रविवार, 29 मार्च 2026

इंग्लैंड में ईसाईमूल्य विसर्जन

इंग्लैंड के मुस्लिम नागरिकों, जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप के शरणार्थी भी हैं, ने स्थानीय ईसाइयों को इंग्लैण्ड छोड़ने की माँग उठा दी है। वे प्रदर्शन कर रहे हैं, जो कभी-कभी हिंसक भी हो जाते हैं जिससे इंग्लैण्ड की स्थानीय संस्कृति पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। यह इंग्लैण्ड के लिए ही नहीं, यूरोप के अन्य देशों, भारत और अफ्रीकी देशों के लिए भी गंभीर संकट का विषय है। किसी भी समुदाय के सांस्कृतिक परिवर्तन और राष्ट्रांतरण के लिए किसी भी देश के पारंपरिक मूल्यों का क्षरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक होता है। 
इंग्लैंड ही नहीं, सभी ईसाई देशों में ईसाईमूल्यों का निरंतर विसर्जन वहाँ के चिंतकों और राजनीतिज्ञों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। भारत में भी हिंदू अपने पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अध्यात्मिक मूल्यों के क्रमिक विसर्जन की राह पर तीव्रता से बढ़ते जा रहे हैं। इससे हमने विदेशी मूल्यों को स्थान देने के लिए पर्याप्त रिक्तता उत्पन्न कर दी है। दुर्भाग्य से पतन के लिए विदेशी पराधीनता के युग से भी अधिक प्रेरक तत्व आज उठ कर खड़े हो गये हैं। ये क्षद्म लोग उपदेश देते नहीं थकते कि "यह देश केवल हिंदुओं का नहीं, सबका है। हमारे डीएनए समान हैं, सब धर्म हमारे हैं, यहाँ सबका समान अधिकार है, सबकी स्वीकार्यता है...।"
भारतीय संस्कृति और मूल्यों की हत्या के लिए मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार जैसे हिंदुत्व के उपदेशक भी जब इस्लामिक समारोहों में उनके प्रतीकों, परंपराओं और मूल्यों का अनुसरण करने में गर्व का अनुभव करने लगें तो हिंदुत्व को नेपथ्य में धकेलने और इस्लाम को आमंत्रित करने का स्पष्ट संदेश पूरे विश्व में, जहाँ भी कहीं हिंदू हैं उन्हें आहत और चिंतित करता है।
हम हर किसी को मित्र नहीं मान सकते, हर किसी की परंपराओं और मूल्यों का अपने जीवन में अनुसरण नहीं कर सकते, विष और अमृत में समानता का उपदेश नहीं दे सकते। ऐसा करके हम सनातन सिद्धांतों की अवहेलना तो करते ही हैं, मतांतरण और जीवनमूल्यों के विचारांतरण को भी प्रोत्साहित करते हैं। यह सब बहुत अकल्याणकारी और सनातनियों के लिए आत्मघाती है।
तो क्या करें?
करना यह है कि हमें तथाकथित महान चिंतकों, विचारकों, परमपूज्यों और राष्ट्रसमर्पितों के उपदेशों पर लेश भी ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। ये सब छद्म लोग हैं जो मारीच बनकर सीताहरण के पाप की योजना में सक्रिय भागीदार हैं। कलियुग के इस कालखंड में मानवदेहधारी कोई भी व्यक्ति हमारा मार्गदर्शक बनने के योग्य नहीं है, हमें प्राचीनशास्त्रों, जिनमें षड्दर्शन मुख्य हैं, को ही अपना गुरु और मार्गदर्शक स्वीकार करना चाहिए, साथ में अपनी समस्त इंद्रियों को भी सचेत रखने की आवश्यकता है।

शनिवार, 28 मार्च 2026

पूर्णता और पूरकता

वह भाजपाई है, ...नहीं-नहीं वह तो कम्युनिस्ट है। वह आस्तिक है, ...नहीं-नहीं वह तो पक्का नास्तिक है। 

