गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

ये कौन मूर्तिकार है.....



ये कौन मूर्तिकार है ......


ये कौन मूर्तिकार है जो अर्थ को है गढ़ रहा

अमूर्त को बना रहा, मूर्त को सजा रहा  


दृष्य में कहाँ धरा जो दृष्टि में है खिल रहा।

ये कौन मूर्तिकार है जो अर्थ को है गढ़ रहा॥

 


ये राग भी विराग भी ये साज को बजा रहा।

ये कौन मूर्तिकार है जो अर्थ को है गढ़ रहा॥


रूप भी विरूप भी ये कैसी सृष्टि रच रहा।

ये कौन मूर्तिकार है जो अर्थ को है गढ़ रहा॥


3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक ही तो है वो जिसने हम सबको भी गढा है....
    बहुत सुन्दर चित्र..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.