आदिमतंत्र से
राजतंत्र
अधिनायकतंत्र
और लोकतंत्र से होते हुए
निरंकुशतंत्र तक की यात्रा में
उभय है शक्ति
कभी मर्यादित
कभी अमर्यादित ।
आवश्यक है शक्ति
अनुशासित शासन के लिए
पर संरक्षण की धौंस में पनपी
तुम्हारी निरंकुशता
नहीं है स्वीकार।
भूल गये हो तुम
शक्ति
अमर्यादित हो
तो पलटता है चक्र
शासनतंत्र का।
इस बार
समाप्त हो जाओगे तुम
दुर्लभ भूगर्भीय खनिजों
और तेल के पीछे-पीछे
भागते हुए
कभी इधर
कभी उधर।
बालहठ से भी बड़ा तुम्हारा हठ
कि खेलने दो मुझे
तुम्हारे स्वाभिमान
और सबकी स्वतंत्रता से
अन्यथा
जीने नहीं दूँगा किसी को।
तुम्हारा हठ
कि छीन लूँगा
धरती, नभ और पाताल
सभी लोक और सभी दिशायें
क्योंकि "महान हूँ मैं"।
सबको पता है
तुम्हारा यह सच
जो नहीं पता है तुम्हें
कि इतना बड़ा भी नहीं है
तुम्हारा विषबुझा उत्तरीय
कि ढक सको
पूरी धरती।
हठ
समेट लेने का पूरी धरती
कभी हो सका है पूरा
किसी भी बलशाली का!
सावधान!
समीप ही है
तंत्र का संक्रांति काल।
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