रविवार, 5 अप्रैल 2026

शत्रुबोध की पैथोलाजिकल फिलासफी

आज का ज्वलंत विषय है नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा अर्थात अपसंस्कृति का कूटनीतिक चरित्र।

विश्व भर में नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा वर्तमान सभ्यता की सबसे बड़ी समस्यायें बन चुकी हैं। इनका मानवीकरण किया जाय तो ये वैचारिक और राजनीतिक हिंदूकुश की घटनायें हैं जो प्रतिपल घटित होती जा रही हैं।

दर्शन और भौतिक विज्ञान में सूक्ष्म की विराटशक्ति को स्वीकार किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से एक हिंदू संगठन को हम अपने सनातनी समाज का एक महत्वपूर्ण अंग मानते रहे, इतना अपना कि अपने शरीर की सूक्ष्मकोशिका और कभी-कभी कोशिकाअवयव के समान... यानी एक माइक्राॅन से भी सूक्ष्म, जिससे वह सनातनी समाज में विराटशक्ति के साथ स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण कर सके। किंतु हुआ क्या! संगठन ने हमारी सदाशयता का लाभ उठाकर नैनोप्लास्टिक की तरह मिमिक्री प्रारम्भ कर दी। एक विधर्मी द्रव्य को हम पहचान नहीं सके और उसे अपने ही पोषण के अंश से प्रोटीन-कोरोना बनाते रहे। 
(Cells often mistake nanoplastics for nutrients or foreign agents and actively pull them inside via processes like endocytosis or macropinocytosis. Once inside, they can accumulate in organelles like lysosomes. Upon entering biological fluids, nanoplastics interact with proteins, lipids, and carbohydrates, creating a "protein corona" around themselves. This coating makes them behave like biological particles, masking them from immediate immune clearance and allowing them to be transported throughout the body.)
संगठन के सूक्ष्म विचार जो कि वास्तव में संकुचित थे, ब्लड-ब्रेन-बैरियर को बड़ी सुगमता से पार कर तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचने लगे। संगठन की कार्यप्रणाली नैनोप्लास्टिकवत हमारी मस्तिष्क की तंत्रिकाओं की एपोप्लास्टी (कोशिका मृत्यु) की कारण बनती गई और हमें कुछ भी पता ही नहीं चला।
(Nanoplastics can trigger cell membrane damage, oxidative stress, and inflammatory responses,releasing cytokines, similar to the body's response to pathogens. They can impair energy metabolism, disrupt mitochondrial function, and cause cellular apoptosis i.e. cell death.) 
जहाँ संगठन नैनोप्लास्टिक की तरह हमारे चिंतन को प्रभावित कर एपोप्लास्टी का कारण बनता गया वहीं उसके राजनीतिक प्रकल्प हमारे विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध करते रहे और हम कुछ समझ ही नहीं सके। सनातनियों के प्रति उसकी कार्यप्रणाली कार्सिनोमा की तरह फलती-फूलती रही। कार्सिनोमा कोशिकायें हमारी सामान्य कौशिकाओं का रूप धारण कर हमें ही खाती रहीं और हमें अपने भीतर छिपे शत्रु की भनक तक नहीं लगी।

