसा करना अपने भविष्य पर खतरे को आमंत्रित करना लगा जो उन्हें किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं था. अपनी साख खोती कांग्रेस को किसी चमत्कारी व्यक्तित्व के रूप में गांधी और उसके बाद नेहरू (और अब सोनिया ) की सख्त आवश्यकता थी. समय की मांग के अनुरूप अवसरवादी लोगों ने चमत्कारी व्यक्तित्व गढ़े.....यह परम्परा आज भी कायम है. गांधी की ह्त्या ने उन्हें तत्कालीन विवादों से ऊपर उठाकर अनायास ही महान या अवतारी व्यक्ति की श्रेणी में लाकर खडा कर दिया. गांधी यदि स्वाभाविक मौत मरते तो शायद कांग्रेस उनकी ऐसी छवि इतनी आसानी से नहीं बना पाती. कांग्रेस को नाथूराम का कृतज्ञ होना चाहिए जिसने उनका अवसरवादी लक्ष्य आसान कर दिया. 

गांधी के काम संबंधी प्रयोग अनोखे रहे हैं. चूंकि वे महान थे इसलिए उनका सब कुछ महान था...१७ वर्ष की कुमारी कन्या, जिसे हम भारतीय 'शक्ति' का अवतार मानकर पूजते रहने के अभ्यस्त हैं, को निर्वस्त्र हो कर अपने साथ सोने के लिए तैयार कर लेना भी महान था, बकरी पालना और उसे अंगूर खिलाना भी महान था....अपने पुत्रों को औपचारिक शिक्षा से वंचित किये जाने का निर्णय थोपना भी महान था...उनके महान कार्यों की सूची अनंत है. दुःख यही है कि उनके पुत्र उनकी इस महानता को समझ नहीं पाए......और उनकी पारिवारिक तानाशाही में छिपे अहिंसा के तत्व को अपने जीवन में शामिल नहीं कर पाए.

जब हम ब्रह्मचर्य संबंधी प्रयोगों की बात करते हैं तो एक आकर्षक लोक में अनायास ही पहुँच जाते हैं. प्रयोग का उद्देश्य, सिद्धांत, उपकरण, विधि, विश्लेषण और फिर उसका परिणाम सब कुछ किसी भी अनुसंधानकर्ता के लिए परीलोक की सैर जैसा लगने लगता है. तब प्रयोगकर्ता के लिए कितना आकर्षक रहा होगा यह सब ....सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

हमारे देश में ब्रह्मचर्य के लिए साधना की गयी है पर कभी इस तरह के प्रयोग नहीं किये गए जिसमें उपकरणों के रूप में जीवित मनुष्य का उपयोग किया जाय.  उपकरण को प्रयोगकर्त्ता की आवश्यकता के अनुरूप स्तेमाल होना होता है, उसका अपना चैतन्य अस्तित्व नहीं रह जाता.....साधन के रूप में उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती ....वह मात्र साधन भर होता है. 