राजनीति और दर्शन के संबंध में जब किसी के प्रति प्रेक्षकों द्वारा विभाजित और परस्पर विरोधी निर्णय किए जाने लगें तो समझ लेना चाहिये कि जिसके संबंध में चर्चा की जा रही है उसकी दृष्टि विहंगम दृश्य की पक्षधर है। वह पूर्णता की संधान यात्रा में पूरकता के छोटे-बड़े अंशों को स्वीकार करता हुआ चलने में विश्वास रखता है। यदि कोई दर्शन पूर्ण होता तो अन्य दर्शनों की आवश्यकता ही नहीं रहती, तब न चार्वाक दर्शन होता और न वैशेषिकादि षड्दर्शन।
राजनीतिक परिपक्वता के लिए सापेक्ष श्रेष्ठता का चयन परिवर्तनकारी होता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है। हिमाचल जैसे प्रांतों में सतत सत्तापरिवर्तन सापेक्ष श्रेष्ठता के चयन का प्रतीक है। वहाँ के मतदाता कांग्रेस या भाजपा से बँधकर नहीं रह पाते। ऐसा कोई भी बंधन राजनीतिक दलों में आने वाली निरंकुशता का आधार बन जाता है जो लोकतंत्र की एक अवांछित विकृति है जिससे बचा जाना चाहिए।

कट्टरहिंदू

मैं पहले भी कह चुका हूँ, पुनः स्पष्ट कर दूँ, मैं कट्टर हिन्दू नहीं, निष्ठावान हिंदू हूँ।
निष्ठा और कट्टरता के अर्थों को जाने बिना इन शब्दों के प्रयोग में सावधानी होनी चाहिए। कट्टरता एक अंधी वीथिका है, जिसका सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं। जो हिंदू है वह कट्टर नहीं हो सकता, जो कट्टर है वह हिंदू नहीं हो सकता।
यही बात भक्त और आलोचक के लिए भी है। भक्त आलोचना नहीं कर सकता, जो आलोचक है वह भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति केवल ईश्वर की हो सकती है, किसी देहधारी की नहीं।
राजनेताओं की आलोचना हो सकती है, भक्ति नहीं। हम लोगों ने भक्ति करके ही भाजपा और संघ को निरंतर विकृत होने देने का पाप किया है। हमने संघ और मोदी का अंधसमर्थन किया, कभी स्वस्थ आलोचना नहीं की। इन दोनों पर उठने वाली उंगलियों और कलंकों के लिए हम सभी अपराधी हैं जो सत्य से सदा भागते रहे और कभी इनके विचारों और कार्यों की आलोचना नहीं की। आलोचना उतनी ही आवश्यक है जितनी किसी रुग्ण की चिकित्सा, इसे पाप या विरोध नहीं समझा जाना चाहिए। मैं पुनः सावधान कर रहा हूँ, सतत परिमार्जन और स्वस्थ आलोचना का यदि इसी तरह बहिष्कार किया जाता रहेगा तो एक दिन संघ और भाजपा के अध्याय सदा के लिए बंद हो जाएँगे।
जब हम अच्छे समालोचक नहीं होते तो राजनीतिक क्षितिज पर लोकहितों की हत्या होते हुये देखते हैं।
ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी या मोहन भागवत को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता, ये सब हमारी दीर्घकालिक निष्क्रियता के परिणाम हैं जिन्हें भोगने के लिए हम सब विवश हैं।

