बुधवार, 4 मई 2011

धर्म चिंतन ........2


पिछली बार हमने लौकिक धर्म पर कुछ चर्चा की थी. सुज्ञ जी ने सार रूप में धर्म को लोक स्व-भाव कहा. यह सूत्र ज्ञानियों के लिए है. अभी ओसामा-बिन-लादेन के मारे जाने के पश्चात प्रसंगवश इस "स्व-भाव" पर पुनः चर्चा की आवश्यकता है. अस्तु .......
     
पिछली बार धर्म के प्रसंग में भौतिक शास्त्र के अनुसार ब्रह्माण्ड के स्व-भाव पर चिंतन किया गया था. जब हम स्व-भाव की बात करते हैं तो यह संकेत चराचर जगत के मौलिक गुणों की ओर होता है. मौलिक गुण किसी भी पिंड की सूक्ष्म संरचना के संयोजन पर निर्भर करते हैं. वही इलेक्ट्रोन-प्रोटोन और न्यूट्रोन सभी तत्वों के परमाणुओं में होते हैं किन्तु संख्या और संयोजन की भिन्नता के कारण कोई परमाणु सोने का बन जाता है तो कोई यूरेनियम का....और फिर ये सभी तत्व अपने-अपने भिन्न गुणों के कारण भिन्न-भिन्न स्वभाव प्रकट करते हैं. अब चिंतन का विषय यह है कि क्या ओसामा-बिन-लादेन जैसे   लोगों का स्व-भाव भी उनका अपना विशिष्ट धर्म कहा जाएगा ? मानवता विरोधी कार्यों में संलिप्त और उस तरह की सोच रखने वाले लोगों के स्वभाव को क्या कहा जाय ? 
    
सामान्य बोलचाल में हम स्वभाव को किसी व्यक्ति की प्रकृति से जोड़ कर देखते हैं.  निश्चित ही यह उसकी विशिष्ट दैहिक संरचना का विशिष्ट प्रभाव है.....और इस नाते उसका स्वभाव उसका भौतिक धर्म है.... जड़ता का धर्म है.  किन्तु मनुष्य का धर्म भौतिक धर्म से आगे का धर्म है.....और यह चेतना का धर्म है.....विवेक निर्णीत धर्म है ......सर्व कल्याण का धर्म है. जड़ और चेतन के धर्म में यही अंतर है. 
    
सुर-असुर, देव-दैत्य, मानव-दानव आदि के स्वभावों के आधार पर दो प्रकार की प्रवृतियां सामने आती हैं ...हिंसक और अहिंसक. मनुष्य चेतन जगत में सर्वश्रेष्ठ है ...इसलिए उससे सर्व कल्याणकारी व्यवहार ही अपेक्षित है.... और यही मनुष्य का लौकिक धर्म है .  
    
मनुष्य की मूल प्रकृति अहिंसक है ...हिंसा तो उसकी विकृति है. चेतन जगत में मनुष्य ही सर्वाधिक व्यापक परिवर्तनकारी कारक है....उसकी यह परिवर्तनकारी प्रवृत्ति शान्ति या अशांति का कारण बन  सकती है. इसलिए मनुष्य से अपने भौतिक धर्म के अतिरिक्त चेतन धर्म की भी अनिवार्य अपेक्षा की जाती है. हम अपने भौतिक धर्मों का तो पालन कर लेते हैं ....जन्म, ज़रा ..मृत्यु की स्वाभाविक जैव-रासायनिक क्रियाएं स्वतः संपन्न होती रहती हैं. फिर जीवन को बनाए रखने के लौकिक धर्म भी जैसे-तैसे  संपन्न करते ही हैं ......पर जो चूक होती है वह इस चेतन-धर्म के पालन में ही हो रही है...और इसके प्रति हम ज़रा भी संवेदनशील नहीं हैं. सारा ध्यान लौकिक धर्म के पाखण्ड में ही केन्द्रित हो कर रह गया है. 
   
सुज्ञ जी को बहुत-बहुत धन्यवाद. उनके सूत्र वाक्य के कारण ही इस विमर्श को कुछ और गति मिल सकी.