संघ, सिकलिंग और सवर्ण

यह गंभीर चिंता का विषय है कि डाॅक्टर होने के बाद भी मोहन भागवत अंतरजातीय रोटी-बेटी व्यवहार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। भागवत की गतिविधियाँ महर्षि परंपराओं के विरुद्ध म्लेच्छ परंपराओं की स्थापना के समर्थन में बढ़ती ही जा रही हैं। यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संहारक प्रहार है जिससे सतर्क होने की आवश्यकता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और इंद्रेश कुमार के बीच हुयी एक वार्ता के अनुसार संघ के प्रयासों से दस लाख हिंदू लड़कियों के निकाह मुस्लिम लड़कों से करवाये जा चुके हैं।
संघ के मोहन भागवत इस तरह की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करके सवर्ण समुदाय को भारत से पूरी तरह समाप्त कर देना चाहते हैं।
रोटी व्यवहार तो पूरे भारत में अंतरजातीय ही नहीं अंतरधार्मिक भी स्वीकार किया ही जा रहा है। किंतु अंतरजातीय बेटी व्यवहार स्वीकार करने से पहले चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से भी इसे समझना होगा। जिन्होंने सिकलसेल डिसीज के पीड़ितों की विभिन्न पीड़ादायक स्थितियों को देखा है वे इसकी गंभीरता को अच्छी तरह समझ सकते हैं।
यहाँ सवर्णेतर जातियों में होने वाली सिकलिंग और थैलेसीमिया जैसी आनुवंशिक और अचिकित्स्य व्याधियों के संदर्भ में मोहन भागवत के विचार को समझे जाने की आवश्यकता है।
सिकलिंग जैसी आनुवंशिक व्याधियों से सर्वाधिक प्रभावित लोगों में एसटी के बाद एससी और फिर पिछड़ी जातियाँ हैं, जबकि सवर्ण इस व्याधि से पूरी तरह मुक्त रहते हैं(इस अनुबंध के साथ किसी सवर्ण ने सिकलिंग प्रभावित के साथ अंतरजातीय विवाह न किया हो)
एक अध्ययन में पाया गया है कि सिकल सेल डिसीज एस.सी.डी., सिकल सेल ट्रेट (एस.सी.टी.) और एचबीएस-बीटा-थैलेसीमिया की व्यापकता क्रमशः 1.17% (95% सीआई: 0.79%–1.75%), 5.9% (95% सीआई: 3.8%–8.88%) और 0.37% (95% सीआई: 0.17%–0.83%) अनुमानित की गई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में एस.सी.डी. और एस.सी.टी. की व्यापकता अधिक है। भारत के आदिवासी समुदायों में इसका बोझ सर्वाधिक है।
सिकलिंग और थैलेसीमिया व्याधियों की कोई भी चिकित्सा अभी तक संभव नहीं है। भारत के 17 राज्यों अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और उत्तराखंड में SCD की प्रायिकता अधिक है। 
अन्य प्रभावितों में अफ्रीका की कुछ जनजातियाँ और अमेरिकी नीग्रो मुख्य हैं। इसकी उत्पत्ति और विशिष्ट जातीय समूहों में ही होने के कारण अज्ञात हैं। क्या मोहन भागवत प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

जंबूद्वीपे भरतखण्डे

घर से बाहर
जब भी धरे पाँव
लगा ही नहीं कभी
हमारा ही देश है यह!
घर से बाहर
घूमती थीं निर्भय
राजा की रची जातियाँ
खोदती हुई खाइयाँ,
निरंकुश दबंग
सताते हुये निर्बलों को,
स्वेच्छाचारी राजसेवक
लूटते हुये प्रजा को,
और राजपुरुष
रचते हुये चक्रव्यूह
षड्यंत्रों के
आर्यावर्त्त की जनता के विरुद्ध।
बचपन से अब तक
लगा ही नहीं कभी
कि यह देश
हमारा अपना है
हमारे पूर्वजों का है
मंत्रदृष्टा महर्षियों का है।
यहाँ तो हैं
आतंक के बवंडर
असुरक्षा की तेज आँधियाँ
कौन है प्रायोजक इनका, कौन...
बता दूँगा
तो कुपित हो जायेगा राजा
काट देगा जिह्वा।

प्रजा है
नूपुर
बँधी हुई
राजा के पाँवों में
पीपल की पात सी
थरथराती।
हम
परदेस हो चुके अपने ही देस में
परदेसी हैं
या फिर शरणार्थी
खोजते हुये
अपने ही जीवन के
खोए हुये टुकड़े
पल-पल धमकाती
मृत्यु के अट्टहास में।

प्रायोजित भीड़
भरती है हुंकार
ब्राह्मणो! भारत छोड़ो
छोड़कर अपनी बेटियाँ
और
अपनी चल-अचल संपत्तियाँ।
पूरा भारत
लाहौर हो गया है
कश्मीर हो गया है।
सुना है
हमारा भी राजा
डोनाल्ड ट्रंप हो गया है
करता है नृत्य
धधकती ज्वाला की लय पर।

पल्लवित पुष्पित पृथकतावाद

भारत में जितना पृथकतावाद स्वतंत्रतासंग्राम के उत्तरकाल में था उससे भी अधिक आज विभाजन के बाद भी है। हिंदुओं को मंथन करना होगा कि विभाजन से उन्हें क्या मिला? क्या उनकी हिंदू पहचान मिली, क्या हिंदू राष्ट्र मिला?

बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित भारत में हिंदुओं की हत्यायें, उनके स्वाभिमान को कुचलने के निरंतर प्रयास, उनकी मान्यताओं और जीवन पद्धति पर निरंतर प्रहार, उनकी भूमि और बेटियों का अपहरण, शरीया शासन के लिए उत्पात और अब हिंदुओं को भारत छोड़ने की धमकियाँ... ! यही सब तो मिलता रहा है। यहाँ हार-जीत का नहीं, प्रमुख विषय अस्तित्व रक्षा का है।
मुझे लगता है कि अस्तित्व के विषय में हिंदू सर्वाधिक विश्वासघाती समूह रहा है। अरबी मुसलमान शेष विश्व के लिए घातक नहीं हैं जबकि मतांतरित हुये मुसलमान पूरे विश्व में स्थानीय समुदायों के उन्मूलन को अपने जीवन का लक्ष्य मानते रहे हैं। पाकिस्तान का जनक मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू था, वहाँ के अधिसंख्य मुसलमान भारतीय मुसलमानों की ही तरह मतांतरित हैं। ईरान के मुसलमान भी मतांतरित हैं।
यह मतांतरण ऐसा क्या कर देता कि मनुष्य मनुष्य ही नहीं रहता! यद्यपि ईरान की स्थिति भारत से भिन्न है। इसलिए वहाँ के शासक कैसे भी हों पर आम जनता प्रायः ठीक ही है।
भारत में तो मतांतरित मुसलमानों से अधिक मुसलमान सेक्युलर हिंदू हैं जिनमें अब संघ और भाजपा जैसे हिंदूवादी संगठन बहुत आगे बढ़त बना चुके हैं।
तो क्या धरती से हिंदू समाप्त हो जाएंगे? समाप्त तो कोई भी नहीं होगा। हाँ!जनसंख्या समीकरण ऊपर-नीचे हो सकते हैं। आम हिंदुओं को भक्ति और समालोचना के अंतर और उनके परिणामों पर गंभीरता से विचार करते हुये अपने अस्तित्व के संघर्षपथ पर आगे बढ़ना होगा।
स्वातंत्रयोत्तर भारत में हिंदू शासकों ने ही हिंदुओं का सर्वाधिक अहित किया है, आज भी कर रहे हैं। यह सब इसलिए क्योंकि हमने हिंदूमूल्यों का परित्याग कर दिया है। हम वैचारिक आदर्शों को सम्मान देने के स्थान पर जातियों और समूहों को सम्मान देने लगे हैं। आम हिंदुओं को संघ और भाजपा की कलुषिता का पोस्टमार्टम करना ही होगा।

मूलनिवासी

भारत में ब्रिटिश शासन से पहले मूलनिवासी जैसी कोई अवधारणा कभी नहीं रही, कोई औचित्य ही नहीं था इसका। यह तो अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए प्रासंगिक है जहाँ दूसरे देश के लोगों ने स्थानीय लोगों को समाप्त कर अपनी पृथक पहचान बनाई और वहाँ अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। भारतीयों के संदर्भ में यह बात मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना और फिजी आदि के लिए सही है, वह भी इस संशोधन के साथ कि भारतीयों को वहाँ दास बनाकर या काम करवाने के लिए विदेशी शासकों द्वारा ले जाया गया, वे वहाँ स्वेच्छा से नहीं गये और न उन्होंने वहाँ के स्थानीय लोगों का नरसंहार किया। भारतीय जहाँ जाते हैं वहाँकी संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करते हैं।

भारत में सवर्णों के विदेशी होने की कहानी मुस्लिम शासकों द्वारा नहीं अपितु यूरोपीय शासकों द्वारा पहली बार गढ़ी गई। जिस तरह अपने अनैतिक और अन्यायपूर्ण कार्यों को नैतिक और न्यायसंगत बनाने के लिए यूरोपीय शासक उन्हें कानून के मनमाने बंधन में जकड़ने में पारंगत हुआ करते थे उसी तरह उन्होंने भारतीय समाज को तोड़ने के लिए सांस्कृतिक, धार्मिक और अध्यात्मिक मूल्यों पर निरंतर आक्रमण करने को उचित ठहराने के लिए अपनी गढ़ी कहानियों को वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से प्रभावी और प्रामाणिक बनाने के प्रयास किये। इसमें उन्हें कुछ सफलता भी मिली। इन्हीं प्रयासों में एक है "आर्यन इनवेज़न थ्योरी" जिसे प्रामाणिकता का चोला पहनने के लिए डीएनए थ्योरी गढ़ी गई। 