अनार्य दर्शन

दैत्य नहीं, तो देव भी नहीं

दानव नहीं, तो मानव भी नहीं 

राक्षस नहीं, तो आर्य भी नहीं

यौनोत्पीड़क नहीं, तो नारीपूजक भी नहीं

अपराधी नहीं, तो संत भी नहीं

राष्ट्रद्रोही नहीं, तो राष्ट्रप्रेमी भी नहीं

शत्रु नहीं, तो मित्र भी नहीं 

अन्याय नहीं, तो न्याय भी नहीं

असत्य नहीं, तो सत्य भी नहीं

पाप नहीं, तो पुण्य भी नहीं।

सह अस्तित्व ही है रहस्य

राजसिंहासन का।

रहना होगा सबको 

एक साथ

मिलजुलकर

यह देश सबका है

किसी के बाप का नहीं,

उनका भी नहीं

जिन्होंने रचा, गढ़ा और सँवारा

अपने तप और पुरुषार्थ से।

हमारी दृष्टि में 

सब हैं समान

और सम्माननीय

सभी का लक्ष्य है

ईश्वर की प्राप्ति

हम चलते रहेंगे

ऐसे ही 

लेकर सबको साथ

करते रहेंगे सबका विकास

पाप का भी, पुण्य का भी

और बन जायेंगे

विश्वगुरु।

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

जैविकयुद्ध

अमेरिका और ईरान के अड़ियल व्यवहार के कारण अब गुरिल्ला युद्ध से भी अधिक गोपनीय और दबे पाँव होने वाले जैविक युद्ध की आशंकाएँ निरंतर बलवती होती जा रही हैं। सभी विकसित देशों के पास महासंहारक बायो-वीपन्स के भंडार उपलब्ध हैं।

कोरोना के नये-नये वैरिएंट्स आना कोई नयी बात नहीं रही, समाचार है कि अब प्राणघातक निपाह वायरस भी पूरी तैयारी के साथ आ चुका है।
इधर कैंसर की रोकथाम के लिए चौदह वर्ष के किशोरों/किशोरियों के लिए वैक्सीन आ गये हैं। यह मान लिया गया है कि यौन संबंधों से फैलने वाले पैपिलोमा वायरस से हमारे किशोर/किशोरियाँ संक्रमित हो सकते हैं इसलिए सभी लोगों को लगभग ३५९० रु. मूल्य वाले (मूल्य सरकार चुकाएगी) वैक्सीन के तीन डोज तो ले ही लेना चाहिए। यह वैक्सीन निर्भय होकर "यौनसंबंध बनाने का मार्ग" प्रशस्त करती है।
"HPV is highly infectious and predominantly spread through sexual contact, and HPV vaccines work best if they’re given before someone is exposed to the virus."
Gardasil 4/9 ; The cancer vaccine for girls, primarily known as the HPV vaccine (Human Papillomavirus), prevents infections that cause cervical and other cancers. It is highly effective and recommended for girls (and boys) aged 9–14, ideally *before sexual activity.* It is often given as a two-dose series, or three for older teens.
 
टीकाकरण की विश्वसनीयता मेरे लिए सदा से नकारात्मक रही है। वैज्ञानिकों का एक समुदाय टीकाकरण को नये वैरिएंट्स के जन्म का कारण मानता रहा है, विषाणुविज्ञान और इम्यूनोलाॅजी के तथ्य भी उसी के पक्ष में हैं। मैं यह नहीं समझ पाता कि जब इम्यूनिटी बनाये रखने के लिए हमारे पास बहुत से साधन उपलब्ध हैं तो सारा ध्यान वैक्सीनेशन पर ही क्यों केंद्रित रहता है? क्या यह स्वास्थ्य की नहीं अपितु केवल उद्योग की आवश्यकता है?
*सिकुड़ता वाय क्रोमोसोम*
एंटी कोविड-१९ वैक्सीन की न्यून कार्मिक अवधि हम सब देख चुके हैं। अब मुझे आशंका है कि एंटीबायोटिक्स और वैक्सीनेशन के अंधाधुंध प्रयोग के दुष्प्रभाव कहीं हमारे क्रोमोसोम पर भी तो नहीं पड़ रहे हैं! यह आशंका निर्मूल नहीं है। किसी वायरस को हमारे शरीर में प्रवेश करने के लिए किसी पासपोर्ट और वीसा की तो आवश्यकता नहीं होती न! यह वैक्सीनेशन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, तब इंड्यूस्ड इम्यूनाइजेशन का क्या औचित्य? प्रचार किया जाता है कि टीकों में एटेनुएटेड वायरस या एंटीजेन सीरम का प्रयोग किया जाता है। यही प्रक्रिया तो प्रकृति की भी है, तब इंड्यूस्ड क्यों?
यह पाया जाता रहा है कि निर्धन परिवारों के मिट्टी में खेलने वाले बच्चों की रोगप्रतिकारक क्षमता उन बच्चों से अधिक होती है जो हाइजीन का बहुत अधिक पालन करते हैं। यह निर्धन देशों के लिए प्रकृति की निःशुल्क व्यवस्था है।
चिंता का विषय यही है कि कैंसर रोकथाम के नाम पर कहीं यह बिल गेट्स प्रायोजित जैविक युद्ध तो नहीं?

