बुधवार, 1 अप्रैल 2026

हिंदूराष्ट्र

नये संदर्भों में "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्घोष निरस्त कर दिया गया है। हिंदुत्व के अभी तक स्वयंभू सारथी रहे मोहन भागवत ने "हिंदू" शब्द के अस्तित्व को ही नकार दिया है। तो अब भारत के इतिहास को नये संदर्भ में समझना होगा... वैसा ही जैसा कि भारतीय समाज को हाँकने वाले स्वयंभू विद्वान समझाना चाहते हैं।

इस देश के बहुसंख्यक समाज के बौद्धिक मालिक अब हिंदूराष्ट्र के पक्ष में नहीं हैं। उनका आदेश है कि यह देश सबका है। अर्थात यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को विकसित करने वाले "सब" लोग हैं, यहाँ की प्राचीनता का ऐतिहासिक महत्व समाप्त हो गया है।
परमपूज्य मालिक जी! आपके ये "सब" कौन हैं?
क्या आपके ये "सब" भारत के नागरिक हैं। भारत के नागरिक कौन हैं? क्या वे "सब" भारतीय नागरिक हैं जो भारत में रहते हैं, जिनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र हैं। अर्थात रोहिंग्या, बांग्लादेशी, विभाजन से पूर्व पृथक देश बनाने के लिए मतदान करने वाले मुस्लिम जो विभाजन करवाने के बाद भी शेष भारत का गजवा-ए-हिंद करने के लिए यहाँ से कहीं नहीं गये, गजवा-ए-हिंद की हुंकार भरने वाले लोगों के समर्थक अतिविद्वान सेक्युलर्स आदि ...यही हैं आपके "सब"?
अभी तक जो लोग आपकी आज्ञा से स्वयं को हिंदू मानते रहे वे एक झटके में अब कहीं भी नहीं है, क्योंकि आपने तो निर्णय कर दिया है कि यह शब्द भारतीय है ही नहीं।
अभी तक "हिंदुओं" के मालिक रहे मोहन भागवत क्या अब सवर्णों को यूरेशियन्स घोषित कर रहे हैं? वे तो यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हिंदुत्व के ठेकेदार नहीं हैं इसलिए हिंदुत्व की राजनीति नहीं करेंगे, केवल राष्ट्रनिर्माण की बात करेंगे। अच्छी बात है, राष्ट्र निर्माण होना ही चाहिए। कैसे होगा? कौन करेगा? कैसे करेगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने का अधिकार यूरेशियन्स को नहीं है।
हिंदूराष्ट्र का नारा अब गजवा-ए-हिंद के नारे के सामने समाप्त हो गया है। संघ के इंद्रेश कुमार बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नाम से भारत का सांख्यिक विभाजन स्वीकार कर बहुत पहले ही अल्पसंख्यक घराने के मुखिया बन चुके हैं। सभी मालिक "अल्पसंख्यक" के उत्थान के लिए चिंतित और समर्पित हैं । बहुसंख्यक यूरेशियन्स के उत्थान का तो अब प्रश्न ही नहीं उठता। मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि "यह बहुसंख्यकों के समूल उच्छेद की समाजमनोवैज्ञानिक भूमिका है" जिसके जनक हमारे मालिक लोग हैं जिनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह जैसे प्रकांड संत भी सम्मिलित हैं।
बृहस्पति आगम में हिंदू शब्द की निरुक्ति दी गई है पर मालिक लोग उसे आर्ष ग्रंथ नहीं मानते। तो क्या आर्ष ग्रंथों में जिसका उल्लेख नहीं है उसका भारत की धरती पर कोई अस्तित्व नहीं माना जाना चाहिए? तब तो संविधान, दलित, सवर्ण, इस्लाम, शाह, मोदी, बौद्ध, टमाटर, गोभी, सिगरेट, सर तन से जुदा ...आदि शब्दों का भी कोई अस्तित्व नहीं होना चाहिए।
मालिक लोग हिंदू शब्द की प्राचीनता को नकारकर क्या यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू शब्द शहंशाह साइरस के युग में ईरानी आक्रमणकारियों ने पहली बार प्रयुक्त किया जिसे बाद में बृहस्पति आगम में यथावत ले लिया गया?
मालिक लोग कल को यह भी कह सकते हैं कि इस देश का नाम भारत नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कम्युनल है, इस नाम में उनके "सब" का प्रतिनिधित्व नहीं होता इसलिए इस देश का नाम "अल्पसंख्यक", "दलित", "बहुसंख्यकमुक्त", या "सबका देश" होना चाहिए।
यदि आपके शब्दकोष में "हिंदू" शब्द नहीं है तो क्या ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जो जंबूद्वीप के इस भूभाग पर उन लोगों की प्राचीनता सिद्ध कर सके जिन्होंने इस देश की संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान एवं चौंसठ कलाओं आदि को स्थापित और विकसित करने में पीढ़ियों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
मालिक जी! हम तुम्हारे "सब का देश" अस्वीकार करते हैं, यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं है तो आपको संघ की प्रार्थना में से "हिंदभूमे", "हिंदुराष्ट्राङ्गभूता", "स्वराष्ट्रम्" और "धर्मस्य संरक्षणम्" आदि शब्दों को भी विलोपित करना होगा और यह भी बताना होगा कि अभी तक इन अस्तित्वहीन शब्दों का हमारे मुँह से गायन करवाकर आपने देश के साथ यह छल क्यों किया? आपका यह "स्वराष्ट्रम्" क्या है, उसकी भौगोलिक स्थिति कहाँ है? अभी तक आप जिस "धर्मस्य संरक्षणम्" का संकल्प करवाते रहे वह "धर्म" क्या है? उस धर्म की संज्ञा क्या है?
इस "सबका देश" के मालिक जी! यदि यह हिंदूराष्ट्र नहीं हो सकता तो क्या आर्यावर्त्त, वैदिकराष्ट्र, सनातन राष्ट्र, ब्रह्मराष्ट्र आदि में से भी कुछ नहीं हो सकता?

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