यह बात तो पूरे विश्व के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शोध और आविष्कार प्रायः राज्याश्रित या सत्ताश्रित हुआ करते हैं। यही कारण है कि यदि सत्ता दुष्टों के हाथ में हुयी तो शोध के विषय और उसके परिणाम सत्ताधीशों के स्वार्थ से प्रभावित होते हैं। कोविड-१९ और ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के विरुद्ध लाये गये वैक्सीन्स इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। शोधकार्यों के क्षेत्र में यह एक अवांछित, दुःखद और कटु सत्य है। 

देशी-विदेशी डीएनए को आधार बनाने से पहले कुछ अन्य व्यावहारिक तथ्यों पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। डीएनए प्राप्त करने के लिए जिन नरकंकालों के प्रादर्श लिए गये हैं उनकी राष्ट्रीयता का आधार क्या है? यह कैसे पता लगेगा कि वह कंकाल किसी विदेशी सैनिक, व्यापारी या पर्यटक का नहीं अपितु भारतीय का ही है, जबकि भारतीयों की सनातन परंपरा में शवदाह किया जाता रहा है। शव को भूमि में गाड़ने की विदेशी परंपरा रही है, भारत की नहीं। दूसरी बात यह कि भूमि से निकाले गये इस तरह के नरकंकालों की संख्या कितनी है, क्या ये व्यापकरूप से और बहुत अधिक संख्या में पाए जाते रहे हैं?

हम इस लेख में मूलनिवासी और विदेशी विवाद के सत्य को डीएनए, भाषा, लिपि, शारीरिक गठन, परंपरा, विकास, पुरातात्त्विक प्रमाण, स्थापत्यकला और साहित्यादि दृष्टियों से हटकर कुछ अन्य बिंदुओं के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे। 

आवागमन, भ्रमण और बसाहट सदा से मनुष्य की स्वाभाविक गतिविधियाँ रही हैं। जलमार्गों की अपेक्षा थलमार्गों से यह सब अधिक सुगम होता है इसलिए सामान्य स्थितियों में आपसी संबंधों में तरलता का होना स्वाभाविक है। इसीलिए आवागमन और वैवाहिक संबंधों में प्रांतीय और राष्ट्रीय सीमायें अधिक बाधक नहीं हो पातीं। सीमावर्ती क्षेत्रों में यह सदा से रहा है, आज भी है।  उत्तराखंड, उप्र और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाल, तिब्बत और भूटान के निवासियों के बीच वैवाहिक संबंधों की तरलता देखी जाती है। यही तरलता न्यूनाधिक रूप में पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों में भी है, जो विभिन्न कालों में परिवर्तित होती रही है। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि बृहत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में हमारे वैवाहिक और व्यापारिक संबंध तत्कालीन देशों के क्षेत्रीय लोगों के साथ नहीं हुआ करते थे। यही कारण है कि उत्तर-पूर्वी भारतीयों में तिब्बती और मंगोल मुखाकृतियाँ आसानी से दिखाई दे जाती हैं तो पश्चिमी सीमावर्ती भारतीयों में गांधार, सिंध, ईरान और निकटवर्ती कज्जाक, उज़्बेक आदि लोगों से वैवाहिक संबंधों के कारण उत्पन्न संततियों के वंशज आज भी मिलते हैं। जो स्थिति भारतीयों की है वही स्थिति तिब्बतियों, नेपालियों और ईरानियों की भी है। उनके गुणसूत्रों में हमारे भी गुणसूत्र हैं। यही स्थिति पूरे विश्व की है। वास्तव में पशु-पक्षियों की तरह मनुष्यों में भी मिलने-जुलने और आपसी संबंधों के लिए एक स्वाभाविक तरलता होती है, अंतर केवल इतना है कि मनुष्य के प्रकरण में राजनीतिक कारणों से न्यूनाधिक प्रतिबंध इन संबंधों को बाधित करते हैं। 

