बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अबय और खेलओ होरी

 
काये कों चुप गोरी इतैं आओ री, मन मोरे बसीं, ना कितैं जाओ री।
बात सुनी कछु अँखियन मोरी, खोयी-खोयी लागय तू मोहें और भोरी॥
 
 
कैसे आये अमवा में बौर सखी, बन्दी तेरी देहिंया में फागुन री !
गैल-गैल फैल गयी अब बात री, छोड़ दै फगुना तू, मोरी मान री !



 पोर-पोर तोरे फागुन झूमय, झूम रहे लख-लख होरियारे।

  चढ़ी अटरिया गोरी बोलावय, अइयो न कोऊ मोरे द्वारे॥ 
 
 
रंग डारबें को आयीं, रंग डरबाबें आयीं।
     रंग डारियो ना मों पै, झूठ-मूठ बोलन आयीं॥  


 

मुड़-मुड़ नैन सों सैन चलावे, मौन अधर सों राग सुनावे।
नैनन सों जब दयी पिचकारी, बीच सखियन कें लाजन मरी॥  
 
 
रंग डारियो ना मों पै, सैन सों बुलावे गोरी।



मोरे रंग डूबी बोली, अबय और खेलओ होरी॥



लाज सों गाल रंगे देख कें, आय गयो फागुन जरन मारे।
तन-मन सें तू कुबेर गोरी, फागुन संग काये कों रार तोरी॥
 
 

 
गोरी-कारी-साँवरी, सब होरी में है गयीं बाबरी।
नेक ठहर, मत एक झलक दै मोरी गली सें जाओ री ॥
 

होरी हैssssssssss

 

 

5 टिप्‍पणियां:

  1. same holi - same background pictures are here also

    http://girijeshrao.blogspot.in/2011/03/blog-post_8644.html

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  2. अभी और खेलौ होरी..
    कविता से माहौल बनना शुरू हो गया फागुन का यहा भी ...नहीं तो आज केएल महानगरो मे होली का मतलब सिर्फ एक अवकाश का दिन भर बस है॥

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.