गुरुवार, 28 मई 2026

गुणांतरण

राजा

अपराधी मानता है
विद्यालय में
प्रवेश लेने के पहले से ही
हर उस विद्यार्थी को
जिसने लिया है जन्म
किसी ब्राह्मण
या क्षत्रिय
या वैश्य कुल में,
बस, इतना ही पर्याप्त है
चलाने के लिए उस पर
कई गंभीर अभियोग
कई काल्पनिक अपराधों के लिए।
दंड का भागी है वह विद्यार्थी
किसी भी काल्पनिक आरोप में,
यह न्यायालय का नहीं
राजा का निर्णय है
उन पूर्वाग्रहों पर आधारित
जिनका नहीं मिलता
कोई प्रमाण।
प्रजा ने याचना की
खीझकर
दुःखी होकर
निराश होकर
मिथ्यारोपों से व्यथित होकर
कि पद
और राजसेवायें तो कर ही दी हैं पृथक
अब
पृथक कर दो
हमारे विद्यालय भी
हमारे विश्वविद्यालय भी
हमारे चिकित्सालय भी
हमारे न्यायालय भी
और
हमारी पुलिस भी।
"स-वर्णों के लिए स-वर्ण
अ-वर्णों के लिए अ-वर्ण"।

यद्यपि
कोई सुदामा
न खड़ा, न लड़ा
तथापि
राजा रहा अड़ा
उसे चाहिए
केवल व्यवधान
समाधान नहीं
इसलिए उसने प्रारंभ करवा दिये हैं
देश भर में हिंदूकुश...
केवल हिंदूकुश,
क्योंकि वह स्वप्न देखता है
विश्वगुरु बनने के
दादा ईदी अमीन बनने के
रावण बनने के
और ईश्वर बनने के भी।
उसने पढ़ा था बचपन में
"सर्वाइवल आॅफ़ द फिटेस्ट" से ही
होता है स्थापित
पहले वर्चस्व
और फिर
विकास...
एक कोषीय से बहुकोषीय
अमीबा से वानर
फिर वानर से मानव।
राजा प्रगतिशील है
वह विकास करेगा
नीम को आम बनायेगा
बेर को केला
पैरों को मस्तिष्क
और
गुदाद्वार को मुँह
करके विच्छेद
मस्तिष्क और मुँह का,
समूल उच्छेदित कर
आम और केला।
राजा
नान-बायोलाॅजिकल है
देना चाहता है "अ-वर्णों" को
सारे अधिकार
छीनकर स-वर्णों से,
देना चाहता है नीम और बेर को
आम और केले के गुण।
यही है राजा का अभियान
"गुणांतरण"
ठीक
जैसे "धर्मांतरण"।

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