जल, जंगल, जमीन...
उन्होंने कहा जल, जंगल, जमीन हमारी है, इसके उपभोग का अधिकार हमें है, हम तुम्हें यह सब छीनने नहीं देंगे।ढपली वाले आये, खूब गीत गाये... "किरांती" वाले गीत, प्रकृति के संरक्षण वाले गीत!
नारे लगते रहे, ढपलियाँ बजाई जाती रहीं...
इस बीच 'चार' (चिरौंजी) और 'आँवला' के वृक्ष लुप्त होते रहे, जल पहुँच से दूर होता गया, और जंगल की जमीन पर पहले कुछ झोपड़ियाँ और फिर पक्के मकान उगते रहे। आमचो बस्तर की ऐसी दुर्गति के लिए उत्तरदायी कौन है?
कल अल्मोड़ा वाले मार्ग पर पैदल चलते-चलते देखा- एक स्थान पर एक बूढ़ी नानी अपने नन्हें से नाती को लेकर एक गाछ के पास गयीं और हँसिये से उसकी डालियाँ काटने लगी। मुझे उत्सुकता हुयी, पास जा कर देखा, अरे! यह तो 'काफल' है।
बूढ़ी नानी के नाती को 'काफल' खाना है, इसलिए माई डालियाँ काट रही थीं। डालियों में कुछ पके, कुछ अधपके और कुछ कच्चे काफल व्यथित हो उठे, मानो कह रहे हों - "आप पके काफल चुन लीजिए, पर डालियों को मत काटिये!"
विज्ञानद्वय (भौतिकशास्त्र और वनस्पतिशास्त्र) के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने सिद्ध किया था कि प्राणियों की तरह वनस्पतियों में भी चेतना होती है और वे बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर अपनी प्रतिक्रियायें देती हैं।
बूढ़ी नानी का हँसिया जैसे ही पहली डाल पर पड़ा, काफल का गाछ पीड़ा से चीख पड़ा.... जिसे देवभूमि की बूढ़ी नानी सुन नहीं सकीं। बस्तर में भी तो भीमा राजू कहाँ कभी सुन पाया पीड़ित-शोषित चार और आमला का रुदन!
बस्तर में चार और आँवला दुर्लभ हो गये..., देवभूमि में काफल दुर्लभ होता जा रहा है। तभी तो एक दोना काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है।
मैं उदास हूँ, इसलिए नहीं कि चार वर्ष पहले तक पचास रुपये प्रति दोना मिलने वाला काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है, अपितु इसलिए कि कुछ समय बाद यही काफल एक हजार रुपये में भी नहीं मिलेगा।
राजा ने राजसेवकों से राजमार्ग के किनारे पड़े पत्थरों के वक्ष पर लिखवा दिया है -
"वन से जल, जल से जीवन"।
राजसेवकों ने राजाज्ञा का पालन किया पर इसी बीच शब्दों का उनके अर्थों से तलाक करवा दिया गया। यहाँ हलाला की कोई व्यवस्था नहीं है और प्रेरणादायक नारे भी अब गूँगे हो गये हैं।
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