रविवार, 1 मई 2011

                                        धर्म चिंतन ........1 


      मैं कोई नवीन बात बताने नहीं जा रहा हूँ.बस शब्दों का हेर-फेर है. मुझे लगता है कि हमें सुपरिचित शब्द "धर्म" से बार-बार परिचित होने की आवश्यकता है. अस्तु आज का चिंतन इसी विषय पर.
         यदि मैं कहूँ कि हम एक साथ कई धर्मों का पालन करते हैं तो आपको विचित्र सा लगेगा. पर वास्तविकता यही है कि जन्म से मृत्यु तक हमें कई धर्मों का पालन करना पड़ता है. भोर से अगली भोर तक ........और फिर नित्य यही क्रम...... उसी तरह .....जैसे पृथिवी को सामान्यतः  एक नहीं तीन-तीन गतियों से अपनी यात्रा करनी पड़ती है. एक अपनी धुरी पर, दूसरी सूर्य के चारो ओर ..और तीसरी उसके अपने भीतर.......इसके साथ ही गति के सारे सिद्धांतों का पालन भी. इतना ही नहीं  .....अपने अस्तित्व के लिए और भी न जाने कितने सिद्धांतों का पालन भी.  इन सबका पालन अनिवार्य है पृथिवी के लिए. ये पृथिवी के धर्म हैं. पृथिवी बंधी हुयी है इन धर्मों से. धर्मच्युत होने का परिणाम सहज ही समझा जा सकता है. 
       हमें भी .....ब्रह्माण्ड के असंख्य पिंडों की तरह ...मौसम की तरह .....चराचर जगत के अपने धर्मों का पालन करना पड़ता है. सोने-जागने से लेकर जीवन के सारे कर्मों के लिए एक निश्चित परिधि में कर्त्तव्य  करने होते हैं. 
    ब्रह्माण्ड के असंख्य स्थूल पिंडों की व्यवस्था कितनी आश्चर्यजनक है ! सबकी दिशाएँ भिन्न ..... गतियाँ भिन्न.....किन्तु कहीं पारस्परिक मुठभेड़ नहीं. भिन्नता के बाद भी टकराव नहीं. वस्तुतः भिन्नता के कारण ही टकराव नहीं है. एकरूपता होती तो सोचिये क्या होता.....? ब्रह्मांड के सभी सौर्य मंडल एक ही दिशा में एक ही गति से .......
       हाँ ! विशेषता यह है कि इनमें से कोई भी एक दूसरे के कार्यों में बाधा उत्पन्न नहीं करता ....यह नहीं कहता कि हमारी ही दिशा सही है ...हमारी ही गति सही है ...सब लोग हमारा ही अनुसरण करो. क्योंकि उन भौतिक पिंडों को पता है ...... पता है कि सब एक दूसरे का अनुसरण करने लगेंगे तो आपस में मुठभेड़ हो जायेगी . सब छिन्न-भिन्न हो जायेंगे ....अस्तित्व समाप्त हो जाएगा सबका.  इसलिए सब अपने-अपने रास्ते में अपनी-अपनी गति से गमनशील हैं. सब एक दूसरे का सम्मान करते हुए ...उनकी परम्पराओं का सम्मान करते हुए ...उनके सिद्धांतों का आदर करते हुए गतिमान हैं .  तथापि कुछ नियम हैं जिनका पालन सबके लिए अनिवार्य है. ......गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का धर्मपालन किये बिना .......गति के सामान्य सिद्धांतों का धर्मपालन किये बिना ........कुल मिलाकर यह कि भौतिक शास्त्र के ज्ञाताज्ञात धर्मों का पालन किये बिना उनका अस्तित्व संभव ही नहीं है.  ऐसा ही है सनातन धर्म. इसी कारण सब धर्मों का पिता स्वरूप है यह. सनातन धर्म बड़ी उदारता से भिन्न-भिन्न सौर्य मंडलों को अपनी विशेष व्यवस्था बनाने की स्वतंत्रता प्रदान करता है. .....शर्त यह है कि एक व्यवस्था की  स्वतंत्रता दूसरे की व्यवस्था के लिए चुनौती न बन जाय. हम अलास्का के निवासी से यह नहीं कह सकते कि आप धोती कुर्ता पहनिए और हर पक्ष में मुंडन करवाइए. हाँ यदि वह भारत आता है तो उसे गरम कपडे छोड़ने ही होंगे ...अब वह यह नहीं कह सकता कि हमारे धर्मानुसार तो हमें सदैव गरम कपड़े ही पहनने हैं और रोज स्नान नहीं करना है.....क्योंकि हम अपने धर्म के विरुद्ध नहीं जा सकते. धर्म का यह जड़ स्वरूप है. यह हमारे लिए हानिकारक है. समाज के लिए हानिकारक है. हमारी जीवन शैली सदा सर्वदा सभी देश कालों में एक समान नहीं रह सकती. ....रहेगी तो कल्याणप्रद नहीं होगी. हमारा जीवन दुखों से भर जाएगा ..और हम समाज में उपहास के पात्र बन जायेंगे. 
