रविवार, 19 अप्रैल 2026

संविधान संशोधन

वज्जीसंघ की अट्टकुलीय राजधानी वैशाली में राजपुत्रों के हठ पर एक विधान पारित हुआ- आठों राज्यों में जो भी होगी अनिंद्य सुंदरी कन्या वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे नगर की वधू होकर "नगरवधू" कहलाएगी। 

मातृहीना ब्राह्मण कन्या आम्रपाली को उसके पिता ने पूरे नगर की दृष्टि से छिपाने के यथासंभव प्रयास किए पर वह अनिंद्य सुंदरी थी, ख्याति प्रकाशित हुई और अंततः राजपुत्रों ने उसका अपहरण कर लिया।
मगध में राजकुल की कुदृष्टि ने एक ब्राह्मण कन्या को समारोहपूर्वक नगरवधू बना ही लिया।
फिर एक दिन आम्रपाली के देखते ही देखते वज्जीसंघ बिखर गया। 
औपनिवेशिक पराधीनता के बाद भारत में एक बार पुनः लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य स्थापित हुआ, आयु है लगभग आठ दशक मात्र। एक बार पुनः भारत के नये राजा ने ब्राह्मणों को जन्म लेते ही अपराधी घोषित कर दिया है। तब वज्जीसंघ का पराभव हुआ, अब इस राजा की बारी है।
नये सम्राट संविधान में परिवर्तन (संशोधन नहीं) करके
सदन में स्त्रियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे, पर वज्जीसंघ के आठ राजाओं के राजपुत्रों की तरह भाग्यशाली नहीं निकले, संविधान में अतार्किक और अव्यावहारिक परिवर्तन नहीं कर सके। सम्राट तो सदन में स्त्रियों की संख्या नहीं बढ़ा सकेगा, किंतु वैशाली की नगरवधू भारत को  पुनर्जन्म देने के लिए तैयार हो चुकी है।
अभी, जब स्त्री सांसद उनकी दृष्टि में पर्याप्त नहीं हैं तब भी तो सदन चल नहीं पाता, सदस्य संख्या बढ़ने से...
सांसदों में तलवारें अवश्य चलेंगी।
तलवारें चलेंगी तो वज्जीसंघ का उपसंहार हो जाएगा। फिर कोई राजपुत्र किसी ब्राह्मण की अनिंद्य सुंदरी कन्या को नगरवधू बनाने का बिल पारित करने का हठ नहीं करेगा। हम मगध के नये जन्म का स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

वंचितx१०टु द पाॅवर पाँच लाख

अठारहवीं शताब्दी के तीसरे दशक में

सिंधिया राजवंश के संस्थापक
राणोजीराव सिंधिया को
नहीं था पता
कि बीसवीं शताब्दी में
जब जातीय वर्गीकरण करेगा
कोई राजा
वह चिन्हित करेगा
सिंधिया के वंशजों को
पिछड़ा।
महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया
हो गये हैं अब
वंचित, पीड़ित शोषित
और पिछड़ा।
ना...ना...
भगवान ने नहीं
किसी ब्राह्मण ने नहीं
किसी पंडित ने नहीं,
एक अति पिछड़े सम्राट ने
जो कुछ वर्ष पहले ही बना था
पिछड़ा,
फिर एक दिन अचानक
बन गया अति पिछड़ा भी
उसी ने...
उसी सम्राट ने बना दिया
महाराजा राणोजीराव सिंधिया के
राजवंश को
पिछड़ा।

किसी को नहीं पता
कब कोई राजा बना देगा
किसी को भी दलित या अगड़ा
पिछड़ा या अति पिछड़ा
या कुछ और ...
यथा,
अति-अति पिछड़ा
या नितांत गड़बड़ा
या धरती का
"सर्वाधिक वंचित
इन टु टेन टु द पाॅवर पाँच लाख...
साल से प्यासा" ।

राजा घोषित करता है
पहले स्वयं को अछूत
फिर किसी को भी अछूत
और थोप देता है
अपने सारे अपराध
ब्राह्मणों पर
कोसते हुये उनके पूर्वजों को
और देते हुये दंड
उनके वंशजों को,
सदा से
यही तो होता आया है
अन्यथा आप ही बताइए
किस पंडित ने
कब बनाई थीं
जातियाँ
और उनके वर्गीकरण?

संकल्प

'गंगा-यमुना' भी मेरी

'कूभा' भी मेरी
रणजीत-दाहिर की
धरती भी मेरी।
टुकड़े-टुकड़े भी गिनने को
अब ना बचेंगे
सदी आठवीं से जो सहते रहे हैं।
'गंगा-जमुनी है तहज़ीब'
रटते रहे जो
वार छल से वही
हम पे करते रहे हैं।

नवासों के नवासों को भी शरण दी
अपने घर हम तभी से
गँवाते रहे हैं।
चाहते 'शांति' हम
'जंग' पर वो अड़े हैं।
'भाईचारे' के धोखे में
क्यों सब पड़े हैं!
"सर तन से जुदा" भी
वो कर रहे पर
गुणसूत्र उनमें
खोजते हम रहे हैं।
देश लुटता रहा
देखते सब रहे हैं
झूठे गीतों में हम सब
भरमते रहे हैं।
हम गुणसूत्र अपने
उधर खोजते हैं
वो गुणसूत्र अपने 
हमें दे रहे हैं।
उनकी तहज़ीब में
रेत की आँधियाँ
गंगा-यमुना पे आँखें
गड़ाये रहे हैं।
ये बेचते सदा
स्वाभिमान सबका
कलंकित धर्म-वेद करते रहे हैं।
अब ना हम रुकेंगे
ना कुछ सहेंगे
प्राण अर्पित भी करने पड़े तो करेंगे।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

यह रथ खड़ा क्यों है!

आरक्षण से समानता का हठ, किंवा कृष्णपक्ष की रात्रि में सूर्योदव का आश्वासन!

शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से लेकर शासकीय सेवाओं में पदोन्नति तक आरक्षण, चुनाव पात्रता में जाति के अनुसार जातीयआरक्षण और फिर लिङ्ग के आधार पर लैङ्गिकआरक्षण, पेट्रोल पंप आवंटन में आरक्षण...; और उनका सिद्धांत है कि आरक्षण से ही समाज में समानता ला पाना संभव है।

कोई अतिविद्वान आरक्षण शब्द का विश्लेषण नहीं करता, जो इसके लपेटे में हैं वे भी नहीं।
जैसे ही हमारे सामने सजा-धजा आरक्षण शब्द प्रस्तुत किया जाता है, सबसे पहले जो चित्र उभरता है वह है पात्रता के मानदण्डों में अनैतिक शिथिलता, दूसरा है इससे प्रभावित किसी सुपात्र की अन्यायपूर्ण उपेक्षा, तीसरा है परिणामों में गुणात्मक अपेक्षा का अभाव, चौथा है किसी सुपात्र की प्रतिभा से समाज और देश को वंचित करने का हठपूर्ण अपराध, और पाँचवा है किसी सुपात्र को कुंठा की कालकोठरी में एक अनपेक्षित जीवन जीने के लिए बाध्य कर देना।
'आरक्षण' की अवधारणा सामाजिक विषमता के सिद्धांत पर आरुढ़ होकर राजसिंहासन का पथ प्रशस्त करती है। यह एक से छीनकर दूसरे को उपकृत करने की अनैतिकता को समाज पर थोपने का षड्यंत्र है। यह लोकतंत्र का विधिसम्मत बना दिया गया परिहास है।  यह एक ऐसा विधान है जो अविधिक और अलोकतांत्रिक है। यह उठकर दौड़ सकने की संभावनाओं की निर्मम हत्या है। यह संभावनाओं को अपंग बनाने का षड्यंत्र है।
आरक्षण एक ऐसा चक्रविहीन रथ है जो कभी गति नहीं कर सका इसलिए पिछले लगभग आठ दशकों से एक ही स्थान पर खड़ा है, और अब तो तुम्हारी ही प्रेरणा से जिसने खड़े रहने को ही अपना मौलिक अधिकार मान लिया है।
किसी व्यक्ति में उसकी नैसर्गिक सक्रियता की संभावनाओं को निष्क्रियता में ढालने का यह हठ समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को अपंग बना रहा है। आठ दशकों से आरक्षण का रथ आज भी वहीं खड़ा है।
ब्रिटिश शासकों की तरह तुम भी कुटीर उद्योगों और शिल्पों के स्वैच्छिक चयन को जातीय कुप्रथा कहकर निंदा करते रहे और परंपरा से प्राप्त दक्षता-प्रवीणता को समाप्त करने के लिए जातीय ढाँचों का निर्माण करते रहे। तुम जातियों का विरोध करके भी जातियाँ बनाते रहे, जातियों के वर्ग और उपवर्ग बनाते रहे, फिर उन सबको भी कभी इधर कभी उधर करते रहे। यह सब न तो प्रकृति के संविधान के अनुरूप है और न किसी ब्राह्मण के धर्मपथ के अनुरूप। तुम्हें यह अच्छी तरह बोध है कि यह सब अनुचित है और इतिहास कभी तुम्हें क्षमा नहीं करेगा इसीलिए महान बनने की महत्वाकांक्षा में तुम षड्यंत्रपूर्वक अपने कुकर्मों के लिए ब्राह्मणों पर दोषारोपण की ब्रिटिश चाल चलते रहे।
ब्राह्मण तो सदा की तरह आज भी जातीय विषमता को स्वीकार नहीं करता। और तुम जातिप्रथा का विरोध करते-करते न केवल जातियाँ बनाते रहे अपितु उनमें घृणा के बीज भी बोते रहे। यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर विदेशी औपनिवेशिक शासकों की परंपरा को ही आगे बढ़ाते हुए तुम्हारा सुनियोजित आक्रमण है जिसके लिए इतिहास में तुम्हारा अभिलेखांकन किया जा चुका है।

जीवनशैली निषेध

"हिंदू प्रतीकों पर प्रतिबंध, बुर्का और गोल टोपी से कोई आपत्ति नहीं"।

लेंसकार्ट कंपनी के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल द्वारा अपने अधिकारियों/कर्मचारियों को तिलक, कलावा, शिखा, मंगलसूत्र, बिंदी और सिंदूर आदि हिंदू प्रतीकों के साथ कार्यस्थल पर आने और काम करने पर  प्रतिबंध लगा दिया गया। वहीं बंसल को मुस्लिम अधिकारियों/कर्मचारियों के सांप्रदायिक प्रतीकों से कोई आपत्ति नहीं है।
बात बाहर आई तो बंसल ने पत्रकारों के सामने स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि यह आदेश पुराना (फ़रवरी २०२६ का) है, और वर्तमान में अब यह प्रभावी नहीं है।
१९४७ में जब दुनिया के सबसे बड़े और क्रूर नरसंहार के साथ सांप्रदायिक और जीवनशैली के आधार पर देश का विभाजन हुआ था तब क्या किसी ने ऐसी कल्पना की होगी कि खंडित भारत में भी हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के पालन की स्वतंत्रता नहीं होगी!
ईसाई और मुस्लिम शिक्षण संस्थाओं और कभी-कभी तो शासकीय संस्थाओं में भी छात्र-छात्राओं के साथ, हिंदू प्रतीक मिटाने के लिए प्रताड़ना की घटनाएँ होती रहती हैं जिन पर सरकारों का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है।

No Lenskart
#पीयूषबंसल की कंपनी लेंसकार्ट के उत्पादों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। लेंसकार्ट स्टाॅक एक्सचेंज में भी शेयर्स के लिए सूचीबद्ध है। आप यदि शेयर बाजार में ट्रेड या निवेश करते हैं तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि लेंसकाॅर्ट के शेयर्स का सदा के लिए बहिष्कार करने पर गंभीरता से विचार करें।
जिस कंपनी ने हमारे पारंपरिक प्रतीकों का बहिष्कार कर दिया, उस कंपनी के शेयर्स का भी बहिष्कार किया जाना आवश्यक है। सारा संघर्ष सांप्रदायिक पहचान के वर्चस्व को लेकर ही तो है। हमें किसी के विचारों और जीवनमूल्यों से तब तक कोई प्रयोजन नहीं जब तक वह हमारे जीवनमूल्यों और अस्तित्व में अनधिकृत हस्तक्षेप नहीं करता।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

जयंती जो बन गई घृणा

जैसी कि भूमिकायें रची जा रही थीं, तदनुरुप ही भीमराव जयंती किसी उत्सव से अधिक घृणा, उत्तेजना और अपमानजनक गतिविधियों की प्रतीक बन कर रह गई।

