रविवार, 22 जनवरी 2023

चमत्कार/पाखण्ड और जीवनपद्धति

         हर व्यक्ति वैज्ञानिक नहीं होता, उनकी सोच भी वैज्ञानिक नहीं होती, इसलिए हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएँ, आधिकांश आम लोगों में अंधविश्वास, चमत्कार और पाखण्ड के प्रति आकर्षण बना ही रहेगा। अंधविश्वास, चमत्कार और पाखण्ड का धर्म से कोई सम्बंध नहीं, तथापि यह बहुत से लोगों की जीवनशैली हो सकती है। मनुष्येतर प्राणियों में यह सब नहीं होता, उन्हें इस सबकी आवश्यकता भी नहीं हुआ करती, तो क्या इसकी आवश्यकता केवल मनुष्यों को ही हुआ करती है?

बाबाओं के चमत्कारी दरबारों, मौलवियों की दरगाहों और पादरियों की चंगाई सभाओं में लोग अपनी पीड़ा लेकर जाते हैं, हर स्थान पर लगभग एक जैसे ही दृश्य हुआ करते हैं, रोते-चीखते, उछलते-कूदते, नाचते-झूमते और विक्षिप्तों जैसा असामान्य व्यवहार करते हुये पीड़ित लोग, …जिन्हें अपनी भौतिक समस्याओं के समाधान के लिए किसी चमत्कार की आशा होती है, उनकी आशायें कितनी फलवती होती हैं इसका कोई सर्वेक्षण हमारे पास नहीं है। क्या सनातन धर्म, इस्लाम और ईसाइयत को बनाये रखने के लिए इन सबका होते रहना आवश्यक है?   

पी.सी. सरकार का जादू देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ा करती थी, लोग पैसे देकर जादू देखते थे, इससे दर्शकों को कुछ समय के लिए सुख की अनुभूति होती थी। कौन नहीं जानता कि जादूगर की जीविका का सबसे बड़ा आधार उसका झूठ ही हुआ करता है! किसी सरकार ने इसे कभी प्रतिबंधित नहीं किया, किसी ने इसके विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं किया।

फ़िल्म के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों-खलनायकों और खलनायिकाओं का जीवन क्या वास्तव में वैसा ही होता है जैसा कि फ़िल्मों में वे प्रदर्शित करते हैं! राजनीतिक नेताओं के अश्वासनों और पाखण्डी जीवनचरित्र से हम सब अनभिज्ञ हैं क्या! एक ही नेता विभिन्न अवसरों पर अपनी पहचान को कभी मुसलमान जैसा, कभी ईसाई जैसा तो कभी सनातनी हिन्दू जैसा प्रदर्शित करता है। हम किसके ...और कौन से आचरण को पाखण्ड कहेंगे और किसे पाखण्ड से मुक्त रखेंगे?

सर्जरी से पहले हर रोगी को एक वचनपत्र हस्ताक्षरित करके चिकित्सक को देना होता है, …कि यदि ऑपरेशन सफल न हुआ तो असफलता का कोई दायित्व चिकित्सक पर नहीं होगा, …और यदि कोई कॉम्प्लीकेशन होते हैं तो उसके लिए भी चिकित्सक उत्तरदायी नहीं होगा। चिकित्सक नहीं तो फिर कौन होगा उत्तरदायी, क्या स्वयं रोगी या फिर ईश्वर? रोगी या ईश्वर की इसमें क्या भूमिका हो सकती है? चिकित्सक के पास तो विज्ञान का सत्य होता है फिर भी वह अपनी क्रिया की सफलता के प्रति सुनिश्चित क्यों नहीं होता? वह कौन सा घटक है जो शल्य कर्म की सफलता के प्रति चिकित्सक को सुनिश्चित नहीं कर पाता? कुछ है जो हमारी पकड़ से छूट गया है, कुछ है जो अभी भी रहस्य बना हुआ है। यह थोड़ा सा बचा हुआ रहस्य ही हमें एक अद्भुत संसार में ले कर जाता है जहाँ चमत्कार है और अविश्वसनीय सी जीवनशैलियाँ हैं। दुनिया भर की जनजातियों से लेकर उच्चशिक्षित लोगों में भी इस रहस्यमय संसार के प्रति एक स्थान शेष रहता है। अंगूर की शराब की नदी और बहत्तर हूरों के अद्भुत आकर्षण से तो उच्च शिक्षित इंजीनियर्स, डॉक्टर्स, प्रोफ़ेसर्स और विद्वान भी कहाँ मुक्त हो सके हैं! सत्य कहाँ है? रहस्य कहाँ है? पाखण्ड कहाँ है?              

