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बुधवार, 25 जनवरी 2023

हत्यारों के लक्ष्य पर पं. धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री भी

         मैं आज तक नहीं समझ सका नूपुर शर्मा का अपराध, मैं आज तक नहीं समझ सका नूपुर शर्मा के पक्ष में खड़े होने वाले उन कई लोगों के अपराध जिनकी क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गयी, मैं आज तक नहीं समझ सका पालघर वाले वयोवृद्ध संत का कोई अपराध जिन्हें महाराष्ट्र पुलिस की उपस्थिति में पीट-पीट कर मार डाला गया। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ पंडित धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री का कोई अपराध जिनकी हत्या कर देने की पूर्वसूचना दी है किसी अमर सिंह (?) ने।

मैं आज तक नहीं समझ सका कि टीवी डिबेट्स में दहाड़-दहाड़ कर हिन्दुओं की हत्या करने, उन्हें गाँव छोड़कर चले जाने, सड़कों पर ख़ून बहा देने, राष्ट्रीय सम्पत्ति पर अवैध अतिक्रमण करने, लाल किले पर खालिस्तानी ध्वज लहराने, दिल्ली की सड़कों को महीनों तक आवागमन हेतु बाधित किए रहने, भारत को इस्लामिक देश बनाने, अयोध्या के निर्माणाधीन श्रीराम मंदिर को ढहाकर वहाँ पुनः बाबरी मस्ज़िद बनाने जैसी घोषणायें बारम्बार करने वाले निरंकुश, असामाजिक और राष्ट्रविरोधी लोगों के कृत्यों को राष्ट्रविरोधी अपराध क्यों नहीं माना जाता?

मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि कुरीतियों के नाम पर सनातन समाज को परिमार्जित करने का बीड़ा आयातित सम्प्रदाय के ठेकेदारों ने क्यों उठा लिया है जिनका सनातन समाज से दूर-दूर तक कोई सम्बंध नहीं है,… और जो स्वयं अपने समाज या सम्प्रदाय की कुरीतियों एवं अवैज्ञानिक किस्सों को सनातनियों पर थोपना चाहते हैं?

मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि एम.ए. उपाधिधारी श्याम मानव को, जिनकी शिक्षा में विज्ञान के विषय नहीं रहे हैं, विज्ञान की कितनी समझ है कि वे बात-बात में अधिकारपूर्वक विज्ञान और वैज्ञानिकता की बात ही नहीं करते बल्कि दूसरों को चुनौती भी देने लगते हैं? किसी बात की वैज्ञानिकता को परखने के लिए उनके पास उपलब्ध उपायों और मापदण्डों की वैज्ञानिकता क्या और कितनी है?

मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि अंधश्रद्धा निर्मूलन वाले श्याम मानव ने, चुनौती का सामना न कर पाने की स्थिति में पं. धीरेंद्र शास्त्री को लाखों रुपये का इनाम देने के लिए व्यवस्था कहाँ से की है?

मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि श्याम मानव ने अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिए केवल सनातन समाज को ही क्यों चुना है?

यदि आप चमत्कार करने और औषधि के बिना ही किसी रोगी को रोगमुक्त कर देने के आश्वासनों को अपराध मानते हैं तो ऐसा करने वालों में पुजारी, बैगा-गुनिया, पादरी और मौलवी ही सम्मिलित नहीं हैं बल्कि जनता को झूठे आश्वासन देने वाले नेता, झूठे विज्ञापनों से जनता को मूर्ख बनाने वाले अभिनेता, काउंसलिंग द्वारा मनोविकार दूर करने वाले मनोचिकित्सक और कुछ रोगों में प्लेसीबो देने वाले उच्चशिक्षित चिकित्सक भी सम्मिलित हैं। कोरोना वायरस की कोई औषधि न होने पर भी दुनिया भर के चिकित्सकों द्वारा अ-तार्किक, अ-वैज्ञानिक और अ-विशिष्ट औषधि दे कर चिकित्सा करने का आश्वासन देने वाले चिकित्सकों के कृत्यों को भी अवैज्ञानिक, क्रूर और जनता को मूर्ख बनाकर धन कमाने वाला क्यों नहीं माना जाना चाहिये?

सनातन समाज सदा से मानता रहा है कि पाखण्ड जैसे जानबूझकर किए जाने वाले अपराधों और ज्ञान के अभाव में अंधविश्वास जैसी धारणाओं को दूर किये जाने के प्रयास समय-समय पर किये जाते रहने चाहिये किंतु इस कार्य के लिए अ-सनातनी लोगों द्वारा जानबूझकर सनातन समाज का ही बारम्बार चयन किया जाना दुष्टतापूर्ण कृत्य ही कहा जायेगा। सनातन समाज तो वह समाज है जिसमें कालक्रम में आयी कुरीतियों को दूर करने के लिए समय-समय पर महापुरुष जन्म ले कर अभियानपूर्वक इस तरह के शोधन-परिमार्जन करते रहे हैं। यह वह समाज नहीं है जहाँ धार्मिक-अध्यात्मिक-दार्शनिक और सामाजिक आदि विषयों के मुक्तविमर्श प्रतिबंधित हों या “सर तन से जुदा” के नारे लगा कर किसी को भी बलपूर्वक चुप करा दिये जाने की क्रूर और आपराधिक परम्परा रही हो।