गुरुवार, 26 मार्च 2026

देशप्रेम का प्रमाण और राष्ट्रनिर्माण

मुस्लिम नेता और विचारक प्रायः यह कहा करते हैं कि हमें किसी को अपने देशप्रेम का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन सांसद इकरा हसन ने सदन में अपने देशप्रेम का प्रमाण दे ही दिया, वह भी बिना किसी माँग या पृच्छा के ही। उन्होंने अयातुल्ला ख़ामेनेई की महानता की तुलना मोदी की ५६ इंच की छाती से करते हुये बता दिया कि ख़ामेनेई मोदी से श्रेष्ठ हैं। प्रकारांतर से इकरा हसन ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारत के लिए मोदी नहीं, अयातुल्ला ख़ामेनेई उपयुक्त शासक है।

इधर मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि भारत में मुसलमानों के बिना हिंदुत्व नहीं, अर्थात् इस्लाम है तो हिंदुत्व है। क्या सचमुच हिंदुत्व के मूल में इस्लाम है? क्या सचमुच हिंदुत्व के सिद्धांतों को इस्लामिक दर्शन से ही पोषण प्राप्त हुआ है। क्या सचमुच पहले इस्लाम आया फिर सनातन आया अर्थात इस्लाम वैदिक काल से भी पहले अस्तित्व में आया! क्या अरब में इस्लाम के उदय के समय भारत में कोई धर्म या मानव सभ्यता नहीं थी! क्या ईसवी सन् ७१२ से पहले भारत में हिंदुत्व जैसा कुछ भी नहीं था! कुछ भी नहीं था तो क्या था! इस्लाम से पहले भारत में क्या कोई सभ्यता नहीं थी?
मैं भ्रमित हो गया हूँ, मोहन भागवत जैसा परमपूज्य जब कुछ कहता है तो विचार करना पड़ता है। हमने अभी तक जो सुना, जो पढ़ा और जो मंथन किया उसके अनुसार तो वैदिक सभ्यता और सनातन धर्म दुनिया के सबसे प्राचीन पदार्थ हैं,  ...क्या मैंने जो पढ़ा और सुना वह सब मिथ्या था!
मोहन भागवत यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता बल्कि राष्ट्रनिर्माण की बात करता है। परमपूज्य अवतारी पुरुष ने यह नहीं बताया कि राष्ट्रनिर्माण के लिए "आवश्यक" और "बाधक" तत्व क्या हैं।
हम पुनः इकरा हसन के भाषण पर आते हैं। मोहन भागवत जिस हिंदुत्व रहित राष्ट्रनिर्माण का उपदेश दे रहे हैं क्या उसके लिए भारत की सत्ता दिवंगत ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी को सौंप दी जानी चाहिए?

थोड़ा सा मुसलमान

कहानी संग्रह "थोड़ा सा मंटो" के बाद अब "थोड़ा सा मुसलमान" मेरी अगली पुस्तक का नाम हो सकता है।

