रविवार, 19 दिसंबर 2010

सर्दी की एक सुबह

सुबह-सुबह सैर को निकले
लोग-बाग़ कपड़ों में लिपटे
आते-जाते रोज देखते .............
सुबह देर तक सोये रहते, मरियल से दो प्राणी
एक कुत्ता......और एक भिखारी.
ठिठुर-ठिठुर कर रात बिताते  
एक-दूजे की देह तापते, सर्दी की रातों के साथी
दिन चढ़ते ही सड़क नापते,  इधर ताकते ... उधर ताकते  
जो न समाया कुछ पेटों में .......उस जूठन से पेट पालते 
मरियल से दो प्राणी ....एक कुत्ता और भिखारी .
ऐसे दृश्य न जाने कितने लोगों नें देखे होंगे 
देख-देख कर सभी लोग तो अनदेखी करते होंगे 
पर यह मामूली सी बात ......अचानक नामामूली बन जाती 
जब कभी रात में कोई ठिठुरकर
भगवान को होता प्यारा
बस, एक सुबह भर सुर्खी बनता 
समाचार-पत्रों में छपकर
क्षण भर सबका ध्यान बटाता 
प्रश्न, और फिर यह दोहराता.......
समाधान की बात छोड़....सब करते रहे प्रतीक्षा ?
जब तक रही वेदना, किये उपेक्षित सभी निवेदन
जब हुयी वेदनाहीन देह ......तब ही जागा संवेदन ?

किन्तु हुआ कुछ उलट-पुलट यूँ
की नहीं प्रतीक्षा मरने की यूँ 
जब एक वृद्ध नें शाल उतारी........ 
ठिठुर रहे उन दोनों को, अपनी महंगी शाल ओढ़ा दी
फिर कहा नहीं ........., पर मन में सोचा ..................
शपथ ग्रहण में व्यर्थ प्रदर्शन......!
वही अपव्यय यदि रुक जाता
तो बच जाता ........कितना सारा धन
बच जाता कितनों का जीवन।
पर कौन बताये उनको यह सब ...धृतराष्ट्र हो गया है ये शासन   
ऐ ! राष्ट्र चलाने वालो तुमको 
राष्ट्र-धर्म की समझ न आयी
किस हाल में जीते बन्धु तुम्हारे ....नेक दया या शर्म न आयी  
सब के हक पर मार कुण्डली 
बैठे......तुमको लाज न आयी. 
लोक-तंत्र का किया तमाशा
टूट रही जन-जन की आशा. 
अब तो जागो हुआ सबेरा 
बंद करो या झूठा खेला. 
कितना कुछ तुम खा पाओगे ?
साथ में कितना ले जाओगे ?
कुछ इनकी भी समझो लाचारी  
एक कुत्ता ...और एक  भिखारी ......