     एक उदाहरण देखिये. छत्तीसगढ़ एक उष्ण क्षेत्र है ...यहाँ ग्रीष्म ऋतु में भी एक स्कूल के प्राचार्य पादरियों वाला ऊपर से नीचे तक लंबा चोंगा पहनते हैं. दूसरी कक्षा की एक छोटे बच्ची ने जिसे पादरी का नाम नहीं मालुम था ...पारस्परिक वार्ता में उन्हें " वो जो गले से पेटीकोट पहनते हैं ..........." संबोधन दिया. बड़े बच्चों ने सुना तो उनका नाम ही "पेटीकोट" रख दिया. अब वे जिधर से निकलते ...बच्चे मुंह दबाकर हंसने लगते. कितनी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न करली उन्होंने अपने लिए. इतनी ग्रीष्म में केवल धार्मिक जड़-परम्परा के पालन और अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने के लिए उस चोंगे का धारण करना बुद्धिमत्ता का परिचायक नहीं है. धर्म प्रदर्शन की नहीं आचरण की चीज है. हिन्दुओं में कभी पर्दाप्रथा नहीं रही ....समय बदला .....तो पर्दे की आवश्यकता का अनुभव किया गया ......समय फिर बदला तो पर्दा शनैः-शनैः लुप्त होने लगा. यही धर्म है ...आवश्यकता के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन. परिवर्तन के पीछे कोई कारण होते हैं...कोई तर्क होता है ....परिस्थितिजन्य  कारणों और तर्कों की उपेक्षा किसी भी धर्म को पाखण्ड बना देती है. धर्म जब पाखण्ड बन जाता है तभी वह अफीम की संज्ञा धारण करता है. 
       अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान को सबसे पृथक रखना विभिन्न धर्मावलम्बियों की एक बड़ी समस्या है. प्रश्न यह है कि आवश्यक क्या है जीवन के लिए ? पृथक पहचान या धर्मानुशीलन ? पहचान पाखण्ड है और धर्मानुशीलन आचरण है. आज जब शिक्षा इतनी सुलभ है ...विज्ञान ने लोगों को नयी दृष्टि प्रदान की है ....तब उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे जीवन में तर्क का समावेश करें. ....उचित-अनुचित की वैज्ञानिक दृष्टि से समीक्षा करें और फिर उसे जीवन में अनुकरण के योग्य बनाएं. विश्व के उन देशों के लिए जो गर्म हैं और जहाँ पानी की कमी है.....मैं खतने का समर्थन करता हूँ . कारण यह है कि वहां के लोगों में नित्य स्नान और शारीरिक स्वछता के अभाव में लिंगाग्र के चर्मावरण के नीचे जमा होने वाला स्राव किसी गंभीर व्याधि का कारण बन सकता है.  खतना उनके लिए आवश्यक है .......पर जहाँ पर्याप्त जल है ..और यूरोप जैसे देशों में जहाँ खूब शीत पड़ती है ऐसा करना आवश्यक नहीं है. मेरा आशय यह है कि धर्म यदि विज्ञान सम्मत है और आवश्यकतानुसार किंचित परिवर्तनशील हो तो ही समाज के लिए कल्याणकारी हो पाता है. भारत में ऋतु अनुरूप हमारी जीवन शैली में पर्याप्त परिवर्तन किये जाते रहने की गौरवशाली परम्परा रही है. 