12 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ न कुछ रहस्य तो शेष है ही, जो हमें अपने दैनिक जीवन में कभी कभी महसूस होता है।
    अच्छा लेख।

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    1. कोई रचना अपने निर्माता के सभी रहस्यों से कभी पूरी तरह अवगत नहीं हो सकती। जिस दिन हम सभी रहस्यों को अनावृत कर लेंगे उसी दिन हमारा अंत हो जायेगा, यही शास्वत नियम है। पढ़ने और टिप्पणी के लिए साधुवाद!

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  2. कुछ है जो हमारी पकड़ से छूट गया है, कुछ है जो अभी भी रहस्य बना हुआ है। यह थोड़ा सा बचा हुआ रहस्य ही हमें एक अद्भुत संसार में ले कर जाता है जहाँ चमत्कार है और अविश्वसनीय सी जीवनशैलियाँ हैं।
    इससे अधिक इसे समझा तो जा सकता है पर कहना शायद मुश्किल है ।
    सुंदर लेख ।

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    1. विनम्र आभार ! मैं तो विज्ञान का छात्र रहा हूँ और अब जाकर समझ सका हूँ कि विज्ञान की सीमायें बहुत संकुचित हैं। कोरोना प्रकरण में हम सब देख चुके हैं।

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  3. कमजोर मन वाले मनुष्यों को ही ऐसे पाखंडों के जाल में आसानी से फँसाया जा सकता है यह बात बाबा, मौलवी, तांत्रिक, जादूगर आदि लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं। परंतु कुछ गूढ़ रहस्य भी हैं इस संसार में, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

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    1. जितना यह दृष्टव्य ब्रह्माण्ड है उससे कई गुना अधिक अदृष्टव्य ब्रह्माण्ड है । सत्य है तो असत्य और छल भी है। बहुत कुछ ऐसा है जो विज्ञान और हमारी पहुँच से बहुत परे है। टिप्पणी के लिए आभार!

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  4. अजब-गज़ब दुनिया के अजब-गजब लोग ।
    चमत्कार, जादुई ,तिलिस्मी, रहस्यमयी परतों को तर्कपूर्ण ढंग से टटोलना चाहिए न कि ऐसे ही किसी भीड़ का हिस्सा बन जाना चाहिए।
    बढ़िया लेख सर।
    सादर।

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    1. प्रकाश है, अंधकार भी है। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम हैं, साधुवेशधारी रावण भी है। हिरण्यकश्यपु है और प्रह्लाद भी है। हमारे साथ जो है अथवा नहीं है वह है विवेक । टिप्पणी के लिए आभार।

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  5. हर धर्म किसी न किसी रूप में अपने अपने चमत्कार के लिए जाना जाता है, अनपढ़ गंवारों को तो कहना सरल है परंतु पढ़े लिखे लोगों की संख्या की भी कोई कमी नहीं जो ऐसे मुल्लो, मौलवियों, पादरियों, बाबाओं के अनुयाई न हों, कुछ तो कहीं कोई न कोई रहस्य है, इस बात का फायदा इन लोगों ने सीधे सरल लोगों को मध्यम बना कर उठा रखा है।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.