रविवार, 22 जनवरी 2023

चमत्कार/पाखण्ड और जीवनपद्धति

         हर व्यक्ति वैज्ञानिक नहीं होता, उनकी सोच भी वैज्ञानिक नहीं होती, इसलिए हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएँ, आधिकांश आम लोगों में अंधविश्वास, चमत्कार और पाखण्ड के प्रति आकर्षण बना ही रहेगा। अंधविश्वास, चमत्कार और पाखण्ड का धर्म से कोई सम्बंध नहीं, तथापि यह बहुत से लोगों की जीवनशैली हो सकती है। मनुष्येतर प्राणियों में यह सब नहीं होता, उन्हें इस सबकी आवश्यकता भी नहीं हुआ करती, तो क्या इसकी आवश्यकता केवल मनुष्यों को ही हुआ करती है?

बाबाओं के चमत्कारी दरबारों, मौलवियों की दरगाहों और पादरियों की चंगाई सभाओं में लोग अपनी पीड़ा लेकर जाते हैं, हर स्थान पर लगभग एक जैसे ही दृश्य हुआ करते हैं, रोते-चीखते, उछलते-कूदते, नाचते-झूमते और विक्षिप्तों जैसा असामान्य व्यवहार करते हुये पीड़ित लोग, …जिन्हें अपनी भौतिक समस्याओं के समाधान के लिए किसी चमत्कार की आशा होती है, उनकी आशायें कितनी फलवती होती हैं इसका कोई सर्वेक्षण हमारे पास नहीं है। क्या सनातन धर्म, इस्लाम और ईसाइयत को बनाये रखने के लिए इन सबका होते रहना आवश्यक है?   

पी.सी. सरकार का जादू देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ा करती थी, लोग पैसे देकर जादू देखते थे, इससे दर्शकों को कुछ समय के लिए सुख की अनुभूति होती थी। कौन नहीं जानता कि जादूगर की जीविका का सबसे बड़ा आधार उसका झूठ ही हुआ करता है! किसी सरकार ने इसे कभी प्रतिबंधित नहीं किया, किसी ने इसके विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं किया।

फ़िल्म के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों-खलनायकों और खलनायिकाओं का जीवन क्या वास्तव में वैसा ही होता है जैसा कि फ़िल्मों में वे प्रदर्शित करते हैं! राजनीतिक नेताओं के अश्वासनों और पाखण्डी जीवनचरित्र से हम सब अनभिज्ञ हैं क्या! एक ही नेता विभिन्न अवसरों पर अपनी पहचान को कभी मुसलमान जैसा, कभी ईसाई जैसा तो कभी सनातनी हिन्दू जैसा प्रदर्शित करता है। हम किसके ...और कौन से आचरण को पाखण्ड कहेंगे और किसे पाखण्ड से मुक्त रखेंगे?

सर्जरी से पहले हर रोगी को एक वचनपत्र हस्ताक्षरित करके चिकित्सक को देना होता है, …कि यदि ऑपरेशन सफल न हुआ तो असफलता का कोई दायित्व चिकित्सक पर नहीं होगा, …और यदि कोई कॉम्प्लीकेशन होते हैं तो उसके लिए भी चिकित्सक उत्तरदायी नहीं होगा। चिकित्सक नहीं तो फिर कौन होगा उत्तरदायी, क्या स्वयं रोगी या फिर ईश्वर? रोगी या ईश्वर की इसमें क्या भूमिका हो सकती है? चिकित्सक के पास तो विज्ञान का सत्य होता है फिर भी वह अपनी क्रिया की सफलता के प्रति सुनिश्चित क्यों नहीं होता? वह कौन सा घटक है जो शल्य कर्म की सफलता के प्रति चिकित्सक को सुनिश्चित नहीं कर पाता? कुछ है जो हमारी पकड़ से छूट गया है, कुछ है जो अभी भी रहस्य बना हुआ है। यह थोड़ा सा बचा हुआ रहस्य ही हमें एक अद्भुत संसार में ले कर जाता है जहाँ चमत्कार है और अविश्वसनीय सी जीवनशैलियाँ हैं। दुनिया भर की जनजातियों से लेकर उच्चशिक्षित लोगों में भी इस रहस्यमय संसार के प्रति एक स्थान शेष रहता है। अंगूर की शराब की नदी और बहत्तर हूरों के अद्भुत आकर्षण से तो उच्च शिक्षित इंजीनियर्स, डॉक्टर्स, प्रोफ़ेसर्स और विद्वान भी कहाँ मुक्त हो सके हैं! सत्य कहाँ है? रहस्य कहाँ है? पाखण्ड कहाँ है?              

