बुधवार, 25 नवंबर 2015

किसका धर्म ! कैसा धर्म !


      मन्दिर में मूर्तियों और आभूषणों की चोरी करने वाले धार्मिक हैं या अधार्मिक ? उत्कोचप्रेमी (रिश्वतखोर) अधिकारी धार्मिक हैं या अधार्मिक ? देश और भगवान को ठगने वाले नेता धार्मिक हैं या अधार्मिक ? मिलावट और जमाखोरी करने वाले व्यापारिक धार्मिक हैं या अधार्मिक ? दूध में पानी मिलाने वाला ग्वाला धार्मिक है या अधार्मिक ? छेड़छाड़ से लेकर सामूहिक यौनौत्पीड़न करने वाले ‘मासूम’ धार्मिक हैं या अधार्मिक ? बाबा रामपाल, आसाराम और सुखविन्दर कौर जैसे प्रवचनकर्ता धार्मिक हैं या अधार्मिक ? पाकिस्तान जाकर अपने देश के प्रधानमंत्री को हटाने की याचना करने वाले सांसद मणिशंकर अय्यर धार्मिक हैं या अधार्मिक ? भैस का चारा खाने वाले लालू धार्मिक हैं या अधार्मिक ? देहव्यापार करने वाली लड़कियाँ धार्मिक हैं या अधार्मिक ?    

      दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिये जिनके चौखट की मिट्टी उठायी जाती है मैं उन्हें इन सबकी अपेक्षा कहीं अधिक धार्मिक मानता हूँ ?

    धर्म की कसौटी पर परखेंगे तो भारत की बहुसंख्य जनता आस्तिक और धार्मिक नहीं बल्कि अनास्तिक और अधार्मिक ही प्रमाणित होगी फिर भी उनका नाम हिन्दू धर्म से जुड़ा हुआ है । जबकि वास्तव में धर्म से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता ।
मुम्बई बमकाण्ड जैसी कई आतंकी घटनाओं के अपराधी एवं उनके पक्षधर, कश्मीर में पाकिस्तानी झण्डे लहराने वाले मुसलमान, कभी भारत तो कभी पश्चिमी बंगाल को इस्लामिक देश बनाने की माँग करने वाले अतिवादी, इस्लाम के नाम पर पूरी दुनिया में मानवीयता की क्रूर हत्यायें करने वाले ज़िहादी, सीरिया में स्त्रियों को वस्तु समझकर उनके साथ पाषाणी व्यवहार करने वाले लोग निश्चित ही धार्मिक लोग नहीं हो सकते फिर भी उनका नाम धर्म से जुड़ा हुआ है जबकि वास्तव में धर्म से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता ।
सही अर्थों में धार्मिक शायद बहुत कम मिलेंगे किंतु वे तथाकथित रूप से किसी न किसी धर्म की आड़ लेकर चलने में विश्वास अवश्य रखते हैं ।
धर्म की अवधारणा यहाँ निष्प्राण हो चुकी है । यह भीड़ है जो धर्म का शव लेकर भागी चली जा रही है । इस भीड़ में हम सब सम्मिलित हैं हिंदू, मुसलमान, ईसाई ....कोई छूटा नहीं है ।
यह भीड़ जो उग्र होती जा रही है, यह भीड़ जो जयचन्द बनने पर आमादा है, यह भीड़ जो मणिशंकर अय्यर है, यह भीड़ जो घृणा के नये-नये शब्द गढ़ने में दक्ष है,  यह भीड़ जो राम और गंगा को बेचती है, यह भीड़ जो बड़े गर्व से अपने पूर्वजों को दिन-रात गरियाती है, यह भीड़ जो नरसंहार करके दुनिया पर हुक़ूमत करने के सपने देखती है, यह भीड़ जो 72 हूरों के लोभ में फ़िदायीन बनती है .... इस भीड़ का कोई धर्म नहीं होता ।
यह अधार्मिक भीड़ धर्म का व्यापार करती है, यह अधार्मिक भीड़ सपने देखती है, यह अधार्मिक भीड़ नकली दवाइयाँ बनाती है, यह अधार्मिक भीड़ मिलावट करती है, यह अधार्मिक भीड़ घातक हथियार बनाकर बेचती है, यह अधार्मिक भीड़ नरसंहार करती है ...


इस भीड़ का कोई धर्म नहीं होता ........ किंतु इस भीड़ का एक समुदाय अवश्य होता है । 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - गुरु पर्व और देव दीपावली की हार्दिक बधाई। में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. भीड़ का कोई धर्म नहीं होता, किंतु इस भीड़ का एक समुदाय अवश्य होता है.. सटीक कहा आपने। .
    धर्म का मर्म कितने लोग समझते हैं, यह उंगुलियों में गिनने लायक होगे। ..

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  3. आभार हर्षवर्धन जी ! धन्यवाद कविता जी !
    आप लोगों ने समय निकालकर लेख पढ़ा और संदेश को यथावत् समझा !

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.