जब आप भाजपा-कांग्रेस-सीपीएम के बंद कूपों से निष्ठापूर्वक बाहर निकलकर अपने स्व-भाव में प्रवेश करते हैं तो स्वयं को सर्वथा भिन्न पाते हैं। इस दृष्टि से मैं स्वयं को थोड़ा सा साम्यवादी, थोड़ा सा मुसलमान और बहुत सा सनातनी पाता हूँ। मुझे लगता है इस तरह हम सनातनी दर्शन के लौकिक स्वरूप का एक विहंगम परिदृश्य अपने सामने पाते हैं।
वर्षों पहले मैंने दुर्गा और सरस्वती पूजा के विकृत होते आयोजनों पर कुछ लेख लिखकर सांप्रदायिक टकरावों की आशंका को लेकर सचेत किया था। आज हम उन शंकाओं को सच होता देख रहे हैं। हमें अपने ही देश में अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों, उत्सवों और परंपराओं के लिए सरकारी सुरक्षा की आवश्यकता होने लगी है। जब देश में विभाजनकारी शक्तियाँ निर्भय हों, सांप्रदायिक आतंक के सामने सत्ता निर्बल हो, जनता सुषुप्तावस्था में हो तब ऐसे आनुष्ठानिक आयोजनों के लौकिकस्वरूप पर चिंतन करना आवश्यक हो जाता है।
आज मैं मूर्ति को लेकर उसके वैज्ञानिक महत्व के बाद भी इस्लामिक अवधारणा के साथ खड़े होने के लिए विवश हो रहा हूँ। विश्व भर में समय-समय पर मूर्तियों को जिस तरह तोड़ने और उन्हें अपमानित करने की घटनायें होती रही हैं, उन पर मंथन किया जाना आवश्यक है। देवी-देवताओं से लेकर राजनैतिक व्यक्तियों तक की मूर्तियों के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किये जा सकते। मूर्तियाँ बनवाकर युगों तक अमर रहने के लोभ से अमिताभ बच्चन और मायावती जैसे लोगों को भी मुक्त होना चाहिए। विगत कुछ वर्षों में मार्क्स, स्टालिन, मुजीबुर्रहमान, भीमराव और मोहनदास की मूर्तियाँ भी कट्टरपंथियों के लक्ष्य पर रही हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से मैं मोहनदास का विरोधी रहा हूँ, पर जिस तरह उनकी मूर्ति के साथ किशोरवय बच्चों द्वारा अश्लील और अपमानजनक व्यवहार प्रदर्शन किया गया है वह स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं मूर्तिनिषेध की इस्लामिक परम्परा के साथ स्वयं को बरबस ही खड़ा पाता हूँ। विरोध और घृणा प्रदर्शन के लिए मूर्तियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाना विचारों से बहुत आगे बढ़कर उनका भौतिक रूपांतरण है जो भीड़ को हिंसा के लिए उत्तेजित करता है। बस, यहीं पर मैं थोड़ा सा मुसलमान हो जाना चाहता हूँ। यदि हम मूर्तियों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो चौक-चौराहों पर उनकी स्थापना का क्या औचित्य!

