गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

राजीव जी की भोली सी किन्तु खरी-खरी कविता पर कठोर सी किन्तु खरी-खरी टिप्पणी .....

सच कहा तुमने........
देखना तुम्हें ......सजा-धजा 
अच्छा लगता है मुझे, 
पर वह दृष्टि 
ज़ो मेरे पास है तुम्हारे लिए 
कहाँ रखी औरों के पास ?
यकीन करो 
बहुत फ़र्क  है 
घर की  
और घर से बाहर की दुनिया में.
सब कुछ नहीं है वैसा 
जैसा देता है दिखाई. 
और फिर ........
ज़ो वचन दिया था मैनें 
तुम्हें .......
भरे समाज में 
लेते समय सात फेरे ..... 
उन्हें पूरा करना है मुझे ही 
...........और सिर्फ मुझे ही 
इसलिए पति  को बनना पड़ता है 
एक पुरुष भी.
मैं नहीं चाहता
जब भी निकलो तुम घर से बाहर 
भेदती रहें तुम्हें 
लोगों की घूरती आँखों से निकलीं एक्स-रे 
और शर्म से तुम्हें छिपना पड़े मेरे पीछे  
और सच कहूं .......
कोई पति देख नहीं सकता 
अपनी पत्नी को 
बनते हुए
एक नुमाइश की चीज़ 
न जाने क्यों ....न जानें क्यों ! 


2 टिप्‍पणियां:

  1. baba ....bilkul sahii soch he baba....x ray wali nazra sirf patiyon ke liye hi nhi..aurton ke liye bhii asehniy hain.....
    sabhi ko apni maryaadon ka ptaa hona chahiye....prshnsaa..aur abhdrtaa me ik kaafi moti lakeer he..sabko dekhni chaiye..laaghne se pehale..bahut sashakat rchnaa....

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.