सतत
पदाघातों से
वाहनों के आघातों से
कट कर
हो जाते हैं अ-पथ
वे सुपथ
बढ़ जाता है जिनपर
आवागमन
पर ...
नहीं होता
सर्वेक्षण
और जीर्णोद्धार
सतत।
निर्जन होना होता है
एक दिन
ऐसे हर पथ को
जहाँ नहीं होता
सर्वेक्षण
और जीर्णोद्धार
सतत।
मूल्यविहीन हो जाते हैं
वे मूल्य
वे विचार
वे सिद्धांत
और वे कर्म
जिनका नहीं होता
समय-समय पर परिमार्जन
और पुनर्मूल्यांकन।
भाग्यवान हैं वे सब
जो रहते हैं सजग
करते हैं स्वागत
आलोचनाओं का
ताकि कर सकें
आत्मावलोकन
और फिर परिमार्जन
देते हुये गति को सम्मान
जड़ता के विरुद्ध।
...तभी तो धर्म है
सनातन...
सार्वकालिक...
और सार्वदेशिक।
गतिमान है ब्रह्माण्ड
गतिमान है जग,
इस जगत में
जो ठहर जायेगा
उसे समाप्त होना होगा
एक दिन
यह सुनिश्चित है।
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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.