सोमवार, 23 मई 2011

कुम्हार 

दिन भर बेचे 
मिट्टी के दिए 
जब गहराई साँझ   
तो चल दिए कुम्हार 
एक टुकड़ा रोशनी 
माँगने उधार.

जयविलास महल ग्वालियर का दीवान-ए-ख़ास

कफ़न बिन ही दफ़न हो गए 
रेशम चढ़े मज़ार पर 
एक झोपडी भी ना मयस्सर 
सोना चढ़े दीवार पर .

आपकी सरकार आपके द्वार   

दर्द की सीमा 
समंदर की तरह है 
कैसे सफ़र फिर  
दास्ताँ का हो शुरू 
खो गए हैं छोर  
दर्दों के 
किस सिरे से हो रहे तुम  
रू-ब-रू.?

व्यवसाय 

बिक रहे हैं धर्म के 
परिधान अब बाज़ार में 
दानवों के दल हैं निकले 
घूमने बाज़ार में .

खुदकुशी 

क्यों खामोश हैं 
इस शहर में सभी 
सच ने की खुदकुशी 
आज फिर से अभी.

यकीं 

तुम हो धोये दूध के 
किस तरह कर लें यकीं
दूध भी पानी बिना 
आजकल मिलता नहीं. 

भूख 

रूप बदले हाकिमों के 
और बदली नीति भी 
पर न बदली भूख की 
पीड़ा कभी मज़दूर की.

लोकतंत्र 

क्या हुआ जो मंच बदले 
पर लोग तो बदले नहीं 
फिर वही होगा तमाशा 
ग़र रहे दर्शक वही .