शनिवार, 11 दिसंबर 2010

पढ़ सको तो ......

मैं 
नदी नहीं........ 
कि काट कर घायल कर दूं 
अपने ही किनारों को, 
और ......न बेबस तालाब हूँ .......
कि कीचड में तब्दील कर दूं 
अपनी सारी सीमाएं / 
मैं 
हमेशा के लिए 
न तो बह कर जा सकता हूँ .......
नदी की तरह, 
न ठहर सकता हूँ ....... 
तालाब की तरह 
............किन्तु 
तुम मुझे इल्ज़ाम न देना,
मैं तो बारबार आऊँगा............
ज्वार की तरह 
.................तुम्हें स्पर्श करने ...........
लौट जाऊंगा फिर
उछाल कर सीपियाँ ............ 
तुम्हारे सुनहले....रूपहले तट पर 
और लिख कर .......
बालू पर एक इबारत .............
पढ़ सको तो पढ़ लेना
खारे पानी की 
अनंत व्यथा-कथा.