गुरुवार, 2 अगस्त 2012

भागते शहर का ठहराव

लोग कहते हैं ....

कि मुम्बई कभी सोती नहीं, जब देखो तब जागती ही रहती है ।

क्या सचमुच मुम्बई जागती रहती है दिन-रात ?

मगर ....

मुम्बई जागती रहती है तो उस दिन क्यों सो गयी थी

जब कसाब ने कसाई बन कर मुम्बई को तबाह करने की ज़ुर्रत की थी ?

मैंने मुम्बई से ये प्रश्न बारम्बार पूछा, मुम्बई हर बार ख़ामोश रही।

मैंने मुम्बई की भागती मेट्रो ट्रेन्स से पूछा, वे ख़ामोश रहीं। 

तब मैंने बज़बज़ाती धारावी से पूछा, वहाँ भी वही ख़ामोशी !

भीड़ भरी सड़कों से लेकर

अरब सागर के तट पर अपना सर पटकती लहरों तक

हर कहीं ख़ामोशी थी।

अद्भुत थी यह ख़ामोशी।

आख़िर इस ख़ामोशी ने ही मुझे राज बताया,

कहा - जब शहर भागता है तब लोग ठहर जाते हैं।

जब लोग भागते हैं तो उनका विवेक ठहर जाता है।

जब विवेक ठहर जाता है

तब कभी नादिर शाह आता है, कभी चंगेज़ ख़ान तो कभी कसाब।

और............

और इन सबके बीच साध्वी प्रज्ञा सिंह चीखती रहती है।         


 
मुम्बई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस यानी पुराना बॉम्बे वी.टी. रेलवे स्टेशन


उच्च न्यायालय मुम्बई

समुद्री मार्ग से विदेशी व्यापारियों का प्रवेश द्वार
यानी गेट वे ऑफ़ इण्डिया


होटल ओबेराय और ताज
 तबाह करने आये थे जिसे
पाक से कुछ नापाक  

कैसे कहूँ....
तुम मुझे कितने अपने लगते हो सागर !

सागर
रेत पर छोड़ गया है अपने पद चिन्ह
ऐ! नदी!
तुम भटक मत जाना  

रेत पर बिखरा है सागर का ख़जाना

पता नहीं..... कौन किससे टक्कर लेने को तैयार है


लहरें
मेरे भीतर हैं
और ख़ामोशी
मेरे बाहर
मैं
तुझे ये कैसे समझाऊँ ?
बोलो  ना सागर !  

गिरता भी है उछलता भी है
कहीं ख़ामोश
तो कहीं गरजता भी है।
बात समय-समय की है
कभी  नदिया में बहता
तो कभी सागर में समाता भी है
कभी डुबोता है हमें
तो कभी ख़ुद भी डूब जाता है।

हम सागर मथते रहते हैं
सारे विष उसमें डाल-डाल
अमृत सब छीना करते हैं
इन काली-काली करतूतों पर
जब सागर शोर मचाता है
लहरों के पाँव थिरकते हैं
धरती धड़क-धड़क उठती
हम अहंकार में चूर-चूर
अपने में खोये रहते हैं
उपहास शक्ति का देख, विकल तब
 शिवजी ताण्डव करते हैं।
हम सागर मथते रहते हैं।  

लहरों ने अवगुण्ठन डाला
नयनों का खारा नीर छिपाया।
तुम आये
कुछ सपने लेकर
मुझको
धीरे से सहलाया।
जैसे ही उमड़ा सागर पीड़ा का
तुमने मेरा
हर राज उछाला।

जो किताबें नहीं सुना पातीं
वो सुनाती हैं
ये लहरें।
 
कभी
गौर से सुनने की कोशिश कीजियेगा
ये ख़ामोशी
बहुत शोर करती है।

13 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अलग अंदाज की प्रस्तुति के लिए बधाई,,,,,

    रक्षाबँधन की हार्दिक शुभकामनाए,,,
    RECENT POST ...: रक्षा का बंधन,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  3. डॉक्टर साहब! मैंने इस विषय पर एक लंबी कविता लिखी थी और मेरे बेटे ने भी अलग से एक कविता लिखी थी.. मुम्बई आज भी मेरे लिए ड्रीम सिटी है... मगर अब शायद मौक़ा ना मिले वहाँ काम करने का.. मगर जितना भी समय यहां बिताया, ज़िंदगी को पास पाया!!
    लेकिन आपके कैमरे की नज़र सचमुच जादू का असर पैदा करती है!! मुग्ध करती है, चमत्कृत करती है!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. तो दोनो कवितायें पढ़ने से हमें वंचित क्यों रखा गया है अभी तक? हम कउनो गुनाह किये हैं का?
      मैं बहुत ख़ुश हूँ यह जानकर कि कविता के ज़ींस इन्हेरिट हुये हैं आपकी अगली पीढ़ी में। यह परम्परा चलती रहे इसके लिये शुभकामनायें।
      भारत के कई शहरों में जाने का अवसर मिला है पर मुम्बई कभी मुझे अपरिचित सा नहीं लगा।
      ये है मुम्बई मेरी जां ..... बात निराली है मुम्बई की।

      हटाएं
  4. बहुत सुन्दर............
    सागर
    रेत पर छोड़ गया है अपने पद चिन्ह
    ऐ! नदी!
    तुम भटक मत जाना

    लाजवाब.........आप कविताएं ही लिखा करें..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनु जी! बहुत-बहुत धन्यवाद!
    "...कवितायें ही लिखा करें .."
    संकेत समझ रहा हूँ :)
    हरकीरत हीर जी कहती हैं कि मुझे कहानी लिखनी चाहिये ....आप कहती हैं कि मुझे कवितायें ही लिखनी चाहिये।
    चलिये न! एक आयोग गठित कर लिया जाय, वही तय करेगा कि मुझे क्या लिखना चाहिये। मैं हीर जी को भी ख़बर किये देता हूँ .....आयोग का अध्यक्ष कौन बनेगा यह आप दोनों को ही तय करना पड़ेगा। :)

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर !
    कहीं संदेश है तो बस पानी का
    कहीं लहरें कुछ बातें करती हैं
    शहर के शोर की कौन सोचे
    अपने अपने शोरों से ही
    बहरे हो चुके हों जब लोग
    अब उनकी बातें ही बस
    कुछ बातें करती हैं !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुशील जी! बस्तर की अभिव्यक्ति में आपके प्रथम आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है।

      हटाएं
  7. सागर की लहरे नहीं, होती हैं गम्भीर।
    महाराष्ट्र में हुए हैं, कितने ही रणधीर।।
    --

    उत्तर देंहटाएं
  8. खूबसूरत चित्रों के साथ कविता की जुगलबंदी... वाह! अद्भुत...
    सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ही सही कहा आपने ...

    जब विवेक ठहर जाता है
    तब कभी नादिर शाह आता है, कभी चंगेज़ ख़ान तो कभी कसाब।

    सारी तस्वीरें काफी सुंदर और साथ में जुड़ी सार्थक पंक्तियाँ इनमें चार चाँद लगा रही हैं !
    साभार !

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.