बुधवार, 1 दिसंबर 2010

आज़ादी बचाओ आन्दोलन ...

आजादी बचाओ आन्दोलन के सूत्रधार भाई राजीव दीक्षित नहीं रहे .......
वे एक अकिंचन ....हृदय में देश के प्रति दीवानगी लिए ..........कुछ कर गुजरने की ऊर्जा लिए ......एक चलते-फिरते ग्रंथालय थे..... खुद एक जलती हुयी मशाल थे.
कई साल पहले छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में पहली बार उनको देखा था .....उसी छत्तीसगढ़ से उन्होंनें एक बार फिर बिदाई ली ...पर इस बार अंतिम बिदाई ......वे अल्पायु में चले गए ......एक मशाल जला कर चले गए ......एक बड़ी ज़िम्मेदारी चुपके से हमें सौंप कर चले गए ......अपनी चिर-परिचित शैली में मुस्कराते हुए ......जैसे कह रहे हों ...."लो भाई ! मैं तो चला अब .....मुझे और भी काम हैं ....अब  ये मशाल रही आपके जिम्मे .....जलाते रहना ....आजादी को बचाते रहना ......"
...लगता है वे जा रहे हैं ....मुस्कराते हुए .....अपनी अंतिम यात्रा पर.
अक्सर ऐसा ही होता है, जिन्हें हम चाहते हैं .....जिनकी हमें ज़रुरत होती है .......जिन्हें लम्बे समय तक हमारे बीच रहने की दरकार होती है ....वे ही हमें छोड़कर चले जाते हैं .......जैसी ईश्वर की मर्जी ! 
भाई राजीव  ! आप बहुत याद आओगे . 
जगह-जगह श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किये जा रहे हैं ......एक औपचारिकता.......शायद .....कुछ आँसू...कुछ भाषण ....फिर ...फिर सब-कुछ यथावत......सदा की तरह .....यही हमारी आदत है ......हम नेक भी उनके आदर्शों का पालन कर सके अपने जीवन में ......तो ही श्रद्धांजलि की पात्रता के अधिकारी हो सकेंगे .
ॐ शान्तिः. ! शान्तिः !! शान्तिः !!!