सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

शक्ति, शोषण और अत्याचार

यूजीसी रेगुलेशन पर पूरे देश में उबाल है। दो ध्रुव एक बार फिर आमने-सामने हैं। संचार माध्यम पारस्परिक घृणा से विषाक्त हो रहे हैं। एक-दूसरे को चुनौतियाँ दी जा रही हैं। कंचना यादव ने सवर्णों को फंसाये जाने की आवश्यकता बताते हुये अपने लोगों को प्रोत्साहित किया। इस बीच एक और आरोप हवा में उछाल दिया गया है -

"ब्राह्मणों ने तीन हजार साल तक हमारा शोषण किया और हमें शिक्षा से वंचित रखा। यदि यूजीसी रेगुलेशन वापस लिया गया तो हम सवर्णों को देश से बाहर खदेड़ देंगे।"

यह आरोप बहुत गंभीर है, प्रायः ऐसे आरोपों पर ब्राह्मणों  को कम ही उद्वेलित होते हुये देखा गया है। किंतु जेएनयू जैसी संस्था में भी जब "ब्राह्मण-बनिया भारत छोड़ो" के नारे लगने लगें तो समझा जाना चाहिए कि बात अब आगे बढ़ चुकी है और उत्तर दिया जाना आवश्यक है। 

१. शिक्षा और गुरुकुल सदा से राज्य (सत्ता) के अधीन और उसके द्वारा पोषित व संरक्षित रहे हैं न कि ब्राह्मणों के एकाधिकार में। 

२. पिछले तीन हजार वर्षों में कितने ब्राह्मण राजा हुये हैं जिन्होंने किसी को भी शिक्षा से वंचित रखा? गुरुकुलों में प्रवेशपात्रता का विधान था, आज की शैक्षणिक संस्थानों में भी है। 

३. बाबा भीमराव के पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर थे, क्या कोई अशिक्षित व्यक्ति सूबेदार हो सकता है?

४. वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषियों में स्त्रियों सहित सभी वर्ण के ऋषियों की सहभागिता क्या सिद्ध करती है?आज भी संतों में हर वर्ण के लोगों का सम्माननीय स्थान है।

५. यदि ब्राह्मणों से इतनी शत्रुता और घृणा है तो सतनामी एवं अन्य आरक्षित समूहों के लोग ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के उपनाम यथा- तिवारी, उपाध्याय, चतुर्वेदी, जोशी, पाठक, व्यास, भदौरिया, बघेल, तोमर, चौहान... आदि क्यों लिख रहे हैं?

६. जातियाँ कौन बनाता है, ब्राह्मण या सरकारें? किस ग्रंथ या सरकारी अभिलेख में ब्राह्मणों द्वारा जाति बनाये जाने का उल्लेख है? कृपया बतायें।

७. वर्ष १९६७ में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के भोटिया, जौनसारी, थारू, बुक्सा और राजी लोगों को अनुसूचित जनजाति में किसने सम्मिलित किया, तत्कालीन सत्ता ने या ब्राह्मणों ने?

८. समय-समय पर स्वयं को आरक्षित श्रेणी में सम्मिलित किये जाने के लिए किये जाने वाले उग्र आंदोलन किसने किये, पटेलों और गुर्जरों... आदि ने या ब्राह्मणों ने?

९. धर्मांतरण के बाद भी आपको अपनी जातियों से चिपके रहने के लिए किसने बाध्य किया, क्या ब्राह्मणों ने?

