शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

महँगा सौदा

सुना था
ख़्वाब देखने के नहीं लगते पैसे
इसलिए देख डाले
ढेर सारे ख़्वाब /
फिर ......
टूटते चले गए
एक-एक कर सारे /
मैं क्या जानूं
ये सौदा
इतना  महँगा होगा !
टूटे ख़्वाब .......
और ताजिन्दगी का दर्द ........
है न महँगा ?
बेहद महँगा न !
क्या करूँ,
मैं तो ठगा रह गया हूँ
पर किसी को इलज़ाम भी तो नहीं दे सकता /
खुद ही घुटते रहने को मजबूर हूँ
.....यह एक और दर्द