रविवार, 18 सितंबर 2011

सेमिनार्स को निगलती राजनीति

राजनीति के अजगर ने सेमिनार्स को निगल लिया है. देश में कहीं भी सेमीनार हो यह अजगर वहाँ पहुँच ही जाता है  तभी तो आज तक कभी भी मैं सेमीनार से खुश होकर नहीं लौट पाया. मरते हुए सेमिनार्स को देख कर कोई कैसे खुश हो सकता है ? विशेषज्ञों के निदान के अनुसार भारतीय राजनीति को भस्मक रोग हो गया है .....हर चीज़ पचा जाने की अद्भुत क्षमता .....और उसकी भूख है कि कभी शांत ही नहीं होती. धर्म, संस्कृति, नैतिकता, चरित्र, धन, खनिज, जंगल, ...किस-किस को गिनाएं .......इस अजगर की पकड़ में जो भी आया बच नहीं सका. सब भस्म हो जाता है. 
दो दिन के सेमीनार में पहला आधा दिन झट से निगल जाने वाली राजनीति दूसरे दिन फिर आ धमकती है...समापन समारोह के लिए...गोया पहला दिन खाकर अभी पेट भरा नहीं उसका. वैज्ञानिक सत्र के नाम पर आयोजित होने वाले इन सेमिनार्स के प्रथम दिन का प्रथमार्ध और दूसरे दिन का उत्तरार्ध निगलने वाली राजनीति का इस आँगन में औचित्य आज तक नहीं समझ सका मैं. राजनीति के लिए तो कई मंच हैं पर वैज्ञानिकों के लिए मिल बैठ कर अपनी बात कहने के कितने मंच हैं ?  क्यों आवश्यक है वैज्ञानिक सत्रों में उदघाटन और भाषण देने के लिए और फिर अंतिम दिन उनका आशीर्वाद लेने के लिए राजनीतिज्ञों को बुलाना. ? क्या कोई शीर्ष वैज्ञानिक ही उदघाटन नहीं कर सकता ? क्या कोई वरिष्ठ वैज्ञानिक ही आशीर्वाद नहीं दे सकता ? प्रथम दिन के उदघाटन के बाद जब तक वैज्ञानिक सत्र प्रारम्भ हो समय इतनी तेज़ी से भाग चुका होता है कि आयोजकों को चेयरपर्सन के कान में बारम्बार एक सूत्री मन्त्र  दोहराने को विवश होना पड़ता है " सर ! १० मिनट ही दीजिएगा, बस ऑब्जेक्टिव के बाद फ़ाइनडिन्ग्स और फिर सीधे काँक्ल्यूजन." .....और फिर अगले दिन मन्त्र में थोड़ा परिवर्तन और-  "सर ! केवल ६ से ८ मिनट". 
अब वैज्ञानिक सत्र का दृश्य देखने योग्य होता है - 
शोध वैज्ञानिक का मंच पर प्रवेश. चेयरपर्सन की गूंजती हिदायत- "कृपया ६ मिनट में ही अपनी बात ख़त्म करें, समापन समारोह ठीक ३ बजे प्रारम्भ होना है." 
शोधपत्र वाचन के लिए आये हुए वैज्ञानिक हैरान-परेशान हैं ....वर्षों तक किये शोध की बात ६ मिनट में !
 वह मन में हिसाब लगाता है ...६ मिनट तो केवल फाइंडिंग्स में ही निकल जायेंगे. चलो ठीक है काँक्ल्यूजन ही बता देते हैं. 
शोधपत्र का वाचन प्रारम्भ होता है . उधर आयोजक चेयर पर्सन के कान में एक बार फिर वही मन्त्र उड़ेल जाता है- " सर ! समय का ध्यान रखियेगा." 
हड़बड़ाकर चेयरपर्सन घंटी बजा देता है. शोध वैज्ञानिक हैरान है अभी तो तीन मिनट ही हुए हैं. वह शब्दों को निगलते-उगलते अपना काँक्ल्यूजन थूक देता है -"पिच्च". 
प्रोजेक्टर धाँय से एक "धन्यवाद" स्क्रीन पर फेकता है. अगले शोध वैज्ञानिक हिसाब में डूबे हुए हैं -"कितना बोलूँ ?"  
पूरे देश से आये हुए श्रोता ने शोधवैज्ञानिक कुछ समझते हैं कुछ अनुमान लगाने को विवश होते हैं. सब कुछ हाइपोथेटिकल हो गया है. 
चेयरपर्सन बड़ी ही विनम्रता से या कहिये कि बड़े ही अहसानमंद से होकर धन्यवाद देते हैं और लगभग गिड़गिड़ाते हुए से बोलते हैं - "कृपया अपनी शंकाओं के लिए शोधकर्ता से बाद में भोजन के समय संपर्क करने का कष्ट करें"  
हर शोधवैज्ञानिक दुखी है. प्रेजेंटेशन ठीक से नहीं हो सका.
कमाल है ! .....जिस उद्देश्य के लिए सारा आयोजन किया जाता है उसी के लिए समय नहीं है ? उदघाटन सत्र में अतिथियों की प्रतीक्षा के लिए समय है. अतिथियों को भाषण देने के लिए बेशुमार समय है. समापन सत्र में अतिथियों की प्रतीक्षा के लिए फिर समय है....समय ही समय है ...नहीं है तो केवल शोध वैज्ञानिकों के लिए समय नहीं है. शोध वैज्ञानिक आपस में विमर्श कर सकें इसके लिए समय नहीं है. 
और हम वादा करते हैं कि इस अनावश्यक और निहायत घटिया परम्परा को त्यागने के बारे में कभी सोचेंगे भी नहीं. राजनीति का अजगर विज्ञान की गरिमा और गंभीरता को निगल रहा है ...निगलने दीजिये. सेमीनार ख़त्म हो गया है . 
खेल ख़तम पैसा हज़म. बच्चो ! बजाओ ताली .