      तालाबों, झीलों , झरनों , नदियों और समुद्रों के जल भंडारों के अपने-अपने धर्म हैं .....धर्मों की यह भिन्नता उनकी आवश्यकता है. पर तभी तक ......जब तक कि वे स्वसमूहों में रहते हैं. स्थान परिवर्तन के साथ ही उनके धर्म भी बदल जाते हैं. तालाब के पानी को नदी में डाल देने पर उसे नदी का धर्म मानना पड़ता है. वहाँ वह यह हठ नहीं कर सकता कि हमारी परम्परा तो स्थिर रहने की है ...हम प्रवाहित नहीं होंगे. ...प्रवाहमान होने से हम विधर्मी हो जायेंगे .  झरने का जल जब नदी में पहुंचे तो कहे कि हमारे धर्म में तो आदिकाल से ऊपर से नीचे झरते रहने की परम्परा है इसलिए हम यहाँ भी ऊपर से ही नीचे की ओर झरेंगे . नदी में आ गए तो क्या हुआ .......हमारी पृथक पहचान आवश्यक है हम अपनी धार्मिक परम्परा नहीं छोड़ेंगे. हमारी धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए हमें किसी ऊंचे स्थान पर ले चलो ताकि हम वहाँ से झर सकें और अपने धर्म की रक्षा कर सकें  .........विचारणीय  विषय है .....आप लोग सोचिये.....विभिन्न जल राशियों में विवाद खडा हो जाएगा . धार्मिक झगड़े होंगे और उनका विकास अवरुद्ध  हो जाएगा. धर्म के नाम पर हम सब भी यही कर रहे हैं ....ऊपर से इन अविवेकी बातों को संरक्षण देने के लिए धर्म निरपेक्षता नामक एक और अधर्म खड़ा कर दिया गया है  .  आप कल्पना कीजिये........ समुद्र में सभी जल राशियों के पहुँचने के बाद समुद्र की शासन व्यवस्था उनके लिए धर्म निरपेक्षता के नाम पर सभी को अपने-अपने धर्मों के पालन की स्वतंत्रता प्रदान करदे तो क्या होगा. मीठे-खारे का विवाद, मटमैले-साफ़ का विवाद, स्थिर रहने और बहने का विवाद ...न जाने कितने विवाद होंगे. फिर उनके धर्माधिकारी व्यवस्था दें कि प्रत्येक जल राशि की मछलियों को अपने-अपने जल राशि वाले धर्मपालन की स्वतंत्रता है.  साफ़ और मीठी नदी की मछलियों का धर्माधिकारी कहेगा कि समुद्र में मिल गए  तालाब के मटमैले जल के साथ रहने से हमारा धर्म नष्ट हो जाएगा इसलिए हमारी वाली मछलियो इधर आ जाओ. मछलियाँ परेशान होंगी ......समुद्र में जाएँ तो जाएँ कहाँ ? सारा जल तो मिल गया ...कैसे पहचाने कि कौन सी जल राशि समुद्र के किस भाग में है ?
     कल्याणकारी और अनुकरणीय धर्म वह है जो देश-काल की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित और विकसित किया जाय. एक देश का एक धर्म हो . किसी एक देश में विभिन्न धर्मों का एक साथ होना अवैज्ञानिक है . उनकी निष्ठाएं पृथक हैं ...उनकी आवश्यकताएं पृथक हैं....उनकी प्राथमिकताएं पृथक हैं....उनकी कार्यशैली पृथक है....उनकी जीवन शैली  पृथक है .....
    भारत के विभिन्न सम्प्रदाय अपनी पृथक धारा के बाद भी राष्ट्रीय धारा में एक गति से ....एक दिशा में प्रवाहित होते हैं.  भारत के आयातित धर्म अपने को इनके समान नहीं बना सके हैं अभी तक ......विवाद का एक बड़ा कारण यही है. 
       आज की चर्चा में लौकिक धर्म पर किंचित चर्चा का प्रयास किया गया है ...अगली बार हम आध्यात्मिक धर्म के स्वरूप पर कुछ चर्चा और चिंतन -मनन करेंगे.           इति शुभम् .