क्या यह संभव है कि ईरानियों में पश्चिमी भारतीयों के या फ्रांसीसियों में डच लोगों के गुणसूत्र न हों! यह सब सदा से होता रहा है, सदा होता रहेगा। इस बात का कोई औचित्य नहीं कि अरब सागर और हिंदमहासागर का जल आपस में क्यों मिल गया, और मिलने के बाद उसमें से कितना जल मूलहिंदसागरीय है और कितना विदेशी। 

इसी भारत में भाभा, जमशेद जी टाटा और मानिकशाॅ भी रहे हैं और इसी देश में ख़ामेनेई की मृत्यु पर रोने-चीखने और ईरान के लिए चंदा भेजने वाले शिया भी हैं। कोई भारत में आकर भारतीय हो जाता है तो कोई भारत में शताब्दियों से रहकर भी भारतीय नही हो पाता।

मुझे भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में कई पीढ़ियों से रह रहे हाॅर्न आॅफ़ अफ्रीका (इरिट्रिया, इथियोपिया, सोमालिया और दिजिवूती) से आकर बसे लोगों से मिलने का अवसर मिला है। उनमें मूलनिवासी या विदेशी जैसी कोई भावना दिखाई नहीं देती। दूसरी ओर क्या मणिशंकर अय्यर, अखिलेश यादव और लालूप्रसाद जैसे लोगों को भारतीय माना जा सकता है!

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हिंदूराष्ट्र

नये संदर्भों में "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्घोष निरस्त कर दिया गया है। हिंदुत्व के अभी तक स्वयंभू सारथी रहे मोहन भागवत ने "हिंदू" शब्द के अस्तित्व को ही नकार दिया है। तो अब भारत के इतिहास को नये संदर्भ में समझना होगा... वैसा ही जैसा कि भारतीय समाज को हाँकने वाले स्वयंभू विद्वान समझाना चाहते हैं।