स्वयं को हिंदू नहीं मानने की प्रतिज्ञा के प्रतीकस्वरूप मनुस्मृतिदहन, राममंदिर के परंपरागत ध्वज को निकालकर नीलेध्वज लगाने, जूते पहनकर परशुराम चौक की छतरी पर चढ़ने और ब्राह्मणविरोधी नारों के साथ अंबेडकरजयंती मनाई गई। क्या जयंती मनाने का यही स्वरूप होता है! इसमें आनंद नहीं उन्माद था, उत्सव नहीं घृणा का प्रदर्शन था, सामाजिक सौहार्द्य नहीं ब्राह्मणों को भारत छोड़ने की धमकी थी, किसी महान विचार का प्रचार नहीं आत्ममुग्धता का हठ था।
क्या ये सब मनोभाव किसी समाज को उत्थान की ओर ले जा सकते हैं! पूरे देश में हर्ष के स्थान पर आशंकाओं और भय का वातावरण निर्मित कर दिया गया। क्या इसमें भारतीय संस्कृति की लेश भी झलक मिल सकी किसी को?
भगवाध्वज के पतन और नीले ध्वज की विजय के उन्माद से यह कैसे भारत की कल्पना की जा रही है?
भारत ने ऐसे झंझावात न जाने कितनी बार झेले हैं, कहीं यह एक और झंझावात का प्रथम चरण तो नहीं?
विगत कुछ दशकों से हिंदूवादी चोले में छिपे असुरों की गतिविधियों और हुंकारों को देख-सुन कर भी उनके लक्ष्यों को
पहचानने में हमसे बहुत बड़ी भूल हुई है। इसका मूल्य चुकाने के लिए हमें तैयार रहना होगा।
भारतीय समाज आपसी टकराव और व्यापक हिंसा की ओर बढ़ चला है। अब तो दृढ़ संकल्प और लोककल्याणकारी भाव के साथ हमें संगठित होना ही पड़ेगा, इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। यही समय का आह्वान है और शास्त्र का आदेश भी।
अच्छी बात यह है कि दलित और पिछड़े वर्ग के ही कुछ संगठनों ने आयोजन के ऐसे विकृत स्वरूप का विरोध किया है। अस्तु विश्वास है कि भारत का विवेकशील समाज संगठित होकर इस झंझावात का भी सफलतापूर्वक सामना कर लेगा।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

राजपथ

जिसने किया प्रथम बार

दशमलव का व्यवहार
जिसने किया प्रकाशित
वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात
जिसने सुलभ कर दीं
ज्यामितीय रचनायें
और खगोल के रहस्य
जिसने सुयोजित किये सूत्र
त्रिकोणमिति और क्षेत्रमिति के...
ऐसे प्रकाण्ड विद्वान को
धकेल दिया जाता है
नेपथ्य के किसी कोने में
क्योंकि वह नहीं कर पाता
प्रभावित
मतदान और उसके परिणाम।
भारत में
नहीं होता किसी को गर्व
आर्यभट्ट पर
क्योंकि वह ब्राह्मण है
जिसने पीने नहीं दिया
नीर
पाँच सहस्र वर्षों तक
पता नहीं किन्हें?

उसी भारत में
पलकों पर बैठ गया
जिसने त्याग दिया
अपने पूर्वजों का धर्म
अपनी सांस्कृतिक परंपरायें
करते हुये निराधार आलोचनायें
ब्राह्मणों की,
करते हुये दासता
ब्रिटिश महारानी की,
वही होता है पूज्य
और प्रातःस्मरणीय
स्वाधीन भारत में
क्योंकि वह
संपन्न और शिक्षित होकर भी
रहता है दलित...
एक जाति
सत्तारचित
ताकि प्रतिभावान
यदि ब्राह्मण हो
तो दी जा सकें उसे गालियाँ
करने प्रशस्त
अपने-अपने राजपथ।

गणितज्ञशिरोमणि आर्यभट्ट!
तुमने जन्म ही क्यों लिया
कुसुमपुर में!
तुम्हें तो
स्मरण करता है पेरिस
प्रतिपल
जहाँ तुम गये नहीं
जीवन में कभी ।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

हिंदूधर्म

वह सत्ता पाने के लिए धर्म को पृथक  पहचान देता है। उसके नाम में स्वामी है, प्रसाद है और मोर है। तीनों शब्द उस धर्म के अनुयाइयों और संस्कृति में आदरणीय हैं जिसे भारत में "धर्म" की संज्ञा प्राप्त है।

वैदिकभारत के महर्षियों ने सामाजिक और व्यक्तिगत मूल्यों की ऊर्ध्वमुखी गति को प्रशस्त मानते हुये कुछ श्रेष्ठ आचरणों और मनोभावों को पहचान कर लोकहित में प्रकाशित किया, और इसे धर्म की संज्ञा दी। कदाचित् प्रारंभ में यह ब्राह्मणों द्वारा आचरणीय हुआ, इसलिए यह लोक में ब्राह्मणधर्म नाम से भी जाना गया। इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य तीनों वर्णों का धर्म से कोई विरोध था। सभी लोग धर्म के प्रति आदरभाव रखते थे और अपनी-अपनी क्षमतानुरूप उसके आचरण का प्रयास करते थे। शतप्रतिशत अंक लाने वाले को धार्मिक और दस अंक लाने वाले अधार्मिक कभी नहीं माना गया। अधार्मिक वही थे जो धर्मप्रतिकूल आचरण किया करते थे। इस तरह आचरण के आधार पर दो समूह के आचरण वाले समाज में सदा से देखे जाते रहे हैं, आज भी हैं- धार्मिक और अधार्मिक। अपनी पृथक पहचान के लिए ध्वज, नाम, संज्ञा आदि में बहुलता और विशिष्टता एकदेशज तो हो सकती है पर व्यापक नहीं। वैदिक धर्म को ही विभिन्न कालखंडों में ब्राह्मण धर्म, आर्य धर्म या हिंदू धर्म की संज्ञायें दी जाती रहीं, इन सबकी पहचान एक ही है, तात्विक अवधारणा भी एक ही है। इसलिये यह कहना कि हिंदू धर्म का कोई शास्त्रोक्त उल्लेख नहीं है, उतना ही सत्य है जितना यह कहना कि भारत और इंडिया दो पृथक देश हैं क्योंकि वेदों-पुराणों आदि में तो इंडिया कहीं लिखा ही नहीं है।
परवर्ती कालों में स्थानीय मान्यताओं, मूल्यों और सभ्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न मत और संप्रदाय भी अस्तित्व में आते रहे जिन्हें राजनैतिक कारणों से धर्म न होते हुये भी धर्म की संज्ञा दी जाती रही। इस सौरमंडल में धरती एक है, सूर्य एक है, धर्म भी एक है, ये अनेक नहीं हो सकते।
सभी धर्म ईश्वर का मार्ग बताते हैं, यह बड़ी धूर्तता से गढ़ा गया कुविचार है जैसे यह विचार कि ब्रह्माण्ड के सभी स्थूल पिंड एक समान होते हैं।
धर्म को लेकर नाम और पहचान का संकट राजनैतिक धूर्तता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हाँ! इसे कलियुग में पतन की प्रतिस्पर्धा अवश्य माना जा सकता है।
विविथता और अनेकता में एकता का उपदेश कितना तात्विक है!
सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, धूम्रकेतु, वामन तारा और कृष्णविवर आदि ब्रह्माण्डीय पिंडों के विभिन्न समूहों को एक ही कैसे मानना जा सकता है? यदि ये सब एक ही होते तो इनकी विविथता का कोई औचित्य ही नहीं था। सबका रक्त एक समान होता तो इनके चार समूह क्यों होते और क्यों उनमें इनकाम्पेटिबिलिटी होती?
सत्ता के लिए निर्मित चक्रव्यूहों का अस्तित्व उनके पूर्ण होने तक ही रहता है, उसके बाद नहीं। धर्म और अधर्म का ध्रुवीय अस्तित्व सदा रहता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