बुधवार, 25 मार्च 2026

मणिपुर डायरी

सहृदयता का दण्ड

आदिवासियों का धर्मांतरण भारत की एक गंभीर समस्या रही है। यह सेवन सिस्टर्स की ही नहीं, असम, झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी ऐसी समस्या है जिसके सामने सरकारें तो नतमस्तक होती ही रही हैं, वे लोग भी नतमस्तक हुये हैं जो धर्मांतरण को अभी तक राष्ट्रांतरण मानते रहे हैं। विगत वर्षों में मणिपुर के आदिवासियों और धर्मांतरित हुये ईसाइयों के बीच हुए रक्तसंघर्ष ने देश-विदेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। 
धर्मांतरण की घटनाओं से व्यथित फ़िल्म निर्देशक सुजल मिश्र के मन में इस विषय को लेकर एक फ़िल्म बनाने का विचार तो पहले से ही था पर जब उन्होंने कुंभ मेले में माला बेचने वाली मोनालिसा को देखा तो उनके मन में स्लम डाॅग के पात्र झिलमिलाने लगे। बस, उन्होंने तय कर लिया कि उनकी नई फ़िल्म "डायरी आफ़ मणिपुर" की नायिका यही लड़की होगी। यह इतना सरल नहीं था, एक तो अशिक्षित ऊपर से भाषा और संवाद में कच्ची मोनालिसा को फ़िल्म के अनुरूप प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती थी। सुजल को लगा, वे एक अति साधारण लड़की को विशिष्ट बनाने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी उस बंजारा परिवार ने कभी नहीं की होगी। बस सुजल यहीं धोखा गये।
मोनालिसा की नई पारी फ़िल्म अभिनय ही नहीं बोली और भाषा जैसे प्रारंभिक बिंदुओं से भी प्रारंभ हुयी। सुजल को पल-पल चुनौतियों का सामना करना पड़ा पर उन्होंने धैर्य नहीं खोया।
अंततः फ़िल्म पूरी हुयी तो सुजल उसका प्रमोशन उसी स्थान से करने के इच्छुक थे जहाँ से उन्होंने मोनालिसा को फ़िल्म के लिए लिया था। किंतु प्रयागराज प्रशासन ने निर्जन हो चुके संगम पर मात्र पंद्रह-बीस लोगों के एक दल को भी इसकी अनुमति नहीं दी। दूसरी ओर मोनालिसा भी बिना बताये ब्याह रचाने अपने प्रेमी के साथ केरल चली गयी। फ़िल्म का प्रमोशन नहीं हो सका। क्या योगी जी के भी राज में धर्मांतरण के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनायी गयी फ़िल्म का यही मूल्यांकन है!
सुजल पर वज्रपात तो तब हुआ जब धर्मांतरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बनाई गई फ़िल्म की नायिका स्वयं लव-जेहाद की शिकार हो गई। यह फ़िल्म के उद्देश्यों के विरुद्ध एक गहरा षड्यंत्र था। माओवादियों की समानान्तर जनतानासरकार की ही तरह एक अन्य समानांतर पटकथा एक ही मंच पर रची जाती रही। भीतर ही भीतर चल रही इस एक और अंतरकथा की लेश भी भनक सुजल को नहीं लग सकी। परिणामतः फ़िल्म प्रमोट होने से पहले ही अंतर्विवादों में फँस गयी।

केरल जाकर अपने प्रेमी से हाई प्रोफ़ाइल निकाह करके मोनालिसा ने ढोल बजाते हुये घोषित कर दिया है कि लव जेहाद एक अच्छी परंपरा है, यह भारतीय समाज में समानता, सांप्रदायिक स्वतंत्रता और भाईचारा स्थापित करने का उत्तम उपाय है इसलिए मणिपुर डायरी का कोई औचित्य नहीं।
मोनालिसा को इसी रूप में प्रोजेक्ट किया जाता रहेगा। यह लव जेहाद को प्रोत्साहित करने के लिए एक सुनियोजित और बहुत बड़ा षड्यंत्र है।
मोनालिसा! तुम एक साथ दो परस्पर  विपरीत भूमिकाओं को बड़ी कुशलता से निभाती रहीं। एक में अभिनय करती रहीं, और दूसरी में उसके ठीक विपरीत भूमिका को अपने जीवन के लिए जीती रहीं! मानना पड़ेगा, तुम्हें तो माताहारी होना चाहिए था।

शक्ति जब अनियंत्रित होकर विकृत होती है तो फिर वह किसी के लिए भी पूजनीय नहीं रह जाती, वह अपने परिवेश के साथ स्वयं को भी समाप्त कर लेती है।

इस बार बाबा भारती नहीं जीत सके, डाकू खड्ग सिंह जीत गया। बंजारिन लड़की के लिए सुजल के मन में उपजी सहृदयता का यही पारितोषिक है!
हमने मोतीहारी वाले मिसिर जी को पूरी कथा बताई तो कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने धनुषभंग की कथा सुनाते हुये इतना ही कहा - "जब परशुराम को श्रीराम के अवतारी होने का प्रमाण मिल गया और राम ने शरसंधान कर उसका लक्ष्य पूछा तो परशुराम ने उत्तर दिया था - हे प्रभु इस शर से मेरे पाप और पुण्य दोनों को लक्ष्य कर नष्ट कर दीजिए।"
सुजल को अपने कार्यों की श्रेष्ठता और उनके उद्देश्यों पर गर्व की अनुभूति थी। ईश्वर ने मोनालिसा के रुप में आकर सुजल को संदेश दे दिया कि अब परशुराम को पुनः अपने तप में लीन जाना चाहिए"।