इस देश के बहुसंख्यक समाज के बौद्धिक मालिक अब हिंदूराष्ट्र के पक्ष में नहीं हैं। उनका आदेश है कि यह देश सबका है। अर्थात यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को विकसित करने वाले "सब" लोग हैं, यहाँ की प्राचीनता का ऐतिहासिक महत्व समाप्त हो गया है।
परमपूज्य मालिक जी! आपके ये "सब" कौन हैं?
क्या आपके ये "सब" भारत के नागरिक हैं। भारत के नागरिक कौन हैं? क्या वे "सब" भारतीय नागरिक हैं जो भारत में रहते हैं, जिनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र हैं। अर्थात रोहिंग्या, बांग्लादेशी, विभाजन से पूर्व पृथक देश बनाने के लिए मतदान करने वाले मुस्लिम जो विभाजन करवाने के बाद भी शेष भारत का गजवा-ए-हिंद करने के लिए यहाँ से कहीं नहीं गये, गजवा-ए-हिंद की हुंकार भरने वाले लोगों के समर्थक अतिविद्वान सेक्युलर्स आदि ...यही हैं आपके "सब"?
अभी तक जो लोग आपकी आज्ञा से स्वयं को हिंदू मानते रहे वे एक झटके में अब कहीं भी नहीं है, क्योंकि आपने तो निर्णय कर दिया है कि यह शब्द भारतीय है ही नहीं।
अभी तक "हिंदुओं" के मालिक रहे मोहन भागवत क्या अब सवर्णों को यूरेशियन्स घोषित कर रहे हैं? वे तो यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हिंदुत्व के ठेकेदार नहीं हैं इसलिए हिंदुत्व की राजनीति नहीं करेंगे, केवल राष्ट्रनिर्माण की बात करेंगे। अच्छी बात है, राष्ट्र निर्माण होना ही चाहिए। कैसे होगा? कौन करेगा? कैसे करेगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने का अधिकार यूरेशियन्स को नहीं है।
हिंदूराष्ट्र का नारा अब गजवा-ए-हिंद के नारे के सामने समाप्त हो गया है। संघ के इंद्रेश कुमार बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नाम से भारत का सांख्यिक विभाजन स्वीकार कर बहुत पहले ही अल्पसंख्यक घराने के मुखिया बन चुके हैं। सभी मालिक "अल्पसंख्यक" के उत्थान के लिए चिंतित और समर्पित हैं । बहुसंख्यक यूरेशियन्स के उत्थान का तो अब प्रश्न ही नहीं उठता। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि "यह बहुसंख्यकों के समूल उच्छेद की समाजमनोवैज्ञानिक भूमिका है" जिसके जनक हमारे मालिक लोग हैं जिनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे प्रकांड संत भी सम्मिलित हैं।
बृहस्पति आगम में हिंदू शब्द की निरुक्ति दी गई है पर मालिक लोग उसे आर्ष ग्रंथ नहीं मानते। तो क्या आर्ष ग्रंथों में जिसका उल्लेख नहीं है उसका भारत की धरती पर कोई अस्तित्व नहीं माना जाना चाहिए? तब तो संविधान, दलित, सवर्ण, इस्लाम, शाह, मोदी, बौद्ध, टमाटर, गोभी, सिगरेट, सर तन से जुदा ...आदि शब्दों का भी कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए।
मालिक लोग हिंदू शब्द की प्राचीनता को नकारकर क्या यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू शब्द शहंशाह साइरस के युग में ईरानी आक्रमणकारियों ने पहली बार प्रयुक्त किया जिसे बाद में बृहस्पति आगम में यथावत ले लिया गया?
मालिक लोग कल को यह भी कह सकते हैं कि इस देश का नाम भारत नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कम्युनल है, इस नाम में उनके "सब" का प्रतिनिधित्व नहीं होता इसलिए इस देश का नाम "अल्पसंख्यक", "दलित", "बहुसंख्यकमुक्त", या "सबका देश" होना चाहिए।
यदि आपके शब्दकोष में "हिंदू" शब्द नहीं है तो क्या ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जो जंबूद्वीप के इस भूभाग पर उन लोगों की प्राचीनता सिद्ध कर सके जिन्होंने इस देश की संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान एवं चौंसठ कलाओं आदि को स्थापित और विकसित करने में पीढ़ियों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
मालिक जी! हम तुम्हारे "सब का देश" अस्वीकार करते हैं, यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं है तो आपको संघ की प्रार्थना में से "हिंदभूमे", "हिंदुराष्ट्राङ्गभूता", "स्वराष्ट्रम्" और "धर्मस्य संरक्षणम्" आदि शब्दों को भी विलोपित करना होगा और यह भी बताना होगा कि अभी तक इन अस्तित्वहीन शब्दों का हमारे मुँह से गायन करवाकर आपने देश के साथ यह छल क्यों किया? आपका यह "स्वराष्ट्रम्" क्या है, उसकी भौगोलिक स्थिति कहाँ है? अभी तक आप जिस "धर्मस्य संरक्षणम्" का संकल्प करवाते रहे वह "धर्म" क्या है? उस धर्म की संज्ञा क्या है?
इस "सबका देश" के मालिक जी! यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं हो सकता तो क्या आर्यावर्त्त, वैदिकराष्ट्र, सनातन राष्ट्र, ब्रह्मराष्ट्र आदि में से भी कुछ नहीं हो सकता?

मंगलवार, 31 मार्च 2026

वि-चित्र

सत्य है सूर्य

सत्य हैं सूर्य के सप्ताश्व,
सप्तवल्गा का
नियंत्रक
उभय सबका
एक सारथी,
किंतु सबने चुनी
कोई एक वल्गा
किसी ने भगवा
किसी ने हरा
किसी ने नीला,
तुमने चुन लीं
तीन वल्गायें
देखकर अवसर
कभी भगवा
कभी नीला
तो कभी हरा।
प्रतीक बन गये रंग
सबकी पृथक पहचान के।
तुम चुनने लगे रंग
देखकर चाल
पृथक-पृथक पहचान के
क्योंकि विश्वास नहीं तुम्हें
तुम्हारे "स्व" में
इसलिए
तुम्हारे चित्र हैं वि-चित्र।

हमसे नहीं
तुम स्वयं से करते हो छल
पल-पल
बोलकर
मिथ्या वचन
कि सर्वश्रेष्ठ है तुम्हारा चयन
होकर भी
विकृत-चित्र।

सुनो मायावी!
जल गई होलिका
मारा गया मारीच
मारा गया रावण भी
मारे जायेंगे
एक-एक कर
सारे मायावी
और तुम
नहीं हो अरुण।