भगनील दर्शन

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा!

जिसमें मिला दो, लागे उस जैसा ।।

संघ और भाजपा का अध्यात्म दर्शन इसी महान गीत से ऊर्जित है। संघ और भाजपा के अभी तक के चरित्र और कार्यों से स्पष्ट हो चुका है कि उनका अपना कोई रंग नहीं, अपना कोई सिद्धांत नहीं, अपना कोई चिंतन और विचार नहीं। उनका एकमात्र लक्ष्य और धर्म राजसिंहासन है जिसे प्राप्त करने के लिए वे जिसमें "मिलते" हैं उसका ही रूप-रंग-सिद्धांत-आदर्श ...सब कुछ "ग्रहण" कर लेते हैं। आप इसे चार्वाक दर्शन का परिवर्द्धित रूप मान सकते हैं।
इसका वर्तमान उदाहरण विचारणीय है, जिसमें भाजपाइयों का रंग भगवा से नील हो गया है, यही है भगनील दर्शन। वास्तव में यह तो 'हमारा' मूल्यांकन था कि संघ और भाजपा सनातन संस्कृति के लिए समर्पित संगठन हैं। हमारा यह मूल्यांकन त्रुटिपूर्ण था, सत्य यह है कि ये लोग न कभी भगवा थे, न आज नीले हैं, न कभी हरे होंगे। ये लोग अपने लक्ष्य के लिए भगवा, नीला, हरा... या किसी भी अन्य रंग में अपनी सुविधानुसार मिल कर वैसा ही रंग-रूप-ग़ुण-सभ्यता-संस्कृति... आदि ग्रहण कर लेने की "अनुकूलन क्षमता" से संपन्न हैं। ये प्रवचनप्रिय लोग सतोगुण से द्वेष रखते हुये रजोगुण और तमोगुण प्रधान हैं तभी तो इतने घनघोर भौतिकवादी हैं। रजोगुण की एक विशेषता होती है- Association and Dissociation, अर्थात इन्हें स्थायित्व अच्छा नहीं लगता। इसको अपनाया, उसको त्यागा, भगवा त्यागा, नीला अपनाया, कल को नीला त्यागकर हरा अपना लेंगे, फिर कुछ समय पश्चात हरा त्यागकर काला अपना लेंगे। इससे एसोसिएशन, उससे डिसोसिएशन... किसी भी तरह चिड़िया की आँख का बेधन होना चाहिए। यही सच्चा ईश्वर है, यही सच्चा धर्म है, यही सच्चा मार्ग है, ....और जीवन का सारतत्व भी यही है। जब पूरा देश "हिंदुत्वा" के चक्रव्यूह में उलझा हुआ था तब संघ और भाजपा अपने अगले रंग का चयन करने में व्यस्त थे। नील तो आ गया, अब हरित रंग की प्रतीक्षा है।
अब यह अष्टकुलीय वज्जीसंघ की प्रजा को निर्णय करना होगा कि मगध के राजसिंहासन का रंग क्या होना चाहिए!

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

नया भगवान

हठ कर बैठ गया

आमरण अनशन पर
सोचकर
कि कल तक
पंक्तिबद्ध खड़े होंगे
कई मंत्री
लेकर संतरे का रस।
मैं नहीं पिऊँगा रस
करूँगा हठ
"मैं तो चंद्र खिलौना लै हों"।
फिर
जब मनुहार करेगा विश्व
तो पी लूँगा रस
गटागट
फिर मैं करूँगा
विजयनृत्य
जय जयकार होगी मेरी
मिल जाएगा मुझे
धरती का सबसे बड़ा पुरस्कार
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।

पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

धूम्रकेतु

संविधान है तो क्या हुआ
दिन-प्रतिदिन बढ़ते अत्याचारी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
वेद हैं तो क्या हुआ
अज्ञानी भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।
राम-कृष्ण की गाथायें हैं तो क्या हुआ
गाथाओं के उपहासक भी तो हैं
अपनी-अपनी व्याख्याओं के साथ।

विक्रय हेतु उपलब्ध हैं
मंडी में मूर्तियाँ
निराकार की
होने के लिए व्याख्यायित
हमसे, तुमसे
और उनसे भी
जिन्हें नहीं होता कोई लेना-देना
किसी भी मूर्ति से।

न्याय के मंदिर में
नहीं सुनाई देती पवित्र शंखध्वनि
सुनाई देती हैं व्याख्यायें
भिन्न-भिन्न
एक ही धारा की।
सच कभी 'झूठ' हो जाता है
तो झूठ भी हो जाता है 'सच'
झूठ नहीं हो पाता 'झूठ'
सच नहीं हो पाता 'सच'
मौन रहती हैं सूर्य रश्मियाँ
नतशिर
कंपित
देखकर सूर्य को
जाते हुए अस्ताचल।

चर्चित होते हैं
कुछ पात्र
अपनी मृत्यु के पश्चात
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ।
राम, कृष्ण, बुद्ध और ईसा
गांधी, भीमराव और पेरियार
जीवित होते तो देखते
वे क्या थे, क्या हो गये
हमारी-तुम्हारी व्याख्याओं के साथ
जिनका नहीं है कोई संबंध
उनके होने से।

