मंगलवार, 13 जनवरी 2026

वाराणसी

टेढ़े-मेढ़े 

या सीधे-सादे

हो सकते हैं पथ

पृथक

तुम्हारे या हमारे।

सुरत्व या अ-सुरत्व 

प्रवृत्ति है 

तुम्हारी या हमारी।

कोई बनिया कोई ब्राह्मण

वृत्ति है

तुम्हारी या हमारी।

...पर उभय है

"आहार निद्रा भय मैथुनं च..."

हर किसी के लिए

विशिष्ट है तो मात्र...

"धर्मो ही तेषामधिको विशेषः..."

...और यह धर्म है 

मनोदैहिक आचरण का।


जन्म

प्रथम् सत्य है 

हमारे जीवन का 

और अंतिम है 

मृत्यु

जिसके मध्य में बिखरे हैं 

बहुत से अर्धसत्य

बहुत से असत्य

कुछ हमारे, कुछ तुम्हारे।

...और यहाँ देखो

जहाँ मिलते हैं चार पथ

एक-दूसरे से विपरीत

चार दिशाओं में जाते हुये

या

चार दिशाओं से आकर मिलते हुये

जैसा भी समझना चाहो

पर 

यह मात्र चौराहा नहीं 

सहज उपलब्ध संहिता भी है

जीवन के व्यवहारशास्त्र की।


चौराहे से...

इस पथ पर जाने से पहुँचेंगे

बाबाविश्वनाथ मंदिर

जिसके समीप ही बहती है

मात्र नदी नहीं

बल्कि *श्री गंगा जी*,

...और यह पथ ले जायेगा 

मणिकर्णिका घाट

उस पथ जाने से मिलेगी 

नश्वरदेह की दालमंडी

और उधर के पथ पर मिलेगी 

दैहिक श्रृंगार की आभूषणमंडी।

चौराहे पर

पथिकों की भीड़ बड़ी

पर निर्णय सबके पृथक-पृथक।

"धर्मो ही तेषामधिको विशेषः..."।

और...

संसार का सार तो यह है 

कि असुर भी सुरत्व के 

वेश्या भी सुलक्षणा के 

और दुराचारी भी सदाचार के

प्रमाणपत्रों के आकांक्षी रहते हैं

यही तो तत्व है

धर्म के सनातनत्व का।

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