१०. जाति से विरोध है तो जातीय जनगणना रोकने और जातियाँ समाप्त करने के लिए आंदोलन क्यों नहीं करते, तब कोई ब्राह्मण आपका विरोध करे तो उसे आप कोई भी दंड दे सकते हैं, हम आपके साथ होंगे। 

११. शूद्र शब्द आपके लिए इतना घृणित क्यों है? जबकि तकनीकी ज्ञान में दक्ष और रचनात्मक कार्य में कुशल हर व्यक्ति शूद्र हुआ करता था। आधुनिक संदर्भ में इंजीनियर और डाॅक्टर आदि को भी आप शूद्र मान सकते हैं जो कि बुद्धि और कर्मठता के समन्वय की स्थिति है। अपनी रचनात्मक दक्षता से कृषि एवं उद्योग आदि के माध्यम से अर्थतंत्र की रीढ़ बनकर समर्पित रहने वाले कर्मठ लोग शूद्र हुआ करते थे, इतने महत्वपूर्ण और सम्माननीय शब्द को घृणित बना दिये जाने के षड्यंत्रों पर भी चिंतन करने की आवश्यकता है।

१२. साधु, संत, बाबा... केवल ब्राह्मण ही नहीं हर वर्ग के लोग होते हैं, सबको सम्मानित माना जाता है, कोई भी व्यक्ति उनकी जाति पूछे बिना उनके चरण स्पर्श, प्रणाम या ॐनमोनारायण करता है, हिंदू समाज की यही व्यवस्था रही है। साधु, संत ऋषि-मुनि, शिक्षक और आचार्य जातियों से ऊपर माने जाते रहे हैं। 

१३. धर्मपाल ने बहुत शोध और अथक परिश्रम से बारह खंडों में एक पुस्तक लिखी है "The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century" जिसमें धर्मपाल जी ने अठारहवीं शताब्दी के भारत में शिक्षा की तत्कालीन स्थिति का वह विवरण दिया है जो ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने अभिलेखों में किया था। जो लोग यह मानते हैं कि ब्राह्मणों ने कुछ लोगों को तीन हजार साल तक शिक्षा से वंचित रखा, उन्हें यह पुस्तक पढ़ना चाहिए।

१४. मन से हीन भावनाओं और ब्राह्मणों के प्रति आधारहीन विद्वेष को समाप्त कर हिंदू समाज की गौरवपूर्ण पुनर्स्थापना के लिए संकल्प लेना हर भारतीय का दायित्व है जिसमें आप सबका स्वागत है। समाज का कोई भी वर्ग त्याज्य नहीं, स्वीकार्य होता है तभी कोई देश समृद्ध हो पाता है।

१५. रही बात प्रताड़ना की, तो प्रताड़ना करने वाला स्वयं मे पतित और दुष्टबुद्धि होता है, वह कोई भी हो सकता है...पंथ, समुदाय, जाति निरपेक्ष। दुष्टों को जब भी अवसर मिलता है वे अपने से निर्बल का शोषण करते हैं, और ऐसे दुष्ट हर जाति एवं समूहों में रहे हैं, आज भी हैं। जब अहंकार, शक्ति और दुष्टता का मिलन होता है तब शोषण की स्थितियाँ उत्पन्न होती है। जिसके पास सत्ता, या सत्ता में सहभागिता या किसी कुपात्र को प्राप्त अधिकार हैं और वह शक्तिशाली भी हो तो दुष्टता करेगा। ब्राह्मण का इतिहास तो प्रायः कोपीनधारी और भिक्षाजीवी होने का रहा है। शूद्र और क्षत्रिय ही प्रायः राजा रहे हैं। वैश्य किसी झंझट में नहीं पड़ते, और प्रायः समझौतावादी और सहनशील प्रवृत्ति के होते हैं। अब विचार करिये किसके द्वारा किसका शोषण किये जा सकने की प्रायिकता हो सकती है! तीन हजार साल से शोषण और उत्पीड़न की बात काल्पनिक और निराधार है। हाँ, पिछली कुछ शताब्दियों में नैतिक पतन के कारण ऐसी घटनायें हुयी है, किंतु वह ब्राह्मण की प्रकृति नहीं है, ब्राह्मण की परंपरा नहीं है, वह अपवाद है और ऐसी घटनाओं की निंदा करने में ब्राह्मण ही आगे भी रहे हैं।

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