आने वाला है
लोकतंत्र का पंचवर्षीय पर्व
भगवा 'नीला' हो गया है
'नीला' भीम हो गया है।
कहा था वेदव्यास ने
आते ही अरुण के
नहीं रहता शून्य का नील
और नील जब होता है व्याप्त
कर देता है वध
अरुण का।
अरुण
अब नहीं है कहीं
धूम मची है
भीम की
पिछड़ा भीम, अगड़ा भीम
मेरा भीम, तेरा भीम
इसका भीम, उसका भीम
जितने लोग, उतने भीम।
भीम 'संविधान' हो रहा है
संविधान 'भीम' हो रहा है।
शक्ति 'सीता' बनकर
बैठी है शोकमग्न
अशोक वृक्ष के नीचे
श्रीराम की प्रतीक्षा में।
सीता के लिए
स्थायी है तमस
आने-जाने का काम तो
प्रकाश का है
जिसे
अब चाहता ही कौन है!

बहुत शक्तिशाली हैं
मायावी धूम्रकेतु
कोई वाशिंगटन में
कोई तेहरान मे
और भारत में तो
बड़ी भीड़ है इनकी।
क्या सचमुच
तैयार हो रहा है समय
लेकर करवट
सत्यमेव जयते के लिए!

रविवार, 5 अप्रैल 2026

शत्रुबोध की पैथोलाजिकल फिलासफी

आज का ज्वलंत विषय है नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा अर्थात अपसंस्कृति का कूटनीतिक चरित्र।

विश्व भर में नैनोप्लास्टिक और कार्सिनोमा वर्तमान सभ्यता की सबसे बड़ी समस्यायें बन चुकी हैं। इनका मानवीकरण किया जाय तो ये वैचारिक और राजनीतिक हिंदूकुश की घटनायें हैं जो प्रतिपल घटित होती जा रही हैं।

दर्शन और भौतिक विज्ञान में सूक्ष्म की विराटशक्ति को स्वीकार किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से एक हिंदू संगठन को हम अपने सनातनी समाज का एक महत्वपूर्ण अंग मानते रहे, इतना अपना कि अपने शरीर की सूक्ष्मकोशिका और कभी-कभी कोशिकाअवयव के समान... यानी एक माइक्राॅन से भी सूक्ष्म, जिससे वह सनातनी समाज में विराटशक्ति के साथ स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण कर सके। किंतु हुआ क्या! संगठन ने हमारी सदाशयता का लाभ उठाकर नैनोप्लास्टिक की तरह मिमिक्री प्रारम्भ कर दी। एक विधर्मी द्रव्य को हम पहचान नहीं सके और उसे अपने ही पोषण के अंश से प्रोटीन-कोरोना बनाते रहे। 
(Cells often mistake nanoplastics for nutrients or foreign agents and actively pull them inside via processes like endocytosis or macropinocytosis. Once inside, they can accumulate in organelles like lysosomes. Upon entering biological fluids, nanoplastics interact with proteins, lipids, and carbohydrates, creating a "protein corona" around themselves. This coating makes them behave like biological particles, masking them from immediate immune clearance and allowing them to be transported throughout the body.)
संगठन के सूक्ष्म विचार जो कि वास्तव में संकुचित थे, ब्लड-ब्रेन-बैरियर को बड़ी सुगमता से पार कर तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचने लगे। संगठन की कार्यप्रणाली नैनोप्लास्टिकवत हमारी मस्तिष्क की तंत्रिकाओं की एपोप्लास्टी (कोशिका मृत्यु) की कारण बनती गई और हमें कुछ भी पता ही नहीं चला।
(Nanoplastics can trigger cell membrane damage, oxidative stress, and inflammatory responses,releasing cytokines, similar to the body's response to pathogens. They can impair energy metabolism, disrupt mitochondrial function, and cause cellular apoptosis i.e. cell death.) 
जहाँ संगठन नैनोप्लास्टिक की तरह हमारे चिंतन को प्रभावित कर एपोप्लास्टी का कारण बनता गया वहीं उसके राजनीतिक प्रकल्प हमारे विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध करते रहे और हम कुछ समझ ही नहीं सके। सनातनियों के प्रति उसकी कार्यप्रणाली कार्सिनोमा की तरह फलती-फूलती रही। कार्सिनोमा कोशिकायें हमारी सामान्य कौशिकाओं का रूप धारण कर हमें ही खाती रहीं और हमें अपने भीतर छिपे शत्रु की भनक तक नहीं लगी।

संघ, सिकलिंग और सवर्ण

यह गंभीर चिंता का विषय है कि डाॅक्टर होने के बाद भी मोहन भागवत अंतरजातीय रोटी-बेटी व्यवहार को प्रोत्साहित कर रहे हैं। भागवत की गतिविधियाँ महर्षि परंपराओं के विरुद्ध म्लेच्छ परंपराओं की स्थापना के समर्थन में बढ़ती ही जा रही हैं। यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संहारक प्रहार है जिससे सतर्क होने की आवश्यकता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और इंद्रेश कुमार के बीच हुयी एक वार्ता के अनुसार संघ के प्रयासों से दस लाख हिंदू लड़कियों के निकाह मुस्लिम लड़कों से करवाये जा चुके हैं।
संघ के मोहन भागवत इस तरह की अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करके सवर्ण समुदाय को भारत से पूरी तरह समाप्त कर देना चाहते हैं।
रोटी व्यवहार तो पूरे भारत में अंतरजातीय ही नहीं अंतरधार्मिक भी स्वीकार किया ही जा रहा है। किंतु अंतरजातीय बेटी व्यवहार स्वीकार करने से पहले चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से भी इसे समझना होगा। जिन्होंने सिकलसेल डिसीज के पीड़ितों की विभिन्न पीड़ादायक स्थितियों को देखा है वे इसकी गंभीरता को अच्छी तरह समझ सकते हैं।
यहाँ सवर्णेतर जातियों में होने वाली सिकलिंग और थैलेसीमिया जैसी आनुवंशिक और अचिकित्स्य व्याधियों के संदर्भ में मोहन भागवत के विचार को समझे जाने की आवश्यकता है।
सिकलिंग जैसी आनुवंशिक व्याधियों से सर्वाधिक प्रभावित लोगों में एसटी के बाद एससी और फिर पिछड़ी जातियाँ हैं, जबकि सवर्ण इस व्याधि से पूरी तरह मुक्त रहते हैं(इस अनुबंध के साथ किसी सवर्ण ने सिकलिंग प्रभावित के साथ अंतरजातीय विवाह न किया हो)
एक अध्ययन में पाया गया है कि सिकल सेल डिसीज एस.सी.डी., सिकल सेल ट्रेट (एस.सी.टी.) और एचबीएस-बीटा-थैलेसीमिया की व्यापकता क्रमशः 1.17% (95% सीआई: 0.79%–1.75%), 5.9% (95% सीआई: 3.8%–8.88%) और 0.37% (95% सीआई: 0.17%–0.83%) अनुमानित की गई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में एस.सी.डी. और एस.सी.टी. की व्यापकता अधिक है। भारत के आदिवासी समुदायों में इसका बोझ सर्वाधिक है।
सिकलिंग और थैलेसीमिया व्याधियों की कोई भी चिकित्सा अभी तक संभव नहीं है। भारत के 17 राज्यों अर्थात् गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार और उत्तराखंड में SCD की प्रायिकता अधिक है। 
अन्य प्रभावितों में अफ्रीका की कुछ जनजातियाँ और अमेरिकी नीग्रो मुख्य हैं। इसकी उत्पत्ति और विशिष्ट जातीय समूहों में ही होने के कारण अज्ञात हैं। क्या मोहन भागवत प्रकृति की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं।
https://www.facebook.com/share/p/18NW6W19QM/

