"जनो यत्कर्म वृणोति स तस्य वर्णः"
अर्थात् कर्म के अनुसार वरण (चयन) किए गए लोग।हम अपने गुणों और प्रारब्ध के अनुरूप कर्म का चयन करते हैं। यह प्राकृतिक व्यवस्था है। वरण का आधार कर्म है न कि जन्म। हर व्यक्ति कुछ न कुछ वरण करता ही है। बिना वरण किये उसकी गति संभव नहीं। अस्तु हर व्यक्ति चार में से किसी एक वर्ण का अधिकारी होता ही है। स्पष्ट है कि हम सब सवर्ण ही होते हैं, इसे विशिष्ट बल देकर पृथक करने की आवश्यकता नहीं जैसा कि किया जा रहा है।
स+वर्ण=सवर्ण। वर्ण? चतुर्वर्ण ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)। बस इतना ही classification है, जो प्राकृतिक है। किसी मनुष्य ने नहीं किया यह वर्गीकरण। पूरा विश्व इतने में ही समाहित है। अंतर केवल इतना है कि भारतीयों ने इस वर्गीकरण को समझा और स्वीकार किया, ठीक उन वनस्पति/जन्तुशास्त्रियों की तरह जिन्होंने वनस्पति/जन्तुजगत के प्राकृतिक वर्गीकरण को पहचाना और स्वीकार किया। नामकरण तो व्यावहारिक उपयोगिता के लिए है, जो अपनी-अपनी भाषा और समझ के अनुसार कुछ भी हो सकता है। मटर पैपिलियोनेसी ही रहेगी, यहाँ भी और अफ्रीका या नीदरलैण्ड में भी। मनुष्य होमोसीपिएन्स ही रहेगा भारत में भी और पाकिस्तान में भी। Qualitative or morphological classification is just to understand the nature of any species for our convenience and further study or re-search.
...तो इस तरह सभी सवर्ण ही होते हैं, वास्तव में सवर्णेतर कुछ नहीं है, हो ही नहीं सकता । एससी, एसटी,ओबीसी आदि राजनीतिक छल के लिए गढ़े गये शब्द हैं, जिनका प्राकृतिक व्यवस्था से कोई संबंध नहीं। राजनीतिक छद्म अयोग्यसत्ताओं की आवश्यकता है, समाज की नहीं। समाज की एकजुटता अयोग्य सत्ताओं के लिए घातक होती है इसलिए राजव्यवस्थायें धूर्ततापूर्वक समाज का विभाजन करती हैं। मनुस्मृति या अन्य किसी भी आर्ष ग्रंथ में अनुसूचितजाति, जनजाति, दलित, अगड़ा, पिछड़ा... जैसा कोई उल्लेख नहीं है। बुद्धि, क्षमता, दक्षता, व्यवसाय और आजीविका की दृष्टि से चारो वर्णों में प्रकृति ने कहीं कोई आरक्षण नहीं किया। राजस्थान के मीणा यूपी बिहार के ब्राह्मणों से किसी भी स्तर पर कम नहीं बल्कि आगे ही हैं। किंबहुना, सब सवर्ण होते हैं, अ-वर्ण कोई नहीं होता, हो ही नहीं सकता। अ-वर्ण या सवर्णेतर कहना तो ऐसा ही है जैसे जल को हाइड्रोजन-आॅक्सीजन रहित कहना, सूर्य की किरण को सात रंग से मुक्त कहना...। प्रकाश में सात रंग नहीं होंगे तो वहाँ उजास नहीं अंधकार होगा। सवर्ण न होना प्राणरहित होना है। लोकबोली में सब उसे शव कहते हैं, जो हर किसी को एक दिन होना ही है। अतः भ्रमित न हों, हम सब सवर्ण हैं, यहाँ तक कि दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों को हर दिन धमकाने वाला डोनाल्ड ट्रंप भी।
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