सोमवार, 14 जनवरी 2013

धर्म और समाज


             प्रभाव किसका - धर्म का या अपनी व्याख्या का?

   इक्ष्वाकुवंशी राजा ‘दण्ड’ द्वारा दैत्यगुरु शुक्राचार्य की कन्या ‘अरजा’ के बलात्कार के अपराध में शुक्राचार्य के श्राप के परिणामस्वरूप श्रीहीन हुये उनके राज्य “दण्डकारण्य” के उत्तरी छोर पर (वर्तमान शासन द्वारा निर्मित) नव जनपद ‘कांकेर’ में एक ब्राह्मण रहते हैं। लोग उन्हें विद्वान शिक्षक के रूप में जानते हैं, शासन की सेवा से निवृत्त होने के पश्चात् अब वे ‘बहाईधर्म’ का प्रचार करने और हिन्दुओं को ‘बहाईधर्म’ में धर्मांतरित होने के लिये प्रेरित करने के कार्य में अपना शेष जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
   इसी श्रापित दण्डकारण्य की उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तर-पूर्वी सीमा को स्पर्श करते दो जनपदों में दो मुसलमान रहते हैं जो तुलसीकृत रामचरित मानस के “रामायणी कथा-वाचक” के रूप में विख्यात हैं। वे कथावाचक हैं, राम के आचरण के अनुशीलन के लिये तो लोगों को प्रेरित करते हैं किंतु किसी को धर्मपरिवर्तन के लिये नहीं।

        ऐसा क्यों है कि भारत की धरती से बाहर के आयातित धर्मों के सम्पर्क में आने के बाद धर्मप्रचारकों के जीवन का उद्देश्य दूसरों का धर्मांतरण कराना हो जाता है जबकि भारतीय धर्म के सम्पर्क में आने के बाद प्रभावितों के जीवन का उद्देश्य आचरण अनुशीलन के लिये लोगों को प्रेरित करना हो जाता है? एक विस्तारवादी बन जाता है तो दूसरा सौम्य और उत्कृष्ट मानवीय गुणों का सन्देशवाहक। यह धर्म विशेष की शिक्षाओं का प्रभाव है या व्यक्ति विशेष की धर्म के बारे में अपनी निजी व्याख्याओं का?

                    भारतीय समाज की चिंता का विषय

  अच्छे लोग अच्छे विचारों को समाज में परम्परा के रूप में सुस्थापित करने का प्रयास करते हैं। बड़े प्रयत्न के पश्चात् जब परम्परायें सुस्थापित हो जाती है तो सुविधाभोगी और विचारशून्य लोग परम्पराओं को विकृत करना प्रारम्भ कर देते हैं, तब अच्छी परम्परायें रूढ़ हो कर पाखण्ड में परिणित हो जाती हैं।
   यह समाज के बुद्धिजीवियों का उत्तरदायित्व है कि वे निरंतर विचारों और परम्पराओं का परिमार्जन करते रहें जिससे कोई परम्परा रूढ़ और विकृत होकर पाखण्ड न बन जाय, किंतु यदि ऐसा हो ही जाय तो उन्हें खुल कर ऐसे पाखण्डों के समूल उच्छेद के लिये कटिबद्ध हो जाना चाहिये। समाज के पतन के लिये असुरवृत्ति के मनुष्य तो उत्तरदायी हैं ही, बुद्धिजीवियों की वैचारिक शिथिलता भी संतुलन न बना सकने के कारण तुल्यकोटि में उत्तरदायी है। दुर्भाग्य से,  आज इस संतुलन की दिशा में लोगों की कटिबद्धता और समर्पण का अभाव समाज की एकता और देश की अखण्डता के लिये चिंता का विषय बन गया है।

धर्म और समाज

4 टिप्‍पणियां:

  1. समाज के विकास के लिए परम्पराओं का सतत परिमार्जन बहुत आवश्यक है...बहुत सारगर्भित आलेख..

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  2. chintayein bahut hain, lekin sab apne apne swaarth siddh kar rahe hain |

    jinhe kaanoon banaane hain - unme iccha shakti nahi

    jinme icchha shakti hai - ve raajneeti kee gandagi me jaate nahi - to gandagi saaf ho kaise ?

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  3. धर्म का प्रचार-प्रसार तभी किया जाता है जब धर्म पतनोन्मुख हो। विवेकी पुरुष केवल अपनी बात कहते हैं,निर्णय श्रोता पर ही छोडते हैं। यह देखते हुए कि सभी धर्मों की शिक्षाएं एक-सी हैं,कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कोई रूपांतरित हो रहा है या नहीं। धार्मिकता उसके भीतर आई या नहीं,असली बात यह है।

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  4. कुमार जी! निश्चित ही हमारे आचरण में धार्मिकता के अभाव से उत्पन्न सामाजिक अधोपतन की स्थिति में धर्म की शिक्षाओं के उपदेश की अधिक आवश्यकता होती है। किंतु मैं ऐसा मानता हूँ कि धार्मिकता के कुछ तत्व देश-काल और वातावरण की विशेषताओं से निर्धारित होते हैं इसलिये सभी धर्मों के उपदेशों में कुछ भिन्नतायें भी होती हैं, आम आदमी का ध्यान समानताओं पर कम और भिन्नताओं पर ही अधिक जाता है। कोई धर्म अहिंसा की बात करता है तो कोई तलवार की, कोई जीवन के आचरण की शुद्धता पर ध्यान देने की बात करता है तो कोई जीवन में उपभोग को ही जीवन का चरम लक्ष्य मानकर चलता है। धर्म को आधार बनाकर धरती पर रेखायें खीची जाती हैं और नये-नये देश अस्तित्व में आ जाते हैं। धर्म के नाम पर होने वाली हिंसायें अन्य हिंसाओं की अपेक्षा अधिक होती हैं। यह धर्म है जिसके पाखण्ड से परेशान होकर इसे अफीम की संज्ञा दी गयी। यह धर्म है जो समाज को आगे ले जाता है। यह धर्म है जो समाज को सदियों पीछे का जीवन जीने के लिये विवश करता है। आपकी यह बात सही है कि मुख्य बात आचरण में धार्मिकता के आने की है। किंतु कैसी धार्मिकता? क्या तालिबानी धार्मिकता? वास्तव में धर्म के नाम पर मनुष्य न जाने कब से छला जाता रहा है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ यह छलावा भी बढ़ा है। ऐसे ही छद्म धर्मों के नाम पर पूरे विश्व में आतंक की गहरी काली चादर फैली हुयी है। असली धर्म तो भीतर से उपजता है जो रेखायें खीचता नहीं बल्कि उन्हें मिटाता है।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.