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

जंबूद्वीपे भरतखण्डे

घर से बाहर
जब भी धरे पाँव
लगा ही नहीं कभी
हमारा ही देश है यह!
घर से बाहर
घूमती थीं निर्भय
राजा की रची जातियाँ
खोदती हुई खाइयाँ,
निरंकुश दबंग
सताते हुये निर्बलों को,
स्वेच्छाचारी राजसेवक
लूटते हुये प्रजा को,
और राजपुरुष
रचते हुये चक्रव्यूह
षड्यंत्रों के
आर्यावर्त्त की जनता के विरुद्ध।
बचपन से अब तक
लगा ही नहीं कभी
कि यह देश
हमारा अपना है
हमारे पूर्वजों का है
मंत्रदृष्टा महर्षियों का है।
यहाँ तो हैं
आतंक के बवंडर
असुरक्षा की तेज आँधियाँ
कौन है प्रायोजक इनका, कौन...
बता दूँगा
तो कुपित हो जायेगा राजा
काट देगा जिह्वा।

प्रजा है
नूपुर
बँधी हुई
राजा के पाँवों में
पीपल की पात सी
थरथराती।
हम
परदेस हो चुके अपने ही देस में
परदेसी हैं
या फिर शरणार्थी
खोजते हुये
अपने ही जीवन के
खोए हुये टुकड़े
पल-पल धमकाती
मृत्यु के अट्टहास में।

प्रायोजित भीड़
भरती है हुंकार
ब्राह्मणो! भारत छोड़ो
छोड़कर अपनी बेटियाँ
और
अपनी चल-अचल संपत्तियाँ।
पूरा भारत
लाहौर हो गया है
कश्मीर हो गया है।
सुना है
हमारा भी राजा
डोनाल्ड ट्रंप हो गया है
करता है नृत्य
धधकती ज्वाला की लय पर।

पल्लवित पुष्पित पृथकतावाद

भारत में जितना पृथकतावाद स्वतंत्रतासंग्राम के उत्तरकाल में था उससे भी अधिक आज विभाजन के बाद भी है। हिंदुओं को मंथन करना होगा कि विभाजन से उन्हें क्या मिला? क्या उनकी हिंदू पहचान मिली, क्या हिंदू राष्ट्र मिला?

बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित भारत में हिंदुओं की हत्यायें, उनके स्वाभिमान को कुचलने के निरंतर प्रयास, उनकी मान्यताओं और जीवन पद्धति पर निरंतर प्रहार, उनकी भूमि और बेटियों का अपहरण, शरीया शासन के लिए उत्पात और अब हिंदुओं को भारत छोड़ने की धमकियाँ... ! यही सब तो मिलता रहा है। यहाँ हार-जीत का नहीं, प्रमुख विषय अस्तित्व रक्षा का है।
मुझे लगता है कि अस्तित्व के विषय में हिंदू सर्वाधिक विश्वासघाती समूह रहा है। अरबी मुसलमान शेष विश्व के लिए घातक नहीं हैं जबकि मतांतरित हुये मुसलमान पूरे विश्व में स्थानीय समुदायों के उन्मूलन को अपने जीवन का लक्ष्य मानते रहे हैं। पाकिस्तान का जनक मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू था, वहाँ के अधिसंख्य मुसलमान भारतीय मुसलमानों की ही तरह मतांतरित हैं। ईरान के मुसलमान भी मतांतरित हैं।
यह मतांतरण ऐसा क्या कर देता कि मनुष्य मनुष्य ही नहीं रहता! यद्यपि ईरान की स्थिति भारत से भिन्न है। इसलिए वहाँ के शासक कैसे भी हों पर आम जनता प्रायः ठीक ही है।
भारत में तो मतांतरित मुसलमानों से अधिक मुसलमान सेक्युलर हिंदू हैं जिनमें अब संघ और भाजपा जैसे हिंदूवादी संगठन बहुत आगे बढ़त बना चुके हैं।
तो क्या धरती से हिंदू समाप्त हो जाएंगे? समाप्त तो कोई भी नहीं होगा। हाँ!जनसंख्या समीकरण ऊपर-नीचे हो सकते हैं। आम हिंदुओं को भक्ति और समालोचना के अंतर और उनके परिणामों पर गंभीरता से विचार करते हुये अपने अस्तित्व के संघर्षपथ पर आगे बढ़ना होगा।
स्वातंत्रयोत्तर भारत में हिंदू शासकों ने ही हिंदुओं का सर्वाधिक अहित किया है, आज भी कर रहे हैं। यह सब इसलिए क्योंकि हमने हिंदूमूल्यों का परित्याग कर दिया है। हम वैचारिक आदर्शों को सम्मान देने के स्थान पर जातियों और समूहों को सम्मान देने लगे हैं। आम हिंदुओं को संघ और भाजपा की कलुषिता का पोस्टमार्टम करना ही होगा।

