गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

यात्रा...

धूप में तपिश

तब भी थी, आज भी है

हवायें

तब भी चलती थीं, आज भी चलती हैं

जल

तब भी प्यास बुझाता था, आज भी बुझाता है

चिड़ियाँ

तब भी कलरव करती थीं, आज भी करती हैं

केवल समय

कुछ और आगे बढ़ गया है ।

गर्भ में

आशाओं का भण्डार लिये

एक कली

लिखकर अपने पीछे एक उत्तराधिकार

मुरझा कर

झर चुकी है

झरी हुयी पंखुड़ियों को

अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता

न धूप, न हवा, न जल और न चिड़ियों का कलरव ।

काल सापेक्ष है यह सम्पूर्ण यात्रा

मिलन और विरह की तरह । 

1 टिप्पणी:

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.