प्रमाण

विषय है श्रद्धा-अंधश्रद्धा, विश्वास-अंधविश्वास और आस्था-अनास्था का। संदर्भ है बागेश्वर धाम वाले धीरेंद्र शास्त्री, मदर टेरेसा, पी.सी. सरकार, श्रीराम मंदिर, निजामुद्दीन औलिया की दरगाह और जामा मस्ज़िदों का। 

दृष्टिकोण

वे मानते हैं कि ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, मूर्तिपूजा, मंत्र, भूत, प्रेत, जादू-टोना, ज्योतिष, जन्मकुण्डली, हस्तरेखाशास्त्र, चमत्कार, पाखण्ड और आयुर्वेद आदि विषयों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता इसलिये समाज में इनका व्यवहार प्रतिबंधित हो जाना चाहिये। ।

           वे मानते हैं कि दुनिया में दो विषय हैं – विज्ञान और अविज्ञान।

कुछ लोग हमें बताते रहे हैं कि जिसे भौतिक प्रयोगों एवं प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया जा सके वही विज्ञानसम्मत है, शेष सब अविज्ञानसम्मत है। अर्थात आदिकाल में, जब मनुष्य को वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी नहीं थी, प्रयोगशालायें नहीं थीं, चिकित्सक नहीं थे, भौतिकशास्त्री नहीं थे... तब कुछ भी विज्ञानसम्मत नहीं था। नदियों का बहना, सूर्य से प्रकाश और ऊर्जा का धरती तक पहुँचना, बीज का उगना, पुष्प की सुगंध का हवा से होते हुये हमारी नासिका तक आना... कुछ भी विज्ञानसम्मत नहीं था। ...तो क्या इनका अस्तित्व नहीं था, या ये सब क्रियायें विज्ञानसम्मत नहीं थीं! ब्रह्माण्ड और एलोपैथिक चिकित्सा के कई रहस्य अभी तक अनसुलझे हैं, इन विषयों के प्रतिपादित सिद्धान्तों में “probable…” “it is thought…” और “expected to be…” जैसे शब्दों का व्यवहार भूरिशः किया जाता है। ये शब्द किसी सत्य निष्कर्ष की ओर नहीं ले जाते बल्कि संभावनाओं को व्यक्त करते हैं। ...तो क्या आज का विज्ञान सम्भावनाओं के स्तम्भों पर ठहरा हुआ है!

अभी कोरोना विषाणु और उसके जेनेटिक वैरिएण्ट्स ने चिकित्सा के मूर्धन्य विद्वानों को खूब नचाया। विश्वस्वास्थ्य संगठन के विद्वानों ने कोरोना वायरस सिण्ड्रोम को कोरोना वायरस डिसीस माना और विद्वान चिकित्सकों ने स्पेसिफ़िक ट्रीटमेंट न होते हुये भी कोरोना संक्रमितों की चिकित्सा की, किन उपायों से चिकित्सा की? जब कोरोना वायरस की कोई औषधि ही नहीं है तो चिकित्सा में जिन औषधियों का व्यवहार किया जाता रहा उनका वैज्ञानिक आधार क्या था? क्या वे उपाय विज्ञानसम्मत थे? क्या आज दिनांक तक कोरोना वायरस, उसके वैक्सीन, उसकी चिकित्सा आदि विषयों पर बारम्बार सिद्धांतों में परिवर्तन नहीं किये जाते रहे हैं? सत्य सार्वकालिक होता है, क्षण-क्षण परिवर्तनकारी नहीं होता... तो क्या चिकित्साविज्ञान सत्य से अभी बहुत दूर है? फिर तो जो सत्य के समीप नहीं है उसका व्यवहार ही क्यों होना चाहिये, उसके व्यवहार को विज्ञानसम्मत कैसे माना जा सकता है?

धीरेंद्र शास्त्री, संत शक्तियों से सम्पन्न मदर टेरेसा, न जाने कितने पादरी-मौलवी, मनोरोगचिकित्सकों द्वारा की जाने वाली काउंसलिंग एवं प्लेसीबो चिकित्सा, ताबीज, कलावा, रक्षासूत्र, कोरोना संक्रमितों की अनुमान और लक्षणों के आधार पर की जाने वाली चिकित्सा, और क्लीनिकल ट्रायल्स में दिये जाने वाले प्लेसीबो के बीच एक बहुत पतली सीमा रेखा है जिसे पहचानना बहुत आवश्यक है... सभी के लिए नहीं, केवल उन लोगों के लिए जो शास्त्रार्थरसिक हैं।

हमें सेंटाक्लॉज़ के उपहारों से बँधी उन कहानियों पर भी विचार करना होगा जो बालमन पर दीर्घकाल तक छायी रहती हैं। हमें “आशा”, “धैर्य” और वाच एण्ड वेट” जैसे शब्दों की वैज्ञानिकता और उनके व्यवहार पर भी चिंतन करना होगा।

        हम मानते हैं कि अंध-विश्वास, पाखण्ड और अंधश्रद्धा जैसे विषय हमें सत्य की ओर नहीं ले जाते, सत्य से दूर ले जाते हैं किंतु माँ की लोरी और दादी की कहानियों का क्या किया जाय जो बच्चों को बहुत प्रिय हैं!