मूलनिवासी

भारत में ब्रिटिश शासन से पहले मूलनिवासी जैसी कोई अवधारणा कभी नहीं रही, कोई औचित्य ही नहीं था इसका। यह तो अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए प्रासंगिक है जहाँ दूसरे देश के लोगों ने स्थानीय लोगों को समाप्त कर अपनी पृथक पहचान बनाई और वहाँ अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। भारतीयों के संदर्भ में यह बात मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना और फिजी आदि के लिए सही है, वह भी इस संशोधन के साथ कि भारतीयों को वहाँ दास बनाकर या काम करवाने के लिए विदेशी शासकों द्वारा ले जाया गया, वे वहाँ स्वेच्छा से नहीं गये और न उन्होंने वहाँ के स्थानीय लोगों का नरसंहार किया। भारतीय जहाँ जाते हैं वहाँकी संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करते हैं।

भारत में सवर्णों के विदेशी होने की कहानी मुस्लिम शासकों द्वारा नहीं अपितु यूरोपीय शासकों द्वारा पहली बार गढ़ी गई। जिस तरह अपने अनैतिक और अन्यायपूर्ण कार्यों को नैतिक और न्यायसंगत बनाने के लिए यूरोपीय शासक उन्हें कानून के मनमाने बंधन में जकड़ने में पारंगत हुआ करते थे उसी तरह उन्होंने भारतीय समाज को तोड़ने के लिए सांस्कृतिक, धार्मिक और अध्यात्मिक मूल्यों पर निरंतर आक्रमण करने को उचित ठहराने के लिए अपनी गढ़ी कहानियों को वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से प्रभावी और प्रामाणिक बनाने के प्रयास किये। इसमें उन्हें कुछ सफलता भी मिली। इन्हीं प्रयासों में एक है "आर्यन इनवेज़न थ्योरी" जिसे प्रामाणिकता का चोला पहनने के लिए डीएनए थ्योरी गढ़ी गई। 

यह बात तो पूरे विश्व के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शोध और आविष्कार प्रायः राज्याश्रित या सत्ताश्रित हुआ करते हैं। यही कारण है कि यदि सत्ता दुष्टों के हाथ में हुयी तो शोध के विषय और उसके परिणाम सत्ताधीशों के स्वार्थ से प्रभावित होते हैं। कोविड-१९ और ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के विरुद्ध लाये गये वैक्सीन्स इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। शोधकार्यों के क्षेत्र में यह एक अवांछित, दुःखद और कटु सत्य है। 

देशी-विदेशी डीएनए को आधार बनाने से पहले कुछ अन्य व्यावहारिक तथ्यों पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। डीएनए प्राप्त करने के लिए जिन नरकंकालों के प्रादर्श लिए गये हैं उनकी राष्ट्रीयता का आधार क्या है? यह कैसे पता लगेगा कि वह कंकाल किसी विदेशी सैनिक, व्यापारी या पर्यटक का नहीं अपितु भारतीय का ही है, जबकि भारतीयों की सनातन परंपरा में शवदाह किया जाता रहा है। शव को भूमि में गाड़ने की विदेशी परंपरा रही है, भारत की नहीं। दूसरी बात यह कि भूमि से निकाले गये इस तरह के नरकंकालों की संख्या कितनी है, क्या ये व्यापकरूप से और बहुत अधिक संख्या में पाए जाते रहे हैं?

हम इस लेख में मूलनिवासी और विदेशी विवाद के सत्य को डीएनए, भाषा, लिपि, शारीरिक गठन, परंपरा, विकास, पुरातात्त्विक प्रमाण, स्थापत्यकला और साहित्यादि दृष्टियों से हटकर कुछ अन्य बिंदुओं के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे। 

आवागमन, भ्रमण और बसाहट सदा से मनुष्य की स्वाभाविक गतिविधियाँ रही हैं। जलमार्गों की अपेक्षा थलमार्गों से यह सब अधिक सुगम होता है इसलिए सामान्य स्थितियों में आपसी संबंधों में तरलता का होना स्वाभाविक है। इसीलिए आवागमन और वैवाहिक संबंधों में प्रांतीय और राष्ट्रीय सीमायें अधिक बाधक नहीं हो पातीं। सीमावर्ती क्षेत्रों में यह सदा से रहा है, आज भी है।  उत्तराखंड, उप्र और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाल, तिब्बत और भूटान के निवासियों के बीच वैवाहिक संबंधों की तरलता देखी जाती है। यही तरलता न्यूनाधिक रूप में पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों में भी है, जो विभिन्न कालों में परिवर्तित होती रही है। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि बृहत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में हमारे वैवाहिक और व्यापारिक संबंध तत्कालीन देशों के क्षेत्रीय लोगों के साथ नहीं हुआ करते थे। यही कारण है कि उत्तर-पूर्वी भारतीयों में तिब्बती और मंगोल मुखाकृतियाँ आसानी से दिखाई दे जाती हैं तो पश्चिमी सीमावर्ती भारतीयों में गांधार, सिंध, ईरान और निकटवर्ती कज्जाक, उज़्बेक आदि लोगों से वैवाहिक संबंधों के कारण उत्पन्न संततियों के वंशज आज भी मिलते हैं। जो स्थिति भारतीयों की है वही स्थिति तिब्बतियों, नेपालियों और ईरानियों की भी है। उनके गुणसूत्रों में हमारे भी गुणसूत्र हैं। यही स्थिति पूरे विश्व की है। वास्तव में पशु-पक्षियों की तरह मनुष्यों में भी मिलने-जुलने और आपसी संबंधों के लिए एक स्वाभाविक तरलता होती है, अंतर केवल इतना है कि मनुष्य के प्रकरण में राजनीतिक कारणों से न्यूनाधिक प्रतिबंध इन संबंधों को बाधित करते हैं। 

क्या यह संभव है कि ईरानियों में पश्चिमी भारतीयों के या फ्रांसीसियों में डच लोगों के गुणसूत्र न हों! यह सब सदा से होता रहा है, सदा होता रहेगा। इस बात का कोई औचित्य नहीं कि अरब सागर और हिंदमहासागर का जल आपस में क्यों मिल गया, और मिलने के बाद उसमें से कितना जल मूलहिंदसागरीय है और कितना विदेशी। 

इसी भारत में भाभा, जमशेद जी टाटा और मानिकशाॅ भी रहे हैं और इसी देश में ख़ामेनेई की मृत्यु पर रोने-चीखने और ईरान के लिए चंदा भेजने वाले शिया भी हैं। कोई भारत में आकर भारतीय हो जाता है तो कोई भारत में शताब्दियों से रहकर भी भारतीय नही हो पाता।

मुझे भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में कई पीढ़ियों से रह रहे हाॅर्न आॅफ़ अफ्रीका (इरिट्रिया, इथियोपिया, सोमालिया और दिजिवूती) से आकर बसे लोगों से मिलने का अवसर मिला है। उनमें मूलनिवासी या विदेशी जैसी कोई भावना दिखाई नहीं देती। दूसरी ओर क्या मणिशंकर अय्यर, अखिलेश यादव और लालूप्रसाद जैसे लोगों को भारतीय माना जा सकता है!