यह कहा जा सकता है कि इस प्रयोग में साधन भी चूंकि जीवित प्राणी है अतः यह प्रयोग दोनों पक्षों द्वारा दोनों पक्षों के लिए है. बचाव में एक अनुमान यह भी किया जा सकता है कि गांधी प्रयोगकर्त्ता होकर साधन के रूप में कुमारी लड़कियों का और साथ ही कुमारी लड़कियाँ प्रयोगकर्त्ता होकर साधन के रूप में गांधी का स्तेमाल करती थीं. दोनों ओर से एक दूसरे पर प्रयोग चलते रहे होंगे . पर एक मौलिक बात यह है कि हर प्रयोग सफल हो यह आवश्यक नहीं....हर प्रयोगकर्ता अपने लक्ष्य तक पहुंचे यह भी आवश्यक नहीं. गांधी वय और वैचारिक रूप से लड़कियों की अपेक्षा अधिक वरिष्ठ एवं अनुभवी थे.....हो सकता है कि गांधी अपने प्रयोगों में सफल रहे हों पर उन लड़कियों का क्या जो इतनी अनुभवी नहीं थीं ? क्या लड़कियाँ भी ब्रह्मचर्य के इस प्रयोग में सफल रही होंगी ? यह प्रश्न इसलिए उठना स्वाभाविक है क्योंकि यह अनोखा प्रयोग केवल दैहिक स्तर पर ही नहीं अपितु मानसिक स्तर पर भी अपने स्वाभाविक एवं अनिवार्य परिणाम देने वाला था. यदि गांधी को एक अवतारी पुरुष मान लिया जाय तो उनके लिए यह सब "लीला" होने के कारण साधारण सी बात रही होगी  ....वे अपने प्रयोग में शत-प्रतिशत सफल भी हुए होंगे पर लड़कियाँ तो निश्चित ही अवतारी नहीं थीं ...इन प्रयोगों में लड़कियों के मनो-दैहिक परिणामों का आकलन किसने किया ? यदि नहीं किया तो क्यों नहीं किया ? इस दृष्टि से यह एक अत्यंत क्रूर प्रयोग कहा जा सकता है और किसी भी सभ्य समाज में इस प्रकार के प्रयोग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. कोई भी प्रयोग तब किया जाता है जब परिणाम सुनिश्चित न हो.....अवधारणा के प्रति शंका हो. निश्चित ही गांधी को अपने ब्रह्मचर्य के प्रति शंका थी जिसकी पुष्टि के लिए ऐसे अमानवीय प्रयोग मासूम लड़कियों पर किये गए. गांधी के व्यक्तिगत जीवन के बहुत से कार्य और निर्णय उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं.  




5 टिप्‍पणियां:

  1. इस दृष्टि से यह एक अत्यंत क्रूर प्रयोग कहा जा सकता है और किसी भी सभ्य समाज में इस प्रकार के प्रयोग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

    बहुत खूबसूरत महोदय ||
    बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. Gandhi ji apne prayogon mein safal rahe ya nahin, ye to koi nahin janta. aise prayog aprakritik zaroor hain. Gandhi ji ke kuchh siddhant unke apne liye sahi ho sakte sabke liye nahin. unki jivan shaili aur vichaar prerak to zaroor hain, bhale hin aam jan ke liye sahaj na ho. vichar purn lekh, dhanyawaad.

    उत्तर देंहटाएं
  4. डॉक्टर कौशलेन्द्र जी, सोचने वाली बात यह है कि इतने बड़े, अनंत ब्रह्माण्ड के शून्य में हमारी बीच में मोटी और किनारे की ओर पतली, अनंत आकार वाली सुदर्शन-चक्र समान दिखने वाली गैलेक्सी, और उसके भीतर उसके बाहरी ओर अवस्थित सौर-मंडल के एक छोटे से सदस्य पृथ्वी ग्रह में हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? किस लिए आये हैं? और हमारी मन की आँख में स्वप्न कहाँ से और क्यूँ दीखते हैं - हमें मानवों को ही नहीं अपितु निम्न स्तर के कई पशुओं में भी? और यह ही नहीं, जागृत अवस्था में भही प्रतिपल विचार कहाँ से आते हैं?
    इसी लिए हमारे पूर्वजों के माध्यम से प्रश्न पूछा गया है, "मैं कौन हूँ?" और उत्तर भी दिया गया है, "शिवोहम!" "तत त्वम् असी!"...उन्होंने तो शिव अथवा परम सत्य को पा भी लिया! और हम कलियुगी प्राणी असत्य में ही उलझे हुए हैं, वैसे ही जैसे मकड़ी के जाल में उसका भोजन, एक कीड़ा! और हम भी भोजन की श्रंखला में शीर्ष स्थान पर हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  5. Better go through this new book – “Gandhi ke brahmacharya prayog” (Delhi: Rajpal and Sons, 2012), it is really very interesting and revealing. Everything the author has said is through Gandhi’s own narrations and comments!
    There is no other book like it so far on this subject.



    Price: Rs 250.00
    ISBN: 9789350640814
    Author: शंकर शरण
    Publisher: Rajpal and Sons
    Language: Hindi
    Pages: 152

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.