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हिंदूराष्ट्र

नये संदर्भों में "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्घोष निरस्त कर दिया गया है। हिंदुत्व के अभी तक स्वयंभू सारथी रहे मोहन भागवत ने "हिंदू" शब्द के अस्तित्व को ही नकार दिया है। तो अब भारत के इतिहास को नये संदर्भ में समझना होगा... वैसा ही जैसा कि भारतीय समाज को हाँकने वाले स्वयंभू विद्वान समझाना चाहते हैं।

इस देश के बहुसंख्यक समाज के बौद्धिक मालिक अब हिंदूराष्ट्र के पक्ष में नहीं हैं। उनका आदेश है कि यह देश सबका है। अर्थात यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को विकसित करने वाले "सब" लोग हैं, यहाँ की प्राचीनता का ऐतिहासिक महत्व समाप्त हो गया है।
परमपूज्य मालिक जी! आपके ये "सब" कौन हैं?
क्या आपके ये "सब" भारत के नागरिक हैं। भारत के नागरिक कौन हैं? क्या वे "सब" भारतीय नागरिक हैं जो भारत में रहते हैं, जिनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र हैं। अर्थात रोहिंग्या, बांग्लादेशी, विभाजन से पूर्व पृथक देश बनाने के लिए मतदान करने वाले मुस्लिम जो विभाजन करवाने के बाद भी शेष भारत का गजवा-ए-हिंद करने के लिए यहाँ से कहीं नहीं गये, गजवा-ए-हिंद की हुंकार भरने वाले लोगों के समर्थक अतिविद्वान सेक्युलर्स आदि ...यही हैं आपके "सब"?
अभी तक जो लोग आपकी आज्ञा से स्वयं को हिंदू मानते रहे वे एक झटके में अब कहीं भी नहीं है, क्योंकि आपने तो निर्णय कर दिया है कि यह शब्द भारतीय है ही नहीं।
अभी तक "हिंदुओं" के मालिक रहे मोहन भागवत क्या अब सवर्णों को यूरेशियन्स घोषित कर रहे हैं? वे तो यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हिंदुत्व के ठेकेदार नहीं हैं इसलिए हिंदुत्व की राजनीति नहीं करेंगे, केवल राष्ट्रनिर्माण की बात करेंगे। अच्छी बात है, राष्ट्र निर्माण होना ही चाहिए। कैसे होगा? कौन करेगा? कैसे करेगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने का अधिकार यूरेशियन्स को नहीं है।
हिंदूराष्ट्र का नारा अब गजवा-ए-हिंद के नारे के सामने समाप्त हो गया है। संघ के इंद्रेश कुमार बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नाम से भारत का सांख्यिक विभाजन स्वीकार कर बहुत पहले ही अल्पसंख्यक घराने के मुखिया बन चुके हैं। सभी मालिक "अल्पसंख्यक" के उत्थान के लिए चिंतित और समर्पित हैं । बहुसंख्यक यूरेशियन्स के उत्थान का तो अब प्रश्न ही नहीं उठता। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि "यह बहुसंख्यकों के समूल उच्छेद की समाजमनोवैज्ञानिक भूमिका है" जिसके जनक हमारे मालिक लोग हैं जिनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे प्रकांड संत भी सम्मिलित हैं।
बृहस्पति आगम में हिंदू शब्द की निरुक्ति दी गई है पर मालिक लोग उसे आर्ष ग्रंथ नहीं मानते। तो क्या आर्ष ग्रंथों में जिसका उल्लेख नहीं है उसका भारत की धरती पर कोई अस्तित्व नहीं माना जाना चाहिए? तब तो संविधान, दलित, सवर्ण, इस्लाम, शाह, मोदी, बौद्ध, टमाटर, गोभी, सिगरेट, सर तन से जुदा ...आदि शब्दों का भी कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए।
मालिक लोग हिंदू शब्द की प्राचीनता को नकारकर क्या यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू शब्द शहंशाह साइरस के युग में ईरानी आक्रमणकारियों ने पहली बार प्रयुक्त किया जिसे बाद में बृहस्पति आगम में यथावत ले लिया गया?
मालिक लोग कल को यह भी कह सकते हैं कि इस देश का नाम भारत नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कम्युनल है, इस नाम में उनके "सब" का प्रतिनिधित्व नहीं होता इसलिए इस देश का नाम "अल्पसंख्यक", "दलित", "बहुसंख्यकमुक्त", या "सबका देश" होना चाहिए।
यदि आपके शब्दकोष में "हिंदू" शब्द नहीं है तो क्या ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जो जंबूद्वीप के इस भूभाग पर उन लोगों की प्राचीनता सिद्ध कर सके जिन्होंने इस देश की संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान एवं चौंसठ कलाओं आदि को स्थापित और विकसित करने में पीढ़ियों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
मालिक जी! हम तुम्हारे "सब का देश" अस्वीकार करते हैं, यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं है तो आपको संघ की प्रार्थना में से "हिंदभूमे", "हिंदुराष्ट्राङ्गभूता", "स्वराष्ट्रम्" और "धर्मस्य संरक्षणम्" आदि शब्दों को भी विलोपित करना होगा और यह भी बताना होगा कि अभी तक इन अस्तित्वहीन शब्दों का हमारे मुँह से गायन करवाकर आपने देश के साथ यह छल क्यों किया? आपका यह "स्वराष्ट्रम्" क्या है, उसकी भौगोलिक स्थिति कहाँ है? अभी तक आप जिस "धर्मस्य संरक्षणम्" का संकल्प करवाते रहे वह "धर्म" क्या है? उस धर्म की संज्ञा क्या है?
इस "सबका देश" के मालिक जी! यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं हो सकता तो क्या आर्यावर्त्त, वैदिकराष्ट्र, सनातन राष्ट्र, ब्रह्मराष्ट्र आदि में से भी कुछ नहीं हो सकता?